समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Friday, May 31, 2013

मनुस्मृति में स्त्रियों को स्वयं वर चुनने का अधिकार-हिन्दी चिंत्तन लेख (manu smriti mein striyon ko swayan var chunna ka adhikar-hindi chinttan lekh)



         
        हमारे देश में पाश्चात्य विचारधाराओं के प्रचारक अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि भारतीय दर्शन स्त्रियों की स्वतंत्रता का हनन करता है।  उसे पहले पिता और पति तथा बाद में पुत्र के अधीन रहने के लिये प्रेरित करता है। ऐसे पाश्चात्य विचाराधाराओं के प्रचारकों की सक्रियता हमेशा ही भारतीय दर्शन के विरुद्ध ही दिखती है। उनकी सक्रियता का अवलोकन करने पर यह भी पता चलता है कि उन्होंने पाश्चात्य विचाराधाराओं को भी नहीं समझा बल्कि भारतीय दर्शन के विरुद्ध चलना है इसीलिये वह उससे नारे लेकर यह गाते हुए अपनी विद्वता प्रदर्शित करते हैं।
   हमारा भारतीय दर्शन वैज्ञानिक आधारों पर टिका है। इसके एक नहीं वरन् अनेक प्रमाण हैं। खासतौर से स्त्रियों को स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय की छूट जितनी है उसे अन्य कोई विचाराधारा नहीं देती। सबसे बड़ी बात है कि विदेशी विचारधारायें स्त्री को हमेशा ही कमजोर दिल वाला मानती हैं।  जबकि हमारा दर्शन मानता है कि स्त्रियों में बुद्धि का स्तर पुरुषों से कम नहीं होता। यही कारण है कि स्त्रियों को समान स्तर के परिवार, वर तथा समाज में विवाह करने का संदेश हमारा दर्शन ही देता है। यही कारण है कि परिवार से उचित समय पर विवाह न करवा पाने की स्थिति में स्वयं ही वर चुनने का अधिकार भी मनुस्मृति में दिया गया है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
------------------
त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत् कुमार्यूतुमती सती।
ऊर्ध्व तु कालादेताम्माद्विन्देत सदृशं पतिम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-ऋतुमती होने के बाद भी अगर पिता कन्या का तीन वर्ष तक विवाह नहीं करे तो तो कन्या को स्वतः किसी योग्य से विवाह कर लेना चाहिए।
काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।
न चैवेनां प्रयाच्छेतु गुणहीनाय कर्हिचित्।।
         हिन्दी में भावार्थ-भले ही ऋतुमती कन्या जीवन भर अविवाहित घर में रह जाये पर उसका विवाह गुणहीन व्यक्ति से नहीं  करना चाहिए।
          विदेशी विचाराधाराओं के प्रचारक मनुस्मृति पर जातिवाद का आरोप लगाते हैं पर इसी में ही अंतर्जातीय विवाह करने की बात भी स्वीकारी गयी है।  हां, इसमें एक बात स्पष्ट रूप से कही गयी है कि स्त्री को अपने से कम स्तर के परिवार का वर चुनने की गलती नहीं करना चाहिये। हमने देखा है कि स्वयं विवाह करने पर अक्सर सम्मान के लिये लड़कियों को परिवार से प्रताड़ित करने की खबरें आती हैं उस समय हमारे देश में पैदा धर्मों का मजाक उड़ाया जाता है जबकि ऐसी घटनाओं में देखा गया है कि लड़कियां अपने परिवार से कम स्तर का वर चुनती हैं।  कभी कभी तो वह प्रथक संस्कार वाले वर को चुनती हैं जिसका ज्ञान उनको विवाह से पहले नहीं हो पाता।  दूसरी बात यह भी है कि विवाह एक आसान क्रिया है पर बाद में गृहस्थी की गाड़ी खींचना आसान नहीं होता। आज के आर्थिक संकट के युग में माता पिता को बाद में भी लड़कियों की जिम्मेदारी लेनी पड़ती है या फिर इसके लिये उनको मजबूर किया जाता है।  दूसरी बात यह है कि बाहरी रूप से अब अंतर नहीं दिखता पर सांस्कारिक रूप से पहले से अधिक कहीं अधिक अंतर समाज में हैं।  ऐसे में प्रथक संस्कार वाले वर से विवाह करने पर लड़कियों को बाद में भारी संकट का सामना करना पड़ता है तब समाज लड़कियोें के माता पिता की मजाक बनाते हैं।  हम इस पर अधिक बहस नहीं कर सकते पर इतना तय है कि लड़कियों को अपने हिसाब से भी योग्य वर चुनने का अधिकार है जिसे रोका नहीं जाना चाहिये।  दूसरी बात यह है कि समय रहते हुए माता पिता को भी अपनी लड़की के लिये योग्य वह गुणवान वर चुनने का कर्तव्य पूरा कर लेना चाहिये अन्यथा लड़की को स्वयं वर चुनने के अधिकार को चुनौती देने का हक उनको नहीं है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, May 28, 2013

