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Friday, August 31, 2012

यजुर्वेद से सन्देश-ईश्वर से हमेश अपने लिए शक्ति मांगें (yajurved se sandesh-pne liye bhagwan se shakti mangen)

                     आजकल पूरे विश्व में ऋण लेकर अपने लिये सुख साधन जुटाने की प्रवृत्ति बढ़ी गयी है।  दूसरे के घर की रोशनी देखकर आदमी अपने घर में कर्ज लाकर आग लगाने को तैयार दिखता है।  सुख किश्तों पर मिलता है पर दुःख कभी एकमुश्त चला आता है।  कर्ज लेकर सामान लेने वाले जब ब्याज और मूलधन नहीं चुका पाते तब उनके पास सिवाय भारीसंताप में फंसे रहने  अलावा  कोई चारा नहीं रहता।  विलाप करते रहने के सिवाय उनके पास अन्य  मार्ग नहीं रहता।  आदमी अब दूसरों पर अपनी निर्भरता इस कदर बढ़ा चुका है कि सड़क पर सिर उठाकर चलने की उसकी मनःस्थिति नहीं रही।  आवश्यकताओं ने आदमी को मजबूर बना दिया है और वह कभी किसी सामाजिक संघर्ष में जमकर लड़ नहीं सकता।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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दृते छोड़ मां ज्योवते सांदृशि जीव्यासं ज्योवते सदृशि जीष्यासम्।। 
              हिन्दी में प्रार्थना का भावार्थ-‘‘हे समर्थ! मुझे शक्तिशाली बनाओ ताकि सब मुझे मैत्री भाव प्रदान करें।  हम सभी एक दूसरे को प्रेममयी दृष्टि से देखें।
मयि त्यांदिन्द्रियं बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः।। 
                 हिन्दी में इस प्रार्थना का अर्थ--‘‘मुझे महान शक्ति प्रदान करो। दक्षता प्रदान करो ताकि अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकूं।’’ 
                      इतना ही नहीं ईश्वर से प्रार्थना करते समय हर आदमी केवल अपने लिये लोकोपयोगी  सामान की याचना करता है।  कोई भी आदमी अपने लिये बल और बुद्धि नहीं मांगता जिससे इस संसार की समस्याओं से निपटा जा सकता है।  कहा जाता है कि जैसा आदमी  के हृदय में संकल्प रहता है वैसा ही उसके लिये यह संसार हो जाता है। आजकल लोग भोग प्रवृत्तियों को तो धारण कर लेते हैं पर योग संस्कार के अभाव में उनकी तृप्ति दूसरे की सहायता से कर्ज, दान या उधार लेकर ही होती है।  यह सब ग्रहण करना अशक्त आदमी का प्रमाण है इसलिये जहां तक हो सके ईश्वर से अपने लिये बल और बुद्धि की याचना करना चाहिए। किसी दूसरे के आगे हाथ फैलाने से अच्छा है उसके आगे हाथ फैलाया जाये जो सभी का दाता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Friday, August 24, 2012

चाणक्य नीति-जो दंड नहीं दे सकता उससे कोई नहीं डरता

                कहा जाता है कि फिट है वही हिट है। दरअसल भौतिक उपलब्धियों के लिये जुटा इंसान न तो अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रयास करता है और न ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर आत्मबली हो पाता है। जीवन में एक बार ऐसा समय अवश्य ही आता है जब वह थक जाता है। यह थकावट उसे वृद्धावस्था में ही पहुंचा देती है। ऐसे में शारीरिक तथा आत्मिक रूप से क्षीण होकर मनुष्य के पास आर्तनाद करने के अलावा कोई मार्ग शेष नहीं रह जाता। हमारे देश में व्यायाम आदि को कभी आदत की तरह नहीं अपनाया गया। अपनी ही योग कला को केवल सिद्धों तथा नकारा लोगों के लिये आवश्यक माना गया है। यही कारण है कि आजकल हम अपने आसपास शारीरिक तथा दिमागी रूप से विकारग्रस्त लोगों का से भरा समाज देख रहे हैं।
                       महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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                        यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैंव धनऽऽगमः।
                       निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति।।
            ‘‘जिसके नाराज होने पर किसी प्रकार का भय नहीं हो और नही प्रसन्न होने पर किसी फल की आशा है और जो दण्ड देने का सामर्थ्य भी नहीं रखता वह गुस्सा होकर कर भी क्या लेगा?’’
                  पश्चिमी आधार पर किये गया व्यायाम भी बुरा नहीं है अगर नियमित रूप से किया जाये मगर हमारे देश में लोगों ने जीवन शैली तो ब्रिटेन और अमेरिका जैसी अपना ली है पर वहां जो कसरत करने का नियम है उसका पालन नहीं करते। सुविधाओं ने इतना विलासी बना दिया है कि हमारे यहां अस्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही है। हमारे यहां की योग कला तो न केवल शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाती है वरन मानसिक रूप से दृढ़ भी बनाती है। आज के समय में जब भौतिकवाद के चलते आदमी अकेला होता जा रहा है तब यह आवश्यक है कि अपने बल को बनाये रखे। यह सभी जानते हैं कि जब तक हमारी देह में सामर्थ्य है तभी तक सारा संसार हमारे साथ है और असमर्थ होने पर अपने भी त्याग देते हैं। इसके बावजूद अगर कोई अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देता तो उसे अज्ञानी ही माना जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, August 15, 2012

