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Tuesday, August 27, 2013

कन्या भ्रूण हत्या के लिए जिम्मेदार लोगों का अन्न भी न खाएं-मनु स्मृति के आधार पर यह सन्देश (kanya bhrun hatya ke liye jimmedar logon ka bhjan grahan na karen-manu smriti ke aadhar par yah sandesh)



         कहा जाता है कि जैसा खायेंगे अन्न, वैसा ही होगा मन।  दरअसल इस कहावत का आशय शब्दिक, लाक्षणिक तथा व्यंजना तीनों विधाओं में लिया जाना चाहिये।  अन्न का शाब्दिक आशय तो गेहुं, चावल तथा दालों सहित उन तमाम तरह के पदार्थों से है जो प्रकृत्ति से प्रदत्त हैं। लाक्षणिका रूप से देखने पर लगता है कि अगर इन अन्नों के उत्पादन की गुणवत्ता में कमी है तो सेवन किये जाने  पर वह देह को कम पौष्टिकता प्रदान करते हैं। गुणहीन अन्न अधिक खाने पर भी पाचक नहीं होता और पाचक अन्न कम खाने पर भी अधिक शक्ति देता है।  उसी तरह आशय  व्यंजना विधा में यह कहा जा सकता है कि अन्न से बने भोज्य पदार्थों का उद्गम स्थल भी अत्यंत महत्व रखता हैै। जहां भोजन आचरणहीन, लोभी तथा दुष्ट व्यक्ति के माध्यम से प्रस्तुत हो उसका सेवन करने से मनोवृत्ति विषाक्त हो जाती है।
      हमारे यहां समाज में आचरण, विचार तथा व्यवहार का स्तर देखने के बजाय लोग केवल पैसे की उपलब्धि देखने लगे हैं।  दूसरी बात यह भी है कि सिकुड़ते हुए पारिवारिक दायरों तथा जीवन में व्यक्तिगत संघर्ष ने लोगों के पास समाज की चारित्रिक स्थिति से मुंह फेरने के लिये विवश कर दिया हैं।  वह मित्रों के संग्रह के लिये जूझते हैं पर स्वयं किसी के स्वयं हितैषी बनने को तैयार नहीं है। फिर पार्टियों तथा पिकनिक के दौर नियमित हो गये हैं जिसमें लोग केवल जान पहचान के आधार पर शमिल होते हैं। यह जानने का कोई प्रयास नहीं करता कि उनके सहभागियों के घन का स्तोत्र क्या हैं? जहां मिल जाये खाना वहीं चला जाये जमाना वाली स्थिति है। भोजन के स्तोत्र की अज्ञानता ने आचरण और व्यवहार के प्रति उदासीनता का भाव पैदा किया है।  
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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मत्तक्रुद्धातुराणां च न भुञ्जति कदाचन।
केशकीटावपन्नं च पदा स्पृष्टं च कामतः।।
भ्रुणघ्रावेक्षितं चैव संस्पृष्टं चाप्यदक्यया।
पतत्रिणाऽवलीढं च शुना संस्पृष्टंमेव च।।
     हिन्दी में भावार्थ- विक्षिप्त, क्रोधी और रोगी व्यक्ति के लिये  रखा, बालों तथा कीड़े पड़ जाने से दूषित, खाने के लिये अनुचित मानकर फैंकने के लिये रखा गया, जिसे भ्रुण हत्यारों ने देखा हो तथा जिसे पक्षियों ने चखा हो, ऐसा पदार्थ कभी सेवना नहीं करना चाहिये।
राजान्नं तेज आदत्ते शूद्रान्नं ब्रह्मवर्चसम्।
आयुः सुवर्णकारान्नं यशश्चर्मावकर्तिनः।।
     हिन्दी में भावार्थ-राजा का अन्न खाने से तेज और निम्न आचरण करने वाले व्यक्ति का अन्न खाने से विद्या के साथ ही यश की भी हानि होती है।
      हमारे यहां सामान्य लोगों को विशिष्ट लोगों के घर मेहमाननवाजी करने का सपना हमेशा रहता है।  खासतौर से राजसी शिखर पर बैठे लोगों के यहां जाने के लिये लोग लालायित रहते हैं।  मनुस्मृति के अनुसार राजा का अन्न खाने से तेज का नाश होता है। इसका आशय यही है कि जब कोई किसी राजपुरुष के यहां भोजन करेगा तो उसके सामने नतमस्तक होना भी पड़ेगा इससे मन के साथ ही ज्ञानेंद्रियां भी शिथिल होती हैं।  उसी तरह हम देख रहे हैं कि कन्या भ्रुण हत्या रोकने का अभियान हमारे देश में इसलिये चल रहा है क्योंकि उसके कारण जनसंख्या में लिग का अनुपात बिगड़ जाने से स्त्रियों के प्रति अपराध बढ़ते जा रहे हैं। कन्या भ्रुण हत्या रोकने का अभियान भी चल  रहा है पर समाज से उसमें सहयोग नहीं मिल रहा है।  समाज में चेतना लाने के लिये यह आवश्यक है कि लोगों को अपना अध्यात्मिक ज्ञान उनमें प्रचारित करना चाहिये। कन्या भ्रुण हत्या के लिये जिम्मेदार लोगों के प्रति समाज जब उपेक्षा का भाव अपनायेगा तभी संभवत सफलता मिल पायेगी।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, August 17, 2013

अथर्ववेद के आधार पर संदेश-सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान कर (atharvved ke adhar par sandesh-sau hath ka kama hazar hath se dan kar)



    हमारे देश में धर्म को लेकर अनेक भ्रम प्रचलित हैं जिनका मुख्य कारण धन के आधारित पर प्रचलित पंरपराऐं हैं जिनको निभाने के लिये कथित धर्मभीरु अपना पूरा जीवन पर दाव पर लगा देते हैं। दूसरी बात यह है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में डूबा समाज अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है और उसके पास धर्म तथा भ्रम की पहचान ही नहीं रही।  सच बात तो यह है कि हम जिस अपनी महान संस्कृति और संस्कारों की बात करते रहे हैं उनका आधार वह पारिवारिक संबंध रहे हैं जो अब धन के असमान वितरण के कारण कलह का कारण बनते जा रहे हैं। पहले एक रिश्तेदार के  पैसा अधिक होता तो दूसरे के पास कम पर अंतर इतना नहीं रहता था कि उसकी अनुभूति प्रत्यक्ष रूपे की जा सके पर  कि अब असमान स्तर दिखने लगा है। इतना ही नहीं स्तर में अंतर इतना अधिक आ गया है कि सद्भाव बने रहना कठिन हो गया है। एक रिश्तेदार सामान्य जीवन जी रहा है तो दूसरा राजकीय कर्म से जुड़ने के कारण विशिष्ट हो जाता है। ऐसे में रिश्तों में मिठास कम कड़वाहट अधिक हो जाती है।
       महत्वपूर्ण बात यह कि हम धर्म के नाम पर सभी एक होने का स्वांग करते हैं पर हो नहीं पाते। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे देश में दो प्रकार के भारतीय धार्मिक लोग हैं। एक तो हैं लालची दूसरे हैं त्यागी।  एक बात निश्चित है कि भारतीय धर्म से जुड़े लोग अधिकतर त्यागी होते हैं पर आधुनिक लोकतंत्र ने कुछ लालची लोगों को आगे बढ़ने का मार्ग दिया है। समाज पर नियंत्रण करने वाली अनेक संस्थाओं में कथित रूप से लालची लोगों ने कब्जा कर लिया है। यह लालची लोग एक तरफ से चंदा लेते हैं दूसरी तरफ दान करने का स्वांग करते हैं। अंधा बांटे रेवड़ी आपु ही आपको दे की तर्ज पर यह उस दान का हिस्सा भी अपने घर ही ले जाते हैं। धर्म, अर्थ, राज्य, कला, तथा शिक्षा के शिखर पर अनेक ऐसे कथित लोग पहुंचें हैं जो भारतीय धर्म के रक्षक होने का दावा तो करते हैं पर होते महान लालची हैं। सीधी बात कहें तो हमारे भारतीय धर्म को खतरा बाहर से नहीं बल्कि अपने ही लालची लोगों से है।  यह लालची लोग प्रचार तंत्र में अपने समाज सेवक होने का प्रचार करते हैं जो जब बाहरी लोग उनका चरित्र देखते हैं तो समस्त भारतीय धर्म के लोगों को वैसा ही समझते हैं जबकि हमारे हमारे देश के अधिकतर  लोग अपने धर्म के अनुसार त्यागी होते हैं।  लालची लोग सौ हाथों से धन तो बटोरते हैं पर दान एक हाथ से भी नहीं करते।  ऐसे ही लोग धर्म के लिये सबसे बड़ा संकट हैं। अगर हम अपने देश में श्रम पर आधारित करने वाले लोगों को देखें तो वह गरीब होने के बावजूद अपने आसपास के लोगों की सहायता को तत्पर होते हैं। इसका वह प्रचार नहीं  करते वरन् करने के बाद किसी प्रकार की फल याचना भी नहीं करते।  इसके विपरीत जिन लोगों ने अपनी लालच की वजह से येन केन प्रकरेण समाज पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं पर कब्जा किया है वह अपना स्तर बनाये रखने के लिये षडयंत्रपूर्वक काम करते हैं। इतना ही नहीं धर्म का कोई एक नाम देना हमारे अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि गलत है वहीं वह सभी धर्मों की रक्षा की बात कहते हुए भ्रमित भी करते हैं।  सबसे बड़ी  इन लोगों ने सभ्रांत होने का रूप भी रख लिया है और अपने से नीचे हर व्यक्ति को हेय मानकर चलते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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शातहस्त समाहार सहस्त्रस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समायह।।
        हिन्दी में भावार्थ-हे मनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथ वाला बनकर दान करते हुए समाज का उद्धार कर।
       समाज में समरसता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि शक्तिशाली तथा समृद्ध वर्ग कमतर श्रेणी के लोगों की सहायता करे पर अब तो समाज कल्याण सरकार का विषय बना दिया गया है जिससे लोग अब सारा दायित्व सरकार का मानने लगे हैं।   धनी, शिक्षित तथा शक्तिशाली वर्ग यह मानने लगा  है कि अपनी रक्षा करना ही एक तरह से  समाज की रक्षा है।  इतना ही नहीं यह वर्ग मानता है कि वह अपने लिये जो कर रहा है उससे ही समाज बचा हुआ है।  जब धर्म की बात आती है तो सभी उसकी रक्षा की बात करते हैं पर लालची लोगों का ध्येय केवल अपनी समृद्धि, शक्ति तथा प्रतिष्ठा बचाना रह जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें केवल किसी को अपने धर्म से जुड़ा मानकर उसे श्रेष्ठ मानना गलत है बल्कि आचरण के आधार पर ही किसी के बारे में राय कायम करना चाहिये। हमारा समाज त्याग पर आधारित सिद्धांत को मानता है जबकि लालची लोग केवल इस सिद्धांत की दुहाई देते हैं पर चलते नहीं। समाज की सेवा भी अनेक लोगों का पारिवारिक व्यापार जैसा  हो गया है यही कारण है कि वह अपनी संस्थाओं का पूरा नियंत्रण परिवार के सदस्यों को सौंपते हैं। दावा यह करते हैं कि पूरे समाज का हम पर विश्वास है पर यह भी दिखाते हैं कि  उनका समाज में  परिवार के बाहर किसी दूसरे पर उनका विश्वास नहीं है।  हम जाति, धर्म, शिक्षा, क्षेत्र तथा कला में ऐसे लालची लोगों की सक्रियता पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि उनका ढोंग वास्तव में समूचे समाज  को बदनाम करने वाला हैं। बहरहाल हमें अपने आचरण पर ध्यान रखना चाहिये। जहां तक हो सके धर्म, जाति, भाषा, कला, राज्यकर्म तथा क्षेत्र के नाम पर समाज को समूहों में  बांटने वाले लोगों  की लालची प्रवृत्ति देखते हुए उनसे दूरी बनाने के साथ ही अपना सहज त्याग कर्म करते रहना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Friday, August 9, 2013

चाणक्य नीति-श्रृंगार का प्रेमी कभी अकाम नहीं हो सकता (chankya neeti darshan-shringar ka premi kabhee akam nahin ho sakta)




        महान भारतीय विद्वान चाणक्य को आज भी विश्व का महान दार्शनिक माना जाता है। हमारे यहां राजनीति शास्त्र का उनको एक तरह से  जनक माना जाता है। जब हम राजनीति की बात करते हैं तो यकीनन उसमें सक्रिय भूमिका राजसी भाव से राजसी कर्म के साथ ही निभाई जा सकती है। महान विशारद चाणक्य के संदेशों में जीवन रहस्यों का सार है। व्यक्ति कोई भी हो-योगी, सात्विक और राजस-उसे चाणक्य नीति का ज्ञान हो तो कहना ही क्या? दरअसल हमारे यहां अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को अपनाया गया है जिसमें केवल राजसी विषयों का अध्ययन ही किया जाता है। नैतिक शिक्षा के नाम पर भी अंग्रेजी उद्धरणों का सहारा ही लिया जाता है।  इस पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय अध्यात्म दर्शन के विषय को बाहर रखा गया है। सच बात यह है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन किसी एक देवता या भगवान की पूजा पद्धति की बात नहीं करता। उसमें साकार तथा  निरंकार का दोनों में किसी का भी  स्मरण करना श्रेष्ठ विचार माना गया है। उसमें जीवन रहस्य के साथ ही सांसरिक विषयों की पहचान भी बतायी गयी है।  मनुष्य की मनस्थिति कब किस प्रकार की होगी यह मनोविज्ञान का विषय है पर भारतीय दर्शन इसे अलग से अध्ययन करने का विचार नहीं देता बल्कि वह सामान्य जीवन के भाग के रूप में इसे देखता है। श्रीमद्भागवत गीता में यह माना गया है कि मनुष्य तीन प्रकार का-सात्विक, राजस तथा तामस-होता है।  अगर कोई  योग का अभ्यास करे तो वह इन तीनों से प्रथक एक अलग प्रकार का जीव योगी  हो जाता है। एक मनुष्य अलग अलग मनस्थिति से गुजर सकता है तो वह प्रथक प्रथक समय सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृतियों के वशीभूत होने से वैसे  कर्म भी कर सकता है। श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान तथा विज्ञान के संदेशोें से भरा एक महान ग्रंथ है।  यह अलग बात है कि उसे केवल भारतीय धर्मों से जुड़ा मानकर शिक्षा के विषयों से दूर रखा जाता है। इसका कारण देश का राजनीतिक रूप से धर्मनिरपेक्ष होने विचार कम, लोगों में अज्ञान का अंधेरा रहे और उन्हें रौशनी के रूप में सपने, वादे और दावे बेचे जा सके, यह नीति अधिक जिम्मेदार है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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निःस्पमृहो नाऽअधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः।।
      हिन्दी में भावार्थ-कोई भी अधिकार संपन्न आकांक्षा रहित, श्रृंगार का प्रेमी अकाम, मूर्ख मधुर वचन बोलने वाला तथा स्पष्टवादी कभी धोखेबाज नहीं होता।
 
       यही कारण है कि आजकल लोग व्यवहार में धोखे का शिकार हो रहे हैं। खासतौर से युवक युवतियों के बीच अज्ञानता की प्रवृत्ति अधिक देखी जा रही है।  सहशिक्षा ने युवक युवतियों के बीच कथित मित्रता या प्रेम संबंधों को प्रोत्साहन दिया है। उर्दू शायर कर लड़कियों को लड़के प्रभावित करते हैं। लड़कियां यह समझती हैं कि उनका मित्र या प्रेमी उनसे निष्काम प्रेम कर रहा है। जब उन्हें धोखे, आक्रमण या अपराध का शिकार होना पड़ता है तब सच्चाई का पता चलता है। लैला मजनूं, शीरी फरहद, रोमियो जूलियट और ससी पुनू के किस्से अक्सर पत्रिकाओं प्रकाशित होते है।  स्थिति यह है कि कामना और वासनामय आकर्षण को हमारे प्रचार माध्यम प्यार, इश्क, लव और प्रेम बताकर प्रचार करते हैं।
    हमारा अध्यात्म दर्शन कहता है कि साकार या निराकार परमात्म के अलावा किसी अन्य नश्वर वस्तु या व्यक्ति से प्रेम हो ही नहीं सकता।  प्रेम निष्काम होना चाहिये पर कामनामय प्रेमी कभी ऐसा नहीं करता।  वह तो श्रृंगार के आकर्षण का शिकार होता है। उसी तरह रिश्त नातों में पारंपरिक अधिकार की बात आती है।  तय बात है कि जब कोई व्यक्ति दूसरे के समक्ष  रिश्ते में अपना अधिकार मानता है उससे  त्याग की आशा करना व्यर्थ है।  मूर्ख से मधुर वचन की आशा लगभग मूर्खतापूर्ण बात ही है।  जो लोग स्पष्ट बात कहते हैं वह कभी धोखेबाज नहीं होते यह अलग बात है उनकी बातें सुनने में बुरी जरूर लगती हैं।
      जीवन में हर आदमी को सतर्क तथा व्यवहारकुशल होना चाहिये पर यह तभी संभव है जब कोई भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करे। उसमें व्यक्ति, विषय तथा वस्तुओं के व्यवहार के साथ ही उनकी उपयोगिता का भी रूप बताया गया है। भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन कर उनका ज्ञान धारण करने पर जीवन में हर पल सहजता का अनुभव होता है तथा प्यार, पैसा तथा प्रतिष्ठा के विषय में कभी कोई धोखा नहीं खा सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, August 3, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-दूषित अन्न की पहचान आवश्यक (katilya ka arthshastra-dushti anna ki pahachan awashyak)




             आजकल खाने पीने की वस्तुओं में मिलावट अधिक हो गयी है। स्थिति यह है कि अनेक धूर्त लोग खाने के सामान अभक्ष्य तथा अपच सामान मिलाकर बेचते हैं।  उससे भी अधिक दृष्ट लोग हैं जो यह जानते हुए कि उनकी सामग्री विषाक्त है वह उसे खाने पीने के लिये ग्राहक या प्रयोक्त को बेचते हैं। अभी हाल ही में बिहार में मध्यान्ह भोजन खाकर अनेक छात्रों की मृत्यु हो गयी थी। इतना ही प्रचार माध्यमों-समाचार पत्रों तथा टीवी चैनलों-में ऐसे समाचार लगातार आते रहे हैं कि मध्यान्ह भोजन में खराब या विषाक्त खाना परसो जा रहा है।  प्रचार माध्यमों का यह प्रयास प्रशंसनीय है पर यह कहना पड़ता है कि उनका ध्यान देर से गया है। देश में सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यक्रमों में गरीबों को खाना खिलाने के नाम पर जिस तरह की खुले में व्यवस्था होती है उसमें ऐसी ढेर सारी शिकायते पहले से ही रही हैं पर उन पर बिहार की घटना से पहले ध्यान नहंी दिया गया।  बहरहाल अब स्थिति यह है कि हम हर जगह इस यकीन के साथ भोजन नहीं कर सकते कि वह स्वच्छ है।  सामान्य लोगों को भोजन के दूषित होने की जानकारी सहजता से नहीं रहती जबकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन इस विषय में अनेक प्रमाण दिये गये हैं।

