समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Saturday, June 25, 2016

योगी के कर्म अशुल्क व फलरहित होते हैं-पतंजलि योग सूत्र के आधार पर चिंत्तन लेख (A Hindu Thought Article Based on Patanjali yoga literature)

पतञ्जलि योग दर्शन में कहा गया है कि
---------------
कर्माशुल्काकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्।।
हिन्दी में भावार्थ-योगी के कर्म अशुल्क (फलरहित) तथा अकृष्णं (धवल) होते हैं।
        लेखकीय व्याख्या-आमतौर से यह सवाल उठता है कि किसी मनुष्य को कैसे पहचाना जाये कि वह योगी है अथवा सामान्य? इसका सीधा जवाब है कि कर्म से ही व्यक्ति की पहचान होती है।  योगी  की पहचान त्याग जबकि सामान्य मनुष्य लोभ तथा मोह से होती है।  योगी बिना कोई शुल्क लिये पात्र मनुष्य की सहायता करता है जबकि सामान्य मनुष्य अपनी सहायता के लिये पात्र सहयोगी ढूंढता है। हमारे यहां धर्म के नाम पर पेशेवर लोग योगी का वेश धारण कर गुरु बन जाते हैं पर वह  एश्वर्य तथा वैभव एकत्रिता करते हैं उससे यह साबित हो जाता है कि वह छद्मरूप धारण किये हुए हैं। वहीं ऐसे भी अनेक योगी है जो निष्काम भाव से समाज का मार्गदर्शन बिना शुल्क लिये करते हैं।
    कहने का अभिप्राय यह है कि जो सहायता व सत्संग के लिये कोई कामना न करे वही योगी है। सच्चे योग की पहचान यह है कि वह अपने लाभ के लिये किसी को भ्रमित नहीं करता न ही कभी झूठ बोलता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वह वाणी विलास तथा प्रमाद से परे रहकर सांसरिक विषयों में उतना ही लिप्त रहता है जितना आवश्यक हो। अपनी बौद्धिक शक्ति वह सांसरिक विषयों पर नष्ट करने की बजाय अध्यात्मिक विषय के अध्ययन में लगाता है।
-----------------------

Sunday, June 12, 2016

अध्यात्मिक साधना से ही मन की बेचैनी दूर हो सकती है-हिन्दी चिंत्तन लेख (A Hindi Thought article base on Patanjali Yoga

                कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। हम इस कहावत को जानते हैं पर इसका आशय कभी अपने जीवन में उतार नहीं पाते। मनुष्य मन चंचल हैं-यह भी जानते हैं पर कभी इस ज्ञान को धारण नहीं करते।  परिणाम यह होता है कि हम मन बहलाने या सुख पाने के लिये भटकते हैं। बेचैनी स्थाई साथी बन जाती है। न घर में चैन न बाहर!
हमारे एक मित्र एक धार्मिक स्थान पर गये। विशेष अवसर होने के कारण उस शहर में खान पान, रहन सहन तथा परिवहन के साधनों के भाव चार से छह गुना महंगे थे।
उन्होंने इस लेखक से कहा-‘यार, धर्म की आड़ में सबसे ज्यादा अंधेर इन पवित्र स्थानों पर ही ज्यादा दिखाई देता है। वहां हर कोई वस्तु तथा सेवा के बदले दूने चौगुने दाम मांग रहा था। रहने की व्यवस्था भी महंगी पर बेकार थी।’
उन्होंने ढेर सारी शिकायतें कीं। लेखक ने जवाब दिया कि-‘तुम पर्यटन का आनंद उठाने के लिये गये थे। साथ में दर्द लाने के लिये श्रम तथा धन का व्यय थोड़े ही किया था।’
इस तरह की शिकायतें अक्सर लोग करते हैं। यहां हम स्पष्ट कर दें कि अध्यात्मिक अभ्यास कर हमने यह अनुभव किया है कि जो लोग अपने शहरों में घूमने का आनंद नहीं उठा पाते। अपने घर को बहुत सजा लेते हैं पर सुख की अनूभूति करना नहीं आता।
हमने देखा होगा कि अधिकतर धार्मिक स्थान बहुत दूर पहाडियों आदि पर स्थित होते हैं।  सामान्य मनुष्य अपने शहर और घर में अधिकतर नहीं चलता। कम चलने से देह का अभ्यास कम होता है जिससे मन तथा बुद्धि शिथिल रहती है। इस कारण अजीब प्रकार का उदासीनता का भाव मस्तिष्क में घर लेता है। अपने घर तथा शहर से दूर होने पर देह का अभ्यास बढ़ने से मन वह बुद्धि में ताजगी का आभास होता है। यही कारण है कि आदमी दूर के ढोल सुहावने देखने लगता है। हमने तो यह भी देखा है कि अपने शहर में ही विशाल तथा आकर्षक मंदिर होने के बावजूद वहां नहीं जाते वरन् दूरदराज स्थिति धार्मिक स्थलों की तरफ टकटकी लगाये देखते हैं कि कब वहां जाना हो? ऐसे लोग भी देखे हैं जो अपने शहर में  नित्य मंदिर जाकर प्रणाम या ध्यान से अपने मन की शुद्धि कर लेते हैं, जिससे उनके हृदय में कभी बाहर धार्मिक स्थलों पर जाने की इच्छा उत्पन्न नहीं होती।
प्रसिद्ध धर्म स्थानों वाले शहरों में रहने वाले स्थाई वासी व्यवसायिक उद्देश्य से रहते हैं।  विशेष अवसर उनके लिये कमाने वाले होते हैं।  उनके लिये वहां के मंदिर आस्था से अधिक आय के केंद्रबिंदु होते हैं। उनके लिये भी अपने ही शहर के मंदिर ‘घर का ब्राह्मण बैल बराबर वाली स्थिति होती है’। उनका प्रयास यह रहता है कि विशेष अवसरों पर अधिक आय अर्जित कर ली जाये। इतना ही नहीं उन्हें भी दूसरे शहर के धार्मिक स्थान घूमने का मोह उसी तरह रहता है जैसे कि उनके शहर  आने वाले लोग रखते हैं। यह मन का खेल है जिसे योग का नियमित अभ्यास करने वाले ही समझ पाते हैं।
वैसे भी बाहर घूमने के बाद वापस आने पर मन की स्थिति यथावत हो जाती है। इसलिये अगर अपने ही घर में रहकर ही नित्य अध्यात्मिक साधना करना चाहिये ताकि मन में भटकाव न हो।
-------------------