संत कबीर दर्शन-पराई नारी से हंसी मजाक कर संकट न बुलाएँ (sant kabir darshan=parai stree se hansi majak kar sankat n bulayen)

                                 मनुष्य अपने सुख के पल तो एकदम सहजता से गुजार लेता है पर जब दुःख आता है तो भगवान को याद करता है।  सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने संकटों को स्वयं ही आमंत्रित करता है।  कई बार तो ऐसे वाद विवादों को जन्म देता है जिसके मूल में सिवाय अहंकार के कुछ अन्य नहीं होता।  हंसी मजाक में झगड़े होते हैं।  कुछ पुरुषों की आदत होती है वह अपने साथ वार्तालाप करने वाली स्त्रियों के साथ हंसी मजाक कर अपना दिल बहलाते हैं।  वह समझते हैं कि अपने आपको बुद्धिमान साबित कर अपने लिये प्रतिष्ठा अर्जित कर रहे हैं पर होता उसका उल्टा है।  उनको लोग हल्का या अगंभीर मानते हैं। कभी कभी इस बात पर झगड़े तक हो जाते हैं।
इस विषय पर संत कबीर कहते हैं कि
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दीपक झोला पवन का, नर का झोला नारि।
साधू झोला शब्द का, बोलै नाहिं बिचारि।।
                   वायु का झौंका दीपक के लिये भय देने वाला होता है तो नारी का संकट पुरुष के लिये परेशानी का कारण होता है।  उसी तरह यदि ठीक से विचार कर शब्द व्यक्त न किया जाये तो वह साधुओं के लिये संकट का कारण बनता है।
पर नारी पैनी छुरी, विरला बांचै कोय।
कबहूं छेड़ि न देखिये, हंस हंसि खावे रोय।
                     दूसरे आदमी की नारी से कभी कोई हंसी या मजाक न करो क्योंकि वह उस छुरी के समान है जो आदमी को हंसकर या रोकर अंततः काट देती है।
                    अनेक पुरुष दूसरे की स्त्रियों से वार्तालाप कर अपने मनोरंजन की प्राप्ति करते हैं। यह मनोरंजन अंततः उनको महंगा पड़ता है।  देखा तो यह जा रहा है कि आधुनिक समाज में केवल इसी बात पर अनेक झगड़े हो जाते हैं कि किसी ने परस्त्री के साथ मजाक किया। अनेक लोग इस चक्कर में बदनाम हो जाते हैं कि वह परस्त्रियों से अपने संबंध बनाते हैं। ऐसा नहीं है कि समाज में पहले ऐसा नहीं होता था।  अगर यह बात होती तो हमारे संत महापुरुष इस बुराई की तरफ प्राचीनकाल से सचेत नहीं करते पर वर्तमान आधुनिक समय में परस्त्रियों से से अश्लील अथवा द्विअर्थी संवाद के साथ वार्तालाप करना एक फैशन हो गया है जो कि देश की सांस्कृतिक परंपराओं के भी विरुद्ध है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Tuesday, August 14, 2012

