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Thursday, December 24, 2015

सजा के विषय पर विदेशी विचारों का अनुकरण संभव नहीं(Crime in India and Punishment,No Equality like west)


                     हमारे देश में बढ़ती जनसंख्या के लिये यहां के समशीतोष्ण जलवायु भी मानी जाती है। कहा जाता है कि भारत में ग्रीष्म की प्रधानता के कारण यहां लोगों में जनसंख्या वृद्धि रखने की प्रवृत्ति है।  जनसंख्या की वृद्धि अनेक समस्याओं की जनक है जिसमें अपराधों की वृद्धि स्वाभाविक है।  अतः कम से कम हम ऐसे अनेक अपराधों से निपटने में पश्चिम के उदार रवैये का अनुसरण बिना विचारे नहीं कर सकते जिसकी अपेक्षा मानवाधिकार के प्रचारक करते हैं।
                           संविधान के अनुसार बाल अपराध नियम में आयु 18 से घटाकर 16 की गयी है। यह स्वागत योग्य है पर हमारी राय यह भी थी किसी प्रकरण विशेष में अभियुक्त की आयु तीन या चार माह कम होने पर  न्यायाधीशों को भी विवेक का उपयोग करने का अधिकार होना चाहिये। भारत की तुलना मानवीय स्वभाव की दृष्टि से शेष विश्व से नहीं की जा सकती है।  कहा जाता है कि  उष्णजलवायु व  जनसंख्या घनत्व की दृष्टि से भारत में बालक जल्दी बड़ा  या कहें बुद्धिमान होता है। इसके साथ ही  गरीबी, अशिक्षा व पिछड़ेपन की स्थितियां होने सेे  अनेक बच्चों को  14 वर्ष की आयु में ही खींचतान के युवा बनाकर मजदूरी  या अपराध करने के क्षेत्र में उतरने को बाध्य किया जाता है। केंद्रीय महिला व बाल विकास मंत्री मेनका गांधी जी सही कहती हैं कि असभ्य  लोग अपने बच्चों को कानून में आयु का लाभ उठाकर आपराधिक कृत्य में लगा देते हैं। हमारा मानना है कि 16 वर्ष बाल अपराध की आयु मानने के साथ ही  न्यायाधीशों को 3 से 4 माह कम होने पर स्वविवेक उपयोग करने का हक तो  देना ही चाहिये। बाल न्याय कानून में बदलाव करना आवश्यक था पर इसका विरोध होना समझ से परे रहा। वैसे जजों को विवेक का अधिक होना चाहिये।
          हमारे यहां वैसे भी न्यायाधीश को भगवान का दूसरा रूप माना जाता है। इसलिये आधुनिक न्याय व्यवस्था में न्यायाधीशों को केवल किताबी कानून पर चलने की बजाय स्वविवेक से निर्णय करने की भी स्वतंत्रता होना चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, December 13, 2015

बाबा रामदेव की योगी व उत्पाद विक्रेता की छवि का संघर्ष( Imege of Baba Ramdev between Yogi and Product Seller)

                               इधर हम अंतर्जाल पर सामाजिक जनसपंर्क लेखकों की टिप्पणियां और पाठ देखते है तो लगता है कि  बाबा रामदेव के उत्पादों पर उनकी नकारात्मक दृष्टि हो गयी है।  इनमें से अधिकतर वह लोग हैं जिन्हें स्वाभाविक रूप से बाबा रामदेव या भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का विरोधी नहीं माना जा सकता। ऐसे लेखकों में भारतीय अध्यात्मिक तत्व मौजूद हैं पर वह बाबा रामदेव के योग से दूर हटकर व्यवसायिक रूप में आने पर निराश हैं। यदि वह परंपरागत विचारधाराओं के लेखक होते तो शायद हम उनके शब्दों को अनदेखा कर देते पर चूंकि वह स्वतंत्र लेखक हैं इसलिये हमारा मानना है कि उनकी आपत्तियों पर विचारा होना ही चाहिये।
                               बाबा रामदेव ने भारतीय योग साधना को आमजनों में लोकप्रिय बनाने का जो काम किया, वह अनुकरणीय है। हम जैसे योग और ज्ञान साधक  उनकी तुलना भक्तिकाल के महापुरुषों से करते रहे हैं। आमजनों में उनकी छवि रही है पर लगता है कि दवाईयां, बिस्कुट, आटा, घी तथा पेय पदार्थ बेचते बेचते उसका क्षरण  हो रहा है। अभी तक यह देखा गया कि भारतीय अध्यात्मिक के जीवंत व्यक्तित्व के रूप में ऐसी छवि  बनी हुई है जो अक्षुण्ण रहेगी। अब जिस तरह उनके उत्पादों के प्रति नकारात्मक चर्चा प्रचार माध्यमों के स्वर नकारात्मक हो रहे है वह दुःख से अधिक चिंता का कारण है। आगे इन्हीं उत्पादों का नकारात्मक पक्ष आने पर उनकी छवि प्रभावित भी हो सकती है। हम जैसे अध्यात्मिक चिंत्तकों के लिये यही चिंता का विषय है।
                               हमें याद है जब चौदह वर्ष पूर्व उद्यान में हम कुछ योगसाधना के दौरान जब सिंहासन व हास्यासन करते थे तो लोग मजाक उड़ाते थे। तालियां बजाते थे तो लोगों को लगता कि शायद यह मानसिक रोगी हैं। बाबा रामदेव के प्रचार पटल पर आने के बाद अब लोग समझ गये कि योग साधक वास्तव में करते क्या हैं? इसका मतलब यह भी है कि प्रचार की वजह से ही उन्हें लोकप्रियता मिली।  अब योगशिक्षा से अधिक उनके उत्पादों का प्रचार हो रहा है जिसमें कहीं दोष भी बताया जाता है। ऐसे में लग रहा है कि कहीं ऐसा तो नहीं धीरे धीरे उनकी छवि से जुड़े योग को जनमानस में विस्मृत करने का प्रयास हो रहा है। हमारा विचार है कि बाबारामदेव को अपनी योग की छवि पर ही अधिक ध्यान देना चाहिये। वैसे भी योग साधना जहां पूर्ण रूप से अध्यात्मिक विषय हैं वही विक्रय योग्य वस्तु राजसी गुण का प्रतीक है जिसमें ऊंच नीच होता ही रहता है।  ऐसे में अगर अध्यात्मिक छवि के आधार पर राजसीकर्म का विस्तार होता है तो उसका प्रभाव भी परिणाम के अनुसार अच्छा बुरा हो सकता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Wednesday, December 2, 2015

जिसे जिज्ञासा नहीं उसे ज्ञान देना निरर्थक-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख (jise Jigyasa nahin use gyan dena Vrath-Hindu spirituly Thught base on ChankyaNiti)

                             भारतीय पंथ व ज्ञान का प्रचार करने वाले अक्सर पश्चिमी पंथ मानने वालों को अध्यात्मिक दर्शन का उपदेश देकर यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि कोई बडा़ काम कर रहे हैं। हम यह तो नहीं कह सकते कि पश्चिमी पंथ मानने वाले सभी भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान से परिचित नहीं है पर इतना जरूर देखा है कि अनेक लोगों में यह प्रवृत्ति  है कि वह इसे न समझना अपना गौरव समझते हैं।  हमारे भारतीय दर्शन के अनुसार अध्यात्मिक संस्कार बचपन में पड़ गये तो सही वरना बड़ी उम्र में तो इसकी संभावना नगण्य है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अन्तःसारविहीनामुपदेशो न जायते।
मलगाचलसंर्गात् न वेणश्चन्दनायते।।
हिन्दी में भावार्थ-जिसके अंतकरण में सार समझने का अभाव है उसे उपदेश देना व्यर्थ है। वह मलयगिरी के पर्वत की तरह है जहां आने वाली वायु के स्पर्श से भी बांस चंदन नहीं होता।

                             दूसरी बात यह भी देखी गयी है कि भारतीय पंथ के प्रति नकारात्मक भाव तथा पश्चिमी पंथ अपनाकर समाज में प्रथक दिखने की प्रवृत्ति कुछ लोगों में  इस तरह भरी हुई है कि उसे सहजता से नहीं हटाया जा सकता।  इसलिये हमारी भारतीय ज्ञान के प्रचारकों को सलाह है कि वह भारतीय पंथों पर चलने वाले समाज से अधिक संवाद करें क्योंकि हमारी दृष्टि से यह आवश्यक है कि वह सबसे पहले मजबूत बने।
हिन्दुत्व को चुनौती देने वाले गलत-ट्विटर पर टिप्पणियां
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 ताज्जृब जिस हिन्दुत्व का आधार वह गीता है जो चार प्रकार के भक्त तथा तीन प्रकार की भक्ति का अस्तित्व स्वीकार करने का संदेश देती है उसे ही असहिष्णु बताया जा रहा है।  श्रीमद्भागवत्गीता को हर हिन्दू मानता है इसलिये किसी भी भक्त के आराधित इष्ट रूप तथा उसकी भक्ति के पंथ पर टिप्पणी नहीं करता।  उस हिन्दू तथा उसके हिन्दुत्व को वह लोग चुनौती दे रहे हैं जिन्होंने धनदाताओं के अनुसार अपनी कलम से  शब्द रचने के साथ ही मंचों पर  मुख से बोले। एक योग तथा ज्ञान साधक के रूप में हमारा मानना है कि वैश्विक आतंकवाद को वैचारिक आधार पर केवल भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है। जिन्हें यह टिप्पणी पसंद नहंी है तो वह बतायें कि क्या रामायण, श्रीमद्भागत तथा वेद का अध्ययन करने वाले किसी व्यक्ति ने आतंकवाद का रुख किया है?
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Tuesday, March 31, 2015

विचार व्यवहार तथा व्यक्तित्व के बौनेपन का विचार भी जरूरी-हिन्दी चिंत्तन लेख(vichar vyaktitva tathaa vyavahar ke baunepan ko pahchane-hindu hindi thought aritcle)


