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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Sunday, July 17, 2016

कश्मीरी जनमानस अलगावादियों से दूरी बनाये तो ही बेहतर होगा-हिन्दी लेख (Kashmir Public and India-Hindi editorial on Kashmir Politics)

                       कश्मीर की स्थिति के बारे में अनेक लोग अपने अपने दृष्टिकोण से राय दे रहे हैं।  अनेक लोग दावा करते हैं कि वह वहां की वास्तविक सत्यता से परिचित हैं जिससे सरकार नहीं जानती।  यह लोग वहां सेना की उपस्थिति पर सवाल उठाकर मानवाधिकारों के संरक्षक बनते हैं।  अभी तक इनकी दाल गल रही थी पर लगता नहीं कि अब इनके प्रपंच अधिक चलेंगे।
हमारी दृष्टि से कश्मीर का जनसामान्य अपनी निष्क्रियता के कारण ऐसे तत्वों की उपेक्षा करने में नाकाम रहा है जो वास्तव में उसके लिये ही खतरनाक हैं।  कश्मीर की अर्थव्यवस्था में पर्यटन व्यवसाय का अधिक योगदान है जिस कारण वहां के स्थानीय निवासियों  की नियमित आय में कमी नहीं होती। यही कारण है कि कथित अलगाववादियों के आह्वान पर वह दुकानें बंद कर बैठ जाते हैं। हर शुक्रवार को धार्मिक स्थानों पर भीड़ की उपस्थिति का लाभ उठाकर अलगाववादी सरकार के विरुद्ध विषवमन करते हैं। अगर हम यह माने कि जनमानस उनके साथ है तो प्रश्न यह उठता है कि चुनावों में 70 फीसदी मतदान कैसे हो जाता है? तय बात है कि अलगाववादियों का ज्यादा प्रभाव नहीं है पर उनके छुट्टी बनाने का अवसर भी नियमित कमाई वाला जनमानस चूकता नहीं है-यही सोचकर कि वह भले ही कथित आजादी का समर्थक न हो पर दिखे जरूर ताकि कोई आपत्ति न उठाये। 
अब जिस तरह 10 दिन से कश्मीर घाटी में कर्फ्यू लागू है उससे वहां के व्यवसायियों के लिये चिंत्ताजनक होगा।  संभव है उनका सरकार के प्रति गुस्सा हो पर अब उन्हें उन अलगाववादियों से भी सवाल करने ही होंगे कि वह अपने बच्चों को तो अच्छे भविष्य के लिये बाहर भेजते हैं जबकि अन्य युवकों हिंसा के लिये उकसाते हैं। कुछ सामान्य कश्मीरियों के मन में यह बात अगर हो कि पश्चिमी देश मानवाधिकारों के नाम पर कभी भारत सरकार पर दबाव बनायेंगे तो भूल जायें क्योंकि वह भी अब आतंकवाद के ऐसे दौर में पहुंच गये हैं जहां से निकट भविष्य में उनका निकलना कठिन है। कश्मीर में तीस चालीस लोग किश्तों में ही मरे दस दिन हो गये हैं जबकि इसी बीच पश्चिम में फ्रांस व तुर्की में एक ही दिन की  हिंसा में उससे दुगुने लोग मर चुकें हैं और विश्व प्रचार माध्यम उन्हीं में व्यस्त हैं-कश्मीर उनके लिये एक छोटी खबर की तरह चल रहा है। पाकिस्तान की अंदरूनी हालत देखने के बाद भी यह चंद कश्मीरी अगर यह सोचते हैं कि वह विश्व मंच पर साथ देकर बचायेगा तो यह भ्रम भी छोड़ दें क्योंकि भारत उसकी हर चाल नाकाम कर देगा। महत्वपूर्ण यह कि एक बार अगर कश्मीर के पर्यटन व्यवसाय का क्रम रुका तो फिर दोबारा बनना कठिन होगा। इसलिये बेहतर होगा कि सामान्य जनमानस अपनी मानसिकता में बदलाव लाये। 
आखिरी बात यह कि 1500 के लगभग सुरक्षा सैनिकों को पत्थरों से घायल करने वालों पर आखिर क्या बरसाना चाहिये? गुलाब के फूल! जान लेने वाली गोली नहीं मारें! नहीं मार रहे। घायल करने वाली गोलियां भी न बरसायें क्या? जिन्हें मानवता की चिंता है वह स्वयं सैनिकों के आगे जाकर इन लोगों का सामना करें? तब पता लग जायेगा कि सामने से आता पत्थर कितना घाव दे सकता है।
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Wednesday, July 6, 2016

राजसी कर्म में फल की प्रधानता होती है-हिन्दी चिंत्तन लेख(Hindu Religion thought Article On Society)

                    आप अगर सात्विक हैं पर ज्ञानी नहीं तो आपका राजसी कर्म उस रूप में फलीभूत नहीं रह सकता जिस तरह चाहते हैं। इस संसार में कर्म तीन प्रकार हैं होते है-सात्विक, राजसी तथा तामसिक। इसमें राजसी कर्म में कर्म व फल का भौतिक सिद्धांत चलता है जिसमें कल्पना या आदर्श ढूंढना अज्ञान ही कहा जा सकता है।
                1.राजसी कर्म में संलिप्त लोगों में फल की कामना होती है और जब वह आपका सहयोग करें तो कार्य संपन्न होने पर पुरस्कृत अवश्य करें।
                     2. हम यह कभी मानकर न चलें कि सात्विक व्यक्ति अगर राजसीकर्म में सहयोग कर रहा है तो उसे पुरस्कार की आवश्यकता नही है।  यह मानकर कि वह निष्कामी है और हमारा काम करना उसका कर्तव्य है उसे पुरस्कार न दें। ऐसा सोचना अज्ञान है।
                      3.एक बात याद रखें सात्विक ज्ञानी व्यक्ति की आंतरिक शक्तियां इतनी प्रबल होती हैं कि वह समय पर अगर कर्तव्य निभाता है तो पुरस्कार न मिलने को अपमान समझकर वह दंड भी दे सकता है।
               4.अपना काम निकल जाने पर सात्विक ज्ञानियों को भूल जाने वाले कृतघ्न बहुत जल्दी अपने स्थिति से गिर जाते हैं।

                   हम इतिहास का अध्ययन करें तो जिन राजपुरुषों ने सात्विक, ज्ञानी, तथा योगियों का सम्मान किया उन्होंने दीर्घ अवधि तक राज किया पर जिन्होंने उनका अपमान किया वह अंततः अपनी स्थिति से भ्रष्ट होकर काल कलवित हो गये। महाभारतकालीन विद्वान विदुर जी का कहना है कि बुद्धिमान की बाहें लंबी होती है उससे कभी बैर नहीं लेना चाहिये। उसी तरह उन्होंने यह भी का है कि अपना काम करने वालों को उपयुक्त पुरस्कार देखकर उसकी प्रसन्नता क्रय करना चाहिये।
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