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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Tuesday, May 16, 2017

लोकतंत्र में गिरगिट की तरह रंग बदलना रोज देखा जा सकता है-हिन्दी व्यंग्यचिंत्तन (loktantra mein Girgit ki tarah rang badalna dekha ja sakta hai-HindiSatire Article)

                                          हमारे ब्लॉगों पर हमारी रचनायें देखकर अनेक पाठक सवाल करते थे कि आप इतना अच्छा लिखते हैं पर अपनी रचनायें हिन्दी समाचार पत्र पत्रिकाओं में क्यों नहीं भेजते? अपनी किताब क्यों नहीं प्रकाशित करवाते? हमसे जवाब देते नहीं बनता था।  अपनी रचनायें डाक से भेजते। फिर ईमेल से भी भेजीं। कुछ छपीं तो कुछ नहीं छपीं! हैरानी की बात यह रही कि यह रचनायें ऐसी हैं कि जिन्हें ब्लागों पर लाखों लोग पढ़ चुके हैं। इधर जब इंटरनेट पर लिखना प्रारंभ किया तो बाहर फिर निकले ही नहीं।
                       बैठकर सारे तमाशे देखें। साफ हो गया कि किताबें लिखने और छपवाने के लिये अधिक पैसा, उच्च पद या फिर अच्छी या बुरी प्रतिठा होना जरूरी है। एक लिपिक को एक लेखक के रूप में मान्यता नहीं मिल सकती। मैक्सिम गोर्की की एक कहानी है‘एक क्लर्क की मौत’। वह हृदय पटल पर अंकित है। उनका एक व्यंग्य भी है ‘गिरगिट’। जिस तरह अध्यात्मिक विषयों पर हमारा दर्शन प्रमाणिक है उसी तरह मैक्सिम गोर्की की रचनायें सांसरिक विषयों का वास्तविक रहस्य बता देती हैं।
                    एक क्लर्क की मौत तो हमने रोज देखी है। गिरगिट की तरह रंग बदलना तो हम अपने लोकतांत्रिक पुरुषों से सीख सकते हैं। जब केंद्र में हिन्दूवादी सरकार आयी तो देश में असहिष्णुता बढ़ने पर एक अघोषित आंदोलन चला। अनेक सम्मानित लोग अपने सम्मान लौटाने लगे। बिहार चुनाव समाप्त होते ही सब बंद हो गया। उत्तरप्रदेश चुनाव से पहले फिर एक ऐसा ही आंदोलन चला पर  उसका दांव फैल हो गया।
                  अब आजकल फिर कुछ लोग कह रहे हैं कि उनकी आवाज कुचली जा रही है। यह कौन लोग हैं? जिन पर सरकार जांच एजेंसियों की छापे पड़ रहे हैं। उच्च पदों पर बैठने के कारण इनकी अभिव्यक्ति बुलंद रही है। इनके रहन सहन तथा चाल चलन से ही यह सिद्ध होता है कि उच्च पद के बाद इनका स्तर गुणात्मक रूप से बढ़ा है। जार्ज बर्नाड शा का कहना है कि बिना बेईमानी के कोई अमीर बन ही नहीं सकता।  इन बड़े लोगों के पद छिन गये तो तय बात है कि सरकारी जांच एजेंसिया उनसे मुक्त हो गयी है।  अब यह लोग कह रहे हैं कि ‘हमारी अभिव्यक्ति कुचली जा रही है।’ रोज इनके नाम अखबारों में छपते हैं। टीवी पर इनके फोटो आते हैं। इनकी अभिव्यक्ति इतनी बुलंद है कि आम लेखक या बुद्धिजीवी की आवाज नकारखाने मे तूती की तरह हो जाती है। यह बड़े लोग उच्च पद पर जाकर रंग बदलते हैं। जब नीचे आते हैं तो सरकारी संस्थायें रंग बदलती हैं। अभिव्यक्ति का सवाल बस तभी उठता है जब भ्रष्टाचारी पकड़ा जाता है या फिर वह विद्वान रोते हैं जो मुफ्त में पलते हैं।
              लगता है कि लोकतंत्र बिना भ्रष्टाचार के चल ही नहीं सकता। साथ ही यह भी भ्रष्टाचार के विरोध के बिना भी नहीं चल सकता। गिरगिट का रंग बदलना लोकतंत्र में प्रतिदिन देखा जा सकता है।
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Wednesday, May 10, 2017

अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने की बात अतार्किक लगती है-हिन्दी लेख (Chenge of religion by The Great Ashoka is Inlogicable-Hindi Article)

                                      कथित राष्ट्रवादियों से कभी कभी तो चिढ़ आती हैं। यह भले ही दावा हिन्दूत्व की विचारधारा पर चलने का हों पर इनमें से एक भी ऐसा नहीं लगता जिसके पास तार्किक ज्ञान हो।  इतिहास में पढ़ाया जाता है कि अशोक ने हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपनाया था। कुछ राष्ट्रवादी इसका ढंग से खंडन भी नहीं कर पाते। दरअसल भारत में धर्म शब्द आचरण से ही रहा है। भक्ति के प्रकारों को लेकर विवाद रहे हों पर यहां कभी उसे धर्म का हिस्सा नहीं माना गया। पूजा धर्म का प्रतीक कभी नहीं रही।  संभवतः यह समाज में धार्मिक विभाजन प्रारंभ हुआ जब  अकबर के काल से जिसने बड़ी चालाकी से दीन-ए-इलाही चलाकर समाज को यह जताने की कोशिश की धर्म का भी नाम या संज्ञा होती हैं। ंभारत के धर्म कभी संगठित या संस्थागत नहीं रहा पर अकबर अपने मूल धर्म के दीन-ऐ-इलाही के  रूप को यहां लाना चाहता होगा। जहां तक हमारी जानकारी है हिन्दू धर्म की तरह शब्द का उपयोग अंग्रेजों के काल में प्रारंभ हुआ है। उसके इतिहास पर हम अलग से चर्चा करेंगे।
                  कलिंग विजय के बाद वहां की दुर्दशा देखकर अशोक के हृदय में हिंसा के प्रति घृणा उत्पन्न हुई। अतः उसने अहिंसा का मार्ग अपनाने का निश्चय किया जोकि महात्मा बुद्ध ने दिखाया था। इसका यह आशय कतई नहीं है कि अशोक के हृदय में भारत के प्राचीन धार्मिक प्रतीकों या मूल अध्यात्मिक विचारधारा के प्रति कोई अरुचि पैदा हुई होगी। उसने महात्मा बुद्ध के संदेशों को पूरे विश्व में फैलाने का निश्चय किया पर इसे धर्म अपनाना या बदलना नहीं कहते।  हम बार बार कहते हैं कि धर्म की संज्ञा या नाम नहीं होता। सनातन धर्म भी कोई समाज की इकाई नहीं था।  सनातन  का आशय प्राचीन या अक्षुण्ण होता है। इससे आशय यही है कि संसार के अक्षुण्ण सत्य को समझना तथा उसके अनुसार ही आचरण करना। समस्या यह है कि सत्ता मे आने के बाद भी राष्ट्रवादी या हिन्दुत्व वादी उसमें ऐसे मस्त हो गये हैं कि उन्हें लगता है कि हमें अब किसी की जरूरत नहीं है। हम विद्वान हैं हम जो कहें वही ब्रह्म वाक्य है।  उन्होंने भारतीय धर्म ग्रंथों का अभ्यास नारे लगाने तक ही किया है। तीन साल निकल गये और हम जैसे ज्ञान साधक के साथ संपर्क नहीं किया। इनके अज्ञान का हम खूब मजा लेते हैं। पहले पांच सो हजार जनवादी व प्रगतिशील मिलकर सम्मानों की बंदरबांट करते थे और अब पचास सौ हिन्दुत्वादी भी यही कर रहे हैं। हमारे एक पुराने राष्ट्रवादी तो प्रधानमंत्री के साथ भी मिलकर फोटो खिंचवा चुके हैं पर उसके बाद उन्हें पूछा तक नहीं गया जबकि बड़ी शिद्दत से वह अब भी हिन्दुत्व विचाराधारा का प्रचार कर रहे हैं।  अगर यह राष्ट्रवादी या हिन्दुत्व वादी गंभीर होते तो पद्मश्री या पद्मविभूषण पुरस्कार उनको जरूर देते।
                               ऐसे अनेक विषय है जिसमें हिन्दुत्वादी अपनी बात चीख चिल्लाकर कहते हैं। कुछ तो गंभीरता भी ओढ़ लेते हैं। तर्क के नाम पर वही शून्य दिखता है।  फिर इधर कहते हैं कि इतिहास तोड़ा मोड़ा गया पर उधर किताबों में कोई बदलाव नहीं है।  ऐसे में समय इनके हाथ से जा रहा है। ऐसा लगता है कि हिन्दुत्व विचाराधारा का संघर्ष पहले से ज्यादा लंबा होने वाला है।

