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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Monday, September 11, 2017

हमारा पवित्र अंक 1008 है इसलिये 969 वालों की हिंसा का समर्थन नहीं करते(Hindu Holi number 1008 and hi no enter in Fight between 969 & 786-HindiArticle)


               एक बात समझ में नहीं आती कि 25 अगस्त 2017 से बर्मा में रौहिंग्याओं के विरुद्ध हिंसा का वातावरण चल रहा था पर पांच सितम्बर को भारत के प्रधानमंत्री की चीन के बाद म्यांमार पहुंचने पर ही अचानक उसका प्रचार क्यों बढ़ गया? दिलचस्प बात यह कि बर्मा या म्यांमार ऐसा देश है जो भारत व चीन के बीच संबंधों का संतुलन बनाये हुए है।  कहा जाता है कि वहां की सरकार पर चीन का दबाव है तो अब यह भी देखने को मिला कि उसने भारत के साथ भी अच्छे संबंध बनाने के प्रयास शुरु किये हैं। जिन लोगों को लगता है कि चीन भारत के प्रति शत्रुभाव रखता है उन्हें इस पर अवश्य विचार करना चाहिये कि क्या बर्मा अब चीन के दबाव से मुक्त हो गया है या फिर इसमें चीन की कोई चाल है?
                        बर्मा में रौहिंग्या लोगों का मसला  अब तेजी से उभर रहा है।  मध्य एशिया के आतंकी अपने लिये नया ठिकाना ढूंढने बर्मा आ रहे हैं।  एक बात तय है कि इन्हें सऊदी अरब, कतर, तुर्की व ईरान से धन मिलता है।  यह देश बिना आतंकवाद के विश्व में अपनी जगह नहीं बनाये रख सकते। फिर इधर भारत से उन्होंने दोस्ताना दिखाना शुरु किया है पर अगर मध्य एशिया के आतंकवादी बर्मा आते हैं तो यकीनन भविष्य में भारत को अस्थिर करने की उनकी कोई योजना होगी जो उन्हें आकाओं ने सौंपी होगी। हालांकि अगर वहां आतंकवाद फैलता है तो भारत, चीन, जापान और दक्षिणकोरिया एक मंच पर होंगे यह भी तय है। 
                      वैसे पहले भी बर्मा में रौहिंग्या लोगों के विरुद्ध भड़की हिंसा की विश्व भर में चर्चा हो रही है। इसको एक धर्म का दूसरे धर्म से संघर्ष बताया जा रहा है।  जब धर्म के नाम पर हिंसा हो तो उसके प्रतीकों की चर्चा जरूर होती है।  बर्मा में बौद्ध भिक्षु अशिन बिरथू को वहां का बिन लादेन कहा जा रहा है। अब हमें तो ज्यादा पता नहीं कि सच क्या है क्योंकि प्रचार माध्यम अपने प्रचार के लिये अनेक कहानियां गढ़ लेते है। बहरहाल यह कथित बौद्ध भिक्षु अपने संगठन 969 का विस्तार कर रहा है। अगर हम कहें कि यह धार्मिक प्रतीक 786 और 969 के बीच संघर्ष है तो गलत नहीं होगा। पाकिस्तानी अपने  अरेबिक होने के अहंकार में रौहिंग्याओं के बचाव में उतरे हैं पर चीन से दोस्ती का खौफ है -जिसका बर्मा सरकार पर पूरा नियंत्रण है -पर वह भारत को उसके लिये जिम्मेदार बता रहे हैं। अब कोई इन 786 वालों को समझाओ हम तो सदियों से 1008 अंक धारण करने वाले महात्माओं को मानते हैं और इस तरह की सामूहिक हिंसा झेलते हैं पर न स्वयं करते न करने वालों का समर्थन करते हैं। जय श्रीराम, हर हर महादेव, जय श्रीकृष्ण, जय झूलेलाल।

Sunday, August 20, 2017

कंपनियां कभी भारत चीन युद्ध नहीं होने देंगी-हिन्दी संपादकीय (companey no would mede any War between India china-HindiEditorial)

