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Sunday, December 27, 2015

अखंड भारत के लिये चिंत्तकों की सेना बढ़ानी होगी(Akhand Bharat ke liye Chinttakon ki sena badhani hogi)


                               आजकल प्रचार माध्यमों पर अखंड भारत की चर्चा चल रही है। सच बात तो यह है कि अंग्रेजों ने भारत के खंड कर उसे स्वतंत्रता दी। उनका मुख्य उद्देश्य यह था कि कभी भारत इतना शक्तिशाली न हो जाये कि कहीं उनके सम्राज्य को ही चुनौती मिलने लगे। इतना ही नहीं उन्होंने अपनी शिक्षा प्रणाली, राज्य प्रबंधन व सांस्कृतिक पद्धति भारतीय जनमानस में इस तरह स्थापित की वह गुलामी के जाल से कभी बाहर ही नहीं आ सके। हम आज जब खंड खंड हो चुके भारतवर्ष का नक्शा देखें तो इस बात की भावनात्मक अनुभूति होगी कि  इस क्षेत्र में लोगों के आपसी सहज संपर्क रोकना ही अप्राकृतिक प्रयास है। हम आज अपने पड़ौसी अच्छे संबंध की बात कर रहे हैं-यह ऐसा ही जैसे किसी व्यक्ति के  हाथ पांव अलग अलग जंजीरों में बांध कर कहंे कि वह सहृदयता की साधना कर रहा है। हम जिन्हें पड़ौसी कह रहे हैं वह हमारी भारतभूमि का अभिन्न अंग हैं। जिसे हम पाकिस्तान कह रहे हैं वह हिन्दूओं के दो बड़े स्थान हैं-सक्खर का जिंदपीर और ननकाना साहिब का गुरुद्वारा। प्राचीन तक्षशिला और हिंगलाज माता का मंदिर भी वहीं स्थित है। सबसे बड़ी बात यह कि हमारे इन कथित नये पड़ौसियों को  धर्म की छत्रछाया मेें वहां केे समाजों को लाने की कोशिश की गयी-जो बेकार साबित हुई। हम आज जिस भारतीय समाज के मूल सहिष्णु स्वभाव की बात कर रहे हैं उसके ठीक विपरीत यह विभाजन हुआ है। फिलहाल अखंड भारत बनना कठिन लगता है पर सच यह है कि इसके बिना इस क्षेत्र में शांति भी नहीं हो सकती।
                              
                               मूलत हिन्दू धर्म नहीं वरन् एक ऐसी जीवन पद्धति है जिसमें मानव जाति को अन्य जीवों से अधिक प्राकृतिक गुण होने का सत्य स्वीकार करते हुए विशिष्ट कर्म के लिये प्रेरित करती है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार ही मनुष्य में अन्य जीवों से अधिक गुण होना तभी लाभदायक है जब बौद्धिक अभ्यास किया जाये। अंग्रेजों ने भारत का विभाजन धर्म के आधार पर इसलिये कराया ताकि यहां का समाज इतना शक्तिशाली न हो जाये कि कहीं उनका मायावी सम्राज्य बिखर जाये।  भारत में विभिन्न पूजा पद्धतियां हमेशा रही हैं पर विवाद नहीं हुआ।  अंग्रेजों के समय इन्हें धर्म रूप देकर यहां का समाज विभाजित किया गया।  आज स्थिति यह है कि पूजा पद्धति को धर्म के खाने में रखकर उसके मानने वाले हिन्दूधर्म को चुनौती देते हैं। मूलतः जिसे हम दक्षिणएशिया समूह कह रहे हैं कि वह वास्तव में भारतवर्ष है।  इसे भारतीय उपमहाद्वीप भी कहा जाता है जिसका समाज धर्म के आधार पर विभाजित किया गया है। स्थिति यह है कि पाकिस्तानी इस क्षेत्र का नाम भारतीय उपमहाद्वीप कहने का भी विरोध किया जाता है।  ऐसे में अखंड भारत की कल्पना अच्छी लगती है पर इससे पहले तो अपने इन नये पड़ौसियों को भारतीय उपमहाद्वीप कहने के लिये प्रेरित किया जाये। एक बात याद रखें इन क्षेत्रों के लोग कथित भारतीय समाज के प्रति नकारात्मक भाव के कारण धर्म के जाल में फंसे। वह स्वयं को भारतीय कहलाने मेें ही संकोच करते हैं तो हिन्दू शब्द की संज्ञा तो स्वीकार हीं नहीं करेंगे।
अभी असहिष्णुता विवाद में कथित बुद्धिमानों का एक तर्क सुना था कि भारतीय समाज अभी तक सहिष्णुता के भाव सराबोर है जो अब कम हो रहा है।  तय बात है कि उनके दिमाग में अंग्रेजों की तय की गयी कागजी रेखा पर रह रहे समाज से ही था। अंग्रेजी शिक्षा के कारण उनका चिंत्तन संकीर्ण दायरों में सिमटा है। पाकिस्तान व बांग्लादेश उनकी दृष्टि से  भारतीय समाज का हिस्सा नहीं है जिनका निर्माण ही असहिष्णुता के आधार पर हुआ है। तय बात है कि जब हम अखंड भारत की कल्पना कागज पर उतारने की बात करते हैं तो पहले अपनी चिंत्तकों की सेना बढ़ानी होगी जो अभी नगण्य है।        
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Thursday, December 24, 2015

सजा के विषय पर विदेशी विचारों का अनुकरण संभव नहीं(Crime in India and Punishment,No Equality like west)