कुछ लोग जन्म से ही छोटे कद के रह जाते हैं तो हम उनको बौना कहते हैं। कुछ लोग छोटे पद पर काम करते हैं तो हम उन्हें बौने व्यक्तित्व का स्वामी मानते हुए यह कहते हैं कि वह छोटा कर्मचारी है। किसी के पास धन अल्प होता है तो हम उसे गरीब मानते हैं, मगर हम व्यक्तित्व, विचार तथा व्यवहार के आधार पर कभी यह तय नहीं कर पाते कि कोई बौना या ऊंचा है। जनमानस की अज्ञानता का लाभ उठाते हुए आर्थिक, सामाजिक, कला तथा धार्मिक क्षेत्र के शिखरों पर कई ऐसे लोग विराजमान हो गये हैं जो विचार, व्यक्तित्व तथा व्यवहार में सामान्य की बजाय बौनापन धारण किये होते हैं। अनेक लोग ऐसे हैं जो जीवन के विषय को व्यापक मानने की बजाय पद, पैसा प्रतिष्ठा अर्जित करने ही लक्ष्य रखते हुए बौनेपन को प्राप्त हो जाते हैं।  सभी के कल्याण का नारा देकर वह अपने क्षेत्र में ऊंचाई पर पहुंचने के बाद वह केवल अपने परिवार की प्रसन्नता के लिये कार्य करते हुए समाज में अहंकार दिखाते हैं।  हमसे दूर रहते हैं इसलिये हम उनका आंकलन नहीं कर पाते वरना वह विचार, व्यक्त्तिव और व्यवहार में अत्यंत बौने होते हैं। एक सामान्य व्यक्ति कभी भी शिखर पर पहुंचने की इच्छा न करते हुए अपने सीमित दायरे में काम करता है पर लालची तथा लोभी लोग तो  अपने लक्ष्य सर्वजनहित के लिये तय करते दिखते हैं पर मूलतः यह उनका पाखंड होता है।
आज अगर हम विश्व के साथ ही अपने समाज की बुरी स्थिति  पर दृष्टिपात करें तो यह पता चलेगा कि आजकल की समस्या यही है कि सामान्य व्यक्ति संतुष्ट होकर अपनी सीमा में रहता है जबकि विचार, व्यक्तित्व और व्यवहार की दृष्टि से बौने लोग पांखड के सहारे इतना आगे बढ़ जाते हैं कि उनके पास प्रचार में विराट व्यक्तित्व दिखाने की शक्ति भी आ जाती है। सच तो यह है कि अपना बौनापन छिपाने के लिये ऐसे लोग हर क्षेत्र शिखर ढूंढते हैं ताकि समाज उनका सम्मान करे।
इसलिये हमें पद, पैसे और प्रतिष्ठा के शिखर पर बैठे लोगों को अपना आदर्श नहीं बनाना चाहिये।  न ही यह विश्वास करना चाहिये कि वह विचार, व्यक्तित्व तथा व्यवहार में हमसे कहीं अधिक बड़े हैं।  एक तरह से तो उन्हें सामान्य व्यक्ति की तुलना में बौना ही मानना चाहिये क्योंकि वह पाखंड नहीं करता।  न ही ऐसे लोगों से ईर्ष्या करना चाहिये क्योंकि यह लोग अपना शिखर बचाने के लिये  इतने चिंतित रहते हैं कि उनकी रातों की नींद हराम हो जाती है। इतना ही नहीं पांखड तथा प्रचार की राह पर चलते हुए उनका नैतिक चरित्र भी गिरता जाता है। हमारे यहां कहा भी जाता है कि धन गया तो समझो कुछ भी नहीं गया, अगर स्वास्थ्य गया तो समझो सब कुछ चला गया और चरित्र गया तो समझो सब कुछ चला गया।  इसलिये अपने व्यवहार, विचार तथा व्यक्तित्व का सौंदर्य बचाने के लिये हमेशा ही आत्म चिंत्तन करते हुए सहज येाग का मार्ग अपनाना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, March 29, 2015

मनोरोग के बढ़ते खतरे का सामना ध्यान से ही संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(manorogon ke badhte khatare ka samana dhayan se hi sambhav-hindu hindi thought article)

