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Wednesday, June 27, 2018

पश्चिमी दबाव में धर्म और नाम बदलने वाले धर्मनिरपेक्षता का नाटक करते रहेंगे-हिन्दी लेख (Convrted Hindu Now will Drama As Secularism Presure of West society-Hindi Article on Conversion of Religion)

        
                           हम पुराने भक्त हैं। चिंत्तक भी हैं। भक्तों का राजनीतिक तथा कथित सामाजिक संगठन के लोगों से संपर्क रहा है। यह अलग बात है कि उन्होंने हमें धास भी नहीं डाली पर जानते हैं कि हमारा चिंत्तन हमेशा स्वतंत्र तथा तार्किक विचाराधारा वाला रहा है।  सो बता बता देते हैं कि भारत में हिन्दू धर्म छोड़ने वालों ने विदेशियों के दबाव में ही छोड़ा था ताकि वहां काम, नाम तथा नामा मिल सके।  हिन्दू धर्म का विरोध यूरोप में रहा है पर वही यूरोप अब हिन्दू धर्म के योग को अपना रहा है।  दूसरा वहां हिन्दू धर्म छोड़ने वालों को प्रगतिशील माना गया सो। याद रखें भारतीय उपमहाद्वीप आज नहीं बरसों से ही श्रम निर्यातक रहा है। प्राचीन काल में गये लोगों ने धर्म नहीं छोड़ा पर आधुनिक काल में यह नीति बन गयी कि हिन्दूधर्म छोड़ो और विकसित कहलाओ।
अ ब यूरोप सहित पश्चिमी देशों में स्थिति उलट हो रही है।  आधुनिक वह धर्मनिरपेक्ष दिखने वाले धर्म तो छोड़ गये। अरेबिक देशों से होते हुए यूरोप तथा अन्य पश्चिमी देशों में घूमते भी रहे पर वहां अब अरेबिक धर्म से पश्चिमी धर्म के लोग चिढ़ने लगे हैं। पहले लोगों को धर्म बदलकर अरेबिक नाम की ज्ररूरत थी अब उन्हें ही हिन्दी नाम की चाहत भी हो सकती है। हिन्दी नाम अब ज्ञान तथा विज्ञान दोनों की पहचान बन गयी है। सीधी बात कहें तो हिन्दू धर्म के मूल ज्ञान तथा विज्ञान का विस्तार अब पश्चिम से होता हुआ यहां आयेगा।  सो धर्मनिरपेक्ष तथा विकासित दिखने वाले लोग प्रयास यही करेंगे कि भक्तों की मानसिकता अस्थित करो। हमारी सलाह है  कि बात को घुमाने की बजाय सीधे कहो कि हम हिन्दू हैं और हमारी विचाराधारा अकेले ऐसी है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान हैं।  हमारे परमात्मा  के रूपों तथा पूजा में भिन्नता एक स्वाभाविक शैली है जो मनुष्य मन को सदैव संचालित रखती है।  हम सात दिन में सात रूप पूजते हैं न कि एक दिन विशेष एक ही प्रकार की दरबार जायें। 
                  आखिरी बात यह है कि हमने देखा है कि मूर्ति पूजने तथा माथे पर टीका लगाने वाले पुरुष तथा बिन्दी लगाने वाली महिलाओं के चेहरे पर एक विशेष प्रकार का आकर्षण होता है। उनके चेहरे पर एक स्वाभाविक मुस्कान खेलती दिखती है। जो मूर्ति पूजा या घर में ध्यान वगैरह नहीं करते उनके चेहरे हमे फक लगते हैं। कितना भी चेहरा चमका लें वह रूखा  ही लगता है। एकदम मुस्कानहीन। कभी कभी हम टीवी पर धर्म परिवर्तित लोगों का चेहरा देखते हैं ऐसा लगता है कि रो रहे हैं। याद रखें हिन्दू मान्यता के अनुसार भक्त चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  जबकि दूसरी मान्यताओं में केवल आर्त भाव की प्रधानता है।  
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            आजकल हम वृंदावन रहने लगे हैं। रेलों में घूमते रहते हैं। आज ग्वालियर वापस लौटे। सोचा कोई बड़ा चिंत्तन लिखो। वृंदावन में भक्त जब आते हैं तो उनका भाव देखते ही बनता है। बाकेबिहारी तथा अंग्रेजों के मंदिर में श्रद्धालू जिस भाव से आते हैं उसका वर्णन शब्दों में कठिन है। प्रेम मंदिर पर तो इतनी भीड़ रहती है कि हमें संदेह होता है कि ताजमहल पर भी इतनी होती होगी।  जो एक वहां जायेगा वह ताजमहल में मृतभाव का अनुभव करेगा। वहां कितने अंग्रेज कृष्ण के भक्त हैं कहना कठिन है उनकी संख्या इतनी है कि वह रास्ते पर मिलते ही रहते हैं।

