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Wednesday, June 27, 2018

पश्चिमी दबाव में धर्म और नाम बदलने वाले धर्मनिरपेक्षता का नाटक करते रहेंगे-हिन्दी लेख (Convrted Hindu Now will Drama As Secularism Presure of West society-Hindi Article on Conversion of Religion)

        
                           हम पुराने भक्त हैं। चिंत्तक भी हैं। भक्तों का राजनीतिक तथा कथित सामाजिक संगठन के लोगों से संपर्क रहा है। यह अलग बात है कि उन्होंने हमें धास भी नहीं डाली पर जानते हैं कि हमारा चिंत्तन हमेशा स्वतंत्र तथा तार्किक विचाराधारा वाला रहा है।  सो बता बता देते हैं कि भारत में हिन्दू धर्म छोड़ने वालों ने विदेशियों के दबाव में ही छोड़ा था ताकि वहां काम, नाम तथा नामा मिल सके।  हिन्दू धर्म का विरोध यूरोप में रहा है पर वही यूरोप अब हिन्दू धर्म के योग को अपना रहा है।  दूसरा वहां हिन्दू धर्म छोड़ने वालों को प्रगतिशील माना गया सो। याद रखें भारतीय उपमहाद्वीप आज नहीं बरसों से ही श्रम निर्यातक रहा है। प्राचीन काल में गये लोगों ने धर्म नहीं छोड़ा पर आधुनिक काल में यह नीति बन गयी कि हिन्दूधर्म छोड़ो और विकसित कहलाओ।
अ ब यूरोप सहित पश्चिमी देशों में स्थिति उलट हो रही है।  आधुनिक वह धर्मनिरपेक्ष दिखने वाले धर्म तो छोड़ गये। अरेबिक देशों से होते हुए यूरोप तथा अन्य पश्चिमी देशों में घूमते भी रहे पर वहां अब अरेबिक धर्म से पश्चिमी धर्म के लोग चिढ़ने लगे हैं। पहले लोगों को धर्म बदलकर अरेबिक नाम की ज्ररूरत थी अब उन्हें ही हिन्दी नाम की चाहत भी हो सकती है। हिन्दी नाम अब ज्ञान तथा विज्ञान दोनों की पहचान बन गयी है। सीधी बात कहें तो हिन्दू धर्म के मूल ज्ञान तथा विज्ञान का विस्तार अब पश्चिम से होता हुआ यहां आयेगा।  सो धर्मनिरपेक्ष तथा विकासित दिखने वाले लोग प्रयास यही करेंगे कि भक्तों की मानसिकता अस्थित करो। हमारी सलाह है  कि बात को घुमाने की बजाय सीधे कहो कि हम हिन्दू हैं और हमारी विचाराधारा अकेले ऐसी है जिसमें ज्ञान तथा विज्ञान हैं।  हमारे परमात्मा  के रूपों तथा पूजा में भिन्नता एक स्वाभाविक शैली है जो मनुष्य मन को सदैव संचालित रखती है।  हम सात दिन में सात रूप पूजते हैं न कि एक दिन विशेष एक ही प्रकार की दरबार जायें। 
                  आखिरी बात यह है कि हमने देखा है कि मूर्ति पूजने तथा माथे पर टीका लगाने वाले पुरुष तथा बिन्दी लगाने वाली महिलाओं के चेहरे पर एक विशेष प्रकार का आकर्षण होता है। उनके चेहरे पर एक स्वाभाविक मुस्कान खेलती दिखती है। जो मूर्ति पूजा या घर में ध्यान वगैरह नहीं करते उनके चेहरे हमे फक लगते हैं। कितना भी चेहरा चमका लें वह रूखा  ही लगता है। एकदम मुस्कानहीन। कभी कभी हम टीवी पर धर्म परिवर्तित लोगों का चेहरा देखते हैं ऐसा लगता है कि रो रहे हैं। याद रखें हिन्दू मान्यता के अनुसार भक्त चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  जबकि दूसरी मान्यताओं में केवल आर्त भाव की प्रधानता है।  
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            आजकल हम वृंदावन रहने लगे हैं। रेलों में घूमते रहते हैं। आज ग्वालियर वापस लौटे। सोचा कोई बड़ा चिंत्तन लिखो। वृंदावन में भक्त जब आते हैं तो उनका भाव देखते ही बनता है। बाकेबिहारी तथा अंग्रेजों के मंदिर में श्रद्धालू जिस भाव से आते हैं उसका वर्णन शब्दों में कठिन है। प्रेम मंदिर पर तो इतनी भीड़ रहती है कि हमें संदेह होता है कि ताजमहल पर भी इतनी होती होगी।  जो एक वहां जायेगा वह ताजमहल में मृतभाव का अनुभव करेगा। वहां कितने अंग्रेज कृष्ण के भक्त हैं कहना कठिन है उनकी संख्या इतनी है कि वह रास्ते पर मिलते ही रहते हैं।

Monday, March 27, 2017

हमने तो यादों का खजाना संभाला था=छोटीकविताये एवं क्षणिकायें (Hamne yandon ka khazana sanbhala thaa-Short HindiPeom)

