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Sunday, June 29, 2014

रविवार के दिन भगवान के स्वरूप पर अध्यात्मिक चर्चा-हिन्दी लेख(special hindi article on bhagwan,A Hindu religion discussion on sunday special)



            आजकल एक संत को भगवान मानने या मानने के विषय को  लेकर प्रचार माध्यमों पर बहस चली रही है। हमारे यहां इतिहास में अनेक कथित चमत्कारी संत हुए हैं पर जिन संत की चर्चा हो रही है उन पर बाज़ार के सौदागरों तथा प्रचार प्रबंधकों की विशेष श्रद्धा रही है। आज के आधुनिक युग में बाज़ार तथा प्रचार का संयुक्त उपक्रम किसी को भी भगवान बना सकता है और मामला बिगड़े तो शैतान भी बना सकता है।  बहरहाल अध्यात्मिक और योग साधकों के लिये ऐसी उन संत के भगवान होने या न होने पर चर्चा मनोरंजक हो सकती है तो साथ ही अपनी साधना पर चिंत्तन करने का अवसर भी प्रदान करती है।
            इस बहस में कथित रूप से अनेक धार्मिक विद्वान शामिल हो रहे हैं।  भारतीय अध्यात्म के पुरोधा होने का दावा करने वाले अनेक श्वेत और केसरिया वस़्त्र पहनने वाले सन्यासी भी इस बहस में प्रचार के लोभ की वजह से शामिल हो रहे हैं। चर्चित संत को मानने वाले इस देश में बहुत हैं पर एक बात तय है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से उनका कोई महत्व नहीं है।  उनके नाम पर कोई एक समाज नहीं रहा  पर बहस कर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई अलग समूह है जो केवल आर्त भाव की भक्ति में लीन रहना चाहता है। हमारा तो यह मानना है यह बहस ही प्रायोजित है क्योंकि चुनाव के बाद इस समय कोई सनसनीखेज विषय नहीं है जिस पर प्रचार माध्यम अपना विज्ञापन का समय पास कर सकें इसलिये धर्म से जुड़ा विषय ले लिया है।

संत कबीरदास कहते हैं कि

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हरि सुमिरन सांची कथा, कोइ न सुनि है कान|

कलिजुग पूजा दंभ की, बाजारी का मान||

            सरल हिन्दी में व्याख्या-यदि कोई श्रद्धापूर्वक हरि की कथा कहे तो उस पर कोई ध्यान नहीं देता। इस कलियुग में अहंकारी की पूजा होती है और धर्म का बाज़ारीकरण वाले को सम्मान मिलता है।

कालि का स्वामी लोभिया, पीतल की खटाय।

राज दुवारें यौं फिरै, ज्यों हरियाई गाय।

            सरल हिन्दी में व्याख्या-इस कलियुग का स्वामी लोभ है जहां पीतल को खटाई में रखकर चमकाया जाता है। लोभी स्वामी राज दरबारों का रुख उसी तरह करते हैं जैसे गाय हरियाली की तरफ जाती है।

