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Wednesday, July 6, 2016

राजसी कर्म में फल की प्रधानता होती है-हिन्दी चिंत्तन लेख(Hindu Religion thought Article On Society)

                    आप अगर सात्विक हैं पर ज्ञानी नहीं तो आपका राजसी कर्म उस रूप में फलीभूत नहीं रह सकता जिस तरह चाहते हैं। इस संसार में कर्म तीन प्रकार हैं होते है-सात्विक, राजसी तथा तामसिक। इसमें राजसी कर्म में कर्म व फल का भौतिक सिद्धांत चलता है जिसमें कल्पना या आदर्श ढूंढना अज्ञान ही कहा जा सकता है।
                1.राजसी कर्म में संलिप्त लोगों में फल की कामना होती है और जब वह आपका सहयोग करें तो कार्य संपन्न होने पर पुरस्कृत अवश्य करें।
                     2. हम यह कभी मानकर न चलें कि सात्विक व्यक्ति अगर राजसीकर्म में सहयोग कर रहा है तो उसे पुरस्कार की आवश्यकता नही है।  यह मानकर कि वह निष्कामी है और हमारा काम करना उसका कर्तव्य है उसे पुरस्कार न दें। ऐसा सोचना अज्ञान है।
                      3.एक बात याद रखें सात्विक ज्ञानी व्यक्ति की आंतरिक शक्तियां इतनी प्रबल होती हैं कि वह समय पर अगर कर्तव्य निभाता है तो पुरस्कार न मिलने को अपमान समझकर वह दंड भी दे सकता है।
               4.अपना काम निकल जाने पर सात्विक ज्ञानियों को भूल जाने वाले कृतघ्न बहुत जल्दी अपने स्थिति से गिर जाते हैं।

                   हम इतिहास का अध्ययन करें तो जिन राजपुरुषों ने सात्विक, ज्ञानी, तथा योगियों का सम्मान किया उन्होंने दीर्घ अवधि तक राज किया पर जिन्होंने उनका अपमान किया वह अंततः अपनी स्थिति से भ्रष्ट होकर काल कलवित हो गये। महाभारतकालीन विद्वान विदुर जी का कहना है कि बुद्धिमान की बाहें लंबी होती है उससे कभी बैर नहीं लेना चाहिये। उसी तरह उन्होंने यह भी का है कि अपना काम करने वालों को उपयुक्त पुरस्कार देखकर उसकी प्रसन्नता क्रय करना चाहिये।
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Thursday, April 14, 2016

रक्तकुंड अब नीर कहलाने लगे हैं-हिन्दी क्षणिकायें (Hindi ShortPoem)

रौशनी के रहवासी
अंधेरों के घेरे से
घबड़ाते हैं।
नहीं जानते
रौशनी के खंबे
अंधेरी बस्तियों के
मजदूर ही लगाते हैं।
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सौदागर कर रहे
लोगों से घर में
रौशनी के लिये चांद का सौदा।
विज्ञापन के बीच जारी बहस
बेईमानी कम करने पर
भूले ईमानदारी का मसौदा।
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अरसा हो गया
धरती से फरिश्तों को
लापता हुए
अब यादों में ही आते हैं।

अब तो शैतान ही
मुखौटा लगाकर
धोखा देने आते हैं।
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जहान की चिंता करते
शब्दों के व्यापारी
चीज कोई बेचते नहीं
छवि बना लेते भारी।
सपने साथ वादों का
व्यापार अनवरत जारी
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हमने तो हमदर्दी जताई
वह रस्म मानकर सो गये।

हमारे दिल से निकले
शब्द हवा में खो गये।

दर्द हल्का करने का भ्रम
यूं ही ढो गये।
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आत्मघात करने वाले
अब वीर कहलाने लगे हैं।

ज़माने के लिये रोने वाले
अब पीर कहलाने लगे हैं।

कहें दीपकबापू रक्तकुंड
अब नीर कहलाने लगे हैं।
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दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, March 13, 2016

राज्य जोंक की तरह व्यापार से कर वसूल करे-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(State Must libral on Tax for Trade Devlopment-A Hindu Hindi Thought based on ManuSmiriti(

हमारे देश की अर्थव्यवस्था समाजवाद के उस उस खिचड़ी सिद्धांत पर आधारित है जो पूंजीवाद और जनवाद के मिश्रित तत्वों बना है। इस सिद्धांत के अनुसार धनिक से अधिक कर लेकर गरीब का कल्याण किया जाना चाहिये।  जिस कृषि को भारतीय अर्थव्यवसथा का आधार माना जाता है वहां से कोई कर नहीं वसूला जाता-अनेक लोगों ने राय दी थी कि बड़े किसानों पर कर लगना चाहिये पर भारतीय आर्थिक रणनीतिकर इस सोच से भी घबड़ाते हैं कि कहीं उन पर गरीब विरोधी होने का आरोप न लग जाये। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि समाजवाद के नाम पर नये पूंजीपति पैदा होने से रोका गया जिससे कथित विकास के नाम पर चंद औद्योगिक घराने परंपरागत रूप से अपना वर्चस्व बनाये हुए हैं।  उदारीकरण की प्रक्रिया में भी उन्हें ही सुविधायें मिल रही हैं। इससे हुआ यह कि हमारे यहां परंपरागत व्यापार  पर ही करों का बोझ पड़ा है जो कि मध्यमवर्ग ही संचालित करता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम्।
तथ वेष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत् सततं करान्।।
हिन्दी में भावार्थ-राज्य प्रबंधक को कर इस तरह लगाना जिससे व्यापार की बढ़ोतरी होने के साथ कोषालय में यथोचित लाभ पहुंचे। ठीक उसी तरह जैसे जोंक, बछड़ा तथा भ्रमर धीरे धीरे भोजन ग्रहण करते हैं।
अगर हम अपने देश के परंपरागत ढांचे को देखें तो यहां कृषि के बाद उच्च, मध्यम तथा निम्न तीनों वर्ग इस पर आश्रित रहे हैं।  नयी शिक्षा प्रणाली जहां पहले ही व्यापार करने की प्रवृति का हतोत्साहित कर रही थी वहीं अब आधुनिक विकास ढांचे में उसके लिये जगह ही नहीं बची है। औद्यागिक संस्थान अपने उत्पादों का व्यापार स्वयं कर रहे हैं। इतना ही नहीं आवश्यक खाद्य पेय वस्तुओं को भी वह बृहद व्यापार संस्थानो में विकास की वस्तुऐं बना रहे हैं जिससे परंपरागत व्यापार का स्वरूप ढहता जा रहा है जो कि हमारे समाज का कृषि के बाद दूसरा ठोस आधार है।
यह सही है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है पर समाज के केंद्र बिंदू में स्थित होने के कारण व्यापारिक वर्ग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यही वर्ग संस्कार, संस्कृति तथा धर्म की धारा का नियमित प्रवाह भी करता रहा है। अगर हम चाहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था सृदृढ़ हो तो हमें इस वर्ग में प्रोत्साहन की धारा प्रवाहित करनी होगी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
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Saturday, February 27, 2016

अज्ञानी को दान लेने का हक नहीं-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख (Agyani ko Daan lene ka hak Nahin-A Thought article Basee on ManuSmriti)

                         कुछ जनवादी संगठनों के कथित वैचारिक युवा अक्सर मनुस्मृति को जलाने की बात करते सुने।  कहते हैं कि उसमें दलितों के लिये खराब बातें कही गयी हैं।  उनकी बात सुनकर हमारी राय तो यह बनी है कि जिस तरह श्रीमद्भागवत को पढ़ने के बावजूद उसे समझे बिना उसके ज्ञान का प्रचार पेशेवर ज्ञान प्रचारक करते हैं उसी तरह ही मनुस्मृति के कुछ अंश पढ़े बिना ही उसका दुष्प्रचार करने वाले भी विद्वान  कम नहीं है। पहली बात तो यह कि मनुस्मृति में जन्म के आधार पर जाति का उल्लेख है तो कर्म भी उसके निर्माण का तत्व माना गया है। इसका आशय यह है कि जन्म के आधार पर एक जाति हो सकती है तो कर्म के आधार पर उसमें बदलाव भी माना जा सकता है।  दूसरी बात यह कि हर प्रकार के कर्म करने वाले का यह धर्म है कि अपनी योग्यता के अनुसार ही उपलब्धि ग्रहण करे।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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आतपास्त्वनाधीयानः प्रतिग्रहरुचिद्विंजः।
अम्भस्यश्मप्लचेनैव सह तेनैव मजति।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान तपस्या व विद्या से रहित होने पर भी दान लेता है वह नरक भोगता है जैसे पत्थर की नाव पर चढ़ने वाला व्यक्ति उसके साथ ही डूब जाता है।
                        हमारे यहां दान की परंपरा है उसमें यह शर्त जोड़ी गयी है कि सुपात्र को ही दिया जाना चाहिये।  सुपात्र में किसी की जाति का उल्लेख नहीं है इसलिये किसी वर्ण विशेष पर दान से कृपा नहीं हो सकती। इतना ही नहीं जो आमजनों में ज्ञान प्रचार का काम करते हैं वह भी अगर उस राह पर नहीं चलते तो उन्हें भी दानदक्षिणा लेने का अधिकार नहीं-यही मनुस्मृति में कहा गया है। कभी कभी तो लगता है कि मनुस्मृति का विरोध करने के लिये कथित उच्च जाति के ज्ञान विक्रेता दलित जाति के लोगों को इसलिये उकसाते हैं ताकि उसमें जो जाति, धर्म तथा ज्ञान के जो सिद्धांत बताये गये हैं उसे वह न पढ़ें न समझें। उनका लक्ष्य समाज में अज्ञान के अंधेरे में स्वर्ग की कृत्रिम रौशनी बेचकर अपना धंधा बनाये रखना है। इतना ही नहीं मनुस्मृति में भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा हत्या के भी कड़े दंड बताये गये हैं जिससे कुछ लोग भयभीत हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, February 14, 2016

ज्ञान से प्रतिपक्षी को परास्त करें-हिन्दी चिंत्तन लेख (Gyan se praipakshi ko parast kar-Hindi Thought article)


                        सामाजिक जनंसपर्क ने जहां विश्व में धाक जमाई हैं वहीं अभद्र भाषा के शब्दों के प्रयोग ने चिंता का वातावरण भी बनाया है। अनेक बार ऐसा होता है कि हम जैसे लेखक किसी फेसबुक, ट्विटर वह ब्लॉग पर प्रदर्शित सामग्री पर असहमति जताने की चाहत इसलिये भी छोड़ देते हैं कि वहां बीभत्स शब्द पहले ही दर्ज होते हैं। यह डर लगता है कि कहीं हम आक्रामक विरोधियों के साथी न समझ लिये जायें। शुद्ध देशी भाषा की गालियां देखकर मन खराब हो जाता है। दुनियां में संसार में समाज भिन्न व्यक्तियों, विचारों व विषयों के समूह से ही बनता है।  भिन्नता से भरा है इसलिये तो समाज कहलाता है। एकरूपता होने पर तो एक ही इकाई ही कहलाता न! ऐसे में अपने से प्रथक विचार वाले व्यक्ति की उपस्थिति सहजता से स्वीकार करना चाहिये न कि उस पर आक्षेप लगाकर अपने अंदर कुंठा लाना चाहिये।
                        सामवेद में कहा गया है कि ऋतस्य जिव्हा पवते मधु।सच्चे मनुष्य की वाणी से मधु टपकता है।
                        जब हम किसी विचार से असहमत हों तो उस पर प्रतिविचार अभिव्यक्त कर सकते हैं-यही ज्ञानी होने का प्रमाण भी होता है। तर्क में भार बढ़ाने के लिये अभद्र शब्द का पत्थर रखना आवश्यक नहीं-अगर रखते हैं तो यही माना जायेगा कि वक्ता या लेखक में अपने ही शब्दों के प्रति विश्वास नहीं है।
                        अथर्ववेद में कहा गया है कि क्षिणामि ब्रह्णामित्रायुन्नयामि स्वानहम्।ज्ञान से विरोधियों का क्षरण कर अपने को आगे बढ़ाये।
                        हमारे देश में विद्वानों के बीच विचाराधाराओं का द्वंद्व सदैव रहा है। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के वाहक होने के नाते हमारा अन्य  विचाराधारा के विद्वानों से मतभेद रहा है। उनसे बहसें भी होती रहीं है पर हमने हमेशा अपनी सहज प्रवृत्ति से उनके सामने अपने तर्क रखे हैं। इधर अंतर्जाल पर प्रगति व जनवादी विद्वान भी अपनी पूरी उसी पूरी शक्ति के साथ सक्रिय है।  उनका राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों से पंरपरागत प्रचार माध्यमों में सदैव वाद विवाद रहा है पर इधर अंतर्जाल पर भयानक वाक्युद्ध में बदल गया है। चूंकि राष्ट्रवादी विचाराधारा के लेखक हमारा अध्यात्मिक लेखन के कारण हमारा सम्मान करते हैं इसलिये उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वह सभी का सम्मान करें। खासतौर से जब राष्ट्रवादी भारत के प्राचीन दर्शन को जब अपना प्रिय विषय मानते हैं तब यह आशा तो की ही जाती है कि वह ज्ञान से प्रतिपक्षियों को परास्त करें। यही हमारे वेद  भी कहते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, January 15, 2016

अंतर्जाल पर सक्रिय प्रतिभाओं को सम्मान देना चाहिये-26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर विशेष हिन्दी लेख(Special Hindi article on 26 january Republic Day)


                             अब 26 जनवरी गणतंत्र दिवस आ रहा है।  इस अवसर पर कला, साहित्य, कला, पत्रकारिता तथासमाज सेवा में सक्रिय महानुभावों को पद्म भूषण पद्मविभभूषण तथा पद्मश्री सम्मान दिये जाने की घोषणा होनी है।  ऐसे समाचार भी आते रहे हैं कि पहुंच तथा पैसे वाले कथित महानायक इन पुरस्कारों का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं।  हमारे यहां प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों को सम्मानित करने की परंपरा अधिक रही है। राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों, कलाकारों, पत्रकार तथा समाजसेवकों की उपेक्षा का आरोप हमेशा लगता रहा है। इसके अलावा संगठित व्यवसायिक क्षेत्र से अलग हटकर कार्य करने वालों की अनदेखी करने की बात भी कही जाती है।  पिछले कुछ वर्षों से अंतर्जाल पर भी अनेक लोग सक्रिय हैं पर किसी को भी इस आधार पर सम्मान नहीं मिला वह भी प्रतिभाशाली हैं। 
हमारी राय है कि पद्म भूषण व पद्मश्री पुरस्कार अब अंतर्जाल पर कार्यरत लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों तथा कार्टूनिस्टों को दिये जायें जो सिफारिश नहीं कर पाते उनकी तरफ ध्यान देना चाहिये। अंतर्जाल पर सक्रिय प्रतिभाओं  को संगठित क्षेत्र की विभूतियों  के समकक्ष न समझना अन्याय है। इस 26 जनवरी उन्हें पदम् सम्मान देकर नहीं धारा प्रवाहित की जाये तो अच्छा रहेगा। अब इंटरनेटयुग है इसमें बाज़ारवाद से ऊपर उठकर सांस लेने वाले किताबें छपवाने में अनिच्छुक लेखक व कार्टूनिस्ट सक्रिय हैं। उन्हें सम्मान देकर नयी परंपरा बने तो इन सम्मानों की प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी। अंतर्जाल की विभूतियों को पद्म भूषण व पद्मश्री सम्मान देने से यह साबित होगा कि भारत ने नये युग में प्रवेश किया है। 26 जनवरी पर अंतर्जालीय विभूतियों का पद्भूषण पद्मश्री सम्मान देने से उन युवा प्रतिभाशाली लोगों का मनोबल भी बढ़ेगा जो स्वतंत्र रूप से कला व लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं। व्यवसायिक क्षेत्र के लोगों को सम्मान देते रहने से आम लेखकों व कलाविदों में यह भाव है कि केवल पैसे और पहुंच वालों को ही पद्मभूषण व पद्मश्री सम्मान मिलते हैं। इस बार परंपरा से हटकर इंटरनेट की प्रतिभाओं को पद्मभूषण व पद्मश्री सम्मान देने से युवाओं का रचनात्मक क्षेत्र की तरफ रुझान बढ़ेगा। इंटरनेट की प्रतिभाओं को पद्म भूषण व पद्मश्री सम्मान देने से यह संदेश भी निकलेगा कि राज्यप्रबंध लीक से हटकर काम कर रहा है।
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Thursday, December 24, 2015