संदर्भ-भारत चीन युद्ध
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कंपनियां कभी भारत चीन युद्ध नहीं होने देंगी-हिन्दी संपादकीय      

                                               आजकल फेसबुक व ब्लॉग पर कोई बड़ा पाठ लिखने का मन नहीं करता। लिखना बहुत कुछ चाहते पर अंतर्जाल पर मीडिया पर इतना पढ़ते हैं कि बहुत कुछ लिखने का मन करता है पर उसमें से क्या लिखें यह तय करना कठिन है। इधर चीन व भारत के बीच प्रचार युद्ध चल रहा है-बात इससे आगे जायेगी यह संभावना नहीं लगती। हमारे पुराने अंर्तजालीय मित्र विचार जानते हैं। पूरे विश्व पर अंग्रेजी के चतुर्थकोणीय प समूह- पूंजीपति, प्रचारक, प्रबंधक (राज्य) पड़पीड़क (अपराधी)-का समन्वित कार्यक्रम है-अंग्रेजी में ‘एम’-मनीलैंडर, मीडिया, मैनेजर और माफिया ( 'M" MoneyLender, Media, Menegment And Mafia)-माना जा सकता है। भारतीय प्रचारक अभी तक कश्मीर तथा हिन्दूत्व की बहस कर रहे थे पर जनता बोर होने लगी थी-अब उनको डोकलाम नया विषय मिल गया है सो एक दो बरस तक उन्हें शायद ही इसे फुर्सत हो।  चीन रोज भारतीय सीमा में अपने सैनिक लेकर आयेगा फिर भाग जायेगा। यह खबरें भी चलती रहेंगी।
                                यही हाल चीन का है। जापान के विरुद्ध प्रचार वहां शायद पुराना विषय हो रहा है। दूसरी बात यह भी कि वहां की जनता सरकारी प्रचार माध्यमों से जुड़ने को मजबूर है इसलिये वह उस पर ध्यान नहीं देती। अब भारत के विरुद्ध प्रचार से वहां जान फूंकने का प्रयास होता लगा रहा है-उसके अनेक सरकारी समाचार पत्रों का नाम भारत पर सतत धमकियां छपने के कारण अंतर्राष्ट्रीय पटल पर चमक रहा है। संभवतः अनेक लोगों ने उसके अखबारों का नाम ही पहली बार सुना होगा। जहां तक दोनों देशों के बीच किसी भारी लड़ाई का जो भय है वह किसी को नहीं है। कंपनियों के मकड़जाल में चीन भी ऐसे ही फंसा है जैसे कि भारत। दोनो के पास भारी सैन्यबल है जिसे व्यस्त रखना भी जरूरी है ताकि उनका अभ्यास बना रहे। शायद चीन अपने देश में यही कर रहा है। भारतीय सेना तो पाकिस्तान के साथ लड़ने का नियमित अभ्यास करती रहती है। वहां के नेता कोई दूध के धुले नहीं है वरना वहां के राष्ट्रपति शी जिनपिंग का नाम पनामालीक में नहीं आता। हमारा तो मानना है कि चीनी नेता भी शीशे के घर में रहने लगे हैं इसलिये वह भारत पर पत्थर नहीं फैंक सकते। अभी तक चीन एक रहस्यमय देश था पर डोकलाम विवाद के बाद उसकी आंतरिक सच्चाईयां बाहर आने लगी हैं। इससे पता चलता है कि वह अमेरिका या सोवियत संघ की तरह महाशक्ति बनने का उसका सपना अब टूटने वाला ही है-यह शुभकाम भारत के हाथ से ही संपन्न हो रहा है। भारत प्रचार के स्तर में चीन की बराबरी पर आ गया है-इसका अर्थ यह कि चीन एशिया की अकेली महाशक्ति नहीं है वरन् भारत भी उसके समकक्ष खड़ा है। कुछ क्षेत्रों में तो भारत उससे आगे हैं-अंतरिक्ष, वायु तथा जल क्षेत्र में भारत उससे बहुत आगे हैं ऐसा बताया जा रहा है।
                          आजकल  भौतिकता का बोलबाला है। ऐसे में आर्थिक क्षेत्र के प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष संबंधों को बहुत महत्व है। चीन का भारत में भारी व्यापार है तो भारत में भी उससे  आयातित वस्तुओं का बाज़ार है जिसके क्रय विक्रय में स्थानीय लोगों को रोजगार के साथ ही उपभोक्ताओं को सस्ता सामान भी मिल रहा है। दोनों में कोई किसी को तबाह नहीं कर सकता और न करना चाहेगा।  यही कारण है कि सीमा पर एक भी गोली नहीं चली। चल गयी तो मामला सीधे विश्वयुद्ध तक चला जायेगा। ‘म’ समूह की पकड़ राज्य प्रबंधन पर भी होती है। चीन के बारे में तो यह कहा जाता है कि कहीं न कहीं अंतर्राष्ट्रीय माफिया भी वहां अपना पैसा लगाता है। अतः उसका मीडिया चाहे जो बकवास कर ले पर वहां के सरकारी नेता कभी युद्ध जैसी बात सोच भी नहीं सकते। हमारे टीवी चैनलों पर एक पान मसाले का विज्ञापन आता था जिसमें पात्र कहता है कि ‘हम इधर भी खिलाते हैं तो उधर भी खिलाते हैं।’ अंतर्राष्ट्रीय कंपनी सभी देशों में  ले-देकर अपना दखल रखती हैं और तय बात है कि वह अपने संपर्क वाले चीन के सरकारी नेताओं को कभी भारत पर हमला करने की इजाजत नहीं देंगी।