दिमाग बंद कर
दिल का दरवाजा
खोला नहीं जाता।
हादसों में घाव का
बहता रक्त
तोला नहीं जाता।
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सुंदरता के सभी दीवाने
दिल की बात
समझे कोई नहीं।
झील से गहरी आंखों पर
मरने वाले न जाने
वह सोई नहीं।
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हमने तो यादों का
खजाना संभाला था
पर उनके दिल पर ताला था
भटके ज़माने में 
कौन उन्हें
समझाने वाला था।
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उनके कंधों पर उम्मीद रखी
यही हमारा कसूर है।
नतीजा अब यह कि
दिल से यकीन दूर है।
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अगर फूलों के रंग होते
हम भी होली मना लेते।
भावनाओं के तार मिलते
प्रेम की झोली बना लेते।
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दिल की पहचान नहीं
दिमाग से प्यार करें।
जज़्बातों को छू नहीं पायें
आंखों में नकली प्यार भरें।
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खिलाड़ी भी बिकते हैं,
महंगे हों वही टिकते हैं।
बाज़ारवाद के दौर में
बंधुआ आजाद दिखते हैं।
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फुर्सत नहीं मिलने का
बहाना हमेशा करते हैं।
मुफ्त की मुलाकातों से
वह शायद डरते है।
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कपड़े के रंग से बनाते छवि
वह कैसे फकीर हैं।
राजस्व की लूट से बने
वह कैसे अमीर हैं।
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इशारे क्या समझेंगे
शब्दों को ही नहीं समझ पाते।
वह खुश हैं ज़माने से
कहे जो नासमझ जाते।
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इश्क के किस्से भी
रोज सुनाये जाते हैं।
आज भी मरे आशिक
नकदी से भुनाये जाते हैं।
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अपनी प्रतिष्ठा गंवाकर
दूसरे की निंदा करते हैं,
इस तरह आत्मसम्मान
वही जिंदा करते हैं।

Wednesday, July 6, 2016

राजसी कर्म में फल की प्रधानता होती है-हिन्दी चिंत्तन लेख(Hindu Religion thought Article On Society)

                    आप अगर सात्विक हैं पर ज्ञानी नहीं तो आपका राजसी कर्म उस रूप में फलीभूत नहीं रह सकता जिस तरह चाहते हैं। इस संसार में कर्म तीन प्रकार हैं होते है-सात्विक, राजसी तथा तामसिक। इसमें राजसी कर्म में कर्म व फल का भौतिक सिद्धांत चलता है जिसमें कल्पना या आदर्श ढूंढना अज्ञान ही कहा जा सकता है।
                1.राजसी कर्म में संलिप्त लोगों में फल की कामना होती है और जब वह आपका सहयोग करें तो कार्य संपन्न होने पर पुरस्कृत अवश्य करें।
                     2. हम यह कभी मानकर न चलें कि सात्विक व्यक्ति अगर राजसीकर्म में सहयोग कर रहा है तो उसे पुरस्कार की आवश्यकता नही है।  यह मानकर कि वह निष्कामी है और हमारा काम करना उसका कर्तव्य है उसे पुरस्कार न दें। ऐसा सोचना अज्ञान है।
                      3.एक बात याद रखें सात्विक ज्ञानी व्यक्ति की आंतरिक शक्तियां इतनी प्रबल होती हैं कि वह समय पर अगर कर्तव्य निभाता है तो पुरस्कार न मिलने को अपमान समझकर वह दंड भी दे सकता है।
               4.अपना काम निकल जाने पर सात्विक ज्ञानियों को भूल जाने वाले कृतघ्न बहुत जल्दी अपने स्थिति से गिर जाते हैं।

                   हम इतिहास का अध्ययन करें तो जिन राजपुरुषों ने सात्विक, ज्ञानी, तथा योगियों का सम्मान किया उन्होंने दीर्घ अवधि तक राज किया पर जिन्होंने उनका अपमान किया वह अंततः अपनी स्थिति से भ्रष्ट होकर काल कलवित हो गये। महाभारतकालीन विद्वान विदुर जी का कहना है कि बुद्धिमान की बाहें लंबी होती है उससे कभी बैर नहीं लेना चाहिये। उसी तरह उन्होंने यह भी का है कि अपना काम करने वालों को उपयुक्त पुरस्कार देखकर उसकी प्रसन्नता क्रय करना चाहिये।
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Saturday, February 27, 2016

अज्ञानी को दान लेने का हक नहीं-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख (Agyani ko Daan lene ka hak Nahin-A Thought article Basee on ManuSmriti)

                         कुछ जनवादी संगठनों के कथित वैचारिक युवा अक्सर मनुस्मृति को जलाने की बात करते सुने।  कहते हैं कि उसमें दलितों के लिये खराब बातें कही गयी हैं।  उनकी बात सुनकर हमारी राय तो यह बनी है कि जिस तरह श्रीमद्भागवत को पढ़ने के बावजूद उसे समझे बिना उसके ज्ञान का प्रचार पेशेवर ज्ञान प्रचारक करते हैं उसी तरह ही मनुस्मृति के कुछ अंश पढ़े बिना ही उसका दुष्प्रचार करने वाले भी विद्वान  कम नहीं है। पहली बात तो यह कि मनुस्मृति में जन्म के आधार पर जाति का उल्लेख है तो कर्म भी उसके निर्माण का तत्व माना गया है। इसका आशय यह है कि जन्म के आधार पर एक जाति हो सकती है तो कर्म के आधार पर उसमें बदलाव भी माना जा सकता है।  दूसरी बात यह कि हर प्रकार के कर्म करने वाले का यह धर्म है कि अपनी योग्यता के अनुसार ही उपलब्धि ग्रहण करे।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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आतपास्त्वनाधीयानः प्रतिग्रहरुचिद्विंजः।
अम्भस्यश्मप्लचेनैव सह तेनैव मजति।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान तपस्या व विद्या से रहित होने पर भी दान लेता है वह नरक भोगता है जैसे पत्थर की नाव पर चढ़ने वाला व्यक्ति उसके साथ ही डूब जाता है।
                        हमारे यहां दान की परंपरा है उसमें यह शर्त जोड़ी गयी है कि सुपात्र को ही दिया जाना चाहिये।  सुपात्र में किसी की जाति का उल्लेख नहीं है इसलिये किसी वर्ण विशेष पर दान से कृपा नहीं हो सकती। इतना ही नहीं जो आमजनों में ज्ञान प्रचार का काम करते हैं वह भी अगर उस राह पर नहीं चलते तो उन्हें भी दानदक्षिणा लेने का अधिकार नहीं-यही मनुस्मृति में कहा गया है। कभी कभी तो लगता है कि मनुस्मृति का विरोध करने के लिये कथित उच्च जाति के ज्ञान विक्रेता दलित जाति के लोगों को इसलिये उकसाते हैं ताकि उसमें जो जाति, धर्म तथा ज्ञान के जो सिद्धांत बताये गये हैं उसे वह न पढ़ें न समझें। उनका लक्ष्य समाज में अज्ञान के अंधेरे में स्वर्ग की कृत्रिम रौशनी बेचकर अपना धंधा बनाये रखना है। इतना ही नहीं मनुस्मृति में भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा हत्या के भी कड़े दंड बताये गये हैं जिससे कुछ लोग भयभीत हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, February 20, 2016

मनृस्मृति में वर्णित हैं धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत-हिन्दी चिंत्तन लेख(Secularism Thought in ManuSmriti-Manuwad Is GraeatThought-HInduDharama Sandesh)

                        भारतीय तथा पाश्चातय धार्मिक विचाराधाराओं में मूल अंतर यह है कि हम मनुष्य के कर्म को ही धर्म की संज्ञा देते हैं जबकि विदेशी पूजा पद्धति के आधार पर उसका नाम तय करते हैं। भारत में विदेशी धार्मिक व सामाजिक विचाराधाराओं के साथ ही अध्यात्म में विषय में भ्रम पैदा हुआ है। हमारे यहां अभी तक राज्य प्रबंध के समर्थन के कारण प्रगतिशील तथा जनवादी चिंत्तन धारा अे पेशेवर विचारकों को समर्थन मिला जिससे वह समाज में बौद्धिक शिखर पर प्रभावी हो गये। यही कारण है कि हमारे यहां लोगों के इष्ट, पूजा पद्धति तथा पहनावे के आधार पर धर्म का रूप तय किया जाने लगा है। इसके बाद भारतीय समाज में जाति, क्षेत्र तथा भाषा के आधार पर बांटकर उसे आपस में लड़ाया जाता है। कर्म वह आचरण के आधार पर किसी के व्यक्तित्व व कृत्तिव पर दृष्टिपात करने की बजाय उसके भौतिक रूप को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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जातिज्ञानपदान्धर्मान्श्रेणीधर्माश्च धर्मवित्।
समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्म प्रतिपादवेत्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-धर्मज्ञ राजा को जाति धर्म, जनपद धर्म, श्रेणी धर्म तथा कुल धर्म को अच्छी तरह समझकर अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिये।
                        हमारे यहां राज्य की धर्मनिरपेक्षता से आशय पाश्चात्य आधार पर बने संज्ञाधारी धर्मों को समान देखने की दृष्टि से माना जाता है जबकि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कर्म के आधार पर बने धर्मो में बीच सामंजस्य स्थापित करना राजधर्म बताया गया है। जाति, जनपद या क्षेत्र, व्यवसाय या श्रेणी तथा कुल के आधार पर हर मनुष्य में स्वभाविक गुण होते हैं जिनकी जानकारी होने पर राज्य प्रमुख सहजता से प्रजा पर नियंत्रण कर सकता है। हमने देखा होगा कि हमारे देश में कुछ जातियों में दैहिक  क्षमता व आक्रामक प्रवृत्ति किसी क्षेत्र विशेष में उत्पन्न के कारण अधिक होती है जिससे उसके लोगों को रक्षा संस्थाओं में सेवा करने के लिये वरीयता दी जाती है।  यह ठीक भी है जहां बल से कार्य होता है वहां उसमें दक्ष व्यक्ति ही आवश्यक है लेकिन जहां बुद्धि तथा व्यवसाय कौशल वाली सेवाओं में वह दक्षता की बजाय किताबी ज्ञान देखा जाता है जबकि वहां प्रबंध कुशल के साथ ही व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता भी देखा जाना चाहिये।
                        रक्षाकर्मी का रक्षा, व्यवसायी का व्यवसाय, बुद्धिमान का मार्गदर्शन तथा सेवक का सेवा ही कर्म होता है जिसका निर्वाह ही उसका धर्म भी है।  राज्य प्रबंध में कुशल प्रमुख अपने देश की जातियों, वर्णों तथा वर्गों के कर्म तथा धर्म को समझकर उसमें अपने अनुकूल सेवका का चयन करता है। सर्वधर्मसमभाव की कला में पारंगत राज्य प्रमुख ही सहजता से राज्य कर सकता है-हमारी दृष्टि से मनुस्मृति की यही मान्यता लगती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Friday, January 15, 2016

अंतर्जाल पर सक्रिय प्रतिभाओं को सम्मान देना चाहिये-26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर विशेष हिन्दी लेख(Special Hindi article on 26 january Republic Day)


