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Friday, December 28, 2012

विदुर नीति-मूढ़ता की प्रवृत्ति से बचना चाहिये(vidur neeti-murkhta ki privritti se bachna chahiye)

                    जब तक कोई मनुष्य   नित्य आत्ममंथन न करें तब तक उसे इसका आभास नहीं हो सकता है कि वह  दिन में कितनी बार मूढ़ता का प्रदर्शन करता हैं।  अनेक बार किसी का यह पता होता है कि अमुक आदमी उसके प्रति सद्भावना न रखता है न आगे ऐसी कोई संभावना  है तब भी यह कामना करता है कि शायद स्थिति पलट जाये।  इतना ही नहीं कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो अपने हित की कामना करने वालों को संदेह की दृष्टि से देखता है और जो संदेहपूर्ण है उसके हितचिंतक होने की कामना करता है। 
     समाज में सभी लोग मूर्ख नहीं होते पर सभी ज्ञानी भी नहीं होते।  कुछ लोगों में किसी के लक्ष्य का विध्वंस करने या देखने की अत्यंत उत्कंठा होती है।  वह हर समय किसी न किसी की हानि का कामना करते हैं।  ऐसे मनुष्य के साथ संपर्क रखना भी अत्यंत खतरनाक हो सकता है। किसी का बनता काम बिगाड़ने और बिगाड़ कर बदनाम करने की प्रवृत्ति अनेक लोगों में होती है।  ऐसे लोगों से यह अपेक्षा करना कि वह कभी सुधर जायेंगे एकदम व्यर्थ है।  अगर कोई ऐसी अपेक्षा करता है तो वह स्वयं महामूर्ख है।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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अकामान् कामयनि यः कामयानान् परित्यजेत्।
बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मुढचेतसम्।।
           हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य अपने से प्रेम न करने वाले को प्रेम करता है और प्रेम करने वाले को त्याग देता है वह मनुष्य मूढ़ चेतना वाला कहलाता है।
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं देष्टि हिनस्ति।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मुढचेतसम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य शत्रु को मित्र और मित्र को शत्रु बनाने का प्रयास करता है वह मूढ़ प्रवृत्ति का होता है।
संसारयति क1त्यानि सर्वत्र विचिकित्सते।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ।।
       हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य अपने काम को व्यर्थ ही फैलाता है। सर्वत्र ही संदेह करता है और शीघ्र होने वाले काम मे विलंब करता है वह अत्यंत मूढ़ है।
       अपने काम को लापरवाही या बेईमानी से करना भी मूढ़ प्रवृत्ति का प्रमाण है।  कबीर दास जी भी कह गये हैं कि ‘‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब,
पल में परलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब’’।  कुछ लोग अपना काम अनावश्यक रूप से फैला लेते हैं। कुछ अपने काम में यह सोचकर विलंब करते हैं कि करना तो हमें ही है। यह प्रवृत्ति पतन की ओर धकेलने वाली है।
     कहने का अभिप्राय यह है कि हमें दिन प्रतिदिन अपने कार्य, व्यापार और आचरण पर दृष्टिपात रखते हुए दूसरों की भी प्रकृत्ति, लक्ष्य और स्वभाव का अध्ययन करते रहना चाहिये।  ऐसा न कर हम स्वयं को धोखा देंगे और यही मूढ़ प्रवृत्ति है जो घातक कहलाती है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Tuesday, December 25, 2012

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जो सद्व्यवहार करे वही सच्चा बंधु (kautilya ka arthshastra-jo sadvyavahar kare vahi sachcha bandhu)

             इस संसार में कोई मनुष्य अकेला नहीं रह सकता।  उसे समय समय पर बंधु बांधव और मित्रों की सहायता की आवश्यकता होती है।  इसके साथ ही यह भी सत्य है कि सभी बंधु या मित्र समय पड़ने पर सहायता करने वाले नहीं होते।  आजकल विद्यालयो, महाविद्यालयों तथा कार्यालयों में अनेक लोगों के बीच मैत्री और प्रेम भाव पनपता है और सभी लोग इस भ्रम में रहते हैं कि आपत्तकाल में वह मदद करने वाले हैं।  अनेक लोगों को तो ऐसा लगता है कि  ऐसे मित्र जीवन भर निभायेंगे। इतना ही नहीं आपस में एक दूसरे की परीक्षा किये बिना लोग बंधु या मित्र का रिश्ता कायम कर लेते हैं।  यह अलग बात है कि समय आने पर उनको पता चलता है कि कोई उनकी सहायता करना नहीं चाहता या वह उतना क्षमतावान नहीं है जितना वह दावा करता है।  इसके अलावा  अपने रिश्तों नातों में आदमी यह सोचकर लिप्त रहता है कि समय आने पर वह निभायेंगे।  यह अलग बात है कि समय आने पर कोई सीधे मुंह फेर लेता है या मदद न करने के लिये कोई  बहाना बना देता है। ऐसा नहीं है कि संसार में सभी बुरे लोग हैं क्योंकि देखा यह भी गया है कि समय पड़ने पर ऐसे लोग भी मदद करते हैं जो न तो बंधु होते हैं न मित्र।  यह सत्य है कि अध्यात्मिक रूप से ज्ञान होने पर मनुष्य  किसी का न मित्र रहता न शत्रु बल्कि वह निष्काम भाव से दूसरे की मदद करता है।  ज्ञानियों को न मित्र चाहिये न शत्रु पर वह ऐसे लोगों को बंधु मानते हैं जो इस भौतिक संसार से जुड़े विषयों पर बिना किसी प्रयोजन के उनकी मदद करते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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सा बन्धुर्योऽनुबंधाति हितऽर्वे वा हितादरः।।
अनुरक्तं विरक्त वा तन्मित्रमुपकरि यत्।।
              हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में वही बंधु है जो अपने प्रयोजन को सिद्ध करता हो।  अनुरक्त होकर विरक्त भाव से जो उपकार करे वही सच्चा बंधु है।
मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्यवेत्।
तयजन्नभूतदोषं हि धर्मार्थदुपहन्ति हि।।
        हिन्दी में भावार्थ-अपनी मित्र मंडली के बारे में विचार करते रहना चाहिए। जब किसी मित्र के दोष का पता चले तब उससे दूरी बना लें। अगर दोष युक्त मित्र या पूरी मंडली का त्याग न किया तो अनर्थ होने की संभावना प्रबल रहती है।
     इतना ही नहीं अपने बंधुओं या मित्रों में अनेक ऐसे भी होते हैं जिनके अंदर अनेक प्रकार के दोष होते हैं।  उनके मुख में कुछ मन में कुछ होता है।  ऐसे लोगों की पहचान होने पर उनका साथ त्याग देना ही श्रेयस्कर है।  समय समय पर एकांत में हर आदमी को अपने मित्र तथा बंधुओं की स्थिति और विचारों पर दृष्टिपात करना चाहिये।  मनुष्य गुणों का पुतला है। समय और स्थिति के अनुसार उसकी सोच बदलती रहती है।  संभव है कि वह वफादार दिखते हों पर जब हमें हानि पहुंचाने पर उनको लाभ होता है तब वह गद्दारी करने में संकोच न करें।  इसलिये हमेशा सतर्क रहते हुए अपने बंधु और मित्रों की भाव भंगिमाओं पर दृष्टिपात रखना चाहिये।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, December 22, 2012

मनुस्मृति से संदेश-सत्कर्म करने से इच्छित फल न मिले तो भी निराश न हों (Manu smriti se sandesh-satkarma karne se ichchhit fal n mile to bhi nirash n hon)

