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Sunday, March 13, 2016

राज्य जोंक की तरह व्यापार से कर वसूल करे-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(State Must libral on Tax for Trade Devlopment-A Hindu Hindi Thought based on ManuSmiriti(

हमारे देश की अर्थव्यवस्था समाजवाद के उस उस खिचड़ी सिद्धांत पर आधारित है जो पूंजीवाद और जनवाद के मिश्रित तत्वों बना है। इस सिद्धांत के अनुसार धनिक से अधिक कर लेकर गरीब का कल्याण किया जाना चाहिये।  जिस कृषि को भारतीय अर्थव्यवसथा का आधार माना जाता है वहां से कोई कर नहीं वसूला जाता-अनेक लोगों ने राय दी थी कि बड़े किसानों पर कर लगना चाहिये पर भारतीय आर्थिक रणनीतिकर इस सोच से भी घबड़ाते हैं कि कहीं उन पर गरीब विरोधी होने का आरोप न लग जाये। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि समाजवाद के नाम पर नये पूंजीपति पैदा होने से रोका गया जिससे कथित विकास के नाम पर चंद औद्योगिक घराने परंपरागत रूप से अपना वर्चस्व बनाये हुए हैं।  उदारीकरण की प्रक्रिया में भी उन्हें ही सुविधायें मिल रही हैं। इससे हुआ यह कि हमारे यहां परंपरागत व्यापार  पर ही करों का बोझ पड़ा है जो कि मध्यमवर्ग ही संचालित करता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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यथा फलेन युज्येत राजा कर्ता च कर्मणाम्।
तथ वेष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत् सततं करान्।।
हिन्दी में भावार्थ-राज्य प्रबंधक को कर इस तरह लगाना जिससे व्यापार की बढ़ोतरी होने के साथ कोषालय में यथोचित लाभ पहुंचे। ठीक उसी तरह जैसे जोंक, बछड़ा तथा भ्रमर धीरे धीरे भोजन ग्रहण करते हैं।
अगर हम अपने देश के परंपरागत ढांचे को देखें तो यहां कृषि के बाद उच्च, मध्यम तथा निम्न तीनों वर्ग इस पर आश्रित रहे हैं।  नयी शिक्षा प्रणाली जहां पहले ही व्यापार करने की प्रवृति का हतोत्साहित कर रही थी वहीं अब आधुनिक विकास ढांचे में उसके लिये जगह ही नहीं बची है। औद्यागिक संस्थान अपने उत्पादों का व्यापार स्वयं कर रहे हैं। इतना ही नहीं आवश्यक खाद्य पेय वस्तुओं को भी वह बृहद व्यापार संस्थानो में विकास की वस्तुऐं बना रहे हैं जिससे परंपरागत व्यापार का स्वरूप ढहता जा रहा है जो कि हमारे समाज का कृषि के बाद दूसरा ठोस आधार है।
यह सही है कि भारत एक कृषि प्रधान देश है पर समाज के केंद्र बिंदू में स्थित होने के कारण व्यापारिक वर्ग का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यही वर्ग संस्कार, संस्कृति तथा धर्म की धारा का नियमित प्रवाह भी करता रहा है। अगर हम चाहते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था सृदृढ़ हो तो हमें इस वर्ग में प्रोत्साहन की धारा प्रवाहित करनी होगी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Tuesday, March 8, 2016

नारियों के दुःखी होने पर परिवार शीघ्र नष्ट हो जाता है-महिला दिवस पर मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(Great Thouhgt for women in ManuSmriti-A Hindi Article on world Women Day)