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

Wednesday, May 25, 2016

जरूर बदल जाते हैं-हिन्दी कविता (jaroor badal jate hain-Hindi Poem)

मकान रहते वहीं रहते
घर के रूप 
जरूर बदल जाते है।

चमकते महल भी
इतिहास के खंडहर में
जरूर बदल जाते हैं।

कहें दीपकबापू धरती पर
इंसान बनता बहुरूपिया
यह अलग बात है
सभी एक दिन तस्वीर में
जरूर बदल जाते हैं।
-----------

दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, May 7, 2016

एक विषय पर चित्त रखना ही धारणा है-पतञ्जलि योग दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख (A Hindi Article based on PatanjaliYogaDarshan)

हमारी देह स्थित चित्त की महिमा अजीब है। स्वप्न की तरह लुप्त होने वाले सांसरिक विषयों की तरफ भागता है तो स्थाई रूप से साथ रहने वाले अध्यात्मिक ज्ञान को देखना भी चाहता है। उस मनोरंजन में रमता है जो देह को थका देते हैं पर जिस अभ्यास से देह में शक्ति व स्थिरता आती है उस योग साधना में परिश्रम करने से कतराता है।
पतञ्जलि योग दर्शन में कहा गया है कि

‘देशबन्धश्चित्त्स्य धारणा।’
हिन्दी में भावार्थ-‘किसी एक देश (क्षेत्र या विषय) पर चित्त ठहराना धारणा है।’
व्याख्या-यहां देश से आशय समूचे भौतिक संसार के किसी क्षेत्र तथा शरीर के किसी विशेष अंग पर ध्यान केंद्रित कर उसका चिंत्तन करने से है जिसे धारणा भी कहा जाता है। कोई भी मनुष्य समस्त संसार का भ्रमण नहीं कर सकता पर योग साधना से वह सिद्ध बन जाता है जिसे संसार के किसी भी विषय, वस्तु या व्यक्ति का आंतरिक रूप जानने के लिये किसी बाह्य तत्व की आवश्यकता नहीं होती। इतना ही नहीं अंतरिक्ष के लिये भी वैज्ञानिक दूरबीनों का उपयोग करते हैं। अब तो उपग्रह भेजकर आकाश का अनुसंधान किया जाता है।  इस अनुसंधान से पश्चिम के वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष अब निकाले हैं वह हमारे देश के प्राचीन योगी पहले ही देख चुके हैं। दरअसल भारतीय दर्शन की योग साधना एक ऐसी विधा है जिसमें न केवल भौतिक वरन् अभौतिक संसार का भी अध्ययन किया जा सकता है।  इसका यह आशय कतई नहीं है कि जो भी योग साधना कर रहा है वह सिद्ध है वरन् जिसका अभ्यास तथा प्रतिबद्धता इस विषय से प्रगाढ़ होगी वही सिद्ध बन सकता है।
योग साधक अपने अभ्यास के दौरान जितना ही अंतमुर्खी होगा उतना ही चिंत्तन के विषय का बाह्य रूप उसके सामने प्रकट होगा।  जिसने आष्टांग योगविद्या का अभ्यास किया वह हर विषय, व्यक्ति तथा वस्तु के भौतिक अभौतिक तत्वों को भी समझ लेता है। उसे अध्ययन, अनुसंधान तथा प्रयोग के लिये बाह्य साधनों की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य का मन व बुद्धि में नित्त नये अनुभव होते हैं।
----------------
दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Wednesday, April 20, 2016