संत नागरीदास की दोहावली-अधिक चतुर आदमी की बुद्धि दुख की खान (sant nagridas ki dohawali-adhik chatur aadmi ki buddhi dukh ki khan hotee hai)

     अध्ययन की दृष्टि से अध्यात्म और संासरिक विषय प्रथक प्रथक हैं।  अध्यात्म ज्ञान से संपन्न मनुष्य सहजता से आचरण करते हैं। यह उनकी स्वाभाविक चतुराई है।  जब किसी के पास अध्यात्म ज्ञान होता है उसका दृष्टिकोण सांसरिक विषयों के प्रति सीमित होता है। वह उन विषयों में रत होकर कर्म तो करते हैं पर उसमें अपने हृदय को लिप्त नहीं करते।  निष्काम करने के कारण उनकी बुद्धि में क्लेश का भाव नहीं होता जिससे वह कभी स्वयं को संकट में नहीं फंसने देते।   इसके विपरीत स्वयं को सांसरिक विषयों में चतुर समझने वाले लोग न केवल कामना के साथ कर्म करते हैं बल्कि उसका प्रचार अन्य लोगों को सामने करते हुए स्वयं के लिये चतुर होने को प्रमाण पत्र भी जुटाते हैं। दरअसल ऐसे आत्ममुग्ध लोगों की बुद्धि उनके संकट का कारण ही होती हैं। संसार के एक विषय से मुक्ति पाते हैं तो दूसरा उनके सामने आता है। दूसरे के बाद तीसरा आता है। यह क्रम अनवरत चलता है और केवल सांसरिक विषयों में लिप्त लोग कभी अपने मानसिक तनाव से मुक्ति नहीं पाते।  
संत नागरी दास कहते हैं कि
------------------
अधिक सयानय है जहां, सोई बुधि दुख खानि।
सर्वोपरि आनंदमय, प्रेम बाय चौरानि।
            सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जो मनुष्य अधिक चुतराई दिखाता है उसकी बुद्धि दुख की खान होती है। इसके विपरीत जो प्रेम का मार्ग लेता है वह सर्वोच्च आनंद पाता है।
अधिक भये तो कहा भयो, बुद्धिहीन दुख रास।
साहिब बिग नर बहुत ज्यौं, कीरे दीपक पास।।
            सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-अधिक संख्या होने पर भी कुछ नहीं होता यदि किसी मनुष्य समूह में बुद्धि का अभाव है तो उससे कोई आशा नहीं करना चाहिये। परमात्मा के पास अनेक नर है जैसे दीपक के पास अनेक कीड़े होते हैं।
       अनेक बार हम देखते हैं कि अपराधियों के नाम के साथ भी चतुर या बुद्धिमान होने की संज्ञायें सुशोभित की जाती हैं।  उनकी सफलताओं का बखान किया जाता है पर सच यह है कि यही अपराधी अपने साथ प्रतिशोध लेने की आशंकाओं अथवा कानून के  शिकंजे में फंसने से डरे रहते हैं।  देखा यह भी गया है कि अनेक मानव समूह अपने संख्याबाल पर इतराते हैं क्योंकि उनको लगता है कि इनके पास ढेर सारा बाहुबल है।  समय पड़ने पर जब उनके पास संकट आता है तो वह मिट भी जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि अपराध, अत्याचार या किसी पर आक्रमण करने को बुद्धिमानी नहीं कहा जाता क्योंकि उसमें प्रतिरोध के खतरे भी होते हैं। बुद्धिमानी तो इसमें है कि जीवन में ऐसा मार्ग चुना जो कंटक रहित होने के साथ ही सहज भी हो।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, May 26, 2013

कविवर रहीम का दर्शन-इस संसार का सबसे बड़ा सत्य है भोजन (rahim ka darshan-is sansar ka sabse bada satya hai bhojan, roti a truth of world-A hindu dharma article)



