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Sunday, June 12, 2016

अध्यात्मिक साधना से ही मन की बेचैनी दूर हो सकती है-हिन्दी चिंत्तन लेख (A Hindi Thought article base on Patanjali Yoga

                कहा जाता है कि दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। हम इस कहावत को जानते हैं पर इसका आशय कभी अपने जीवन में उतार नहीं पाते। मनुष्य मन चंचल हैं-यह भी जानते हैं पर कभी इस ज्ञान को धारण नहीं करते।  परिणाम यह होता है कि हम मन बहलाने या सुख पाने के लिये भटकते हैं। बेचैनी स्थाई साथी बन जाती है। न घर में चैन न बाहर!
हमारे एक मित्र एक धार्मिक स्थान पर गये। विशेष अवसर होने के कारण उस शहर में खान पान, रहन सहन तथा परिवहन के साधनों के भाव चार से छह गुना महंगे थे।
उन्होंने इस लेखक से कहा-‘यार, धर्म की आड़ में सबसे ज्यादा अंधेर इन पवित्र स्थानों पर ही ज्यादा दिखाई देता है। वहां हर कोई वस्तु तथा सेवा के बदले दूने चौगुने दाम मांग रहा था। रहने की व्यवस्था भी महंगी पर बेकार थी।’
उन्होंने ढेर सारी शिकायतें कीं। लेखक ने जवाब दिया कि-‘तुम पर्यटन का आनंद उठाने के लिये गये थे। साथ में दर्द लाने के लिये श्रम तथा धन का व्यय थोड़े ही किया था।’
इस तरह की शिकायतें अक्सर लोग करते हैं। यहां हम स्पष्ट कर दें कि अध्यात्मिक अभ्यास कर हमने यह अनुभव किया है कि जो लोग अपने शहरों में घूमने का आनंद नहीं उठा पाते। अपने घर को बहुत सजा लेते हैं पर सुख की अनूभूति करना नहीं आता।
हमने देखा होगा कि अधिकतर धार्मिक स्थान बहुत दूर पहाडियों आदि पर स्थित होते हैं।  सामान्य मनुष्य अपने शहर और घर में अधिकतर नहीं चलता। कम चलने से देह का अभ्यास कम होता है जिससे मन तथा बुद्धि शिथिल रहती है। इस कारण अजीब प्रकार का उदासीनता का भाव मस्तिष्क में घर लेता है। अपने घर तथा शहर से दूर होने पर देह का अभ्यास बढ़ने से मन वह बुद्धि में ताजगी का आभास होता है। यही कारण है कि आदमी दूर के ढोल सुहावने देखने लगता है। हमने तो यह भी देखा है कि अपने शहर में ही विशाल तथा आकर्षक मंदिर होने के बावजूद वहां नहीं जाते वरन् दूरदराज स्थिति धार्मिक स्थलों की तरफ टकटकी लगाये देखते हैं कि कब वहां जाना हो? ऐसे लोग भी देखे हैं जो अपने शहर में  नित्य मंदिर जाकर प्रणाम या ध्यान से अपने मन की शुद्धि कर लेते हैं, जिससे उनके हृदय में कभी बाहर धार्मिक स्थलों पर जाने की इच्छा उत्पन्न नहीं होती।
प्रसिद्ध धर्म स्थानों वाले शहरों में रहने वाले स्थाई वासी व्यवसायिक उद्देश्य से रहते हैं।  विशेष अवसर उनके लिये कमाने वाले होते हैं।  उनके लिये वहां के मंदिर आस्था से अधिक आय के केंद्रबिंदु होते हैं। उनके लिये भी अपने ही शहर के मंदिर ‘घर का ब्राह्मण बैल बराबर वाली स्थिति होती है’। उनका प्रयास यह रहता है कि विशेष अवसरों पर अधिक आय अर्जित कर ली जाये। इतना ही नहीं उन्हें भी दूसरे शहर के धार्मिक स्थान घूमने का मोह उसी तरह रहता है जैसे कि उनके शहर  आने वाले लोग रखते हैं। यह मन का खेल है जिसे योग का नियमित अभ्यास करने वाले ही समझ पाते हैं।
वैसे भी बाहर घूमने के बाद वापस आने पर मन की स्थिति यथावत हो जाती है। इसलिये अगर अपने ही घर में रहकर ही नित्य अध्यात्मिक साधना करना चाहिये ताकि मन में भटकाव न हो।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’

Saturday, May 7, 2016

एक विषय पर चित्त रखना ही धारणा है-पतञ्जलि योग दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख (A Hindi Article based on PatanjaliYogaDarshan)

हमारी देह स्थित चित्त की महिमा अजीब है। स्वप्न की तरह लुप्त होने वाले सांसरिक विषयों की तरफ भागता है तो स्थाई रूप से साथ रहने वाले अध्यात्मिक ज्ञान को देखना भी चाहता है। उस मनोरंजन में रमता है जो देह को थका देते हैं पर जिस अभ्यास से देह में शक्ति व स्थिरता आती है उस योग साधना में परिश्रम करने से कतराता है।
पतञ्जलि योग दर्शन में कहा गया है कि