            अगर हम भारतीय समाज के अध्यात्म यात्रा को देखें तो हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ है जो पूज्यनीय तथा पठनीय है पर श्रीमद्भागवत गीत ने सभी का सार ले लिया है।  इसलिये यह माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का सबसे मजबूत आधार उसके संदेशों पर ही टिका है।  श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करने वालों को इस तरह की बहस में अपनी राय व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता और न ही वह चाहते हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों से इतर लोगों में इस पर चर्चा करना निषिद्ध किया है।
            अनेक सन्यासी इस बहस में आ रहे हैं पर अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अवलोकन करें तो उनके सन्यासत्व पर ही प्रश्न उठ सकते हैं।  उनका व्यवहार इस तरह है जैसे कि वह कोई धर्म के बहुत बड़े प्रवर्तक हैं।  एक बात यह सन्यासी भूल रहे हैं है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त हमेशा ही रहेंगे-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  जब इस समय महंगाई, बेकारी, बीमारी तथा अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है तो भय और आशंकाओं से ग्रसित लोग उससे उपजे तनाव के विसर्जन  के लिये नये मार्ग ढूंढ रहे हैं तो यह उनका अधिकार है। हमारे यहां भगवान की आरती की परंपरा रही जो कि अंततः आर्त भाव का ही परिचायक है। उसके बाद अर्थार्थी भाव के भक्तों का नंबर आता है। लोगों के अंदर जल्दी से जल्दी उपलब्धियां पाने की लालसा बढ़ी है इसलिये वह धर्म के नाम पर सिद्ध स्थानों का रास्ता पकड़ते हैं।  संसार के विषयों की स्थिति यह होती है कि समय आ गया तो काम सिद्ध नहीं तो इंतजार करो।  इस इंतजार में बीच लोग  दूसरा सिद्ध स्थान ढूंढने जाते है।  काम बन गया तो भक्त सिद्ध स्थान का स्थाई पर्यटक बन जाता है।  ज्ञान साधकों के लिये यह स्थिति अचंभित करने वाली नहीं होती। भक्त भी तीन प्रकार के होते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी-यह जानने वाले ज्ञानी कभी किसी की भक्ति पर टिप्पणी नहीं करते। इन तीनों से आगे होते हैं योगी जिनको ज्ञान भक्ति का प्रतीक माना जाता है जो ध्यान के माध्यम से अपनी आत्मा और मन का संपर्क करने में सफल होते हैं तब उन्हेें किसी अन्य प्रकार की भक्ति से प्रयोजन नहीं रह जाता-वह निरंकार परमात्मा का स्मरण करते हैं जो सामान्य मनुष्य के लिये सहज नहीं होती।  यह अलग बात है कि गेरुए और श्वेत वस्त्र धारण करने वाले अनेक लोग धर्म का झंडा उठाये स्वयं के योग होने का प्रचार करते हुए शिष्य समुदाय का संग्रंह का प्रचार करवाते हैं।
            हमारे यहां अनेक ऐसे कथित संत हुए हैं जिनके भगवान होने का प्रचार कर बाज़ार तथा प्रचार समूह अपना व्यवसायिक हित साधते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां भक्ति में फैशन आ जाता है। यह अलग बात है कि हमारे यहां प्राचीन अध्यात्मिक पुरुषों-भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण-की ऐसी महत्ता है कि भारतीय जनमानस उसे कभी विस्मृत नहीं कर सकता।  इसी दृढ़ विश्वास के कारण अध्यात्मिक ज्ञान तथा योग साधक कभी किसी के भगवान होने के दावे पर चिंतित नहीं होते और न ही उनकी भक्ति तथा भक्तों पर प्रतिकूल टिप्पणी कर अपने ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, June 27, 2014

विषयों के त्याग से पूर्ण योगाभ्यास संभव-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(vishayon ke tyag ka poorn yogabhyas sanbhav-A hindu hindi religion thought based on patanjali yoga literature)



