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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Saturday, January 14, 2017

इतिहास में डूबने की बजाय वर्तमान में तैरने की जरूरत समझें-हिन्दी लेख (To sink in History Better than swiming in current Topic-HindiArticle)

                                    भगतसिंह व गांधी जी इतिहास में दर्ज हैं-उनके नामों को न प्रचार की आवश्यकता है न ही स्मरण के लिये भीड़ एकतित्र करने की। दोनों ही गरीबी, बेबसी और गुलाम अभिव्यक्ति हटाने के लिये संघर्ष रत रहे। वह अमर है और उनके नामों को बार बार प्रचारित कर हमारा बौद्धिक समाज राज्य प्रबंध में अक्षम पर पदासीन शोभायमान खलनायकों की चर्चा से बचता है। वह इन्हीं पदासीन खलनायकों के सहारे जीवित है और नहीं चाहता कि जनमानस में उनकी चर्चा हो इसलिये कोई गांधीजी तो कोई भगतसिंह के नाम पर झंडा बुलंद किये हैं-वैसे तो चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्ला, लोकमान्य तिलक, सुभाषचंद्र बसु तथा खुदीराम बसु जैसे महानायकों ने भी देश की आजादी की लड़ाई लड़ी पर राज्य प्रबंध में पदासीन खलनायकों ने अपनी छवि बचाने के लिये भगतसिंह और गांधीजी के नाम को ज्यादा प्रधानता दी। उनसे प्रायोजित बौद्धिक समाज भी इन दोनों महानुभावों की जयंती और पुण्यतिथि पर सक्रिय होकर समाज का ध्यान इतिहास के पीछे ले जाता है। वर्तमान में जहां उच्च पदों पर प्रबंध कौशल के सिद्धहस्त लोगों की आवश्यकता है वहां मूर्तिमान लोग बिठा दिये जाते हैं-जो अपना न सोचें, अपना न बोले, अपना न देखें-जो केवल अपने अनुचरों के मार्गदर्शन में अपनी सक्रियता सीमित रखें।
                   आजादी के बाद भी कथित रूप से अनेक अर्थशास्त्री और कुशल प्रबंधक हुए हैं पर राज्य की कार्यप्रणाली वही रही जो अंग्रेजों की थी-जिसमें निचले कर्मचारी को गुलाम और जनता को गुंगी असहाय मानकर व्यवहार करने का सिद्धांत अपनाया गया। आजादी के समय एक डॉलर की कीमत एक रुपया थी पर आज 70 के आसपास है-अब हम कैसे मान लें कि देश में कुशल राज्य प्रबंध तथा अर्थप्रणाली रही है।  अब यह कह सकते हैं कि उस समय तो लोगों के पास साइकिल नसीब नहीं थी पर आज तो कारें भी है-जवाब में हम आपको बतायेंगे यह विकास तो विश्वव्यापी है वैसे ही जैसे भ्रष्टाचार। अनेक देश ऐसे हैं जो  हमसे बाद में आजादी इतनी ही तरक्की कर गये हैं कि हम उनके आगे अभी भी पानी भरते हैं। दूसरी बात यह कि हमारे देश में प्राकृत्तिक साधनों के साथ ही मानवश्रम की प्रचुरता रही है ऐसे में वर्तमान विकास एक स्वाभाविक प्रक्रिया के तहत हुआ। अगर कोई इसका श्रेय ले रहा है तो उसे बताना  होगा कि अंग्रेजों की स्थापित व्यवस्था से अलग उसने स्वयं क्या सोचा और किया।
           अर्थशास्त्र में भारत की समस्याओं में अकुशल प्रबंध भारी मानी जाती है।  इस पर एक भी अर्थशास्त्री अपनी कलाकारी नहीं दिखा पाया। इधर हम पढ़ते रहते हैं कि अमुक महान अर्थशास्त्री ने यह योगदान दिया उसने वह दिया पर अकुशल प्रबंध के लिये किसे क्या किया कोई बताने वाला नहीं है। हर दिन किसी जन्मतिथि या पुण्यतिथि मनाकर प्रचार माध्यम अपने विज्ञापनों की सामग्री जुटाते हैं। इतिहास को चूसकर देश की जनता को भ्रमित करने का प्रयास अब भी जारी है।  वर्तमान में समाज की स्थिति जटिल हो गयी है। हम अगर उसकी व्याख्या करने बैठें तो इतनी कहानियां हो जायेंगी कि हम लिखते लिखते थक जायेंगें। बेहतर हो कि वर्तमान पर ज्यादा ध्यान लगायें। देश के हालात देखकर नहीं लगता कि आजादी के पास कोई ऐसा महानायक हुआ जिसने समाज में संतोष रस का लंबे समय तक प्रवाह किया हो।  तात्कालिक रूप से कुछ महान प्रयास करके अनेकों ने नाम बटोरे पर उससे समाज में लंबे समय तक सामान्य स्थिति रही हो ऐसा नहीं लगा-वरना हमने तो देश में आर्थिक, नैतिक और वैचारिक पतन की बहती धारा ही देखी है। यही कारण है कि हमें इतिहास सुहाता नहीं है।


Wednesday, January 11, 2017

नोटबंदी के पहले और बाद के अनुभव रोमांचित करते हैं-हिन्दी लेख (Interesting Experince before and afterDeMonetisation-HindiArticle)

