समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Saturday, February 27, 2016

अज्ञानी को दान लेने का हक नहीं-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख (Agyani ko Daan lene ka hak Nahin-A Thought article Basee on ManuSmriti)

                         कुछ जनवादी संगठनों के कथित वैचारिक युवा अक्सर मनुस्मृति को जलाने की बात करते सुने।  कहते हैं कि उसमें दलितों के लिये खराब बातें कही गयी हैं।  उनकी बात सुनकर हमारी राय तो यह बनी है कि जिस तरह श्रीमद्भागवत को पढ़ने के बावजूद उसे समझे बिना उसके ज्ञान का प्रचार पेशेवर ज्ञान प्रचारक करते हैं उसी तरह ही मनुस्मृति के कुछ अंश पढ़े बिना ही उसका दुष्प्रचार करने वाले भी विद्वान  कम नहीं है। पहली बात तो यह कि मनुस्मृति में जन्म के आधार पर जाति का उल्लेख है तो कर्म भी उसके निर्माण का तत्व माना गया है। इसका आशय यह है कि जन्म के आधार पर एक जाति हो सकती है तो कर्म के आधार पर उसमें बदलाव भी माना जा सकता है।  दूसरी बात यह कि हर प्रकार के कर्म करने वाले का यह धर्म है कि अपनी योग्यता के अनुसार ही उपलब्धि ग्रहण करे।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
--------------
आतपास्त्वनाधीयानः प्रतिग्रहरुचिद्विंजः।
अम्भस्यश्मप्लचेनैव सह तेनैव मजति।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान तपस्या व विद्या से रहित होने पर भी दान लेता है वह नरक भोगता है जैसे पत्थर की नाव पर चढ़ने वाला व्यक्ति उसके साथ ही डूब जाता है।
                        हमारे यहां दान की परंपरा है उसमें यह शर्त जोड़ी गयी है कि सुपात्र को ही दिया जाना चाहिये।  सुपात्र में किसी की जाति का उल्लेख नहीं है इसलिये किसी वर्ण विशेष पर दान से कृपा नहीं हो सकती। इतना ही नहीं जो आमजनों में ज्ञान प्रचार का काम करते हैं वह भी अगर उस राह पर नहीं चलते तो उन्हें भी दानदक्षिणा लेने का अधिकार नहीं-यही मनुस्मृति में कहा गया है। कभी कभी तो लगता है कि मनुस्मृति का विरोध करने के लिये कथित उच्च जाति के ज्ञान विक्रेता दलित जाति के लोगों को इसलिये उकसाते हैं ताकि उसमें जो जाति, धर्म तथा ज्ञान के जो सिद्धांत बताये गये हैं उसे वह न पढ़ें न समझें। उनका लक्ष्य समाज में अज्ञान के अंधेरे में स्वर्ग की कृत्रिम रौशनी बेचकर अपना धंधा बनाये रखना है। इतना ही नहीं मनुस्मृति में भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा हत्या के भी कड़े दंड बताये गये हैं जिससे कुछ लोग भयभीत हैं।
--------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, February 20, 2016

मनृस्मृति में वर्णित हैं धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत-हिन्दी चिंत्तन लेख(Secularism Thought in ManuSmriti-Manuwad Is GraeatThought-HInduDharama Sandesh)

                        भारतीय तथा पाश्चातय धार्मिक विचाराधाराओं में मूल अंतर यह है कि हम मनुष्य के कर्म को ही धर्म की संज्ञा देते हैं जबकि विदेशी पूजा पद्धति के आधार पर उसका नाम तय करते हैं। भारत में विदेशी धार्मिक व सामाजिक विचाराधाराओं के साथ ही अध्यात्म में विषय में भ्रम पैदा हुआ है। हमारे यहां अभी तक राज्य प्रबंध के समर्थन के कारण प्रगतिशील तथा जनवादी चिंत्तन धारा अे पेशेवर विचारकों को समर्थन मिला जिससे वह समाज में बौद्धिक शिखर पर प्रभावी हो गये। यही कारण है कि हमारे यहां लोगों के इष्ट, पूजा पद्धति तथा पहनावे के आधार पर धर्म का रूप तय किया जाने लगा है। इसके बाद भारतीय समाज में जाति, क्षेत्र तथा भाषा के आधार पर बांटकर उसे आपस में लड़ाया जाता है। कर्म वह आचरण के आधार पर किसी के व्यक्तित्व व कृत्तिव पर दृष्टिपात करने की बजाय उसके भौतिक रूप को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
-------------
जातिज्ञानपदान्धर्मान्श्रेणीधर्माश्च धर्मवित्।
समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्म प्रतिपादवेत्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-धर्मज्ञ राजा को जाति धर्म, जनपद धर्म, श्रेणी धर्म तथा कुल धर्म को अच्छी तरह समझकर अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिये।
                        हमारे यहां राज्य की धर्मनिरपेक्षता से आशय पाश्चात्य आधार पर बने संज्ञाधारी धर्मों को समान देखने की दृष्टि से माना जाता है जबकि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कर्म के आधार पर बने धर्मो में बीच सामंजस्य स्थापित करना राजधर्म बताया गया है। जाति, जनपद या क्षेत्र, व्यवसाय या श्रेणी तथा कुल के आधार पर हर मनुष्य में स्वभाविक गुण होते हैं जिनकी जानकारी होने पर राज्य प्रमुख सहजता से प्रजा पर नियंत्रण कर सकता है। हमने देखा होगा कि हमारे देश में कुछ जातियों में दैहिक  क्षमता व आक्रामक प्रवृत्ति किसी क्षेत्र विशेष में उत्पन्न के कारण अधिक होती है जिससे उसके लोगों को रक्षा संस्थाओं में सेवा करने के लिये वरीयता दी जाती है।  यह ठीक भी है जहां बल से कार्य होता है वहां उसमें दक्ष व्यक्ति ही आवश्यक है लेकिन जहां बुद्धि तथा व्यवसाय कौशल वाली सेवाओं में वह दक्षता की बजाय किताबी ज्ञान देखा जाता है जबकि वहां प्रबंध कुशल के साथ ही व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता भी देखा जाना चाहिये।
                        रक्षाकर्मी का रक्षा, व्यवसायी का व्यवसाय, बुद्धिमान का मार्गदर्शन तथा सेवक का सेवा ही कर्म होता है जिसका निर्वाह ही उसका धर्म भी है।  राज्य प्रबंध में कुशल प्रमुख अपने देश की जातियों, वर्णों तथा वर्गों के कर्म तथा धर्म को समझकर उसमें अपने अनुकूल सेवका का चयन करता है। सर्वधर्मसमभाव की कला में पारंगत राज्य प्रमुख ही सहजता से राज्य कर सकता है-हमारी दृष्टि से मनुस्मृति की यही मान्यता लगती है।
-----------------

