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Friday, July 31, 2015

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी का हार्दिक अभिनंदन(guru purnima par sabhi ka hardik abhinandan)


                    आज 31 जुलाई 2015 गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरे देश में मनाया जा रहा है। किसी भी मनुष्य के लिये अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये अपनी  इंद्रियों को निरंतर सक्रिय रखना पड़ता है।  उसे दर्शन, श्रवण अध्ययन, चिंत्तन और मनन के साथ ही अनुसंधान कर इस संसार के भौतिक तथा अध्यात्मिक दोनों तत्वों का ज्ञान करना चाहिये।  भौतिक तत्वों का ज्ञान देने वाले तो बहुत मिल जाते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान समझाने वाले गुरु बहुत कठिनाई से मिलते हैं। यहां तक कि जिन पेशेवर धार्मिक प्रवचनकारों को गुरु माना जाता है वह भी धन या शुल्क लेकर उस श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान रटकर सुनाते हैं जो निष्काम कर्म का अनुपम सिद्धांत बताती है।  उनके दर्शन और और वचन श्रवण का प्रभाव कामनाओं की अग्नि में जलकर नष्ट हो जाता है।
                    ऐसे मेें अपने प्राचीन ग्रथों का अध्ययन कर ही ज्ञानार्जन करना श्रेष्ठ  लगता है। श्रीमद्भागवत गीता को अध्ययन करते समय यह अनुुभूति करना चाहिये कि हम अपने गुरु के शब्द ही पढ़ रहे हैं। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में गंुरू की महिमा बताई गयी है पर पेशेवर ज्ञानी केवल दैहिक या भौतिक आधारों तक ही सीमित रखकर अपनी पूजा करवाते हैं। इस संबंध में हमारे एक आदर्श शिष्य के रूप में एकलव्य का उदाहरण हमेशा विद्यमान रहता  है, जिन्होंने गुरू द्रोणाचार्य की प्रस्तर प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या सीखी।  इसका सीधा अर्थ यही है कि केवल देहधारी गुरु होना ही आवश्यक नहीं है।  जिस तरह प्रतिमा गुरु बन सकती है उसी तरह पवित्र शब्द ज्ञान से सुसज्जित ग्रंथ भी हृदय से अध्ययन करने पर हमारे गुरु बन जाते हैं।  एक बात तय रही कि इस संसार में विषयों के विष का प्रहार अध्यात्मिक ज्ञान के अमृत से ही झेला जा सकता है और उसके लिये कोई गुरु-व्यक्ति, प्रतिमा और किताब होना आवश्यक है।
                    इस पावन पर्व पर सहयोगी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकोें, फेसबुक और ट्विटर के अनुयायियों के साथ ही  भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा मानने वाले सभी सहृदय जनों को हार्दिक बधाई।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Tuesday, July 28, 2015

गुरदासपुर हमलाः 10-15 वर्ष में सीमा पार जाकर पाक को सबक सिखाना होगा(gurdaspur Attack::10-15varsh mein seema par jakar pakistan ko samjhana hoga)