            हमारा योग दर्शन अत्यंत पुराना है और उसका मूल स्वरूप आत्म नियंत्रण के लिये  आंतरिक क्रियाओं से जुड़ा है। उसमें आसनों साथ व्यायाम जुड़ा नहंी दिखता। हालांकि वर्तमान काल में जब लोगों का जीवन अत्यंधिक श्रमवान नहीं है तब इन व्यायामों की आवश्यकता है और नये योग शिक्षकों नेे इस विषय के  साथ सूर्यनमस्कार, वज्रासन और पद्मासन जैसी प्रभावशील क्रियाओं को जोड़ा है तो अच्छा ही किया है।  चूंकि देह की सक्रियता इन आसनों से दिखती है तो करने और देखने वाले को अच्छी लगती है।  यही कारण है कि प्राचीन योग के साथ नया स्वरूप उसे लोकप्रिय बना रहा है। यह अलग बात है कि लोग बाह्य रूप पर अधिक ध्यान दे रहे हैं पर उसके आंतरिक प्रभाव का ज्ञान उन्हें नहीं है। दरअसल योग का मूल आशय सांसरिक विषयों से परे होकर साधना करने से है। अभ्यास से ऐसी स्थिति हो जाती है कि आदमी संसार के विषयों में कार्यरत दिखता है पर उसमें आसक्ति नहीं रह जाती। यह कर्मयोगी का श्रेष्ठ रूप होता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः।
ततः क्षीयते प्रकाशवरणाम्।।
धारणासु च योग्यता मनसः।।
स्वविषयास्प्रयोग चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः।
            हिन्दी में भावार्थ-बाहर और भीतर के विषयों के चिन्त्तन का त्याग कर देना अपने आप में चौथा प्राणायाम है। उससे सांसरिक प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है। ज्ञान की धारणा से मन योग्य हो जाता है। अपने विषयों से रहित हो जाने पर इंद्रियों का चित्त से जो संपर्क होता है वही प्रत्याहार है।
            हमने देखा है कि अनेक लोग प्रचार माध्यमों में योग के बारे में पढ़ और सुनकर समूह बनाकर  साधना करते हैं। इस दौरान वह सांसरिक विषयों पर बातचीत करते हैं।  कहीं पार्क में बैठ गये और हाथ पैर हिलाने लगे।  दावा यह कि योग कर रहे हैं। वैसे प्रातः घर से बाहर निकलना ही अपने आप में एक अच्छी किया है जिसका लाभ अवश्य होता है पर इस दौरान वार्तालाप में अपनी ऊर्जा नष्ट करना ठीक नहीं है। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि जिन सांसरिक विषयों से बाद में जुड़ना उनका स्मरण करना प्रातःकाल सैर करने पर मिलने वाले मानसिक लाभ से वंचित करता है।  अनेक लोग समूह में बैठकर हाथ पैर हिलाकर योग कर का दावा अवश्य करें पर उनको यह मालुम नहीं है कि वह स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं।
            भारतीय योग संस्थान योग साधना का अभ्यास कराने के लिये निशुल्क शिविर चलाता है। उसके शिविर में योग का जो अभ्यास कराया जाता है पर अभी तक विधियों में अत्यंत श्रेष्ठ है। श्रीमद्भागवत में त्रिस्तरीय आसन की चर्चा होती है। पहले कुश फिर उस पर मृगचर्म और फिर वस्त्र बिछाकर सुख से बैठना ही आसन बताया गया है।  भारतीय योग संस्थान के शिविरों  उसकी जगह प्लस्टिक की चादर, दरी और फिर कपड़े की चादर को आसन बनाकर योगाभ्यास कराया जाता है। इस तरह के अभ्यास से देह, मन और विचारों में शुद्धि आती है।
            इस तरह के अभ्यास के बाद श्रीमद्भागवत गीता के एक दो श्लोक का अध्ययन अवश्य करना चाहिये।  उससे यह बात समझ में आ जायेगी के वास्तव में विषयों का त्यागकर अभ्यास करना ही योग है। अगर आसन तथा प्राणायाम के समय भी विषयों के प्रति आसक्ति बनी रहे तो समझ लेना चाहिये कि हमें अधिक आंतरिक अभ्यास की जरूरत है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, June 14, 2014

बड़ा काम करने पर छोटे आदमी को प्रशंसा की आशा नहीं करना चाहिये-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(bada kam karnea par chhote aadmi ko prashansa ki aasha nahin karna chahiye-A hindi hindu religion thought based on chankya policy)