     यह संसार अत्यंत विचित्र है कुछ लोगों को धन संपदा पैतृक रूप से प्राप्त होती है तो कुछ अपने कर्मों से उसे प्राप्त करते हैं।  यह अलग बात है कि दुष्कर्मों से धन संपदा अत्यंत सहजता से मिलती है पर अंततः वह कष्टकारक होती है।  सत्कर्म करते हुए एक तो परिश्रम करना पड़ता है दूसरा इच्छित लक्ष्य विलंब से मिलने की भी संभावना रहती है।  अनेक बार यह विलंब इतना हो जाता है कि आदमी का मन दुष्कर्म के मार्ग पर चलकर सफलता पाने के लिये लालायित हो उठता है। उस समय मनुष्य को अपने मन पर नियंत्रण कर अपने आसपास के वातावरण पर विचार करना चाहिये।  अनेक ऐसे लोग हैं जो संक्षिप्त मार्ग पर चलकर अमीर बन जाते हैं पर उसके दुष्परिणाम के रूप में उनको अपना जीवन तक की आहुति देनी पड़ती है।   विपत्ति के समय उनका कोई साथी नहीं बनता।  ऐसा नहीं है कि सत्कर्मी पर संकट  नहीं आता पर धर्म पर दृढ़ हैं उनको पूरे समाज की सहानुभूति मिल जाती है। सत्कर्म के बावजूद अगर सफलता न मिले तो भी यह नहीं मानना चाहिये कि हम भाग्यहीन हैं।  समय आने पर इच्छित फल मिलेगा यह विश्वास धारण करते हुए अपने कर्म में लिप्त रहना ही मनुष्य का धर्म है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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नात्मात्नमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः।
आमृत्यो श्रियमन्विच्छेनैनां मन्येत दुर्लभाम्।।
             हिन्दी में भावार्थ-अपनी समृद्धि के लिये पूरा प्रयास करने पर भी इच्छित लक्ष्य प्राप्त न हो तो भी स्वयं को कुंठित करते हुए भाग्यहीन नहीं मानना चाहिए। प्रयत्न करते रहना मनुष्य का धर्म है और संभव है कभी भाग्य साथ दे तो इच्छित लक्ष्य चाहे वह कितना भी दुर्लभ क्यों न हो मिल ही सकता है।

न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत्।
अधार्मिकारणां पापनामशुः पश्यन्विपर्ययम्।।
      हिन्दी में भावार्थ-धर्म का आचरण करने पर संकट भले ही झेलना पड़े पर उससे विचलित नहीं होकर   अधर्म में लिप्त लोगों को अपने अपराध का किस तरह दंड भोगना पड़ता है यह देखकर अधर्म के माग पर चलने का विचार ही त्याग देना चाहिये।
         आजकल लोगों में ऐसी प्रवृत्ति आ गयी है कि हर कोई जल्दी से जल्दी धन, प्रतिष्ठा और उच्च पद पाना चाहता है।  इतना ही नहीं लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान का इस कदर अभाव आ गया है कि धर्म और नैतिकता उनके लिये कोई अगेय विषय हो गया है। जिन लोगों के अंदर ज्ञान और विवेक है वही केवल यह देख पाते हैं कि अधर्म पर चलने वाले अंततः शीघ्र ही पतन की तरफ जाते हैं।  धर्म और नैतिकता का मार्ग दुरुह अवश्य है रक्षित है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Tuesday, December 18, 2012

पतंजलि योग साहित्य-कूर्माकार नाड़ी में संयम रखने से स्थिरता आती है (patanjali yoga sahitya-koormakar nadi par mein sanyam rakhne se sathirta aate hai)

        भारतीय अध्यात्म दर्शन में योगासन, प्राणायाम और ध्यान ऐसे साधन माने गये हैं जिससे मनुष्य अपने जीवन को कलात्मक रूप से व्यतीत कर सकता है।  आधुनिक संसार में भौतिकतावाद से उकताये और सुस्ताये लोगों को अनेक कथित योग शिक्षकों ने अपने पेशेवराना अंदाज से आकर्षित किया है  पर सच तो यह है कि योग विद्या में पारंगत लोगों की कमी ही दिखती है।  आसन और प्राणायाम से देह और मन को लाभ होता है पर ध्यान से जो मनुष्य में पूर्णता आती है इसका ज्ञान अभी पूरी तरह प्रचारित नही किया गया है। 
         आजकल हम देखते हैं कि लोग भारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं।  जीवन पहले से कहीं अधिक संघर्षमय हो गया है।  आज के आधुनिक बुद्धिजीवी तो पतंजलि योग को विज्ञान मानने से ही इंकार करते हैं।  उनकी नज़र में पश्चिमी विचारधाराओं में भी व्यायाम का महत्व बताया गया है उसके कारण यह भारतीय योग विद्या कोई अनोखा विषय नहीं है।  यह अलग बात है कि हम पश्चिम के अंधानुकरण करते हुए यह भूल रहे हैं कि यूरोप और अमेरिका में भी लोगों के अंदर भारी मानसिक कुंठायें व्याप्त हो गयी हैं।  सबसे बड़ी बात यह है कि भारतीय अध्यात्म की घ्यान पद्धति को अब पश्चिम के लोग भी मानने लगे हैं। 
         जिस व्यक्ति के पास  ध्यान लगाने की कला होती है वह दूसरे का उद्धार करने वाला सिद्ध भले न हो पर उसमें कई ऐसी विशेषतायें आ ही जाती हैं जो उसे आम मनुष्य से अधिक प्रतिभाशाली बना देती हैं।  बहुत सहज लगने वाली यह कला तभी आ सकती है जब आदमी का संकल्प पवित्र होने के साथ ही उसे पाने के लिये दृढ़प्रतिज्ञ हो।
पतंजलि योग में कहा गया है कि
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नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्।
       हिन्दी में भावार्थ-नाभिचक्र में ध्यान या संयम करने से पूरे शरीर का ज्ञान हो जाता है।
कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्ति।
        हिन्दी में भावार्थ-कण्ठकूप  (जिव्हा के नीचे एक तालू है जिसे जिव्हा मूल भी कहते हैं) में ध्यान या संयम करने से भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती है।
कूर्मानाडयां स्वैर्यम्।
        हिन्दी में भावार्थ-कूर्माकार नाड़ी ( वक्षःस्थल के नीचे एक कछूए की आकार वाली नाड़ी होती है) में ध्यान या संयम करने से मन और देह में स्थिरता आती है।
मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्।
           हिन्दी में भावार्थ-मूर्धा की ज्योति (सिर के कपोल में एक छिद्र है जिसे बृह्मारन्ध भी कहते है तथा जिसमें प्रकाशमयी ज्योति प्रज्जवलित है) में ध्यान या संयम करने से प्रथ्वी और स्वर्ग लोक में विचरने वाले सिद्ध पुरुषों के दर्शन होते हैं।
प्रातिभद्वा सर्वम्।
             हिन्दी में भावार्थ-पूर्ण ज्ञान होने पर ध्यान या संयम के भी सारी बातों का ज्ञान होता है।
        नियमित योग साधना करने वालों को ध्यान के लिये अधिक से अधिक समय निकालना चाहिये। ध्यान कहीं और कभी भी लगाया जा सकता है।  अपने ध्यान को स्थापित करने करने के लिये पहले भृकुटि पर प्राण केंद्रित करें। नाक  के   ऊपर  भृकुटि के साथ ही आज्ञा चक्र भी जुड़ा हुआ है उसके बाद सहस्त्रात चक्र, विशुद्धि चक्र, अनाहत  चक्र, मणिपुर चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र तथा मूलाधार चक्र की तरफ ध्यान को घुमाते रहना चाहिये।  इसे हम संयम करना भी मान सकते हैं।  इन चक्रों पर ध्यान या संयम करने से अंतर्मन में प्रकाश का अनुभव होता है। हम अपने अंदर देह के अंगों की क्रिया और प्रतिक्रिया को तब अच्छी तरह से समझ सकते हैं जब नियमित रूप से ध्यान लगायें।  ध्यान लगाने वाले लोग क्षेत्रज्ञ हो जाते हैं और किसी आधुनिक चिकित्सक से अधिक अपने विकार और उनके प्रतिकार का ज्ञान रखते हैं।
     यहां यह स्पष्ट कर दें कि हृदय में संकल्प धारण करना उतना सहज नहीं है जितना कुछ लोग मानते हैं।  यह संसार संकल्प का खेल है।  आम मनुष्यों की आदत यह है कि वह स्वयं को विकार रहित मानते हुए अपनी नाकामियों का ठीकरा दूसरों पर फोड़ते हैं जबकि सच्चाई यह है कि हर मनुष्य अपने कर्म फल का उत्तरदायी स्वयं है।  जब कोई मनुष्य कर्तापन का त्याग कर ध्यान लगाता है तब वह दृष्टा हो जाता है और अपने जीवन को कलात्मक ढंग से बिताता है।  इसके लिये सबसे बड़ा महत्व संकल्प का है जो स्वयं धारण करना होता है। इसके लिये प्रेरणा स्वध्याय से ही जाग सकती है।
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Saturday, December 15, 2012