                             अब 26 जनवरी गणतंत्र दिवस आ रहा है।  इस अवसर पर कला, साहित्य, कला, पत्रकारिता तथासमाज सेवा में सक्रिय महानुभावों को पद्म भूषण पद्मविभभूषण तथा पद्मश्री सम्मान दिये जाने की घोषणा होनी है।  ऐसे समाचार भी आते रहे हैं कि पहुंच तथा पैसे वाले कथित महानायक इन पुरस्कारों का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं।  हमारे यहां प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों को सम्मानित करने की परंपरा अधिक रही है। राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों, कलाकारों, पत्रकार तथा समाजसेवकों की उपेक्षा का आरोप हमेशा लगता रहा है। इसके अलावा संगठित व्यवसायिक क्षेत्र से अलग हटकर कार्य करने वालों की अनदेखी करने की बात भी कही जाती है।  पिछले कुछ वर्षों से अंतर्जाल पर भी अनेक लोग सक्रिय हैं पर किसी को भी इस आधार पर सम्मान नहीं मिला वह भी प्रतिभाशाली हैं। 
हमारी राय है कि पद्म भूषण व पद्मश्री पुरस्कार अब अंतर्जाल पर कार्यरत लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों तथा कार्टूनिस्टों को दिये जायें जो सिफारिश नहीं कर पाते उनकी तरफ ध्यान देना चाहिये। अंतर्जाल पर सक्रिय प्रतिभाओं  को संगठित क्षेत्र की विभूतियों  के समकक्ष न समझना अन्याय है। इस 26 जनवरी उन्हें पदम् सम्मान देकर नहीं धारा प्रवाहित की जाये तो अच्छा रहेगा। अब इंटरनेटयुग है इसमें बाज़ारवाद से ऊपर उठकर सांस लेने वाले किताबें छपवाने में अनिच्छुक लेखक व कार्टूनिस्ट सक्रिय हैं। उन्हें सम्मान देकर नयी परंपरा बने तो इन सम्मानों की प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी। अंतर्जाल की विभूतियों को पद्म भूषण व पद्मश्री सम्मान देने से यह साबित होगा कि भारत ने नये युग में प्रवेश किया है। 26 जनवरी पर अंतर्जालीय विभूतियों का पद्भूषण पद्मश्री सम्मान देने से उन युवा प्रतिभाशाली लोगों का मनोबल भी बढ़ेगा जो स्वतंत्र रूप से कला व लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं। व्यवसायिक क्षेत्र के लोगों को सम्मान देते रहने से आम लेखकों व कलाविदों में यह भाव है कि केवल पैसे और पहुंच वालों को ही पद्मभूषण व पद्मश्री सम्मान मिलते हैं। इस बार परंपरा से हटकर इंटरनेट की प्रतिभाओं को पद्मभूषण व पद्मश्री सम्मान देने से युवाओं का रचनात्मक क्षेत्र की तरफ रुझान बढ़ेगा। इंटरनेट की प्रतिभाओं को पद्म भूषण व पद्मश्री सम्मान देने से यह संदेश भी निकलेगा कि राज्यप्रबंध लीक से हटकर काम कर रहा है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Friday, December 4, 2015

कमजोर को सजा-हिन्दी कविता (Kamjor ko Saja dete hain-Hindi kavita)

किसी के दुखती नस पर
हाथ रखकर
लोग मजा लेते हैं।

अपने गम
छिपाने के लिये
दिल बजा लेते हैं।

कहें दीपकबापू जिंदा जज़्बात से
रिश्ता तोड़ चुका ज़माना
लोग अपने कसूर की
कमजोर को सजा देते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Wednesday, November 25, 2015

गुरुनानकदेवजी पूरे विश्व के लिये प्रेरक-गुरुनानक जंयती पर लेख(Gurunanakji Inspiration for all World-Hindi Article on Gurunanak Jayanti hindi lekh)

आज गुरुनानक जयंती देश भर में मनाई जा रही है। हमारे देश में आजादी के पहले तक धार्मिक विभाजन की चर्चा नहीं होती थी पर अब लोग करने लगे हैं-इससे एक बात साफ होती है कि देश में अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव है। गुरुनानक जी ने हिन्दू धर्म में अंधविश्वासों के निवारण का ऐसा काम किया जिसे देश में चेतना का वातावरण बना-इसी कारण उन्हें भगवत्रूप माना जाता हैं। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधाराओं को मानने वाले सभी लोग  गुरुनानक जी को मानते हैं पर कुछ संकीर्ण मानसिकता वाले उन्हें सिख धर्म के प्रथम प्रवर्तक के रूप में ही प्रचारित करते हैं। गुरुग्रंथ साहिब में अनेक बार राम का नाम लिखा है। इसके संदेश इतने स्पष्ट हैं कि उन्हें समझकर कोई भी व्यक्ति संसार का सत्य समझ सकता है।
गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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साधो रचना राम बनाई।
इकि बिनसै इक अस्थिरु माने अचरजु लखिओ न जाई।।
                           हिन्दी में अर्थ-यह संसार राम की रचना है। हैरानी इस बात की है कि एक आदमी सबके सामने मरता है फिर भी अन्य लोग यह सोचते हैं कि वह तो हमेशा स्थिर रहने वाले हैं।
                           इस तरह अनेक संदेशों का अर्थ समझें तो ऐसे लगेगा कि हम अनेक प्रकार के भ्रमों में जी रहे हैं। हम अपने साथ अनेक प्रकार की आशायें, कामनायें तथा इच्छायें लिये होते हैं जो कालांतर में भय, निराशा तथा तनाव का वातावरण बनाती हैं। इसलिये आज गुरुनानक देव जी के संदेशों को अधिक से अधिक समझने की जरूरत है।
                           गुरुनानक जी जैसे महापुरुष संसार में सदियों बाद आते हैं। यह हमारी भारतभूमि के लिये गर्व की बात है कि ऐसे महापुरुष पूरे विश्व के लिये प्रेरक बनते हैं। गुरुनानक जयंती पर सभी ब्लॉग लेखक साथियों, फेसबुक मित्रों तथा ट्विटर के अनुयायियों को बधाई।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, November 21, 2015

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की तुलना विदेशी विचारधाराओं से करना व्यर्थ(Indian Spiritual Thought And Other Riligion Policy)


