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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Wednesday, April 19, 2017

अंतर्जाल पर सौम्य व सुंदर तस्वीर दिखाने वाले सदाबहार बने रहें (Internet And Beutiful Foto)


                                 हमारे दो फेसबुक खाते हैं। पहले सार्वजनिक फेसबुक के एक या दो वर्ष दूसरा  केवल निजी संपर्क वाले लोगों के लिये ही बिनाया था। देखते देखते वहां मित्रों का झुंड बन गया। हम दस वर्ष से अंतर्जाल पर सक्रिय है। आरंमिक दौर में अपने जैसे ही फुर्सतिया लेखकों ने हमें प्रोत्साहित किया पर फेसबुक के बाद वह छूट गये। इनमें से कुछ आज भी साथी हैं। तब हिन्दी भाषा इतनी नहीं लिखी और पढ़ी जाती थी जितनी अब।  अंतर्जाल पर निजी मित्र तो कोई था ही नहीं। उस समय जब हम लोगों को बताते थे कि हम अंतर्जाल पर लिखते हैं तो मासूमियत से देखते थे। अब निजी संपर्क वाला ऐसा कौनसा नाम है जिसे ढूंढने निकले और वह मिले नहीं।  कईयों को हम देखते हैं पर उन्हें अपना फेसबुक दिखाने नहीं जाते।  भूले बिसरे लोगों को ढूंढ निकाला। उम्र की कोई सीमा नहीं देखी।  सतर से अस्सी वर्ष के  लोगों को फेसबुक से ढूंढ निकाला। हम सतत फेसबुक नहीं बैठते-समय नहीं ढूंढते, मिलता है तो बैठ जाते हैं।
                    हमारी राय में फेसबुक पर मनोविज्ञान का अध्ययन सहजता से किया जा सकता है। दोनों फेसबुक पर एक मजेदार बात हमने देखी है। निजी संपर्क वालों में एक पहचान और सार्वजनिक संपर्क वाले पर दो मित्र महिलाओं की सौम्य, सुंदर तथा आकर्षक तस्वीरों डालते हैं। दोनों की उम्र समान होगी पर जातीय पहचान अलग है। इनकी तस्वीरें एक ही दिन में एक से दस तक हो सकती हैं। तय बात है कि यह लोग स्वयं उनका संग्रह नहीं करते बल्कि यहीं अंतर्जाल से निकालते होंगे। जब हम अपनी  घरेलू स्तंभ देखते हैं तो एक दो पोस्ट के बाद इनकी तस्वीरें आती रहती हैं। अगर कोई इनकी उम्र देखे तो शायद व्यंग्यात्मक टिप्पणी भी कर सकता है पर हम जैसे सकारात्मक विचार वाले तो इनके प्रयासों की सराहना ही करेगा। यह हमें श्रृगार रस का असमय सेवन कराते हैं जो बोझिल वातावरण को भी रसदार बना देता है।  बस एक ही विचार आता है यार यह इतनी सारी तस्वीरों लाते कहां से हैं? हम पूछते नहीं क्योंकि लगता है कि उनक अंतर्जाल साधना बाधित न हो। हम शब्दप्रेमी हैं और पढ़ने लिखने में ही हमारी रुचि है फिर भी इतना जरूर कहना चाहेंगे कि ऐसे माननीय लोग सदाबहार बने रहें।

Friday, April 14, 2017

अमेरिका के बम का विज्ञापन हमें तो अच्छा लगा-हिन्दी संपादकीय (America MOABBomb Add is Good-Hindi Editorial)