            जिस तरह प्रकृत्ति नियमों में बंधकर चलती है वैसे ही यहां विचरने वाले जीव भी अपनी मूल प्रकृत्ति के साथ ही रहते हैं। इस प्रकृत्ति और जीवन को बांधने वाले तत्वों का समझने वाला ही ज्ञानी है। सत्य के साथ जीवन बिताने वाला कभी भी अपने अंदर किसी भी हालत में कष्ट का अनुभव नहीं करता।
            आमतौर से मनुष्य का यह स्वभाव होता है कि वह अपनी शक्ति, योग्यता तथा पराक्रम से अधिक वस्तु पाने की कामना करता है। कई लोगों में प्रतिष्ठित हस्तियों की तरह महत्व पाने का लोभ पैदा होता है।  हम देखते भी हैं कि फिल्म और टीवी में कथित सामाजिक धारावाहिकों में अनेक ऐसे पात्र सृजित किये जाते हैं जिनका आधार केवल कल्पना ही होती है पर देखने वाले अनेक कमजोर मानसिकता वाले लोग वैसा ही जीवन जीने का सपना देखते हैं।  यही कारण है कि अनेक लोग उलूल जुलूल हरकते कर मजाक का पात्र बनते हैं।  अनेक लोग तो अपनी हरकतों की वजह से जान भी गंवा बैठते हैं।  उन्हें यह समझाना कठिन है कि जीवन और प्रकृत्ति के नियम अलग ही है। मनुष्यों का समूह मूल रूप से इस प्रकृत्ति का है कि वह खास को ही तवज्जो देता है और अपनी तरह आम आदमी की कभी प्रशंसा नहीं कर सकता।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अयुक्त्तं स्वामिनो युक्त्तं युक्त्तं नीचस्य दूषणम्।
अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकर भूषणम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-धन, उच्च पद और बाहुबल के स्वामी यानि समर्थ व्यक्ति का अनुचित कार्य भी उचित माना जाता है जबकि असमर्थ या छोटे आदमी का बड़ा काम भी महत्वहीन माना जाता है। अमृत राहु के  कंठ के लिये कंटक तो विष भगवान शंकर के लिये आभूषण बन गया था।
            आजकल हर बड़ा कार्य पैसे की दम पर ही होता है यही कारण है कि लोग येनकेन प्रकरेण उसे कमाना चाहते हैं।  उन्हें उचित या अनुचित साधनों की चिंता नही होती।  किसी ने अगर गलत काम कर पैसे कमा लिये तो वह प्रतिष्ठित मान लिया जाता है।  हमारे देश में भ्रष्टाचार का रोना सभी रोते हैं पर कभी कोई आम आदमी अपने आसपास किसी धनिक के भ्रष्ट होने पर उसके समक्ष प्रतिकूल  टिप्पणी करने का न साहस करता है न उसकी इच्छा ही होती है।  सच बात तो यह है कि हमारे देश में धर्म, कर्म, कला, साहित्य तथा अन्य बड़े कार्यक्रम बिना दो नंबर के धन के हो ही नहीं सकते पर लोग उसमें अधिक संख्या में शामिल होते हैं।  यह प्रदर्शन है वहां भीड़ जमा होती है जहां सादगी है वहां कोई नहीं जाता।
            कहने का अभिप्राय यही है कि ज्ञान साधकों को हमेशा अपनी चादर देखकर ही पांव फैलाने के सिद्धांत का पालन करते हुए यही मानना चाहिये कि उनकी प्रतिष्ठा में इससे अधिक वृद्धि नहीं होगी। अगर वह कोई भला काम करते हैं तो उन्हें उससे किसी प्रकार की प्रतिष्ठा पाने का मोह भी नहीं रखना चाहिए।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, June 7, 2014

तीन दोष मनुष्य का नाश कर देते हैं-विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(teen dosh admi ka nash ka dete hain-A hindi hindu religion message based on vidur neeti)



            जैसे जैसे विश्व में आर्थिक विकास हुआ है वैसे ही अध्यात्मिक रूप से लोगों में  चिंत्तन क्षमता का हªास भी दिखाई देता है।  मनुष्य में उपभोग की  प्रवृत्ति बढ़ी है पर सहनशीलता कम हुई है। लोग धर्म के नाम पर पाखंड न स्वयं करते हैं वरन् उसकी आड़ में पेशा करने वालों को प्रोत्साहन भी देते हैं।  विश्व में कथित रूप से धर्म प्रचार करने वाले संगठनों की संख्या बढ़ गयी है तो समाज के लिये भी अनेक लोग नाम और नामा कमा रहे हैं। इनके शीर्ष पुरुष अपने आसपास धर्मभीरुओं का जमावड़ा कर लेते है और ुिछ उसकी आड़ में अपने समाज विरोधी गतिविधियों में लिप्त हो जाते हैं।
            ऐसे लोग अपनी सफेद तथा काली गतिविधियों को सहजता से इसलिये भी कर लेते हैं क्योंकि सामान्य लोग अपने ज्ञान चक्षु बंदकर उनका नेतृत्व को अच्छा मानकर पिछलग्गू बन जाते हैं।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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हरणं च परम्वानां परदाराभिमर्शनम्।
सुहृदश्चय परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षमावहा।।

           
हिंदी में भावार्थ-दूसरे के धन का हरण,  परायी स्त्री से संपर्क रखना तथा सहृदय मित्र का त्याग-यह तीन दोष आदमी का नाश कर देते हैं।
द्वाविमौ पुरुषौ राजन् स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः।
प्रभुश्चक्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान्।।