               
                              गुरदासपुर में हुआ पाकिस्तानी प्रायोजित हमला बहुत गंभीर है-यह सभी मान रहे हैं पर ऐसे हमले आगे न हों इसका स्थाई उपाय करने की बात पर सभी खामोश हो जाते हैं। सन् 1971 के बाद भारतीय सेना ने सीमा पार जाकर पाकिस्तान को सबक नहीं सिखाया  है जबकि इसकी आवश्यकता लंबे समय से अनुभव की जा रही है-कारगिल युद्ध में भारत ने सीमा पार नहीं की इसका पाकिस्तान इसे भारत की कमजोरी समझ रहा है। पाकिस्तान सीना तानकर कहता है कि उसके पास परमाणु बम है और वह युद्ध में परंपरागत हथियारों की बजाय उसका इस्तेमाल करेगा। भारत के रणनीतिकार इस धमकी पर खामोश हो जाते हैं।  निष्पक्ष अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक कह चुके हैं कि पाकिस्तान के परमाणु बम से भारत का जो होगा सो होगा पर जवाबी कार्यवाही में पाकिस्तान का अस्तित्व मिट जायेगा। पाकिस्तान के अस्तित्व मिटने की बात पर वहां से ज्यादा भारत के रणनीतिक विशारद ज्यादा घबड़ाते हैं।  उनका मानना है कि पाकिस्तान का अस्तित्व बना रहना भारत के हित में है। अगर उनकी बात सही माने तो उन्हें यह भी समझना चाहिये कि कम से कम दस वर्ष में एक बार सीमा पार जाकर पाकिस्तान को सबक सिखाते रहना जरूरी होगा।  वह लातों का भूत है बातों से नहीं मानेगा।
                              जहां तक पाकिस्तान के अस्तित्व का प्रश्न है पाकिस्तान के रणनीतिकार इसके लिये कम चिंतित नहीं होंगे। परमाणु बम हमले की धमकी देते जरूर हैं पर उनको पता है कि अंततः सबसे बुरे नतीजे उन्हें भी भोगने होंगे। जिस तरह भारत के सुविधा भोगी युद्ध के नाम से सिहरते हैं उसी तरह पाकिस्तान के सुविधाभोगी रणनीतिकार भी कम विचलित नहीं होंगे।  थोड़ी मार झेलकर उन्हें खामोश होना ही होगा।  इस थोड़ी मार से सीधा आशय यही है कि दस पंद्रह वर्ष में एक बार भारतीय सेना पंजाब से बाघा सीमा या गुजरात के कच्छ के रण से एक बार निकल कर पाकिस्तान को ठोके।  रहा परमाणु बम का सवाल तो पाकिस्तान कोई अमेरिका नहीं कि बम फैंक ही लेगा और भारत भी कोई जापान जैसा छोटा देश नहीं है कि दो चार परमाणु बम खाकर चुप बैठ जायेगा।  वैसे भी अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ अक्सर पाकिस्तान को समझाते हैं कि पाकिस्तान जब भारत पर परमाणु बम फैंकने की सोचगा तब तक भारत उसे पहले ही अपने परमाणु बम उपहार में आकाश से प्रस्तुत  कर इस तरह कृतार्थ करेगा कि वह उठ ही नहीं जायेगा-पाकिस्तान बचेगा ही नहीं कि वह परमाणु बम फैंके।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Friday, July 24, 2015

समाज के संकट पर शोध जरूरी-हिन्दी चिंत्तन लेख(samaj ke sankar par shodh jaroori-hindi thought article)

                                                आज के समाज का संकट के सामने क्यों खड़ा है इस पर कोई शोध नहीं करता। हर कोई अपना बखान कर रहा है पर सार्थक चर्चा नहीं हो्र पाती। बहुत समय पहले एक मित्र ने कहा था कि इस देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि भले काम का ठेका भी ऐसे लोग ले रहे हैं जो कभी यह सोचते भी नहीं कि किसी का भला करना चाहिये।
                              यह हमें बात इतनी सही लगी कि हमारे लेखन का अभिन्न हिस्सा बन गयी।  वह मित्र हमसे उम्र में करीब पंद्रह वर्ष बड़ा था पर लेखक होने के नाते अक्सर चर्चा होती थी। उसने ही यह भी समझाया था कि हमें किसी भी विषय पर केवल प्रचार माध्यमों में आधिकारिक रूप से प्रकाशित हो रही खबरों को जस की तरह नहीं मान लेना चाहिये।  दूर की छोड़ो  अपने ही इर्दगिर्द अनेक ऐसे आपराधिक घटनायें  देख सकते हैं जिनके बारे में हमारी जानकारी इन प्रचार माध्यमों से दी गयी आधिकारिक सूचना से अलग होती है। हमारे एक गुरु जो पत्रकार थे उन्होंने भी करीब करीब यही बात कही थी।  इन दोनों महानुभावों की वजह से हम किसी भी घटना पर वैसा नहीं सोचते जैसा कि अन्य करते हैं।
                              हम अब तो अपनी सोच का विस्तार यहां तक देख रहे हैं कि निहायत पाखंडी लोग भलाई के व्यापार में लगे हुए है और विज्ञापन तथा प्रचार के सहारे सामान्य समाज में अपनी छवि धवल बनाते हैं।  उससे भी बड़ी समस्या यह कि भले लोग भय से इन्हीं कथित धवल छवि वालों की अदाओं पर तालियां बजाते हैं।  वह मौन भी नहीं रहते इस आशंका से कहीं इन दुष्टों की पता नहीं कब जरूरत पड़ जाये।  हमारे यहां समाज का वातावरण ही ऐसा हो गया है कि लोग भले लोगों की संगत में समय खराब करने की बजाय दुष्टों को दबंग मानकर उनके प्रति सद्भाव दिखाते हैं।
                              कहा जाता है कि हमारे समाज का संकट यह नहीं कि दुष्ट सक्रिय हैं वरन् यह भी है कि सज्जन लोग निष्क्रिय हैं।  वैसे तो यह भी देखा  जाता है कि सज्जन लोगों का संगठन सहजता से नहीं बनता जबकि दुष्ट लोग स्वार्थ के आधार पर जल्दी संगठन बना लेेते हैं। संभवतः यह मानवीय स्वभाव है कि स्वार्थ से लोग एक दूसरे से सहजता से जुड़ जाते हैं और परमार्थ के समय सभी अकेले होते हैं।  हालांकि आजकल भौतिकता के प्रभाव के कारण लोगो की चिंत्तन क्षमता केवल संपन्न और प्रतिष्ठित लोगों की तरफ केंद्रित हो गयी है। कोई किसी क चरित्र पर विचार नहीं करता और यही समाज के संकट का कारण है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, July 20, 2015