                     हमारे देश में बढ़ती जनसंख्या के लिये यहां के समशीतोष्ण जलवायु भी मानी जाती है। कहा जाता है कि भारत में ग्रीष्म की प्रधानता के कारण यहां लोगों में जनसंख्या वृद्धि रखने की प्रवृत्ति है।  जनसंख्या की वृद्धि अनेक समस्याओं की जनक है जिसमें अपराधों की वृद्धि स्वाभाविक है।  अतः कम से कम हम ऐसे अनेक अपराधों से निपटने में पश्चिम के उदार रवैये का अनुसरण बिना विचारे नहीं कर सकते जिसकी अपेक्षा मानवाधिकार के प्रचारक करते हैं।
                           संविधान के अनुसार बाल अपराध नियम में आयु 18 से घटाकर 16 की गयी है। यह स्वागत योग्य है पर हमारी राय यह भी थी किसी प्रकरण विशेष में अभियुक्त की आयु तीन या चार माह कम होने पर  न्यायाधीशों को भी विवेक का उपयोग करने का अधिकार होना चाहिये। भारत की तुलना मानवीय स्वभाव की दृष्टि से शेष विश्व से नहीं की जा सकती है।  कहा जाता है कि  उष्णजलवायु व  जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत में बालक जल्दी बड़ा  या कहें बुद्धिमान होता है। इसके साथ ही  गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ेपन की स्थितियां होने सेे  अनेक बच्चों को  14 वर्ष की आयु में ही खींचतान के युवा बनाकर मजदूरी  या अपराध करने के क्षेत्र में उतरने को बाध्य किया जाता है। केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी जी सही कहती हैं कि असभ्य  लोग अपने बच्चों को कानून में आयु का लाभ उठाकर आपराधिक कृत्य में लगा देते हैं। हमारा मानना है कि 16 वर्ष बाल अपराध की आयु मानने के साथ ही  न्यायाधीशों को 3 से 4 माह कम होने पर स्वविवेक उपयोग करने का हक तो  देना ही चाहिये। बाल न्याय कानून में बदलाव करना आवश्यक था पर इसका विरोध होना समझ से परे रहा। वैसे जजों को विवेक का अधिक होना चाहिये।
          हमारे यहां वैसे भी न्यायाधीश को भगवान का दूसरा रूप माना जाता है। इसलिये आधुनिक न्याय व्यवस्था में न्यायाधीशों को केवल किताबी कानून पर चलने की बजाय स्वविवेक से निर्णय करने की भी स्वतंत्रता होना चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, December 13, 2015

बाबा रामदेव की योगी व उत्पाद विक्रेता की छवि का संघर्ष( Imege of Baba Ramdev between Yogi and Product Seller)

                               इधर हम अंतर्जाल पर सामाजिक जनसपंर्क लेखकों की टिप्पणियां और पाठ देखते है तो लगता है कि  बाबा रामदेव के उत्पादों पर उनकी नकारात्मक दृष्टि हो गयी है।  इनमें से अधिकतर वह लोग हैं जिन्हें स्वाभाविक रूप से बाबा रामदेव या भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का विरोधी नहीं माना जा सकता। ऐसे लेखकों में भारतीय अध्यात्मिक तत्व मौजूद हैं पर वह बाबा रामदेव के योग से दूर हटकर व्यवसायिक रूप में आने पर निराश हैं। यदि वह परंपरागत विचारधाराओं के लेखक होते तो शायद हम उनके शब्दों को अनदेखा कर देते पर चूंकि वह स्वतंत्र लेखक हैं इसलिये हमारा मानना है कि उनकी आपत्तियों पर विचारा होना ही चाहिये।
                               बाबा रामदेव ने भारतीय योग साधना को आमजनों में लोकप्रिय बनाने का जो काम किया, वह अनुकरणीय है। हम जैसे योग और ज्ञान साधक  उनकी तुलना भक्तिकाल के महापुरुषों से करते रहे हैं। आमजनों में उनकी छवि रही है पर लगता है कि दवाईयां, बिस्कुट, आटा, घी तथा पेय पदार्थ बेचते बेचते उसका क्षरण  हो रहा है। अभी तक यह देखा गया कि भारतीय अध्यात्मिक के जीवंत व्यक्तित्व के रूप में ऐसी छवि  बनी हुई है जो अक्षुण्ण रहेगी। अब जिस तरह उनके उत्पादों के प्रति नकारात्मक चर्चा प्रचार माध्यमों के स्वर नकारात्मक हो रहे है वह दुःख से अधिक चिंता का कारण है। आगे इन्हीं उत्पादों का नकारात्मक पक्ष आने पर उनकी छवि प्रभावित भी हो सकती है। हम जैसे अध्यात्मिक चिंत्तकों के लिये यही चिंता का विषय है।
                               हमें याद है जब चौदह वर्ष पूर्व उद्यान में हम कुछ योगसाधना के दौरान जब सिंहासन व हास्यासन करते थे तो लोग मजाक उड़ाते थे। तालियां बजाते थे तो लोगों को लगता कि शायद यह मानसिक रोगी हैं। बाबा रामदेव के प्रचार पटल पर आने के बाद अब लोग समझ गये कि योग साधक वास्तव में करते क्या हैं? इसका मतलब यह भी है कि प्रचार की वजह से ही उन्हें लोकप्रियता मिली।  अब योगशिक्षा से अधिक उनके उत्पादों का प्रचार हो रहा है जिसमें कहीं दोष भी बताया जाता है। ऐसे में लग रहा है कि कहीं ऐसा तो नहीं धीरे धीरे उनकी छवि से जुड़े योग को जनमानस में विस्मृत करने का प्रयास हो रहा है। हमारा विचार है कि बाबारामदेव को अपनी योग की छवि पर ही अधिक ध्यान देना चाहिये। वैसे भी योग साधना जहां पूर्ण रूप से अध्यात्मिक विषय हैं वही विक्रय योग्य वस्तु राजसी गुण का प्रतीक है जिसमें ऊंच नीच होता ही रहता है।  ऐसे में अगर अध्यात्मिक छवि के आधार पर राजसीकर्म का विस्तार होता है तो उसका प्रभाव भी परिणाम के अनुसार अच्छा बुरा हो सकता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Friday, December 4, 2015

