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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Monday, March 27, 2017

हमने तो यादों का खजाना संभाला था=छोटीकविताये एवं क्षणिकायें (Hamne yandon ka khazana sanbhala thaa-Short HindiPeom)

दिमाग बंद कर
दिल का दरवाजा
खोला नहीं जाता।
हादसों में घाव का
बहता रक्त
तोला नहीं जाता।
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सुंदरता के सभी दीवाने
दिल की बात
समझे कोई नहीं।
झील से गहरी आंखों पर
मरने वाले न जाने
वह सोई नहीं।
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हमने तो यादों का
खजाना संभाला था
पर उनके दिल पर ताला था
भटके ज़माने में 
कौन उन्हें
समझाने वाला था।
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उनके कंधों पर उम्मीद रखी
यही हमारा कसूर है।
नतीजा अब यह कि
दिल से यकीन दूर है।
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अगर फूलों के रंग होते
हम भी होली मना लेते।
भावनाओं के तार मिलते
प्रेम की झोली बना लेते।
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दिल की पहचान नहीं
दिमाग से प्यार करें।
जज़्बातों को छू नहीं पायें
आंखों में नकली प्यार भरें।
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खिलाड़ी भी बिकते हैं,
महंगे हों वही टिकते हैं।
बाज़ारवाद के दौर में
बंधुआ आजाद दिखते हैं।
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फुर्सत नहीं मिलने का
बहाना हमेशा करते हैं।
मुफ्त की मुलाकातों से
वह शायद डरते है।
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कपड़े के रंग से बनाते छवि
वह कैसे फकीर हैं।
राजस्व की लूट से बने
वह कैसे अमीर हैं।
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इशारे क्या समझेंगे
शब्दों को ही नहीं समझ पाते।
वह खुश हैं ज़माने से
कहे जो नासमझ जाते।
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इश्क के किस्से भी
रोज सुनाये जाते हैं।
आज भी मरे आशिक
नकदी से भुनाये जाते हैं।
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अपनी प्रतिष्ठा गंवाकर
दूसरे की निंदा करते हैं,
इस तरह आत्मसम्मान
वही जिंदा करते हैं।

Friday, March 24, 2017

हिन्दी भाषा में रोमियो शब्द के तीन आशय होते हैं-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन (Three meaning in Hindi Languvase-Hind Satire Thought)