अफवाह और सच-लघु हास्य व्यंग्य(afawaf aur sach-hindi comdey satire article)


               हमारे देश में अफवाहें संभवतः ऐसे लोग यह सोचकर प्रायोजित करते हैं कि अभी तक समाज के सामान्य लोगों की सोच अभी भी मृतप्रायः है या फिर उनमें चेतना आ गयी है।  जब वह जान लेते हैं कि अभी लोग गुलामी की मानसिकता में है तो वह शराब, जुआ तथा अन्य गंदे व्यवसायों में नये प्रयोग करते हैं ताकि अधिक से अधिक कमा सकें। अभी एक अफवाह फैली हुई है कि कोई जिन्न पत्थर की उपयोग में आने वाली वस्तुओं को खराब कर रहा है जिससे उसमें विष फैल जाता है।  अनेक लोग तमाम कहानियां सुना रहे हैं।  हैरानी इस बात की है कि पढ़े लिखे लोग भी चर्चायें कर एक तरह से इस अफवाह को प्रचारित ही कर रहे हैं। किसी ने बताया कि वर्षा के दिनों एक कीड़ा पैदा होता है जो कैल्शियम का भोजन करता है। हमारे देश के शहरों में अब पत्थरों के मकान नहीं होते अलबत्ते चक्की या सिल्वटा होता हैं इसलिये वह उन्हें चाटता है जिससे निशान बन जाते हैं।
            एक ने सवाल किया कि कितनी अजीब बात है कि कुछ लोग इंतजार करते हैं कि कोई दूध देने उनके घर पर आये पर शराब खरीदने स्वयं बाज़ार में दुकान पर लाईन में लगते हैं।’’
                    दूसरा कुछ देर सोचने लगा और फिर बोला-‘‘ अभी कोई अफवाह फैली है कि कोई जिन्न पत्थर की चक्की में मुंह मारता है।  कोई आदमी उसकी आवाज सुनकर कुछ कहता है तो वह स्वयं पत्थर का बन जाता है। ऐसी बेतुकी अफवाओं की जगह कोई ऐसी क्यों नही फैलाता कि कहीं कहीं शराब की बोतल से जिन्न निकलकर आदमी को खा जाता है। तब तो मजा आ जाये।’’
                 वहां तीसरा भी खड़ा था वह बोला-‘‘शराब से जिन्न निकलने की  अफवाह फैलाने वालों को प्रायोजित कौन करेगा? यहां मुफ्त में कोई अफवाह नहीं फैलाता। दूध गरीब बेचता है इसलिये घर आता है पर शराब बेचने वाले दमदार होते हैं इसलिये लोग उनकी दुकान पर जाते हैं। रही बोतल से जिन्न की अफवाह फैलाने की बात तो यकीन मानो उसे शराबी ही ठिकाने लगा देंगे या वह ऐसी हालत में आ जायेगा कि शराब पीकर ही अपना गम मिटायेगा।
                              बहरहाल हमारा मानना है कि इस तरह की अफवाहों पर चर्चा करना ही अफवाह को आगे बढ़ाने में सहायक होती है इसलिये उससे बचना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, July 18, 2015

नेकी कर दरिया में डाल का सिद्धांत आंनददायक-हिन्दी चिंत्तन लेख(neki kar dariya mein dal-hindi religion thoght article)