Friday, May 5, 2017

कंपनी दैत्यों के लिये पूरा संसार एक क्लब की तरह है-दो हिन्दी व्यंग्य रचनायें (A Club made all World for Company Devil- Two HindiSatireArticle)

कभी कभी पनामालीक्स भी पढ़ लिया करो-हिन्दी व्यंग्य
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                                                 भाई लोग समझ नहीं रहे। लंबे चौड़े संदेश पेले जा रहे हैं। एक दूसरे पर प्रतिक्रियावादी होने का आरोप लगाते हैं पर हमारी नज़र में दोनो इसी रूप का बोझा सिर पर ढो रहे हैं।  यह पाकिस्तान, चीन और रूस का नाम ले लेकर लिखे जा रहे हैं। दूसरी तरफ हिन्दूत्व का नारा लग रहा है।
                                    अब यारो कुछ म्हारी भी बात समझो। पाकिस्तान क्या है? अंग्र्रेजों ने भारत का बंटवारा नहीं किया इस देश के कुछ विशिष्ट लोगों को लगने लगा था कि एक तो पूरा देश संभाल नहीं पायेंगे दूसरा यह कि लोकतंत्र के चलते एक दैत्य चाहिये ताकि जनता को उसका भय दिखा सकें। उधर हिन्दूओं का भय इधर अरेबिक संस्कृति का भय। दोनो जगह भय बड़ी आसानी से बिक रहा है। आक्रमण प्रत्याक्रमण का दौर चलता रहेगा। टीवी चैनलों पर बहसें होंगी तो पूंजीपतियों का विज्ञापन चलता रहेगा। उत्पाद बिकेंगे। वह यहां भी खिलायेंगे तो वहां भी खिलायेंगे।  हम नक्शे में बैठे राष्ट्रों के नाम देखते हैं और यह पूंजीपति उन्हें उन्हें निजी क्लब की तरह देखते हैं। दुनियां उनकी मुट्ठी में हैं-कम से कम कार्ल मार्क्स के चेलों को तो यह समझ लेना चाहिये। यह लोग  मिनटों में चाहे जहां से वहां पहुंच जायें। बड़े बड़े राष्ट्राध्यक्ष उनके मित्र हैं। कभी कभी पनामलीक्स के कागजात भी देख लिया करो। शरीफ, पुतिन और शीजिनपिंग वहां अपना खाता रखते हैं। क्या आप सोच सकते हैं कि अपने देश से संपत्ति चुराकर विदेश भेजने वाले लोग किसी बड़े युद्ध का दावतनामा स्वीकार करेंगे। नाम तो भारत के लोगों के भी हैं-पर भारतीय मीडिया उन पर चुप है। तय बात है कि यहां के सेठ लोग कभी अपने देश के युद्ध का प्रयोजन नहीं करेंगे क्योंकि इससे देश मे अफरातफरी मचेगी। ऐसे में उनका पूरा बाज़ार चौपट हो जायेगा। 
                       सो भारत पाक के बीच युद्ध जैसी बात तो भूल जाईये। तीसरे युद्ध की आहट टीवी चैनलों पर देखते रहिये। यह कभी होगा नहीं अलबत्ता टीवी चैनलों पर बहस में समाचार चलाने के लिये विज्ञापन का समय अच्छा निकलता रहेगा। 
कंपनी दैत्य तो इधर भी खिलाता है उधर भी खिलाता है-लघु हिन्दी व्यंग्य
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                                 हमारे घर या कहें पूरी कालौनी का डिस्क कनेक्शन मृतप्रायः है पर लगता नहीं कि किसी को इसकी परवाह है। हमें ही नहीं है। हम डिस्क पर समाचार चैनल देखते रहे हैं-अब उनसे भी उकता गये थे। वही क्रिकेट, फिल्म, राजनीति और पाकिस्तान के विषय। फिल्म और राजनीति में पुराने चेहरे ही देखदेखकर बोर हो गये। एक समय था जब केवल जीटीवी का मनोरंजन चैनल ही मिलता था। तब एक आध घंटा न मिले तो साइकिल पर एक किलोमीटर दूर जाकर ऑपरेटर का घर खटखटाते थे। अब इसकी परवाह नहीं है। फिलहाल तो अपना ब्लॉग और अपना फेसबुक है सोच चिंत्तन का आंनद उठा ही लेते हैं।
                 इधर अब फेसबुक और ब्लॉग पर लिखते हुए बीच बीच में समाचार चैनल देखते हैं।  वही पुराने विषय। वही पाकिस्तान, वही राजनीतिक चेहरे, वही विकास के वादे, और वही बहस जिसमें पहले के हमलावार वक्ता अब रक्षा कवच पहनकर आते है और उनके सामने  रक्षाकवच गंवा चुके हमलावर वक्ता होते है।  ऐसे में हम भी यह सोचकर आलसी होते जा रहे हैं कि जब ऑपरेटर शुरु करेगा तब देखेंगे। हमने प्रयास यह किया कि शायद दूरदर्शन चैनल पहले की तरह मिल जाये पर दिखता नहीं। यही डिजिटल इंडिया है जिसमें अब कोई चीज बिना दाम के नहीं मिलती। हम कंपनी दैत्य का जानते हैं। वह अब अंतर्राष्ट्रीय रूप धारण कर चुका है। उसके लिये पूरी दुनियां एक क्लब है।
        एक पान मसाले का विज्ञापन आता था जिसमें अभिनेता कहता है कि ‘हम इधर भी खिलाते हैं, उधर भी खिलाते हैं।’
         इसी कंपनी दैत्य को टीवी चैनल इधर भी चलाने हैं उधर भी चलाने हैं।  आप कभी भक्ति रस में डूबिये या श्रृंगार रस चूसिये या फिर वीर रस में उड़िये। यह तय करने का आपका हक है पर विषय या संदर्भ आपको इसी कंपनी दैत्य से तय करने पर मिलेंगे। हमने कभी उसके विषयों का रस नहीं लिया वरन् अपने ही चिंत्तन रस में आनंद लेते हैं। 