कमजोर को सजा-हिन्दी कविता (Kamjor ko Saja dete hain-Hindi kavita)

किसी के दुखती नस पर
हाथ रखकर
लोग मजा लेते हैं।

अपने गम
छिपाने के लिये
दिल बजा लेते हैं।

कहें दीपकबापू जिंदा जज़्बात से
रिश्ता तोड़ चुका ज़माना
लोग अपने कसूर की
कमजोर को सजा देते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Wednesday, December 2, 2015

जिसे जिज्ञासा नहीं उसे ज्ञान देना निरर्थक-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख (jise Jigyasa nahin use gyan dena Vrath-Hindu spirituly Thught base on ChankyaNiti)

                             भारतीय पंथ व ज्ञान का प्रचार करने वाले अक्सर पश्चिमी पंथ मानने वालों को अध्यात्मिक दर्शन का उपदेश देकर यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि कोई बडा़ काम कर रहे हैं। हम यह तो नहीं कह सकते कि पश्चिमी पंथ मानने वाले सभी भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परिचित नहीं है पर इतना जरूर देखा है कि अनेक लोगों में यह प्रवृत्ति  है कि वह इसे न समझना अपना गौरव समझते हैं।  हमारे भारतीय दर्शन के अनुसार अध्यात्मिक संस्कार बचपन में पड़ गये तो सही वरना बड़ी उम्र में तो इसकी संभावना नगण्य है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अन्तःसारविहीनामुपदेशो न जायते।
मलगाचलसंर्गात् न वेणश्चन्दनायते।।
हिन्दी में भावार्थ-जिसके अंतकरण में सार समझने का अभाव है उसे उपदेश देना व्यर्थ है। वह मलयगिरी के पर्वत की तरह है जहां आने वाली वायु के स्पर्श से भी बांस चंदन नहीं होता।

                             दूसरी बात यह भी देखी गयी है कि भारतीय पंथ के प्रति नकारात्मक भाव तथा पश्चिमी पंथ अपनाकर समाज में प्रथक दिखने की प्रवृत्ति कुछ लोगों में  इस तरह भरी हुई है कि उसे सहजता से नहीं हटाया जा सकता।  इसलिये हमारी भारतीय ज्ञान के प्रचारकों को सलाह है कि वह भारतीय पंथों पर चलने वाले समाज से अधिक संवाद करें क्योंकि हमारी दृष्टि से यह आवश्यक है कि वह सबसे पहले मजबूत बने।
हिन्दुत्व को चुनौती देने वाले गलत-ट्विटर पर टिप्पणियां
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 ताज्जृब जिस हिन्दुत्व का आधार वह गीता है जो चार प्रकार के भक्त तथा तीन प्रकार की भक्ति का अस्तित्व स्वीकार करने का संदेश देती है उसे ही असहिष्णु बताया जा रहा है।  श्रीमद्भागवत्गीता को हर हिन्दू मानता है इसलिये किसी भी भक्त के आराधित इष्ट रूप तथा उसकी भक्ति के पंथ पर टिप्पणी नहीं करता।  उस हिन्दू तथा उसके हिन्दुत्व को वह लोग चुनौती दे रहे हैं जिन्होंने धनदाताओं के अनुसार अपनी कलम से  शब्द रचने के साथ ही मंचों पर  मुख से बोले। एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि वैश्विक आतंकवाद को वैचारिक आधार पर केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। जिन्हें यह टिप्पणी पसंद नहंी है तो वह बतायें कि क्या रामायण, श्रीमद्भागत तथा वेद का अध्ययन करने वाले किसी व्यक्ति ने आतंकवाद का रुख किया है?
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Wednesday, November 25, 2015

गुरुनानकदेवजी पूरे विश्व के लिये प्रेरक-गुरुनानक जंयती पर लेख(Gurunanakji Inspiration for all World-Hindi Article on Gurunanak Jayanti hindi lekh)

आज गुरुनानक जयंती देश भर में मनाई जा रही है। हमारे देश में आजादी के पहले तक धार्मिक विभाजन की चर्चा नहीं होती थी पर अब लोग करने लगे हैं-इससे एक बात साफ होती है कि देश में अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव है। गुरुनानक जी ने हिन्दू धर्म में अंधविश्वासों के निवारण का ऐसा काम किया जिसे देश में चेतना का वातावरण बना-इसी कारण उन्हें भगवत्रूप माना जाता हैं। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधाराओं को मानने वाले सभी लोग  गुरुनानक जी को मानते हैं पर कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले उन्हें सिख धर्म के प्रथम प्रवर्तक के रूप में ही प्रचारित करते हैं। गुरुग्रंथ साहिब में अनेक बार राम का नाम लिखा है। इसके संदेश इतने स्पष्ट हैं कि उन्हें समझकर कोई भी व्यक्ति संसार का सत्य समझ सकता है।
गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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साधो रचना राम बनाई।
इकि बिनसै इक अस्थिरु माने अचरजु लखिओ न जाई।।
                           हिन्दी में अर्थ-यह संसार राम की रचना है। हैरानी इस बात की है कि एक आदमी सबके सामने मरता है फिर भी अन्य लोग यह सोचते हैं कि वह तो हमेशा स्थिर रहने वाले हैं।
                           इस तरह अनेक संदेशों का अर्थ समझें तो ऐसे लगेगा कि हम अनेक प्रकार के भ्रमों में जी रहे हैं। हम अपने साथ अनेक प्रकार की आशायें, कामनायें तथा इच्छायें लिये होते हैं जो कालांतर में भय, निराशा तथा तनाव का वातावरण बनाती हैं। इसलिये आज गुरुनानक देव जी के संदेशों को अधिक से अधिक समझने की जरूरत है।
                           गुरुनानक जी जैसे महापुरुष संसार में सदियों बाद आते हैं। यह हमारी भारतभूमि के लिये गर्व की बात है कि ऐसे महापुरुष पूरे विश्व के लिये प्रेरक बनते हैं। गुरुनानक जयंती पर सभी ब्लॉग लेखक साथियों, फेसबुक मित्रों तथा ट्विटर के अनुयायियों को बधाई।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Tuesday, November 24, 2015

अंगों के अनुष्ठान से ही ज्ञान प्राप्त होता है-योगसाधना पर विशेष लेख (Angon ke anushtan se gyan prapta hota hai-A Special article on Yoga Yogsadhna)


                       भारत संभवतः अपने संपूर्ण अध्यात्मिक ज्ञान के कारण विश्व गुरु माना जाता है।  इसके अनुसार जब तक देह, मन और विचार के विकार नहीं निकलेंगे तब तककिसी भी प्रकार की भक्ति या साधना हार्दिक भाव से नहीं हो सकती।  हमारे अनेक पेशेवर धार्मिक विद्वान लोगों को काम, का्रेध, मोह, लोभ तथा अहंकार के दुर्गुण त्याग कर भक्ति करने का संदेश देते हैं जबकि वह स्वयं ही अपने शिष्यों से दान, चंदा तथा अन्य प्रकार की ऐसी सेवायें भी लेते हैं जिसके लिये उन्हें दाम देना नहीं देना पड़ता। हमने अनेक ऐसे पेशेवर विद्वान भी देखे हैं जो योग साधना को केवल दैहिक साधना प्रचारित कर अपने शिष्यों को भ्रमित करते हैं।

पतंजलि योग सूत्र में कहा गया है कि
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योगाङ्गनुष्ठादशुद्धक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः।।
                       हिन्दी मे भावार्थ-योग से अंगों का अनुष्ठान करने से अशुद्धि का क्षरण होता है जिससे ज्ञान का प्रकाश होने से विवेक की प्राप्ति होती है।
                       योग साधना के आठ भाग हैं जिसमें आसन तथा प्राणायाम दो भाग मात्र हैं। छह अन्य भाग-यम, नियम, प्रत्याहार, ध्यान और समाधि-का प्रचार कम होता है पर यह सब भी योग साधना का महत्वपूर्ण भाग हैं। समाधि भक्ति का सर्वोच्च स्तर है जिसमें आत्मा ही परमात्मा रूप हो जाता है। अगर कोई साधना और अभ्यास से योग में पूर्णता प्राप्त कर  लेता है तो वह किसी व्यक्ति, विषय तथा वस्तु के प्रति आकर्षित नहीं होता जबकि पेशेवर विद्वान लोगों का ध्यान अपनी तरफ बनाये रखने के लिये तमाम तरह के स्वांग रचते हैं। इतना ही नहीं अनेक आश्रम में ही व्यवसाय करते हुए लोगों को न केवल सांसरिक विषयों के मंत्र जपाते के साथ ही  दैहिक विकारों के लिये इलाज भी बताते हैं।
                       हम पतंजलि योग का अध्ययन स्वयं करें तो पायेंगे कि निरंतर अभ्यास करने से जहां दैहिक विकार कभी घर नहीं करते वहीं मानसिक तथा वैचारिक रूप से भी दृढ़ता आती हैं। अनेक व्यसनों में रत रहते हुए विकारग्रस्त होने के बाद योग साधना को ही अपना नशा बताने वाले हमारे मित्र ने हमसे यह बात कहीं।
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Sunday, November 22, 2015

वैचारिक बहस से आतंकवाद पर नियंत्रण संभव नहीं संकट-हिन्दी लेख (World Terratish Not Control by Theorical Disscisopm-Hindi Article or Hindi lekh)

                           कथित रूप से अगर किसी धर्म का नाम लेकर उसके सिद्धांतों पर राज्यप्रबंध चलाने की बात कही जायेगी तो तय है कि उसके विद्रोही भी अपना संगठन चलाने की बात कहा सकते हैं। तब निष्पक्ष व्यक्ति यह तर्क स्वीकार कैसे कर सकता है कि  राज्यप्रबंध का धर्म से संबंध है पर आतंकवाद का नहीं।
                           आतंकवाद विश्व में एक व्यवसाय की तरह चल रहा है। आतंकी संगठन भी धर्म का उपयोग उसी तरह कर रहे हैं जैसे कि सफेदपोश व्यवसायी करते हैं। इस विषय पर धर्म के नाम पर बहस करने वालों में वैचारिक खोखलापन साफ दिखता है। दरअसल धर्म को लोगों ने पूजा पद्धति, खानपान, रहनसहन और चाल चलने के नियमों का समूह मान लिया है। विदेशी विचाराधाराओं पर यह नियम लागू हो पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन पर लागू नहीं होता। इसके अनुसार सांसरिक तथा अध्यात्मिक विषय प्रथक प्रथक हैं। हमें ऐसा लगता है कि भारत के बाहर पनपी  विचाराधाराओं में अध्यात्मिक ज्ञान का नितांत अभाव है शायद यही कारण है कि उसके कुछ अनुयायियों में अपने ही मत को लेकर भ्रम की स्थिति है जिससे आतंकवाद का वैश्विक संकट खड़ा हुआ है।
इस  समय विश्व में चल रहे आतंकवाद के इतिहास पर नज़र डालें तो यह साफ दिखेगा कि यह पैंतीस से अधिक वर्ष से चल रहा है। यह अलग बात है कि समय के साथ आतंक के शीर्ष और उनके संगठनों के नाम बदलते रहे हैं।  हथियारों के नये रूप तथा प्रचार माध्यमों की नयी तकनीकी के साथ आतंकवादी संगठनों का कार्यशैली बदल जाती है। हमने पिछले दस वर्षों से स्वयं देखा है कि पहले वेबसाईटें, ब्लॉग तथा अन्य साधनों के साथ पहले आतंकवादी बनाते हैं तो अब फेसबुक और ट्विटर भी का भी उन्होंने पहले अपने ढंग से पूरा उपयोग किया। जहां तक आतंकवाद का युद्ध से सामना करने का सवाल है वह एक अलग विषय है पर समस्या यह है कि कुछ लोग इस पर वैचारिक बहस कर अपनी धार्मिक चर्चायों करने लगते हैं और इससे समाज में भ्रम फैलता है। यही कारण है कि कम से कम इस संकट का हल वैचारिक प्रहार से होता नहीं दिखता। जब तक भारतीय दर्शन के आधार पर अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषयों को प्रथक नहीं देखा जायेगा तब तक आतंकवाद का कम से कम वैचारिक रूप से मुकाबला करना बेमानी है।