    साम्यवादी विचारधारा के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इस विश्व का सबसे बड़ा सत्य रोटी है।  हमारे देश में उनके अनुयासी उनके इस वचन को विश्व की एक बहुत बड़ी खोज मानते हैं जबकि हमारे अध्यात्मिक विद्वानों ने यह बात तो बहुत पहले ही बता दी थी।  यह अलग बात है कि कार्ल मार्क्स के शिष्य अंग्रेंजी में लिखे गये उनके पूंजी ग्रंथ के अलावा किसी अन्य भारतीय विद्वान की बात पढ़ना ही नहीं चाहते। वह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों को साम्प्रदायिक तथा जातिवादी व्यवस्था का पोषक मानते हुए कार्ल मार्क्स को विश्व का इकलौता धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का पोषक प्रचारित करते हैं।
    हमारा अध्यात्मिक दर्शन न केवल भोजन को मनुष्य के लिये बल्कि हर जीव के लिये एक सत्य के रूप में स्वीकारता है। इतना ही नहीं हमारा दर्शन हर मनुष्य को श्रम से धन कमाने के साथ ही भेाजन अपने हाथ से बनाने का संदेश भी देता है।  उससे भी आगे जाकर हमारा अध्यात्मिक दर्शन श्रमिकों और गरीबों की सहायता की निष्काम भाव से मदद करने की बात कहता है। 
कविवर रहीम कहते हैं कि
------------------
चारा प्यारा जगत में, छाला हित कर लेय।
ज्यों रहीमआटा लगे, ज्यों मृदंग स्वर देय।।
    सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-इस संसार में भोजन सभी जीवों को प्यारा है। इसमें स्वाद तभी आता है जब परिश्रम कर उसे जुटाया जाये। जिस तरह मृद्रग पर आटे की थाप पड़ने से मधुर स्वर होता है उसी तरह अपने मेहनत के कमाये तथा बनाये भोजन में स्वाद आता है।
        अंग्रेजी संस्कृति तथा शिक्षा के प्रभाव के चलते  हमारे देश में शारीरिक तथा अकुशल श्रम को हेय मान लिया गया हैं। हर कोई सफेद कालर वाली नौकरी करना चाहता है। गृहस्थ स्त्रियों के प्रति समाज में एक नकारात्मक भाव बन गया है।  घर पर रोटी बनाने, कपड़े धोने, और बर्तन मांजने जैसे कामों को छोटा बताकर शिक्षित स्त्रियों को उससे विमुख करने का प्रयास भी हो रहा है। एक शोध के अनुसार भारत में गृहस्थी का काम करने वाली स्त्रियों के कार्यों का अगर मुद्रा में मूल्यांकन किया जाये तो वह अपने पुरुषों से ज्यादा कमा रही है।  इसका सीधा मतलब यह है कि पुरुष अगर उन कामों के लिये कहीं दूसरी जगह या दूसरे पर अपनी घरेलु सुविधाओं के लिये   धन व्यय करे तो उसे अपनी कमाई से अधिक भुगतान करना होगा। यह कहा जा सकता है कि  इस तरह उसके घर में काम करने वाली स्त्री उससे अधिक कमा रही है।  स्थिति यह है कि कार्ल मार्क्स के शिष्य इस तरह घर का काम करने वाली स्त्रियों को हेय मानते हुए उनको आजादी के नाम पर बाहर आकर काम करने की प्रेरणा देते हैं। मनुष्य के लिये सर्वोत्म सत्य यानि रोटी का सृजन करने वाली नारियों को इस तरह हेय मानना अपने आप में ही अनुचित विचार लगता है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के प्रमाणिक ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता में भी  अकुशल श्रम को हेय मानना तामस बुद्धि का प्रमाण माना गया है।  कहने का अभिप्राय यही है कि हमें अपने शरीर से अधिक काम लेना चाहिये ताकि वह आर्थिक रूप से उत्पादक होने के साथ ही स्वस्थ भी रहे।  इसी में ही जीवन का आनंद है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, May 24, 2013

दादू दयाल के दोहे-माया के साथ अहंकार भी आता है (dadu dayal ke dohe-maya ke saath ahankar bhee aataa hai)