                                                  अनेक लोग शिकायत करते हैं कि उन्होंनें किसी की मदद की तो उसने वादा नहीं निभाया। अनेक कहते हैं कि अमुक आदमी ने उनका भरोसा तोड़ा। भरोसे का संकट मनुष्य समाज में रहता ही है। एक आदमी पर कब तक भरोसा किया जा सकता है कि वह अपनी बात पर खरा उतरेगाजब तक वह अपनी जिम्मेदारी पर लिये गये काम को करने का वादा करता रहे भले ही इस संबंध में कुछ करता न दिखे या उसके काम करने की अवधि निकल जाये या फिर तब तक जब तक हम सुनते हुए बोर न हो जायें। सबसे बेहतर यह कि यह मान लिया जाये कि भरोसा वैसे ही टूटता है जैसे वादा मुकरने के लिये किया जाता है। जिसे काम करना है वह वादा नहंी करता। जो मदद करता है वह ढिंढोरा नहीं पीटता।  गरजने वाले बादल कभी बरसते नहीं-यह सिद्धांत मान लें तो कभी कष्ट ही न हो।
                              इस संबंध में एक कथा आती है कि एक आदमी फल तोड़ने के लिये पेड़ पर चढ़ गया।  फल तो उसने तोड़ा पर अब सवाल यह आया कि नीचे उतरे कैसेवह भगवान से प्रार्थना करने लगा कि हे भगवानकिसी तरह इस पेड़ से उतर तो मैं दस रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा।
                              वह थोड़ा उतरा तो पांच रुपये फिर सवा रुपये और जब पूरी तरह उतर गया तो कहने लगा किकाहे का प्रसाद चढ़ाऊंजब मै पेड़ पर चढ़ा ही स्वयं था तो उतरना कौनसी बड़ी बात थी?’’
                              पुरानी कहानियां में हमेशा कोई न कोई संदेश रहता है। यह कहानी मानवीय स्वभाव की स्थिति को बयान करती है।  जब व्यक्ति संकट में होता है या उसका ऐसा काम फंसा रहता है जिसे स्वयं नहीं कर सकता तब वह मासूमियत से इधर उधर देखता है कि कोई उसकी मदद करे। इस प्रयास में वह जिससे मदद की आशा करता है उससे तमाम तरह की प्रार्थना करने के साथ ही प्रलोभन भी देता है।  काम निकलने के बाद वह वादा पूरा करेगा या नहींकरेगा तो अपने कथन के अनुसार या नहींइस पर विश्वास करना कठिन है। नही करता तो मदद करने वाला आदमी निराश होता है पर ज्ञानियों के लिये यह समस्या नहीं होती। वह तो नेकी कर दरिया में डाल के सिद्धांत पर चलते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, July 16, 2015

अपने भोजन पर भी विचार करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(apne bhojan par bhi vichar karen-hindi thought article)