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Saturday, November 21, 2015

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की तुलना विदेशी विचारधाराओं से करना व्यर्थ(Indian Spiritual Thought And Other Riligion Policy)


अक्सर कहा जाता है कि सभी धर्म मनुष्य को शांति, अहिंसा और प्रेम से रहना सिखाते हैं।  सच बात तो यह है भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान दर्शन की विश्व की किसी अन्य विचाराधारा से कोई तुलना नहीं है। यहां तक  कि विश्व की अनेक विचाराधाराओं की किताबों की तुलना श्रीमद्भागवत ग्रंथ से करते हुए कहा जाता है कि सभी प्रेम अहिंसा तथा उदार रहना सिखाती हैं। यह केवल एक नारा भर है।  श्रीमद्भागवत गीता तथा हमारे अन्य शास्त्र केवल इष्ट स्मरण की आराधना करना ही नहीं सिखाते वरन् अपने मन मस्तिष्क के विकार निकालने की प्रेरणा भी देते हैं। जबकि अन्य विचारधारायें विकार निकलाने की कला नहीं सिखातीं।
पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि
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कायेन्दियसिद्धिरशुद्धिक्षयान्तपस।
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                           हिन्दी में भावार्थ-तप के प्रभाव से जब अशुद्धि का नाश हो जाता है तब शरीर और इंद्रियों की सिद्धि भी हो जाती है।
                           सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप की आराधना हो मन मस्तिष्क में शुद्धता के बिना फलीभूत नहीं हो सकती।  हम जब विश्व में शांति तथा सुख की कल्पना करते हैं तो उसके लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की राह चलना आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि भारतीय दर्शन में अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषय अलग कर संदेश दिया जाता है जबकि पश्चात्य विचाराधाराओं में सांसरिक विषयों से ही सर्वशक्तिमान पाने की कल्पना की जाती है।  हमारा मानना है कि विश्व में शांति, एकता, अहिंसा तथा विकास का वातावरण स्थापित करने के लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का प्रचार प्रमाणिक विद्वानों के माध्यम से किया जाना चाहिये। ऐसे ही विद्वान प्रमाणिम माने जा सकते हैं जो अपने जीवन निर्वाह के लिये गृहस्थाश्रम या धर्म में स्थित होकर योग साधना की शिक्षा देते हुए विचरते हैं।  सन्यास के नाम पर पंचतारा सुविधाओं में आश्रमों के निवासियों को विद्वता की दृष्टि से प्रमाणिक नहीं मान जा सकता। जयश्रीराम, जयश्रीकृष्ण, सुप्रभात।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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Wednesday, November 18, 2015

भारत में सहशिक्षा पर विचार करना आवश्यक(Bharat mein Sahshiksha par vichar karna Awashyak)


                                   
                                   भारत में छात्र छात्राओं की सहशिक्षा पर सदैव विवाद चलता रहा है। जहां आधुनिकतावादी सहशिक्षा को पौंगपंथी मानते हैं वह सामाजिक, धार्मिक तथा स्वास्थ्य विशेषाज्ञों का एक समूह आज भी इसका समर्थक है।  केरल के शिक्षामंत्री ने कहीं कह दिया कि महाविद्यालय में लड़के लड़कियों को एक साथ नहीं बैठना चाहिये। इसे प्रचार माध्यम विवादित कहकर शोर मचा रहे हैं।
                                   इस तरह के बयान पहले भी आते रहे हैं जिन्हें दकियानूसी कहकर खारिज किया जाता है पर सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक दिखने के प्रयास में प्राकृत्तिक सिद्धांतों की अनदेखी तो नहीं कर रहे।
                                   भारत को विश्व में समशीतोष्ण जलवायु वाला माना जाता हैं। यहां गर्मी और सर्दी अधिक पड़ती हैं।  अशिक्षा, गरीबी तथा बेकारी के कारण जनसंख्या बढ़ती है। कहा जाता है कि जहां विकास हो वहां जनंसख्या नियंत्रण स्वयं हो जाता है। भारत में उष्णता की प्रचुरता के कारण यौनिक उन्माद की प्रवृत्ति अधिक मानी जाती है। हम यह भी देख रहे हैं कि युवा रिश्तों में खुलेपन की वजह से अनेक प्रकार के संकट भी पैदा हो रहे हैं।  सबसे बुरी बात यह कि शैक्षणिक संस्थानों में जिन्हें मंदिर भी कहा जाता है वहां सहशिक्षा के चलते लड़के लड़कियों के बीच पाठयक्रम की कम अन्य विषयों पर चर्चा अधिक होती है। वहां परंपरागत खेलों की जगह प्रेम या मित्रता के नाम पर खेल होने लगता है। हम भारत की किसी भी भाषा में बनी फिल्म को देखें तो पायेंगे कि शैक्षणिक संस्थान केवल प्रेम करने के लिये ही होते हैं।  फिल्मों का प्रभाव समाज पर कितना है हम सभी जानते हैं और इनकी देखादेखी जहां सहशिक्षा है वहां अनेक ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो बताती हैं कि वास्तव में अब विचार किया जाना चाहिये।
                                   पहले तो मनुष्य में दैहिक तथा मानसिक संयम अधिक होता था पर आज तो उसकी शक्ति का हृास हो गया है। ऐसे में ऐसी राय ठीक है पर कोई न माने यह अलग बात है पर कम से कम शोर तो न मचाये। हम अपने देश में जिस तरह अनेक  छात्र तथा छात्राओं के शिक्षा से इतर गतिविधियों से उनके पालको परेशान देखते हैं उससे तो यह लगता है कि अब भी छात्र छात्राओं के लिये प्रथक शैक्षणिक संस्थान बने रहना जरूरी है। कम से कम भारत में जो सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्थिति है उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है। सुप्रभात
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Monday, November 16, 2015