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छात्रों के एक वर्ग ने महिला दिवस पर मनुस्मृति को जलाकर जश्न मनाया। जहां तक हमारा अनुमान है इसके पीछे जनवादी विद्वानों का प्रश्रय है। हमारी चार वर्ष पूर्व एक कार्यक्रम में जनवादी विचारक से भेंट हुई तब उसे हमारे साथी ने बताया कि ‘यह महाशय मनुस्मृति के विषय पर सकारात्मक रूप से लिखते हैं।’
 वह तपाक से बोला था कि‘हम तो कभी मनुस्मृति जलाने का कार्यक्रम बनाना चाहते हैं। उसमें स्त्रियों तथा दलितों के लिये तमाम गलत बातें लिखी हुईं हैं।’
हमें हंसी आ गयी पर हमने  मनुस्मृति का फिर से अध्ययन करने का निश्चय किया तब समझ में आ गया कि वर्तमान समय में अनेक आकर्षक चेहरे छद्म रूप से ऐसे धनदाताओं के बुत भर हैं जो अनुचित काम से अपना जीवन चलाते हैं। मनुस्मृति में भ्रष्टाचारियों, व्याभिचारियों तथा अन्य अपराधों  के लिये कड़ी सजा का प्रावधान है जो शायद  आज के छद्म सभ्रांत समाज के लिये अनुकरणीय नहीं है। इसलिये उसका विरोध महिला तथा दलित उद्धार के नाम पर हो रहा है। उस विचारक का नाम तो याद नहीं पर चार वर्ष से मनुस्मृति जलाने के समाचार की खबरें अंतर्जाल पर ढूंढते रहे। शायद अब सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में यही समय  अब उनके साथियों को उपयुक्त लगा। वह विचारक अब इसमें शामिल हैं या नहीं कह नहीं सकते पर उनके सहविचारकों का यह कारनामा हमारे लिए हास्य का विषय  है। 
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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शोचन्ति जामयां यत्र विनशत्याशु  तत्कुलम।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।
हिन्दी में भावार्थ-उस परिवार का शीघ्र नाश हो जाता है जिसकी नारियां दुःख उठाती हैं। जहां नारियां सुखी हैं वहीं विकास होता है।
हैरानी तो इस बात की है कि भारतीय धर्म के अनेक प्रचारक भी मनुस्मृति की चर्चा से बचते हैं। मनृस्मृति में यह स्पष्ट लिखा गया है कि धर्म के नाम पर लोभ की प्रवृत्ति से काम करने वालों को कतई संत न माना जाये। इतना ही नहीं जिन लोगों को वेद के ज्ञान के साथ ही उस पर चलने की शक्ति नहीं है उन्हें न तो विद्वान माने  न उन्हें दान दिया जाये। हमने देखा है कि विद्वता के नाम पर पाखंड करने वाले लोग अधिकतर उच्च वर्ग हैं और मनुस्मृति में जिस तरह भ्रष्ट, भयावह तथा व्याभिचार के लिये जो कड़ी सजा है उससे वह बचना चाहता है।  खासतौर से राजसी कर्म में लिप्त लोग भ्रष्टाचार, भूख, भय के साथ अन्य समस्याओं से जनमानस का ध्यान हटाने के लिये पुराने ग्रंथों को निशाना बना रहे हैं जिसमें भ्रष्ट, व्याभिचार तथा अन्य अपराधों के लिये कड़ी सजा का प्रावधान हैं।  मनुस्मृमि की वेदाभ्यास में रत ब्राह्ण, समाज की रक्षा में रत क्षत्रिय, व्यवसाय में रत व्यापारी तथा इन तीनो की सेवा करने वाला सेवक जाति का है। इन्हीं कर्मों का निर्वाह धर्म माना गया है। स्पष्टतः जन्म से जाति स्वीकार नहीं की गयी है। लगता है कि मनुस्मृति के विरुद्ध प्रचार किन्हीं सिद्धांतों की बजाय आत्मकुंठा की वजह से की जा रही है। 
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, February 27, 2016

अज्ञानी को दान लेने का हक नहीं-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख (Agyani ko Daan lene ka hak Nahin-A Thought article Basee on ManuSmriti)