           
हिंदी में भावार्थ-शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने तथा दरिद्र होने पर भी दान करने वाला मनुष्य स्वर्ग से भी ऊपर स्थान पाता है।
      आजकल सबसे बड़ी समस्या यह है कि आदमी अपने गुण दोषों पर ध्यान नहीं देता। दूसरे के हक मारने से लोग तब रुकें जब उनके पास इतनी चिंतन क्षमता हो कि वह अच्छाई बुराई का निर्णय कर सकें। सभी को अपने स्वार्थ का भान है दूसरे के अधिकार पर कौन ध्यान देता है? हमने कई बार सुना होगा कि किसी ने अनुसंधान से कोई अविष्कार किया तो किसी दूसरे ने अपने नाम से उसे प्रचारित किया। उसी तरह अनेक लोग दूसरों की मौलिक रचनायें अपने नाम से छापकर गर्व महसूस करते हैं। कई लोग दूसरे के परिश्रम के रूप में देय मूल्य से मूंह फेरे जाते हैं या फिर कम देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि दूसरे का अधिकार मारने में कोई नहीं झिझकता। यह कोई नहीं समझता कि इसका परिणाम कहीं न कहीं भोगना पड़ता है।
      मनुष्य की शक्ति की पहचान उसकी सहनशीलता में है न कि हिंसा का प्रदर्शन करने में। जिसमें शारीरिक शक्ति और मानसिक दृढ़ता की कमी होती है वह बहुत जल्द हिंसक हो उठते हैं। जिन लोगों के पास शक्ति और धीरज है वह क्षमा करने में अधिक विश्वास करते हैं। उसी तरह आजकल धनलोलुपों का हाल है। सभी धन के पीछे अंधे होकर भाग रहे हैं। दिखाने के लिये वह धन का दान भले ही करते हों पर उनके लिये पुण्य कमाना दुर्लभ है क्योंकि उनका धन उचित मार्गों से नहीं अर्जित किया गया। सच तो यह है कि जो मिलबांटकर खाते हैं उनको ही पुण्य मिलता है। जो दरिद्र है वह जब दान करता है तो उसका स्थान स्वर्ग से भी ऊंचा हो जाता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, June 6, 2014

दूसरों के छिद्र देखने वाला हमेशा कष्ट में रहता है-विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(doosron ke chidra dekhne wala hamesha kashta mein rahta hai-A hindu hindi relition message based on vidur neeti)



            मनुष्य का यह सहज स्वभाव होता है कि अपने अंदर गुणों का विकास करने की बजाय दूसरे के दोष दिखाकर अपने लिये प्रशंसा जुटाना चाहता है।  इतना ही नहीं रचनात्मक कार्य में लगे लोगों का समर्थन करने की बजाय समाज उसका मनोबल गिराना चाहता है। सामान्य लोग पूरा जीवन स्वार्थों की पूर्ति में लगा देते हैं पर परमार्थी कहलाने का मोह होने के कारण वह कोई परोपकार करने की बजाय दूसरे के कार्यों को समाज के लिये अपकारी बताकर अपनी छवि बनाना चाहते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय लोग थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करना चाहते हैं।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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असूय को दन्दशू को निष्ठुरो वैरकृच्छठः।
स कृच्छम् महदाप्नोति न चिरात् पापमाचरन्।।

       हिन्दी में भावार्थ-गुणों में दोष देखने वाला, दूसरे के मर्म को छेदने वाला, निर्दयी, शत्रुता का व्यवहार रखने वाला और शठ मनुष्य शीघ्र ही अपने आचरण के कारण महान कष्ट को प्राप्त होता है।
अनूसयुः कृतप्रज्ञ शोभनान्याचरन् सदा।
न कृच्छ्रम् महदाप्नोति सर्वत्र च विरोचते।।