                                                        
                              हमारे देश में लोग भोजन की बात तो करते हैं पर उसे ग्रहण करने का तरीके और पचाने की शक्ति पर कभी विचार नहीं करते। हम भोजन में कब, क्या और कितना खायें-यह सवाल अनेक लोगों को परेशान करता है। अनेक लोग तो अपने से सवाल पूछकर ही स्वयं से ही कन्नी काट जाते हैं।  हमारा मानना है कि पेट में ऐसे ही भरें जैसे स्कूटर या गाड़ी में उतना ही ईंधन भरवाते हैं जितना टंकी में आता है। अंतर इतना है कि अगर उनकी टंकी में ज्यादा पेट्रोल भरा जाये तो वह बाहर फैल जाता है और उसे कपड़े से साफ किया जा सकता है पर अगर पेट में भरा ईंधन फैला तो वह शरीर में ही इधर उधर फैलता है जिसे साफ करना कठिन है। कालांतर में यही अति भोजन बीमारियों का कारण बनता है।
                              आजकल स्थिति यह हो गयी है कि लोग भोजन के बारे में कम अपने लिये धन संपदा अर्जन पर अधिक मानसिक ऊर्जा नष्ट करते हैं।  परंपरागत घरेलू रोटी सब्जी की जगह बाज़ार में चटकदार मसाले का खाना चाहते हैं। उससे भी ज्यादा मैदे के बने पिज्जा तथा अन्य सामग्री सामान्य लोगों के लिये प्रिय भोजन बनता जा रहा है। परिणाम हम देख ही रहे हैं कि आजकल अस्पताल पांच सितारानुमा बन गये हैं।  उनके बाहर की नामपट्टिका भी संस्कृत के मधुर शब्दों-आस्था, संस्कार, संजीवनी आदि-से सजी हुई हैं।  अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति से किसी  बीमारी का इलाज नहीं होता पर इसके सहारे रहने वाले चिकित्सक भारी पैसा कमा रहे हैं।
                              हर व्यक्ति दावा करता है कि वह स्वयं परिवार तथा रोटी के लिये कमा रहा है पर उसी के प्रति वह गंभीर नहीं दिखता। लोग खाने का बाहरी आकर्षण और स्वाद देखते हैं यह जानना ही नहीं चाहते  कि उनके हाथ से उदरस्थ सामग्री सुपाच्य है कि नहीं।  खासतौर से शादी आदि समारोह  में लोगों की यह दिलचस्पी ही खत्म हो गयी है कि वह जो खा रहे हैं कि उससे उसे वह पचा पायेंगे कि नहीं। कई घंटे पहले रखा सलाद खा लेते हैं जिसके खराब होने की पूरी आशंका रहती है।
                              सबसे बड़ी बात यह है कि खाने के बाद आदमी में जो संतोष का भाव होना चाहिये उसकी अनुभूति करना ही भुला दिया गया है।  कहा जाता है कि भोजन प्रसाद की ग्रहण करना चाहिये। यह भी कहा जाता है कि प्रसाद भोजन की तरह नहीं लेना चाहिये। लोगों खाने पीने में किसी नियम का पालन नहीं कर रहे।  हमारा मानना है कि भोजन शांत भाव से ग्रहण करते हुए सर्वशक्तिमान का इस बात के लिये मन ही मन धन्यवाद देना चाहिये कि उसने हमें न केवल वह दिया वरन् हमें पचाने की शक्ति भी दी।                        
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, July 11, 2015

आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में स्वदेशी विचाराधारा का मार्ग ही श्रेष्ठ(arthik samajik tathaa dharmik kshitra mein swadeshi vichardhara ka marg hee shreshth)

                              विश्व में अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं के दबाव में जब से कथित उदारीकरण का दौर प्रारंभ हुआ है तब से अनेक देशों पर जनकल्याण कार्यों से दूर हटने का दबाव बढ़ गया है। ग्रीस यानि यूनान यानि दुनियां की प्राचीन सभ्यताओं में भारत के समकक्ष देश ने अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था में बदलाव करने से इंकार कर दिया है।  वहां की जनता ने जनमत संग्रह में अपनी सरकार का समर्थन कर यह साबित किया कि वह विश्व से अलग रहना स्वीकार कर सकती है पर अपनी राज व्यवस्था को अस्थिर नहीं कर सकती।  इधर चीन की अर्थव्यवस्था को लेकर भी अनेक संदेह पैदा हो गये हैं क्योंकि वहां का शेयर बाज़ार ढह गया है।
                              हमारा हमेशा मानना रहा है कि भारतीय समाज, अर्थतंत्र तथा धार्मिक व्यवस्था कभी विदेशी सिद्धांतों पर नहीं चल सकती। भारत में राज्य व्यवस्था प्रजा हित के लिये मानी जाती है जबकि पश्चिमी विचारधारायें समाज को टुकड़ों में बांटकर उनका हित करने के सिद्धांत पर आधारित हैं।  अब वह समय आ गया है कि भारत के आर्थिक, रणनीति तथा धार्मिक क्षेत्र पर नियंत्रण करने वाले विद्वान स्वदेशी नीतियों पर विचार करना प्रारंभ कर दें। अनेक सामाजिक तथा इतिहास विशेषज्ञ यूनान और भारतीय सभ्यता को प्राचीन तथा वैज्ञानिक मानते हैं।  यह अलग बात है कि अर्थ, धर्म, कला तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में व्यवसायिक प्रवृत्ति के लोगों ने अनेक बदलाव कर दोनों सभ्याताओं को नष्ट करने का प्रयास किया है। इतना ही संयुक्त राष्ट्र संघ कहने के लिये ही निष्पक्ष है पर उसकी गतिविधियों में  अमेरिका का दबाव स्पष्टतः दिखता है जो विभिन्न देशों पर अनुचित दबाव के रूप में प्रकट होता है।  इतना ही नहीं एक धर्म विशेष के प्रति उसका रुझान भी देखा गया है।
                              देखा जाये तो धर्म का संबंध केवल आचरण से है पर पश्चिम के अनेक लोगों ने सर्वशक्तिमान का मध्यस्थ होने के नाम पर लोगों की बुद्धि हरण करने के लिये व्यवसायिक तथा राजनीतिक दोहन के लिये अव्यवहारिक सिद्धांतों का निर्माण किया। मूलतः राजसी प्रवृत्तियों पर आधार इन पश्चिमी विचारधाराओं में राजा, व्यापारी और अस्त्र शस्त्रधारी को ही समाज का नियंत्रण करने का अधिकार सौंपा गया। जबकि हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हर मनुष्य को स्वविवेक से जीवन जीने का अधिक है।
हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है।  अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली समुदाय यहीं है पर सबसे बड़ी कमी आत्मविश्वास की है जिसके कारण यह पाश्यात्य सभ्यता को पांव पसारने का अवसर मिला है। जिस तरह विश्व में उथल पुथल मची है उसे देखते हुए भारत में अब स्वदेशी आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक विचाराधारा की राह पर चलने का निर्णय लेना ही चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, July 5, 2015

