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Saturday, March 26, 2016

कुशल राज्यप्रबंध में बौद्धिकवर्ग की भूमिका आवश्यक (Good Governes with GoodManegment-ChankyaNiti)


चाणक्य के अनुसार अर्थ के बिना धर्म की रक्षा नहीं की जा सकती। इसका यह आशय सामाजिक संगठनों के कर्णधार यह प्रचारित करते हैं कि उन्हें लोग पैसा दें तो वह समाज की रक्षा करें।  वह यह कभी इस बात पर चिंत्तन नहीं करते कि समाज के समस्त लोगों के पास पर्याप्त मात्रा में अर्थ या धन होगा तभी वह खड़ा रह पायेगा। धनवानों से धन लेकर सामाजिक संगठन फलते फूलते रहें पर अर्थसंकट से जूझ रहा समाज खड़ा नही रह पायेगा अंततः सामाजिक व धार्मिक संगठनों पर अस्तित्व का खतरा उत्पन्न होगा। हम देख रहे हैं कि सामाजिक व धार्मिक संगठनों के अनेक कर्णधार सामान्य जनों के बौद्धिक व धार्मिक शोषण तक ही अपनी गतिविधियां सीमित रखते हैं। महत्वपूर्ण बात यह कि हमारे राज्य प्रबंध पर प्रभाव रखने के लिये तत्पर इन सामाजिक तथा धार्मिक संगठनों को लोग कभी देश की आर्थिक स्थिति पर कुछ नहीं बोलते।
देश में अर्थव्यवस्था की दृष्टि से अनेक प्रकार के विरोधाभास हैं।  भले ही विकास दर बढ़ रही हो पर आमजन पर अर्थ का भारी दबाव है। विशेषकर मध्यमवर्ग जो कि समाज की रीढ़ माना जाता है वह अस्तित्व बचाने का संघर्ष कर रहा है। इस अर्थयुग में जब पूरा बौद्धिकतंत्र ही धनपतियों के हाथ में हो वहां स्वतंत्र चिंत्तकों के पास अभिव्यक्ति के अधिक साधन नहीं है-ऐसे में बंधुआ बौद्धिक प्रचार माध्यमों पर आकर मोर्चा संभाल रहे हैं जो कि सामान्य जनमानस की मौलिक अभिव्यक्ति के संवाहक नहीं होते। अंतर्जाल पर सामाजिक जनसंपर्क पर इन स्वतंत्र मौलिक चिंत्तकों को अपने ही साधनों से चलना पड़ता है। इसके बावजूद यह देखकर खुशी होती है कि हमें सहविचारकों के शब्द यहां बहुत पढ़ने को मिलते हैं। इनमें से कई प्रेरणादायक लिखते हैं।
हमारे राज्यप्रबंध का अर्थशास्त्र ‘अमीरों से लेकर गरीबों का कल्याण करने के सिद्धांत’ पर चल रहा है। अमीर अगर ईमानदारी से अपने भाग का राजस्व  दें तो शायद राज्यप्रबंध का काम सुचारु रूप से चल जाये पर ऐसा हो नहीं रहा।  गरीब अमीर के संघर्ष के बीच अपना अस्तित्व बनाये रखने वाले बंधुआ बुद्धिजीवी भले ही मध्यम वर्ग के हैं पर उसकी चिंता नहीं करते। गरीबों का कल्याण मार्ग एक लोकप्रिय सूत्र बन गया है इसलिये उसे अपनाकर सम्मान व पद पाने के मोह में बंधुआ बुद्धिजीवी इसी राह पर चल रहे हैं। हमें उस पर आपत्ति नहीं है पर यह तय बात है कि जब तक मध्यम वर्ग स्वतंत्रता से सांस नहीं लेगा समाज का भला नहीं हो सकता। हम आज यह बात करते हैं कि भारत दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा। हम उसे धर्म जाति या क्षेत्र से जोड़ देते हैं पर सच यह है कि इसका कारण कहीं न कहीं अकुशल राज्य प्रबंध रहा है। इतने सारे राजा इस देश में थे पर उनमें न एकता थी न ही कुशल प्रबंध की कला थी। प्रजा के असंतोष की वजह से उन्हें अपने राज्य गंवाने पड़े।
हम आज भी चंद्रगुप्त और अशोक के राज्य की चर्चा करते हैं इसका मतलब यह है कि इतिहास में अन्य राजा अकुशल या अलोकप्रिय थे। महत्वपूर्ण यह कि वही राजा लोकप्रिय थे जिन्होंने बुद्धि, कुशलता व पराक्रम का प्रतीक मध्यमवर्गीय लोगों को प्रश्रय दिया। जिन्होंने नहीं दिया उनके नाम इतिहास के अंधेरे में खो गये। यही सत्य है।
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दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, March 24, 2016