Monday, October 17, 2016

छोटे व मध्यम व्यापारियों की कमाई का भी ध्यान रखना होगा-चीनी सामान के बहिष्कार से देशभक्ति जोड़ने पर एक लेख (Attension takes of Poor and Middle Class Treders-Boycott of chines good and Natinaliti-Hindi Article)


                                                            चीन भारत के प्रति शत्रुभाव रखता है यह सर्वविदित है और हम तो उसके भारत के उपभोक्ता बाज़ार में खुले प्रवेश पर पहले भी सवाल उठाते रहे हैं। सबसे बड़ा हमारा सवाल यह रहा है कि भारत में लघुउद्योग व कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन की नीति थी वह सफल क्यों नहीं रही? इन लघु व कुटीर उद्योगों में निर्मित छोटे छोटे सामान भारतीय परंपराओं का अभिन्न भाग होते थे। यह पता ही नहीं चला कि चीनी सामान ने भारतीय बाज़ार में प्रवेश किया पर इतना तय है कि यह देश के आर्थिक तथा राजनीति के शिखर पर विराजमान लोगों के आंखों के सामने ही हुआ था-या कहें उन्होंने अपनी आंखें फेर ली थीं।
                                           अब अचानक चीन के एक आतंकी के प्रति प्रेमपूर्ण व्यवहार दिखाने पर उसके सामान के बहिष्कार का आह्वान देशभक्ति के नाम पर किया जा रहा है।  सच कहें तो अब देशभक्ति को सस्ता बनाया जा रहा है।  इस समय दिवाली के अवसर पर पर्व से संबंधित पटाखे, सजावाट का सामान तथा खिलौने आदि न खरीदने के लिये जोरदार अभियान चल रहा है।  हम बता दें कि मोबाइल, लेपटॉप तथा कंप्यूटर में भी ढेर सारा चीनी सामान लगा है।  अनेक आधुनिक सामान तो चीन से पुर्जें लाकर यही संयोजित किया जाता है।  हमें एक दुकानदार ने बताया था कि इनवर्टर, स्कूटर , कार तथा चाहे कहीं भी लगने वाली जो भी बैट्री हो वह चीन में ही बनती है।  इस समय बड़े व्यापारियों से कोई अपील नहीं कर रहा-क्योंकि उन्हें शायद देशभक्ति दिखाने की जरूरत नहीं है।  इसके लिये आसान शिकार मध्यम तथा निम्न वर्ग का व्यवसायी बनाया जा रहा है।  हम यहां चीनी सामान बिकने का समर्थन नहीं कर रहे पर हमारे देश के मध्यम तथा निम्न वर्ग के व्यवसायियों के रोजगार की चिंता करने से हमें कोई रोक नहीं सकता।  वैसे ही हमारे देश में रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं।  आजकल छोटे व्यापारी आधुनिक मॉल संस्कृति के विकास के कारण वैसे भी अस्तित्व का संघर्ष कर रहे हैं-स्थित यह है कि उनकी नयी पीढ़ी अपना पैतृक काम छोड़कर नौकरी की तलाश में घूम रही हैं।  ऐसे में दिपावली तथा होली जैसे पर्वों के समय जो अधिक कमाने की जिम्मेदारी योजना होती है उस पर पानी फिरा जा रहा है।  अनेक लोगों ने चीन का सामान भरा है और अगर उनकी बिक्री कम हुई तो पूंजी का नाश होगा-हालांकि जिस तरह महंगाई व आय के असमान वितरण ने जिस तरह समाज के एक बहुत बड़े वर्ग की क्रय क्षमता को कम किया उससे भी दीवाली पर चीनी सामान की बिक्री कम हो सकती है। यह अलग बात है कि इसे देशभक्ति के खाते में ही दिखाया जायेगा।
                                       अपनी रक्षा की इच्छा रखने वाला हर आदमी देश के प्रति वफादार होता है-देशभक्ति दिखाने में उत्साह रखना भी चाहिये पर इसका मतलब यह नहीं है कि हम हर छोटे विषय पर भी अपने दाव खेलने लगे।  देश में आर्थिक असमंजसता का वातावरण है इसलिये यह ध्यान रखना चाहिये कि अपने नागरिकों की हानि न हो। हमें सबसे ज्यादा आपत्ति उस योग शिक्षक पर कर रहे हैं जिसने योग व्यवसाय के दम पर बड़ी कंपनी बनाकर पूंजीपति का उपाधि प्राप्त कर ली और अब चीनी सामान के बहिष्कार का आह्वान कर रहा है।  इस तरह वह छोटे व्यापारियों को उसी तरह संकट में डाल रहा है जैसे कि उसकी हर मोहल्ले में खुली दुकानें डाल रही हैं।  अगर उसमें हिम्मत है तो चीन से आयात करने वाले बड़े दलालों, व्यापारियों तथा उद्योगपतियों से देशभक्ति दिखाने को कहें-जिनका अरबों का विनिवेश चीन में हैं।  प्रसंगवश हमने हमेशा ही मध्यम वर्ग के संकट की चर्चा की है और इस विषय में जिस तरह देशभक्ति दिखाने के लिये फिर उसे बाध्य किया जा रहा है उस पर हमारी नज़र है।
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Wednesday, September 21, 2016