अक्सर कहा जाता है कि सभी धर्म मनुष्य को शांति, अहिंसा और प्रेम से रहना सिखाते हैं।  सच बात तो यह है भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान दर्शन की विश्व की किसी अन्य विचाराधारा से कोई तुलना नहीं है। यहां तक  कि विश्व की अनेक विचाराधाराओं की किताबों की तुलना श्रीमद्भागवत ग्रंथ से करते हुए कहा जाता है कि सभी प्रेम अहिंसा तथा उदार रहना सिखाती हैं। यह केवल एक नारा भर है।  श्रीमद्भागवत गीता तथा हमारे अन्य शास्त्र केवल इष्ट स्मरण की आराधना करना ही नहीं सिखाते वरन् अपने मन मस्तिष्क के विकार निकालने की प्रेरणा भी देते हैं। जबकि अन्य विचारधारायें विकार निकलाने की कला नहीं सिखातीं।
पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि
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कायेन्दियसिद्धिरशुद्धिक्षयान्तपस।
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                           हिन्दी में भावार्थ-तप के प्रभाव से जब अशुद्धि का नाश हो जाता है तब शरीर और इंद्रियों की सिद्धि भी हो जाती है।
                           सर्वशक्तिमान के किसी भी रूप की आराधना हो मन मस्तिष्क में शुद्धता के बिना फलीभूत नहीं हो सकती।  हम जब विश्व में शांति तथा सुख की कल्पना करते हैं तो उसके लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की राह चलना आवश्यक है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि भारतीय दर्शन में अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषय अलग कर संदेश दिया जाता है जबकि पश्चात्य विचाराधाराओं में सांसरिक विषयों से ही सर्वशक्तिमान पाने की कल्पना की जाती है।  हमारा मानना है कि विश्व में शांति, एकता, अहिंसा तथा विकास का वातावरण स्थापित करने के लिये भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का प्रचार प्रमाणिक विद्वानों के माध्यम से किया जाना चाहिये। ऐसे ही विद्वान प्रमाणिम माने जा सकते हैं जो अपने जीवन निर्वाह के लिये गृहस्थाश्रम या धर्म में स्थित होकर योग साधना की शिक्षा देते हुए विचरते हैं।  सन्यास के नाम पर पंचतारा सुविधाओं में आश्रमों के निवासियों को विद्वता की दृष्टि से प्रमाणिक नहीं मान जा सकता। जयश्रीराम, जयश्रीकृष्ण, सुप्रभात।
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Wednesday, November 18, 2015

भारत में सहशिक्षा पर विचार करना आवश्यक(Bharat mein Sahshiksha par vichar karna Awashyak)


                                   
                                   भारत में छात्र छात्राओं की सहशिक्षा पर सदैव विवाद चलता रहा है। जहां आधुनिकतावादी सहशिक्षा को पौंगपंथी मानते हैं वह सामाजिक, धार्मिक तथा स्वास्थ्य विशेषाज्ञों का एक समूह आज भी इसका समर्थक है।  केरल के शिक्षामंत्री ने कहीं कह दिया कि महाविद्यालय में लड़के लड़कियों को एक साथ नहीं बैठना चाहिये। इसे प्रचार माध्यम विवादित कहकर शोर मचा रहे हैं।
                                   इस तरह के बयान पहले भी आते रहे हैं जिन्हें दकियानूसी कहकर खारिज किया जाता है पर सवाल यह है कि क्या हम आधुनिक दिखने के प्रयास में प्राकृत्तिक सिद्धांतों की अनदेखी तो नहीं कर रहे।
                                   भारत को विश्व में समशीतोष्ण जलवायु वाला माना जाता हैं। यहां गर्मी और सर्दी अधिक पड़ती हैं।  अशिक्षा, गरीबी तथा बेकारी के कारण जनसंख्या बढ़ती है। कहा जाता है कि जहां विकास हो वहां जनंसख्या नियंत्रण स्वयं हो जाता है। भारत में उष्णता की प्रचुरता के कारण यौनिक उन्माद की प्रवृत्ति अधिक मानी जाती है। हम यह भी देख रहे हैं कि युवा रिश्तों में खुलेपन की वजह से अनेक प्रकार के संकट भी पैदा हो रहे हैं।  सबसे बुरी बात यह कि शैक्षणिक संस्थानों में जिन्हें मंदिर भी कहा जाता है वहां सहशिक्षा के चलते लड़के लड़कियों के बीच पाठयक्रम की कम अन्य विषयों पर चर्चा अधिक होती है। वहां परंपरागत खेलों की जगह प्रेम या मित्रता के नाम पर खेल होने लगता है। हम भारत की किसी भी भाषा में बनी फिल्म को देखें तो पायेंगे कि शैक्षणिक संस्थान केवल प्रेम करने के लिये ही होते हैं।  फिल्मों का प्रभाव समाज पर कितना है हम सभी जानते हैं और इनकी देखादेखी जहां सहशिक्षा है वहां अनेक ऐसी घटनायें सामने आती हैं जो बताती हैं कि वास्तव में अब विचार किया जाना चाहिये।
                                   पहले तो मनुष्य में दैहिक तथा मानसिक संयम अधिक होता था पर आज तो उसकी शक्ति का हृास हो गया है। ऐसे में ऐसी राय ठीक है पर कोई न माने यह अलग बात है पर कम से कम शोर तो न मचाये। हम अपने देश में जिस तरह अनेक  छात्र तथा छात्राओं के शिक्षा से इतर गतिविधियों से उनके पालको परेशान देखते हैं उससे तो यह लगता है कि अब भी छात्र छात्राओं के लिये प्रथक शैक्षणिक संस्थान बने रहना जरूरी है। कम से कम भारत में जो सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक स्थिति है उसे देखते हुए तो यही कहा जा सकता है। सुप्रभात
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
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Monday, November 16, 2015

पेरिस पर हमले से अभी सबक सीखा नहीं-हिन्दी चिंत्तन लेख(Not Lesson learn from Paris Attack or Paris Terror-Hindi Thought article)