विदुर नीति-कोई धन में तो कोई गुण में धनी है (vidur neeti-koyee dhan mein to gun mein dhani hai)

       पूरे विश्व में आर्थिक एवं वैज्ञानिक विकास की बात खूब होती है पर चारित्रिक विकास  का कोई प्रश्न नहीं उठाता। अगर विश्व के भौतिक विकास को ही सत्य माना जाये तो फिर हमें यह मानना चाहिए समूचे मानव सभ्यता में जो भयंकर वैचारिक दोष आ गये हैं उन पर अधिक चिंता करने की आवश्यकता व्यर्थ है ।  यह अलग बात है कि पूरे विश्व के प्रचार माध्यम एक तरफ से विश्व समुदाय के भौतिक विकास को सभ्य मानव सभ्यता का प्रमाण प्रचारित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं में नित प्रतिदिन हिंसा, अपराध और संवदेनहीन समाज को लेकर अनेक प्रकार की बहस भी होती है।  इस धरती पर विचरने वाले जीवों में मनुष्य एक ऐसा जीव है जिसकी बुद्धि अधिक है और जहां वह भौतिक विकास पर प्रसन्न है वहीं चारित्रिक, वैचारिक तथा आचरण में हुए हृास पर  चिंतित भी है।  संसार का बौद्धिक समाज असमंजस में है।  इस भौतिक विकास ने एक तरह से मनुष्य समुदाय की बुद्धि का ह्रास  इस कदर किया है कि समझ में नहीं आता कि पशु और मनुष्य में अंतर क्या रह गया है?
         अध्यात्मिक विकास की बात करना एक तरह से बकवाद करना लगता है।  यह कहना गलत होगा कि पूरा मनुष्य समुदाय मूर्ख है पर इतना तय है कि ज्ञानियों की संख्या अब नगण्य रह गयी है।  आर्थिक विकास और मनोरंजन के नये साधनों में मगजपच्ची लोगों को यह आभास नहीं है कि इनसे उनकी बुद्धि के साथ आयु का भी क्षय हो रहा है।  देह और मन के साथ विचारों में विकार इतने भर गये हैं कि आदमी विष को भी अमृत समझ कर सेवन कर रहा है। 
विदुरनीति में कहा गया है कि
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न च क्षयो महाराज यः क्षयो शुद्धिभावहेतु।
क्षयः सत्विह मन्तव्यो यं लब्धवां बहुनाशयेत्।।
         हिन्दी में भावार्थ-किसी हानि या क्षय से अगर वृद्धि या लाभ होता है तो उसकी परवाह नहीं करना चाहिये पर अगर किसी लाभ से बाद में हानि या क्षय हो उस पर अवश्य विचार कर कोई काम करना चाहिए।
समृद्धा गुणतः केचित भवन्ति धनतोऽपरे।
धनवृद्धान् गुणंहींनान् धृतराष्ट्र विवर्जय।
        हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में कुछ लोग धन के तो कुछ गुणों में धनी होते हैं। जो धनी होते हुए भी गुणों से हीन हैं उनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।
         समाज में धनवान को गुणवान मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  गुणवान अगर अल्पधनी है तो उसका सम्मान कोई नहीं करना चाहता। स्थिति यह है कि समाज सेवा, राजनीति, कला, साहित्य, तथा धार्मिक क्षेत्र में जो लोग सक्रिय हैं उनके छोटे और बड़े होने की पहचान केवल उनके पास उपलब्ध  धन की मात्रा रह गयी है।  इधर उधर से धन के साथ शिष्यों का संग्रह कर कोई अपना रटा रटाया अध्यात्मिक ज्ञान सुनाता है तो वह ज्ञानी है पर धारण करने वाला जो त्यागी है उसे कोई ज्ञानी नहीं मान सकता।  दान लेकर समाज सेवा करने वाले सम्मानीय और स्वतः दान देने वाला मूर्ख मान जा रहा है।  धर्म और समाज सेवा में व्यवसायिकता का इतना बोलबाला है कि जिसे अध्यात्म का ज्ञान नहीं है वह उन्हीं लोगों को महान समझता है जो कमाने के लिये सेवा करते हैं।  सेवा कर जो न कमाये उसे तो एक तरह से मूर्ख माना जाता है।
        समाज की इस प्रवृत्ति के बावजूद ज्ञानी और  साधकों का एक ऐसा समूह है जो निष्काम भाव से सक्रिय है।  वह यह सच जानते हैं कि समाज में लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक विकारों से जूझ रहा है।  हमारे देश में संपन्नता बड़ी है पर लोगों में उसी अनुपात से  प्रसन्नता का भाव कम हो गया है।  मूल बात यह है कि हम दूसरों की तरफ देखने की बजाय आत्ममंथन करें कि कहां खड़े हैं। भीड़ में भेड़ की तरह एकांत में ध्यान साधना करने पर इसका आभास हो सकता है कि एक ज्ञानी या साधक और आम मनुष्य में क्या अंतर है? साथ ही जिन लोगों को बड़ा माना जाता है उनकी स्थिति वाकई क्या है?        
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Saturday, November 24, 2012

चाणक्य नीति-जंगल के जल जाने पर पशु पक्षी उसे त्याग देते हैं

                हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक ऐसी परंपरायें प्रचलित हो गयी हैं जिनका मूल आध्यात्मिक आधारों से कोई संबंध नहीं है।  भोगी और त्यागी में का समाज में कोई  अंतर नहीं जानता है।  भोग करने वाले अपने आपको सबसे बड़ा त्यागी बताते हैं और त्यागी को अक्षम कहा जाता है।  हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में जन्म के आधार पर जातियों का पैमाना तय किया हो ऐसा लगता नहीं है।  अलबत्ता जातियों का कर्म के आधार पर विभाजन बताया गया है।  यह कहना कठिन है कि मनुष्य की जाति उसके जन्म के आधार पर तय करना चाहिए यह कर्म ही उसकी पहचान होना चाहिए।  एक व्यक्ति जो समाज को मार्गदर्शन देता है उसे ब्राह्मण माना जाता है उसकी संतान अगर अपना पारिवारिक कर्म न करे तो उसकी जाति उसके जन्म के आधार तय हो या कर्म को आधार  मानना चाहिए? इस प्रश्न पर अनेक लोगों को भिन्न भिन्न मत हैं।  एक बात तय है कि जातियों का संबंध कहीं न कहीं कर्म से है।  समाज को बौद्धिक सहायता देने वाले विद्वान ब्राह्मण, व्यापार करने वाले वैश्य, रक्षा करने वाले क्षत्रिय और अन्य सेवायें करने वाले शुद्र माने गये हैं।  आमतौर से शुद्र शब्द को अत्यंत बुरा माना जाता है पर सत्य यह है कि यह उस सेवा भाव का प्रतीक है जिसका हमारे अध्यात्मिक दर्शन  में बहुत महत्व है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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गृहीत्वा दक्षिणां विप्रास्त्यजन्ति वाजामानकम्।
प्राप्तविद्या गुरुं दगधाऽरण्यं मृगास्तथा।।
  हिन्दी में भावार्थ-ब्राह्मण दक्षिण लेकर यजमान, शिष्य ज्ञान लेकर गुरुदक्षिणा देकर गुरु और जंगल के जाने पर पशु पक्षी उसे त्याग देते हैं।
लौकि कर्मणि रतः पशुनां परिपालकः
वाणिज्यकृषिकर्मा यः सः विप्रो उच्यते।
       हिन्दी में भावार्थ -जो विद्वान ब्रह्मज्ञान होने पर भी  सांसरिक जीवन मे  रहकर पशुपालन, व्यापार और कृषि करता है वह वैश्य कहलाता है
                अनेक लोग यह कहते हैं कि हम गरीबों, अपंगों, असहायों तथा पीड़ितों की सेवा कर रहे हैं पर वह अपने आपको ऊंचा दिखाना चाहते हैं।  सेवक के रूप में वह झंडा लेकर समाज के शासक बनने का प्रयास करते हैं।  फिर पाश्चात्य शिक्षा पद्धति की वजह से हमारे यहां शुद्र को केवल घृणित या निम्न कोटि का कर्म करने वाला माना जाने लगा है जबकि इस जाति के लोग अन्य तीन वर्णों की सेवा करने वाला कार्य करते हैं।  अध्यात्मिक ग्रंथों में यह कहीं नहीं कहा गया कि शुद्र होना निम्न होना है।  अनेक जगह शुद्रों को ज्ञान देने पर प्रतिबंध है पर उसका आशय स्पष्ट नहीं है।  ऐसा लगता है कि सेवाकर्म में लगे मनुष्यों में नम्रता, दया, सहृदयता का भाव  और कष्ट उठाने की क्षमता स्वाभाविक रूप से रहती है।  उनमें अपनी मूल पारिवारिक तथा सामाजिक स्थिति के कारण बड़े बनने के लिये पाखंड दिखाने  की इच्छायें नहंी रहती। सेवाभाव वाले लोगों राजसी भाव का अभाव होता है इसलिये वह विकारों से परे रहते हैं। उनको ज्ञान की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। सेवा भाव में लगे समूहों को बारे में जानते हैं और यकीनन राजसी षड्यंत्रों और सामूहिक अपराधों में उनकी सक्रियता नहीं देखी जाती।
     हमारे देश में पेशेवर अध्यात्मिक संदेश वाहकों ने अपनी अपनी दृष्टि और सुविधा से  ग्रंथों की व्याख्या की है।  श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से संसार के चारों वर्णों को अपनी भक्ति का अधिकार दिया है।  उसमें कहीं भी किसी भी तरह का प्रतिबंध नहीं लगाया गया।  उसमें स्पष्टत त्यागी को ज्ञानी बताया गया है पर हमारे समाज में भोगियों के आभामंडल से प्रभावित लोग उन लोगों को सन्यासी मानते हैं जिन्होंने केवल वस्त्र सफेद या गेरुए पहने हों पर शेष सारा काम राजस भाव से करते हैं।  चाणक्य नीति में कहा गया है कि शिक्षा प्राप्ति के बाद गुरु का त्याग किया जाता है पर आजकल लोग केवल गुरुओं के आश्रमों में जाकर ही अपना धर्म निभाते हैं। उनके दर्शन होने पर क्षणिक प्रसन्नता का दावा करने वाले लोग कभी जीवन में आनंद नहीं उठा पाते क्योंकि उनमें ज्ञान का सर्वथा अभाव है। पेशेवर गुरु भी क्यों किसी शिष्य को ज्ञान देंगे? उनको पता है कि पूरी शिक्षा दे दी तो शिष्य गायब हो जायेगा।  यही कारण है कि अध्यात्मिक सत्संग के नाम पर अब केवल गुरु शिष्य का नियमित आपसी मेलमिलाप होना रह गया है।   
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Thursday, November 15, 2012

मनुस्मृति से संदेश-भिक्षा लेने और देने के भी नियम होते हैं (manu smriti se sandesh-bhiksha lene aur dene ka bhee niyam hote hain)

            हमारे देश में बरसों से भिक्षा मांगने और देने की एक धार्मिक परंपरा रही है। इसमें भी भिक्षा मांगने वाले भिक्षुक और देने वाले गृहस्थ के लिये भी नियम होते इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को  है।  दरअसल भिक्षा हमारी दान परंपरा का वह हिस्सा है जिसमें सांसरिक धर्म का निर्वाह होता है।  दान के बारे में कहा जाता है कि वह हमेशा सुपात्र को दिया जाना चाहिए। गृहस्थ का कुपात्र को दिया गया दान   निष्फल हो जाता है और दुष्ट को दान देने पर तो पाप भी लगता है।  उसी तरह भिक्षा लेना भी केवल उन सन्यासियों का कार्य है जो संसार में धनोपार्जन त्यागी भाव होने के कारण नहीं करते। भिक्षा लेकर अपनी देह का पालन पोषण वह धर्म पालन की दृष्टि से करते हैं न कि उनका यह एक पूर्णकालिक व्यवसाय होता है।  अपना पेट भरने के बाद वह समाज निर्माण का प्रयास करते हैं। इस सन्यासियों के मुख, वाणी और चक्षृओं में तप का तेज दिखाई देता है।  
                                    एककालं चरेद्भेक्षं न प्रसजोत विस्तरे।
                               भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति।।
          हिन्दी में भावार्थ-
एक बार भिक्षा मांगकर सन्यासी को उसी से अपना पालन करना चाहिए।  एक से अधिक बार भीख मांगने वाला सन्यासी विषयों में घिरने लगता है।
                      विघूमे सन्ममुसले ज्याङ्गारे भुक्तवञ्जने।
                    वृत्ते शराव सम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत्।।
            हिंदी में भावार्थ-
सन्यासी को उसी घर से  भिक्षा मांगनी चाहिए जहां चूल्हा ठंडा हो चुका हो। उस घर में कूटने और पीसने का काम पूरा होने पर खानी पीने के बर्तन धोकर रख दिये गये हों।
                 यह अलग बात है कि इस भिक्षा का स्वरूप अब बदलकर भीख के रूप में दिखता है। अब भिखारी मंदिरों के द्वारों पर खड़े होकर जिस  तरह भीख मांगते हैं उसे देखकर नहीं लगता कि वह कोई त्यागी हैं।  उनके चेहरे पर अकर्मण्यता, लालच और लोभ के भाव आसानी से देखे जा सकते हैं।  अनेक खास अवसरों पर ऐसे भिखारी सारा दिन भीख मांगते हैं। अनेक श्रद्धालु उनको खाना खिलाते हैं पर उसके बाद वह फिर वहीं भीख मांगने लगते हैं। कुछ धर्मभीरु भीख में धन या भोजन प्रदान कर  यह सोचते हैं कि उन्होंने महान दान किया है। अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में उनका यह प्रयास वृथा होता है।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो इस प्रकार की भीख को पापपूर्ण मानते हैं क्योंकि इस कार्य में त्यागी लोग नहीं बल्कि आलसी और लालची लोग लगे हैं।  अनेक जगह छोटे छोटे बच्चे भीख मांगते हैं। सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि उन बच्चों को भीख देकर उनको भविष्य में अकर्मण्यता के साथ जीवन बिताने के लिये प्रेरित किया जाता है। देखा यह गया है कि अनेक लोगों को भीख मांगने की आदत बचपन से ही लग जाती है और वृद्धावस्था तब वह उससे छूट नहीं पाते।  इसलिये भीख की इस नयी परंपरा से समाज में जो विकृत्तियां आई हैं उसे रोकने के लिये हमें अपने ग्रंथों में वर्णित भिक्षा परंपरा के नियमों की जानकारी रखनी चाहिए।



संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, November 10, 2012

विदुर नीति-भोजन वह करो जो पच सके (vidur neeti-bhojan vah karen jo pach sake)

                 धन, पद और शक्ति की संचय में लगे पूरे विश्व समाज का ध्यान अपने शरीर पर कम मन पर अधिक रहता है।  लोग बाहरी आंखों से संसार की रंगीनियों  को देखने में इतना ध्यान लगाते हैं कि उनको इस बात का आभास ही नहीं होता कि उनकी देह समय से पूर्व ही विकारो के जाल में फसती जा रही है।  अब तो स्थिति यह है कि दिमागी तनाव से पैदा होने वाले रोग छोटे बच्चों और युवकों में भी दिखाई देने लगे  है। विश्व के मनोवैज्ञानिक समाज में मनोविकारों की बढ़ती संख्या से चिंतित हैं।  पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ इसके लिये भोजन, रहन सहन और अप्राकृतिक कार्यशैली को बताते हैं। हालत यह है कि अनेक मनोवैज्ञानिक यह बात  कहते हुए नहीं चूकते कि अब यह बात लगाना भी कठिन है कि हम से बात कर रहा व्यक्ति मनोरोगी है या हम स्वयं ही हैं।  उनकी बात ठीक है पर भोजन, रहन सहन और कार्यशैली के सुविधाभोगी होने से उपजे मनोरोगों का परिणाम क्या हो रहा है, इस पर अभी तक कोई चिंत्तन सामने नहीं आ रहा है।

