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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Saturday, December 3, 2016

कालाधन बाहर लाने के साथ ही भ्रष्ट धनासुर का भी वध जरूरी है-नोटबंदी पर हिन्दी निबंध (curropt Money Should come Out with Black Money-Hindi Essay)

                      भारत के वर्तमान राष्ट्रवादी कर्णधार लगातार यह कह रहे हैं कि नोटबंदी का कदम उन्होंने कालेधन को समाप्त करने के लिये उठाया है।  अनेक बार उन्होंने यह भी कहा कि देश में व्याप्त आतंकवादियों का धन सुखाने के लिये यह कदम उठाया  है। अनेक अर्थशास्त्री इस पर व्यंग्य भी करते हैं पर हमारा विचार इससे अलग है। यह नोटबंदी सामाजिक रूप से ज्यादा प्रभावी होने वाली है भले ही नोटबंदी के समर्थक या विरोधी केवल आर्थिक परिणामों की व्याख्या अपनी अनुसार कर रहे हों।  सबसे बड़ी बात यह कि हमारे समाज में धन से मदांध लोगों का एक ऐसा समूह विचर रहा था जो मुद्रा की कीमत नहीं समझता था। उसे लगता था कि उसके वैभाव की स्थिति स्थाई है इसलिये चाहे जैसे व्यवहार कर रहा था। मुद्रा का अभाव उसे ऐसे अनेक सबक देगा जो अध्यात्मिक विद्वान देते रहे थे पर लोग उनको सुनकर भूल जाते थे।
            नोटबंदी के दौरान टीवी और अखबारों पर चल रही बहसों मेें हमने विद्वानों तर्कों में भारी भटकाव देखा।  सरकार ने पांच सौ, हजार और दो हजार के नोट बंद किये पर फिर दूसरे नये शुरु भी कर दिये।  इस पर कुछ लोगों ने कहा कि यह भ्रष्टाचार की दर दुगुनी कर देगा-यह सही बात अब लग रही है। हम जैसे लोग बड़े उद्योगपतियों, व्यापारियों अथवा साहुकारों के उस धन पर अधिक नहीं सोचते जो आयकर बचाकर उसे काली चादर पहनाते हैं।  हमारी दिलचस्पी उस सार्वजनिक भ्रष्टाचार से है जिसने देश का नैतिक चरित्र खोखला किया है।  हमने पश्चिमी अर्थशास्त्र के साथ देशी अर्थशास्त्र का-चाणक्य, विदुर, कौटिल्य तथा मनुस्मृति- अध्ययन किया है और इस आधार पर हमारा मानना है कि काले तथा भ्रष्ट धन में अब अंतर करना चाहिये।  हमारा मानना है कि करों की अधिक दरों तथा कागजी कार्यवाही की वजह से अनेक लोग आयकर बचाते हैं पर उनके व्यवसाय को अवैध नहीं कह सकते।  इसके विपरीत राजपद के दुरुपयोग, सट्टे तथा मादक पदार्थों के प्रतिबंध व्यवसाय से उपार्जित धन हमारी दृष्टि से भ्रष्ट होने के साथ ही देश के लिये बड़ा खतरा है।  कालाधन पर प्रहार के लिये दीवानी प्रयास हो सकते हैं पर भ्रष्ट धन बिना फौजदारी कार्यवाही के हाथ नहीं आयेगा। आप कालेधन के समर्पण के लिये प्रस्ताव दे सकते हैं पर भ्रष्ट धन के लिये यह संभव नहीं है।
                सच बात तो यह है कि वर्तमान में राष्ट्रवादी कर्णधार अपने ही स्वदेशी विचार को लेकर दिग्भ्रमित हैं।  