सजा के विषय पर विदेशी विचारों का अनुकरण संभव नहीं(Crime in India and Punishment,No Equality like west)


                     हमारे देश में बढ़ती जनसंख्या के लिये यहां के समशीतोष्ण जलवायु भी मानी जाती है। कहा जाता है कि भारत में ग्रीष्म की प्रधानता के कारण यहां लोगों में जनसंख्या वृद्धि रखने की प्रवृत्ति है।  जनसंख्या की वृद्धि अनेक समस्याओं की जनक है जिसमें अपराधों की वृद्धि स्वाभाविक है।  अतः कम से कम हम ऐसे अनेक अपराधों से निपटने में पश्चिम के उदार रवैये का अनुसरण बिना विचारे नहीं कर सकते जिसकी अपेक्षा मानवाधिकार के प्रचारक करते हैं।
                           संविधान के अनुसार बाल अपराध नियम में आयु 18 से घटाकर 16 की गयी है। यह स्वागत योग्य है पर हमारी राय यह भी थी किसी प्रकरण विशेष में अभियुक्त की आयु तीन या चार माह कम होने पर  न्यायाधीशों को भी विवेक का उपयोग करने का अधिकार होना चाहिये। भारत की तुलना मानवीय स्वभाव की दृष्टि से शेष विश्व से नहीं की जा सकती है।  कहा जाता है कि  उष्णजलवायु व  जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत में बालक जल्दी बड़ा  या कहें बुद्धिमान होता है। इसके साथ ही  गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ेपन की स्थितियां होने सेे  अनेक बच्चों को  14 वर्ष की आयु में ही खींचतान के युवा बनाकर मजदूरी  या अपराध करने के क्षेत्र में उतरने को बाध्य किया जाता है। केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी जी सही कहती हैं कि असभ्य  लोग अपने बच्चों को कानून में आयु का लाभ उठाकर आपराधिक कृत्य में लगा देते हैं। हमारा मानना है कि 16 वर्ष बाल अपराध की आयु मानने के साथ ही  न्यायाधीशों को 3 से 4 माह कम होने पर स्वविवेक उपयोग करने का हक तो  देना ही चाहिये। बाल न्याय कानून में बदलाव करना आवश्यक था पर इसका विरोध होना समझ से परे रहा। वैसे जजों को विवेक का अधिक होना चाहिये।
          हमारे यहां वैसे भी न्यायाधीश को भगवान का दूसरा रूप माना जाता है। इसलिये आधुनिक न्याय व्यवस्था में न्यायाधीशों को केवल किताबी कानून पर चलने की बजाय स्वविवेक से निर्णय करने की भी स्वतंत्रता होना चाहिये।
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Sunday, December 13, 2015

बाबा रामदेव की योगी व उत्पाद विक्रेता की छवि का संघर्ष( Imege of Baba Ramdev between Yogi and Product Seller)

                               इधर हम अंतर्जाल पर सामाजिक जनसपंर्क लेखकों की टिप्पणियां और पाठ देखते है तो लगता है कि  बाबा रामदेव के उत्पादों पर उनकी नकारात्मक दृष्टि हो गयी है।  इनमें से अधिकतर वह लोग हैं जिन्हें स्वाभाविक रूप से बाबा रामदेव या भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का विरोधी नहीं माना जा सकता। ऐसे लेखकों में भारतीय अध्यात्मिक तत्व मौजूद हैं पर वह बाबा रामदेव के योग से दूर हटकर व्यवसायिक रूप में आने पर निराश हैं। यदि वह परंपरागत विचारधाराओं के लेखक होते तो शायद हम उनके शब्दों को अनदेखा कर देते पर चूंकि वह स्वतंत्र लेखक हैं इसलिये हमारा मानना है कि उनकी आपत्तियों पर विचारा होना ही चाहिये।
                               बाबा रामदेव ने भारतीय योग साधना को आमजनों में लोकप्रिय बनाने का जो काम किया, वह अनुकरणीय है। हम जैसे योग और ज्ञान साधक  उनकी तुलना भक्तिकाल के महापुरुषों से करते रहे हैं। आमजनों में उनकी छवि रही है पर लगता है कि दवाईयां, बिस्कुट, आटा, घी तथा पेय पदार्थ बेचते बेचते उसका क्षरण  हो रहा है। अभी तक यह देखा गया कि भारतीय अध्यात्मिक के जीवंत व्यक्तित्व के रूप में ऐसी छवि  बनी हुई है जो अक्षुण्ण रहेगी। अब जिस तरह उनके उत्पादों के प्रति नकारात्मक चर्चा प्रचार माध्यमों के स्वर नकारात्मक हो रहे है वह दुःख से अधिक चिंता का कारण है। आगे इन्हीं उत्पादों का नकारात्मक पक्ष आने पर उनकी छवि प्रभावित भी हो सकती है। हम जैसे अध्यात्मिक चिंत्तकों के लिये यही चिंता का विषय है।
                               हमें याद है जब चौदह वर्ष पूर्व उद्यान में हम कुछ योगसाधना के दौरान जब सिंहासन व हास्यासन करते थे तो लोग मजाक उड़ाते थे। तालियां बजाते थे तो लोगों को लगता कि शायद यह मानसिक रोगी हैं। बाबा रामदेव के प्रचार पटल पर आने के बाद अब लोग समझ गये कि योग साधक वास्तव में करते क्या हैं? इसका मतलब यह भी है कि प्रचार की वजह से ही उन्हें लोकप्रियता मिली।  अब योगशिक्षा से अधिक उनके उत्पादों का प्रचार हो रहा है जिसमें कहीं दोष भी बताया जाता है। ऐसे में लग रहा है कि कहीं ऐसा तो नहीं धीरे धीरे उनकी छवि से जुड़े योग को जनमानस में विस्मृत करने का प्रयास हो रहा है। हमारा विचार है कि बाबारामदेव को अपनी योग की छवि पर ही अधिक ध्यान देना चाहिये। वैसे भी योग साधना जहां पूर्ण रूप से अध्यात्मिक विषय हैं वही विक्रय योग्य वस्तु राजसी गुण का प्रतीक है जिसमें ऊंच नीच होता ही रहता है।  ऐसे में अगर अध्यात्मिक छवि के आधार पर राजसीकर्म का विस्तार होता है तो उसका प्रभाव भी परिणाम के अनुसार अच्छा बुरा हो सकता है।
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Friday, December 4, 2015