अभी हाल ही में जर्मनी के विमान को उसके ही मनोरोगी चालक ने जमीन पर गिरा दिया। उसमें सवार सभी यात्री काल के गाल में समा गये।  अब उसकी महिला मित्र ने बताया कि वह चालक एक मनोरोगी था और उसकी इच्छा थी कि ऐसा काम करे जिससे पूरी दुनियां उसका नाम याद रखे। उसका मनोरोग इतना विकराल था कि वह उसके निराकरण के लिये दवायें ले रहा था। उसके कुछ करने की इच्छा ने अनेक मनुष्यों को असमय ही काल के गाल में डाल दिया।
अध्यात्मिक ज्ञान की तरह से कुछ करने की इच्छा मनुष्य में स्थित अहंकार के भाव को ही परिलक्षित करती है। सामान्य मनुष्य में भी अहंकार रहता ही है। यह अलग बात है कि उसके अंदर ऐसे विषय भी रहते हैं जिससे उसमें काम, क्रोध, मोह और लोभ के भाव भी आते जाते हैं।  संसार चक्र में वह किसी एक भाव में स्थिर नहीं रहता।  जब वह किसी एक भाव में रहेगा तो मनोरोगी हो जायेगा।  वह जर्मनी का विमान चालक अगर अपनी महिला मित्र को लेकर काम और मोह के वशीभूत रहता तो शायद कुछ करने की इच्छा से-जिसका पिता अहंकार का ही भाव है-दूर हो जाता तब शायद यह दुर्घटना नहीं होती।  जिस तरह यह कहा जाता है कि शरीर में कहीं  दर्द हो और फिर एकाएक दूसरी जगह घाव हो जाये तो वहां होने वाले दर्द से पुराने की अनुभूति  नहीं रहती। यही स्थित हमारे अंदर काम, क्रोध, लोभ मोह तथा अहंकार के भाव की है।  जब एक भाव आता है तो दूसरा दूर रहता है। एकरसता नहीं रहती तो मनुष्य खतरनाक नहीं रहता।
          हमारे कथित धार्मिक विशेषज्ञ इन भावों से दूर रहने को कहते हैं पर सच यह है कि कोई भी इससे दूर नहीं रह सकता।  यह अलग बात है कि ज्ञान होने पर आदमी इन पर नियंत्रण रख सकता है।  योग साधना करने पर तो इतनी शक्ति आ जाती है कि इन भावों की लगाम ही अपने हाथ में आ जाती है। मुक्ति तब भी नहीं मिल सकती पर यह तय है कि वह योग साधक पर सवारी नहीं करते वही उन पर सवार रहता है।  सामान्य मनुष्य इन भावों में घूमता है इसलिये खतरनाक नहीं रहता पर जो मनोरोगी हो जाये वह एक ही भाव में फंसकर अपना जीवन नष्ट कर लेता है।  धार्मिक विद्वान काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार के भावों को विष कहते हैं पर सच यही है कि जीवन के संचालन में इनका ही योगदान है।  इन पर नियंत्रण का मार्ग भक्ति है इसलिये ही प्राचीन कालीन ऋषि, मुनियों और तपस्वियों ने ही अनेक प्रयोग कर तत्वज्ञान का रहस्य खोज निकाला। जो लोग तत्वाज्ञान की राह चले जाते हैं वह जीवन में बाहरी विषयों में उतनी ही सक्रियता रखते हैं  जितनी देह के लिये आवश्यक हो पर जिन पर इन भावों ने सवारी की वह उसे इधर से उधर दौड़ाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि पूरे विश्व में मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है।  इसके साथ ही ऐसे रोगों की संख्या बढ़ रही है जो मानसिक तनाव से पैदा होते हैं। हमारा मानना है कि मानसिक तनाव का मुख्य कारण यह है कि हम अपना ध्यान बहिर्मुखी विषयों पर ही रखते हैं।  एकांत में ध्यान, नाम स्मरण तथा आत्मचिंत्तन करने की प्रक्रिया हमारी आदत से बाहर चली गयी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि देश में मनोरोगियों के साथ अन्य रोगियों की संख्या बढ़ रही है। अनेक लोगों को तो अपने रोगों का ज्ञान तक नहीं है। इसलिये जहां तक हो सके एकांत में ध्यान, नाम स्मरण तथा आत्मचिंत्तन करते रहना चाहिये।  इससे अपने बुद्धि तथा मन पर नियंत्रण रहता है। यही जीवन के लिये श्रेयस्कर स्थिति हो सकती है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Friday, May 31, 2013

मनुस्मृति में स्त्रियों को स्वयं वर चुनने का अधिकार-हिन्दी चिंत्तन लेख (manu smriti mein striyon ko swayan var chunna ka adhikar-hindi chinttan lekh)



         
        हमारे देश में पाश्चात्य विचारधाराओं के प्रचारक अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि भारतीय दर्शन स्त्रियों की स्वतंत्रता का हनन करता है।  उसे पहले पिता और पति तथा बाद में पुत्र के अधीन रहने के लिये प्रेरित करता है। ऐसे पाश्चात्य विचाराधाराओं के प्रचारकों की सक्रियता हमेशा ही भारतीय दर्शन के विरुद्ध ही दिखती है। उनकी सक्रियता का अवलोकन करने पर यह भी पता चलता है कि उन्होंने पाश्चात्य विचाराधाराओं को भी नहीं समझा बल्कि भारतीय दर्शन के विरुद्ध चलना है इसीलिये वह उससे नारे लेकर यह गाते हुए अपनी विद्वता प्रदर्शित करते हैं।
   हमारा भारतीय दर्शन वैज्ञानिक आधारों पर टिका है। इसके एक नहीं वरन् अनेक प्रमाण हैं। खासतौर से स्त्रियों को स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय की छूट जितनी है उसे अन्य कोई विचाराधारा नहीं देती। सबसे बड़ी बात है कि विदेशी विचारधारायें स्त्री को हमेशा ही कमजोर दिल वाला मानती हैं।  जबकि हमारा दर्शन मानता है कि स्त्रियों में बुद्धि का स्तर पुरुषों से कम नहीं होता। यही कारण है कि स्त्रियों को समान स्तर के परिवार, वर तथा समाज में विवाह करने का संदेश हमारा दर्शन ही देता है। यही कारण है कि परिवार से उचित समय पर विवाह न करवा पाने की स्थिति में स्वयं ही वर चुनने का अधिकार भी मनुस्मृति में दिया गया है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत् कुमार्यूतुमती सती।
ऊर्ध्व तु कालादेताम्माद्विन्देत सदृशं पतिम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-ऋतुमती होने के बाद भी अगर पिता कन्या का तीन वर्ष तक विवाह नहीं करे तो तो कन्या को स्वतः किसी योग्य से विवाह कर लेना चाहिए।
काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।
न चैवेनां प्रयाच्छेतु गुणहीनाय कर्हिचित्।।
         हिन्दी में भावार्थ-भले ही ऋतुमती कन्या जीवन भर अविवाहित घर में रह जाये पर उसका विवाह गुणहीन व्यक्ति से नहीं  करना चाहिए।
          विदेशी विचाराधाराओं के प्रचारक मनुस्मृति पर जातिवाद का आरोप लगाते हैं पर इसी में ही अंतर्जातीय विवाह करने की बात भी स्वीकारी गयी है।  हां, इसमें एक बात स्पष्ट रूप से कही गयी है कि स्त्री को अपने से कम स्तर के परिवार का वर चुनने की गलती नहीं करना चाहिये। हमने देखा है कि स्वयं विवाह करने पर अक्सर सम्मान के लिये लड़कियों को परिवार से प्रताड़ित करने की खबरें आती हैं उस समय हमारे देश में पैदा धर्मों का मजाक उड़ाया जाता है जबकि ऐसी घटनाओं में देखा गया है कि लड़कियां अपने परिवार से कम स्तर का वर चुनती हैं।  कभी कभी तो वह प्रथक संस्कार वाले वर को चुनती हैं जिसका ज्ञान उनको विवाह से पहले नहीं हो पाता।  दूसरी बात यह भी है कि विवाह एक आसान क्रिया है पर बाद में गृहस्थी की गाड़ी खींचना आसान नहीं होता। आज के आर्थिक संकट के युग में माता पिता को बाद में भी लड़कियों की जिम्मेदारी लेनी पड़ती है या फिर इसके लिये उनको मजबूर किया जाता है।  दूसरी बात यह है कि बाहरी रूप से अब अंतर नहीं दिखता पर सांस्कारिक रूप से पहले से अधिक कहीं अधिक अंतर समाज में हैं।  ऐसे में प्रथक संस्कार वाले वर से विवाह करने पर लड़कियों को बाद में भारी संकट का सामना करना पड़ता है तब समाज लड़कियोें के माता पिता की मजाक बनाते हैं।  हम इस पर अधिक बहस नहीं कर सकते पर इतना तय है कि लड़कियों को अपने हिसाब से भी योग्य वर चुनने का अधिकार है जिसे रोका नहीं जाना चाहिये।  दूसरी बात यह है कि समय रहते हुए माता पिता को भी अपनी लड़की के लिये योग्य वह गुणवान वर चुनने का कर्तव्य पूरा कर लेना चाहिये अन्यथा लड़की को स्वयं वर चुनने के अधिकार को चुनौती देने का हक उनको नहीं है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Tuesday, May 28, 2013

संत नागरीदास की दोहावली-अधिक चतुर आदमी की बुद्धि दुख की खान (sant nagridas ki dohawali-adhik chatur aadmi ki buddhi dukh ki khan hotee hai)

     अध्ययन की दृष्टि से अध्यात्म और संासरिक विषय प्रथक प्रथक हैं।  अध्यात्म ज्ञान से संपन्न मनुष्य सहजता से आचरण करते हैं। यह उनकी स्वाभाविक चतुराई है।  जब किसी के पास अध्यात्म ज्ञान होता है उसका दृष्टिकोण सांसरिक विषयों के प्रति सीमित होता है। वह उन विषयों में रत होकर कर्म तो करते हैं पर उसमें अपने हृदय को लिप्त नहीं करते।  निष्काम करने के कारण उनकी बुद्धि में क्लेश का भाव नहीं होता जिससे वह कभी स्वयं को संकट में नहीं फंसने देते।   इसके विपरीत स्वयं को सांसरिक विषयों में चतुर समझने वाले लोग न केवल कामना के साथ कर्म करते हैं बल्कि उसका प्रचार अन्य लोगों को सामने करते हुए स्वयं के लिये चतुर होने को प्रमाण पत्र भी जुटाते हैं। दरअसल ऐसे आत्ममुग्ध लोगों की बुद्धि उनके संकट का कारण ही होती हैं। संसार के एक विषय से मुक्ति पाते हैं तो दूसरा उनके सामने आता है। दूसरे के बाद तीसरा आता है। यह क्रम अनवरत चलता है और केवल सांसरिक विषयों में लिप्त लोग कभी अपने मानसिक तनाव से मुक्ति नहीं पाते।  
संत नागरी दास कहते हैं कि
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अधिक सयानय है जहां, सोई बुधि दुख खानि।
सर्वोपरि आनंदमय, प्रेम बाय चौरानि।
            सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जो मनुष्य अधिक चुतराई दिखाता है उसकी बुद्धि दुख की खान होती है। इसके विपरीत जो प्रेम का मार्ग लेता है वह सर्वोच्च आनंद पाता है।
अधिक भये तो कहा भयो, बुद्धिहीन दुख रास।
साहिब बिग नर बहुत ज्यौं, कीरे दीपक पास।।
            सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-अधिक संख्या होने पर भी कुछ नहीं होता यदि किसी मनुष्य समूह में बुद्धि का अभाव है तो उससे कोई आशा नहीं करना चाहिये। परमात्मा के पास अनेक नर है जैसे दीपक के पास अनेक कीड़े होते हैं।
       अनेक बार हम देखते हैं कि अपराधियों के नाम के साथ भी चतुर या बुद्धिमान होने की संज्ञायें सुशोभित की जाती हैं।  उनकी सफलताओं का बखान किया जाता है पर सच यह है कि यही अपराधी अपने साथ प्रतिशोध लेने की आशंकाओं अथवा कानून के  शिकंजे में फंसने से डरे रहते हैं।  देखा यह भी गया है कि अनेक मानव समूह अपने संख्याबाल पर इतराते हैं क्योंकि उनको लगता है कि इनके पास ढेर सारा बाहुबल है।  समय पड़ने पर जब उनके पास संकट आता है तो वह मिट भी जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि अपराध, अत्याचार या किसी पर आक्रमण करने को बुद्धिमानी नहीं कहा जाता क्योंकि उसमें प्रतिरोध के खतरे भी होते हैं। बुद्धिमानी तो इसमें है कि जीवन में ऐसा मार्ग चुना जो कंटक रहित होने के साथ ही सहज भी हो।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, May 26, 2013