                                         हिन्दी भाषा में किसी भी संज्ञा के तीन अर्थ होते हैं।  किसी भी शब्द का  अर्थ तथा भाव प्रसंग की अनुसार लिया जाता है। हम यहां उत्तरप्रदेश में चल रहे एंटी रोमियो अभियान का मजाक उड़ाने वाले प्रगति तथा उलटपंथियों के हिन्दी ज्ञान पर ही सवाल उठा रहे हैं क्योंकि वह शेक्सिपियर को अपना आदर्श मानते हैं और उनके एक पात्र का अपमान सहन नहीं कर रहे।  विश्व में हिन्दी एकमात्र ऐसी भाषा है जो जैसी बोली जाती है वैसी लिखी जाती है यह कहा जाता है पर हमारा मानना है कि इसमें शब्दों के भाव वैसे नहीं होते जैसे बोले जाते हैं वरन् यह उन प्रसंगों का संदर्भ तय करता है।
                      हम अपनी दृष्टि से रोमियो ही नहीं वरन् मजनूं और रांझा के परिप्रेक्ष्य में भी इन्हें मान सकते हैं। हम रोमियो का शाब्दिक आशय लें तो वह शेक्सिपियक के नाटक का एक पात्र है जिसने जूलियट से प्रेम किया था।  
                        लाक्षणिक अर्थ तब आता है जब कोई प्रेमिका अपने प्रेमी से कहे-‘वाह रे मेरे रोमियो।’ यहां उसके प्रेमी का नाम रोमियो नहीं है पर वह लक्षणों से उसकी पहचान बता रही हैं।
             तय बात है कि व्यंजन विधा में उस तरफ इशारा किया जाता है जहां किसी के प्रेम का मजाक उड़ाना हो। प्रेमी तब तक प्रेमी नहीं माना जा सकता जब तक प्रेमिका ने उसका प्रणय निवेदन स्वीकार नहीं किया है। ऐसे में उसका नाम न रोमियो है न ही उसके लक्षण प्रेमी जैसे हैं तब उस पर रोमियो की ताना जड़कर मजाक उड़ाया जा रहा है।  हमारे यहां साहित्य विधा में व्यंजना शैली का बहुत महत्वपूर्ण हैं।  संस्कृति तथा हिन्दी में अनेक महान लेखक तो ऐसे हैं कि उनकी हर रचना तीनों विधाओं में एक साथ पूर्ण लगती है। यह पढ़ने वाले पर है वह कितना प्रखर है?  सजग पाठक हमेशा व्यंजना शैली में अर्थ लेता है क्योंकि वही उसके व्यक्तित्व निर्माण में सहायक होती है। वह इस तरह रचना को पढ़ता है जैसे वह उसमें से अपने लिये ज्ञान बढ़ा सके।  जहां हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान की बात करें तो यहां अध्यात्मिक रूप से राधा कृष्ण का प्रेम ही सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है। इस प्रेम की व्याख्या तीनों विधाओं में होती है तो अध्यात्मिक ज्ञानी भी इसके पवित्र भाव की व्याख्या करते हैं।
              सीधी बात कहें तो उत्तरप्रदेश में रोमियो शब्द से आशय उन लोगों की तरफ है जो इकतरफा प्रेम की चाहत में लड़कियों को परेशान करते हैं और व्यंजना विधा में इसे एंटरोमियो अभियान नाम दिया गया है। इसके शाब्दिक या लाक्षणिक अर्थों पर बहस एक बकवास लगती है। हालांकि इस बहाने प्रगति तथा उलटपंथी यह बताना नहीं भूल रहे कि वह विदेशी साहित्य के महान ज्ञाता है।
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                      पहले भारत फिर अमेरिका और अब उत्तरप्रदेश में सत्तापरिवर्तन ने पाक के मीडिया को भारी बेचैन कर दिया है। हैरानी इस बात की है कि जिस हिन्दू धर्म या संस्कृति का अपना नंबर एक दुश्मन मानते हैं वह स्वाभाविक रूप से उसका हिस्सा हैं पर स्वयं को अरेबिक संस्कृति से जुड़ा दिखना चाहते हैं। बात धर्म की करते हैं पर उनको यह मालुम नहीं कि एक अरबी और एक हिन्दू जब आपस में कहीं मिलेंगे तो वह धर्म की बजाय अन्य विषयों पर स्वाभाविक विचार विमर्श करते हें। अरब की धार्मिक विचाराधारा के पाकिस्तानी अनुयायी इस भ्रम में है कि उनकी संस्कृति भी अरबी है या होना चाहिये-अरब वाले इनको अरेबिक मानते नहीं और यह स्वयं को हिन्दू कहना नहीं चाहते। इस अंतर्द्वंद्व ने पाकिस्तानियों की मानसिक रूप से वहां के विद्वानों को भी विक्षिप्त कर दिया है।  वहां का उदार विचारक भी भी हिन्दू के प्रति सद्भाव दिखाने में हिचकता है्र्र-वह भी हिन्दू संस्कृति के उज्जवल पक्ष को नहीं देखता। पाकिस्तानियों को विचार विमर्श देखकर हमें लगता है कि हमें कभी उनसे सद्भाव की आशा नहीं करना चाहिये।

Saturday, March 11, 2017

चुनाव परिणाम पर जाति, धर्म तथा भाषा की दृष्टि से विचार करना गलत-हिन्दी संपादकीय (Religion,Cast amd Languvase not Effect on Election-HindiEditorial)


                                भारत के पांच राज्यों में चुनाव होने के बाद देशभर में प्रचार परिणामों का विश्लेषण परंपरागत ढंग से  सतही रूप से समाज को जातिपाति, धर्म तथा भाषायी  आधार पार बांटकर कर रहे हैं। कम से कम फेसबुक पर यह उम्मीद तो करते हैं कि यहां सक्रिय मित्र जनमानस का सही विश्लेषण करेंगे पर लगता नहीं कि ऐसा हो रहा है। भक्तगण उत्तर प्रदेश में अपने दल की जीत पर सीना फुला रहे हैं। वहां के मुस्लिम मतदाताओं को वह जिस तरह देखते हैं उस पर हमें आपत्ति होती है। हम स्वयं भारतीय अध्यत्मिकवादी हैं पर जब सांसरिक विषय में अपना हित सार देखते हैं। इसी कारण हमारा मानना है कि आमतौर से भारतीय धार्मिक, जातीय तथा भाषायी समूहों में बंधे रहना पसंद करते हैं पर जब राज्य प्रबंध का विषय हो तो वह केवल इस आशा से मतदान करते हैं कि उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये बेहतर सड़कें, शुद्ध पानी तथा नियमित बिजली के लिये बेहतर राज्य प्रबंध की आशा करते हैं।
                     आजादी के बाद से ही देश में राजनीति, पत्रकारिता तथा अन्य जनसंपर्कीय क्षेत्रों में ऐसे लोग सक्रिय रहे हैं जो पूरे समाज को सतही दृष्टि से देखकर यह मानते हैं कि वह गहन चिंत्तक हैं-वह स्वयं आमजन की बजाय एक विद्वान की तरह सोचने के साथ ही बोलते और लिखते दिखना चाहते हैं जिससे सब गड़बड़ हो जाता है। समस्या यह है कि भक्तों का विद्वान समूह उनका विरोध तो करता है पर उसकी विचारशैली कमोबेश उन जैसी ही है-यही से ही हम जैसे अध्यात्मिक चिंत्तकों की राह उनसे अलग हो जाती है। पांच राज्यों में लोगों ने मतदान बेहतर राज्य प्रबंध की आशा से किया है। कट्टर भारतीय अध्यात्मिकवादी होने के बावजूद हम कहते हैं कि चाहे भी जिस भाषा, जाति, धर्म या वैचारिक समुदाय का सदस्य हो उसने अपनी प्रतिबद्धता केवल राज्य से दिखाई है।
               भारत में वैचारिक धाराओं का प्रवाह सदैव ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों ने ही किया है। अनेक राजाओं ने भी राजधर्म का निर्वाह कर लोगों को अभिभूत किया पर उनकी प्रतिष्ठा किसी विचारधारा की वजह से नहीं होती। हम भगवान राम की बात करते हैं पर उनकी छवि भी अध्यात्मिक तत्व की प्रबलता के कारण है-उन्होंने राज्य का त्याग कर एक ऐसी छवि बनायी जिसका उदाहरण नहीं मिलता। भगवान कृष्ण भी अध्यात्मिक तत्व के कारण पूजे जाते हैं न कि द्वारका के राजा होने के कारण उन्हें भगवान कहा जाता है। मूल बात यह है कि राजसी विषय में सात्विक तत्व के साथ काम करना चाहिये पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि देवों की तरह पुजने के लिये प्रचार में रत रहा जाये। हमारा मानना है कि आम भारतीय जनमानस अन्य देशों की अपेक्षा अधिक अध्यात्मिक तत्व से भरपूर है। अतः यहां जात पात या धर्म के आधार पर मतदान होने की बात कहना स्वयं को धोखा देना है।
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लेखक एवं कवि-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप,
ग्वालियर मध्यप्रदेश
writer and poet-Deepak raj kukreja "Bharatdeep",Gwalior madhya pradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक ‘भारतदीप’,ग्वालियर   

