समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Saturday, May 7, 2016

एक विषय पर चित्त रखना ही धारणा है-पतञ्जलि योग दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख (A Hindi Article based on PatanjaliYogaDarshan)

हमारी देह स्थित चित्त की महिमा अजीब है। स्वप्न की तरह लुप्त होने वाले सांसरिक विषयों की तरफ भागता है तो स्थाई रूप से साथ रहने वाले अध्यात्मिक ज्ञान को देखना भी चाहता है। उस मनोरंजन में रमता है जो देह को थका देते हैं पर जिस अभ्यास से देह में शक्ति व स्थिरता आती है उस योग साधना में परिश्रम करने से कतराता है।
पतञ्जलि योग दर्शन में कहा गया है कि

‘देशबन्धश्चित्त्स्य धारणा।’
हिन्दी में भावार्थ-‘किसी एक देश (क्षेत्र या विषय) पर चित्त ठहराना धारणा है।’
व्याख्या-यहां देश से आशय समूचे भौतिक संसार के किसी क्षेत्र तथा शरीर के किसी विशेष अंग पर ध्यान केंद्रित कर उसका चिंत्तन करने से है जिसे धारणा भी कहा जाता है। कोई भी मनुष्य समस्त संसार का भ्रमण नहीं कर सकता पर योग साधना से वह सिद्ध बन जाता है जिसे संसार के किसी भी विषय, वस्तु या व्यक्ति का आंतरिक रूप जानने के लिये किसी बाह्य तत्व की आवश्यकता नहीं होती। इतना ही नहीं अंतरिक्ष के लिये भी वैज्ञानिक दूरबीनों का उपयोग करते हैं। अब तो उपग्रह भेजकर आकाश का अनुसंधान किया जाता है।  इस अनुसंधान से पश्चिम के वैज्ञानिकों ने जो निष्कर्ष अब निकाले हैं वह हमारे देश के प्राचीन योगी पहले ही देख चुके हैं। दरअसल भारतीय दर्शन की योग साधना एक ऐसी विधा है जिसमें न केवल भौतिक वरन् अभौतिक संसार का भी अध्ययन किया जा सकता है।  इसका यह आशय कतई नहीं है कि जो भी योग साधना कर रहा है वह सिद्ध है वरन् जिसका अभ्यास तथा प्रतिबद्धता इस विषय से प्रगाढ़ होगी वही सिद्ध बन सकता है।
योग साधक अपने अभ्यास के दौरान जितना ही अंतमुर्खी होगा उतना ही चिंत्तन के विषय का बाह्य रूप उसके सामने प्रकट होगा।  जिसने आष्टांग योगविद्या का अभ्यास किया वह हर विषय, व्यक्ति तथा वस्तु के भौतिक अभौतिक तत्वों को भी समझ लेता है। उसे अध्ययन, अनुसंधान तथा प्रयोग के लिये बाह्य साधनों की आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य का मन व बुद्धि में नित्त नये अनुभव होते हैं।
----------------
दीपक  राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

No comments:

Post a Comment

अध्यात्मिक पत्रिकाएं