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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Saturday, April 21, 2012

विदुर नीति-इस संसार में गरीब और अमीर दोनों ही ज़िंदा रहते हैं (is sansar mein garib aur amir zinda rahte hain)

            हमारे अध्यात्म ग्रंथों में भगवान के अवतारों, देवताओं, ऋषियों, मुनियों तथा संत कवियों की महिमा का वर्णन किया गया है। इससे प्रभावित होकर अनेक लोग वैसा ही बनने या दिखने का पाखंड रचते हैं। आजकल हम देखते हैं कि देश, समाज, तथा गरीबों का कल्याण करने का दावा करने वालो अनेक लोग मिल जायेंगे। इतना ही नहीं आधुनिक काल में अनेक ऐसे महापुरुष का चरित्र प्रचारित किया जाता है जिन्हें देश, समाज तथा गरीबों का उद्धारक कहकर उनके अनुयायी सामान्य लोगों का संचालन करते करते हैं। अगर आधुनिक प्रचारतंत्र की तरफ देखें तो लगेगा कि साक्षात देवता अपने नये अवतारों में हमारे देश में विचरण कर रहे हैं। आत्मविज्ञापन के माध्यम से सर्वश्रेष्ठ बनने से अधिक लोगों को दिखने के लिये प्रेरित लोग समाज सेवा को विशुद्ध रूप से व्यवसाय की तरह कर रहे हैं। एक मजे की बात है कि निज आचरण को सार्वजनिक चर्चा से अलग कर यह कहा जाता है कि सामाजिक जीवन में सक्रिय लोगों का केवल बाह्य काम देखा जाये।
         विदुरनीति में कहा गया है कि
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                 न स्वप्नेन जयेनिद्रां न कामेन जयेत् स्त्रियः।
                 नेन्धनेन जयेदग्नि न पानेन सुरां जयेत्।।
            ‘‘सपनों को निद्रा से, काम से स्त्री तथा लकड़ी से आग तथा अधिक मदिरा पीकर व्यसनों की जीतने की इच्छा करना व्यर्थ है।
              ’’सहस़्ित्रणेऽपि जीवन्ति जीवन्ति शातिनस्तथा।।
               धृतराष्ट्र निमुंचेच्छां न कर्थचित्र जीव्यते।।
             ‘‘जिनके पास हजार है वह भी जीवित है तो जिसके पास सौ है वह भी जी रहा है। यह बात निश्चित है कि जो लोभ छोड़ेगा वह भी अपना जीवन व्यतीत करेगा।’’
               आज हम जब समाज की स्थिति देखते हैं तो आम आदमी एक भेड़ की तरह दिखाई देता है जिसे वह खास लोग हांक रहे हैं जिनका आचरण, कर्म तथा लक्ष्य पवित्र नहीं है पर वह शिखर पर इस तरह स्थापित हैं कि उनका निजत्व देखना कठिन है। सार्वजनिक जीवन में देवत्व का दर्जा प्राप्त करने वाले कथित लोग अपने निजत्व में राक्षसत्व का का मिश्रण कर अपने श्रेष्ठ होने का आत्म विज्ञापन करते हैं। जिन लोगों को अपने भले के अलावा कुछ करना नहीं आता वही समाज सेवा करने के लिये आ रहे हैं। तत्व ज्ञान को रटने के बाद मोहमाया का संग्रह करने वाले कथित गुरु अपने आपको अवतार घोषित कर देते हैं। ऐसे में हमें विदुर नीति से प्रेरणा लेकर यह स्वयं तय करना चाहिए कि कौन कितने पानी में हैं? साथ ही यह सोचना चाहिए कि जिनके पास धन संपदा का अभाव है वह भी जिंदा रहता है। जिंदा रहने के लिये धन से अधिक संकल्प की आवश्यकता होती है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, April 15, 2012