Monday, May 1, 2017

मजदूर दिवस पर सभी श्रमजीवियों को हार्दिक बधाई


                               जो लोग मजाक में मजदूर दिवस को पुरुष दिवस का पर्याय मान रहे हैं उनकी दिव्य दृष्टि केवल भारत के वर्तमान सभ्रांत समाज तक जा रही है या फिर वह उलटपंथियों के विचार प्रवाह में ही बह रहे हैं जिसमें नारी को अबला ही माना जाता है-उन्हें बालक और नारी के विषय प्रथक रूप से विमर्श के लिये लगते हैं। सभ्रांत वर्ग की अपेक्षा श्रमशील का जीवन संघर्ष बहुत अधिक होता है-पुरुष हो या महिला संयुक्त रूप से परिवार चलाने-या कहें बचाने-के लिये संघर्षरत रहते हैं । श्रमशील परिवार के पुरुष का संघर्ष जहां कठिन होता है तो वहीं महिला का तो  अति कठिन होता है। वह न केवल कमाने में पति की मदद करती है वरन उसके लिये खाना पकाने के साथ ही बच्चे संभालने का काम भी करती है। अतः मजदूर दिवस पर नारियों को अलग देखना एक भद्दा मजाक लगता है।
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अध्यात्मिक ज्ञान बाज़ार में नहीं मिलता
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           लोग अध्यात्मिक ज्ञान पाने के लिये इधर उधर फिरते हैं।  अनेक लोग हैं तो आकंठ सांसरिक विषयों में डूबे हैं पर उनके मन में भी यह उत्कण्ठा रहती है कि कहीं ऐसी जगह जायें जहां शांति मिले-यह कहीं न कहीं विरक्ति का भाव रहता है जो ऊब से पैदा होता है।  ज्ञान के व्यवसायी इसका भरपूर लाभ उठाते हें और उन्हें अपने पास बुंलाकर कहीं न कहीं उनका आर्थिक दोहन करते हैं। आदमी कुछ देर की शांति के बाद वापस लौटता है और फिर वही अशांति उसे तत्काल घेर लेती है। अध्यात्मिक ज्ञान का मूल सिद्धांत यह है कि हम स्वयं को दृष्टा समझें न कि कर्ता। किसी दृश्य को देखें तो उस पर विचार कर अपनी राय कायम करें।  बोलने से पहले सोचें।  व्यवहार में इस बात का ध्यान रखें कि समय कभी एक जैसा नहीं रहता। समय की छोड़िये हमारा मन ही एक राह नहीं चलता।  ऐसे में दोस्त भी सावधानी बनाना चाहिये वरना दुश्मन भी ज्यादा होते हैं। संगत की रंगत से बचना संभव नहीं है इसलिये यह देखना चाहिये कि इसलिये व्यक्ति के गुण दुर्गुण देखकर किसी से संबंध कायम करें।  वरना अंदर के भटकाव को बाहर रास्ता दिखाने का कोई भी व्यक्ति नहीं है-यही सच्चाई है।

अध्यात्मिक पत्रिकाएं

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