पराधीनता सबसे बड़ा दुःख-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(Paradhinta sabse Badh dukhg-A Hindi thought based on ManuSmriti)


15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। 26 जनवरी 1950 को अपना स्वदेशी संविधान भी बना पर राज्य व शैक्षणिक प्रणाली यथावत रही। इसी कारण देश में एक नवपरतंत्र जीवन शैली का भी विकसित हुई इसका सबसे बड़ा प्रभाव नवशिक्षितों पर पड़ा। लोगों के निजी व्यवसाय में अपना पसीना बहाकर कमाने की प्रवृत्ति की बजाय नौकरी कर सभ्रांत दिखने की ऐसी प्रवृत्ति बढ़ी कि देश बेरोजगारी के ऐसे भंवर में फंसा कि अभी तक निकल नहीं पाया। हमारे यहां कहावत है कि ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ पर अब उसकी जगह कहा जाने लगा है कि ‘अपना हाथ कर्ज के साथ’। स्थिति यह हो गयी है कि नौकरी पेशा लोग कर्ज लेकर वाहन वह मकान बड़ी शान से बना रहे हैं।  बाहर से विकसित दिखने वाला समाज अंदर से कितना खोखला है इसका अध्ययन करना चाहिये।
मनुस्मृत्ति में कहा गया है कि
--------------
सर्व परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्
एतद्विद्यातसमासेन लक्षणं सुखदंःखयोः।
हिन्दी में भावार्थ-किसी मनुष्य का कार्य दूसरे के अधीन है तो वह दुःख है। अपने अधीन कार्य का होना ही सुख है। यही सुखःदुःख का लक्षण है।
किसी भी राष्ट्र को तभी विकसित व शक्तिशाली माना जाता है जिसका समाज ठोस मुद्रा  से सराबोर होता है। तरल मुद्रा की बहुलता कभी भी संपन्नता का प्रमाण नहीं मानी जाती क्योंकि उसका प्रवाह एक से दूसरे हाथ की तरफ होता है। आज हम देखें तो देश में अधिकतर लोगों के जीवन का आधार ही परजीवी हो गया है। ऐसे में किसी बड़े अभियान की सफलता की सोचना ही गलत है। इतना ही नहीं लोग भले ही एक दूसरे को आपातकाल में सहायता की मदद का वादा करें पर उनमें उसे निभाने की क्षमता संदिग्ध होती है।  अगर हम चाहते है कि हमारा समाज दृढ़ हो तो ऐसी आर्थिक प्रणाली अपनानी होगी जिससे लोग आत्मनिर्भर हों न कि कर्ज चुकाने में संघर्षरत रहें।
------------------
दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Thursday, April 14, 2016

रक्तकुंड अब नीर कहलाने लगे हैं-हिन्दी क्षणिकायें (Hindi ShortPoem)

रौशनी के रहवासी
अंधेरों के घेरे से
घबड़ाते हैं।
नहीं जानते
रौशनी के खंबे
अंधेरी बस्तियों के
मजदूर ही लगाते हैं।
-----------
सौदागर कर रहे
लोगों से घर में
रौशनी के लिये चांद का सौदा।
विज्ञापन के बीच जारी बहस
बेईमानी कम करने पर
भूले ईमानदारी का मसौदा।
----------------
अरसा हो गया
धरती से फरिश्तों को
लापता हुए
अब यादों में ही आते हैं।

अब तो शैतान ही
मुखौटा लगाकर
धोखा देने आते हैं।
-----------

जहान की चिंता करते
शब्दों के व्यापारी
चीज कोई बेचते नहीं
छवि बना लेते भारी।
सपने साथ वादों का
व्यापार अनवरत जारी
----------
हमने तो हमदर्दी जताई
वह रस्म मानकर सो गये।

हमारे दिल से निकले
शब्द हवा में खो गये।

दर्द हल्का करने का भ्रम
यूं ही ढो गये।
---------
आत्मघात करने वाले
अब वीर कहलाने लगे हैं।

ज़माने के लिये रोने वाले
अब पीर कहलाने लगे हैं।

कहें दीपकबापू रक्तकुंड
अब नीर कहलाने लगे हैं।
----------

दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, March 26, 2016

कुशल राज्यप्रबंध में बौद्धिकवर्ग की भूमिका आवश्यक (Good Governes with GoodManegment-ChankyaNiti)


