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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Wednesday, May 9, 2018

भोजन के प्रति सदा सम्मानजनक दृष्टि रखना चाहिये-मनुस्मृति (Bhojan ke prati Samman ka Bhav rakhna chahiye-ManuSmriti)

मनुस्मृति में कहा गया है कि
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पूजित ह्यशान नित्यं बलमूर्जं च यच्छति।
अपूजितं तु तद् भुक्तमुभूवं नाशवेदिदमफ।
         हिन्दी में भावार्थ-नित्य सम्मान की दृष्टि से भोजन करने पर मनुष्य की देह में बल और तेज बढ़ता है। भोजन करते समय उसके प्रति अपमान की दृष्टि रखने से दोनों का नाश होता है।
वर्तमान संदर्भ में लेखकीय व्याख्या-आज के विकास के दौर में जहां भौतिकीय पदार्थों के संग्रह की होड़ लगी हुई है वही अपनी ही देह के प्रति लोगों में जागरुकता कम हो गयी है।  भोजन की सामग्री पाचक है या नहीं या उससे स्वास्थ्य पर अच्छा या बुरा कैसा प्रभाव होगा-इस पर लोगों ने सोचना बंद ही कर दिया है।  जहां जैसे भी स्वादिष्ट भोजन मिले लोग उसे खाते हैं पर मन में खाद्य पदार्थ के प्रति कोई सम्मान नहीं होता।  जीभ को स्वाद व पेट को भार दिलाना है इसी भाव से लोग खाते हैं।  अनेक बार तो खाते ही कह देते हैं कि ‘खाने में मजा नहीं आ रहा है।’ खाने के बाद बड़ी बेदर्दी से कह देते हैं कि ‘खाने में मजा नहीं आया।  वह नहीं जानते कि ऐसे भाव का बुरा असर कहने वाले के  मस्तिष्क पर ही है जिससे खाया हुआ भोजन रसहीन तो कभी विषहीन हो जाता है। सच बात तो यह है कि अनेक बार हमारे लिये स्वादहीन भोजन स्वास्थ्यवर्द्धक तो स्वादिष्ट भोजन रोग उत्पादक हो सकता है।
हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार भोजन और जल जहां देह की जरूरत पूरी करते हैं तो अनेक बार इनका औषधि के रूप में भी उपयोग होता है। हमने देखा होगा कि हल्दी, जीरा, हींग तथा भोजन में शामिल किये जाने वाले अनेक मसाले औषधि के रूम में काम आते हैं।  महत्वपूर्ण बात यह कि हम जिस अंग्रेजी जीवन पद्धति के जाल में फंसे हैं उसके अनुसार ही मस्तिष्क पर दुष्प्रभाव पड़ने से अनेक रोग होते हैं। ऐसे में हमें अपने मस्तिष्क में ही भोजन के प्रति सकारात्मक भाव रखते हुए भोजन करना चाहिये।

Friday, July 7, 2017

पंचसंकट का निवारण एकतत्व के अभ्यास से ही संभव-पतंजलि योग दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख (PanchSankat ka niwaran ektatv ka abhyas se hi sambhav-A Article based on Patanjali yoga Darshan)