बेजुबानों में ही अब मौन बचा है-दीपकबापूवाणी (Bejubanon mein hi maun bacha hai-DeepakBapuWani)

अंग्रेजी में मु्फ्त के माल उड़ायें, हिन्दी में पराये शब्द जुड़ायें।
‘दीपकबापू’ तोतलों की संगत में, अच्छा है वाणी से मौन जुडायें।
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चारों तरफ शांति का शोर मचा है, बेजुबानों में ही अब मौन बचा है।
मन के मीत करें धन से प्रीत, साहुकार वही जिसे काला धन पचा है।।
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असल के नाम पर नकल मिलाया है, अमृत कहकर विष खिलाया है।
‘दीपकबापू’ गम करना बेकार माने, सभी ने खुशी से दर्द पिलाया है।।
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भीड़ में बहुत मिले लोग, मगर दोस्त अब भी दिल में छाये हैं।
तन्हाई नहीं अब सताती इतना, अच्छी यादें जो साथ लाये हैं।
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दिन में राम का नाम जापें, रात को रम में गला तापें।
‘दीपकबापू’ खड़े दरबार में, भक्त अपना ही भाव नापें।।
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नाम के त्यागी सिंहासन पर विराजे, बजवा रहे प्रशंसा में बाजे।
‘दीपकबापू’ पकड़े वैभव मार्ग, भक्तों को दिखाते स्वर्ग के दरवाजे।
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नारे लगाकर वह लूट जाते, वादे निभाने से भी छूट जाते।
‘दीपकबापू’ शिष्टाचारी ठग बने, भले लोग झूठ से टूट जाते।।
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मौसम बदलने के अहसास नहीं होते, जज़्बात सामानों का बोझ ढोते।
‘दीपकबापू’ दिल के अंदाज से अनजान, अपने लिये ही अकेलापन बोते।।
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शांति की बात कातिलों से करते, भलमानसों में अपने लिये शक भरते।
‘दीपकबापू’ चला रहे बहसों का दौर, लाशों की तरफ देखने से डरते।।
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पहले पांच बरस बीते, अगले भी बीत जायेंगे।
‘दीपकबापू’ बनाये नये नारे, नयी फसल लायेंगे।।
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Wednesday, July 6, 2016

राजसी कर्म में फल की प्रधानता होती है-हिन्दी चिंत्तन लेख(Hindu Religion thought Article On Society)