                                           अमेरिका ने अफगानिस्तान में क्या बम गिराया उससे सन्नाटा भारत में छा गया है। अरे भई, यह अमेरिका नये नये हथियार बनाता है और फि र ऐसी जगहों पर प्रयोग करता है जहां से प्रतिरोध की कोई संभावना नहीं है। अमेरिका कभी उत्तर कोरिया पर हमला नहीं करेगा क्योंकि वहां से प्रतिकार की संभावना है।  यह तो अमेरिका भी कह रहा है कि उसने बमों की मां प्रयोग के लिये अफगानिस्तान में गिरायी है। भारत के लोग ऐसे सहम गये हैं जैसे कि कहीं अमेरिका नाराज होकर हम पर हमला न कर दे। अमेरिका अपने दुश्मनों से कोई लड़ायी नहीं जीता। उसने हमेशा ही अपने ऐसे लोगों को निपटाया है जो उसके कभी मित्र थे-हिटलर, सद्दाम हुसैन, कद्दाफी और लादेन कभी अमेरिका के गोदी में बैठे थे। इनको भी अकेले नहीं निपटाया वरन् मित्र देश उसके साथ रहे। अकेले लड़कर वियतनाम में अमेरिका बुरी तरह से हार चुका है।  लगभग यही स्थिति चीन की भी है उसे भी वियतनाम युद्ध में मुंह  की खानी पड़ी थी।  भारतीय नेता चतुर हैं वह अमेरिका से मित्रता तो करते हैं पर उसकी गोदी में नहीं बैठते। फिर भारत की सैन्य क्षमता अमेरिका से थोड़ी ही कम होगी। बहरहाल इस बम को एक विज्ञापन ही समझो। उसने बीस हजार करोड़ खर्च कर 36 आतंकी मारे-इस दावे को कोई प्रमाण नहीं है। अब इस बम को बेचने की करेगा। 

ट्रम्प ने चुनावों में कहा था कि अमेरिका उनके लिये पहले हैं और वह दूसरे देशों की मदद में अपना समय और पैसा बर्बाद नहीं करेंगे।  कुछ लोग कहते हैं कि दुनियां भर में इंसानी मुखौटे राज्य कर रहे हैं पर उनकी डोर खुफिया एजेंसी के हाथ में होती है।  ट्रम्प ने भी देख लिया कि राजकाज से सीधे जनता का भला तो हो नहीं सकता इसलिये अपनी राष्ट्रवादी छवि बचाये रखने के लिये खुफिया एजेंसियों की मात मान लो। वैसे हमें यह विज्ञापन अच्छा लगा। सुनने में आ रहा है कि भारत का भी एक लड़का इसमें मरा है पर इसकी पुष्टि नहीं हुई है। हम सोच रहे थे कि इस विज्ञापन से कहीं न कहीं भारतीय लोगों को भी प्रसन्न करने की कोशिश जरूर होगी। सच क्या है? यह तो हमें पता नहीं  पर इतना तय है कि इससे कोई बड़ा युद्ध नहीं भड़केगा।  तीसरे विश्व युद्ध की संभावनाये तो बिल्कुल नहीं है।

Monday, March 27, 2017

हमने तो यादों का खजाना संभाला था=छोटीकविताये एवं क्षणिकायें (Hamne yandon ka khazana sanbhala thaa-Short HindiPeom)

दिमाग बंद कर
दिल का दरवाजा
खोला नहीं जाता।
हादसों में घाव का
बहता रक्त
तोला नहीं जाता।
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सुंदरता के सभी दीवाने
दिल की बात
समझे कोई नहीं।
झील से गहरी आंखों पर
मरने वाले न जाने
वह सोई नहीं।
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हमने तो यादों का
खजाना संभाला था
पर उनके दिल पर ताला था
भटके ज़माने में 
कौन उन्हें
समझाने वाला था।
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उनके कंधों पर उम्मीद रखी
यही हमारा कसूर है।
नतीजा अब यह कि
दिल से यकीन दूर है।
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अगर फूलों के रंग होते
हम भी होली मना लेते।
भावनाओं के तार मिलते
प्रेम की झोली बना लेते।
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दिल की पहचान नहीं
दिमाग से प्यार करें।
जज़्बातों को छू नहीं पायें
आंखों में नकली प्यार भरें।
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खिलाड़ी भी बिकते हैं,
महंगे हों वही टिकते हैं।
बाज़ारवाद के दौर में
बंधुआ आजाद दिखते हैं।
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फुर्सत नहीं मिलने का
बहाना हमेशा करते हैं।
मुफ्त की मुलाकातों से
वह शायद डरते है।
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कपड़े के रंग से बनाते छवि
वह कैसे फकीर हैं।
राजस्व की लूट से बने
वह कैसे अमीर हैं।
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इशारे क्या समझेंगे
शब्दों को ही नहीं समझ पाते।
वह खुश हैं ज़माने से
कहे जो नासमझ जाते।
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इश्क के किस्से भी
रोज सुनाये जाते हैं।
आज भी मरे आशिक
नकदी से भुनाये जाते हैं।
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अपनी प्रतिष्ठा गंवाकर
दूसरे की निंदा करते हैं,
इस तरह आत्मसम्मान
वही जिंदा करते हैं।