पेरिस पर हमले से अभी सबक सीखा नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख(Not Lesson learn from Paris Attack or Paris Terror-Hindi Thought article)


                                   पेरिस पर हमले के बाद पूरे विश्व में उथलपुथल मची है। उस पर कहने से पूर्व हम भारतीय योग सिद्धांत की बात करें। यह सच है कि क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। हम अगर किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति से अनुकूल प्रतिक्रिया चाहें तो अपनी किया उसके अनुरूप करनी होगी।  दूसरा कर्म और फल के सिद्धांत को भी ध्यान रखना होगा। यूरोप तथा अमेरिका हथियारों के उत्पादक तथा निर्यातक देश हैं।  पेरिस पर निरंतर हो रहे हमलों को हम धर्म तथा लोकतंत्र के सीमित दृष्टिकोण से उठकर व्यापक चिंत्तन के दायरें में आयें तो पता चलेगा हर व्यापारी अपनी वस्तु का प्रचार करते हुए उसके प्रयोग का भी प्रचार करता है। इसलिये संभव है कि पहले अपराधियों को ऐसे हथियार देकर उनके हमलों से प्रचारित अपने हथियारों के  बेचने का बाज़ार बनाते हों।
                                   हम एशियाई देशों की सेनाओं तथा पुलिस विभागों की स्थिति में नज़र डालें तो उनसे पहले नये हथियार अपराधियों के पास आये।  उससे प्रभावित होकर संबंधित देशों ने उत्पादक देशों से हथियार खरीदे। एक-47 बंदूक इसका प्रमाण है।  एशियाई देशों ने खरीदी पर बाद में पता चला कि उसका नया रूप पहले ही अपराधियों के पास आ गया है।  अमेरिका व यूरोप हथियार निजी क्षेत्र के माध्यम से हथियार बेचते हैं जिन्हें क्रेता के प्रमाणीकरण की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे में संदेह होता है कि हथियारों के मध्यस्थ कहीं आतंकवादियों को प्रचार नायक तो नहीं बनाते? अमेरिका ने सीरिया सरकार के विद्रोहियों की सहायता के लिये हथियार हवाई जहाज से नीचे गिराये थे-जिनके संबंध आतंकी संगठनों से प्रत्यक्ष दिख रहे थे।  अमेरिका मध्यपूर्व में अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये जिन संगठनों को अपना मित्र समझता है उन्हें शेष विश्व आतंकी कहता है। इस तरह विश्व के राज्यप्रबंधकों तथा आतंकवादियों के बीच एक ऐसा रिश्ता है जिसकी व्याख्या करने बैठें तो एक ग्रंथ लिखना पड़ेगा।
                                   मध्यपूर्व में जबरदस्त अस्थिरता फैली है और हमारा अनुमान है कि उसका प्रकोप काम होने की बजाय बढ़ते रहने वाला ही है। आतंकवादी जिन देशों को ललकार रहे हैं वह सभी कहीं न कहीं हथियार के कारखानों की कमाई से अपनी संपन्नता बढ़ाने  वाले रहे हैं।  अब उनके सामने स्वयं के बने हथियार दुश्मन की तरह सामने आने वाले हैं।  मध्यपूर्व से लाखों शरणार्थी इन देशों में गये हैं जिनके साथ आतंकवादी भी हैं।  पेरिस में हुए हमलों से यह जाहिर हो गया है कि इन संपन्न देशों का राज्यप्रबंध के अभेद होने का भ्रम समाप्त हो गया है। जिस तरह इन देशों के राजकीय प्रबंधकों की प्रतिक्रियायें सामने आयी हैं उससे तो नहीं लगता कि वह जल्दी आतंकवादी पर विजय प्राप्त करेंगे।  वैसे जिन लोगों ने पचास वर्षों से लगतार समाचार देखे और पढ़े हों उन्हें पता है कि कोई राजनीतिक, धार्मिक या वैचारिक संघर्ष प्रारंभ होता है तो वह अगले दस वर्ष तक चलता है।  जब थमता भी तो उसके कारण प्राकृतिक होते हैं-राजकीय प्रबंधक बयानबाजी तक ही सीमित रहती है।
                                   अब योग और भारत की बात करें।  कुछ लोगों को चिंता है कि भारत में भी मध्यपूर्व के आतंकवादी संगठन आ सकते हैं। हमारे पास खुफिया संगठन नहीं है पर योगदृष्टि से हमें यह आशंका नहीं लगती।  एक बात तो यह कि भारत ने कोई हथियार योग नहीं किया-उसने बंदूकें तोप या टैंक नहीं बेचे जो उनका मुंह हमारी तरफ होगा।  इसलिये जिन्होंने युद्ध योग किया है उन्हें प्रतियुद्ध भी झेलना ही होगा। अगर इन देशों को प्रतियुद्ध से बचना है तो युद्ध योग से बचते हुए हथियार के कारखाने बंद करने होंगे। जिसकी संभावना नहीं दिखती। उल्टे जिस तरह यह देश मध्यपूर्व देशों में अधिक हमले कर रहे हैं उससे शरणार्थी संकट बढ़ेगा और आतंकी इन्हीं देशों में जायेंगे।  आखिरी सलाह भारतीय प्रचार माध्यमों को भी है कि वह मध्यपूर्व के आतंकी संगठनों का नाम अधिक न लें कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान कहीं उसके नाम से आतंकी भेजने लगे।
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Friday, November 6, 2015