कविवर रहीम का दर्शन-इस संसार का सबसे बड़ा सत्य है भोजन (rahim ka darshan-is sansar ka sabse bada satya hai bhojan, roti a truth of world-A hindu dharma article)



    साम्यवादी विचारधारा के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इस विश्व का सबसे बड़ा सत्य रोटी है।  हमारे देश में उनके अनुयासी उनके इस वचन को विश्व की एक बहुत बड़ी खोज मानते हैं जबकि हमारे अध्यात्मिक विद्वानों ने यह बात तो बहुत पहले ही बता दी थी।  यह अलग बात है कि कार्ल मार्क्स के शिष्य अंग्रेंजी में लिखे गये उनके पूंजी ग्रंथ के अलावा किसी अन्य भारतीय विद्वान की बात पढ़ना ही नहीं चाहते। वह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों को साम्प्रदायिक तथा जातिवादी व्यवस्था का पोषक मानते हुए कार्ल मार्क्स को विश्व का इकलौता धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का पोषक प्रचारित करते हैं।
    हमारा अध्यात्मिक दर्शन न केवल भोजन को मनुष्य के लिये बल्कि हर जीव के लिये एक सत्य के रूप में स्वीकारता है। इतना ही नहीं हमारा दर्शन हर मनुष्य को श्रम से धन कमाने के साथ ही भेाजन अपने हाथ से बनाने का संदेश भी देता है।  उससे भी आगे जाकर हमारा अध्यात्मिक दर्शन श्रमिकों और गरीबों की सहायता की निष्काम भाव से मदद करने की बात कहता है। 
कविवर रहीम कहते हैं कि
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चारा प्यारा जगत में, छाला हित कर लेय।
ज्यों रहीमआटा लगे, ज्यों मृदंग स्वर देय।।
    सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-इस संसार में भोजन सभी जीवों को प्यारा है। इसमें स्वाद तभी आता है जब परिश्रम कर उसे जुटाया जाये। जिस तरह मृद्रग पर आटे की थाप पड़ने से मधुर स्वर होता है उसी तरह अपने मेहनत के कमाये तथा बनाये भोजन में स्वाद आता है।
        अंग्रेजी संस्कृति तथा शिक्षा के प्रभाव के चलते  हमारे देश में शारीरिक तथा अकुशल श्रम को हेय मान लिया गया हैं। हर कोई सफेद कालर वाली नौकरी करना चाहता है। गृहस्थ स्त्रियों के प्रति समाज में एक नकारात्मक भाव बन गया है।  घर पर रोटी बनाने, कपड़े धोने, और बर्तन मांजने जैसे कामों को छोटा बताकर शिक्षित स्त्रियों को उससे विमुख करने का प्रयास भी हो रहा है। एक शोध के अनुसार भारत में गृहस्थी का काम करने वाली स्त्रियों के कार्यों का अगर मुद्रा में मूल्यांकन किया जाये तो वह अपने पुरुषों से ज्यादा कमा रही है।  इसका सीधा मतलब यह है कि पुरुष अगर उन कामों के लिये कहीं दूसरी जगह या दूसरे पर अपनी घरेलु सुविधाओं के लिये   धन व्यय करे तो उसे अपनी कमाई से अधिक भुगतान करना होगा। यह कहा जा सकता है कि  इस तरह उसके घर में काम करने वाली स्त्री उससे अधिक कमा रही है।  स्थिति यह है कि कार्ल मार्क्स के शिष्य इस तरह घर का काम करने वाली स्त्रियों को हेय मानते हुए उनको आजादी के नाम पर बाहर आकर काम करने की प्रेरणा देते हैं। मनुष्य के लिये सर्वोत्म सत्य यानि रोटी का सृजन करने वाली नारियों को इस तरह हेय मानना अपने आप में ही अनुचित विचार लगता है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के प्रमाणिक ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता में भी  अकुशल श्रम को हेय मानना तामस बुद्धि का प्रमाण माना गया है।  कहने का अभिप्राय यही है कि हमें अपने शरीर से अधिक काम लेना चाहिये ताकि वह आर्थिक रूप से उत्पादक होने के साथ ही स्वस्थ भी रहे।  इसी में ही जीवन का आनंद है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, May 24, 2013

दादू दयाल के दोहे-माया के साथ अहंकार भी आता है (dadu dayal ke dohe-maya ke saath ahankar bhee aataa hai)