Friday, March 24, 2017

हिन्दी भाषा में रोमियो शब्द के तीन आशय होते हैं-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (Three meaning in Hindi Languvase-Hind Satire Thought)

                                         हिन्दी भाषा में किसी भी संज्ञा के तीन अर्थ होते हैं।  किसी भी शब्द का  अर्थ तथा भाव प्रसंग की अनुसार लिया जाता है। हम यहां उत्तरप्रदेश में चल रहे एंटी रोमियो अभियान का मजाक उड़ाने वाले प्रगति तथा उलटपंथियों के हिन्दी ज्ञान पर ही सवाल उठा रहे हैं क्योंकि वह शेक्सिपियर को अपना आदर्श मानते हैं और उनके एक पात्र का अपमान सहन नहीं कर रहे।  विश्व में हिन्दी एकमात्र ऐसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है यह कहा जाता है पर हमारा मानना है कि इसमें शब्दों के भाव वैसे नहीं होते जैसे बोले जाते हैं वरन् यह उन प्रसंगों का संदर्भ तय करता है।
                      हम अपनी दृष्टि से रोमियो ही नहीं वरन् मजनूं और रांझा के परिप्रेक्ष्य में भी इन्हें मान सकते हैं। हम रोमियो का शाब्दिक आशय लें तो वह शेक्सिपियक के नाटक का एक पात्र है जिसने जूलियट से प्रेम किया था।  
                        लाक्षणिक अर्थ तब आता है जब कोई प्रेमिका अपने प्रेमी से कहे-‘वाह रे मेरे रोमियो।’ यहां उसके प्रेमी का नाम रोमियो नहीं है पर वह लक्षणों से उसकी पहचान बता रही हैं।
             तय बात है कि व्यंजन विधा में उस तरफ इशारा किया जाता है जहां किसी के प्रेम का मजाक उड़ाना हो। प्रेमी तब तक प्रेमी नहीं माना जा सकता जब तक प्रेमिका ने उसका प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में उसका नाम न रोमियो है न ही उसके लक्षण प्रेमी जैसे हैं तब उस पर रोमियो की ताना जड़कर मजाक उड़ाया जा रहा है।  हमारे यहां साहित्य विधा में व्यंजना शैली का बहुत महत्वपूर्ण हैं।  संस्कृति तथा हिन्दी में अनेक महान लेखक तो ऐसे हैं कि उनकी हर रचना तीनों विधाओं में एक साथ पूर्ण लगती है। यह पढ़ने वाले पर है वह कितना प्रखर है?  सजग पाठक हमेशा व्यंजना शैली में अर्थ लेता है क्योंकि वही उसके व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होती है। वह इस तरह रचना को पढ़ता है जैसे वह उसमें से अपने लिये ज्ञान बढ़ा सके।  जहां हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की बात करें तो यहां अध्यात्मिक रूप से राधा कृष्ण का प्रेम ही सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। इस प्रेम की व्याख्या तीनों विधाओं में होती है तो अध्यात्मिक ज्ञानी भी इसके पवित्र भाव की व्याख्या करते हैं।
              सीधी बात कहें तो उत्तरप्रदेश में रोमियो शब्द से आशय उन लोगों की तरफ है जो इकतरफा प्रेम की चाहत में लड़कियों को परेशान करते हैं और व्यंजना विधा में इसे एंटरोमियो अभियान नाम दिया गया है। इसके शाब्दिक या लाक्षणिक अर्थों पर बहस एक बकवास लगती है। हालांकि इस बहाने प्रगति तथा उलटपंथी यह बताना नहीं भूल रहे कि वह विदेशी साहित्य के महान ज्ञाता है।
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                      पहले भारत फिर अमेरिका और अब उत्तरप्रदेश में सत्तापरिवर्तन ने पाक के मीडिया को भारी बेचैन कर दिया है। हैरानी इस बात की है कि जिस हिन्दू धर्म या संस्कृति का अपना नंबर एक दुश्मन मानते हैं वह स्वाभाविक रूप से उसका हिस्सा हैं पर स्वयं को अरेबिक संस्कृति से जुड़ा दिखना चाहते हैं। बात धर्म की करते हैं पर उनको यह मालुम नहीं कि एक अरबी और एक हिन्दू जब आपस में कहीं मिलेंगे तो वह धर्म की बजाय अन्य विषयों पर स्वाभाविक विचार विमर्श करते हें। अरब की धार्मिक विचाराधारा के पाकिस्तानी अनुयायी इस भ्रम में है कि उनकी संस्कृति भी अरबी है या होना चाहिये-अरब वाले इनको अरेबिक मानते नहीं और यह स्वयं को हिन्दू कहना नहीं चाहते। इस अंतर्द्वंद्व ने पाकिस्तानियों की मानसिक रूप से वहां के विद्वानों को भी विक्षिप्त कर दिया है।  वहां का उदार विचारक भी भी हिन्दू के प्रति सद्भाव दिखाने में हिचकता है्र्र-वह भी हिन्दू संस्कृति के उज्जवल पक्ष को नहीं देखता। पाकिस्तानियों को विचार विमर्श देखकर हमें लगता है कि हमें कभी उनसे सद्भाव की आशा नहीं करना चाहिये।