  अनेक मासूम दिल वाले लोग धनी, उच्च पदस्थ तथा बाहुबली लोगों से दया की आशा से निहारते हैं। कुछ लोग बड़े होने पर भी विनम्र हो सकते हैं पर सभी के अंदर सहृदयता का भाव होना  संभव नहीं है। माया के फेर में फंसे लोगों से दया, परोपकार और अपने से कमजोर व्यक्ति के प्रति सहृदयता दिखाने की उम्मीद करना निरर्थक है।  खासतौर से आजकल अंग्रेजी शिक्षा तथा जीवन पद्धति के साथ जीने के आदी हो चुके समाज में तो यह आशा करना ही मूर्खता है कि धनी, उच्च पदस्थ तथा शक्तिशाली लोग समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभायेंगे।  अंग्रेजी शिक्षा उपभोग के लिये गुलाम तक बनने के लिये प्रेरित करती है तो जीवन शैली अपना पूरा ध्यान सांसरिक विषयों की तरफ ले जाती है।  ऐसे में सामान्य मनुष्य से आशा करना कि वह भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन करेगा, बेकार है |
कविवर दादू दयाल कहते हैं कि
---------------------------
दादूमाया का खेल देखि करि, आया अति अहंकार।
अंध भया सूझे नहीं, का करिहै सिरजनहार ।।
        सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-माया का खेल अत्यंत विकट है। यह संभव ही नहीं है कि जिस मनुष्य के  पास धन, पद और प्रतिष्ठा का अंबार हो वह अहंकार का समंदर में न डूबे। जिसके पास माया है उसे कभी भी परमात्मा की भक्ति हो ही नहीं सकती।
माखन मन पांहण भया, माया रस पीया।
पाहण मन मांखण भया, राम रस लीया।।
      सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिनका मन मक्खन की तरह है उनके पास धन, पद और प्रतिष्ठा यान माया के प्रभाव में वह भी पत्थर हो जाता है। राम का रस पी ले तो पत्थर मन भी मक्खन हो जाता है।
       सच बात तो यह है कि भारत ने हर क्षेत्र में पाश्चात्य व्यवस्था का अनुकरण किया है। एक अंग्रेजी विद्वान ने बहुत पहले कहा था कि इस संसार में बिना बेईमानी या दो नंबर के धन के बिना कोई धनपति बन ही नहीं सकता।  जब हम अपनी प्राचीन पद्धतियों  से दूर हो गये हैं और  भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात नहीं भी करें तो  पश्चिमी विद्वानों का सिद्धांत भी यही कहता है कि बिना बेईमानी के किसी के पास अधिक धन आ ही नहीं सकता।  हम यह भी देखें कि जब किसी के पास बेईमानी से काला धन आता है तो यकीनन उसके साथ अनेक प्रकार के संकट भी जुउ़ते हैं।  ऐसे में ऐसे काले धन के स्वामियों की रात की नींद हराम हो जाती है तो दिन का चैन भी साथ छोड़ देता है। अपने संकटों से दो चार हो रहे बड़े लोग  अपनी रक्षा करेंगे या दूसरों पर दया करने का समय निकालेंगे? इसलिये जहां तक हो सके अपने ही पवित्र साधनों से जीवन बिताना चाहिये और धनी, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठावान लोगों से कोई सरोकार न रखते हुए उनसे आशा करना त्याग देना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, May 20, 2013

रहीम के दर्शन के आधार पर चिंत्तन-बड़े लोगों की नक़ल न करें (rahim ke darshan ke aadhar par chinttan-badon ke nakal na karen)



             इस संसार में युवाकाल के दौरान हर मनुष्य में आक्रामकता रहती है।  उस समय वह किसी काम को करते समय यह नहीं सोचता कि उसका परिणाम क्या होगा? दूसरी बात युवावस्था में दूसरे की होड़ करने की सभी के हृदय में प्रवृत्ति भी अत्यंत तीव्रतर होती है। ऐसे में अनेक लोग अपनी सामाजिक, आर्थिक तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि की परवाह नहीं करते हुए ऐसे कामों में लग जाते हैं जो अनुचित होते हैं। दरअसल जब हीन पृष्ठभूमि वाले लोग देखते हैं कि संपन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को अपने अपराधों का दंड नहीं मिल रहा है तब वह भी उनकी राह चलते हैं।  उसके बाद होता यह है कि निम्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को सजा तो मिल जाती है पर सपंन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को कोई दंड क्या उन पर मामला चलाने का भी कोई साहस नहीं कर सकता।
            यह विधि का विधान कहें या मनुष्य समाज की कमजोरी कि बड़े लोगों पर कोई आक्षेप नहीं करता बल्कि छोटे आदमी की हर कोई टांग खींचता है। इस सच्चाई को तो वैसे छोटा बड़ा हर आदमी जानता है पर उसके बावजूद कुछ लोग जोश में आकर होश खो बैठते है जिसका परिणाम उनको भुगतना ही पड़ता है।  उस समय भले ही कोई शिकायत करे कि बड़े लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता हम छोटे लेागों को ही दंड भुगतना पड़ता है, मगर यहां सुनता कौन है?
कविवर रहीम कहते हैं कि
___________________