‘देशबन्धश्चित्त्स्य धारणा।’
हिन्दी में भावार्थ-‘किसी एक देश (क्षेत्र या विषय) पर चित्त ठहराना धारणा है।’
व्याख्या-यहां देश से आशय समूचे भौतिक संसार के किसी क्षेत्र तथा शरीर के किसी विशेष अंग पर ध्यान केंद्रित कर उसका चिंत्तन करने से है जिसे धारणा भी कहा जाता है। कोई भी मनुष्य समस्त संसार का भ्रमण नहीं कर सकता पर योग साधना से वह सिद्ध बन जाता है जिसे संसार के किसी भी विषय, वस्तु या व्यक्ति का आंतरिक रूप जानने के लिये किसी बाह्य तत्व की आवश्यकता नहीं होती। इतना ही नहीं अंतरिक्ष के लिये भी वैज्ञानिक दूरबीनों का उपयोग करते हैं। अब तो उपग्रह भेजकर आकाश का अनुसंधान किया जाता है।  इस अनुसंधान से पश्चिम के वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष अब निकाले हैं वह हमारे देश के प्राचीन योगी पहले ही देख चुके हैं। दरअसल भारतीय दर्शन की योग साधना एक ऐसी विधा है जिसमें न केवल भौतिक वरन् अभौतिक संसार का भी अध्ययन किया जा सकता है।  इसका यह आशय कतई नहीं है कि जो भी योग साधना कर रहा है वह सिद्ध है वरन् जिसका अभ्यास तथा प्रतिबद्धता इस विषय से प्रगाढ़ होगी वही सिद्ध बन सकता है।
योग साधक अपने अभ्यास के दौरान जितना ही अंतमुर्खी होगा उतना ही चिंत्तन के विषय का बाह्य रूप उसके सामने प्रकट होगा।  जिसने आष्टांग योगविद्या का अभ्यास किया वह हर विषय, व्यक्ति तथा वस्तु के भौतिक अभौतिक तत्वों को भी समझ लेता है। उसे अध्ययन, अनुसंधान तथा प्रयोग के लिये बाह्य साधनों की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य का मन व बुद्धि में नित्त नये अनुभव होते हैं।
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दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Thursday, March 24, 2016

पेशेवर पहलवान क्या जाने योगफल का स्वाद (Peshewar Pahalwan Kya jane Yogafal ka Swad)

हमारे देश के अध्यात्मिक दर्शन का मूल तत्व योग साधना है। इसके आठभाग है जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं पर इसके बावजूद अनेक अल्पज्ञानी इस पर गाहबगाहे टिप्पणियां करने लग जाते हैं। लोकतंत्र में वाणी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होती है। यह ठीक भी है पर इसमें अब समस्या यह हो गयी है कि चाहे जो कुछ बोलने लगता है।  अनेक लोग प्रतिष्ठा के मद में इतने लिप्त हो जाते हैं कि अपने सर्वज्ञानी होने का भ्रम उनको हो जाता है। वह ऐसे विषयों पर भी बोल जाते हैं जिनके शास्त्र का अध्ययन उन्होंने नहीं किया होता वरन् इधर उधर से सुनकर अपनी राय बनाकर शब्द फैक देते हैं।  एक पेशेवर नकली पहलवान ने कह दिया कि ‘आलसी व बीमार लोग योग साधना करते हैं। ताकतवर को इसकी जरूरत नहीं है।’
वैसे एक ऐसे योगाचार्य को लक्ष्य कर उसने अपनी बात कही जिन्होंने वास्तव में योग साधना का समाज में बहुत प्रचार किया है पर उनकी वजह से ही अनेक लोग इसे शारीरिक व्यायाम समझने लगे हैं-एक तरह से जहां योग साधना प्रचार तो किया पर उससे साधकों को सीमित लक्ष्य तक ही रहने के लिये प्रेरित किया। देखा जाये तो पेशेवर पहलवान से एक पेशेवर योगाचार्य समाज के लिये अधिक बेहतर है-कम से कम अपने उसकी तरह महानायक होने का भ्रम तो नहीं पैदा करता।  बहरहाल पेशेवर पहलवान के बारे में कहा जाता है कि वह तयशुदा मुकाबले लड़ता है-मुक्केबाजी व कुश्ती खेल में इस तरह की चर्चा रहती है कि परिणाम न केवल तयशुदा होते हैं वरन् प्रहार भी दिखावटी होते हैं। अलबत्ता उसने पैसा व प्रचार खूब कमाया है जिससे उसके दिमाग में अपने  ज्ञानी होने का भ्रम होना स्वाभाविक है। उसे अब कौन समझाये कि योग के आठ भाग होते हैं जिनमें से गुजरने की आलसी सोच भी नहीं सकते और बीमारों के यह बस का नहीं होता। बीमारी भी देह की नहीं वरन् मन तथा विचार की भी होती है।
               आजकल आत्ममुग्धता की यह बीमारी पूरे समाज में फैल रही है कि  किसी भी विषय की किताब पढ़ने की बजाय उसका नाम पढ़कर ही लोग यह मानते हैं कि कि उन्हें ज्ञान हो गया। उर्दू की शायरी ने सभी लोग में यह अहंकार भर दिया है कि ‘खत का मजमून जान लेते हैं लिफाफा देखकर’। कथित नकली पर प्रसिद्ध पहलवान के बारे में हम  बस इतना ही कह सकते हैं कि वह स्वतः योग शास्त्र का अध्ययन करे फिर टिप्पणी करे।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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