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Sunday, February 14, 2016

ज्ञान से प्रतिपक्षी को परास्त करें-हिन्दी चिंत्तन लेख (Gyan se praipakshi ko parast kar-Hindi Thought article)


                        सामाजिक जनंसपर्क ने जहां विश्व में धाक जमाई हैं वहीं अभद्र भाषा के शब्दों के प्रयोग ने चिंता का वातावरण भी बनाया है। अनेक बार ऐसा होता है कि हम जैसे लेखक किसी फेसबुक, ट्विटर वह ब्लॉग पर प्रदर्शित सामग्री पर असहमति जताने की चाहत इसलिये भी छोड़ देते हैं कि वहां बीभत्स शब्द पहले ही दर्ज होते हैं। यह डर लगता है कि कहीं हम आक्रामक विरोधियों के साथी न समझ लिये जायें। शुद्ध देशी भाषा की गालियां देखकर मन खराब हो जाता है। दुनियां में संसार में समाज भिन्न व्यक्तियों, विचारों व विषयों के समूह से ही बनता है।  भिन्नता से भरा है इसलिये तो समाज कहलाता है। एकरूपता होने पर तो एक ही इकाई ही कहलाता न! ऐसे में अपने से प्रथक विचार वाले व्यक्ति की उपस्थिति सहजता से स्वीकार करना चाहिये न कि उस पर आक्षेप लगाकर अपने अंदर कुंठा लाना चाहिये।
                        सामवेद में कहा गया है कि ऋतस्य जिव्हा पवते मधु।सच्चे मनुष्य की वाणी से मधु टपकता है।
                        जब हम किसी विचार से असहमत हों तो उस पर प्रतिविचार अभिव्यक्त कर सकते हैं-यही ज्ञानी होने का प्रमाण भी होता है। तर्क में भार बढ़ाने के लिये अभद्र शब्द का पत्थर रखना आवश्यक नहीं-अगर रखते हैं तो यही माना जायेगा कि वक्ता या लेखक में अपने ही शब्दों के प्रति विश्वास नहीं है।
                        अथर्ववेद में कहा गया है कि क्षिणामि ब्रह्णामित्रायुन्नयामि स्वानहम्।ज्ञान से विरोधियों का क्षरण कर अपने को आगे बढ़ाये।
                        हमारे देश में विद्वानों के बीच विचाराधाराओं का द्वंद्व सदैव रहा है। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के वाहक होने के नाते हमारा अन्य  विचाराधारा के विद्वानों से मतभेद रहा है। उनसे बहसें भी होती रहीं है पर हमने हमेशा अपनी सहज प्रवृत्ति से उनके सामने अपने तर्क रखे हैं। इधर अंतर्जाल पर प्रगति व जनवादी विद्वान भी अपनी पूरी उसी पूरी शक्ति के साथ सक्रिय है।  उनका राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों से पंरपरागत प्रचार माध्यमों में सदैव वाद विवाद रहा है पर इधर अंतर्जाल पर भयानक वाक्युद्ध में बदल गया है। चूंकि राष्ट्रवादी विचाराधारा के लेखक हमारा अध्यात्मिक लेखन के कारण हमारा सम्मान करते हैं इसलिये उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वह सभी का सम्मान करें। खासतौर से जब राष्ट्रवादी भारत के प्राचीन दर्शन को जब अपना प्रिय विषय मानते हैं तब यह आशा तो की ही जाती है कि वह ज्ञान से प्रतिपक्षियों को परास्त करें। यही हमारे वेद  भी कहते हैं।
----------------
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकाएं

आप इस ब्लॉग की कापी नहीं कर सकते

Text selection Lock by Hindi Blog Tips