athor and editor-Deepak  "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Wednesday, March 8, 2017

प्रचार में बगदादी तब तक रहेगा जब कोई दूसरा विज्ञापन बिकवाने नहीं आ जाता-हिंदी संपादकीय (Baghdadi bagdadi and osama bin laden nececsary for world media with indian News Chainal-Hindi Editorial)

                 ओसामा बिन लादेन तब तक प्रचार में जिंदा रहा जब तक प्रचार प्रबंधकों को यह लगा कि वह उनके लिये समाचारों पर सनसनी बनाये रखने के लिये उसका नाम जीवंत होना जरूरी है। जब बगदादी का नाम स्थापित हो गया तब उसे पाकिस्तान के एबटाबाद में एकाउंटर में उसे मरा बताया। लादेन को कितनी बार मीडिया ने मरा बताकर फिर उसे जिंदा बताया।  अब यही हाल बगदादी का है। उसे कम से कम दस बार मृत घोषित कर फिर उसे जीवित बताकर लगातार सनसनी बिक रही है। हमें तो लगता है कि बगदादी नाम का कोई व्यक्ति ऐसा हुआ ही नहीं होगा जो इतना बड़ा आतंकवादी संगठन चलाये। इराक, सीरिया तथा लीबिया में सरकारों के पतन से वहां अपराधी गिरोह बन गये होंगे जिन्हें अमेरिका, रूस तथा अन्य राष्ट्र हथियार राजस्व कमाते हैं-अब यह सिद्ध भी हुआ है कि वहां अमेरिका तथा रूस कहीं न कहीं आतंकवादियों के सहायक हैं। हमारा तो मानना है कि लादेन भी बहुत पहले मारा गया था पर जब बगदादी का अभ्युदय तब उसे मरा बताया। अब बगदादी भी तब तक रहेगा जब कोई तीसरा नहीं आ जाता।
        इस पूरे विश्व पर ‘प’ समूह-पूंजीपति, प्रचारक, प्रबंध तथा पतितों के मिलेजुले संगठन-चला रहे हैं। पूंजीपति  पतितों  की आड़ में अपने धंधे चलाते हैं तो उनका भय दिखाकर अपनी ताकत प्रचार माध्यमों में दिखाते हैं। इतना ही नहीं इनकी ताकत इतनी ज्यादा है कि अनेक जगह राज्यप्रबंधक भी इनका साथ निभाते हैं।  इसलिये ओसामा बिन लादेन हो या बगदादी या अन्य खलनायक इतने खूंखार, चतुर और बाहूबली न हों जितने बताये जाते हैं। मजे की बात यह कि ऐसे लोग कहीं न कहीं कभी किसी देश के राज्य प्रबंधकों के सपंर्क रखते हैं और बाद में उनमें बिगाड़ होने पर निशाना बनते हैं। इनका नाम पहले खलनायक की तरह पकाया जाता है ताकि कोई नायक उसे खाकर प्रचार माध्यमों  में विज्ञापन प्रसारण के बीच समाचार बनाता है।  कम से कम हम जैसे चिंतक तो यही सोचते हैं।

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