         
                      जो लोग कभी कहते थे कि ‘हमें पैसे की कभी परवाह नहीं है’-नोटबंदी के बाद जब उनके श्रीमुख से हमने सुना कि ‘हमारे पास किसी को देने के लिये पैसे नहीं है’-तो उनकी बेबसी देखकर अच्छा लगा।  हमें तो खर्च पानी के लिये पैसे चाहिये थे वह तो आराम से मिल रहे थे पर चूंकि आर्थिक ढांचे का विस्तार ज्यादा नहीं कर पाये इसलिये सीमित दायरे में जितनी जरूरत थी काम चलता रहा।
            दरअसल उस समय चिंता इस बात की थी कि कहीं हमारे घर पर बीमारी का कोई बड़ा हमला न हो क्योंकि हमें आधुनिक चिकित्सालयों की पंचसितारा वसूली का अनुमान नहीं है-इधर उधर लोगों से सुनते रहते हैं।  हमने अभी तक सरकारी चिकित्सालयों का सहारा लिया है या फिर गली के निजी चिकित्सकों ने ही हमारे जुकाम, बुखार तथा घावों की मरम्मत की है।  पिछले उन्नीस वर्ष से योग साधना की कृपा से देह निर्बाध गति से चल रही है। एक बात हम मानते हैं कि आधुनिक चिकित्सा के पास किसी बीमारी का स्थाई इलाज नहीं है-हर बीमारी के लिये नियमित से जीवन पर्यंत गोलियां का इंतजाम जरूर हो हो जाता है। हर पल बीमारी होने का अहसास लिये लोग कैसे जिंदा रहते हैं-यह देखकर आश्चर्य होता है।
            समस्या बीमारी की नहीं है वरन् लोगों की है। किसी से कह दो कि ‘हम बीमार हैं’ तो कहता है कि किसी चिकित्सक को दिखाओ।  उन्नीस वर्ष पहले अपने ही दुष्कर्मों के कारण उच्च रक्तचाप का शिकार होना पड़ा था।  उस समय ढेर सारे टेस्ट कराये। दवाईयां लीं।  आखिर एक होम्योपैथिक चिकित्सक ने हमारा परीक्षण किया तो पर्चे पर लिखा ‘उच्च वायु विकार’।  हमारे लिये यह एक स्वाभाविक बीमारी थी। अतः साइकिल चलाने के साथ पैदल भी घूमने लगे।  फिर योग शिविर की शरण ली।  उसके बाद बुखार और जुकाम का रोग आता जाता है और उसका मुख्य कारण बाज़ार से खरीदी गयी खाद्य सामग्री का सेवन ही होना पाया है। जब तक बाज़ार से लायी खाद्य सामग्री नहीं लेते सब ठीक चलता है जब बीमार पड़ते हैं तो अपनी एक दो दिन पुरान इतिहास देखते हैं याद आता है कि शादी या बाज़ार का सामान इसके लिये जिम्मेदार है। चिकित्सक के पास न जाना पड़े इसलिये सुबह पैदल घूमने के साथ ही योग साधना का अभ्यास करते हैं।  हृदय में यह संकल्प घर कर गया है कि जब तक हम योग साधना करेंगे तब तक देह, मन और विचार के विकार हमें तंग नहीं कर सकते। इसलिये अपनी बीमारी की चर्चा किसी से करने में भी संकोच होता है।
            नोटबंदी के बाद समस्या यह थी कोई तेज बीमारी आ जाये और किसी निजी चिकित्सक के पास जायें तो समस्या भुगतान की थी।  सरकारी चिकित्सालयों की हालत देखकर अब वहां जाना अजीब लगता है। सबसे बड़ी बात यह कि वहां जाने पर समाज के लोग शर्मिंदा करते हैं कि ‘पैसा नहीं है क्या जो सरकारी अस्पताल गये।’
            हम नेताओं के श्रीमुख से बहुत सुनते हैं कि गरीब, मजदूर और बेबस का कल्याण करेंगे पर अगर उनसे पूछा जाये कि एक लंबे समय तक सरकारी अस्पतालों और स्कूलों की जो प्रतिष्ठा रही वह धूमिल कैसे हो गयी तो वह फर्जी विकास के दावे दिखायेंगे-नोटबंदी के बाद पता चल गया कि करचोरी करने वाले ही कालेधन से महंगाई बढ़ा रहे थे जिसे हमने विकास मान लिया था।
            हर व्यक्ति अरबपति होने का सपना पला रहा था।  जमीन और मकान के पीछे ऐसे पड़े थे जैसे मानो कोई विदेशी आकर उस पर कब्जा कर सकता है। उस पर पैसा लगाकर कब्जा कर अपने नाम का कब्जा लिखा लें ऐसा न हो कि कहीं कोई दूसरा आकर न हथिया ले।  जमीन और मकान की कीमतंें इतनी थी कि अनेक लोगों के लिये एक स्वपनलोक बन गया था जिसमें दाखिल होना सहज नहीं रहा था। एक समय था सरकारी स्कूल और अस्पताल अमीर और गरीब के लिये एक जैसा सहारा थे। अब विकास होते होते  अमीर और गरीब के बीच दूरियां बढ़ गयी हैं। सरकार अस्पताल या स्कूल में उपस्थिति गरीब तो निजी में अमीर होने का प्रमाण बना है।  नोटबंदी में गरीबों का रोना ऐसे लोग रो रहे थे जिन पर सरकारी स्कूलों और अस्पतालों की दुर्दशा ठीक करने का जिम्मा था।  वह बड़ी बेशरमी से बेबसों की बर्बादी पर मगरमच्छीय आंसु बहा रहे थे।
            नोटबंदी ने हमें समाज के उस करचोर वर्ग को नग्नावस्था में देखा जो अभी तक अदृश्य होकर अपना काम कर रहा था।  वह शर्म त्यागकर बाहर आया और अपना कालधन सफेद करने लगा।  अलबत्ता अब वह हमें दिखाई दिया और कम से कम उसे करचोरी की उपाधि तो दी ही जा सकती है। अब अगर हमें कोई अपनी पैसे का अहंकार दिखायेगा तो उससे यह तो पूछ ही सकते हैं कि ‘आखिर आयकर कितना चुकाते हो।’
            यकीन मानिए वह खामोश हो जायेगा।  हम आयकर देते हैं और यही बात हमारे लिये गर्व की है।  भगवान के बाद राजा का नंबर इसलिये आता है ताकि मनुष्य समुदाय में व्यवस्था बनी रहे। इसी व्यवस्था के लिये कर जरूरी है।  हम कर देते हैं तो कोई महान काम नहीं करते पर जो करचोरी कर अपना घर भर रहे हैं वह हमारी दृष्टि में महान अपराधी हैं। वह क्या सोचते हैं कि राज्य व्यवस्था का कर कोई दूसरा चुकाये और वह मुफतखोरी करते रहें।  वह यह भूलते हैं कि अगर राज्य व्यवस्था न रहे तो उनका सारा वैभव कुछ ही घंटों में मिट्टी में मिल जाये। उन्हें आभारी होना चाहिये उन लोगों का जो कर चुकाते हैं न कि उन्हें अपने वैभव का अहंकार दिखायें।