      हिन्दी में भावार्थ-दोषदृष्टि से रहित शुद्ध मंतव्य वाला सदा अनुष्ठान तथा पवित्र कार्य करते हुए महान सुख के साथ सम्मान भी प्राप्त करता है
       चाहे कोई कितना भी कहे कि आजकल बुरे काम और गलत मार्ग अपनाये बिना कुछ नहीं मिलता पर यह उसका भ्रम है। जो मार्ग कुऐं की तरफ जाता है और कोई अज्ञानी उस पर चलता चला जायेगा तो वह उसमें गिरेगा ही-वह कोई आकाश में उड़ने का विमान प्राप्त नहीं कर लेगा। यही स्थिति कर्म, व्यवहार और दृष्टि की है।
      दूसरे में दोष देखते रहकर उसकी चर्चा करने रहने से वह दुर्गुण हमारे अंदर भी आ जाता है। हमारे मन में जिस प्रकार का स्मरण होता है वैसे ही दृश्य सामने आते हैं। दूसरे के दोषों का स्मरण करने मात्र से भी वह दोष हमारे अंदर आ जाता है। दूसरे को मर्म भेदने वाली बात कहकर उसे कष्ट देना बहुत बुरा है। किसी के दुःख को उभारने उसके मन में जो कष्ट आता है उसका प्रभाव कहीं न कहीं हम पर भी पड़ता है। इस तरह का नकारत्मक व्यवहार करने वाले लोग न केवल अपने जीवन में विकास से वंचित रहते हैं बल्कि उनको महान कष्ट भी प्राप्त होता है।
    कहने का अभिप्राय यह है  जो  मनुष्य सदा दूसरों में गुण देखते हुए सभी का सम्मान करते हैं उनको अपने काम में न केवल सफलता मिलती है बल्कि समाज में उनको सम्मान भी प्राप्त होता है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, June 1, 2014

सभी वर्गो को प्रसन्न रखे वही राज्य प्रमुख लोकप्रिय होता है-रहीम दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख (sabhi vargon ko prasanna rakhe vahi rajya pramukh lokpriya hota hai)



                      हमारे देश में राजपद पाने की लालसा अनेक लोग राजनीति में सक्रिय करते हैं।  जिनके पास पैसा, प्रतिष्ठा और पराक्रम है वह आधुनिक लोकतंत्र में पद पाकर समाज में अपना प्रभाव बढ़ने को उत्सुक रहते हैं।  यह पद की चाहत अपने मन में पूज्यता का भाव शांत करने के लिये पैदा होती है। सच बात तो यह है कि राजपद पाना हमारे देश में एक उपलब्धि तो माना जाता है पर उसके साथ जो दायित्व हैं उन पर किसी की दृष्टि नहीं जाती।  किसी भी राज्य का प्रबंध सहज नहीं होता उस पर भारत जैसे विशाल तथा विविधताओं वाले देश में तो सुशासन बनाय रखना एक बड़ी चुनौती होती है पर कभी यह नहीं लगता कि राजपद की कामना रखने अनेक लोगों को इसका आभास होता है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन राज सराहिए, ससि सम सुखद जो होय।
कहा बापुरो भानु है, तपै तरैयन खोय।।
                   हिन्दी में भावार्थ-वही राज्य सराहनीय है जिसमें सभी लोग वर्ग के लोग खुश रहें। जहां सभी को आगे बढ़ने का अवसर मिले और जहां सभी को अपने काम काम पूरा दाम मिले वही राज्य सुशासित कहलाता है।
                      राज्य प्रमुख का यह कर्तव्य रहता है कि वह अपने अंतर्गत रहने वाले विभिन्न वर्ग, वर्ण तथा विचार वाले लोगों की रक्षा करे।  सभी को आगे बढ़ने के समान अवसर मिले। हम देख रहे हैं भारत में आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली होने के बावजूद वैसी अपेक्षायें पूरी नहीं हो सकीं जैसी अपेक्षा की गयी थी।  देखा यह गया कि इस लोकतंत्र की आड़ में वैसी राजशाही, वंशवाद तथा वणिक वृत्ति राज्यकर्म में व्याप्त हो गयी है जैसे पहले हुआ करती थी।  हालांकि अभी हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनाव के परिणामों में आम लोगों ने यह जता दिया है कि वह देश में एक सच्चा लोकतंत्र चाहते हैं।  इन चुनाव परिणामों से यही संदेश मिला है कि लोग इस देश में राज्य से अपने विकास तथा रक्षा की अपेक्षा करते हैं।  वह छोटी छोटी बातों से बहलने वाले नहीं है। न ही कथित नारे उनको प्रभावित कर सकते हैं।  यह अलग बात है  कि इस संदेश को राजपद पाने का मोह रखने वाले लोग कितना समझ पाते हैं


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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