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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Sunday, January 24, 2016

मन नहीं रमता तो ध्यान लगायें-भर्तृहरि नीति शतक के आधार चिंत्तन लेख (man nahin ramta to Dhyan lagayen-A Hindu Religion Thought based on bhartrihai Niti Shatak )

                            मनुष्य का पूरा जीवन मन के स्वामित्व में व्यतीत करता है इसके बावजूद उसकी बुद्धि  स्वयं के स्वतंत्र होने  का निरर्थक भ्रम पालती है। हमारे दर्शन के अनुसार दिन समय चार भागों में वैज्ञानिक रूप से चार भागों में बांटा गया है-प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सायं काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष या निद्रा के लिये होती है। अवैज्ञानिक रूप से दिनचर्या बिताने तथा व्यवसायिक  प्रचार से भ्रमित लोगों ने अपनी चिंत्तन क्षमता को खो दिया है ऐसे में मानसिक तनाव से उपजे रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है।
भर्तृहरिनीति शतक के अनुसार
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अग्रे गीतं सरसकवयः पार्श्वयोर्दाक्षिणात्याः पाश्चाल्लीवलयरणितं चामरग्राहणीनाम्।
यद्यस्त्येवं कुरु भवरसास्वादने लम्पटत्वं नो चेच्वेतः प्रविश सहसा निर्विकल्पे समाधी।।
                            हिन्दी में भावार्थ-अरे मन! यदि तेरे सामने श्रेष्ठ गायक गा रहे हैं, दायें बायें श्रेष्ठ कवि काव्य पाठ कर रहे हैं। तेरे पीछे सुंदरियां चंवर हिला रही हैं तब तो उनमें रम जा वरना वन में जाकर समाधि ले।
                            अपने मन से हारे लोग अनेक तरह की मजबूरियों का बखान करते हुए भाग्य को दोष देते हैं। लोग अपने दिन का समय वैज्ञानिक ढंग से बिताने के आदी नहीं रहे। मनोरंजन के प्रति इतना लगाव है उसके लिये तो कोई समय तय नहीं करते। सच तो यह है कि मनोरंजन के सुख की अनुभूति करने वाली संवेदनायें ही लोगों में नहीं दिखती। लोग धर्म के समय में अपनी देह, मन और  विचार के विकार निकालने की बजाय प्रातः ही सांसरिक विषयों में अपनी बुद्धि का अपव्यय करने लगते हैं। जब प्रातः बौद्धिक तथा वैचारिक शक्ति ग्रहण करने का समय है तब उनमें तामसीगुण की प्रधानता के कारण आलस्य का भाव शासन करता है। ऐसे में अर्थ के समय उनकी क्षमतायें सीमित रहती हैं। सायं मनोरंजन के समय भी बाहरी प्रभाव से बहलना चाहते हैं। जबकि योग के अनुसार ध्यान करने पर भी आनंद मिल सकता है।  निद्रा के समय ही चिंतायें साथ लिये होते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपने की पहचान नहीं कर पाता जिससे वह जीवन भर भटकता है। हम अनुभव करते हैं कि आज के समय भारतीय योग विज्ञान से जीवन व्यतीत करने पर ही मानसिक शांति अनुभव कर सकते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Friday, January 15, 2016

अंतर्जाल पर सक्रिय प्रतिभाओं को सम्मान देना चाहिये-26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर विशेष हिन्दी लेख(Special Hindi article on 26 january Republic Day)


                             अब 26 जनवरी गणतंत्र दिवस आ रहा है।  इस अवसर पर कला, साहित्य, कला, पत्रकारिता तथासमाज सेवा में सक्रिय महानुभावों को पद्म भूषण पद्मविभभूषण तथा पद्मश्री सम्मान दिये जाने की घोषणा होनी है।  ऐसे समाचार भी आते रहे हैं कि पहुंच तथा पैसे वाले कथित महानायक इन पुरस्कारों का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं।  हमारे यहां प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों को सम्मानित करने की परंपरा अधिक रही है। राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों, कलाकारों, पत्रकार तथा समाजसेवकों की उपेक्षा का आरोप हमेशा लगता रहा है। इसके अलावा संगठित व्यवसायिक क्षेत्र से अलग हटकर कार्य करने वालों की अनदेखी करने की बात भी कही जाती है।  पिछले कुछ वर्षों से अंतर्जाल पर भी अनेक लोग सक्रिय हैं पर किसी को भी इस आधार पर सम्मान नहीं मिला वह भी प्रतिभाशाली हैं। 
हमारी राय है कि पद्म भूषण व पद्मश्री पुरस्कार अब अंतर्जाल पर कार्यरत लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों तथा कार्टूनिस्टों को दिये जायें जो सिफारिश नहीं कर पाते उनकी तरफ ध्यान देना चाहिये। अंतर्जाल पर सक्रिय प्रतिभाओं  को संगठित क्षेत्र की विभूतियों  के समकक्ष न समझना अन्याय है। इस 26 जनवरी उन्हें पदम् सम्मान देकर नहीं धारा प्रवाहित की जाये तो अच्छा रहेगा। अब इंटरनेटयुग है इसमें बाज़ारवाद से ऊपर उठकर सांस लेने वाले किताबें छपवाने में अनिच्छुक लेखक व कार्टूनिस्ट सक्रिय हैं। उन्हें सम्मान देकर नयी परंपरा बने तो इन सम्मानों की प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी। अंतर्जाल की विभूतियों को पद्म भूषण व पद्मश्री सम्मान देने से यह साबित होगा कि भारत ने नये युग में प्रवेश किया है। 26 जनवरी पर अंतर्जालीय विभूतियों का पद्भूषण पद्मश्री सम्मान देने से उन युवा प्रतिभाशाली लोगों का मनोबल भी बढ़ेगा जो स्वतंत्र रूप से कला व लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं। व्यवसायिक क्षेत्र के लोगों को सम्मान देते रहने से आम लेखकों व कलाविदों में यह भाव है कि केवल पैसे और पहुंच वालों को ही पद्मभूषण व पद्मश्री सम्मान मिलते हैं। इस बार परंपरा से हटकर इंटरनेट की प्रतिभाओं को पद्मभूषण व पद्मश्री सम्मान देने से युवाओं का रचनात्मक क्षेत्र की तरफ रुझान बढ़ेगा। इंटरनेट की प्रतिभाओं को पद्म भूषण व पद्मश्री सम्मान देने से यह संदेश भी निकलेगा कि राज्यप्रबंध लीक से हटकर काम कर रहा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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