                                   पेरिस पर हमले के बाद पूरे विश्व में उथलपुथल मची है। उस पर कहने से पूर्व हम भारतीय योग सिद्धांत की बात करें। यह सच है कि क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। हम अगर किसी वस्तु, विषय या व्यक्ति से अनुकूल प्रतिक्रिया चाहें तो अपनी किया उसके अनुरूप करनी होगी।  दूसरा कर्म और फल के सिद्धांत को भी ध्यान रखना होगा। यूरोप तथा अमेरिका हथियारों के उत्पादक तथा निर्यातक देश हैं।  पेरिस पर निरंतर हो रहे हमलों को हम धर्म तथा लोकतंत्र के सीमित दृष्टिकोण से उठकर व्यापक चिंत्तन के दायरें में आयें तो पता चलेगा हर व्यापारी अपनी वस्तु का प्रचार करते हुए उसके प्रयोग का भी प्रचार करता है। इसलिये संभव है कि पहले अपराधियों को ऐसे हथियार देकर उनके हमलों से प्रचारित अपने हथियारों के  बेचने का बाज़ार बनाते हों।
                                   हम एशियाई देशों की सेनाओं तथा पुलिस विभागों की स्थिति में नज़र डालें तो उनसे पहले नये हथियार अपराधियों के पास आये।  उससे प्रभावित होकर संबंधित देशों ने उत्पादक देशों से हथियार खरीदे। एक-47 बंदूक इसका प्रमाण है।  एशियाई देशों ने खरीदी पर बाद में पता चला कि उसका नया रूप पहले ही अपराधियों के पास आ गया है।  अमेरिका व यूरोप हथियार निजी क्षेत्र के माध्यम से हथियार बेचते हैं जिन्हें क्रेता के प्रमाणीकरण की आवश्यकता नहीं होती। ऐसे में संदेह होता है कि हथियारों के मध्यस्थ कहीं आतंकवादियों को प्रचार नायक तो नहीं बनाते? अमेरिका ने सीरिया सरकार के विद्रोहियों की सहायता के लिये हथियार हवाई जहाज से नीचे गिराये थे-जिनके संबंध आतंकी संगठनों से प्रत्यक्ष दिख रहे थे।  अमेरिका मध्यपूर्व में अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिये जिन संगठनों को अपना मित्र समझता है उन्हें शेष विश्व आतंकी कहता है। इस तरह विश्व के राज्यप्रबंधकों तथा आतंकवादियों के बीच एक ऐसा रिश्ता है जिसकी व्याख्या करने बैठें तो एक ग्रंथ लिखना पड़ेगा।
                                   मध्यपूर्व में जबरदस्त अस्थिरता फैली है और हमारा अनुमान है कि उसका प्रकोप काम होने की बजाय बढ़ते रहने वाला ही है। आतंकवादी जिन देशों को ललकार रहे हैं वह सभी कहीं न कहीं हथियार के कारखानों की कमाई से अपनी संपन्नता बढ़ाने  वाले रहे हैं।  अब उनके सामने स्वयं के बने हथियार दुश्मन की तरह सामने आने वाले हैं।  मध्यपूर्व से लाखों शरणार्थी इन देशों में गये हैं जिनके साथ आतंकवादी भी हैं।  पेरिस में हुए हमलों से यह जाहिर हो गया है कि इन संपन्न देशों का राज्यप्रबंध के अभेद होने का भ्रम समाप्त हो गया है। जिस तरह इन देशों के राजकीय प्रबंधकों की प्रतिक्रियायें सामने आयी हैं उससे तो नहीं लगता कि वह जल्दी आतंकवादी पर विजय प्राप्त करेंगे।  वैसे जिन लोगों ने पचास वर्षों से लगतार समाचार देखे और पढ़े हों उन्हें पता है कि कोई राजनीतिक, धार्मिक या वैचारिक संघर्ष प्रारंभ होता है तो वह अगले दस वर्ष तक चलता है।  जब थमता भी तो उसके कारण प्राकृतिक होते हैं-राजकीय प्रबंधक बयानबाजी तक ही सीमित रहती है।
                                   अब योग और भारत की बात करें।  कुछ लोगों को चिंता है कि भारत में भी मध्यपूर्व के आतंकवादी संगठन आ सकते हैं। हमारे पास खुफिया संगठन नहीं है पर योगदृष्टि से हमें यह आशंका नहीं लगती।  एक बात तो यह कि भारत ने कोई हथियार योग नहीं किया-उसने बंदूकें तोप या टैंक नहीं बेचे जो उनका मुंह हमारी तरफ होगा।  इसलिये जिन्होंने युद्ध योग किया है उन्हें प्रतियुद्ध भी झेलना ही होगा। अगर इन देशों को प्रतियुद्ध से बचना है तो युद्ध योग से बचते हुए हथियार के कारखाने बंद करने होंगे। जिसकी संभावना नहीं दिखती। उल्टे जिस तरह यह देश मध्यपूर्व देशों में अधिक हमले कर रहे हैं उससे शरणार्थी संकट बढ़ेगा और आतंकी इन्हीं देशों में जायेंगे।  आखिरी सलाह भारतीय प्रचार माध्यमों को भी है कि वह मध्यपूर्व के आतंकी संगठनों का नाम अधिक न लें कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान कहीं उसके नाम से आतंकी भेजने लगे।
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Friday, November 6, 2015

संतों की मतभिन्नता से खिन्नता लाने की आवश्यकता नहीं-अष्टावक्रगीता के आधार पर चिंत्तन लेख(A Hindu Spirutual Thought article based on Ashtawakaragita)

         
            भारतीय धर्म दर्शन में अनेक ग्रंथ है। इनके आधार पर हर कोई अपनी समझ के अनुसार व्याख्या करता है।  अब यह अलग बात है कि भाषा, भाव और शैली की भिन्नता के  कारण इन व्याख्याताओं के कारण अनेक प्रकार के ज्ञान संचार में विरोधाभास पैदा होते हैं। अनेक व्यवसायिक व्याख्ता धारणा शक्ति के अभाव में केवल ज्ञान रट कर ही ज्ञान सुनाते हैं। दूसरी बात यह कि हमारे अध्यात्मिक दर्शन में साकार-निराकार और सकाम-निष्काम भक्ति को सहजता से स्वीकार किया है पर हमारे पेशेवर धार्मिक शिक्षक दोनों की इनकी प्रथक प्रथक व्याख्या नहीं करते इस कारण भी उनके विचार तथा  आचरण में अंतर रहता है।  वैसे भी कथनी और करनी के अंतर को पाटना कठिन होता है ऐसे में पेशेवर धार्मिक शिक्षक मतभिन्नता फैलाकर समाज को भ्रमित करते हैं।