Sunday, January 8, 2017

अगर प्रबंध कौशल है तो मादक पदार्थों तथा सट्टे वाले क्रिकेट व्यापार पर रोक लगाकर दिखायें-हिन्दी संपादकीय #If the Are Good State manager so should Ban on Batting Cricket-Hindi Editorial)


                            हम शराब पीने का समर्थन नहीं करते पर एक योग व ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि अपनी पंसद दूसरों पर थोपना अहंकार है। शराब न पीने के लिये प्रेरणा उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिये पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि स्वयं पीने की नियमित आदत से मुक्त होने पर इतराना चाहिये।
               इधर कुछ दिन से अंतर्जाल पर कुछ लोग शराब पर प्रतिबंध लगाने को एक आदर्श कदम मानने लगे हैं। दरअसल शराब पर प्रतिबंध लगाना एक सहज कदम है पर उससे मुश्किल उसके अवैध उत्पादन तथा वितरण रोकना है-इससे जहरीली शराब बनने तथा राजस्व हानि दोनो की आशंका रहती है। गुजरात में शराब पर प्रतिबंध है पर वहां के अनुभवी बताते हैं कि वहां चाहे जहां शराब मिल सकती है-बस महंगे दाम चुकाने होते हैं। अभी बिहार की चर्चा भी खूब हो रही है पर वहां अवैध शराब बनने और बिकने के समाचार भी आते हैं।
                 शराब पर प्रतिबंध लगाने की वकालत करने वालों को हम यह भी बता दें कि इस समय देश में मादक द्रव्य पदार्थों की बिक्री और उनका सेवन जमकर हो रहा है। यह महंगेे तथा स्वास्थ्य के लिये भयावह होते हैं।  हम पंजाब में युवाओं के जिस नशे को लेकर चिंतित रहते हैं वह शराब नहीं वरन् पाकिस्तान से आने वाले यही मादक पदार्थ हैं।  वैसे पंजाब ही नहीं पूरा देश ऐसे नशों की जाल में फंसा है जिनका अवैध रूप से वितरण होता है। देखा जाये तो युवा कौम बुरी तरह से इसके जाल में फंसी है।
               इधर शराब के साथ ही तंबाकू का भी विरोध होता है। हम बता दें कि सादा तंबाकू का सेवन भी चूने के साथ होता है।  यह भी ठीक नहीं है पर इससे ज्यादा खतरनाक तो पाउच में बिकने वाले तंबाकू निर्मित पदार्थ हैं। उनके विज्ञापन भी बेधड़क दिखते हैं।  विशेषज्ञ उन पर ही प्रतिबंध की मांग करते हैं पर उसकी आड़ में सादा तंबाकू पर रोक लगाने की बात होती है। कुछ लोग मानते हैं कि सादा तंबाकू के साथ अगर सुपारी न खायी जाये तो वह अधिक कष्टकारक नहीं होती-पर इसका आशय यह नहीं कि हम उसका समर्थन करें पर इतना जरूर कहते हैं कि सादा तंबाकू का सेवन हमारे यहां सदियों से हो रहा है इसलिये उस पर रोक की बजाय पाउच वाले तंबाकू पर बैन लगाना चाहिये। 
              हमारा तो यह कहना है कि शराब तथा तंबाकू पर सेवन पर राजकीय प्रतिबंध लगाकर लोकप्रियता का सूत्र अपनाने वाले अगर मादक पदार्थों के वितरण व सेवन को रोककर बतायें तो हम माने कि वह कुशल प्रबंधक हैं। देश में इन खतरनाक मादक पदार्थों की बिक्री जमकर हो रही है। इतना ही नहीं मादक द्रव्य के सौदागर बहुत ताकतवर भी माने जाते हैं। अगर आप हमें कट्टर समझें तो आपत्ति नहीं है तब भी कहेंगे कि उच्च स्तरीय क्रिकेट भी सट्टे के लिये प्रेरक है उस पर भी प्रतिबंध लगा दिया जाये। न लगाया जाये तो उसका सीधा प्रसारण रोक दिया जाये।  हमने मादक द्रव्य पदार्थों के सेवन और सट्टे पर पैसा खर्च करने वालों के हाल देखें है।  शराब या सादा तंबाकू बंदी तो सरलता से लोकप्रियता दिलाने वाली है इसलिये कोई भी कर सकता है पर अगर प्रबंध का कौशल  और पराक्रम है तो तीव्र मादक पदार्थों पर सट्टे वाले क्रिकेट पर रोक लगाकर दिखायें।