                    आप अगर सात्विक हैं पर ज्ञानी नहीं तो आपका राजसी कर्म उस रूप में फलीभूत नहीं रह सकता जिस तरह चाहते हैं। इस संसार में कर्म तीन प्रकार हैं होते है-सात्विक, राजसी तथा तामसिक। इसमें राजसी कर्म में कर्म व फल का भौतिक सिद्धांत चलता है जिसमें कल्पना या आदर्श ढूंढना अज्ञान ही कहा जा सकता है।
                1.राजसी कर्म में संलिप्त लोगों में फल की कामना होती है और जब वह आपका सहयोग करें तो कार्य संपन्न होने पर पुरस्कृत अवश्य करें।
                     2. हम यह कभी मानकर न चलें कि सात्विक व्यक्ति अगर राजसीकर्म में सहयोग कर रहा है तो उसे पुरस्कार की आवश्यकता नही है।  यह मानकर कि वह निष्कामी है और हमारा काम करना उसका कर्तव्य है उसे पुरस्कार न दें। ऐसा सोचना अज्ञान है।
                      3.एक बात याद रखें सात्विक ज्ञानी व्यक्ति की आंतरिक शक्तियां इतनी प्रबल होती हैं कि वह समय पर अगर कर्तव्य निभाता है तो पुरस्कार न मिलने को अपमान समझकर वह दंड भी दे सकता है।
               4.अपना काम निकल जाने पर सात्विक ज्ञानियों को भूल जाने वाले कृतघ्न बहुत जल्दी अपने स्थिति से गिर जाते हैं।

                   हम इतिहास का अध्ययन करें तो जिन राजपुरुषों ने सात्विक, ज्ञानी, तथा योगियों का सम्मान किया उन्होंने दीर्घ अवधि तक राज किया पर जिन्होंने उनका अपमान किया वह अंततः अपनी स्थिति से भ्रष्ट होकर काल कलवित हो गये। महाभारतकालीन विद्वान विदुर जी का कहना है कि बुद्धिमान की बाहें लंबी होती है उससे कभी बैर नहीं लेना चाहिये। उसी तरह उन्होंने यह भी का है कि अपना काम करने वालों को उपयुक्त पुरस्कार देखकर उसकी प्रसन्नता क्रय करना चाहिये।
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Thursday, April 14, 2016

रक्तकुंड अब नीर कहलाने लगे हैं-हिन्दी क्षणिकायें (Hindi ShortPoem)

रौशनी के रहवासी
अंधेरों के घेरे से
घबड़ाते हैं।
नहीं जानते
रौशनी के खंबे
अंधेरी बस्तियों के
मजदूर ही लगाते हैं।
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सौदागर कर रहे
लोगों से घर में
रौशनी के लिये चांद का सौदा।
विज्ञापन के बीच जारी बहस
बेईमानी कम करने पर
भूले ईमानदारी का मसौदा।
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अरसा हो गया
धरती से फरिश्तों को
लापता हुए
अब यादों में ही आते हैं।

अब तो शैतान ही
मुखौटा लगाकर
धोखा देने आते हैं।
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जहान की चिंता करते
शब्दों के व्यापारी
चीज कोई बेचते नहीं
छवि बना लेते भारी।
सपने साथ वादों का
व्यापार अनवरत जारी
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हमने तो हमदर्दी जताई
वह रस्म मानकर सो गये।

हमारे दिल से निकले
शब्द हवा में खो गये।

दर्द हल्का करने का भ्रम
यूं ही ढो गये।
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आत्मघात करने वाले
अब वीर कहलाने लगे हैं।

ज़माने के लिये रोने वाले
अब पीर कहलाने लगे हैं।

कहें दीपकबापू रक्तकुंड
अब नीर कहलाने लगे हैं।
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दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, March 13, 2016

राज्य जोंक की तरह व्यापार से कर वसूल करे-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(State Must libral on Tax for Trade Devlopment-A Hindu Hindi Thought based on ManuSmiriti(