Saturday, March 11, 2017

चुनाव परिणाम पर जाति, धर्म तथा भाषा की दृष्टि से विचार करना गलत-हिन्दी संपादकीय (Religion,Cast amd Languvase not Effect on Election-HindiEditorial)


                                भारत के पांच राज्यों में चुनाव होने के बाद देशभर में प्रचार परिणामों का विश्लेषण परंपरागत ढंग से  सतही रूप से समाज को जातिपाति, धर्म तथा भाषायी  आधार पार बांटकर कर रहे हैं। कम से कम फेसबुक पर यह उम्मीद तो करते हैं कि यहां सक्रिय मित्र जनमानस का सही विश्लेषण करेंगे पर लगता नहीं कि ऐसा हो रहा है। भक्तगण उत्तर प्रदेश में अपने दल की जीत पर सीना फुला रहे हैं। वहां के मुस्लिम मतदाताओं को वह जिस तरह देखते हैं उस पर हमें आपत्ति होती है। हम स्वयं भारतीय अध्यत्मिकवादी हैं पर जब सांसरिक विषय में अपना हित सार देखते हैं। इसी कारण हमारा मानना है कि आमतौर से भारतीय धार्मिक, जातीय तथा भाषायी समूहों में बंधे रहना पसंद करते हैं पर जब राज्य प्रबंध का विषय हो तो वह केवल इस आशा से मतदान करते हैं कि उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बेहतर सड़कें, शुद्ध पानी तथा नियमित बिजली के लिये बेहतर राज्य प्रबंध की आशा करते हैं।
                     आजादी के बाद से ही देश में राजनीति, पत्रकारिता तथा अन्य जनसंपर्कीय क्षेत्रों में ऐसे लोग सक्रिय रहे हैं जो पूरे समाज को सतही दृष्टि से देखकर यह मानते हैं कि वह गहन चिंत्तक हैं-वह स्वयं आमजन की बजाय एक विद्वान की तरह सोचने के साथ ही बोलते और लिखते दिखना चाहते हैं जिससे सब गड़बड़ हो जाता है। समस्या यह है कि भक्तों का विद्वान समूह उनका विरोध तो करता है पर उसकी विचारशैली कमोबेश उन जैसी ही है-यही से ही हम जैसे अध्यात्मिक चिंत्तकों की राह उनसे अलग हो जाती है। पांच राज्यों में लोगों ने मतदान बेहतर राज्य प्रबंध की आशा से किया है। कट्टर भारतीय अध्यात्मिकवादी होने के बावजूद हम कहते हैं कि चाहे भी जिस भाषा, जाति, धर्म या वैचारिक समुदाय का सदस्य हो उसने अपनी प्रतिबद्धता केवल राज्य से दिखाई है।
               भारत में वैचारिक धाराओं का प्रवाह सदैव ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों ने ही किया है। अनेक राजाओं ने भी राजधर्म का निर्वाह कर लोगों को अभिभूत किया पर उनकी प्रतिष्ठा किसी विचारधारा की वजह से नहीं होती। हम भगवान राम की बात करते हैं पर उनकी छवि भी अध्यात्मिक तत्व की प्रबलता के कारण है-उन्होंने राज्य का त्याग कर एक ऐसी छवि बनायी जिसका उदाहरण नहीं मिलता। भगवान कृष्ण भी अध्यात्मिक तत्व के कारण पूजे जाते हैं न कि द्वारका के राजा होने के कारण उन्हें भगवान कहा जाता है। मूल बात यह है कि राजसी विषय में सात्विक तत्व के साथ काम करना चाहिये पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि देवों की तरह पुजने के लिये प्रचार में रत रहा जाये। हमारा मानना है कि आम भारतीय जनमानस अन्य देशों की अपेक्षा अधिक अध्यात्मिक तत्व से भरपूर है। अतः यहां जात पात या धर्म के आधार पर मतदान होने की बात कहना स्वयं को धोखा देना है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर   