चाणक्य के अनुसार अर्थ के बिना धर्म की रक्षा नहीं की जा सकती। इसका यह आशय सामाजिक संगठनों के कर्णधार यह प्रचारित करते हैं कि उन्हें लोग पैसा दें तो वह समाज की रक्षा करें।  वह यह कभी इस बात पर चिंत्तन नहीं करते कि समाज के समस्त लोगों के पास पर्याप्त मात्रा में अर्थ या धन होगा तभी वह खड़ा रह पायेगा। धनवानों से धन लेकर सामाजिक संगठन फलते फूलते रहें पर अर्थसंकट से जूझ रहा समाज खड़ा नही रह पायेगा अंततः सामाजिक व धार्मिक संगठनों पर अस्तित्व का खतरा उत्पन्न होगा। हम देख रहे हैं कि सामाजिक व धार्मिक संगठनों के अनेक कर्णधार सामान्य जनों के बौद्धिक व धार्मिक शोषण तक ही अपनी गतिविधियां सीमित रखते हैं। महत्वपूर्ण बात यह कि हमारे राज्य प्रबंध पर प्रभाव रखने के लिये तत्पर इन सामाजिक तथा धार्मिक संगठनों को लोग कभी देश की आर्थिक स्थिति पर कुछ नहीं बोलते।
देश में अर्थव्यवस्था की दृष्टि से अनेक प्रकार के विरोधाभास हैं।  भले ही विकास दर बढ़ रही हो पर आमजन पर अर्थ का भारी दबाव है। विशेषकर मध्यमवर्ग जो कि समाज की रीढ़ माना जाता है वह अस्तित्व बचाने का संघर्ष कर रहा है। इस अर्थयुग में जब पूरा बौद्धिकतंत्र ही धनपतियों के हाथ में हो वहां स्वतंत्र चिंत्तकों के पास अभिव्यक्ति के अधिक साधन नहीं है-ऐसे में बंधुआ बौद्धिक प्रचार माध्यमों पर आकर मोर्चा संभाल रहे हैं जो कि सामान्य जनमानस की मौलिक अभिव्यक्ति के संवाहक नहीं होते। अंतर्जाल पर सामाजिक जनसंपर्क पर इन स्वतंत्र मौलिक चिंत्तकों को अपने ही साधनों से चलना पड़ता है। इसके बावजूद यह देखकर खुशी होती है कि हमें सहविचारकों के शब्द यहां बहुत पढ़ने को मिलते हैं। इनमें से कई प्रेरणादायक लिखते हैं।
हमारे राज्यप्रबंध का अर्थशास्त्र ‘अमीरों से लेकर गरीबों का कल्याण करने के सिद्धांत’ पर चल रहा है। अमीर अगर ईमानदारी से अपने भाग का राजस्व  दें तो शायद राज्यप्रबंध का काम सुचारु रूप से चल जाये पर ऐसा हो नहीं रहा।  गरीब अमीर के संघर्ष के बीच अपना अस्तित्व बनाये रखने वाले बंधुआ बुद्धिजीवी भले ही मध्यम वर्ग के हैं पर उसकी चिंता नहीं करते। गरीबों का कल्याण मार्ग एक लोकप्रिय सूत्र बन गया है इसलिये उसे अपनाकर सम्मान व पद पाने के मोह में बंधुआ बुद्धिजीवी इसी राह पर चल रहे हैं। हमें उस पर आपत्ति नहीं है पर यह तय बात है कि जब तक मध्यम वर्ग स्वतंत्रता से सांस नहीं लेगा समाज का भला नहीं हो सकता। हम आज यह बात करते हैं कि भारत दो हजार वर्ष तक गुलाम रहा। हम उसे धर्म जाति या क्षेत्र से जोड़ देते हैं पर सच यह है कि इसका कारण कहीं न कहीं अकुशल राज्य प्रबंध रहा है। इतने सारे राजा इस देश में थे पर उनमें न एकता थी न ही कुशल प्रबंध की कला थी। प्रजा के असंतोष की वजह से उन्हें अपने राज्य गंवाने पड़े।
हम आज भी चंद्रगुप्त और अशोक के राज्य की चर्चा करते हैं इसका मतलब यह है कि इतिहास में अन्य राजा अकुशल या अलोकप्रिय थे। महत्वपूर्ण यह कि वही राजा लोकप्रिय थे जिन्होंने बुद्धि, कुशलता व पराक्रम का प्रतीक मध्यमवर्गीय लोगों को प्रश्रय दिया। जिन्होंने नहीं दिया उनके नाम इतिहास के अंधेरे में खो गये। यही सत्य है।
-----------
दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

अध्यात्मिक पत्रिकाएं