पेशेवर पहलवान क्या जाने योगफल का स्वाद (Peshewar Pahalwan Kya jane Yogafal ka Swad)

हमारे देश के अध्यात्मिक दर्शन का मूल तत्व योग साधना है। इसके आठभाग है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं पर इसके बावजूद अनेक अल्पज्ञानी इस पर गाहबगाहे टिप्पणियां करने लग जाते हैं। लोकतंत्र में वाणी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है। यह ठीक भी है पर इसमें अब समस्या यह हो गयी है कि चाहे जो कुछ बोलने लगता है।  अनेक लोग प्रतिष्ठा के मद में इतने लिप्त हो जाते हैं कि अपने सर्वज्ञानी होने का भ्रम उनको हो जाता है। वह ऐसे विषयों पर भी बोल जाते हैं जिनके शास्त्र का अध्ययन उन्होंने नहीं किया होता वरन् इधर उधर से सुनकर अपनी राय बनाकर शब्द फैक देते हैं।  एक पेशेवर नकली पहलवान ने कह दिया कि ‘आलसी व बीमार लोग योग साधना करते हैं। ताकतवर को इसकी जरूरत नहीं है।’
वैसे एक ऐसे योगाचार्य को लक्ष्य कर उसने अपनी बात कही जिन्होंने वास्तव में योग साधना का समाज में बहुत प्रचार किया है पर उनकी वजह से ही अनेक लोग इसे शारीरिक व्यायाम समझने लगे हैं-एक तरह से जहां योग साधना प्रचार तो किया पर उससे साधकों को सीमित लक्ष्य तक ही रहने के लिये प्रेरित किया। देखा जाये तो पेशेवर पहलवान से एक पेशेवर योगाचार्य समाज के लिये अधिक बेहतर है-कम से कम अपने उसकी तरह महानायक होने का भ्रम तो नहीं पैदा करता।  बहरहाल पेशेवर पहलवान के बारे में कहा जाता है कि वह तयशुदा मुकाबले लड़ता है-मुक्केबाजी व कुश्ती खेल में इस तरह की चर्चा रहती है कि परिणाम न केवल तयशुदा होते हैं वरन् प्रहार भी दिखावटी होते हैं। अलबत्ता उसने पैसा व प्रचार खूब कमाया है जिससे उसके दिमाग में अपने  ज्ञानी होने का भ्रम होना स्वाभाविक है। उसे अब कौन समझाये कि योग के आठ भाग होते हैं जिनमें से गुजरने की आलसी सोच भी नहीं सकते और बीमारों के यह बस का नहीं होता। बीमारी भी देह की नहीं वरन् मन तथा विचार की भी होती है।
               आजकल आत्ममुग्धता की यह बीमारी पूरे समाज में फैल रही है कि  किसी भी विषय की किताब पढ़ने की बजाय उसका नाम पढ़कर ही लोग यह मानते हैं कि कि उन्हें ज्ञान हो गया। उर्दू की शायरी ने सभी लोग में यह अहंकार भर दिया है कि ‘खत का मजमून जान लेते हैं लिफाफा देखकर’। कथित नकली पर प्रसिद्ध पहलवान के बारे में हम  बस इतना ही कह सकते हैं कि वह स्वतः योग शास्त्र का अध्ययन करे फिर टिप्पणी करे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, March 13, 2016