वह बात तो करते हैं अपने देश के महान दर्शन की पर अमेरिका, जापान, चीन और ब्रिटेन जैसा समाज बनाने का सपना देखते हैं। पश्चिमी और स्वदेशी विचाराधारा में फंसे होने के कारण उनके दिमाग में विरोधाभासी विचारा पलते हैं। पश्चिमी अर्थशास्त्र में दर्शनशास्त्र को छोड़कर सारे शास्त्र शामिल होते हैं जबकि हमारा दर्शनशास्त्र ही अर्थशास्त्र सहित सारे शास्त्र समेटे रहता है। हमारे दर्शन में करचोरी और भ्रष्टाचार का अलग अलग उल्लेख मिलता है। मजे की बात यह कि हमारे अध्यात्मिक विद्वान ही मानते रहे हैं कि राजकर्मियों में राज्य के धन हरण की प्रवृत्ति रहती है। जब हम धन की बात करते हैं तो स्वच्छ, काले तथा भ्रष्ट धन के प्रति अलग अलग दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से बन जाता है। देश के वर्तमान राष्ट्रवादी कर्णधार नोटबंदी करने के बाद भारी दबाव में आ गये हैं। वह तय नहीं कर पा रहे कि करना क्या है और कहना क्या है? अभी तक राष्ट्रवादियों ने अनेंक आंदोलन चलाये थे जिसमें नारों के आधार पर ही उन्हें प्रतिष्ठा मिल गयी। बीच में उनकी अन्य दलों के सहारे साढ़े छह साल सरकार चली पर अन्य दलों के दबाव में अपने विचार लागू न कर पाने का बहाना करते रहे। अब अपनी पूर्ण सरकार है तो उनकी कार्यप्रणाली में जहां नयेपन का अभाव दिख रहा है तो वहीं सैद्धांतिक विचाराधारा का अत्यंत सीमित भंडार भी प्रकट हो रहा है।  उनका संकट यह है कि अपने समर्थकों को कुछ नया कर दिखाना है पर सत्ता का सुख तो केवल यथास्थिति में ही मिल सकता है।
                      राष्ट्रवादियों का यह संकट उनके लिये बड़ी चुनौती है पर यह लगता नहीं कि वह इसे पार हो सकेंगे।  नोटबंदी के प्रकरण को मामूली नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस पर बरसों तक बहस चलेगी। राष्ट्रवादियों ने अपनी सरकार भी अपने प्रतिद्वंद्वियों की तरह धन के सहारे ही बनायी और उन्हें उनकी तरह ही धनपतियों को प्रसन्न करना था। राजपदों की गरिमा जो राष्ट्रवादियों में होना चाहिये वह धनपतियों के सामने धरी की धरी रह गयी। अगर अपने अध्यात्मिक दर्शन के प्रति वास्तव में समर्पण होता तो वह राजपद की उस गरिमा के साथ चलते जिसमें राजा हमेशा ही साहुकारों, जमीदारों और व्यापारियों से उपहार के रूप में राशि लेता है पर उनके आगे सिर नहीं झुकाता। इन लोगों को इतना ज्ञान नहीं रहा कि साहुकारों, जमींदारों तथा व्यापारियों की यह मजबूरी रहती है कि वह अपने राजा को बचायं रखें क्योंकि इससे ही उनका अस्तित्व बना रहता है। इसके विपरीत यह तो धनपतियों के आगे इसलिये नतमस्तक हो रहे हैं कि उनका पद बचा रहे।  हमने तो राष्ट्रवादियों की सुविधा के लिये यह लिखा है कि हमें उद्योगपतियों के कालेधन में नहीं वरन् अनिर्वाचित राजपदों पर-सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों-काम करने वालों के भ्रष्ट धन से मतलब है। लगता नहीं है कि राष्ट्रवादी यह भी कर पायेंगे क्योंकि वह भी अपने प्रतिद्वंद्वियों की तरह ही इन्हीं अनिर्वाचित राजपदासीन लोगों के सहारे सरकार चलाते हैें जो कि उन्हें राज्यसुख नियमित रूप से प्रदान कर अपनी स्थाई पद बचाये रहते हैं। हमारा तो सीधा कहना है कि राष्ट्रवादी अब नोटबंदी के बाद उस दौर में पहुंच गये हैं जहां उन्हें अपने वैचारिक धरातल पर उतरकर आगे बढ़ना ही होगा। पीछे लौटने या वहीं बने रहने का अवसर अब उनके पास नहीं बचा है।
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Thursday, December 1, 2016