विदुरनीति में कहा गया है कि
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भक्ष्योत्तमप्रतिाच्छन्नं मत्स्यो वडिशमायसम्।
लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धनवेक्षते।।
      हिन्दी में भावार्थ-मछली हमेशा ही भोजन की लालच में कांटा पकड़कर उसमें बिना किसी विचार के फस जाती है।’’
यच्छक्यं ग्रसितु ग्रस्यं परिणमेच्च यत्
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता।।
      हिन्दी में भावार्थ- अपनी उन्नति की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सदैव ऐसा भोजन करना चाहिए जो पच सके।
    पूरे विश्व के प्रचार माध्यम पूंजीपतियों के हाथ में है और वह केवल आर्थिक विकास की बात करते हुए समाज को भ्रमित कर रहे हैं।  वास्तविकता यह है कि विकास केवल भौतिक ही नहीं वरन् आध्यात्मिक भी होता है पर इसके प्रति कोई जागरुक नहीं है। वास्तविकता यह  है कि जब मनुष्य को भौतिकता का चरम मिलता है तब उसके अंदर एक खालीपन दिखाई देता है।  यह खालीपन उसके आध्यात्मिक विषयों के अभाव की तरफ संकेत करता है। कहा जाता है कि इस ंसार में न गरीब सुखी है न अमीर! तब प्रश्न उठता है कि लोग अमीर होकर कौनसा सुख पाते है? सीधी बात यह है कि सुख कहीं मिलता नहीं बल्कि उसे अंदर अनुभव किया जाता है। इस अनुभूति के लिये यह आवश्यक है कि अध्यात्मिक ज्ञान होना चाहिए वरना तो जिस तरह मछली फसती है आदमी भी फस ही रहा है।  स्थति यह है कि फास्ट फूड के नाम पर ऐसा भोजन करने की आदत लोगों में बढ़ी गयी है जो कि जिससे देह में ऊर्जा का निर्माण नहीं होता। बाज़ार में बनने वाले खाद्य पदार्थों में शुद्धता का अभाव होता है पर वहां खाने वालों की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि लोग अपने स्वास्थ्य को बेजुबान मछलियों की तरह  दाव पर लगा रहे हैं।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, November 4, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता से युक्त सम्प्रज्ञात योग (patanjaili yoga vigyan or sicence)

       भारतीय योग साहित्य की चर्चा चारों तरफ है पर मुख्य रूप से आसन तथा प्राणायाम जैसे दो भागों पर ही विद्वान लोग अपना ध्यान केंद्रित कर रहे हैं।  कुछ लोगों ने समय समय पर  यम, नियम और ध्यान पर भी अपनी राय रखी है पर पतंजलि योग साहित्य के बारे सही ज्ञान बहुत कम लोगों को हैं।  यह सत्य है कि योग से मन को बुद्धि से और बुद्धि को आत्मा से जोड़ कर परमात्मा की उपस्थिति का अनुभव अपने अंदर करना सहज हो जाता है पर ऐसा करने के लिये पतंजलि योग के सूत्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  इसमें योग के अनेक रूपों का वर्णन है। जब मनुष्य योग के बाह्य रूप से अवगत होकर अपनी साधना करता है तब उसके अंदर अनेक प्रकार की आंतरिक सिद्धियां स्वतः आती है जो कि योग साधना का चरम स्तर होता है।          
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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  वितर्कविचारान्नदास्मितानुगमात्सप्रज्ञातः।।
हिन्दी में भावार्थ-वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता के संबंध से युक्त सम्प्रज्ञातयोग है।
तत्परं पुरुषख्यांतेर्गुणवैतृष्ण्यम्।।
हिन्दी में भावार्थ-पुरुष के ज्ञान से प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाता है। यह परम वैराग्य है।
    मुख्य बात यह है कि ज्ञान साधक जब इस संसार की त्रिगुणमयी माया से अवगत हो जाता है तब वह बाहरी विषयों में निर्लिप्त और निष्काम भाव से कर्म करता है। अपनी दैहिक क्रियाओं से होने वाली उपलब्धियों को फल नहीं बल्कि कर्म का ही विस्तार मानता है।  उसे यह आभास हो जाता है कि शारीरिक और बौद्धिक श्रम से उसे मिला धन अंततः उसके पास न रहकर दूसरी जगह व्यय होना है।  उसने जो मकान बनाये या वाहन खरीद एक दिन वह उसका साथ छोड़ देंगे।  इतना ही नहीं जिस देह को धारण किये है एक दिन उससे भी वह छोड़ जायेगा।  तब उसमें वैराग्य भाव पैदा होता है जो उसमें जीवन के प्रति आत्मविश्वास पैदा करने के साथ ही परमात्मा की पहचान भी कराता है।  तब आदमी सांसरिक विषयों से दैहिक रूप से प्रथक तो नहीं होता पर आत्मिक रूप से उसका लक्ष्य नहीं रह जाता। वह एक दृष्टा की तरह अपने जीवन को देखता हुआ हर क्षण का आनंद लेता है।  वह ध्यान, धारणा तथा समाधि जैसी विद्याओं में पारंगत होकर कर्मयोगी बन जाता है। यही भारतीय योग साधना का चरम स्तर है।
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Wednesday, October 24, 2012

राज्य के मंत्रियों को योग्य होना चाहिए-कौटिल्य का अर्थशास्त्र

           मूलतः हर मनुष्य में दूसरे पर शासन करने की प्रवृत्ति होती है जो अंततः अहंकार की अग्नि से पैदा होती है। यह बुरा भी नहीं है पर जिस मनुष्य में अपने शासित लोगों का हित करने की बजाय उनका दोहन करने का लक्ष्य होता है  वह उसको भ्रष्ट, निकृष्ट और दुष्ट बना देता है। आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राजनीति शास्त्र की बजाय केवल नारे देने वालों को राज्य पद पर प्रतिष्ठित करना प्रारंभ किया है।  इतना ही नहीं राजनीति की बजाय अन्यत्र विषयों में पारंगत और प्रतिष्ठित लोगों के लिये राजकाज में आने की प्रवृत्ति बढ़ी है।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजनीति से अनभिज्ञ लोग राजधर्म से भी अनभिज्ञ होते हैं और जब वह राजकाज करते हैं तो वह उसमें वह सफल नहीं हो पाते।  इसके परिणाम प्रजा को भोगने पड़ते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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शास्त्रचक्षुनृपस्तस्मान्महामात्यमते स्थितः।
धर्मार्थप्रतिपातीनि व्यसननि परित्येत्।।

                ‘हिन्दी में भावार्थ-किसी भी राज्य प्रमुख के पास शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  उसे हमेशा ही योग्य मंत्रियों के साथ दिखना चाहिए।  धर्म और अर्थ के लिये घातक व्यसनों को वह त्याग दे।
      राज्य करना भी एक तरह से कला है।  जिस तरह समाज में कला का व्यवसायीकरण हुआ है वैसे ही राजनीति भी पेशा बन गयी है।  अनेक लोग तो अपने राजनीति से इतर व्यवसायों, संगठनों तथा सामाजिक हितों की रक्षा के लिये पदारूढ़ होने की  कामना करते हैं।  वह सफल भी होते हैं। उनका लक्ष्य केवल पद पर बैठकर अपने तथा परिवार की रक्षा करना होता है इसलिये प्रजाहित की न तो उनमें दिलचस्पी रहती है न ही कोई वह योजना बनाते हैं।  इसी कारण पूरे विश्व में भ्रष्टाचार और अराजकता का वातावरण बन गया है।  अलबत्ता पद बचाये रखने के लिये ऐसे लोग  नारे अवश्य दिया करते हैं।  यही कारण है कि इस समय विश्व के अनेक देशों में असंतोष का वातावरण बन गया है।  अनेक जगह खूनी संघर्ष चल रहे हैं।  अनेक राज्य प्रमुख अपने ही देश के विद्रोहियों से जान बचाते फिर रहे हैं। यह राज्य प्रमुख केवल बंदूक के सहारे पदों पर आ गये पर जनहित करने की समझ उनमें कभी नहीं दिखी। हमारे देश को अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिले साठ साल से अधिक समय हो गया है पर आज भी अनेक विद्वान मानते हैं कि अधूरी आजादी ही मिली है।  इसलिये राजनीति में सक्रिय होने वाले लोगों को पहले राजनीति शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, October 6, 2012