Wednesday, January 4, 2017

सौदे के कालेरूप की प्रतीक्षा के लिये धवल मुद्रा के काले होने के इंतजार में-नोटबंदी पर सामयिक लेख (wait for white Currency will be Black Shap After DeMonetisation-Hindi Article on DeMonetisation

                               हम कोटा से सात नवंबर 2016 को रात रवाना हुए थे। बस स्टैंड पर एक युवती को अपनी मां से कहते सुना कि ‘पता नहीं किस सीरिज के नोट बंद हुए हैं, देखना पड़ेगा।’
             उसके शब्दों ने हमें हैरान कर दिया। हमें लगा कि कोई खास नंबर के नोट बंद हुए होंगें।  सुबह घर पहुंचकर अखबार देखा तो जब पूरी खबर देखी तब बात समझ में आयी। हमें लगा कि अब देश में उथलपुथल होगी।
                             नोटबंदी के बाद ग्वालियर से बाहर हमारी पहली यात्रा वृंदावन की हुई। रेल से लेकर घर ता आने के बीच कहीं लगा नहीं कि देश में मुद्रा की कमी चल रही है।  सात दिन तक भीड़ के बीच नोटबंदी की चर्चा तो सुनी पर किसी ने परेशानी बयान नहीं की।  वापसी में ऑटो वाला तो प्रधानमंत्री मोदी का ऐसा गुणगान कर रहा था जैसे मानो उसे पंख लग गये हों।  सबसे बड़ी बात जो हमें लगी कि अमीरों ने अपने प्रदर्शन से जो कुंठा सामान्यजनों में पैदा की वह अब समाप्त हो गयी है-हम देश को मनोवैज्ञानिक लाभ होने की बात पहले भी लिख चुके हैं। सामान्यजनों की रुचि इस बात में नहीं है कि बैंकों में कितना कालाधन आया बल्कि वह तो धनिक वर्ग के वैभव का मूल्य पतन देखकर खुश हो रहा है।
                      नोटबंदी ने प्रधानमंत्री मोदी को एक तरह से जननायक बना दिया है। अनेक बड़े अर्थशास्त्री भले आंकड़ों के खेल दिखाकर आलोचना में कुछ भी कहें पर हम जैसे जमीन के अर्थशास्त्री सामान्यजनों के मन के भाव पर दृष्टिपात करते हैं।  अभी सरकार कह रही है कि फरवरी के अंत तक स्थिति सामान्य होगी।  हम जैसे लोग चाहते हैं कि यह स्थिति यानि नकदी मुद्रा की सीमा अगले वर्ष तक बनी रहे तो मजा आ जाये।  बताया जाता है कि इस समय साढ़े आठ लाख करोड़ रुपये की मुद्रा प्रचलन में है और हमारे अनुसार यह पर्याप्त है।  अब नये नोट छापने की बजाय बैंकों से वर्तमान उपलब्ध मुद्रा को ही घुमाने फिराने को निर्देश दिया जाये तो देश के आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्थिति के लिये सबसे बेहतर रहेगा।
            बैंक तथा एटीएम से भीड़ नदारद है।  बड़े भुगतान एटीएम से खातों में किये जा सकते हैं।  ऐसे में वह कौन लोग हैं जो यह चाहते हैं कि पूरी तरह मुद्रा बाज़ार में आये और नकद भुगतान की सीमा समाप्त हो? उत्तर हमने खोज निकाला।  अनेक लेनदेन दो नंबर मेें किये जाते हैं ताकि राजस्व भुगतान से बचा जा सके।  खासतौर से भवन निर्माण व्यवसाय तो करचोरी का महाकुंुभ बन गया है।  इसका पता हमें तब चला जब हमारे एक परिचित ने एक निर्मित भवन खरीदने की इच्छा जताई।