                         कुछ जनवादी संगठनों के कथित वैचारिक युवा अक्सर मनुस्मृति को जलाने की बात करते सुने।  कहते हैं कि उसमें दलितों के लिये खराब बातें कही गयी हैं।  उनकी बात सुनकर हमारी राय तो यह बनी है कि जिस तरह श्रीमद्भागवत को पढ़ने के बावजूद उसे समझे बिना उसके ज्ञान का प्रचार पेशेवर ज्ञान प्रचारक करते हैं उसी तरह ही मनुस्मृति के कुछ अंश पढ़े बिना ही उसका दुष्प्रचार करने वाले भी विद्वान  कम नहीं है। पहली बात तो यह कि मनुस्मृति में जन्म के आधार पर जाति का उल्लेख है तो कर्म भी उसके निर्माण का तत्व माना गया है। इसका आशय यह है कि जन्म के आधार पर एक जाति हो सकती है तो कर्म के आधार पर उसमें बदलाव भी माना जा सकता है।  दूसरी बात यह कि हर प्रकार के कर्म करने वाले का यह धर्म है कि अपनी योग्यता के अनुसार ही उपलब्धि ग्रहण करे।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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आतपास्त्वनाधीयानः प्रतिग्रहरुचिद्विंजः।
अम्भस्यश्मप्लचेनैव सह तेनैव मजति।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान तपस्या व विद्या से रहित होने पर भी दान लेता है वह नरक भोगता है जैसे पत्थर की नाव पर चढ़ने वाला व्यक्ति उसके साथ ही डूब जाता है।
                        हमारे यहां दान की परंपरा है उसमें यह शर्त जोड़ी गयी है कि सुपात्र को ही दिया जाना चाहिये।  सुपात्र में किसी की जाति का उल्लेख नहीं है इसलिये किसी वर्ण विशेष पर दान से कृपा नहीं हो सकती। इतना ही नहीं जो आमजनों में ज्ञान प्रचार का काम करते हैं वह भी अगर उस राह पर नहीं चलते तो उन्हें भी दानदक्षिणा लेने का अधिकार नहीं-यही मनुस्मृति में कहा गया है। कभी कभी तो लगता है कि मनुस्मृति का विरोध करने के लिये कथित उच्च जाति के ज्ञान विक्रेता दलित जाति के लोगों को इसलिये उकसाते हैं ताकि उसमें जो जाति, धर्म तथा ज्ञान के जो सिद्धांत बताये गये हैं उसे वह न पढ़ें न समझें। उनका लक्ष्य समाज में अज्ञान के अंधेरे में स्वर्ग की कृत्रिम रौशनी बेचकर अपना धंधा बनाये रखना है। इतना ही नहीं मनुस्मृति में भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा हत्या के भी कड़े दंड बताये गये हैं जिससे कुछ लोग भयभीत हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
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Saturday, February 20, 2016

मनृस्मृति में वर्णित हैं धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत-हिन्दी चिंत्तन लेख(Secularism Thought in ManuSmriti-Manuwad Is GraeatThought-HInduDharama Sandesh)