वेतन व पैंशनभोगियों की आड़ लेकर नोटबंदी का विरोध करना गलत-हिन्दी लेख (Salary And Pension Users Not Effected from Notbandi-Hindi article


              पिछले 12 वर्ष से कर्मचारियों का वेतन बैंकों में जा रहा है। कोई भी एक दिन में पूरा का पूरा निकलवाने नहीं जाता। वेतन तथा पैंशनभोगियों में कई तो ऐसे हैं जो छह छह महीने पासबुक अपडेट कराने भी बैंक नहंी जाते।  एटीएम से पैसे निकलवाते रहते हैं। 
                          कहा जाता है कि
               परायी शादी में अब्दुल्ला दीवाना
                कुछ ऐसा ही हाल उन लोगों को हैं जिन्होंने नौकरी नहीं की है या की है तो अनभूतियां भूल गये हैं। वह नोटबंदी पर वेतनभोगियों की समस्या पर प्रलाप कर रहे हैं। कर्मचारियों तथा पैंशनरों के खातों मेें रकम जमा हो गयी है और वह पूरा महीना अपने आवश्यकता के अनुसार निकालते रहेंगे। उनके दर्द का वर्णन  करने वाले कम से कम दो दशक पहले की कल्पना में जी रहे हैं।  आजकल शायद ही कोई कर्मचारी ऐसा होगा जो एक तारीख के इंतजार में विरहगीत गाता हो क्योंकि वेतन की राशि उसके हाथ मेें सीधे नहंी आती। अनेक कर्मचारी तो हास्य भाव से कहते भी हैं कि ‘अब तो वेतन पाने का मजा ही खत्म हो गया है।  सीधे बैंक जाने के कारण रुपयों को एक साथ छूने का आंनद खत्म हो गया है।
        आज पहली पहली तारीख वाला अब कोई नहीं गुनगुनाता। इसलिये नोटबंदी के विरोध कोई नये तर्क खोजकर लायें तो अच्छा है वरना हमें ऐसा लगता है कि अनेक लोगों बीस साल पीछे सोचते हैं।
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अर्थक्रांति वालों की बात मानकर आयकर खत्म हुआ तो भ्रष्टाचारी रोने लगेंगे
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            अभी हमने पढ़ा कि अर्थक्रांति नामक एक संस्था सीधे प्रधानमंत्री को आयकर समाप्त करने का सुझाव दिया है। अगर यह मान लिया गया तो तय समझिये कि उसका विरोध नोटबंदी से ज्यादा होगा क्योंकि यह भ्रष्टाचार पर सीधे प्रहार होगा। इतना ही नहीं सामान्य लोगों को सरकार के भय से मुक्त कर देगा और यही भ्रष्टाचार नहीं चाहते। दरअसल समाज में जो भ्रष्टाचार है वह सरकार के इसी आयकर की वजह से है जो अंततः भ्रष्टाचार में बदल जाता है। धनपति इससे सरकारी दलालों के भय से मुक्त हो जायेगा तब उससे कमीशन वसूलना कठिना होगा। हम जैसे लोगों की दिलचस्पी धनपतियों के धन में नहीं वरन् उन लोगों में है जो राजपदों का दुरुपयोग करते हैं। आयकर खत्म हो जायेगा पर उसकी जगह जो दूसरा कर लगेगा वह कष्टकारक नहीं होगा जिसे लोग आसानी से भरकर चैन की सांस ले सकेंगे। यही तो भ्रष्ट राजपदधारी नहीं चाहते हैं।
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Wednesday, November 23, 2016

नोटबंदी से किसानों, मजदूरों और महिलाओं को नकली मुद्रा के खौफ से अभी तो मुक्ति मिलेगी-हिन्दी संपादकीय (formers, Lebour and Woman free Fake Currency from DeModitisation-hindi editorial)