कौटिल्य के अर्थशासत्र में बताया गया है कि
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भोज्यमन्नम् परीक्षार्थ प्रदद्यात्पूर्दमग्नये।
वयोभ्यश्व तत दद्मातत्र लिङ्गानि लक्षयेत्।।
       हिन्दी में भावार्थ-भोजन योग्य अन्न की परीक्षा करने के लिये  पहले अग्नि को दें और फिर पक्षियों को देकर उनकी चेष्टा का अध्ययन किया जा सकता है।
धूमार्चिर्नीलता वह्नेः शब्दफोटश्व जायते।
अन्नेन विषदिग्धेन वयसां मरणभवेत्।।
        हिन्दी में भावार्थ-यदि अग्नि से नीला धुआं निकले और फूटने के समान शब्द हो, अथवा पक्षी खाने के बाद मर जाये तो मानना चाहिये कि वह अन्न विषैला है।
अस्विन्नता मादकत्यमाशु शल्यं विवर्णता।
अन्नस्य विषदिगधस्य तथाष्मा स्निगधमेचकः।।
                 हिन्दी में भावार्थ-विष मिला हुआ भोजन आवश्यकता से अधिक गर्म तथा चिकना होता है।
व्यञ्जनस्याशु शुष्कत्वं क्वथने श्यामफेनता।
गंधस्पर्शरसाश्वव नश्यन्ति विषदूषाणात्।।
    हिन्दी में भावार्थ-बने हुए व्यंजन का जल्दी सुखता है। पकाते समय काला फेल उठना  विष दूषित अन्न के ही लक्षण है।

           बिहार के विद्यालय में विषाक्त अन्न परोसने की जो घटना हुआ थी उसमें खाना पकाने वाली महिला ने वहां की प्राचार्या को पकाते समय ही तेल या अन्न के विषाक्त होने की बात कही थी पर उसने ध्यान नहंी दिया।  गरीब महिला ने खाना पकाया और स्वय तथा वहां उपस्थित अपने तीन बच्चों को भी खिलाया। परिणाम यह हुआ कि यहाँ ं उसके मृत 22 बच्चों में उसके दो बच्चे भी थे। तीसरा बीमार हुआ और वह स्वयं भी बुरी तरह बीमार हुई।  रसोई बनाने वाली महिला संभवतः अधिक शिक्षित नहीं थी पर ग्रंामीण परिवेश की होने के कारण उसे भोजन के विषाक्त होने का संदेंह हो हुआ पर महिला प्राचार्य ने उसकी बात को नज़रअंदाज कर दिया गया । दरअसल देखा जाये तो भारतीय अध्यात्म में वर्णित सूत्रों की जानकारी जितनी ग्रामीण लोग रखते हैं उतनी शहरी क्षेत्र में अंग्र्रेजी शिक्षा पद्धति से ज्ञान संपन्न लोगों को नहीं रहती शायद यही कारण है कि उससे अधिक शिक्षित प्राचार्या ध्यान नहीं दे पायी।
     हम अक्सर कहा करते हैं कि गांवों में अशिक्षित लोग रहते हैं पर सच यह है कि भारतीय अध्यात्म से वह गहराई से जुड़े रहते हैं कि वह शहरी लोगों से अधिक ज्ञानी होते हैं।  इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग शिक्षित जरूर होते हैं पर ज्ञानी नहीं होते।  कोई बीमारी हो तो शहरी लोग आधुनिक चिकित्सा पद्धति की तरफ भागते हैं जबकि ग्रमीण परिवेश के लोग अचूक देशी नुस्खे आजमाते हैं और कभी दूसरों का भी सुझाते हैं।  देखा जाये तो शहरी लोगों में बीमारी का अनुपात अधिक ही रहता है। दूसरी बात यह भी है कि शहरी क्षेत्रों में दूषित और विषाक्त पदार्थ अधिक बिकते हैं क्योंकि वहां के लोगों को उसकी पहचान नहीं है।  अतः शहरी क्षेत्रों में ही दूषित तथा पवित्र खाद्य पदार्थै के प्रति चेतना लाने का प्रयास करना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


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