जानि अनीति ज करै, जागत ही रह सोइ।
ताहि सिखाइ जगाइबो, ‘रहिमनउचित न होइ।।
सामान्य हिन्दी भाषा में अनुवाद-जो मनुष्य जान बूझकर अपराध करता है वह जागते हुए भी सोता है।  उसे किसी प्रकार का भी ज्ञान देना व्यर्थ है।
जे रहीमविधि बड़ किए, को कहि दूषण काढ़ि।
चंद्र दूबरो कूबरो, तऊ नखत तें बाढ़ि।।
सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिन लोगों को प्रकृति ने बड़ा बनाया है उनको कोई दोष नहीं देता। निर्बल और कुबड़ा चंद्रमा आकाश में अन्य नक्षत्रों से बड़ा ही दिखाई देता है।
       मूल बात यह है कि जीवन में केवल अपनी छवि, स्थिति तथा शक्ति का ख्याल करते हुए ही अपना लक्ष्य तय करना चाहिए।  अपने आचरण और विचार पर आत्ममंथन करते हुए ही जीवन में सक्रिय होना चाहिये।  यह विचार नहीं करना चाहिए कि दूसरे का कुछ नहीं बिगड़ा तो हम भी कोई अपराध करके बच जायेंगे।  खासतौर से अपने से अधिक संपन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों का अनुकरण करने का विचार भी हृदय में नहीं लाना चाहिए।  जीवन में सहजता, संपन्नता तथा सुख लाने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम अपनी छवि, शक्ति तथा संभावनाओं के अनुसार काम करें न कि दूसरे की नकल कर अपना जीवन संकट में डालें।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, May 18, 2013

दादू दयाल के दोहे -मनुष्य में सच झूठ की पहचान का गुण होना जरूरी (dadu daya ke dohe-sach jhooth ke pahachan ka gun mansuhya mein hona jaroori(



        हम देख रहे हैं कि समाज में अब बुराई और  भलाई की पहचान के साथ पाप पुण्य के कर्म के चयन का  लोगों में ज्ञान नहीं रहा। अक्सर क्रिकेट में फिक्सिंग की चर्चा होती है। अनेक युवा क्रिकेट खिलाड़ियों को मैचों  के लिये अच्छा खासा पैसा मिलता है फिर भी वह अधिक लालच में सट्टेबाजी के चक्कर में फंस जाते हैं। सभी जानते हैं कि कथित सट्टेबाज अपना हित साधने के लिये पैसे का पिंजरा हाथ में लिये फिर रहे है।  फिर भी कुछ क्रिकेट खिलाड़ियों ने उनके इशारों पर नाचकर अपना पूरा भविष्य  ही दाव पर लगा दिया।  यह सब देखकर हैरानी होती है। पकड़े गये खिलाड़ियों न केवल मैचों के लिये अच्छा पैसा मिल रहा था बल्कि उनको प्रतिष्ठित संस्थानओं में सेवा का अवसर भी मिला।  सब कुछ उनको क्रिकेट में बेहतर प्रदर्शन के कारण मिला पर अधिक पैसों की लालच में वह उसे भूल जाते हैं।  पकड़े जाने के बाद उन्हें अपनी गलती पर पछतावा भी होता  है। हालांकि अनेंक लोग इस पर उनकी निंदा कर रहे हैं पर इस विषय पर कोई चर्चा नहीं कर रहा कि आखिर उन्होंने ऐसा किया क्यों?
       अगर हम कहें कि आजकल समाज में संस्कारहीनता की स्थिति है तो यह भी कहना  पड़ता है कि संत कवि दादूदयाल ने तो बरसों पहले ही समाज की दीवानगी की स्थिति बता दी।  उस समय समाज में पाश्चात्य संस्कृति का प्रचलन नहीं था।  तब  हमारे अपने मूल संस्कार अपने ही समाज में बसे  थे। इसके बावजूद  लोगों में सच झूठ और विष अमृत की पहचान नहंी थी जिसका उल्लेख अनेक संत कवि करते हैं।   ऐसे में जब अंग्रेजी संस्कृति के साथ ही वहां के खेलों को भी समाज में स्थापित किया गया है तब उनके कुसंस्कारों से बचना कठिन ही है।
संत कवि दादू दयाल ने कहा है कि
---------------
झूठा साचा करि लिया, विष अमृत जाना।
दुख कौ सुख सब कोइ कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
        सामान्य भाषा में भावार्थ-पूरा संसार एक तरह से दीवाना है। झूठ को सच और विष को अमृत मानता है। दुख को ही सुख समझकर प्रसन्न होता है।
दादूविषे विकार सौं, जब लग मन राता।
तब लग चीत न आवई, त्रिभुवन पति दाता।।
            सामान्य भाषा में भावार्थ-जब मन में विकार और विष बढ़ता है तब कोई भजन नहीं करता।  ऐसे में त्रिलोकपति परमात्मा की हªªदय में सहज अनुभूति नहीं की जा सकती।
          हम क्रिकेट खिलाड़ियों के पकड़े जाने पर कितनी भी बहस कर लें पर इस तरह की सट्टेबाजी रुकने वाली नहीं है। दरअसल संकट किन्हीं व्यक्तियों का नहीं है वरन समाज की सोच का है।  पहले तो किसी के पास पैसे आने पर उसके स्तोत्रों का पता लगाया जाता था पर अब समाज ने इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया है। अब  जिसके पास पैसा है सभी लोग उसके सामने साष्टांग दंडवत् करने के लिये मरे जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि पहले आमतौर से परिवार के बड़े सदस्य गाहे बगाहे अपने से छोटे सदस्यों को धर्म के अनुसार पैसा कमाने का संदेश देते थे। अच्छे बुरे की पहचान का तरीका बताते थे। अब हालत यह है कि बच्चों में धर्म के नाम पर केवल पूजा पाठ करने को कहा जाता है बाकी कोई सिद्धांत समझाया नहंी जाता।  ऐसे में आजकल के युवा चाहे जिसे क्षेत्र में कार्यरत हों उनके अनैतिक आचरण में फंसने की संभावना प्रबल रहती है।  उनके पकड़े जाने पर पर उनकी निंदा तो की जा सकती है पर जिस मानसिकता के चलते वह ऐसा करते हैं,उसका अध्ययन करना भी आवश्यक है। वरना सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।  आखिर सच झूठ, नैतिक अनैतिक तथा विष अमृत की पहचान जिसे न हो उससे हमेशा ही सदाचरण की उम्मीद कैसे की जा सकती है?      