पतंजलि योग दर्शन के अनुसार
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दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः
                       हिन्दी में अर्थ-दुःख, दौर्मन्स्य (इच्छा की पूति होने पर मन का क्लेश), अंगमेजयत्व (शरीर में कंपन), श्वास और प्रश्वास-ये पांच संकट चित्त के विक्षिप्त होने के कारण होते हैं।
तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्तायासः।
हिन्दी में भावार्थ-इन संकटों के निवारण के लिये एकतत्व का अभ्यास करना चाहिये।
                            मनुष्य की देह में बुद्धि और मन का कोई भौतिक आधार नहीं है-यह रक्त के रूप में हड्डी के रूप में-पर यही पूरा जीवन उसका संचालन करते हैं। सामान्यजन ज्ञान के अभाव में इसी देह, बुद्धि और मन के साथ स्वयं को एकरूप समझते हैं जबकि योग साधक अभ्यास के बाद यह समझ जाते हैं कि देह, मन और बुद्धि हमारे साधन है जिनके हम आत्मरूप उपभोक्ता हैं।  यह जीवन रथ के घोड़े हैं और हम आत्मा उसके सारथि हैं।  जहां योग साधक मन या चित्त पर सवारी करते हैं वही सामान्यजन इनका इस तरह दास हो जाता है कि उसे अपने आत्मरूप अस्तित्व का अनुभव तक नहीं रहता।
                               संसार में भिन्न प्रकार के विषय हैं जिनमें मनुष्य का स्वाभाविक रूप से राग रहता है।  योगदर्शन के अनुसार क्लेश का जनक राग है।  जिस तरह मोर नाचने के बाद अपने मैले पांव देखकर रोता है उसी तरह मनुष्य भी विषयों के उपभोग से निवृत होने के बाद थकावट का अनुभव होता है। हमने देखा होगा कि अनेक मनुष्य गर्मियों में शीत तथा शीत के समय ग्रीष्म स्थानों पर पर्यटन करने के लिये जाते है। वहां से लौटने के बाद अपने ही घर में थकावट का अनुभव करते हुए अन्य लोगों की अपनी कथाओं के साथ व्यथा भी सुनाते हैं-उनके मन में बार बार थकावट का रुदन होता है। यह उनके चित्त की विक्षिप्त अवस्था होती है।  इसके विपरीत नियमित रूप से योगाभ्यासी को कभी भी चिंता या थकावट से त्रस्त नहीं देखा जाता।
                                   अनेक बार लोग थोड़ा चलने पर हांफने और कांपने लगते हैं। उनकी सांसे तेज चलती हैं। कभी खाने पीने से उनको अपनी सांस सीने में फंसी लगती है।  कभी चिंता या डर से शरीर कांपने लगता है।  इस तरह के संकटों में फंसा सामान्यजन जीवन का आंनद लिये बिना ही अपनी सांसों का कोटा पूरा कर लेता है।
                                          हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार संसार में सुख तथा दुःख केवल चित्त की अनुभूतियों का विषय है। ऐसा नहीं कि योगाभ्यासियों का संसार कोई स्थिर रहता है पर जब वह चित्त के सकट से जूझते हैं तो ध्यान के साथ ही भक्ति कर उसे स्थिर कर लेते हैं।  जब चित्त विक्षिप्तता के संकट में हो तब अपना ध्यान संसार से हटाकर परमात्मा में लगाना चाहिये।  कहीं एकांत, स्वच्छ तथा पवित्र स्थान पर सुखासन या पद्मासन में बैठकर अपना ध्यान नासिक के ऊपर भृकुटि पर केंद्रित करते हुए देह शिथिल करना चाहिये।  आष्टांग योग क्रिया में ध्यान एक केंद्रीय तत्व है जिससे धारणा की सीढ़ियों से समाधि के शिखर पर पहुंचा जाता है।
                                 हर मनुष्य जीवन गुजारने के लिये सांसरिक विषयों से जुड़ने के लिये बाध्य है। अंतर इतना है कि सामान्यजन इन विषयों में राग लिप्तता के बाद उससे प्राप्त क्लेश की निवृत्ति का मार्ग नहीं जानता जबकि योगसाधना ध्यान आदि से प्रवृत्तियों को स्थिर कर लेते हैं। यह लेखक पिछले बीस वर्षों से योग साधना का अभ्यास कर रहा है और अनुभव करता है कि योग साधना जीवन जीने की ऐसी कला है यह सभी कहते हैं पर इसकी अनुभूति बहुत कम लोग कर पाते हैं।  योगसाधना के नियमित अभ्यास से प्रवृत्ति और निवृत्ति के मार्ग को अ्रर्तचेतना से ही देखा जा सकता है। इस लेखक ने भारतीय योंग संस्थान के शिविरों में योग साधना का अभ्यास किया और पाया कि वहां के गैरपेशेवर शिक्षक जिस निष्काम भाव से  सिखाते हैं ऐसा अन्यत्र. देखने को नहीं मिलता।  इन शिक्षकों को योग के अभ्यास ने इतना निष्कामी बना दिया है कि यह लोग किसी से ईष्या या द्वेष नहीं करते-यह प्रवृत्ति कथित रूप से संतों में भी नहीं देखी जाती।

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