कमजोर को सजा-हिन्दी कविता (Kamjor ko Saja dete hain-Hindi kavita)

किसी के दुखती नस पर
हाथ रखकर
लोग मजा लेते हैं।

अपने गम
छिपाने के लिये
दिल बजा लेते हैं।

कहें दीपकबापू जिंदा जज़्बात से
रिश्ता तोड़ चुका ज़माना
लोग अपने कसूर की
कमजोर को सजा देते हैं।
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Wednesday, December 2, 2015

जिसे जिज्ञासा नहीं उसे ज्ञान देना निरर्थक-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख (jise Jigyasa nahin use gyan dena Vrath-Hindu spirituly Thught base on ChankyaNiti)

                             भारतीय पंथ व ज्ञान का प्रचार करने वाले अक्सर पश्चिमी पंथ मानने वालों को अध्यात्मिक दर्शन का उपदेश देकर यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि कोई बडा़ काम कर रहे हैं। हम यह तो नहीं कह सकते कि पश्चिमी पंथ मानने वाले सभी भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परिचित नहीं है पर इतना जरूर देखा है कि अनेक लोगों में यह प्रवृत्ति  है कि वह इसे न समझना अपना गौरव समझते हैं।  हमारे भारतीय दर्शन के अनुसार अध्यात्मिक संस्कार बचपन में पड़ गये तो सही वरना बड़ी उम्र में तो इसकी संभावना नगण्य है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अन्तःसारविहीनामुपदेशो न जायते।
मलगाचलसंर्गात् न वेणश्चन्दनायते।।
हिन्दी में भावार्थ-जिसके अंतकरण में सार समझने का अभाव है उसे उपदेश देना व्यर्थ है। वह मलयगिरी के पर्वत की तरह है जहां आने वाली वायु के स्पर्श से भी बांस चंदन नहीं होता।

                             दूसरी बात यह भी देखी गयी है कि भारतीय पंथ के प्रति नकारात्मक भाव तथा पश्चिमी पंथ अपनाकर समाज में प्रथक दिखने की प्रवृत्ति कुछ लोगों में  इस तरह भरी हुई है कि उसे सहजता से नहीं हटाया जा सकता।  इसलिये हमारी भारतीय ज्ञान के प्रचारकों को सलाह है कि वह भारतीय पंथों पर चलने वाले समाज से अधिक संवाद करें क्योंकि हमारी दृष्टि से यह आवश्यक है कि वह सबसे पहले मजबूत बने।
हिन्दुत्व को चुनौती देने वाले गलत-ट्विटर पर टिप्पणियां
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 ताज्जृब जिस हिन्दुत्व का आधार वह गीता है जो चार प्रकार के भक्त तथा तीन प्रकार की भक्ति का अस्तित्व स्वीकार करने का संदेश देती है उसे ही असहिष्णु बताया जा रहा है।  श्रीमद्भागवत्गीता को हर हिन्दू मानता है इसलिये किसी भी भक्त के आराधित इष्ट रूप तथा उसकी भक्ति के पंथ पर टिप्पणी नहीं करता।  उस हिन्दू तथा उसके हिन्दुत्व को वह लोग चुनौती दे रहे हैं जिन्होंने धनदाताओं के अनुसार अपनी कलम से  शब्द रचने के साथ ही मंचों पर  मुख से बोले। एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि वैश्विक आतंकवाद को वैचारिक आधार पर केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। जिन्हें यह टिप्पणी पसंद नहंी है तो वह बतायें कि क्या रामायण, श्रीमद्भागत तथा वेद का अध्ययन करने वाले किसी व्यक्ति ने आतंकवाद का रुख किया है?
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Wednesday, November 25, 2015

गुरुनानकदेवजी पूरे विश्व के लिये प्रेरक-गुरुनानक जंयती पर लेख(Gurunanakji Inspiration for all World-Hindi Article on Gurunanak Jayanti hindi lekh)