Wednesday, August 2, 2017

हमारी दृष्टि तो फेसबुक के सामान्य प्रयोक्ता पुराने लोगों से अधिक विद्वान हैं-हिन्दी लेख (Fecebook user is Great Intictual-HindiArticle)

                                  हमारे देश में इस समय सोशल मीडिया को लेकर अनेक विवाद उठते हैं और स्थापित विद्वानों को लगता है कि वह केवल अज्ञानी लोग सक्रिय हैं। अक्सर कुछ लोग फेसबुक पर सक्रिय रहने वालों पर यह आरोप लगाते है कि वह किसी भी बड़े या खास आदमी को भी कुछ नहीं समझते! उन्हें लगता है कि सब फेसबुक पर सक्रिय लोग अहंकारी हैं। 
              हम इससे उलट अपनी राय रखते हैं। दरअसल पहले टीवी चैनलों और अब सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने आम जनमानस को सबकी औकात के दर्शन करा दिये हैं और उन्हें यह पता लग गया है कि कथित बड़े और खास पहचान रखने वाले फर्जी हैं-वह बड़े पदों पर विराजे हैं, उनके पास ढेर सारा पैसा है और अभिनय से भारी प्रतिष्ठा भी है पर वह समाज के किसी काम के नहीं क्योंकि वह भी आमआदमी की तरह अपने परिवार हित तक ही सीमित हैं। यही हाल लेखकों और पत्रकारों का भी हैं। हम पिछले दस साल से अंतर्जाल पर सक्रिय हैं पर लगता है कि कई कथित बड़े व खास विद्वान लोग सोशल मीडिया से चित्र और विषय चुराकर अपनी मौलिकता प्रदर्शित कर रहे हैं।  
                     आम जनमानस को आभास हो गया है कि जो लोग कला, अर्थ, साहित्य, राजनीति तथा पत्रकारिता के क्षेत्र में शिखर पर है वह योग्यता से कम प्रचार से ज्यादा बड़े वह खास बने हैं।  यही कारण है कि फेसबुक व ट्विटर पर आम प्रयोक्ता आक्रामक हो रहे हैं। उन्हें हम जैसा व्यक्ति तो अहंकारी नहीं मान सकता। इसका कारण यह है कि संगठित क्षेत्र के बुद्धिजीवियों, कलाकारों, तथा पत्रकारों ने सदैव यह भ्रम माना है कि उनकी लिखा या बोला ही ब्रह्म वाक्य है। इतना ही नहीं उन्होंने असंगठित क्षेत्र के विद्वानों को कभी अपने आगे गिना ही नहीं।  ऐसे में अब उन्हें अपनी उपेक्षा देखकर जलन होती है और वह सोशल मीडिया से चिढ़ने लगे हैं।
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Sunday, July 16, 2017