पतंजलि योग साहित्य-बुद्धि और दृश्य का संयोग समझें

            देह और आत्मा को लेकर हमारे समाज में अनेक विचार प्रचलन में है पर पतंजलि योग सूत्र के अनुसार आत्मा जहां देह के लिये प्राण धारण करता है वहीं देह में कार्यरत इंद्रियों के अनुसार सक्रिय रहता है। इसके लिये यह जरूरी है कि योग के माध्यम से इसे समझा जाये। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के कुछ विद्वान आत्मा को परमात्मा का अंश मानते हैं तो कुछ आत्मा को ही परमात्मा मानते हैं। इस तरह की राय में भिन्नता के बावजूद यह एक सत्य बात है कि आत्मा अत्यंत शक्तिशाली तत्व है जिसे समझने की आवश्यकता है। दरअसल जो लोग के माध्यम से इंद्रियों और आत्मा का संयोग करते हैं वही जानते हैं कि तत्पज्ञान क्या है और उसको सहजता से कैसे जीवन में धारण किया जा सकता है। आत्मा और परमात्मा में भेद करने जैसे विषयों में अपना दिमाग खर्च करने से अच्छा है कि अपनी आत्मा को पहचानने और उसे अपनी इ्रद्रियों को संयोजन का प्रयास किया जाये।
            पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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            द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।
          ‘‘चेतनमात्र दृष्ट (आत्मा) यद्यपि स्वभाव से एकदम शुद्ध यानि निर्विकार तो बुद्धिवृति के अनुरूप देखने वाला है।
           तदर्थ एवं दृश्यस्यात्मा।।
         ‘‘दृश्य का स्वरूप उस द्रष्टा यानि आत्मा के लिये ही है।’’
          पंचतत्वों से बनी इस देह का संचालन आत्मा से ही है मगर उसे इसी देह में स्थित इंद्रियों की सहायता चाहिए। आत्मा और देह के संयोग की प्रक्रिया का ही नाम योग है। मूलतः आत्मा शुद्ध है क्योंकि वह त्रिगुणमयी माया से बंधा नहीं है पर पंचेंद्रियों के गुणों से ही वह संसार से संपर्क करता है और बाह्य प्रभावों का उस पर प्रभाव पड़ता है।
           आखिर इसका आशय क्या है? पतंजलि विज्ञान के इस सूत्र का उपयोग क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर तभी जाना जा सकता है जब हम इसका अध्ययन करें। अक्सर ज्ञानी लोग कहते हैं कि ‘किसी बेबस, गरीब, लाचार, तथा बीमार या बेजुबान पर अनाचार मत करो’ तथा ‘किसी असहाय की हाय मत लो’ क्योंकि उनकी बद्दुआओं का बुरा प्रभाव पड़ता है। यह सत्य है क्योंकि किसी लाचार, गरीब, बीमार और बेजुबान पशु पक्षी पर अनाचार किया जाये तो उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही वह स्वयं दानी या महात्मा न हो चाहे उसे ज्ञान न हो या वह भक्ति न करता हो पर उसका आत्मा उसके इंद्रिय गुणों से ही सक्रिय है यह नहीं भूलना चाहिए। अंततः वह उस परमात्मा का अंश है और अपनी देह और मन के प्रति किये गये अपराध का दंड देता है।
         कुछ अल्पज्ञानी अक्सर कहते है कि देह और आत्म अलग है तो किसी को हानि पहुंचाकर उसका प्रायश्चित मन में ही किया जा सकता है इसलिये किसी काम से डरना नहीं चाहिए। । इसके अलावा पशु पक्षियों के वध को भी उचित ठहराते हैं। यह अनुचित विचार है। इतना ही नहीं मनुष्य जब बुद्धि और मन के अनुसार अनुचित कर्म करता है तो भी उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही जिस बुद्धि या मन ने मनुष्य को किसी बुरे कर्म के लिये प्रेरित किया हो पर अंततः वही दोनों आत्मा के भी सहायक है जो शुद्ध है। जब बुद्धि और मन का आत्मा से संयोग होता है तो वह जहां अपने गुण प्रदान करते हैं तो आत्मा उनको अपनी शुद्धता प्रदान करता है। इससे अनेक बार मनुष्य को अपने बुरे कर्म का पश्चाताप होता है। यह अलग बात है कि ज्ञानी पहले ही यह संयोग करते हुए बुरे काम मे लिप्त नहीं होते पर अज्ञानी बाद में करके पछताते हैं। नहीं पछताते तो भी विकार और दंड उनका पीछा नहीं छोड़ते।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, April 8, 2012

पतंजलि योग सूत्र-इच्छाओं का त्याग ही सन्यास है (patnjali yog sootra-ichchaon ka tyag hee snyas)

                 हमारे देश में सन्यास तथा वैराग्य को लेकर भारी भ्रम प्रचलित हैं। विषयों में आसक्ति का अभाव होने का मतलब यह माना जाता है कि मनुष्य कोई कर्म ही नहीं करे। संसार के अन्य जीवों से कटकर कहीं वन में जाकर रहने को ही सन्यास माना जाता है। दरअसल कर्म और सन्यास की जो व्याख्या श्रीमद्भागत गीता में की गयी उसे समझने में हमारा समाज असमर्थ रहा है। कर्म करना और उसके फल में आकांक्षा न होना ही सन्यास है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य अपनी देह के रहते बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता। वह तत्वज्ञान को जानने के बाद विषयों से प्रथक नहीं होता बल्कि उसमें आसक्ति का त्याग कर देता है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब हम कोई काम करते हैं तो वह केवल हमें इसलिये करना चाहिए कि उससे हमारा जीवन निर्वाह होगा। इससे अधिक अपेक्षा करने पर निराशा हाथ लगती है।
                     पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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                   दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम।।
               ‘‘दिखने और सुनने वाले विषयों से सर्वथा तृष्णारहित चित्त की अवस्था है वही वैराग्य है।’’
                     तत्परं पुरुषरव्यातेर्गुणवतृष्ण्यम्।।
                 ‘‘मनुष्य के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना ही परम वैराग्य है।’’
              हमें गाना सुनना है सुने। फिल्म देखनी है देखें। गाड़ी पर जाना है जायें। वैराग्य तो उनमें आसक्ति से हैं। जब हम यह सोचते हैं कि गाना सुने बगैर हमारे कान रह नहीं सकते। फिल्म देखे बिना हमारी आंखें प्यासी रह जाती हैं। गाड़ी में बैठे बिना हमारा मन तृप्त नहीं होगा। यहीं से शुरु होती है मानसिक तनाव की जो हमें ऐसी स्थिति में पहुंचाता है जहां बड़ा से बड़ा ज्ञान भी धरा का धरा रह जाता है। संसार के विषयों से हम अलग नहीं हो सकते मगर उनमें इस तरह की लिप्पता कभी सुखद नहीं होती। शराबी और जुआरी समाज में कभी विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि सब जानते हैं कि वह उनके बिना चल नहीं सकते इस कारण किसी भी दूसरे आदमी के कर्म के योग्य नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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