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Wednesday, March 8, 2017

प्रचार में बगदादी तब तक रहेगा जब कोई दूसरा विज्ञापन बिकवाने नहीं आ जाता-हिंदी संपादकीय (Baghdadi bagdadi and osama bin laden nececsary for world media with indian News Chainal-Hindi Editorial)

                 ओसामा बिन लादेन तब तक प्रचार में जिंदा रहा जब तक प्रचार प्रबंधकों को यह लगा कि वह उनके लिये समाचारों पर सनसनी बनाये रखने के लिये उसका नाम जीवंत होना जरूरी है। जब बगदादी का नाम स्थापित हो गया तब उसे पाकिस्तान के एबटाबाद में एकाउंटर में उसे मरा बताया। लादेन को कितनी बार मीडिया ने मरा बताकर फिर उसे जिंदा बताया।  अब यही हाल बगदादी का है। उसे कम से कम दस बार मृत घोषित कर फिर उसे जीवित बताकर लगातार सनसनी बिक रही है। हमें तो लगता है कि बगदादी नाम का कोई व्यक्ति ऐसा हुआ ही नहीं होगा जो इतना बड़ा आतंकवादी संगठन चलाये। इराक, सीरिया तथा लीबिया में सरकारों के पतन से वहां अपराधी गिरोह बन गये होंगे जिन्हें अमेरिका, रूस तथा अन्य राष्ट्र हथियार राजस्व कमाते हैं-अब यह सिद्ध भी हुआ है कि वहां अमेरिका तथा रूस कहीं न कहीं आतंकवादियों के सहायक हैं। हमारा तो मानना है कि लादेन भी बहुत पहले मारा गया था पर जब बगदादी का अभ्युदय तब उसे मरा बताया। अब बगदादी भी तब तक रहेगा जब कोई तीसरा नहीं आ जाता।
        इस पूरे विश्व पर ‘प’ समूह-पूंजीपति, प्रचारक, प्रबंध तथा पतितों के मिलेजुले संगठन-चला रहे हैं। पूंजीपति  पतितों  की आड़ में अपने धंधे चलाते हैं तो उनका भय दिखाकर अपनी ताकत प्रचार माध्यमों में दिखाते हैं। इतना ही नहीं इनकी ताकत इतनी ज्यादा है कि अनेक जगह राज्यप्रबंधक भी इनका साथ निभाते हैं।  इसलिये ओसामा बिन लादेन हो या बगदादी या अन्य खलनायक इतने खूंखार, चतुर और बाहूबली न हों जितने बताये जाते हैं। मजे की बात यह कि ऐसे लोग कहीं न कहीं कभी किसी देश के राज्य प्रबंधकों के सपंर्क रखते हैं और बाद में उनमें बिगाड़ होने पर निशाना बनते हैं। इनका नाम पहले खलनायक की तरह पकाया जाता है ताकि कोई नायक उसे खाकर प्रचार माध्यमों  में विज्ञापन प्रसारण के बीच समाचार बनाता है।  कम से कम हम जैसे चिंतक तो यही सोचते हैं।