हमारे देश की अर्थव्यवस्था समाजवाद के उस उस खिचड़ी सिद्धांत पर आधारित है जो पूंजीवाद और जनवाद के मिश्रित तत्वों बना है। इस सिद्धांत के अनुसार धनिक से अधिक कर लेकर गरीब का कल्याण किया जाना चाहिये।  जिस कृषि को भारतीय अर्थव्यवसथा का आधार माना जाता है वहां से कोई कर नहीं वसूला जाता-अनेक लोगों ने राय दी थी कि बड़े किसानों पर कर लगना चाहिये पर भारतीय आर्थिक रणनीतिकर इस सोच से भी घबड़ाते हैं कि कहीं उन पर गरीब विरोधी होने का आरोप न लग जाये। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि समाजवाद के नाम पर नये पूंजीपति पैदा होने से रोका गया जिससे कथित विकास के नाम पर चंद औद्योगिक घराने परंपरागत रूप से अपना वर्चस्व बनाये हुए हैं।  उदारीकरण की प्रक्रिया में भी उन्हें ही सुविधायें मिल रही हैं। इससे हुआ यह कि हमारे यहां परंपरागत व्यापार  पर ही करों का बोझ पड़ा है जो कि मध्यमवर्ग ही संचालित करता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम्।
तथ वेष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत् सततं करान्।।
हिन्दी में भावार्थ-राज्य प्रबंधक को कर इस तरह लगाना जिससे व्यापार की बढ़ोतरी होने के साथ कोषालय में यथोचित लाभ पहुंचे। ठीक उसी तरह जैसे जोंक, बछड़ा तथा भ्रमर धीरे धीरे भोजन ग्रहण करते हैं।
अगर हम अपने देश के परंपरागत ढांचे को देखें तो यहां कृषि के बाद उच्च, मध्यम तथा निम्न तीनों वर्ग इस पर आश्रित रहे हैं।  नयी शिक्षा प्रणाली जहां पहले ही व्यापार करने की प्रवृति का हतोत्साहित कर रही थी वहीं अब आधुनिक विकास ढांचे में उसके लिये जगह ही नहीं बची है। औद्यागिक संस्थान अपने उत्पादों का व्यापार स्वयं कर रहे हैं। इतना ही नहीं आवश्यक खाद्य पेय वस्तुओं को भी वह बृहद व्यापार संस्थानो में विकास की वस्तुऐं बना रहे हैं जिससे परंपरागत व्यापार का स्वरूप ढहता जा रहा है जो कि हमारे समाज का कृषि के बाद दूसरा ठोस आधार है।
यह सही है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है पर समाज के केंद्र बिंदू में स्थित होने के कारण व्यापारिक वर्ग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यही वर्ग संस्कार, संस्कृति तथा धर्म की धारा का नियमित प्रवाह भी करता रहा है। अगर हम चाहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था सृदृढ़ हो तो हमें इस वर्ग में प्रोत्साहन की धारा प्रवाहित करनी होगी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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Saturday, February 27, 2016

अज्ञानी को दान लेने का हक नहीं-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख (Agyani ko Daan lene ka hak Nahin-A Thought article Basee on ManuSmriti)

                         कुछ जनवादी संगठनों के कथित वैचारिक युवा अक्सर मनुस्मृति को जलाने की बात करते सुने।  कहते हैं कि उसमें दलितों के लिये खराब बातें कही गयी हैं।  उनकी बात सुनकर हमारी राय तो यह बनी है कि जिस तरह श्रीमद्भागवत को पढ़ने के बावजूद उसे समझे बिना उसके ज्ञान का प्रचार पेशेवर ज्ञान प्रचारक करते हैं उसी तरह ही मनुस्मृति के कुछ अंश पढ़े बिना ही उसका दुष्प्रचार करने वाले भी विद्वान  कम नहीं है। पहली बात तो यह कि मनुस्मृति में जन्म के आधार पर जाति का उल्लेख है तो कर्म भी उसके निर्माण का तत्व माना गया है। इसका आशय यह है कि जन्म के आधार पर एक जाति हो सकती है तो कर्म के आधार पर उसमें बदलाव भी माना जा सकता है।  दूसरी बात यह कि हर प्रकार के कर्म करने वाले का यह धर्म है कि अपनी योग्यता के अनुसार ही उपलब्धि ग्रहण करे।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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आतपास्त्वनाधीयानः प्रतिग्रहरुचिद्विंजः।
अम्भस्यश्मप्लचेनैव सह तेनैव मजति।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान तपस्या व विद्या से रहित होने पर भी दान लेता है वह नरक भोगता है जैसे पत्थर की नाव पर चढ़ने वाला व्यक्ति उसके साथ ही डूब जाता है।
                        हमारे यहां दान की परंपरा है उसमें यह शर्त जोड़ी गयी है कि सुपात्र को ही दिया जाना चाहिये।  सुपात्र में किसी की जाति का उल्लेख नहीं है इसलिये किसी वर्ण विशेष पर दान से कृपा नहीं हो सकती। इतना ही नहीं जो आमजनों में ज्ञान प्रचार का काम करते हैं वह भी अगर उस राह पर नहीं चलते तो उन्हें भी दानदक्षिणा लेने का अधिकार नहीं-यही मनुस्मृति में कहा गया है। कभी कभी तो लगता है कि मनुस्मृति का विरोध करने के लिये कथित उच्च जाति के ज्ञान विक्रेता दलित जाति के लोगों को इसलिये उकसाते हैं ताकि उसमें जो जाति, धर्म तथा ज्ञान के जो सिद्धांत बताये गये हैं उसे वह न पढ़ें न समझें। उनका लक्ष्य समाज में अज्ञान के अंधेरे में स्वर्ग की कृत्रिम रौशनी बेचकर अपना धंधा बनाये रखना है। इतना ही नहीं मनुस्मृति में भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा हत्या के भी कड़े दंड बताये गये हैं जिससे कुछ लोग भयभीत हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, February 20, 2016