                        भारतीय तथा पाश्चातय धार्मिक विचाराधाराओं में मूल अंतर यह है कि हम मनुष्य के कर्म को ही धर्म की संज्ञा देते हैं जबकि विदेशी पूजा पद्धति के आधार पर उसका नाम तय करते हैं। भारत में विदेशी धार्मिक व सामाजिक विचाराधाराओं के साथ ही अध्यात्म में विषय में भ्रम पैदा हुआ है। हमारे यहां अभी तक राज्य प्रबंध के समर्थन के कारण प्रगतिशील तथा जनवादी चिंत्तन धारा अे पेशेवर विचारकों को समर्थन मिला जिससे वह समाज में बौद्धिक शिखर पर प्रभावी हो गये। यही कारण है कि हमारे यहां लोगों के इष्ट, पूजा पद्धति तथा पहनावे के आधार पर धर्म का रूप तय किया जाने लगा है। इसके बाद भारतीय समाज में जाति, क्षेत्र तथा भाषा के आधार पर बांटकर उसे आपस में लड़ाया जाता है। कर्म वह आचरण के आधार पर किसी के व्यक्तित्व व कृत्तिव पर दृष्टिपात करने की बजाय उसके भौतिक रूप को ही श्रेष्ठ मानने की प्रवृत्ति बढ़ गयी है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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जातिज्ञानपदान्धर्मान्श्रेणीधर्माश्च धर्मवित्।
समीक्ष्य कुलधर्माश्च स्वधर्म प्रतिपादवेत्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-धर्मज्ञ राजा को जाति धर्म, जनपद धर्म, श्रेणी धर्म तथा कुल धर्म को अच्छी तरह समझकर अपने धर्म का अनुसरण करना चाहिये।
                        हमारे यहां राज्य की धर्मनिरपेक्षता से आशय पाश्चात्य आधार पर बने संज्ञाधारी धर्मों को समान देखने की दृष्टि से माना जाता है जबकि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कर्म के आधार पर बने धर्मो में बीच सामंजस्य स्थापित करना राजधर्म बताया गया है। जाति, जनपद या क्षेत्र, व्यवसाय या श्रेणी तथा कुल के आधार पर हर मनुष्य में स्वभाविक गुण होते हैं जिनकी जानकारी होने पर राज्य प्रमुख सहजता से प्रजा पर नियंत्रण कर सकता है। हमने देखा होगा कि हमारे देश में कुछ जातियों में दैहिक  क्षमता व आक्रामक प्रवृत्ति किसी क्षेत्र विशेष में उत्पन्न के कारण अधिक होती है जिससे उसके लोगों को रक्षा संस्थाओं में सेवा करने के लिये वरीयता दी जाती है।  यह ठीक भी है जहां बल से कार्य होता है वहां उसमें दक्ष व्यक्ति ही आवश्यक है लेकिन जहां बुद्धि तथा व्यवसाय कौशल वाली सेवाओं में वह दक्षता की बजाय किताबी ज्ञान देखा जाता है जबकि वहां प्रबंध कुशल के साथ ही व्यक्ति की बौद्धिक क्षमता भी देखा जाना चाहिये।
                        रक्षाकर्मी का रक्षा, व्यवसायी का व्यवसाय, बुद्धिमान का मार्गदर्शन तथा सेवक का सेवा ही कर्म होता है जिसका निर्वाह ही उसका धर्म भी है।  राज्य प्रबंध में कुशल प्रमुख अपने देश की जातियों, वर्णों तथा वर्गों के कर्म तथा धर्म को समझकर उसमें अपने अनुकूल सेवका का चयन करता है। सर्वधर्मसमभाव की कला में पारंगत राज्य प्रमुख ही सहजता से राज्य कर सकता है-हमारी दृष्टि से मनुस्मृति की यही मान्यता लगती है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, February 14, 2016

ज्ञान से प्रतिपक्षी को परास्त करें-हिन्दी चिंत्तन लेख (Gyan se praipakshi ko parast kar-Hindi Thought article)


                        सामाजिक जनंसपर्क ने जहां विश्व में धाक जमाई हैं वहीं अभद्र भाषा के शब्दों के प्रयोग ने चिंता का वातावरण भी बनाया है। अनेक बार ऐसा होता है कि हम जैसे लेखक किसी फेसबुक, ट्विटर वह ब्लॉग पर प्रदर्शित सामग्री पर असहमति जताने की चाहत इसलिये भी छोड़ देते हैं कि वहां बीभत्स शब्द पहले ही दर्ज होते हैं। यह डर लगता है कि कहीं हम आक्रामक विरोधियों के साथी न समझ लिये जायें। शुद्ध देशी भाषा की गालियां देखकर मन खराब हो जाता है। दुनियां में संसार में समाज भिन्न व्यक्तियों, विचारों व विषयों के समूह से ही बनता है।  भिन्नता से भरा है इसलिये तो समाज कहलाता है। एकरूपता होने पर तो एक ही इकाई ही कहलाता न! ऐसे में अपने से प्रथक विचार वाले व्यक्ति की उपस्थिति सहजता से स्वीकार करना चाहिये न कि उस पर आक्षेप लगाकर अपने अंदर कुंठा लाना चाहिये।
                        सामवेद में कहा गया है कि ऋतस्य जिव्हा पवते मधु।सच्चे मनुष्य की वाणी से मधु टपकता है।
                        जब हम किसी विचार से असहमत हों तो उस पर प्रतिविचार अभिव्यक्त कर सकते हैं-यही ज्ञानी होने का प्रमाण भी होता है। तर्क में भार बढ़ाने के लिये अभद्र शब्द का पत्थर रखना आवश्यक नहीं-अगर रखते हैं तो यही माना जायेगा कि वक्ता या लेखक में अपने ही शब्दों के प्रति विश्वास नहीं है।
                        अथर्ववेद में कहा गया है कि क्षिणामि ब्रह्णामित्रायुन्नयामि स्वानहम्।ज्ञान से विरोधियों का क्षरण कर अपने को आगे बढ़ाये।
                        हमारे देश में विद्वानों के बीच विचाराधाराओं का द्वंद्व सदैव रहा है। भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा के वाहक होने के नाते हमारा अन्य  विचाराधारा के विद्वानों से मतभेद रहा है। उनसे बहसें भी होती रहीं है पर हमने हमेशा अपनी सहज प्रवृत्ति से उनके सामने अपने तर्क रखे हैं। इधर अंतर्जाल पर प्रगति व जनवादी विद्वान भी अपनी पूरी उसी पूरी शक्ति के साथ सक्रिय है।  उनका राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों से पंरपरागत प्रचार माध्यमों में सदैव वाद विवाद रहा है पर इधर अंतर्जाल पर भयानक वाक्युद्ध में बदल गया है। चूंकि राष्ट्रवादी विचाराधारा के लेखक हमारा अध्यात्मिक लेखन के कारण हमारा सम्मान करते हैं इसलिये उनसे यह अपेक्षा रहती है कि वह सभी का सम्मान करें। खासतौर से जब राष्ट्रवादी भारत के प्राचीन दर्शन को जब अपना प्रिय विषय मानते हैं तब यह आशा तो की ही जाती है कि वह ज्ञान से प्रतिपक्षियों को परास्त करें। यही हमारे वेद  भी कहते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, January 24, 2016