Monday, February 27, 2017

क्या अभिव्यक्ति की आजादी केवल पाकिस्तान के समर्थन पर ही टिकी है-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (What Against Agitation for Nationalism based on Supoort of Pakistan-Hindi Satire Thought Article)

                                               सुना है दिल्ली में कोई अभिव्यक्ति की आजादी वाजादी पर आंदोलन चल रहा है।  पहले बिहार में जब चुनाव होने वाले थे उस समय असहिष्णुता पर अभियान चला था। उत्तरप्रदेश में चुनावों को देखते हुए यह अभियान पहले चलना था पर लगता है इसके लिये नायक और नायिकाओं का चयन देर से हुआ। एक मजेदार बात यह है कि राष्ट्रवादियों के विरोधी हमेशा ही कहीं न कहीं पाकिस्तान का समर्थन जरूर करते हैं। इस बार एक शहीद की संतान ने बताया कि पाकिस्तान ने उसके पिता को नहीं मारा। बवाल मचना था मच गया।
                राष्ट्रवादियों का मुकाबला हमेशा ही जनवादी करते हैं और यह समझ में नहीं आता कि वह अपने अभियान में पाकिस्तान के समर्थन का संकेत अवश्य क्यों देते हैं?  पीछे से प्रगतिशील भी आ जाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि इनकी आजादी की अभिव्यक्ति केवल पाकिस्तान के खुलेआम तक ही सीमित क्यों होती है? इसका मतलब यह है कि यह लोग भी प्रचार चाहते हैं। इन्हें उम्मीद है कि जब आगे कभी प्रगतिशील सरकार आयी तो शायद उनको कोई सम्मान वगैरह मिल जायेगा-संभव है संयुक्त अरब अमीरात में कहीं नौकरी या सेमीनारों के लिये बुलावा आने लगे। यह भी संभव है अभी राष्ट्रवादियों के विरोधी इन्हें धन वगैरह देते हैं-हमारा मानना है कि बिना अर्थ के आजकल हम जैसा मुफ्त में लिखने वाला लेखक भी किसी से प्रतिबद्ध होकर नहीं लिखता तब यह लोग क्या दूसरें के लिये जूझेंगे-इस उम्मीद में कि उनका प्रभाव बना रहे। फिर प्रचार माध्यमों का भी ऐसी कथित संवदेनशील बहसों पर विज्ञापन का समय भी पास हो जाता है। सबसे बड़ी बात यह कि पाकिस्तान का समर्थन किये बिना राष्ट्रवादियों के विरोधियों को प्रचार नहीं मिलता इसलिये कहीं न कहीं से वह जानबूझकर ऐसा करते हैं।
                    बहरहाल इस तरह राष्ट्रवादी और उनके विरोधी जनवादी अपने प्रगतिशील साथियों के साथ समाचारों और बहसों में आकर टीवी चैनलों के विज्ञापन का समय खूब पास करते हैं।  खासबात यह कि हिन्दी चैनलों में इसे आजकल उत्तर प्रदेश के चुनावो की वजह से कम महत्व मिल रहा है जबकि अंग्रेजी चैनल इस पर हल्ला मचा रहे हैं। जनवाद और प्रगतिशीलों समर्थक यह अंग्रेजी चैनल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी निष्पक्षता दिखा रहे हैं पर हमारा मानना है कि जिस तरह ट्रम्प ने आक्रामकता दिखाई है उसके चलते राष्ट्रवादियों को बदनाम नहीं कर पायेंगे। हां, हम ऐसे उत्साही जवानों को यह बात बता दें कि राष्ट्रवादियों के  विरोध के चलते अब उनको संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में नौकरी या सेमीनारी मिलने की संभावनायें अब न के बराबर हैं क्योंकि दोनों ने अब उनके साथ मित्रता बना ली हैं। हालांकि इनका यह भ्रम कब टूटेगा कि राष्ट्रवाद का विरोध पाकिस्तान के समर्थन पर ही टिका है।

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