विदुर नीति-रोगी मनुष्य मृतक समान

        एक तरफ हमारे संचार माध्यम जहां अपने देश के आर्थिक विकास का ढिंढोरा पीट रहे हैं दूसरी तरफ विश्व के स्वास्थ्य विशारद भारतीय समाज में मधुमेह, हृदय रोग, वायुविकार जैसे दैहिक संकट तथा मनोरोगों के बढ़ते आंकड़ों को प्रस्तुत कर रहे हैं। पश्चिमी शिक्षा से ओतप्रोत देश के बुद्धिजीवी इससे बेखबर लगते हैं। देश में स्वास्थ्य की चिंता करने वाले व्यवसायिक विशेषज्ञ भी रोगों के निवारण का प्रचार कर आर्थिक हित साध रहे हैं। ऐसे बहुत कम अध्यात्मिक चिंतक हैं जो रोगों के निवारण से अधिक आरोग्य रूपी धन का संचय करने के लिये लोगों को प्रेरित करें।
            पिछले कुछ समय से हमारे देश में योग का प्रचार बढ़ा है। यह अच्छी बात है पर इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान हो तो आनंद अधिक ही लिया जा सकता है। इसके लिये यह आवश्यक है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया जाये। दरअसल जो लोग योगासन और प्राणायाम करने वाले हैं उनके दैहिक विकास न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाते है पर तत्वज्ञान के अभाव में वह जीवन का पूरा आनंद नहीं उठा पाते। ऐसे में उनका मन रुचिकर विषयों की तरफ लगता है। वह चाहते हैं कि उनसे मिलने वाले लोग भी उन जैसे हों। मगर उनको तब निराशा का सामना करना पड़ता है जब बहुतायत रोगग्रस्त लोगों वाले समाज में केवल विकारों वाले विषयों से सामना होता है। तब उनको असहजता का अनुभव होता है। फिर दैहिक विकारों से ग्रसित लोग तो प्रत्यक्ष दिखते हैं पर मानसिक विकारों वाले लोगों की पहचान नहीं होती। मानसिक रोगों से ग्रसित लोग अपने विचार,, वाक्या तथा व्यवहार से अपने आसपास के लोगों को क्षुब्ध कर देते हैं। उनके इस कर्म से अध्यात्मिक ज्ञान रखने वाले विचलित नहीं होते।
                     विदुरनीति में कहा गया है कि 
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              रोगार्दिता न फलान्याद्वियन्ते न वै लभन्ते विषयेषु तत्वम्।
               दुःखोपेता रोगिणी नित्यमेव न बुध्यन्ते धनभौगान्न सोख्यम्।
           ‘‘बीमार मनुष्य कभी अमृतदायी फलों का आदर नहीं करता। विषयों में भी आसक्ति से भी उनको कोई सुख नहीं मिलता। रोगी सदा ही कष्ट में रहते हैं उनके लिये भोग और सुख व्यर्थ हो जाते हैं।
              न मनुष्ये गुणः कश्चिद् राजन् सधनतामृते।
              अनातुरत्वाद् भद्रं ते मृतकल्या हि रोगिणः।।
             ‘‘मनुष्य के पास धन हो या नहीं  निरोग होने का गुण जरूर होना चाहिये

क्योंकि रोगी मनुष्य तो मृतक समान है।‘‘
                जिस तरह बबूल के पेड़ से आम की अपेक्षा करना व्यर्थ है उसी तरह विकारों से ग्रसित लोगों से सद्व्यवहार की अपेक्षा करना मूर्खता और अज्ञान का प्रमाण है। हम जब किसी व्यक्ति के व्यवहार, विचार या वाक्य से निराश हों तो यह समझना चाहिए कि वह विकार से ग्रसित है। अपने अंदर निराशा या क्रोध का भाव लाने की बजाय उसकी बात को अनसुना करना श्रेयस्कर है। सच बात तो यह है कि हम दूसरों की बात से अपने अंदर गुस्सा लाकर स्वयं को तकलीफ देते हैं। जो विकार से ग्रसित है उसके लिये मधुर वचन बोलना तथा सद्व्यवहार करना कठिन है। तब क्यों अपना खून जलाया जाये।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Saturday, August 4, 2012

पतंजलि योग सूत्र-इच्छाओं का त्याग ही सन्यास है (patanjali yog sahitya-ichchaon ka tyag hi sanyas)