मन नहीं रमता तो ध्यान लगायें-भर्तृहरि नीति शतक के आधार चिंत्तन लेख (man nahin ramta to Dhyan lagayen-A Hindu Religion Thought based on bhartrihai Niti Shatak )

                            मनुष्य का पूरा जीवन मन के स्वामित्व में व्यतीत करता है इसके बावजूद उसकी बुद्धि  स्वयं के स्वतंत्र होने  का निरर्थक भ्रम पालती है। हमारे दर्शन के अनुसार दिन समय चार भागों में वैज्ञानिक रूप से चार भागों में बांटा गया है-प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सायं काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष या निद्रा के लिये होती है। अवैज्ञानिक रूप से दिनचर्या बिताने तथा व्यवसायिक  प्रचार से भ्रमित लोगों ने अपनी चिंत्तन क्षमता को खो दिया है ऐसे में मानसिक तनाव से उपजे रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है।
भर्तृहरिनीति शतक के अनुसार
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अग्रे गीतं सरसकवयः पार्श्वयोर्दाक्षिणात्याः पाश्चाल्लीवलयरणितं चामरग्राहणीनाम्।
यद्यस्त्येवं कुरु भवरसास्वादने लम्पटत्वं नो चेच्वेतः प्रविश सहसा निर्विकल्पे समाधी।।
                            हिन्दी में भावार्थ-अरे मन! यदि तेरे सामने श्रेष्ठ गायक गा रहे हैं, दायें बायें श्रेष्ठ कवि काव्य पाठ कर रहे हैं। तेरे पीछे सुंदरियां चंवर हिला रही हैं तब तो उनमें रम जा वरना वन में जाकर समाधि ले।
                            अपने मन से हारे लोग अनेक तरह की मजबूरियों का बखान करते हुए भाग्य को दोष देते हैं। लोग अपने दिन का समय वैज्ञानिक ढंग से बिताने के आदी नहीं रहे। मनोरंजन के प्रति इतना लगाव है उसके लिये तो कोई समय तय नहीं करते। सच तो यह है कि मनोरंजन के सुख की अनुभूति करने वाली संवेदनायें ही लोगों में नहीं दिखती। लोग धर्म के समय में अपनी देह, मन और  विचार के विकार निकालने की बजाय प्रातः ही सांसरिक विषयों में अपनी बुद्धि का अपव्यय करने लगते हैं। जब प्रातः बौद्धिक तथा वैचारिक शक्ति ग्रहण करने का समय है तब उनमें तामसीगुण की प्रधानता के कारण आलस्य का भाव शासन करता है। ऐसे में अर्थ के समय उनकी क्षमतायें सीमित रहती हैं। सायं मनोरंजन के समय भी बाहरी प्रभाव से बहलना चाहते हैं। जबकि योग के अनुसार ध्यान करने पर भी आनंद मिल सकता है।  निद्रा के समय ही चिंतायें साथ लिये होते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपने की पहचान नहीं कर पाता जिससे वह जीवन भर भटकता है। हम अनुभव करते हैं कि आज के समय भारतीय योग विज्ञान से जीवन व्यतीत करने पर ही मानसिक शांति अनुभव कर सकते हैं।
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Friday, January 15, 2016