आतंकवाद के नये सहायक की छवि चीन को भारी पड़ सकती है-हिन्दी संपादकीय (China Could high cost for its New image new Assitant for Terrism-HindiEditorial)

                                                     इधर उधर की खूब खबरें पढ़ीं और सुनी। अंतर्जाल पर कथित रूप से चीनी मीडिया के वार्तालाप भी सुने।  यूरोपीय यूनियन की चीन को चेतावनी भी सुनी।  लब्बोलुआब यह कि चीन हाथी की तरह था जिसने 1962 से यह भ्रम फैला रखा था कि वही ताकतवर है। हमने 1962 के बारे में बहुत कुछ पढ़ा है जिसमें भारत के एक विशेषज्ञ का कहना था कि 1962 में भारत लड़ा ही नहीं था वरन् नेताओं ने हार मानी थी। फिर 1967 और 1986 में चीन की धुलाई की बात भी सामने आयी।  अब भारत शेर की तरह पराक्रमी हो गया है। चीन की समस्या यह है कि वह अपने ही निर्मित सामानों पर निर्भर हैं जो कामचलाऊ तो हैं पर न टिकाऊ है न उनकी श्रेष्ठता प्रमाणित है।  सबसे बड़ी बात वह रूस, अमेरिका फ्रांस की तरह हथियार निर्यातक देश बनना चाहता है-अभी पाकिस्तान और उत्तरकोरिया उसके ग्राहक हैं।  चीनी मीडिया में वहीं के एक विशेषज्ञ ने माना कि मिसाइल तकनीकी की वजह से भारत उनके देश से कहीं आगे हैं।  सीधी बात यह कि भारत चीन से ज्यादा ताकतवर है क्योंकि वह दूसरे देशों के उपग्रह भी भेज रहा है। भारत ने भले ही खिलौने बनाने में महारत नहीं हासिल किया पर अंतरिक्ष तकनीकी में चीन को पछाड़ दिया है।
                   चीन यह मान नहीं पा रहा कि उसका पड़ौसी देश भारत उससे ताकत में बराबरी करे-ऐसे में आगे निकलने की संभावना ने उसे डरा दिया है।  दूसरी बात यह कि भारत के पास रूस व अमेरिका से मिली सामरिक सामग्री है जिसे प्रमाणिक माना जाता है।  वैसे युद्ध में हार जीत अनिश्चित होती है पर चीन से भारत हारेगा यह अब संभावना नहीं है।  नुक्सान की बात करें तो भारत एक बार झेल जायेगा पर चीन के कई टुकड़े हो जायेंगे।  नुक्सान उठाकर भी भारत तिब्बत और पाक अधिकृत कश्मीर पर कब्जा कर लेगा तब चीन की स्थिति क्या होगी? दरअसल चीन लड़ना नहीं चाहता और भारत डरना नहीं चाहता।  चीन कहीं से हथियार नहीं खरीदता इसलिये रूस भी उसे पसंद नहीं करता।  कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक हथियारों के सौदागर अपने धंधे के लिये दोनों का युद्ध करवाना चाहते है-हम इस पर यकीन करते हैं।  अभी तक चीन स्वयं कमा रहा है पर रूस व अमेरिका का ग्राहक नहीं बन रहा है।  ऐसे में पश्चिमी देश अब चीन को दबाव में डालने के लिये भारत का उपयोग भी कर सकते हैं।
                   बहरहाल चीनी नेताओं का संकट यह है कि कहां तो वह अमेरिका की टक्कर का होने का अहसास अपनी जनता को करा रहे थे और कहां भारत ने ही उनको चुनौती दे दी है। चीन में अब भारत की ताकत को लेकर मंथन चल रहा है। अभी तक 1962 की जीत का भ्रम लेकर जी रहे चीन के सामने जब भारत की ताकत का सही अनुमान आयेगा तब वह तय करेंगे कि लड़ें कि नहीं! बहरहाल भारतीय रणनीतिकारों की सादगी को वह कमजोरी समझ रहे थे पर अब उन्हें लगने लगा है कि वह गलती कर चुके हैं तो झैंप मिटाना चाहते हैं। वह रोज भारत को धमकी देता है और यहां के नेता मौन रहते हैं। सिक्किम की सीमा से बाहर कर भारतीय सेना ने चीन को उस नींद से जगा दिया है जिसमें वह शक्तिशाली होने का सपना देख रहा था। वह कश्मीर में पाकिस्तान का साथ देने की बात कर रहा है तो भारत भी तिब्बत की आजादी का समर्थन कर सकता है।
                       हमारा अनुमान है कि चीन की आंतरिक हालात खराब है।  वह सेना की संख्या कम कर रहा है जिससे असंतोष फैल रहा है। उसने सोचा था कि जिस तरह भारत ने पाकिस्तान में सर्जीकल स्ट्राइक किया था ऐसे ही किसी कार्यवाही से  सिक्किम में भारतीय सेना को भगाकर वह अपनी जनता में संतोष लायेगा पर उसे यह अंदाजा नहीं था कि भारत न केवल पलटकर जवाब देगा वरन् सीधे ही लड़ने की तैयारी भी करेगा।  अब चीन को  यह भी लगने लगा कि सिक्किम की सीमा से वह सेना हटाले तो भी भारत वहां से नहीं हटेगा।  महत्वपूर्ण बात यह कि भारतीय रणनीतिकार भी अपने देश को उससे ज्यादा ताकतवर दिखने के प्रयास में हैं और चीन को यही बात डरा रही है। हमारा मानना है कि आबादी, सैन्य बल तथा सामरिक सामानों की ंसंख्या में चीन ज्यादा है पर क्या वह इतना ताकतवर है कि वह भारत को युद्ध में हरा दे।  हाथी ताकतवर होता है पर जब शेर अपनी पर आता है तो उसे मार ही देता है।
                     वैश्विक प्रचार में चीन को सबसे बड़ा झटका जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने दिया है यह कि वहां की हिंसा में चीन भी शामिल है।  आतंकवाद के सहायक होने का यह मामूली लगने वाला आरोप चीन को भारी संकट देने वाला है। भारत अब इसका उपयोग वैश्विम मंच पर करेगा। आतंकवाद का सहायक होने की बात अगर वैश्विक पटल पर आयी तो न केवल चीन बल्कि उसके विदेशों में स्थित नागरिकों को भी मुश्किल हो जायेगी। अब चीनी रणनीतिकारों को प्रयास यही करना चाहिये कि किसी भी तरह वह इस आरोप से छुटकारा पायें क्योंकि युद्ध हो या नहीं उन्हें अब आतंकवाद के नये सहायक की युद्ध से ज्यादा बर्बादी देने वाली साबित हो सकती है।

Friday, July 14, 2017

भ्रष्टाचार तथा महंगाई अब भी देश के सबसे बड़े दुश्मन हैं-हिन्दी संपादकीय (curropption men enamy of India-HindiEditorial)