               नाम तो पता नहीं पर वह किसी मध्यस्थ के पास हमें ले गये।  हमारे परिचित का पूरा धन एक नंबर का है।  दलाल से उन्होंने बात की तो उसने साफ कहा कि इस समय तो भवनों की कीमत गिरी हुई है पर बेचने वाले भी तैयार नहीं है। हमारे मित्र ने अपनी त्वरित इच्छा जताई तो उन्होंने एक 26 लाख की कीमत वाले भवन की कीमत 23 लाख बताई।  जब उनसे रजिस्ट्री का मूल्य पूछा गया तो वह बोले इसका आधा या कम ही समझ लो। हमारे मित्र ने बताया कि वह तो पूरा पैसा चैक से करेंगे।  तब उसने साफ मना कर दिया हमारे साथी  ने केवल चैक के भुगतान की बात दोहराई।  हमारे मित्र ने बताया कि वह अन्य मध्यस्थों से भी ऐसी ही बात कर चुके हैं।
             हमारा माथा ठनका। भवन की जो कीमत सरकारें रजिस्ट्री के लिये तय करती हैं उससे अधिक निर्माता वसूल करता है। रजिस्ट्री की कीमत वह चैक से ले सकता है पर उससे आगे वह खुलकर कालाधन मांग रहा है। यहां से हमारा चिंत्तन भी प्रारंभ हुआ।  आठ नवंबर से पूर्व देश में कुल 17 लाख करोड़ रुपये की मुद्रा प्रचलन में थी पर यह एक माध्यम थी।  अगर देश में समस्त नागरिकों के खातों में जमा रकम का अनुमान करें तो वह करोड़ करोड़ गुना भी हो सकती है पर सभी एक दिन ही एक समय में पूरी रकम नहीं निकालने जाते।  कोई जमा करता तो कोई दूसरा  निकालता है। इस तरक मुद्रा चक्र घूमता है तो पता नहीं चलता।  आठ नवंबर से नकदी निकालने की सीमा ने सारा गणित बिगाड़ दिया।  अनेक लोगों ने भूमि, भवन, सोना तथा शेयर में अपना पैसा लगा रखा है और आठ नवंबर से पूर्व वह उनके मूल्य पर इतराते थे।  विमुद्रीकरण ने उनकी हवा निकाल दी है। पहले जो पांच या दस करोड़ की संपत्ति इतराता था वह अब उसका वर्तमान मूल्य बतलाते हुए हकलाता है।  बताये तो तब जब बाज़ार में कोई खरीदने की चाहत वाला इंसान मिल जाये।
                    उस दिन एक टीवी  चैनल पर  भवन निर्माता मोदी जी के भाषण पर चर्चा करते हुए कह रहा था कि उन्होंने सब बताया पर यह नहीं स्पष्ट किया कि नकदी निकालने की सीमा कब खत्म होगी?  हमने मजदूर निकाल दिये क्योंकि उनको देने के लिये पैसा नहीं मिल पा रहा। फिर हमारा उद्धार तब होगा जब नये प्रोजेक्ट मिलेंगें।
                 वह सरासर झूठ बोल रहा था। भवन निर्माता इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि नयी मुद्रा कब कालेधन का रूप ले ताकि उन्हें सरकारी कीमत से ज्यादा मूल्य मिले।  भवन निर्माण व्यवसायी तथा मध्यस्थ छह महीने तक सामान्य स्थिति अर्थात नयी मुद्रा के कालेधन में परिवर्तित होने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।  मजदूरों का नाम तो वह ऐसे ही ले रहे हैं जैसे समाज सेवक उनका मत पाने के लिये करते हैं। 
             हमारे अनुसार प्रधानमंत्री श्रीमोदी को नोटबंदी के बाद की प्रक्रियाओं पर भी सतत नज़र रखना चाहिये ताकि कहीं अधिकारीगण इन कालेधनिकों के दबाव में उतनी मुद्रा न जारी कर दें जितनी पहले थी।  बाज़ार में दिख रही  छटपटाहट उन कालेधन वालों की है जो कि राजस्व चोरी कर अपनी वैभव खड़ा करते हैं। हम जैसे जमीनी अर्थशास्त्री तो अब यह अनुभव करने लगे हैं कि देश ने 70 सालों में कथित विकास कालेधन का ही था।  सरकार के राजस्व में भारी बढ़ोतरी उस अनुपात में नहीं देखी गयी जितना आर्थिक विकास होने का दावा किया जाता है।