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, May 11, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जब दंड प्रणाली विफल हो तो कौआ पुरोडाश खाने लगता है (economics of kautilya-punisnment and criminal,kautilya ka arthshastra-jab dand pranali vifal ho to kauva pudorasha khane lagta hai)



      पिछले कई दिनों से भारतीय प्रचार माध्यम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों की घटनाऐं प्रचारित कर समाज की स्थिति का रोना रोते हुए  अपने विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं।  अनेक प्रकार की बहस होती  है पर निष्कर्ष के रूप में नतीजा शून्य ही रहा है।  सच बात तो यह है कि हमारे देश की  ही नहीं वरन् पूरे विश्व की दंडप्रणालियां अत्यंत अपराधों के अन्वेषण तथा  विलंब से निर्णय करने का कारक बन गयी हैं।  दूसरी बात यह है कि अपराध अन्वेषण तथा न्यायिक प्रणाली के सदुपयोग की योग्यता जिन लोगों में अधिक नहीं  है वह भी राज्य कर्म में लिप्त होकर समाज की रक्षा का जिम्मा ले लेते हैं।  पुरातन सभ्यताओं में अपराध की प्रकृत्ति के अनुसार दंड की व्यवस्था थी। इनमें कई सजायें क्रूर थी जिनको पश्चिमी सभ्यता के लोग पशुवत मानते थे।  अपने को सभ्य समाज साबित करने के लिये पश्चिम के लोगों ने पशुवत अपराधों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का सिद्धांत स्थापित किया जिससे समाज में अपराध बढ़े ही हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
--------------  ----------------------
यदि प्रणयेराजा दण्डं उण्ड्येष्वतन्द्रितः।
शले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः।
           हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपनी प्रजा की रक्षा करने के लिये अपराधियों को दंड देने में सावधानी से काम नहीं करता तब अव्यवस्था फैलती है। शक्तिशाली मनुष्य कमजोर लोगों पर भारी अनाचार करने लगते हैं।
अद्यात्काकः परोडाशं श्वा लिह्याद्धविस्तथा।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम्
          हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपराधियों को दंड नहीं देता तो कौआ पुरोडाश खाने लगेगा, कुत्ता हवि खाकर स्वामी की बात नहीं मानेगा और समाज उच्च से निम्न स्थिति में चला जायेगा।
        भारत में भी कथित रूप से पश्चिमी व्यवस्था को अपनााया गया है। जिस भारतीय संविधान के आधार पर हमारे देश का वर्तमान स्वरूप विद्यमान है वह भी अंग्रेजों से विरासत में मिला है। हमने अपना संविधान बनाया पर उसके साथ ऐसे अनेक नियम हैं जो अंग्रेजों के काल से ही बने हैं।  अंग्रेज आधुनिक सभ्यता के प्रवर्तक होने का दावा करते हैं जो अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की बात करती है।  इसके विपरीत हमारा दर्शन मानता है कि क्रूरतम अपराधों की सजा भी क्रूर होना चाहिये।  चूंकि हमारे देश में पश्मिमी सभ्यता के समर्थकों के पास सारी शक्ति है इसलिये यह संभव नहीं है कि यहां अपराध के अन्वेषण तथा दंड के लिये अपने ही देश के अनुरूप कोई नयी प्रणाली बनायी जाये।
       हमारा दर्शन मानता है कि कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं हेाती जबकि पश्चिमी दर्शन अपराधियों के सुधरने की कल्पनातीत आशा पालता है।  उहापोह फंसे हमारे देश की स्थिति दिन ब दिन इसलिये बिगड़ती जा रही है क्योंकि हमारे यह अपराध तथा  अन्वेषण तथा न्यायालय में उनके प्रमाणीकरण में विलंब होता है।  अनेक अपराधी तो अपने पुराने अपराध के लिये क्षमा तक की आशा करते हैं।  कुछ तो बिना सजा के ही देह छोड़ जाते हैं।  जब तक हम अपने देश के मूल स्वभाव के अनुसार अपराध के अन्वेषण तथा उनके दंड देने की कोई तीव्र प्रणाली नहीं अपनायेंगे तब तक भयमुक्त समाज की आशा करना व्यर्थ है।         