संतों की मतभिन्नता से खिन्नता लाने की आवश्यकता नहीं-अष्टावक्रगीता के आधार पर चिंत्तन लेख(A Hindu Spirutual Thought article based on Ashtawakaragita)

         
            भारतीय धर्म दर्शन में अनेक ग्रंथ है। इनके आधार पर हर कोई अपनी समझ के अनुसार व्याख्या करता है।  अब यह अलग बात है कि भाषा, भाव और शैली की भिन्नता के  कारण इन व्याख्याताओं के कारण अनेक प्रकार के ज्ञान संचार में विरोधाभास पैदा होते हैं। अनेक व्यवसायिक व्याख्ता धारणा शक्ति के अभाव में केवल ज्ञान रट कर ही ज्ञान सुनाते हैं। दूसरी बात यह कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में साकार-निराकार और सकाम-निष्काम भक्ति को सहजता से स्वीकार किया है पर हमारे पेशेवर धार्मिक शिक्षक दोनों की इनकी प्रथक प्रथक व्याख्या नहीं करते इस कारण भी उनके विचार तथा  आचरण में अंतर रहता है।  वैसे भी कथनी और करनी के अंतर को पाटना कठिन होता है ऐसे में पेशेवर धार्मिक शिक्षक मतभिन्नता फैलाकर समाज को भ्रमित करते हैं।

अष्टावक्र गीता में कहा गया है कि
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नाना मतं महर्षि साधूनां योगिनां तथा।
दृष्टवा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः।।
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                                   हिन्दी में भावार्थ-महर्षियों, योगियों तथा साधुओं के प्रथम मत होते हैं। यह देखकर उपेक्षा को प्राप्त मनुष्य शांति नहीं पाता।
                                   इस मतभिन्नता के कारण अनेक जिज्ञासु खीझ जाते हैं।  उनको हमारी सलाह है कि वह इस खिन्नता से बचने के लिये स्वयं धर्मग्रथों का स्वयं अध्ययन करें। पहले शब्द का अर्थ स्वयं ग्रहण करें फिर उस पर चिंत्तन से अपनी राय बनायें। पहले जब देवभाषा संस्कृत का प्रभाव व्यापक नहीं था तब सामान्यजन विद्वानों की सभा में श्रवण कर ज्ञान सुनते थे जिसे आज सत्संग परंपरा कहा जाता है। यह अलग बात है कि कालांतर में ऐसे अनेक विद्वान गुरु कहलाने में मोह में फंसकर मायावी लीला करने लगे। अब तो अक्षरज्ञान वाला बृहद समाज है पर फिर भी अध्ययन कर स्वयं ज्ञानी बनने की बजाय लोग इन पेशेवर विद्वानों की शरण लेते हैं। इससे भक्त लोगों के शोषण की परंपरा बन गयी है। इसका एक ही उपाय है कि धर्मग्रथों का स्वयं अध्ययन करें।
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Friday, October 30, 2015

कहां है चीन के विकास से सबक लेने वाले-हिन्दी चिंत्तन लेख (Chenge in China Populatain policy-Hindi thought aritcle)

                               
            चीन से विकास का सबक सीखने का उपदेश देने वाले बतायें कि आखिर चीन ने जनसंख्या नीति में हम दो हमारा एक का सिद्धांत हटाकर हम दो हमारे दो क्यों बना दिया। दरअसल उलटपंथी हमेशा ही भौतिक विकास की बात करते हैं।  वह हमेशा ही समाज मेें व्याप्त गरीबी, असमानता और भेदभाव समाप्त कर धरती पर स्वर्ग लाने का सपना बेचकर लोगों को भ्रमित करते हैं।  उलटपंथी कार्ल मार्क्स के पूंजी ग्रंथ को गीता  बताते हैं जबकि उसमें अध्यात्मिक ज्ञान का ककहरा भी नहीं है।
                                   जब तक चीन हम दो हमारे एक के सिद्धांत पर चल रहा था उसने खूब भौतिक विकास किया। यह अलग बात है कि उसका विकास बड़े शहरों से होकर मंझोले और छोटे शहरों के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में कितना पहुंचा इसकी व्यापक जानकारी उपलब्ध नहीं है। बहरहाल अब वहां के समाज को वृद्ध प्रधान माना जाता है।  इसके विपरीत भारत अब युवा प्रधान देश हो गया है। चीन ने औद्योगिक विकास खूब किया। अपना निर्यात बढ़ाया जिससे उसकी आर्थिक शक्ति बढ़ी। अब समस्या दूसरी आयी है।  विश्व में आर्थिक मंदी आ गयी है। चीन के अनेक उत्पादन आकर्षक तथा सस्ते होने के बावजूद अधिक टिकाऊ नहीं होते।  अगर जेब में पैसा हो तो भारत के स्वदेशी उत्पादन आज भी श्रेष्ठ माने जाते हैं। चीन में लोगों की क्रय क्षमता का स्तर क्या है यह पता नहीं पर इतना तय है कि वह अपने उत्पादन  देश में खपाने में सक्षम नहीं है। मजदूरों का अभाव हो रहा है-तय बात है कि उपभोक्तओं का भी अभाव होगा।
                                   एक तरह से कहें तो समाज समाप्त ही हो गया होगा। हम समाज का यहां सिद्धांत  है कि व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज होता है।  जहां एक दंपत्ति के पास एक बच्चा होगा तो उसके पास भाई या बहिन नहीं होगा। पत्नी होगी पर साला या साली नहीं होगी। पति होगा पर ननद या देवर नहीं होगा।  परिवार का यह अवरुद्ध क्रम समाज के स्वरूप के विस्तार में बाधक होता है। सीधी बात कहें तो चीन एक ऐसा देश है जिसे व्यक्ति से जोड़ने वाला समाज लापता है। चीन में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है पर संबंधों के संकीर्ण दायरों में कैद आम चीनी कैसे सांस लेते होंगे इस पर तो ढेर सारी कहानियां हो सकती हैं। कम से कम अब चीन के विकास से सबक लेने वालों को अपने उपदेश बंद कर देना चाहिये।
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Saturday, October 17, 2015