Friday, December 16, 2016

बिन अफसरशाही न इष्ट में गुन सजे न भक्त की धुन बजे.हिन्दी लेख (Bin Afasarshahi n isht mein gun Saje n Bhakt ki Dhun baje-HindiLekh)

                             इधर भक्त उधर इष्ट है।  अगर इन दोनों का कोई सम्मेलन हो तो भक्त और इष्ट एक दूसरे से पास आकर नहीं मिल सकते। बीच में पुजारी और सेवक भी होते हैं। कहीं सत्संग वगैरह हो तो वहां इष्ट का प्रत्यक्ष स्मरण होने से पहले उनके भेजे पुजारियों का सम्मान होता है। सीधी बात कहें तो न भक्त भ्रम पालें न उनके इष्ट आत्ममुग्ध हों कि उनका आपस में प्रत्यक्ष संबंध हमेशा बना रह सकता है। हम अब बात करेंगे बीच की कड़ियों की जिनका महत्व इष्ट और भक्त दोनों को समझना होगा।
                                        अभी नोटबंदी हुई। इष्ट के इस कदम पर भक्त बहुत प्रसन्न हुए पर अब कह रहे हैं कि बीच में बैंक वालों ने भांजी मार ली।  यही इनको समझना होगा कि राज्य प्रबंध हमेशा ही अधिकारियों के सहारे ही चलता है।  राज्यप्रबंध में भ्रष्टाचार है यह सब जानते हैं।  यहां तक कि भक्त भी भ्रष्टाचार पर प्रहार करते हैं। मगर अब उनके पास बहाने नहीं हो सकते क्योंकि उनके इष्ट इसी राज्य प्रबंध के मुखिया हैं।  हमने भक्तों के इष्ट का गुजरात से लेकर दिल्ली तक का सफर देखा है। यहां हम भी बता दें कि चुनावी राजनीति का अनुभव हमारा शून्य है पर उसे देखते रहने का चालीस साल पुराना अनुभव है।  सर्वोच्च प्रतिनिधि संस्था के अंदर तो छोड़िये उसके बाहर लगी सड़क तक नहीं गये पर उसकी गतिविधियां पढ़ने का भी उतना ही अनुभव है।  इसी अनुभव के आधार पर हमारा यह अनुमान था कि यह यह पूरा सत्र ऐसे ही शोर के साथ बीतेगा क्योंकि नोटबंदी एक एतिहासिक निर्णय था और इससे ध्यान हटाकर दूसरे विषयों पर बहस करना एक मुश्किल संभावना थी।
                                  आज भी भक्तों के इष्ट का भाषण सुना जिसमें उन्होंने कहा था कि ष्नागरिकों को अधिकारियों से मुक्ति दिलानी है।
                           अपने प्रधानमंत्री बनने के तत्काल बाद भी अपने भाषण में उन्होंने गुजरात में उनके कार्यकाल की चर्चा करते हुए बताया था कि उनके सत्ता में आने से पूर्व अनेक उद्योगपतियों को पर्यावरण की राज्य प्रबंध के अधिकारियों से अनुमति नहीं मिल रही थी तब उन्होंने उनसे कहा कि वह अपना कामकाज शुरु कर दें और उसके बाद उनको सारी अनुमतियां एकल खिड़की पर तत्काल मिल जायेंगी।
                                      अब हम यह बात किसे समझायें कि इष्ट की घोषणाओं को जमीन पर भक्तों के लिये लाने वाले यही अधिकारी तथा कर्मचारी हैं। इसमें सभी भ्रष्ट नहीं है पर यह भी सच है कि जिन पदों पर मलाई होती है वहां कमाऊ प्रवृत्ति पता नहीं कैसे आ जाते हैंघ् भक्त भले ही सभी कर्मचारियों और अधिकारियों को सरकार पर बोझ मानते हों पर यह सच समझ लें कि प्रधानमंत्री से चलने वाली सरकार जनता के पास तीन मुंहों में आती है.पटवारीए पुलिसथाना और पोस्टमेन। यह सभी भारत की आकस्मिक निधि से वेतन पाते हैं और जनहित के साथ काम करना इनका कर्तव्य है।  सरकार का आकार छोटा किया जा रहा है पर एक तरह से वह अपनी ताकत कम कर रही है।  अभी तब अंग्रेजों की राज्य प्रणाली काम कर रही है उसमें सरकार का यही रूप है।  अगर पसंद नहीं है तो संविधान बदल कर दूसरी बनाओं पर अगर इसी रूप में चलानी है तो प्रधानमंत्री से लेकर पटवारीए पुलिस और पोस्टमेन तक राज्य प्रबंध मजबूत करो। बीच में जो अधिकारी हैं वह स्थाई हैं। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री बदलते हैं पर उनका रुतवा कम नहीं होता।  नोटबंदी में भक्तों के इष्ट के लिये पूरी राज्यव्यवस्था को समझने का अवसर रहा होगा।  अभी तो बैंकों का रवैया देखा है अगर थोड़ा जांच करें तो प्रशासनिक संस्थायें भी भ्रष्ट रूप में सामने आयेंगी। बेहतर होगा भक्तनुमा कर्मियों का मनोबल बढ़ाकर अपना काम सिद्ध करें।
                                       हमने 33 वर्ष सेवा की और आज एक बात साफ कहें कि हमारा सौभाग्य समझें कि भ्रष्टाचार करने का अवसर हाथ नहीं आया पर यह भी मानते हैं कि हमारी कार्य तथा बौद्धिक क्षमता का उससे ज्यादा उपयोग हो सकता था जितना किया गया।  हम मन में कोई दाग लेकर नहीं निकले पर यह अफसोस रहा कि हमारा कार्यकाल एकदम सामान्य तथा निरुपयोगी रहा।  जिन मनमोहन सिंह पर भक्त हंसते हैं उनका कार्यकाल इस मायने में अच्छा रहा कि उन्होंने राज्यप्रबंध से जुड़े लोगों का बेहतर उपयोग करने के नियम बनाये पर अधिकारियों ने उन्हें अमल नहीं होने दिया।  ईमानदारए उत्साह तथा निष्ठा से काम करने के इच्छुक लोगों के लिये राज्यप्रबंध में कोई प्रेरणा नहीं है। मजे की बात यह कि अनेक भक्त हैं पर राज्यप्रबंध में अपने योगदान को लेकर निराश रहते हैं।  एक कर्मचारी के रूप में उनका मनोबल गिरा रहता है।  इस पर इष्ट की उनके प्रति उपेक्षा का भाव उन्हें थका देता है। इन निष्ठावान कर्मचारियों का मनोबल बढ़ाने काम भक्तों के इष्ट को करना ही होगा वरना करते रहो घोषणायें.कुछ होने वाला नहीं है। कालेधन और भ्रष्टाचार की पकड़ करने वाले कोई आसमान से नहीं आयेंगे।  हमने भक्तों के अनेक शिखर पुरुषों के ब्रह्वचन सुने हैं जिसमें वह सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों को अकर्मण्य और भ्रष्ट बनते हैं पर जरा यह बतायें कि राज्य प्रबंध में उनके बिना जनहित कैसे किया जा सकता हैघ् हम दलनिरपेक्ष राजनीति करते हैं इसलिये सहृदय से मुफ्त में सलाह दे रहे हैं।  अच्छी लगे तो मान लेना नहीं तो भूल जाना।
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Saturday, December 3, 2016

कालाधन बाहर लाने के साथ ही भ्रष्ट धनासुर का भी वध जरूरी है-नोटबंदी पर हिन्दी निबंध (curropt Money Should come Out with Black Money-Hindi Essay)