आज गुरुनानक जयंती देश भर में मनाई जा रही है। हमारे देश में आजादी के पहले तक धार्मिक विभाजन की चर्चा नहीं होती थी पर अब लोग करने लगे हैं-इससे एक बात साफ होती है कि देश में अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव है। गुरुनानक जी ने हिन्दू धर्म में अंधविश्वासों के निवारण का ऐसा काम किया जिसे देश में चेतना का वातावरण बना-इसी कारण उन्हें भगवत्रूप माना जाता हैं। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधाराओं को मानने वाले सभी लोग  गुरुनानक जी को मानते हैं पर कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले उन्हें सिख धर्म के प्रथम प्रवर्तक के रूप में ही प्रचारित करते हैं। गुरुग्रंथ साहिब में अनेक बार राम का नाम लिखा है। इसके संदेश इतने स्पष्ट हैं कि उन्हें समझकर कोई भी व्यक्ति संसार का सत्य समझ सकता है।
गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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साधो रचना राम बनाई।
इकि बिनसै इक अस्थिरु माने अचरजु लखिओ न जाई।।
                           हिन्दी में अर्थ-यह संसार राम की रचना है। हैरानी इस बात की है कि एक आदमी सबके सामने मरता है फिर भी अन्य लोग यह सोचते हैं कि वह तो हमेशा स्थिर रहने वाले हैं।
                           इस तरह अनेक संदेशों का अर्थ समझें तो ऐसे लगेगा कि हम अनेक प्रकार के भ्रमों में जी रहे हैं। हम अपने साथ अनेक प्रकार की आशायें, कामनायें तथा इच्छायें लिये होते हैं जो कालांतर में भय, निराशा तथा तनाव का वातावरण बनाती हैं। इसलिये आज गुरुनानक देव जी के संदेशों को अधिक से अधिक समझने की जरूरत है।
                           गुरुनानक जी जैसे महापुरुष संसार में सदियों बाद आते हैं। यह हमारी भारतभूमि के लिये गर्व की बात है कि ऐसे महापुरुष पूरे विश्व के लिये प्रेरक बनते हैं। गुरुनानक जयंती पर सभी ब्लॉग लेखक साथियों, फेसबुक मित्रों तथा ट्विटर के अनुयायियों को बधाई।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, November 21, 2015

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की तुलना विदेशी विचारधाराओं से करना व्यर्थ(Indian Spiritual Thought And Other Riligion Policy)


अक्सर कहा जाता है कि सभी धर्म मनुष्य को शांति, अहिंसा और प्रेम से रहना सिखाते हैं।  सच बात तो यह है भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान दर्शन की विश्व की किसी अन्य विचाराधारा से कोई तुलना नहीं है। यहां तक  कि विश्व की अनेक विचाराधाराओं की किताबों की तुलना श्रीमद्भागवत ग्रंथ से करते हुए कहा जाता है कि सभी प्रेम अहिंसा तथा उदार रहना सिखाती हैं। यह केवल एक नारा भर है।  श्रीमद्भागवत गीता तथा हमारे अन्य शास्त्र केवल इष्ट स्मरण की आराधना करना ही नहीं सिखाते वरन् अपने मन मस्तिष्क के विकार निकालने की प्रेरणा भी देते हैं। जबकि अन्य विचारधारायें विकार निकलाने की कला नहीं सिखातीं।
पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि
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कायेन्दियसिद्धिरशुद्धिक्षयान्तपस।
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                           हिन्दी में भावार्थ-तप के प्रभाव से जब अशुद्धि का नाश हो जाता है तब शरीर और इंद्रियों की सिद्धि भी हो जाती है।
                           सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप की आराधना हो मन मस्तिष्क में शुद्धता के बिना फलीभूत नहीं हो सकती।  हम जब विश्व में शांति तथा सुख की कल्पना करते हैं तो उसके लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की राह चलना आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि भारतीय दर्शन में अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषय अलग कर संदेश दिया जाता है जबकि पश्चात्य विचाराधाराओं में सांसरिक विषयों से ही सर्वशक्तिमान पाने की कल्पना की जाती है।  हमारा मानना है कि विश्व में शांति, एकता, अहिंसा तथा विकास का वातावरण स्थापित करने के लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का प्रचार प्रमाणिक विद्वानों के माध्यम से किया जाना चाहिये। ऐसे ही विद्वान प्रमाणिम माने जा सकते हैं जो अपने जीवन निर्वाह के लिये गृहस्थाश्रम या धर्म में स्थित होकर योग साधना की शिक्षा देते हुए विचरते हैं।  सन्यास के नाम पर पंचतारा सुविधाओं में आश्रमों के निवासियों को विद्वता की दृष्टि से प्रमाणिक नहीं मान जा सकता। जयश्रीराम, जयश्रीकृष्ण, सुप्रभात।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Wednesday, November 18, 2015

भारत में सहशिक्षा पर विचार करना आवश्यक(Bharat mein Sahshiksha par vichar karna Awashyak)