मनृस्मृति में वर्णित हैं धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत-हिन्दी चिंत्तन लेख(Secularism Thought in ManuSmriti-Manuwad Is GraeatThought-HInduDharama Sandesh)

                        भारतीय तथा पाश्चातय धार्मिक विचाराधाराओं में मूल अंतर यह है कि हम मनुष्य के कर्म को ही धर्म की संज्ञा देते हैं जबकि विदेशी पूजा पद्धति के आधार पर उसका नाम तय करते हैं। भारत में विदेशी धार्मिक व सामाजिक विचाराधाराओं के साथ ही अध्यात्म में विषय में भ्रम पैदा हुआ है। हमारे यहां अभी तक राज्य प्रबंध के समर्थन के कारण प्रगतिशील तथा जनवादी चिंत्तन धारा अे पेशेवर विचारकों को समर्थन मिला जिससे वह समाज में बौद्धिक शिखर पर प्रभावी हो गये। यही कारण है कि हमारे यहां लोगों के इष्ट, पूजा पद्धति तथा पहनावे के आधार पर धर्म का रूप तय किया जाने लगा है। इसके बाद भारतीय समाज में जाति, क्षेत्र तथा भाषा के आधार पर बांटकर उसे आपस में लड़ाया जाता है। कर्म वह आचरण के आधार पर किसी के व्यक्तित्व व कृत्तिव पर दृष्टिपात करने की बजाय उसके भौतिक रूप को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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जातिज्ञानपदान्धर्मान्श्रेणीधर्माश्च धर्मवित्।
समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्म प्रतिपादवेत्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-धर्मज्ञ राजा को जाति धर्म, जनपद धर्म, श्रेणी धर्म तथा कुल धर्म को अच्छी तरह समझकर अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिये।
                        हमारे यहां राज्य की धर्मनिरपेक्षता से आशय पाश्चात्य आधार पर बने संज्ञाधारी धर्मों को समान देखने की दृष्टि से माना जाता है जबकि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कर्म के आधार पर बने धर्मो में बीच सामंजस्य स्थापित करना राजधर्म बताया गया है। जाति, जनपद या क्षेत्र, व्यवसाय या श्रेणी तथा कुल के आधार पर हर मनुष्य में स्वभाविक गुण होते हैं जिनकी जानकारी होने पर राज्य प्रमुख सहजता से प्रजा पर नियंत्रण कर सकता है। हमने देखा होगा कि हमारे देश में कुछ जातियों में दैहिक  क्षमता व आक्रामक प्रवृत्ति किसी क्षेत्र विशेष में उत्पन्न के कारण अधिक होती है जिससे उसके लोगों को रक्षा संस्थाओं में सेवा करने के लिये वरीयता दी जाती है।  यह ठीक भी है जहां बल से कार्य होता है वहां उसमें दक्ष व्यक्ति ही आवश्यक है लेकिन जहां बुद्धि तथा व्यवसाय कौशल वाली सेवाओं में वह दक्षता की बजाय किताबी ज्ञान देखा जाता है जबकि वहां प्रबंध कुशल के साथ ही व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता भी देखा जाना चाहिये।
                        रक्षाकर्मी का रक्षा, व्यवसायी का व्यवसाय, बुद्धिमान का मार्गदर्शन तथा सेवक का सेवा ही कर्म होता है जिसका निर्वाह ही उसका धर्म भी है।  राज्य प्रबंध में कुशल प्रमुख अपने देश की जातियों, वर्णों तथा वर्गों के कर्म तथा धर्म को समझकर उसमें अपने अनुकूल सेवका का चयन करता है। सर्वधर्मसमभाव की कला में पारंगत राज्य प्रमुख ही सहजता से राज्य कर सकता है-हमारी दृष्टि से मनुस्मृति की यही मान्यता लगती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, February 14, 2016