राज्य जोंक की तरह व्यापार से कर वसूल करे-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(State Must libral on Tax for Trade Devlopment-A Hindu Hindi Thought based on ManuSmiriti(

हमारे देश की अर्थव्यवस्था समाजवाद के उस उस खिचड़ी सिद्धांत पर आधारित है जो पूंजीवाद और जनवाद के मिश्रित तत्वों बना है। इस सिद्धांत के अनुसार धनिक से अधिक कर लेकर गरीब का कल्याण किया जाना चाहिये।  जिस कृषि को भारतीय अर्थव्यवसथा का आधार माना जाता है वहां से कोई कर नहीं वसूला जाता-अनेक लोगों ने राय दी थी कि बड़े किसानों पर कर लगना चाहिये पर भारतीय आर्थिक रणनीतिकर इस सोच से भी घबड़ाते हैं कि कहीं उन पर गरीब विरोधी होने का आरोप न लग जाये। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि समाजवाद के नाम पर नये पूंजीपति पैदा होने से रोका गया जिससे कथित विकास के नाम पर चंद औद्योगिक घराने परंपरागत रूप से अपना वर्चस्व बनाये हुए हैं।  उदारीकरण की प्रक्रिया में भी उन्हें ही सुविधायें मिल रही हैं। इससे हुआ यह कि हमारे यहां परंपरागत व्यापार  पर ही करों का बोझ पड़ा है जो कि मध्यमवर्ग ही संचालित करता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम्।
तथ वेष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत् सततं करान्।।
हिन्दी में भावार्थ-राज्य प्रबंधक को कर इस तरह लगाना जिससे व्यापार की बढ़ोतरी होने के साथ कोषालय में यथोचित लाभ पहुंचे। ठीक उसी तरह जैसे जोंक, बछड़ा तथा भ्रमर धीरे धीरे भोजन ग्रहण करते हैं।
अगर हम अपने देश के परंपरागत ढांचे को देखें तो यहां कृषि के बाद उच्च, मध्यम तथा निम्न तीनों वर्ग इस पर आश्रित रहे हैं।  नयी शिक्षा प्रणाली जहां पहले ही व्यापार करने की प्रवृति का हतोत्साहित कर रही थी वहीं अब आधुनिक विकास ढांचे में उसके लिये जगह ही नहीं बची है। औद्यागिक संस्थान अपने उत्पादों का व्यापार स्वयं कर रहे हैं। इतना ही नहीं आवश्यक खाद्य पेय वस्तुओं को भी वह बृहद व्यापार संस्थानो में विकास की वस्तुऐं बना रहे हैं जिससे परंपरागत व्यापार का स्वरूप ढहता जा रहा है जो कि हमारे समाज का कृषि के बाद दूसरा ठोस आधार है।
यह सही है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है पर समाज के केंद्र बिंदू में स्थित होने के कारण व्यापारिक वर्ग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यही वर्ग संस्कार, संस्कृति तथा धर्म की धारा का नियमित प्रवाह भी करता रहा है। अगर हम चाहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था सृदृढ़ हो तो हमें इस वर्ग में प्रोत्साहन की धारा प्रवाहित करनी होगी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Tuesday, March 8, 2016