                 हमारे देश में सन्यास तथा वैराग्य को लेकर भारी भ्रम प्रचलित हैं। विषयों में आसक्ति का अभाव होने का मतलब यह माना जाता है कि मनुष्य कोई कर्म ही नहीं करे। संसार के अन्य जीवों से कटकर कहीं वन में जाकर रहने को ही सन्यास माना जाता है। दरअसल कर्म और सन्यास की जो व्याख्या श्रीमद्भागत गीता में की गयी उसे समझने में हमारा समाज असमर्थ रहा है। कर्म करना और उसके फल में आकांक्षा न होना ही सन्यास है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य अपनी देह के रहते बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता। वह तत्वज्ञान को जानने के बाद विषयों से प्रथक नहीं होता बल्कि उसमें आसक्ति का त्याग कर देता है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब हम कोई काम करते हैं तो वह केवल हमें इसलिये करना चाहिए कि उससे हमारा जीवन निर्वाह होगा। इससे अधिक अपेक्षा करने पर निराशा हाथ लगती है।
                     पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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                   दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम।।
               ‘‘दिखने और सुनने वाले विषयों से सर्वथा तृष्णारहित चित्त की अवस्था है वही वैराग्य है।’’
                     तत्परं पुरुषरव्यातेर्गुणवतृष्ण्यम्।।
                 ‘‘मनुष्य के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना ही परम वैराग्य है।’’
              हमें गाना सुनना है सुने। फिल्म देखनी है देखें। गाड़ी पर जाना है जायें। वैराग्य तो उनमें आसक्ति से हैं। जब हम यह सोचते हैं कि गाना सुने बगैर हमारे कान रह नहीं सकते। फिल्म देखे बिना हमारी आंखें प्यासी रह जाती हैं। गाड़ी में बैठे बिना हमारा मन तृप्त नहीं होगा। यहीं से शुरु होती है मानसिक तनाव की जो हमें ऐसी स्थिति में पहुंचाता है जहां बड़ा से बड़ा ज्ञान भी धरा का धरा रह जाता है। संसार के विषयों से हम अलग नहीं हो सकते मगर उनमें इस तरह की लिप्पता कभी सुखद नहीं होती। शराबी और जुआरी समाज में कभी विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि सब जानते हैं कि वह उनके बिना चल नहीं सकते इस कारण किसी भी दूसरे आदमी के कर्म के योग्य नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, August 2, 2012

ऋग्वेद से सन्देश-मन को प्रसन्न करने वाले काम करें (man ko prasanna karne wale kaam karen-rigved se sandesh)

             सामान्य मनुष्य अनेक बार परिवार, मित्र तथा समाज के दबाव में अनेक बार ऐसे कार्य करते हैं जिससे उनका स्वयं का मन उद्विग्न हो उठता है। इसके विपरीत ज्ञानी हमेशा ही अपने मन को प्रसन्न करने वाले ही कर्म करते हैं। यह बात हम धार्मिक कर्मकांडों अवसर पर देख सकते हैं जब परिवार, समाज तथा मित्रों के दबाव में आदमी उनका निर्वाह करता है यह जानते हुए भी यह ढकोसला है। खासतौर से विवाह, गमी तथा अन्य कार्यक्रमों के समय दिखावे के लिये ऐसे अनेक कर्मकांड रचे गये हैं जिनको केवल दिखावे के लिये ही धर्म का प्रतीक माना जाता है। हमारे अनेक महान विद्वानों ने धार्मिक कर्मकांडों तथा अध्यात्मिक ज्ञान के अंतर को स्पष्ट किया है। यह अलग बात है कि समाज में उनका नाम को सम्मान दिया जाता है पर उनके संदेश कोई नहीं मानता। यही कारण है कि जब किसी के घर में शादी या गमी का अवसर आता है तो वह अपना सुख दुःख भूलकर केवल अपनी जिम्मेदारी निभाने का तनाव झेलता है। उसके मन में यही ख्याल आता है कि ‘अगर मैंने यह नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे’। यही सोचकर हम ऐसे काम भी करते हैं जो मन को प्रसन्न करने की बजाय तनाव के तरफ धकेलते हैं।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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श्रिय मनांसि देवासो अक्रन्
‘‘ज्ञानी निज अपने हृदय को प्रसन्न करने वाले कर्म करते हैं।’’
सुवीर्यस्य पतयः स्याम।
‘‘हम उत्तम बल के स्वामी बनें।’’
       अगर मनुष्य चाहे तो स्वयं को योगसाधना तथा अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन से मानसिक रूप से दृढ़ होने के साथ ही दैहिक रूप से बलवान भी बना सकता है। हमारे हिन्दू धर्म की पहचान उसके कर्मकांडों से नहीं वरन् उसमें वर्णित तत्वज्ञान से है जिसका लोह आज पूरा विश्व मानता है। अगर हम अपने अंदर कर्मकांडों के निर्वहन का तनाव पालेंगे तो कभी शक्तिशाली नहीं बन सकते। जहां धर्म से कुछ पाने का मोह है वहां सिवाय तनाव के कुछ नहीं आता। मन में धर्म के प्रति त्याग का भाव हो तो स्वतः मन स्फूर्त हो जाता है। इस त्याग को भाव को तभी समझा जा सकता है जब हम परोपकार, ज्ञान संग्रह तथा हृदय से भगवान की भक्ति करेंगे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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