ज्ञान से प्रतिपक्षी को परास्त करें-हिन्दी चिंत्तन लेख (Gyan se praipakshi ko parast kar-Hindi Thought article)


                        सामाजिक जनंसपर्क ने जहां विश्व में धाक जमाई हैं वहीं अभद्र भाषा के शब्दों के प्रयोग ने चिंता का वातावरण भी बनाया है। अनेक बार ऐसा होता है कि हम जैसे लेखक किसी फेसबुक, ट्विटर वह ब्लॉग पर प्रदर्शित सामग्री पर असहमति जताने की चाहत इसलिये भी छोड़ देते हैं कि वहां बीभत्स शब्द पहले ही दर्ज होते हैं। यह डर लगता है कि कहीं हम आक्रामक विरोधियों के साथी न समझ लिये जायें। शुद्ध देशी भाषा की गालियां देखकर मन खराब हो जाता है। दुनियां में संसार में समाज भिन्न व्यक्तियों, विचारों व विषयों के समूह से ही बनता है।  भिन्नता से भरा है इसलिये तो समाज कहलाता है। एकरूपता होने पर तो एक ही इकाई ही कहलाता न! ऐसे में अपने से प्रथक विचार वाले व्यक्ति की उपस्थिति सहजता से स्वीकार करना चाहिये न कि उस पर आक्षेप लगाकर अपने अंदर कुंठा लाना चाहिये।
                        सामवेद में कहा गया है कि ऋतस्य जिव्हा पवते मधु।सच्चे मनुष्य की वाणी से मधु टपकता है।
                        जब हम किसी विचार से असहमत हों तो उस पर प्रतिविचार अभिव्यक्त कर सकते हैं-यही ज्ञानी होने का प्रमाण भी होता है। तर्क में भार बढ़ाने के लिये अभद्र शब्द का पत्थर रखना आवश्यक नहीं-अगर रखते हैं तो यही माना जायेगा कि वक्ता या लेखक में अपने ही शब्दों के प्रति विश्वास नहीं है।
                        अथर्ववेद में कहा गया है कि क्षिणामि ब्रह्णामित्रायुन्नयामि स्वानहम्।ज्ञान से विरोधियों का क्षरण कर अपने को आगे बढ़ाये।
                        हमारे देश में विद्वानों के बीच विचाराधाराओं का द्वंद्व सदैव रहा है। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के वाहक होने के नाते हमारा अन्य  विचाराधारा के विद्वानों से मतभेद रहा है। उनसे बहसें भी होती रहीं है पर हमने हमेशा अपनी सहज प्रवृत्ति से उनके सामने अपने तर्क रखे हैं। इधर अंतर्जाल पर प्रगति व जनवादी विद्वान भी अपनी पूरी उसी पूरी शक्ति के साथ सक्रिय है।  उनका राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों से पंरपरागत प्रचार माध्यमों में सदैव वाद विवाद रहा है पर इधर अंतर्जाल पर भयानक वाक्युद्ध में बदल गया है। चूंकि राष्ट्रवादी विचाराधारा के लेखक हमारा अध्यात्मिक लेखन के कारण हमारा सम्मान करते हैं इसलिये उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वह सभी का सम्मान करें। खासतौर से जब राष्ट्रवादी भारत के प्राचीन दर्शन को जब अपना प्रिय विषय मानते हैं तब यह आशा तो की ही जाती है कि वह ज्ञान से प्रतिपक्षियों को परास्त करें। यही हमारे वेद  भी कहते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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