                                   
                                   भारत में छात्र छात्राओं की सहशिक्षा पर सदैव विवाद चलता रहा है। जहां आधुनिकतावादी सहशिक्षा को पौंगपंथी मानते हैं वह सामाजिक, धार्मिक तथा स्वास्थ्य विशेषाज्ञों का एक समूह आज भी इसका समर्थक है।  केरल के शिक्षामंत्री ने कहीं कह दिया कि महाविद्यालय में लड़के लड़कियों को एक साथ नहीं बैठना चाहिये। इसे प्रचार माध्यम विवादित कहकर शोर मचा रहे हैं।
                                   इस तरह के बयान पहले भी आते रहे हैं जिन्हें दकियानूसी कहकर खारिज किया जाता है पर सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक दिखने के प्रयास में प्राकृत्तिक सिद्धांतों की अनदेखी तो नहीं कर रहे।
                                   भारत को विश्व में समशीतोष्ण जलवायु वाला माना जाता हैं। यहां गर्मी और सर्दी अधिक पड़ती हैं।  अशिक्षा, गरीबी तथा बेकारी के कारण जनसंख्या बढ़ती है। कहा जाता है कि जहां विकास हो वहां जनंसख्या नियंत्रण स्वयं हो जाता है। भारत में उष्णता की प्रचुरता के कारण यौनिक उन्माद की प्रवृत्ति अधिक मानी जाती है। हम यह भी देख रहे हैं कि युवा रिश्तों में खुलेपन की वजह से अनेक प्रकार के संकट भी पैदा हो रहे हैं।  सबसे बुरी बात यह कि शैक्षणिक संस्थानों में जिन्हें मंदिर भी कहा जाता है वहां सहशिक्षा के चलते लड़के लड़कियों के बीच पाठयक्रम की कम अन्य विषयों पर चर्चा अधिक होती है। वहां परंपरागत खेलों की जगह प्रेम या मित्रता के नाम पर खेल होने लगता है। हम भारत की किसी भी भाषा में बनी फिल्म को देखें तो पायेंगे कि शैक्षणिक संस्थान केवल प्रेम करने के लिये ही होते हैं।  फिल्मों का प्रभाव समाज पर कितना है हम सभी जानते हैं और इनकी देखादेखी जहां सहशिक्षा है वहां अनेक ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो बताती हैं कि वास्तव में अब विचार किया जाना चाहिये।
                                   पहले तो मनुष्य में दैहिक तथा मानसिक संयम अधिक होता था पर आज तो उसकी शक्ति का हृास हो गया है। ऐसे में ऐसी राय ठीक है पर कोई न माने यह अलग बात है पर कम से कम शोर तो न मचाये। हम अपने देश में जिस तरह अनेक  छात्र तथा छात्राओं के शिक्षा से इतर गतिविधियों से उनके पालको परेशान देखते हैं उससे तो यह लगता है कि अब भी छात्र छात्राओं के लिये प्रथक शैक्षणिक संस्थान बने रहना जरूरी है। कम से कम भारत में जो सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्थिति है उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है। सुप्रभात
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Monday, November 16, 2015

पेरिस पर हमले से अभी सबक सीखा नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख(Not Lesson learn from Paris Attack or Paris Terror-Hindi Thought article)


                                   पेरिस पर हमले के बाद पूरे विश्व में उथलपुथल मची है। उस पर कहने से पूर्व हम भारतीय योग सिद्धांत की बात करें। यह सच है कि क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। हम अगर किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति से अनुकूल प्रतिक्रिया चाहें तो अपनी किया उसके अनुरूप करनी होगी।  दूसरा कर्म और फल के सिद्धांत को भी ध्यान रखना होगा। यूरोप तथा अमेरिका हथियारों के उत्पादक तथा निर्यातक देश हैं।  पेरिस पर निरंतर हो रहे हमलों को हम धर्म तथा लोकतंत्र के सीमित दृष्टिकोण से उठकर व्यापक चिंत्तन के दायरें में आयें तो पता चलेगा हर व्यापारी अपनी वस्तु का प्रचार करते हुए उसके प्रयोग का भी प्रचार करता है। इसलिये संभव है कि पहले अपराधियों को ऐसे हथियार देकर उनके हमलों से प्रचारित अपने हथियारों के  बेचने का बाज़ार बनाते हों।
                                   हम एशियाई देशों की सेनाओं तथा पुलिस विभागों की स्थिति में नज़र डालें तो उनसे पहले नये हथियार अपराधियों के पास आये।  उससे प्रभावित होकर संबंधित देशों ने उत्पादक देशों से हथियार खरीदे। एक-47 बंदूक इसका प्रमाण है।  एशियाई देशों ने खरीदी पर बाद में पता चला कि उसका नया रूप पहले ही अपराधियों के पास आ गया है।  अमेरिका व यूरोप हथियार निजी क्षेत्र के माध्यम से हथियार बेचते हैं जिन्हें क्रेता के प्रमाणीकरण की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे में संदेह होता है कि हथियारों के मध्यस्थ कहीं आतंकवादियों को प्रचार नायक तो नहीं बनाते? अमेरिका ने सीरिया सरकार के विद्रोहियों की सहायता के लिये हथियार हवाई जहाज से नीचे गिराये थे-जिनके संबंध आतंकी संगठनों से प्रत्यक्ष दिख रहे थे।  अमेरिका मध्यपूर्व में अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये जिन संगठनों को अपना मित्र समझता है उन्हें शेष विश्व आतंकी कहता है। इस तरह विश्व के राज्यप्रबंधकों तथा आतंकवादियों के बीच एक ऐसा रिश्ता है जिसकी व्याख्या करने बैठें तो एक ग्रंथ लिखना पड़ेगा।
                                   मध्यपूर्व में जबरदस्त अस्थिरता फैली है और हमारा अनुमान है कि उसका प्रकोप काम होने की बजाय बढ़ते रहने वाला ही है। आतंकवादी जिन देशों को ललकार रहे हैं वह सभी कहीं न कहीं हथियार के कारखानों की कमाई से अपनी संपन्नता बढ़ाने  वाले रहे हैं।  अब उनके सामने स्वयं के बने हथियार दुश्मन की तरह सामने आने वाले हैं।  मध्यपूर्व से लाखों शरणार्थी इन देशों में गये हैं जिनके साथ आतंकवादी भी हैं।  पेरिस में हुए हमलों से यह जाहिर हो गया है कि इन संपन्न देशों का राज्यप्रबंध के अभेद होने का भ्रम समाप्त हो गया है। जिस तरह इन देशों के राजकीय प्रबंधकों की प्रतिक्रियायें सामने आयी हैं उससे तो नहीं लगता कि वह जल्दी आतंकवादी पर विजय प्राप्त करेंगे।  वैसे जिन लोगों ने पचास वर्षों से लगतार समाचार देखे और पढ़े हों उन्हें पता है कि कोई राजनीतिक, धार्मिक या वैचारिक संघर्ष प्रारंभ होता है तो वह अगले दस वर्ष तक चलता है।  जब थमता भी तो उसके कारण प्राकृतिक होते हैं-राजकीय प्रबंधक बयानबाजी तक ही सीमित रहती है।
                                   अब योग और भारत की बात करें।  कुछ लोगों को चिंता है कि भारत में भी मध्यपूर्व के आतंकवादी संगठन आ सकते हैं। हमारे पास खुफिया संगठन नहीं है पर योगदृष्टि से हमें यह आशंका नहीं लगती।  एक बात तो यह कि भारत ने कोई हथियार योग नहीं किया-उसने बंदूकें तोप या टैंक नहीं बेचे जो उनका मुंह हमारी तरफ होगा।  इसलिये जिन्होंने युद्ध योग किया है उन्हें प्रतियुद्ध भी झेलना ही होगा। अगर इन देशों को प्रतियुद्ध से बचना है तो युद्ध योग से बचते हुए हथियार के कारखाने बंद करने होंगे। जिसकी संभावना नहीं दिखती। उल्टे जिस तरह यह देश मध्यपूर्व देशों में अधिक हमले कर रहे हैं उससे शरणार्थी संकट बढ़ेगा और आतंकी इन्हीं देशों में जायेंगे।  आखिरी सलाह भारतीय प्रचार माध्यमों को भी है कि वह मध्यपूर्व के आतंकी संगठनों का नाम अधिक न लें कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान कहीं उसके नाम से आतंकी भेजने लगे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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Friday, November 6, 2015