ज्ञानियों के लिये मांसाहार न बुरा न अच्छा-हिन्दी चिंत्तन लेख(Gyaniyon ke liye Maansaahar n accha n bura-Hindi Spirituly article)


          इस समय हमारे देश में मांसाहार को लेकर भारी बहस चल रही है। कोई कहता है कि मांस खाना हमारे धर्म के अनुसार ठीक है तो कोई कहता है कि वह हमारे धर्म के अनुसार अपराध है। भारत के प्राचीन ग्रंथ किसी कार्य को बुरा या अच्छा नहीं कहते। उनमें किसी भोजन को वर्जित या स्वागत योग्य नहीं कहा गया है।  हमारे दर्शन के अनुसार यह संसार कर्म और फल के सिद्धांत पर चलता है।  जैसा खाये वैसा हो जाये मन’ ‘जैसा बोयेगा वैसा काटेगातथा बोये पेड़ बबूल का आम कहां से होयजैसी उक्तियां- जिन्हें हम सांसरिक सिद्धांत भी कह सकते हैं-हमें कर्म फल का सिद्धांत समझाती हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाप्नोत्ययलेन यो हिनस्ति न किञ्चन।।
          हिन्दी में भावार्थ- जो मनुष्य किसी के साथ हिंसा नहीं करता वह जिस लक्ष्य का चिंत्तन करता है उसे अपने कर्म और ध्यान से बिना किसी विशेष कठिनाई के प्राप्त कर लेता है।
नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंस मांसमुत्पद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तम्मानान्मांसं विवर्जयेत्।।
          हिन्दी में भावार्थ-मांस की प्राप्ति किसी दूसरे जीव के वध से ही संभव है लेकिन हिंसा से स्वर्ग नहीं मिलता इसलिये मांस खाने का विचार ज्ञानी को करना ही नहीं चाहिये।
           योग और ज्ञानसाधक हमेशा खान पान रहन सहन और संबंध निर्माण में हमेशा सतर्कता बरतते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि उनका प्रभाव उनकी देह, मन और विचार पर पड़ता है। श्रीमद्भागवत गीता में गुणों और इंद्रियों का सहसंबंध बताया गया है। श्री गीता के अनुसार व्यक्ति स्वयं ही अपना उद्धार कर सकता है।
          इधर हम देख रहे हैं कि हमारे देश में आत्म निर्माण की बजाय समाज सुधार का प्रचलन बढ़ा है। विदेशी विचाराधाराओं के कर्णधार समाज के दोषों के निवारण के अभियान चलाते हैं जबकि उनका स्वयं का चरित्र प्रमाणिक नहीं होता। कोई मांस खा रहा है या गलत संगत में समय गुजार रहा है यह उसकी समस्या होना चाहिये।  ज्ञानसाधक उससे संपर्क रखकर अपने अंदर उसके दुर्गण प्रविष्ट नहीं होने देता न कि उस उपदेश देकर बैर लेने का काम करता है।
          अभी हाल ही में हमने देखा कि मंास के विरुद्ध जब प्रचार चल रहा था तब कुछ मनचलों ने मांस सार्वजनिक रूप से खाकर लोकतांत्रक अधिकार के प्रदर्शन का उपक्रम किया। एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमें उन पर तरस आया।  किसी पदार्थ को खाना ही महत्वपूर्ण नहीं होता उसे पचाने के लिये पेट में संघर्ष चलता है। जिसे केवल योग साधक ही देख पाते हैं यही कारण है कि वह ऐसा सुपाच्य भोजन करते हैं जो तन मन और मस्तिष्क की इंद्रियों को व्यथित न करे।  यह बात व्यंग्यपूर्ण जरूर लगे पर फिर भी कह रहे हैं कि मांस खाने वाले शाकाहारियों के मित्र ही है क्योंकि वह अगर सब्जियां खाना प्रारंभ करें तो वह आपूर्ति नियम के अनुसार वह अधिक महंगी हो जायेंगी-वैसे भी इस समय दाल और सब्जियां मौसम की मार से महंगी हो रही हैं।  हम तो मांसाहारियों की तरीफ तब अधिक करेंगे जब वह बिना धनियां, नीबू, प्याज हरी मिर्च और प्राकृतिक मसालों के बिना भी किया करें जैसे कि शाकाहारी लोग मटर, गोभी, लौकी तथा करेला स्वास्थ्य की दृष्टि से करते हैं-इससे भी मसालों की महंगाई कम होगी।
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