नारियों के दुःखी होने पर परिवार शीघ्र नष्ट हो जाता है-महिला दिवस पर मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(Great Thouhgt for women in ManuSmriti-A Hindi Article on world Women Day)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों के एक वर्ग ने महिला दिवस पर मनुस्मृति को जलाकर जश्न मनाया। जहां तक हमारा अनुमान है इसके पीछे जनवादी विद्वानों का प्रश्रय है। हमारी चार वर्ष पूर्व एक कार्यक्रम में जनवादी विचारक से भेंट हुई तब उसे हमारे साथी ने बताया कि ‘यह महाशय मनुस्मृति के विषय पर सकारात्मक रूप से लिखते हैं।’
 वह तपाक से बोला था कि‘हम तो कभी मनुस्मृति जलाने का कार्यक्रम बनाना चाहते हैं। उसमें स्त्रियों तथा दलितों के लिये तमाम गलत बातें लिखी हुईं हैं।’
हमें हंसी आ गयी पर हमने  मनुस्मृति का फिर से अध्ययन करने का निश्चय किया तब समझ में आ गया कि वर्तमान समय में अनेक आकर्षक चेहरे छद्म रूप से ऐसे धनदाताओं के बुत भर हैं जो अनुचित काम से अपना जीवन चलाते हैं। मनुस्मृति में भ्रष्टाचारियों, व्याभिचारियों तथा अन्य अपराधों  के लिये कड़ी सजा का प्रावधान है जो शायद  आज के छद्म सभ्रांत समाज के लिये अनुकरणीय नहीं है। इसलिये उसका विरोध महिला तथा दलित उद्धार के नाम पर हो रहा है। उस विचारक का नाम तो याद नहीं पर चार वर्ष से मनुस्मृति जलाने के समाचार की खबरें अंतर्जाल पर ढूंढते रहे। शायद अब सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में यही समय  अब उनके साथियों को उपयुक्त लगा। वह विचारक अब इसमें शामिल हैं या नहीं कह नहीं सकते पर उनके सहविचारकों का यह कारनामा हमारे लिए हास्य का विषय  है। 
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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शोचन्ति जामयां यत्र विनशत्याशु  तत्कुलम।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।
हिन्दी में भावार्थ-उस परिवार का शीघ्र नाश हो जाता है जिसकी नारियां दुःख उठाती हैं। जहां नारियां सुखी हैं वहीं विकास होता है।
हैरानी तो इस बात की है कि भारतीय धर्म के अनेक प्रचारक भी मनुस्मृति की चर्चा से बचते हैं। मनृस्मृति में यह स्पष्ट लिखा गया है कि धर्म के नाम पर लोभ की प्रवृत्ति से काम करने वालों को कतई संत न माना जाये। इतना ही नहीं जिन लोगों को वेद के ज्ञान के साथ ही उस पर चलने की शक्ति नहीं है उन्हें न तो विद्वान माने  न उन्हें दान दिया जाये। हमने देखा है कि विद्वता के नाम पर पाखंड करने वाले लोग अधिकतर उच्च वर्ग हैं और मनुस्मृति में जिस तरह भ्रष्ट, भयावह तथा व्याभिचार के लिये जो कड़ी सजा है उससे वह बचना चाहता है।  खासतौर से राजसी कर्म में लिप्त लोग भ्रष्टाचार, भूख, भय के साथ अन्य समस्याओं से जनमानस का ध्यान हटाने के लिये पुराने ग्रंथों को निशाना बना रहे हैं जिसमें भ्रष्ट, व्याभिचार तथा अन्य अपराधों के लिये कड़ी सजा का प्रावधान हैं।  मनुस्मृमि की वेदाभ्यास में रत ब्राह्ण, समाज की रक्षा में रत क्षत्रिय, व्यवसाय में रत व्यापारी तथा इन तीनो की सेवा करने वाला सेवक जाति का है। इन्हीं कर्मों का निर्वाह धर्म माना गया है। स्पष्टतः जन्म से जाति स्वीकार नहीं की गयी है। लगता है कि मनुस्मृति के विरुद्ध प्रचार किन्हीं सिद्धांतों की बजाय आत्मकुंठा की वजह से की जा रही है। 
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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