                      भारत के वर्तमान राष्ट्रवादी कर्णधार लगातार यह कह रहे हैं कि नोटबंदी का कदम उन्होंने कालेधन को समाप्त करने के लिये उठाया है।  अनेक बार उन्होंने यह भी कहा कि देश में व्याप्त आतंकवादियों का धन सुखाने के लिये यह कदम उठाया  है। अनेक अर्थशास्त्री इस पर व्यंग्य भी करते हैं पर हमारा विचार इससे अलग है। यह नोटबंदी सामाजिक रूप से ज्यादा प्रभावी होने वाली है भले ही नोटबंदी के समर्थक या विरोधी केवल आर्थिक परिणामों की व्याख्या अपनी अनुसार कर रहे हों।  सबसे बड़ी बात यह कि हमारे समाज में धन से मदांध लोगों का एक ऐसा समूह विचर रहा था जो मुद्रा की कीमत नहीं समझता था। उसे लगता था कि उसके वैभाव की स्थिति स्थाई है इसलिये चाहे जैसे व्यवहार कर रहा था। मुद्रा का अभाव उसे ऐसे अनेक सबक देगा जो अध्यात्मिक विद्वान देते रहे थे पर लोग उनको सुनकर भूल जाते थे।
            नोटबंदी के दौरान टीवी और अखबारों पर चल रही बहसों मेें हमने विद्वानों तर्कों में भारी भटकाव देखा।  सरकार ने पांच सौ, हजार और दो हजार के नोट बंद किये पर फिर दूसरे नये शुरु भी कर दिये।  इस पर कुछ लोगों ने कहा कि यह भ्रष्टाचार की दर दुगुनी कर देगा-यह सही बात अब लग रही है। हम जैसे लोग बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों अथवा साहुकारों के उस धन पर अधिक नहीं सोचते जो आयकर बचाकर उसे काली चादर पहनाते हैं।  हमारी दिलचस्पी उस सार्वजनिक भ्रष्टाचार से है जिसने देश का नैतिक चरित्र खोखला किया है।  हमने पश्चिमी अर्थशास्त्र के साथ देशी अर्थशास्त्र का-चाणक्य, विदुर, कौटिल्य तथा मनुस्मृति- अध्ययन किया है और इस आधार पर हमारा मानना है कि काले तथा भ्रष्ट धन में अब अंतर करना चाहिये।  हमारा मानना है कि करों की अधिक दरों तथा कागजी कार्यवाही की वजह से अनेक लोग आयकर बचाते हैं पर उनके व्यवसाय को अवैध नहीं कह सकते।  इसके विपरीत राजपद के दुरुपयोग, सट्टे तथा मादक पदार्थों के प्रतिबंध व्यवसाय से उपार्जित धन हमारी दृष्टि से भ्रष्ट होने के साथ ही देश के लिये बड़ा खतरा है।  कालाधन पर प्रहार के लिये दीवानी प्रयास हो सकते हैं पर भ्रष्ट धन बिना फौजदारी कार्यवाही के हाथ नहीं आयेगा। आप कालेधन के समर्पण के लिये प्रस्ताव दे सकते हैं पर भ्रष्ट धन के लिये यह संभव नहीं है।
                सच बात तो यह है कि वर्तमान में राष्ट्रवादी कर्णधार अपने ही स्वदेशी विचार को लेकर दिग्भ्रमित हैं।  वह बात तो करते हैं अपने देश के महान दर्शन की पर अमेरिका, जापान, चीन और ब्रिटेन जैसा समाज बनाने का सपना देखते हैं। पश्चिमी और स्वदेशी विचाराधारा में फंसे होने के कारण उनके दिमाग में विरोधाभासी विचारा पलते हैं। पश्चिमी अर्थशास्त्र में दर्शनशास्त्र को छोड़कर सारे शास्त्र शामिल होते हैं जबकि हमारा दर्शनशास्त्र ही अर्थशास्त्र सहित सारे शास्त्र समेटे रहता है। हमारे दर्शन में करचोरी और भ्रष्टाचार का अलग अलग उल्लेख मिलता है। मजे की बात यह कि हमारे अध्यात्मिक विद्वान ही मानते रहे हैं कि राजकर्मियों में राज्य के धन हरण की प्रवृत्ति रहती है। जब हम धन की बात करते हैं तो स्वच्छ, काले तथा भ्रष्ट धन के प्रति अलग अलग दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से बन जाता है। देश के वर्तमान राष्ट्रवादी कर्णधार नोटबंदी करने के बाद भारी दबाव में आ गये हैं। वह तय नहीं कर पा रहे कि करना क्या है और कहना क्या है? अभी तक राष्ट्रवादियों ने अनेंक आंदोलन चलाये थे जिसमें नारों के आधार पर ही उन्हें प्रतिष्ठा मिल गयी। बीच में उनकी अन्य दलों के सहारे साढ़े छह साल सरकार चली पर अन्य दलों के दबाव में अपने विचार लागू न कर पाने का बहाना करते रहे। अब अपनी पूर्ण सरकार है तो उनकी कार्यप्रणाली में जहां नयेपन का अभाव दिख रहा है तो वहीं सैद्धांतिक विचाराधारा का अत्यंत सीमित भंडार भी प्रकट हो रहा है।  उनका संकट यह है कि अपने समर्थकों को कुछ नया कर दिखाना है पर सत्ता का सुख तो केवल यथास्थिति में ही मिल सकता है।
                      राष्ट्रवादियों का यह संकट उनके लिये बड़ी चुनौती है पर यह लगता नहीं कि वह इसे पार हो सकेंगे।  नोटबंदी के प्रकरण को मामूली नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस पर बरसों तक बहस चलेगी। राष्ट्रवादियों ने अपनी सरकार भी अपने प्रतिद्वंद्वियों की तरह धन के सहारे ही बनायी और उन्हें उनकी तरह ही धनपतियों को प्रसन्न करना था। राजपदों की गरिमा जो राष्ट्रवादियों में होना चाहिये वह धनपतियों के सामने धरी की धरी रह गयी। अगर अपने अध्यात्मिक दर्शन के प्रति वास्तव में समर्पण होता तो वह राजपद की उस गरिमा के साथ चलते जिसमें राजा हमेशा ही साहुकारों, जमीदारों और व्यापारियों से उपहार के रूप में राशि लेता है पर उनके आगे सिर नहीं झुकाता। इन लोगों को इतना ज्ञान नहीं रहा कि साहुकारों, जमींदारों तथा व्यापारियों की यह मजबूरी रहती है कि वह अपने राजा को बचायं रखें क्योंकि इससे ही उनका अस्तित्व बना रहता है। इसके विपरीत यह तो धनपतियों के आगे इसलिये नतमस्तक हो रहे हैं कि उनका पद बचा रहे।  हमने तो राष्ट्रवादियों की सुविधा के लिये यह लिखा है कि हमें उद्योगपतियों के कालेधन में नहीं वरन् अनिर्वाचित राजपदों पर-सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों-काम करने वालों के भ्रष्ट धन से मतलब है। लगता नहीं है कि राष्ट्रवादी यह भी कर पायेंगे क्योंकि वह भी अपने प्रतिद्वंद्वियों की तरह ही इन्हीं अनिर्वाचित राजपदासीन लोगों के सहारे सरकार चलाते हैें जो कि उन्हें राज्यसुख नियमित रूप से प्रदान कर अपनी स्थाई पद बचाये रहते हैं। हमारा तो सीधा कहना है कि राष्ट्रवादी अब नोटबंदी के बाद उस दौर में पहुंच गये हैं जहां उन्हें अपने वैचारिक धरातल पर उतरकर आगे बढ़ना ही होगा। पीछे लौटने या वहीं बने रहने का अवसर अब उनके पास नहीं बचा है।
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Thursday, December 1, 2016