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, May 7, 2013

संत कबीर दास दर्शन-जीभ को विष के कुऐं में न फसायें (sant kabir darshan-jeebh ko swad ke kuen mein na fasayen



       पशु पक्षियों से अधिक बुद्धिमान होते हुए भी मनुष्य अपने जीवन में अपनी स्वार्थपूर्ति से अधिक कुछ नहीं  कर पाता।  इसका कारण यह है कि वह अपनी पूरी जिंदगी जीभ के स्वाद में पड़ा रहता है।  आजकल तो हालत अधिक ही मुश्किल हो गये हैं जब अप्राकृतिक भोजन का सेवन बढता ही जा रहा है।  लोगा बाज़ार की वस्तुऐं यह बिना जाने सेवन करते हैं कि उनके निर्माण या उत्पादन में कितनी सावधानी बरती गयी है।  बाज़ार में खुले में वस्तुऐं बन रही हैं।  अनेक जगह गंदी नालियों के निकट चाट की दुकानें खुली मिलेंगी। वहां रखी वस्तुओं पर आसपास से गुजर रहे वाहनों की धूल आ जाती है।  प्रदूषित वातावरण में घंटों रखी वस्तुओं को लोग स्वाद के कारण ग्रहण करते हैं।  अनेक चिकित्सक आज के दौर में बीमारियों का प्रेरक तत्व बाज़ार की वस्तुओं को भी मानते है।  कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि अगर आज के लोग बाज़ार में निर्मित वस्तुओं का सेवन न करें तो वह पचास फीसदी से अधिक बीमारियों से बच सकते हैं।
संत कबीर कहते हैं कि
--------------
खट्टा मीठा चरपराद्व जिभ्या सब रस लेय।
चोरों कुतिया मिल गई, पहरा किसका होय।।
          हिन्दी में भावार्थ-जीभ तो मीठे, खट्टे तथा चटपटे का रस लेती है, इसी कारण चाहे जब फिसल जाती है। ठीक वैसे ही जैसे कुतिया जब चोरों से मिल जाये तो उसका पहरा घर की सुरक्षा समाप्त कर देता है।
जीभ स्वाद के कूप में, जहां हलाहल काम।
अंग अविद्या ऊपजै, जाय हिये ते नाम।।
        हिन्दी में भावार्थ-जब तक जीभ स्वाद के गहरे कुऐं फंसी हुई है तब विषय रूपी विष का ही सेवन करेगी।  तब उसके अंग अंग में अविद्या रहेगी और परमात्मा का नाम या भक्ति करना उसक लिये संभव नहीं है।
       अभी हाल ही में टीवी चैनलों तथा प्रचार माध्यमों में अनेक बड़ी कंपनियों केा खाद्य तथा पेय पदार्थों के अशुद्ध तथा विकारों को उत्पन्न होने की बात सामने आयी थी।  दरअसल आधुनिक प्रचार माध्यमों ने स्वयं ही कथित रूप से कंपनियों  के विज्ञापनों के के कारण उनके उनके सामने घुटने टेक दिये हैं। यही कारण है कि आम लोग बड़ी कंपनियों के खाद्य तथा पेय पदार्थों की तरफ आकर्षित हो रहे हैं।  फिर इन कंपनियों के उत्पादों का स्वाद कुछ ऐसा है कि लोग उनका उपयोग धड़ल्ले से इस आशा के साथ करते हैं कि उनके उत्पादन में सावधानी बरती गयी होगी।
    इसी विश्वास का नतीजा है कि अब बच्चों तथा युवाओं में भी वह बीमारियां बढ़ रही हैं जो कभी बड़ी आयु वाले लोगों में स्वाभाविक रूप से दिखाई देती थीं। सच बात तो यह है कि अब  घर में गृहणियों के हाथ से निर्मित वस्तुओं का सेवन करना ही स्वास्थ्य के लिये श्रेयस्कर है।  एक तो उनके हाथ निर्मित खाद्य तथा पेय पदार्थ ताजा होते हैं दूसरे शुद्ध होना उनकी एक खास पहचान है।  जहां तक हो सके घर के सभी सदस्यों को भी इस बात की प्रेरणा देते रहना चाहिये कि घर में निर्मित वस्तुओं का ही सेवन करें।
         