संतों की मतभिन्नता से खिन्नता लाने की आवश्यकता नहीं-अष्टावक्रगीता के आधार पर चिंत्तन लेख(A Hindu Spirutual Thought article based on Ashtawakaragita)

         
            भारतीय धर्म दर्शन में अनेक ग्रंथ है। इनके आधार पर हर कोई अपनी समझ के अनुसार व्याख्या करता है।  अब यह अलग बात है कि भाषा, भाव और शैली की भिन्नता के  कारण इन व्याख्याताओं के कारण अनेक प्रकार के ज्ञान संचार में विरोधाभास पैदा होते हैं। अनेक व्यवसायिक व्याख्ता धारणा शक्ति के अभाव में केवल ज्ञान रट कर ही ज्ञान सुनाते हैं। दूसरी बात यह कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में साकार-निराकार और सकाम-निष्काम भक्ति को सहजता से स्वीकार किया है पर हमारे पेशेवर धार्मिक शिक्षक दोनों की इनकी प्रथक प्रथक व्याख्या नहीं करते इस कारण भी उनके विचार तथा  आचरण में अंतर रहता है।  वैसे भी कथनी और करनी के अंतर को पाटना कठिन होता है ऐसे में पेशेवर धार्मिक शिक्षक मतभिन्नता फैलाकर समाज को भ्रमित करते हैं।

अष्टावक्र गीता में कहा गया है कि
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नाना मतं महर्षि साधूनां योगिनां तथा।
दृष्टवा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः।।
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                                   हिन्दी में भावार्थ-महर्षियों, योगियों तथा साधुओं के प्रथम मत होते हैं। यह देखकर उपेक्षा को प्राप्त मनुष्य शांति नहीं पाता।
                                   इस मतभिन्नता के कारण अनेक जिज्ञासु खीझ जाते हैं।  उनको हमारी सलाह है कि वह इस खिन्नता से बचने के लिये स्वयं धर्मग्रथों का स्वयं अध्ययन करें। पहले शब्द का अर्थ स्वयं ग्रहण करें फिर उस पर चिंत्तन से अपनी राय बनायें। पहले जब देवभाषा संस्कृत का प्रभाव व्यापक नहीं था तब सामान्यजन विद्वानों की सभा में श्रवण कर ज्ञान सुनते थे जिसे आज सत्संग परंपरा कहा जाता है। यह अलग बात है कि कालांतर में ऐसे अनेक विद्वान गुरु कहलाने में मोह में फंसकर मायावी लीला करने लगे। अब तो अक्षरज्ञान वाला बृहद समाज है पर फिर भी अध्ययन कर स्वयं ज्ञानी बनने की बजाय लोग इन पेशेवर विद्वानों की शरण लेते हैं। इससे भक्त लोगों के शोषण की परंपरा बन गयी है। इसका एक ही उपाय है कि धर्मग्रथों का स्वयं अध्ययन करें।
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