सामवेद से संदेश-आलसी मनुष्य को देवता पसंद नहीं करते (asli manushya ko devata pasand nahin larte)

         ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो देवता तथा मनुष्यों की उत्पति हुई।  उन्होंने कहा कि मनुष्य देवताओं की आराधना करें तो देवता मनुष्य को उसका  फल देंगे। अध्यात्म और सांसरिक विषयों के बीच जीव की देह पुल का काम करती है। सांसरिक विषयों में सहजता से संबंध रखना आवश्यक है। इसलिये आवश्यक है कि उन विषयों से संबंधित कार्य करते हुए हृदय में शुद्धि हो। सांसरिक विषयों में फल की कामना का त्याग नहीं किया जा सकता  पर उसके लिये ऐसे गलत मार्ग का अनुसरण भी नहीं किया जाना चाहिए जिससे बाद में संकट का सामना करना पड़े।  दूसरी बात यह भी है कि अपने कर्म के परिणाम की आशा दूसरे का दायित्व नहीं मानते हुए आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए।। 
सामवेद में कहा गया है कि
..................................
देवाः स्वप्नाय न स्पृहन्ति।
 
हिन्दी में भावार्थ-देवता आलसी मनुष्य को प्रेम नहीं करते।
देवाः सुन्वन्तम् इच्छान्ति। 
हिन्दी में भावार्थ-देवता कर्मशील मनुष्य को प्रेम नहीं करते हैं।
           जीवन को सुचारु रूप से चलाने क्रे लिये कर्मशील होना आवश्यक है। आलस्य मनुष्य का शत्रु माना जाता है। देह से परिश्रम न करना ही आलस्य है यह सोचना गलत है वरन् मस्तिष्क को सोचने के ले कष्ट देने से बचना भी इसी श्रेणी में आता है। आधुनिक सुविधाभोगी जीवन ने आदमी की देह के साथ ही उसके मस्तिष्क की सक्रियता पर भी बुरा प्रभाव डाला है। लोग प्रमाद तथा व्यसन में अधिक रुचि इसलिये लेते हैं कि उनके मस्तिष्क को राहत मिले। यही राहत आलस्य का रूप है।  इससे बचना चाहिए। अध्यात्म ज्ञान प्राप्त करने यह आलस्य स्वमेव दूर होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, September 16, 2012

यजुर्वेद से सन्देश-प्रेम से रहना सीखें (yajurvd se sandesh -prem se rahana seekhe)

                     आजकल पूरे विश्व में ऋण लेकर अपने लिये सुख साधन जुटाने की प्रवृत्ति बढ़ी गयी है।  दूसरे के घर की रोशनी देखकर आदमी अपने घर में कर्ज लाकर आग लगाने को तैयार दिखता है।  सुख किश्तों पर मिलता है पर दुःख कभी एकमुश्त चला आता है।  कर्ज लेकर सामान लेने वाले जब ब्याज और मूलधन नहीं चुका पाते तब उनके पास सिवाय भारीसंताप में फंसे रहने  अलावा  कोई चारा नहीं रहता।  विलाप करते रहने के सिवाय उनके पास अन्य  मार्ग नहीं रहता।  आदमी अब दूसरों पर अपनी निर्भरता इस कदर बढ़ा चुका है कि सड़क पर सिर उठाकर चलने की उसकी मनःस्थिति नहीं रही।  आवश्यकताओं ने आदमी को मजबूर बना दिया है और वह कभी किसी सामाजिक संघर्ष में जमकर लड़ नहीं सकता।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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दृते छोड़ मां ज्योवते सांदृशि जीव्यासं ज्योवते सदृशि जीष्यासम्।।
                    हिन्दी में प्रार्थना का भावार्थ-‘‘हे समर्थ! मुझे शक्तिशाली बनाओ ताकि सब मुझे मैत्री भाव प्रदान करें।  हम सभी एक दूसरे को प्रेममयी दृष्टि से देखें।
मयि त्यांदिन्द्रियं बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः।।
                   हिन्दी में इस प्रार्थना का अर्थ--‘‘मुझे महान शक्ति प्रदान करो। दक्षता प्रदान करो ताकि अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकूं।’’ 
                      इतना ही नहीं ईश्वर से प्रार्थना करते समय हर आदमी केवल अपने लिये लोकोपयोगी  सामान की याचना करता है।  कोई भी आदमी अपने लिये बल और बुद्धि नहीं मांगता जिससे इस संसार की समस्याओं से निपटा जा सकता है।  कहा जाता है कि जैसा आदमी  के हृदय में संकल्प रहता है वैसा ही उसके लिये यह संसार हो जाता है। आजकल लोग भोग प्रवृत्तियों को तो धारण कर लेते हैं पर योग संस्कार के अभाव में उनकी तृप्ति दूसरे की सहायता से कर्ज, दान या उधार लेकर ही होती है।  यह सब ग्रहण करना अशक्त आदमी का प्रमाण है इसलिये जहां तक हो सके ईश्वर से अपने लिये बल और बुद्धि की याचना करना चाहिए। किसी दूसरे के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है उसके आगे हाथ फैलाया जाये जो सभी का दाता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Sunday, September 9, 2012

विदुर नीति और दर्शन-जैसा कोई व्यवहार कर उसे वैसा ही उत्तर दें (vidur neeti-jase ko taisa jawab den)

    मनुष्य जीवन में समय का बहुत महत्व है।  समय का विभाजन समझने वाले अपने कर्म का सहजता से संपन्न कर सकते हैं।  प्रातःकाल का समय धर्म, दोपहर का अर्थ, सांयकाल का ध्यान चिंतन  तथा रात्रि को मो़क्ष यानि निद्रा के लिये हैं।  जब हम अर्थ के लिये कार्य करते हैं तब उस समय हमारे अंदर राजस कर्म के भाव होता है तब  उसके नियमों का पालन करना आवश्यक है।   राजस कर्म में जीवन यापन  के लिये धन कमाना होता है। उस समय हमारे अंदर अपनी देह के लिये भौतिक साधन जुटाना ही लक्ष्य होता है। ऐसे में हमारा वास्ता ऐसे लोगों से पड़ता है जो राजस बुद्धि से काम करते हैं जिनका लक्ष्य भी वही होता है।  उनसे सात्विकता की आशा व्यर्थ हैं।  उस समय जो कपट करे उसका प्रतिवाद करना चाहिये। जो ईमानदारी से पेश आये तो उसकी प्रशंसा करना चाहिए।
यस्मिन यथ वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिस्तथा वर्तित्व्यं स धर्मेः।
मायाचारी मायया वर्तितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः।।
           हिन्दी में भावार्थ-जैसा व्यवहार दूसरा मनुष्य करे वैसा ही हमें भी करना चाहिए यही धर्म है। अगर कोई कपट से पेश आये तो उसका प्रत्युत्तर भी उसी तरह देना चाहिए। जिसका व्यवहार अच्छा हो उसे सम्मान देना चाहिए।
न निह्नवं मन्त्रतस्य गच्छेतफ संसृष्टमन्त्रस्य कुसङ्गतस्य।
न च ब्रुयान्नश्वसिमि त्वयीति सकारणं व्यपदेशं तु कुर्यात्।।
        हिन्दी में भावार्थ-जब कोई राजा दुष्ट सहायकों के साथ मंत्रणा कर रहा हो तब उस समय उसकी बात का प्रतिवाद न करे। उसके सामने अपना अविश्वास भी न जताये तथा कोई बहाना बनाकर वहां से निकल आयें।
           समाज में राज्य, अर्थ तथा धर्म के शिखर पुरुषों पर बैठे लोगों के साथ व्यवहार करते समय अपनी तथा उनकी स्थिति पर विचार करना चाहिए।  आजकल हर क्षेत्र में तामसी प्रवृत्ति के लोग सक्रिय हैं।  प्रकृति का नियम है कि सज्जन लोगों का संगठन सहजता से नहीं बनता क्योंकि उसकी उनको आवश्यकता भी नहीं होती। इसके विपरीत दुष्ट तथा स्वार्थी तत्वों का संगठन आसानी से बन जाता है।  ऐसे में अपने सार्वजनिक जीवन में इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि हमारे व्यवहार में आने वाले लोगों का कर्म किस प्रकृत्ति के हैं।  जहां दुष्ट लोगों का समूह हो वहां अपनी बुद्धिमानी, चातुर्य तथा ज्ञान बघारना ठीक नहीं है।  चुपचाप वहां से निकल जायें।  ऐसे लोगों केवल अपना काम निकालने के लिये तत्पर होते हैं।  उनसे सात्विकता और सहृदय की आशा करना स्वयं को धोखा देने के अलावा कुछ नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, August 31, 2012