  अनेक मासूम दिल वाले लोग धनी, उच्च पदस्थ तथा बाहुबली लोगों से दया की आशा से निहारते हैं। कुछ लोग बड़े होने पर भी विनम्र हो सकते हैं पर सभी के अंदर सहृदयता का भाव होना  संभव नहीं है। माया के फेर में फंसे लोगों से दया, परोपकार और अपने से कमजोर व्यक्ति के प्रति सहृदयता दिखाने की उम्मीद करना निरर्थक है।  खासतौर से आजकल अंग्रेजी शिक्षा तथा जीवन पद्धति के साथ जीने के आदी हो चुके समाज में तो यह आशा करना ही मूर्खता है कि धनी, उच्च पदस्थ तथा शक्तिशाली लोग समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभायेंगे।  अंग्रेजी शिक्षा उपभोग के लिये गुलाम तक बनने के लिये प्रेरित करती है तो जीवन शैली अपना पूरा ध्यान सांसरिक विषयों की तरफ ले जाती है।  ऐसे में सामान्य मनुष्य से आशा करना कि वह भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन करेगा, बेकार है |
कविवर दादू दयाल कहते हैं कि
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दादूमाया का खेल देखि करि, आया अति अहंकार।
अंध भया सूझे नहीं, का करिहै सिरजनहार ।।
        सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-माया का खेल अत्यंत विकट है। यह संभव ही नहीं है कि जिस मनुष्य के  पास धन, पद और प्रतिष्ठा का अंबार हो वह अहंकार का समंदर में न डूबे। जिसके पास माया है उसे कभी भी परमात्मा की भक्ति हो ही नहीं सकती।
माखन मन पांहण भया, माया रस पीया।
पाहण मन मांखण भया, राम रस लीया।।
      सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिनका मन मक्खन की तरह है उनके पास धन, पद और प्रतिष्ठा यान माया के प्रभाव में वह भी पत्थर हो जाता है। राम का रस पी ले तो पत्थर मन भी मक्खन हो जाता है।
       सच बात तो यह है कि भारत ने हर क्षेत्र में पाश्चात्य व्यवस्था का अनुकरण किया है। एक अंग्रेजी विद्वान ने बहुत पहले कहा था कि इस संसार में बिना बेईमानी या दो नंबर के धन के बिना कोई धनपति बन ही नहीं सकता।  जब हम अपनी प्राचीन पद्धतियों  से दूर हो गये हैं और  भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात नहीं भी करें तो  पश्चिमी विद्वानों का सिद्धांत भी यही कहता है कि बिना बेईमानी के किसी के पास अधिक धन आ ही नहीं सकता।  हम यह भी देखें कि जब किसी के पास बेईमानी से काला धन आता है तो यकीनन उसके साथ अनेक प्रकार के संकट भी जुउ़ते हैं।  ऐसे में ऐसे काले धन के स्वामियों की रात की नींद हराम हो जाती है तो दिन का चैन भी साथ छोड़ देता है। अपने संकटों से दो चार हो रहे बड़े लोग  अपनी रक्षा करेंगे या दूसरों पर दया करने का समय निकालेंगे? इसलिये जहां तक हो सके अपने ही पवित्र साधनों से जीवन बिताना चाहिये और धनी, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठावान लोगों से कोई सरोकार न रखते हुए उनसे आशा करना त्याग देना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, May 20, 2013

रहीम के दर्शन के आधार पर चिंत्तन-बड़े लोगों की नक़ल न करें (rahim ke darshan ke aadhar par chinttan-badon ke nakal na karen)



             इस संसार में युवाकाल के दौरान हर मनुष्य में आक्रामकता रहती है।  उस समय वह किसी काम को करते समय यह नहीं सोचता कि उसका परिणाम क्या होगा? दूसरी बात युवावस्था में दूसरे की होड़ करने की सभी के हृदय में प्रवृत्ति भी अत्यंत तीव्रतर होती है। ऐसे में अनेक लोग अपनी सामाजिक, आर्थिक तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि की परवाह नहीं करते हुए ऐसे कामों में लग जाते हैं जो अनुचित होते हैं। दरअसल जब हीन पृष्ठभूमि वाले लोग देखते हैं कि संपन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को अपने अपराधों का दंड नहीं मिल रहा है तब वह भी उनकी राह चलते हैं।  उसके बाद होता यह है कि निम्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को सजा तो मिल जाती है पर सपंन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को कोई दंड क्या उन पर मामला चलाने का भी कोई साहस नहीं कर सकता।
            यह विधि का विधान कहें या मनुष्य समाज की कमजोरी कि बड़े लोगों पर कोई आक्षेप नहीं करता बल्कि छोटे आदमी की हर कोई टांग खींचता है। इस सच्चाई को तो वैसे छोटा बड़ा हर आदमी जानता है पर उसके बावजूद कुछ लोग जोश में आकर होश खो बैठते है जिसका परिणाम उनको भुगतना ही पड़ता है।  उस समय भले ही कोई शिकायत करे कि बड़े लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता हम छोटे लेागों को ही दंड भुगतना पड़ता है, मगर यहां सुनता कौन है?
कविवर रहीम कहते हैं कि
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जानि अनीति ज करै, जागत ही रह सोइ।
ताहि सिखाइ जगाइबो, ‘रहिमनउचित न होइ।।
सामान्य हिन्दी भाषा में अनुवाद-जो मनुष्य जान बूझकर अपराध करता है वह जागते हुए भी सोता है।  उसे किसी प्रकार का भी ज्ञान देना व्यर्थ है।
जे रहीमविधि बड़ किए, को कहि दूषण काढ़ि।
चंद्र दूबरो कूबरो, तऊ नखत तें बाढ़ि।।
सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिन लोगों को प्रकृति ने बड़ा बनाया है उनको कोई दोष नहीं देता। निर्बल और कुबड़ा चंद्रमा आकाश में अन्य नक्षत्रों से बड़ा ही दिखाई देता है।
       मूल बात यह है कि जीवन में केवल अपनी छवि, स्थिति तथा शक्ति का ख्याल करते हुए ही अपना लक्ष्य तय करना चाहिए।  अपने आचरण और विचार पर आत्ममंथन करते हुए ही जीवन में सक्रिय होना चाहिये।  यह विचार नहीं करना चाहिए कि दूसरे का कुछ नहीं बिगड़ा तो हम भी कोई अपराध करके बच जायेंगे।  खासतौर से अपने से अधिक संपन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों का अनुकरण करने का विचार भी हृदय में नहीं लाना चाहिए।  जीवन में सहजता, संपन्नता तथा सुख लाने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम अपनी छवि, शक्ति तथा संभावनाओं के अनुसार काम करें न कि दूसरे की नकल कर अपना जीवन संकट में डालें।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, May 18, 2013