छोटी आयु में बढ़ती मौत पर स्वास्थ्य विशेषज्ञ अनुसंधान करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(chhoti aayu mein badhti maut par swasthya visheshgya anusandhan karen-hindi thought article)

                      आमतौर से बड़ी आयु में मौत होना ही स्वाभाविक माना जाता है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह और अन्य राजरोगों से एक सामान्य मनुष्य एक आयु तक स्वयं ही लड़ लेता है पर बड़ी उम्र होने पर वह हथियार डाल देता है। अब छोटी आयु में मौतें भी अधिक होने लगी हैं जिस पर शायद ही कोई अधिक चिंतित होता हो।  सड़क हादसों में अनेक युवा काल कवलित होते देखे गये हैं।  अगर बड़ी आयु के लोग अपनी स्मरण शक्ति पर बोझ डालें तो उन्हें लगेगा कि अपनी युवा अवस्था से अधिक उम्र के इस पड़ाव अनेक  गोदें सूनी होते देख रहे हैं।   बहरहाल तीस से चालीस के बीच अगर सड़क हादसे की बजाय बीमारी से किसी की मौत हो तो अब भी स्वाभाविक मानना कठिन लगता है पर जिस तरह तंबाकू के पाउचों का प्रचलन हुआ है उस पर अनेक स्वास्थ्य विशेषज्ञ चिंतित हैं। अनेक लोग तो इन पाउचों को धीमे विष जैसा मानते हैं। ऐसे में जागरुक लोगों को इस पर ध्यान देना चाहिये।
                              इस लेखक ने एक चिकित्सक मित्र को एक अस्वस्थ युवक के पिता से यह कहते सुना था किअगर तुम्हारा लड़का इस पाउच का सेवन बंद नहीं करता तो समझ लेना कि वह तुम्हें दुनियां का सबसे बड़ा दर्द देने वाला है।अतः यह जरूरी है कि इस विषय पर गंभीरता से अनुसंधान कर लोगों को जानकारी दी जाये।
                              शायद दस वर्ष पूर्व की बात होगी। इस लेखक के एक मित्र न मात्र 42 वर्ष की उम्र में हृदयाघात से दम तोड़ा होगा।  वह ऐसे पाउचों का सेवन करता था।  उससे एक दो वर्ष पूर्व एक लड़के ने इन पाउचों के सेवन का दुष्परिणाम बताया था। उसने पाउच की पूरी सामग्री एक ग्लास में भरते हुए पानी के साथ ही चार आल्पिनें उसमें डाल दीं। सुबह वह चारों आल्पिने गुम थीं।  मित्र की  मौत के बाद इस लेखन ने कम उम्र में हृदयाघात से मरने वालों की जानकारी लेना प्रारंभ किया।  दस में से सात इसके सेवन में लिप्त पाये गये। पिछले बीस पच्चीस वर्ष से यह पाउच प्रचलन में आया है इसलिये अनेक बड़ी आयु के भी इसका शिकार होते हैं तो बड़ी बात नहीं पर चूंकि उनकी मौत स्वाभाविक मानी जाती है इसलिये कोई चर्चा नहीं करतां।
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ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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