                                                      कल एबीपी चैनल ने राजमार्गों पर तीन प्रदेशों के-मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान-राजमागों पर पुलिस प्रशासन के भ्रष्टाचार का पर्दाफाश किया। वैसे इसे पर्दाफाश कहना गलत है क्योंकि यह एक आम जानकारी है कि राजमार्गों पर राजकीय कर्मचारी राजस्व नहीं हफ्ता वसूलने का काम करते हैं। हमारे जैसे पुराने भक्तों के सामने नये भक्त यह कहकर बच नहीं सकते कि यह तो उनके दल ही नहीं बल्कि दूसरे राज्यों में भी होता है। हमें मतलब है तो उस दल से है जिसे कभी हमने भावनात्मक नहीं वरन् आत्मिक समर्थन दिया था-यह भी याद रखना कि हम जैसे एक नहीं करोड़ों भक्त हैं जो केवल उनके इष्ट के नाम की वजह से वापस लौटे थे।  राज्यों में 14 वर्ष बाद भी इतना भ्रष्टाचार उस दल के राज्य में हो तो हम जैसे भक्त यह कहने में नहीं चूकेंगे कि हमारे कथित हिन्दूत्ववादी शिखर पुरुष राज्यप्रबंध में नाकाम सिद्ध हुए हैं। वह भी धर्मनिरपेक्षवादियों की तरह यथास्थितिवादी हैं।  उनकी आदर्श छवि एक ढोंग है। उन्होंने सत्ता सुंदरी के  महल के दरवाजे खोलने के लिये हमारे जैसे भक्तों के धार्मिक भाव का चाबी की तरह उपयोग किया है।
              तमिलनाडू की एक सजायाफ्ता महिला नेता को बैंगलौर की जेल में विशेष सुविधायें लेने के लिये दो करोड़ खर्च करने पड़े-यह भ्रष्टाचार का मामला है जिस पर भक्त कुछ नहीं बोले हैं-वजह साफ है कि इनको अब नये राजनीतिक समीकरणों की तलाश है। इनको पता है कि 2019 अब 2014 जैसा नहीं रहने वाला है। अपने ही आर्थिक व जातीय रूप से मध्यमवर्गीय मतदाताओं में व्याप्त निराशा को दूर करने की बजाय यह नये वर्ग के मतदाता वह भी नये प्रदेशों में ढूंढ रहे हैं। कालाधान वापस लाने, भ्रष्टाचार हटाने व महंगाई घटाने में नाकामी की चर्चा से बचने के लिये नित नये विवादास्पद बयान देकर प्रचार माध्यमों को व्यस्त  रखा जा रहा है।  21 महीने इस तरह निकल जायेंगे पर जब मतदान का समय आयेगा तब प्रतिबद्ध मतदाता निराशा में इनके मत कैसे देगा यह इसकी चिंता करें। ऐसे करेंगे लगता नहीं है। 

Friday, July 7, 2017

पंचसंकट का निवारण एकतत्व के अभ्यास से ही संभव-पतंजलि योग दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख (PanchSankat ka niwaran ektatv ka abhyas se hi sambhav-A Article based on Patanjali yoga Darshan)