दादू दयाल के दोहे -मनुष्य में सच झूठ की पहचान का गुण होना जरूरी (dadu daya ke dohe-sach jhooth ke pahachan ka gun mansuhya mein hona jaroori(



        हम देख रहे हैं कि समाज में अब बुराई और  भलाई की पहचान के साथ पाप पुण्य के कर्म के चयन का  लोगों में ज्ञान नहीं रहा। अक्सर क्रिकेट में फिक्सिंग की चर्चा होती है। अनेक युवा क्रिकेट खिलाड़ियों को मैचों  के लिये अच्छा खासा पैसा मिलता है फिर भी वह अधिक लालच में सट्टेबाजी के चक्कर में फंस जाते हैं। सभी जानते हैं कि कथित सट्टेबाज अपना हित साधने के लिये पैसे का पिंजरा हाथ में लिये फिर रहे है।  फिर भी कुछ क्रिकेट खिलाड़ियों ने उनके इशारों पर नाचकर अपना पूरा भविष्य  ही दाव पर लगा दिया।  यह सब देखकर हैरानी होती है। पकड़े गये खिलाड़ियों न केवल मैचों के लिये अच्छा पैसा मिल रहा था बल्कि उनको प्रतिष्ठित संस्थानओं में सेवा का अवसर भी मिला।  सब कुछ उनको क्रिकेट में बेहतर प्रदर्शन के कारण मिला पर अधिक पैसों की लालच में वह उसे भूल जाते हैं।  पकड़े जाने के बाद उन्हें अपनी गलती पर पछतावा भी होता  है। हालांकि अनेंक लोग इस पर उनकी निंदा कर रहे हैं पर इस विषय पर कोई चर्चा नहीं कर रहा कि आखिर उन्होंने ऐसा किया क्यों?
       अगर हम कहें कि आजकल समाज में संस्कारहीनता की स्थिति है तो यह भी कहना  पड़ता है कि संत कवि दादूदयाल ने तो बरसों पहले ही समाज की दीवानगी की स्थिति बता दी।  उस समय समाज में पाश्चात्य संस्कृति का प्रचलन नहीं था।  तब  हमारे अपने मूल संस्कार अपने ही समाज में बसे  थे। इसके बावजूद  लोगों में सच झूठ और विष अमृत की पहचान नहंी थी जिसका उल्लेख अनेक संत कवि करते हैं।   ऐसे में जब अंग्रेजी संस्कृति के साथ ही वहां के खेलों को भी समाज में स्थापित किया गया है तब उनके कुसंस्कारों से बचना कठिन ही है।
संत कवि दादू दयाल ने कहा है कि
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झूठा साचा करि लिया, विष अमृत जाना।
दुख कौ सुख सब कोइ कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
        सामान्य भाषा में भावार्थ-पूरा संसार एक तरह से दीवाना है। झूठ को सच और विष को अमृत मानता है। दुख को ही सुख समझकर प्रसन्न होता है।
दादूविषे विकार सौं, जब लग मन राता।
तब लग चीत न आवई, त्रिभुवन पति दाता।।
            सामान्य भाषा में भावार्थ-जब मन में विकार और विष बढ़ता है तब कोई भजन नहीं करता।  ऐसे में त्रिलोकपति परमात्मा की हªªदय में सहज अनुभूति नहीं की जा सकती।
          हम क्रिकेट खिलाड़ियों के पकड़े जाने पर कितनी भी बहस कर लें पर इस तरह की सट्टेबाजी रुकने वाली नहीं है। दरअसल संकट किन्हीं व्यक्तियों का नहीं है वरन समाज की सोच का है।  पहले तो किसी के पास पैसे आने पर उसके स्तोत्रों का पता लगाया जाता था पर अब समाज ने इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया है। अब  जिसके पास पैसा है सभी लोग उसके सामने साष्टांग दंडवत् करने के लिये मरे जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि पहले आमतौर से परिवार के बड़े सदस्य गाहे बगाहे अपने से छोटे सदस्यों को धर्म के अनुसार पैसा कमाने का संदेश देते थे। अच्छे बुरे की पहचान का तरीका बताते थे। अब हालत यह है कि बच्चों में धर्म के नाम पर केवल पूजा पाठ करने को कहा जाता है बाकी कोई सिद्धांत समझाया नहंी जाता।  ऐसे में आजकल के युवा चाहे जिसे क्षेत्र में कार्यरत हों उनके अनैतिक आचरण में फंसने की संभावना प्रबल रहती है।  उनके पकड़े जाने पर पर उनकी निंदा तो की जा सकती है पर जिस मानसिकता के चलते वह ऐसा करते हैं,उसका अध्ययन करना भी आवश्यक है। वरना सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।  आखिर सच झूठ, नैतिक अनैतिक तथा विष अमृत की पहचान जिसे न हो उससे हमेशा ही सदाचरण की उम्मीद कैसे की जा सकती है?      

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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