अंतर्जाल पर सक्रिय प्रतिभाओं को सम्मान देना चाहिये-26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर विशेष हिन्दी लेख(Special Hindi article on 26 january Republic Day)


                             अब 26 जनवरी गणतंत्र दिवस आ रहा है।  इस अवसर पर कला, साहित्य, कला, पत्रकारिता तथासमाज सेवा में सक्रिय महानुभावों को पद्म भूषण पद्मविभभूषण तथा पद्मश्री सम्मान दिये जाने की घोषणा होनी है।  ऐसे समाचार भी आते रहे हैं कि पहुंच तथा पैसे वाले कथित महानायक इन पुरस्कारों का जुगाड़ करने में लगे रहते हैं।  हमारे यहां प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों को सम्मानित करने की परंपरा अधिक रही है। राष्ट्रवादी विचाराधारा के विद्वानों, कलाकारों, पत्रकार तथा समाजसेवकों की उपेक्षा का आरोप हमेशा लगता रहा है। इसके अलावा संगठित व्यवसायिक क्षेत्र से अलग हटकर कार्य करने वालों की अनदेखी करने की बात भी कही जाती है।  पिछले कुछ वर्षों से अंतर्जाल पर भी अनेक लोग सक्रिय हैं पर किसी को भी इस आधार पर सम्मान नहीं मिला वह भी प्रतिभाशाली हैं। 
हमारी राय है कि पद्म भूषण व पद्मश्री पुरस्कार अब अंतर्जाल पर कार्यरत लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों तथा कार्टूनिस्टों को दिये जायें जो सिफारिश नहीं कर पाते उनकी तरफ ध्यान देना चाहिये। अंतर्जाल पर सक्रिय प्रतिभाओं  को संगठित क्षेत्र की विभूतियों  के समकक्ष न समझना अन्याय है। इस 26 जनवरी उन्हें पदम् सम्मान देकर नहीं धारा प्रवाहित की जाये तो अच्छा रहेगा। अब इंटरनेटयुग है इसमें बाज़ारवाद से ऊपर उठकर सांस लेने वाले किताबें छपवाने में अनिच्छुक लेखक व कार्टूनिस्ट सक्रिय हैं। उन्हें सम्मान देकर नयी परंपरा बने तो इन सम्मानों की प्रतिष्ठा ही बढ़ेगी। अंतर्जाल की विभूतियों को पद्म भूषण व पद्मश्री सम्मान देने से यह साबित होगा कि भारत ने नये युग में प्रवेश किया है। 26 जनवरी पर अंतर्जालीय विभूतियों का पद्भूषण पद्मश्री सम्मान देने से उन युवा प्रतिभाशाली लोगों का मनोबल भी बढ़ेगा जो स्वतंत्र रूप से कला व लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं। व्यवसायिक क्षेत्र के लोगों को सम्मान देते रहने से आम लेखकों व कलाविदों में यह भाव है कि केवल पैसे और पहुंच वालों को ही पद्मभूषण व पद्मश्री सम्मान मिलते हैं। इस बार परंपरा से हटकर इंटरनेट की प्रतिभाओं को पद्मभूषण व पद्मश्री सम्मान देने से युवाओं का रचनात्मक क्षेत्र की तरफ रुझान बढ़ेगा। इंटरनेट की प्रतिभाओं को पद्म भूषण व पद्मश्री सम्मान देने से यह संदेश भी निकलेगा कि राज्यप्रबंध लीक से हटकर काम कर रहा है।
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