पतंजलि योग दर्शन के अनुसार
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दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः
                       हिन्दी में अर्थ-दुःख, दौर्मन्स्य (इच्छा की पूति होने पर मन का क्लेश), अंगमेजयत्व (शरीर में कंपन), श्वास और प्रश्वास-ये पांच संकट चित्त के विक्षिप्त होने के कारण होते हैं।
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्तायासः।
हिन्दी में भावार्थ-इन संकटों के निवारण के लिये एकतत्व का अभ्यास करना चाहिये।
                            मनुष्य की देह में बुद्धि और मन का कोई भौतिक आधार नहीं है-यह रक्त के रूप में हड्डी के रूप में-पर यही पूरा जीवन उसका संचालन करते हैं। सामान्यजन ज्ञान के अभाव में इसी देह, बुद्धि और मन के साथ स्वयं को एकरूप समझते हैं जबकि योग साधक अभ्यास के बाद यह समझ जाते हैं कि देह, मन और बुद्धि हमारे साधन है जिनके हम आत्मरूप उपभोक्ता हैं।  यह जीवन रथ के घोड़े हैं और हम आत्मा उसके सारथि हैं।  जहां योग साधक मन या चित्त पर सवारी करते हैं वही सामान्यजन इनका इस तरह दास हो जाता है कि उसे अपने आत्मरूप अस्तित्व का अनुभव तक नहीं रहता।
                               संसार में भिन्न प्रकार के विषय हैं जिनमें मनुष्य का स्वाभाविक रूप से राग रहता है।  योगदर्शन के अनुसार क्लेश का जनक राग है।  जिस तरह मोर नाचने के बाद अपने मैले पांव देखकर रोता है उसी तरह मनुष्य भी विषयों के उपभोग से निवृत होने के बाद थकावट का अनुभव होता है। हमने देखा होगा कि अनेक मनुष्य गर्मियों में शीत तथा शीत के समय ग्रीष्म स्थानों पर पर्यटन करने के लिये जाते है। वहां से लौटने के बाद अपने ही घर में थकावट का अनुभव करते हुए अन्य लोगों की अपनी कथाओं के साथ व्यथा भी सुनाते हैं-उनके मन में बार बार थकावट का रुदन होता है। यह उनके चित्त की विक्षिप्त अवस्था होती है।  इसके विपरीत नियमित रूप से योगाभ्यासी को कभी भी चिंता या थकावट से त्रस्त नहीं देखा जाता।
                                   अनेक बार लोग थोड़ा चलने पर हांफने और कांपने लगते हैं। उनकी सांसे तेज चलती हैं। कभी खाने पीने से उनको अपनी सांस सीने में फंसी लगती है।  कभी चिंता या डर से शरीर कांपने लगता है।  इस तरह के संकटों में फंसा सामान्यजन जीवन का आंनद लिये बिना ही अपनी सांसों का कोटा पूरा कर लेता है।
                                          हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार संसार में सुख तथा दुःख केवल चित्त की अनुभूतियों का विषय है। ऐसा नहीं कि योगाभ्यासियों का संसार कोई स्थिर रहता है पर जब वह चित्त के सकट से जूझते हैं तो ध्यान के साथ ही भक्ति कर उसे स्थिर कर लेते हैं।  जब चित्त विक्षिप्तता के संकट में हो तब अपना ध्यान संसार से हटाकर परमात्मा में लगाना चाहिये।  कहीं एकांत, स्वच्छ तथा पवित्र स्थान पर सुखासन या पद्मासन में बैठकर अपना ध्यान नासिक के ऊपर भृकुटि पर केंद्रित करते हुए देह शिथिल करना चाहिये।  आष्टांग योग क्रिया में ध्यान एक केंद्रीय तत्व है जिससे धारणा की सीढ़ियों से समाधि के शिखर पर पहुंचा जाता है।
                                 हर मनुष्य जीवन गुजारने के लिये सांसरिक विषयों से जुड़ने के लिये बाध्य है। अंतर इतना है कि सामान्यजन इन विषयों में राग लिप्तता के बाद उससे प्राप्त क्लेश की निवृत्ति का मार्ग नहीं जानता जबकि योगसाधना ध्यान आदि से प्रवृत्तियों को स्थिर कर लेते हैं। यह लेखक पिछले बीस वर्षों से योग साधना का अभ्यास कर रहा है और अनुभव करता है कि योग साधना जीवन जीने की ऐसी कला है यह सभी कहते हैं पर इसकी अनुभूति बहुत कम लोग कर पाते हैं।  योगसाधना के नियमित अभ्यास से प्रवृत्ति और निवृत्ति के मार्ग को अ्रर्तचेतना से ही देखा जा सकता है। इस लेखक ने भारतीय योंग संस्थान के शिविरों में योग साधना का अभ्यास किया और पाया कि वहां के गैरपेशेवर शिक्षक जिस निष्काम भाव से  सिखाते हैं ऐसा अन्यत्र. देखने को नहीं मिलता।  इन शिक्षकों को योग के अभ्यास ने इतना निष्कामी बना दिया है कि यह लोग किसी से ईष्या या द्वेष नहीं करते-यह प्रवृत्ति कथित रूप से संतों में भी नहीं देखी जाती।

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