अष्टावक्र गीता में कहा गया है कि
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नाना मतं महर्षि साधूनां योगिनां तथा।
दृष्टवा निर्वेदमापन्नः को न शाम्यति मानवः।।
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                                   हिन्दी में भावार्थ-महर्षियों, योगियों तथा साधुओं के प्रथम मत होते हैं। यह देखकर उपेक्षा को प्राप्त मनुष्य शांति नहीं पाता।
                                   इस मतभिन्नता के कारण अनेक जिज्ञासु खीझ जाते हैं।  उनको हमारी सलाह है कि वह इस खिन्नता से बचने के लिये स्वयं धर्मग्रथों का स्वयं अध्ययन करें। पहले शब्द का अर्थ स्वयं ग्रहण करें फिर उस पर चिंत्तन से अपनी राय बनायें। पहले जब देवभाषा संस्कृत का प्रभाव व्यापक नहीं था तब सामान्यजन विद्वानों की सभा में श्रवण कर ज्ञान सुनते थे जिसे आज सत्संग परंपरा कहा जाता है। यह अलग बात है कि कालांतर में ऐसे अनेक विद्वान गुरु कहलाने में मोह में फंसकर मायावी लीला करने लगे। अब तो अक्षरज्ञान वाला बृहद समाज है पर फिर भी अध्ययन कर स्वयं ज्ञानी बनने की बजाय लोग इन पेशेवर विद्वानों की शरण लेते हैं। इससे भक्त लोगों के शोषण की परंपरा बन गयी है। इसका एक ही उपाय है कि धर्मग्रथों का स्वयं अध्ययन करें।
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Friday, October 30, 2015

कहां है चीन के विकास से सबक लेने वाले-हिन्दी चिंत्तन लेख (Chenge in China Populatain policy-Hindi thought aritcle)

                               
            चीन से विकास का सबक सीखने का उपदेश देने वाले बतायें कि आखिर चीन ने जनसंख्या नीति में हम दो हमारा एक का सिद्धांत हटाकर हम दो हमारे दो क्यों बना दिया। दरअसल उलटपंथी हमेशा ही भौतिक विकास की बात करते हैं।  वह हमेशा ही समाज मेें व्याप्त गरीबी, असमानता और भेदभाव समाप्त कर धरती पर स्वर्ग लाने का सपना बेचकर लोगों को भ्रमित करते हैं।  उलटपंथी कार्ल मार्क्स के पूंजी ग्रंथ को गीता  बताते हैं जबकि उसमें अध्यात्मिक ज्ञान का ककहरा भी नहीं है।
                                   जब तक चीन हम दो हमारे एक के सिद्धांत पर चल रहा था उसने खूब भौतिक विकास किया। यह अलग बात है कि उसका विकास बड़े शहरों से होकर मंझोले और छोटे शहरों के साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में कितना पहुंचा इसकी व्यापक जानकारी उपलब्ध नहीं है। बहरहाल अब वहां के समाज को वृद्ध प्रधान माना जाता है।  इसके विपरीत भारत अब युवा प्रधान देश हो गया है। चीन ने औद्योगिक विकास खूब किया। अपना निर्यात बढ़ाया जिससे उसकी आर्थिक शक्ति बढ़ी। अब समस्या दूसरी आयी है।  विश्व में आर्थिक मंदी आ गयी है। चीन के अनेक उत्पादन आकर्षक तथा सस्ते होने के बावजूद अधिक टिकाऊ नहीं होते।  अगर जेब में पैसा हो तो भारत के स्वदेशी उत्पादन आज भी श्रेष्ठ माने जाते हैं। चीन में लोगों की क्रय क्षमता का स्तर क्या है यह पता नहीं पर इतना तय है कि वह अपने उत्पादन  देश में खपाने में सक्षम नहीं है। मजदूरों का अभाव हो रहा है-तय बात है कि उपभोक्तओं का भी अभाव होगा।
                                   एक तरह से कहें तो समाज समाप्त ही हो गया होगा। हम समाज का यहां सिद्धांत  है कि व्यक्ति से परिवार और परिवार से समाज होता है।  जहां एक दंपत्ति के पास एक बच्चा होगा तो उसके पास भाई या बहिन नहीं होगा। पत्नी होगी पर साला या साली नहीं होगी। पति होगा पर ननद या देवर नहीं होगा।  परिवार का यह अवरुद्ध क्रम समाज के स्वरूप के विस्तार में बाधक होता है। सीधी बात कहें तो चीन एक ऐसा देश है जिसे व्यक्ति से जोड़ने वाला समाज लापता है। चीन में अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है पर संबंधों के संकीर्ण दायरों में कैद आम चीनी कैसे सांस लेते होंगे इस पर तो ढेर सारी कहानियां हो सकती हैं। कम से कम अब चीन के विकास से सबक लेने वालों को अपने उपदेश बंद कर देना चाहिये।
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Saturday, October 17, 2015

ज्ञानियों के लिये मांसाहार न बुरा न अच्छा-हिन्दी चिंत्तन लेख(Gyaniyon ke liye Maansaahar n accha n bura-Hindi Spirituly article)