यजुर्वेद से सन्देश-ईश्वर से हमेश अपने लिए शक्ति मांगें (yajurved se sandesh-pne liye bhagwan se shakti mangen)

                     आजकल पूरे विश्व में ऋण लेकर अपने लिये सुख साधन जुटाने की प्रवृत्ति बढ़ी गयी है।  दूसरे के घर की रोशनी देखकर आदमी अपने घर में कर्ज लाकर आग लगाने को तैयार दिखता है।  सुख किश्तों पर मिलता है पर दुःख कभी एकमुश्त चला आता है।  कर्ज लेकर सामान लेने वाले जब ब्याज और मूलधन नहीं चुका पाते तब उनके पास सिवाय भारीसंताप में फंसे रहने  अलावा  कोई चारा नहीं रहता।  विलाप करते रहने के सिवाय उनके पास अन्य  मार्ग नहीं रहता।  आदमी अब दूसरों पर अपनी निर्भरता इस कदर बढ़ा चुका है कि सड़क पर सिर उठाकर चलने की उसकी मनःस्थिति नहीं रही।  आवश्यकताओं ने आदमी को मजबूर बना दिया है और वह कभी किसी सामाजिक संघर्ष में जमकर लड़ नहीं सकता।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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दृते छोड़ मां ज्योवते सांदृशि जीव्यासं ज्योवते सदृशि जीष्यासम्।। 
              हिन्दी में प्रार्थना का भावार्थ-‘‘हे समर्थ! मुझे शक्तिशाली बनाओ ताकि सब मुझे मैत्री भाव प्रदान करें।  हम सभी एक दूसरे को प्रेममयी दृष्टि से देखें।
मयि त्यांदिन्द्रियं बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः।। 
                 हिन्दी में इस प्रार्थना का अर्थ--‘‘मुझे महान शक्ति प्रदान करो। दक्षता प्रदान करो ताकि अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकूं।’’ 
                      इतना ही नहीं ईश्वर से प्रार्थना करते समय हर आदमी केवल अपने लिये लोकोपयोगी  सामान की याचना करता है।  कोई भी आदमी अपने लिये बल और बुद्धि नहीं मांगता जिससे इस संसार की समस्याओं से निपटा जा सकता है।  कहा जाता है कि जैसा आदमी  के हृदय में संकल्प रहता है वैसा ही उसके लिये यह संसार हो जाता है। आजकल लोग भोग प्रवृत्तियों को तो धारण कर लेते हैं पर योग संस्कार के अभाव में उनकी तृप्ति दूसरे की सहायता से कर्ज, दान या उधार लेकर ही होती है।  यह सब ग्रहण करना अशक्त आदमी का प्रमाण है इसलिये जहां तक हो सके ईश्वर से अपने लिये बल और बुद्धि की याचना करना चाहिए। किसी दूसरे के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है उसके आगे हाथ फैलाया जाये जो सभी का दाता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Friday, August 24, 2012

चाणक्य नीति-जो दंड नहीं दे सकता उससे कोई नहीं डरता

                कहा जाता है कि फिट है वही हिट है। दरअसल भौतिक उपलब्धियों के लिये जुटा इंसान न तो अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रयास करता है और न ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर आत्मबली हो पाता है। जीवन में एक बार ऐसा समय अवश्य ही आता है जब वह थक जाता है। यह थकावट उसे वृद्धावस्था में ही पहुंचा देती है। ऐसे में शारीरिक तथा आत्मिक रूप से क्षीण होकर मनुष्य के पास आर्तनाद करने के अलावा कोई मार्ग शेष नहीं रह जाता। हमारे देश में व्यायाम आदि को कभी आदत की तरह नहीं अपनाया गया। अपनी ही योग कला को केवल सिद्धों तथा नकारा लोगों के लिये आवश्यक माना गया है। यही कारण है कि आजकल हम अपने आसपास शारीरिक तथा दिमागी रूप से विकारग्रस्त लोगों का से भरा समाज देख रहे हैं।
                       महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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                        यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैंव धनऽऽगमः।
                       निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति।।
            ‘‘जिसके नाराज होने पर किसी प्रकार का भय नहीं हो और नही प्रसन्न होने पर किसी फल की आशा है और जो दण्ड देने का सामर्थ्य भी नहीं रखता वह गुस्सा होकर कर भी क्या लेगा?’’
                  पश्चिमी आधार पर किये गया व्यायाम भी बुरा नहीं है अगर नियमित रूप से किया जाये मगर हमारे देश में लोगों ने जीवन शैली तो ब्रिटेन और अमेरिका जैसी अपना ली है पर वहां जो कसरत करने का नियम है उसका पालन नहीं करते। सुविधाओं ने इतना विलासी बना दिया है कि हमारे यहां अस्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही है। हमारे यहां की योग कला तो न केवल शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाती है वरन मानसिक रूप से दृढ़ भी बनाती है। आज के समय में जब भौतिकवाद के चलते आदमी अकेला होता जा रहा है तब यह आवश्यक है कि अपने बल को बनाये रखे। यह सभी जानते हैं कि जब तक हमारी देह में सामर्थ्य है तभी तक सारा संसार हमारे साथ है और असमर्थ होने पर अपने भी त्याग देते हैं। इसके बावजूद अगर कोई अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देता तो उसे अज्ञानी ही माना जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, August 15, 2012

संत कबीर दर्शन-पराई नारी से हंसी मजाक कर संकट न बुलाएँ (sant kabir darshan=parai stree se hansi majak kar sankat n bulayen)