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, May 4, 2013

गुरु ग्रंथ साहिब से संदेश-छल कपट करने वालों की विपत्ति पर रोना व्यर्थ (chhal kapat karne walon ki vipatti par rona vyarth-guru granth sahib se sandesh)



    हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मनुष्य इस संसार में अपने संकल्प के आधार पर ही चलता है। जैसा वह संकल्प करता है वैसा ही दृश्य उसके सामने आता है। जब हम यह कहते हैं कि आजकल छलकपट करने वालों की संख्या अधिक हो गयी है तब अपने अंदर नहीं झांकते।  दरअसल हमारे अंदर कहीं न कहीं छल कपट रहता है।  समय आने पर कौन छल करने को तैयार नहीं होता? आजकल हमारे देश में भ्रष्टाचार को लेकर खूब चर्चा होती है। इसका इतना विरोध हो रहा है पर फिर भी वह कम नहीं हो रहा। दरअसल जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं वह उससे अर्जित धन को  उपरी कमाई कहते है। दूसरा कमाई तो उनको भ्रष्टाचार लगता है। इतना ही नहीं समाज में लोग अब केवल धन के आकर्षण में आकर सम्मान करते हैं। वह यह नहीं देखते कि कोई आदमी किस तरह के धन से अमीर बना है।  जिस तरह समाज ने भ्रष्टाचारियों को मान्यता दी है वह एक तरह से समूचे सदस्यों के अंदर मौजूद छल कपट का ही परिणाम कहा जा कसता है। एक तरफ भ्रष्टाचार का विरोध दूसरी तरफ  उससे कमाई करने वाले का सम्मान करने का अपने आपसे ही छल न करना तो और क्या है? क्या समाज ने कभी किसी ऐसे व्यक्ति का बहिष्कार किया है जो भ्रष्टाचार के कारण अमीर बना है?
गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
---------------------
जिना अंदरि कपटु विकार है तिना रोइ किआ कीजै।
हिन्दी में भावार्थ-जिन व्यक्तियों के मन में छल और कपट भरा है उनकी विपत्तियों पर रोना व्यर्थ है।
हिरदै जिनकै कपटु बाहरहु संत कहाहि।
तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।
हिन्दी में भावार्थ-अपने हृदय में कपट धारण करने वाले कथित संतों की पद, पैसे और प्रतिष्ठा की भूख कभी शांत नहीं होती। ऐसे लोगों को आखिरी समय में पछताना पड़ता है।
 
      भारतीय समाज में अनेक ऐसे कथित महान संत  सक्रिय हैं जिन्होंने भारी भरकम आश्रम बनाये हैं। शिष्यों के साथ वह संपदा का संग्रह कर रहे हैं।  कहा जाता है कि सच्चा गुरु वह है जो शिक्षा देकर शिष्य का त्याग करे पर यहां तो हर गुरु अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाने में लगा है।  यही कारण है कि आम भक्तजन गुरुओं के छलिया तथा कपटी रूप को देखकर दुःखी होते है।  यही कारण है कि लोग आजकल किसी को गुरु नहीं बनाते। अगर बनाते हैं तो विश्वास नहंी करते। देखा तो यह भी जा रहा है कि जो लोग गुरु पर विश्वास करते हैं उनकी साथ धोखा भी होता है। अनेक गुरु जेलों में अपने शिष्यों के साथ ठगी और यौन शोषण के आरोप में जेल की हवा खा चुके हैं।  पहले तो गेरुऐ वस्त्र पहनना जहां सम्मान का प्रतीक था अब ऐसे गुरुओं की वजह से यह रंग भी बदनाम हो गया है।
गुरु ग्रंथ साहिब से संदेश-छल कपट करने वालों की विपत्ति पर रोना व्यर्थ

            हिन्दी साहित्य,अध्यात्मिक दर्शन,हिन्दू धर्म संदेश

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

अध्यात्मिक पत्रिकाएं

आप इस ब्लॉग की कापी नहीं कर सकते

Text selection Lock by Hindi Blog Tips