          इस समय हमारे देश में मांसाहार को लेकर भारी बहस चल रही है। कोई कहता है कि मांस खाना हमारे धर्म के अनुसार ठीक है तो कोई कहता है कि वह हमारे धर्म के अनुसार अपराध है। भारत के प्राचीन ग्रंथ किसी कार्य को बुरा या अच्छा नहीं कहते। उनमें किसी भोजन को वर्जित या स्वागत योग्य नहीं कहा गया है।  हमारे दर्शन के अनुसार यह संसार कर्म और फल के सिद्धांत पर चलता है।  जैसा खाये वैसा हो जाये मन’ ‘जैसा बोयेगा वैसा काटेगातथा बोये पेड़ बबूल का आम कहां से होयजैसी उक्तियां- जिन्हें हम सांसरिक सिद्धांत भी कह सकते हैं-हमें कर्म फल का सिद्धांत समझाती हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाप्नोत्ययलेन यो हिनस्ति न किञ्चन।।
          हिन्दी में भावार्थ- जो मनुष्य किसी के साथ हिंसा नहीं करता वह जिस लक्ष्य का चिंत्तन करता है उसे अपने कर्म और ध्यान से बिना किसी विशेष कठिनाई के प्राप्त कर लेता है।
नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंस मांसमुत्पद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वर्ग्यस्तम्मानान्मांसं विवर्जयेत्।।
          हिन्दी में भावार्थ-मांस की प्राप्ति किसी दूसरे जीव के वध से ही संभव है लेकिन हिंसा से स्वर्ग नहीं मिलता इसलिये मांस खाने का विचार ज्ञानी को करना ही नहीं चाहिये।
           योग और ज्ञानसाधक हमेशा खान पान रहन सहन और संबंध निर्माण में हमेशा सतर्कता बरतते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि उनका प्रभाव उनकी देह, मन और विचार पर पड़ता है। श्रीमद्भागवत गीता में गुणों और इंद्रियों का सहसंबंध बताया गया है। श्री गीता के अनुसार व्यक्ति स्वयं ही अपना उद्धार कर सकता है।
          इधर हम देख रहे हैं कि हमारे देश में आत्म निर्माण की बजाय समाज सुधार का प्रचलन बढ़ा है। विदेशी विचाराधाराओं के कर्णधार समाज के दोषों के निवारण के अभियान चलाते हैं जबकि उनका स्वयं का चरित्र प्रमाणिक नहीं होता। कोई मांस खा रहा है या गलत संगत में समय गुजार रहा है यह उसकी समस्या होना चाहिये।  ज्ञानसाधक उससे संपर्क रखकर अपने अंदर उसके दुर्गण प्रविष्ट नहीं होने देता न कि उस उपदेश देकर बैर लेने का काम करता है।
          अभी हाल ही में हमने देखा कि मंास के विरुद्ध जब प्रचार चल रहा था तब कुछ मनचलों ने मांस सार्वजनिक रूप से खाकर लोकतांत्रक अधिकार के प्रदर्शन का उपक्रम किया। एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमें उन पर तरस आया।  किसी पदार्थ को खाना ही महत्वपूर्ण नहीं होता उसे पचाने के लिये पेट में संघर्ष चलता है। जिसे केवल योग साधक ही देख पाते हैं यही कारण है कि वह ऐसा सुपाच्य भोजन करते हैं जो तन मन और मस्तिष्क की इंद्रियों को व्यथित न करे।  यह बात व्यंग्यपूर्ण जरूर लगे पर फिर भी कह रहे हैं कि मांस खाने वाले शाकाहारियों के मित्र ही है क्योंकि वह अगर सब्जियां खाना प्रारंभ करें तो वह आपूर्ति नियम के अनुसार वह अधिक महंगी हो जायेंगी-वैसे भी इस समय दाल और सब्जियां मौसम की मार से महंगी हो रही हैं।  हम तो मांसाहारियों की तरीफ तब अधिक करेंगे जब वह बिना धनियां, नीबू, प्याज हरी मिर्च और प्राकृतिक मसालों के बिना भी किया करें जैसे कि शाकाहारी लोग मटर, गोभी, लौकी तथा करेला स्वास्थ्य की दृष्टि से करते हैं-इससे भी मसालों की महंगाई कम होगी।
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Tuesday, October 13, 2015

नवरात्रि पर्व के साथ ही वातावरण में आनंद का आगमन-हिन्दी चिंत्तन लेख(Navratriparva ke sath hi vatavaran mein Anand ka Agaman-HindiThought article)


                                   आज सुबह योगसाधना करने के दौरान बहुत समय बाद थोड़े अच्छे मौसम की अनुभूति हुई।  जब दैहिक सक्रियता अधिक करने वाले आसन करते तब तो पसीना आ जाता पर विश्राम वाले आसन के समय वह सूख भी जल्दी जाता था।  बाद में योग साधना करते करते ही जब पास पड़े अखबार पर नज़र गयी तो पता लगा कि आज से नवरात्रि प्रारंभ हो गये हैं।  हमारे मुख से निकला आह!
                                   भारती अध्यात्मिक दर्शन, धर्म, कर्म और जीवन शैली पर नाकभौं सिकोड़ने वालों को आज तक प्रचार माध्यमों में एकदम निरपेक्ष, निरापद और और निष्पक्ष माना जाता है। हालांकि ऐसे बुद्धिमानों को  न तो उन्हें योग साधना करना आती है न ही वह गीता ज्ञान का अध्ययन करते हैं इसलिये उन्हें पता नहीं कि बसंत का बंधते हैं।  आजकल एक विशेष विचारधारा के लेखक किसी अज्ञात योजना के तहत अपने सम्मान वापस कर रहे हैं।  उनका यह दुष्प्रचार है कि भारतीय धर्म, कर्म और शर्म समाज पर थोपी जा रही है।  वह कहते हैं कि भारत मे मिलीजुली धर्म संस्कृति की मान्यता ध्वस्त हो रही है। हमारा इसके विपरीत मानना है कि देश में जो विवाद हो रहे हैं  वह कर्म संस्कृति की विभिन्नता के कारण हैं और वह भी कथित बौद्धिक ठेकेदार कराते हैं।
                                   इस बार बारिश कम हुई है इसलिये वातावरण में उष्णता अधिक है। मनुष्य चाहे या नहीं वह गुणों के अधीन रहता ही है। जहां प्रातःकाल मन प्रसन्न रहता है वहीं दोपहर होते दिमाग सुस्त या तनाव में आ जाता है।  इससे मनुष्य के व्यवहार में अंतर पड़ता ही है।  भारत में बारिश कम होने से किसानों की फसलें नष्ट हुईं हैं या इतनी कम हुई कि उनके घर खर्च के लिये संकट पैदा हो गया है।  नवरात्रि प्रारंभ होने से पर्वों की श्रृंखला प्रारंभ हुई है पर पता नहीं क्यों ऐसा लग रहा है कि जनमानस में उत्साह की धारा प्रवाहित हुई हो। हालांकि दशहरा और दिवाली आते आते मौसम ठंडा हो जोयगा तब शायद लोगों के चेहरे पर चमक आती दिखे।  भारतीय पर्व वैज्ञानिक ढंग से ही बने हैं इसमें चाहे अनचाहे प्रसन्नता का भाव आ ही जाता है।
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