                                 मनुष्य अपने सुख के पल तो एकदम सहजता से गुजार लेता है पर जब दुःख आता है तो भगवान को याद करता है।  सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने संकटों को स्वयं ही आमंत्रित करता है।  कई बार तो ऐसे वाद विवादों को जन्म देता है जिसके मूल में सिवाय अहंकार के कुछ अन्य नहीं होता।  हंसी मजाक में झगड़े होते हैं।  कुछ पुरुषों की आदत होती है वह अपने साथ वार्तालाप करने वाली स्त्रियों के साथ हंसी मजाक कर अपना दिल बहलाते हैं।  वह समझते हैं कि अपने आपको बुद्धिमान साबित कर अपने लिये प्रतिष्ठा अर्जित कर रहे हैं पर होता उसका उल्टा है।  उनको लोग हल्का या अगंभीर मानते हैं। कभी कभी इस बात पर झगड़े तक हो जाते हैं।
इस विषय पर संत कबीर कहते हैं कि
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दीपक झोला पवन का, नर का झोला नारि।
साधू झोला शब्द का, बोलै नाहिं बिचारि।।
                   वायु का झौंका दीपक के लिये भय देने वाला होता है तो नारी का संकट पुरुष के लिये परेशानी का कारण होता है।  उसी तरह यदि ठीक से विचार कर शब्द व्यक्त न किया जाये तो वह साधुओं के लिये संकट का कारण बनता है।
पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय।
कबहूं छेड़ि न देखिये, हंस हंसि खावे रोय।
                     दूसरे आदमी की नारी से कभी कोई हंसी या मजाक न करो क्योंकि वह उस छुरी के समान है जो आदमी को हंसकर या रोकर अंततः काट देती है।
                    अनेक पुरुष दूसरे की स्त्रियों से वार्तालाप कर अपने मनोरंजन की प्राप्ति करते हैं। यह मनोरंजन अंततः उनको महंगा पड़ता है।  देखा तो यह जा रहा है कि आधुनिक समाज में केवल इसी बात पर अनेक झगड़े हो जाते हैं कि किसी ने परस्त्री के साथ मजाक किया। अनेक लोग इस चक्कर में बदनाम हो जाते हैं कि वह परस्त्रियों से अपने संबंध बनाते हैं। ऐसा नहीं है कि समाज में पहले ऐसा नहीं होता था।  अगर यह बात होती तो हमारे संत महापुरुष इस बुराई की तरफ प्राचीनकाल से सचेत नहीं करते पर वर्तमान आधुनिक समय में परस्त्रियों से से अश्लील अथवा द्विअर्थी संवाद के साथ वार्तालाप करना एक फैशन हो गया है जो कि देश की सांस्कृतिक परंपराओं के भी विरुद्ध है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Tuesday, August 14, 2012

विदुर नीति-रोगी मनुष्य मृतक समान

        एक तरफ हमारे संचार माध्यम जहां अपने देश के आर्थिक विकास का ढिंढोरा पीट रहे हैं दूसरी तरफ विश्व के स्वास्थ्य विशारद भारतीय समाज में मधुमेह, हृदय रोग, वायुविकार जैसे दैहिक संकट तथा मनोरोगों के बढ़ते आंकड़ों को प्रस्तुत कर रहे हैं। पश्चिमी शिक्षा से ओतप्रोत देश के बुद्धिजीवी इससे बेखबर लगते हैं। देश में स्वास्थ्य की चिंता करने वाले व्यवसायिक विशेषज्ञ भी रोगों के निवारण का प्रचार कर आर्थिक हित साध रहे हैं। ऐसे बहुत कम अध्यात्मिक चिंतक हैं जो रोगों के निवारण से अधिक आरोग्य रूपी धन का संचय करने के लिये लोगों को प्रेरित करें।
            पिछले कुछ समय से हमारे देश में योग का प्रचार बढ़ा है। यह अच्छी बात है पर इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान हो तो आनंद अधिक ही लिया जा सकता है। इसके लिये यह आवश्यक है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया जाये। दरअसल जो लोग योगासन और प्राणायाम करने वाले हैं उनके दैहिक विकास न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाते है पर तत्वज्ञान के अभाव में वह जीवन का पूरा आनंद नहीं उठा पाते। ऐसे में उनका मन रुचिकर विषयों की तरफ लगता है। वह चाहते हैं कि उनसे मिलने वाले लोग भी उन जैसे हों। मगर उनको तब निराशा का सामना करना पड़ता है जब बहुतायत रोगग्रस्त लोगों वाले समाज में केवल विकारों वाले विषयों से सामना होता है। तब उनको असहजता का अनुभव होता है। फिर दैहिक विकारों से ग्रसित लोग तो प्रत्यक्ष दिखते हैं पर मानसिक विकारों वाले लोगों की पहचान नहीं होती। मानसिक रोगों से ग्रसित लोग अपने विचार,, वाक्या तथा व्यवहार से अपने आसपास के लोगों को क्षुब्ध कर देते हैं। उनके इस कर्म से अध्यात्मिक ज्ञान रखने वाले विचलित नहीं होते।
                     विदुरनीति में कहा गया है कि 
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              रोगार्दिता न फलान्याद्वियन्ते न वै लभन्ते विषयेषु तत्वम्।
               दुःखोपेता रोगिणी नित्यमेव न बुध्यन्ते धनभौगान्न सोख्यम्।
           ‘‘बीमार मनुष्य कभी अमृतदायी फलों का आदर नहीं करता। विषयों में भी आसक्ति से भी उनको कोई सुख नहीं मिलता। रोगी सदा ही कष्ट में रहते हैं उनके लिये भोग और सुख व्यर्थ हो जाते हैं।
              न मनुष्ये गुणः कश्चिद् राजन् सधनतामृते।
              अनातुरत्वाद् भद्रं ते मृतकल्या हि रोगिणः।।
             ‘‘मनुष्य के पास धन हो या नहीं  निरोग होने का गुण जरूर होना चाहिये

क्योंकि रोगी मनुष्य तो मृतक समान है।‘‘
                जिस तरह बबूल के पेड़ से आम की अपेक्षा करना व्यर्थ है उसी तरह विकारों से ग्रसित लोगों से सद्व्यवहार की अपेक्षा करना मूर्खता और अज्ञान का प्रमाण है। हम जब किसी व्यक्ति के व्यवहार, विचार या वाक्य से निराश हों तो यह समझना चाहिए कि वह विकार से ग्रसित है। अपने अंदर निराशा या क्रोध का भाव लाने की बजाय उसकी बात को अनसुना करना श्रेयस्कर है। सच बात तो यह है कि हम दूसरों की बात से अपने अंदर गुस्सा लाकर स्वयं को तकलीफ देते हैं। जो विकार से ग्रसित है उसके लिये मधुर वचन बोलना तथा सद्व्यवहार करना कठिन है। तब क्यों अपना खून जलाया जाये।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Saturday, August 4, 2012

पतंजलि योग सूत्र-इच्छाओं का त्याग ही सन्यास है (patanjali yog sahitya-ichchaon ka tyag hi sanyas)

                 हमारे देश में सन्यास तथा वैराग्य को लेकर भारी भ्रम प्रचलित हैं। विषयों में आसक्ति का अभाव होने का मतलब यह माना जाता है कि मनुष्य कोई कर्म ही नहीं करे। संसार के अन्य जीवों से कटकर कहीं वन में जाकर रहने को ही सन्यास माना जाता है। दरअसल कर्म और सन्यास की जो व्याख्या श्रीमद्भागत गीता में की गयी उसे समझने में हमारा समाज असमर्थ रहा है। कर्म करना और उसके फल में आकांक्षा न होना ही सन्यास है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य अपनी देह के रहते बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता। वह तत्वज्ञान को जानने के बाद विषयों से प्रथक नहीं होता बल्कि उसमें आसक्ति का त्याग कर देता है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब हम कोई काम करते हैं तो वह केवल हमें इसलिये करना चाहिए कि उससे हमारा जीवन निर्वाह होगा। इससे अधिक अपेक्षा करने पर निराशा हाथ लगती है।
                     पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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                   दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम।।
               ‘‘दिखने और सुनने वाले विषयों से सर्वथा तृष्णारहित चित्त की अवस्था है वही वैराग्य है।’’
                     तत्परं पुरुषरव्यातेर्गुणवतृष्ण्यम्।।
                 ‘‘मनुष्य के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना ही परम वैराग्य है।’’
              हमें गाना सुनना है सुने। फिल्म देखनी है देखें। गाड़ी पर जाना है जायें। वैराग्य तो उनमें आसक्ति से हैं। जब हम यह सोचते हैं कि गाना सुने बगैर हमारे कान रह नहीं सकते। फिल्म देखे बिना हमारी आंखें प्यासी रह जाती हैं। गाड़ी में बैठे बिना हमारा मन तृप्त नहीं होगा। यहीं से शुरु होती है मानसिक तनाव की जो हमें ऐसी स्थिति में पहुंचाता है जहां बड़ा से बड़ा ज्ञान भी धरा का धरा रह जाता है। संसार के विषयों से हम अलग नहीं हो सकते मगर उनमें इस तरह की लिप्पता कभी सुखद नहीं होती। शराबी और जुआरी समाज में कभी विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि सब जानते हैं कि वह उनके बिना चल नहीं सकते इस कारण किसी भी दूसरे आदमी के कर्म के योग्य नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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