                                 नोटबंदी पर हमारा नजरिया सबसे अलग रहा है।  मजे की बात यह कि जिस किसान, मजदूर और गरीब की दुर्दशा पर नोटबंदी के विरोधी आंसु बहा रहे हैं उसी के खोये मनोबल की वापसी की आशा में समर्थन कर रहे हैं।
                                                एक बार हम बिजलीघर गये थे तो एक निम्न मध्यमवर्गीय अशिक्षित महिला पांच सौ का नोट दिखाकर बोली‘-साहब हमारा यह नोट देखना नकली तो नहीं है। बड़ा डर लगता है क्योंकि इसका नंबर बिल के पीछे लिखाकर लाई हूं।
                        हमने कहा-‘सच बात तो यह है कि हमें भी समझ  नहीं है। फिर भी देख लेते हैं।
                         पास में ही एक सज्जन खड़े थे उन्होंने कहालाओ मैं देखता हूं।
                          उन्होंने देखा और फिर कहा-‘यह असली है।
                        पानी और बिजली के बिलों पर पांच सौ और हजार के नोटों का नंबर लिखकर देना एकदम सामान्य बात लगती है पर हमें अपने ही देश की मुद्रा के प्रति ऐसा अविश्वास हमारा ही मनोबल गिराता है।  बिल जमा कर घर वापस आने पर भी चिंता सताती थी कि कहीं वहां नकली नोट निकलने की सूचना जाये।
                         हम जब किसी को पांच सौ या हजार का नोट देते थे तो वह उलट पलट कर देखता था तो हम कहते थे किभई, यह नोट हम एटीएम से निकाल कर लाये हैं।
                           सीधा जवाब मिलता किएटीएम से भी नकली नोट निकलते हैं।
                                एक आदमी तो हमसे कह रहा था कि बैंकों की गड्डी जो एटीएम में डाली जाती है उसमें सौ में चार नकली होते हैं।  हमारे एक दोस्त ने बताया कि उसे एटीएम से पांच सौ के नोट निकालकर अपने किसी जीवन बीमा एजेंट के पास देने गया तो उसने बताया कि दो नोट नकली है।  उस मित्र ने जैसे तैसे उनको कहीं चला दिया।  एक मित्र ने बताया कि उसने सीधे बैंक से हजार के पांच नोट निकाले और जीवन बीमा कार्यालय में जमा कराने गया।  वहां उसे दो नोट नकली बताकर वापस किये गये। वह बैंक आया तो रोकड़िया ने साफ मना कर दिया कि उसने दिये हैं। यह तो गनीमत थी कि इस गतिविधि के दौरान दो अन्य साथी भी थे। उन्होंने  पुलिस मेें रिपोर्ट लिखाने बात कही तो शायद बात बन गयी थी।
                          इस नकली मुद्रा का प्रकोप इतना था कि हमारे एक मित्र को कहीं से किसी ने 25 हजार कर्ज की वापसी में 5 सौ और हजार के नोट दिये थे। हमने उससे कहा कि-‘तुम इनको बैंक में जमा क्यों नहीं करते?’
                               उसने कहा-‘मैं पागल नहीं हूं। बैंक में कहीं इसमें से कोई नकली निकला तो परेशानी हो सकती है। मैं तो इन्हें घर खर्च में लूंगा।
                                    उस दिन बैंक में पासबुक पर एंट्री कराने गये तो वहां एक अर्द्धशिक्षित वह निम्न मध्यमवर्गीय लड़का हजार के चार नोट पास लाकर बोला-‘सर, आप चेक कर दें इनमें से कोई नकली तो नहीं है।
                                               मैंने उससे कहा कितुम कैशियर के पास जाओ। वह बता देगा।
                                                उसने कहा-‘सर, अगर नकली हुआ तो वह कहीं पुलिस को बुला ले।
                                       हमने उससे कहा-‘तुम यहां किसी दूसरे को दिखा दो मुझे इसका ज्यादा अनुमान नहीं है।
                        एक नहीं ऐसी अनेक घटनायें हुईं जिसमें किसान, मजदूर और महिलाओं को नकली नोटों से भयभीत देखा-सभी घटनाओं का वर्णन करना बेकार है। इन घटनाओं ने हमारे अंदर देश की मुद्रा के प्रति अविश्वास भर दिया था।  एटीएम से निकले हजार या पांच सौ के नोट पहले खर्च करते थे। जेब में सौ के पांच नोट हो तो भी हम पेट्रोल पंप या अन्य कहीं दो सौ के भुगतान के लिये पांच सौ या हजार का नोट पहले देते थे।  हमार सारे भुगतान बैंक में ही आते थे इसलिये कहीं से नकली मुद्रा प्राप्त होने की आशंका नहीं थी। अगर कहीं हजार का नोट देने पर पांच सौ का नोट मिलता था तो चिंता हो जाती थी कि यह असली है या नहीं।
                        कभी अपने हाथ से बैंक या पोस्ट आफिस में हजार या पांच सौ का नोट नहीं दिया। नोटबंदी के बाद हम अपना आखिरी हजार का एक तथा पांच सौ के तीन नोट लेकर बैंक गये तो कैशियर ने जब तक उसको दराज में नहीं रखा तब तक हमारा दिल धक धक कर रहा था कि कहीं नकली निकले।  कहा जाता है कि पैसा कुछ करे या नहीं पर वह आत्मविश्वास पैदा करता है मगर बड़े नोट तो हमें चिंतित किये देते थे।  यह एक अप्राकृतिक स्थिति थी।  अब दो हजार और पांच सौ नोट आने पर हमारा हृदय प्रसन्न नहीं है। इसलिये तय किया है कि अपने बड़े भुगतान अब डेबिट कार्ड से ही करेंगे।  ऐसा नहीं है कि नोटबंदी का कष्ट हम नहीं झेल रहे पर नकली मुद्रा से तनाव की मुक्ति राहत भी दिला रही है। नकली मुद्रा का अंश असली के साथ कितना था, कम था या ज्यादा, आदि प्रश्नों से हमारा कोई लेना देना नहीं है।  हमारा मानना है कि उससे समाज में अनेक लोगों का मनोबल गिरा हुआ था जो कि देश के लिये अच्छी बात नहीं थी। एक योग तथा अध्यात्मिक साधक होने के कारण हमें मन के खेल का पता है और इसलिये ही नोटबंदी का समर्थन करते हैं।

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