वेतन व पैंशनभोगियों की आड़ लेकर नोटबंदी का विरोध करना गलत-हिन्दी लेख (Salary And Pension Users Not Effected from Notbandi-Hindi article


              पिछले 12 वर्ष से कर्मचारियों का वेतन बैंकों में जा रहा है। कोई भी एक दिन में पूरा का पूरा निकलवाने नहीं जाता। वेतन तथा पैंशनभोगियों में कई तो ऐसे हैं जो छह छह महीने पासबुक अपडेट कराने भी बैंक नहंी जाते।  एटीएम से पैसे निकलवाते रहते हैं। 
                          कहा जाता है कि
               परायी शादी में अब्दुल्ला दीवाना
                कुछ ऐसा ही हाल उन लोगों को हैं जिन्होंने नौकरी नहीं की है या की है तो अनभूतियां भूल गये हैं। वह नोटबंदी पर वेतनभोगियों की समस्या पर प्रलाप कर रहे हैं। कर्मचारियों तथा पैंशनरों के खातों मेें रकम जमा हो गयी है और वह पूरा महीना अपने आवश्यकता के अनुसार निकालते रहेंगे। उनके दर्द का वर्णन  करने वाले कम से कम दो दशक पहले की कल्पना में जी रहे हैं।  आजकल शायद ही कोई कर्मचारी ऐसा होगा जो एक तारीख के इंतजार में विरहगीत गाता हो क्योंकि वेतन की राशि उसके हाथ मेें सीधे नहंी आती। अनेक कर्मचारी तो हास्य भाव से कहते भी हैं कि ‘अब तो वेतन पाने का मजा ही खत्म हो गया है।  सीधे बैंक जाने के कारण रुपयों को एक साथ छूने का आंनद खत्म हो गया है।
        आज पहली पहली तारीख वाला अब कोई नहीं गुनगुनाता। इसलिये नोटबंदी के विरोध कोई नये तर्क खोजकर लायें तो अच्छा है वरना हमें ऐसा लगता है कि अनेक लोगों बीस साल पीछे सोचते हैं।
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अर्थक्रांति वालों की बात मानकर आयकर खत्म हुआ तो भ्रष्टाचारी रोने लगेंगे
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            अभी हमने पढ़ा कि अर्थक्रांति नामक एक संस्था सीधे प्रधानमंत्री को आयकर समाप्त करने का सुझाव दिया है। अगर यह मान लिया गया तो तय समझिये कि उसका विरोध नोटबंदी से ज्यादा होगा क्योंकि यह भ्रष्टाचार पर सीधे प्रहार होगा। इतना ही नहीं सामान्य लोगों को सरकार के भय से मुक्त कर देगा और यही भ्रष्टाचार नहीं चाहते। दरअसल समाज में जो भ्रष्टाचार है वह सरकार के इसी आयकर की वजह से है जो अंततः भ्रष्टाचार में बदल जाता है। धनपति इससे सरकारी दलालों के भय से मुक्त हो जायेगा तब उससे कमीशन वसूलना कठिना होगा। हम जैसे लोगों की दिलचस्पी धनपतियों के धन में नहीं वरन् उन लोगों में है जो राजपदों का दुरुपयोग करते हैं। आयकर खत्म हो जायेगा पर उसकी जगह जो दूसरा कर लगेगा वह कष्टकारक नहीं होगा जिसे लोग आसानी से भरकर चैन की सांस ले सकेंगे। यही तो भ्रष्ट राजपदधारी नहीं चाहते हैं।
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