समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Showing posts with label हिन्दू अध्यात्मिक दर्शन. Show all posts
Showing posts with label हिन्दू अध्यात्मिक दर्शन. Show all posts

Wednesday, December 2, 2015

जिसे जिज्ञासा नहीं उसे ज्ञान देना निरर्थक-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख (jise Jigyasa nahin use gyan dena Vrath-Hindu spirituly Thught base on ChankyaNiti)

                             भारतीय पंथ व ज्ञान का प्रचार करने वाले अक्सर पश्चिमी पंथ मानने वालों को अध्यात्मिक दर्शन का उपदेश देकर यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि कोई बडा़ काम कर रहे हैं। हम यह तो नहीं कह सकते कि पश्चिमी पंथ मानने वाले सभी भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परिचित नहीं है पर इतना जरूर देखा है कि अनेक लोगों में यह प्रवृत्ति  है कि वह इसे न समझना अपना गौरव समझते हैं।  हमारे भारतीय दर्शन के अनुसार अध्यात्मिक संस्कार बचपन में पड़ गये तो सही वरना बड़ी उम्र में तो इसकी संभावना नगण्य है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
--------------
अन्तःसारविहीनामुपदेशो न जायते।
मलगाचलसंर्गात् न वेणश्चन्दनायते।।
हिन्दी में भावार्थ-जिसके अंतकरण में सार समझने का अभाव है उसे उपदेश देना व्यर्थ है। वह मलयगिरी के पर्वत की तरह है जहां आने वाली वायु के स्पर्श से भी बांस चंदन नहीं होता।

                             दूसरी बात यह भी देखी गयी है कि भारतीय पंथ के प्रति नकारात्मक भाव तथा पश्चिमी पंथ अपनाकर समाज में प्रथक दिखने की प्रवृत्ति कुछ लोगों में  इस तरह भरी हुई है कि उसे सहजता से नहीं हटाया जा सकता।  इसलिये हमारी भारतीय ज्ञान के प्रचारकों को सलाह है कि वह भारतीय पंथों पर चलने वाले समाज से अधिक संवाद करें क्योंकि हमारी दृष्टि से यह आवश्यक है कि वह सबसे पहले मजबूत बने।
हिन्दुत्व को चुनौती देने वाले गलत-ट्विटर पर टिप्पणियां
---------------
 ताज्जृब जिस हिन्दुत्व का आधार वह गीता है जो चार प्रकार के भक्त तथा तीन प्रकार की भक्ति का अस्तित्व स्वीकार करने का संदेश देती है उसे ही असहिष्णु बताया जा रहा है।  श्रीमद्भागवत्गीता को हर हिन्दू मानता है इसलिये किसी भी भक्त के आराधित इष्ट रूप तथा उसकी भक्ति के पंथ पर टिप्पणी नहीं करता।  उस हिन्दू तथा उसके हिन्दुत्व को वह लोग चुनौती दे रहे हैं जिन्होंने धनदाताओं के अनुसार अपनी कलम से  शब्द रचने के साथ ही मंचों पर  मुख से बोले। एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि वैश्विक आतंकवाद को वैचारिक आधार पर केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। जिन्हें यह टिप्पणी पसंद नहंी है तो वह बतायें कि क्या रामायण, श्रीमद्भागत तथा वेद का अध्ययन करने वाले किसी व्यक्ति ने आतंकवाद का रुख किया है?
-------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Tuesday, November 24, 2015

अंगों के अनुष्ठान से ही ज्ञान प्राप्त होता है-योगसाधना पर विशेष लेख (Angon ke anushtan se gyan prapta hota hai-A Special article on Yoga Yogsadhna)


                       भारत संभवतः अपने संपूर्ण अध्यात्मिक ज्ञान के कारण विश्व गुरु माना जाता है।  इसके अनुसार जब तक देह, मन और विचार के विकार नहीं निकलेंगे तब तककिसी भी प्रकार की भक्ति या साधना हार्दिक भाव से नहीं हो सकती।  हमारे अनेक पेशेवर धार्मिक विद्वान लोगों को काम, का्रेध, मोह, लोभ तथा अहंकार के दुर्गुण त्याग कर भक्ति करने का संदेश देते हैं जबकि वह स्वयं ही अपने शिष्यों से दान, चंदा तथा अन्य प्रकार की ऐसी सेवायें भी लेते हैं जिसके लिये उन्हें दाम देना नहीं देना पड़ता। हमने अनेक ऐसे पेशेवर विद्वान भी देखे हैं जो योग साधना को केवल दैहिक साधना प्रचारित कर अपने शिष्यों को भ्रमित करते हैं।

पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है कि
-----------------
योगाङ्गनुष्ठादशुद्धक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
                       हिन्दी मे भावार्थ-योग से अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का क्षरण होता है जिससे ज्ञान का प्रकाश होने से विवेक की प्राप्ति होती है।
                       योग साधना के आठ भाग हैं जिसमें आसन तथा प्राणायाम दो भाग मात्र हैं। छह अन्य भाग-यम, नियम, प्रत्याहार, ध्यान और समाधि-का प्रचार कम होता है पर यह सब भी योग साधना का महत्वपूर्ण भाग हैं। समाधि भक्ति का सर्वोच्च स्तर है जिसमें आत्मा ही परमात्मा रूप हो जाता है। अगर कोई साधना और अभ्यास से योग में पूर्णता प्राप्त कर  लेता है तो वह किसी व्यक्ति, विषय तथा वस्तु के प्रति आकर्षित नहीं होता जबकि पेशेवर विद्वान लोगों का ध्यान अपनी तरफ बनाये रखने के लिये तमाम तरह के स्वांग रचते हैं। इतना ही नहीं अनेक आश्रम में ही व्यवसाय करते हुए लोगों को न केवल सांसरिक विषयों के मंत्र जपाते के साथ ही  दैहिक विकारों के लिये इलाज भी बताते हैं।
                       हम पतंजलि योग का अध्ययन स्वयं करें तो पायेंगे कि निरंतर अभ्यास करने से जहां दैहिक विकार कभी घर नहीं करते वहीं मानसिक तथा वैचारिक रूप से भी दृढ़ता आती हैं। अनेक व्यसनों में रत रहते हुए विकारग्रस्त होने के बाद योग साधना को ही अपना नशा बताने वाले हमारे मित्र ने हमसे यह बात कहीं।
---------------

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकाएं