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Sunday, January 24, 2016

मन नहीं रमता तो ध्यान लगायें-भर्तृहरि नीति शतक के आधार चिंत्तन लेख (man nahin ramta to Dhyan lagayen-A Hindu Religion Thought based on bhartrihai Niti Shatak )

                            मनुष्य का पूरा जीवन मन के स्वामित्व में व्यतीत करता है इसके बावजूद उसकी बुद्धि  स्वयं के स्वतंत्र होने  का निरर्थक भ्रम पालती है। हमारे दर्शन के अनुसार दिन समय चार भागों में वैज्ञानिक रूप से चार भागों में बांटा गया है-प्रातः धर्म, दोपहर अर्थ, सायं काम या मनोरंजन तथा रात्रि मोक्ष या निद्रा के लिये होती है। अवैज्ञानिक रूप से दिनचर्या बिताने तथा व्यवसायिक  प्रचार से भ्रमित लोगों ने अपनी चिंत्तन क्षमता को खो दिया है ऐसे में मानसिक तनाव से उपजे रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है।
भर्तृहरिनीति शतक के अनुसार
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अग्रे गीतं सरसकवयः पार्श्वयोर्दाक्षिणात्याः पाश्चाल्लीवलयरणितं चामरग्राहणीनाम्।
यद्यस्त्येवं कुरु भवरसास्वादने लम्पटत्वं नो चेच्वेतः प्रविश सहसा निर्विकल्पे समाधी।।
                            हिन्दी में भावार्थ-अरे मन! यदि तेरे सामने श्रेष्ठ गायक गा रहे हैं, दायें बायें श्रेष्ठ कवि काव्य पाठ कर रहे हैं। तेरे पीछे सुंदरियां चंवर हिला रही हैं तब तो उनमें रम जा वरना वन में जाकर समाधि ले।
                            अपने मन से हारे लोग अनेक तरह की मजबूरियों का बखान करते हुए भाग्य को दोष देते हैं। लोग अपने दिन का समय वैज्ञानिक ढंग से बिताने के आदी नहीं रहे। मनोरंजन के प्रति इतना लगाव है उसके लिये तो कोई समय तय नहीं करते। सच तो यह है कि मनोरंजन के सुख की अनुभूति करने वाली संवेदनायें ही लोगों में नहीं दिखती। लोग धर्म के समय में अपनी देह, मन और  विचार के विकार निकालने की बजाय प्रातः ही सांसरिक विषयों में अपनी बुद्धि का अपव्यय करने लगते हैं। जब प्रातः बौद्धिक तथा वैचारिक शक्ति ग्रहण करने का समय है तब उनमें तामसीगुण की प्रधानता के कारण आलस्य का भाव शासन करता है। ऐसे में अर्थ के समय उनकी क्षमतायें सीमित रहती हैं। सायं मनोरंजन के समय भी बाहरी प्रभाव से बहलना चाहते हैं। जबकि योग के अनुसार ध्यान करने पर भी आनंद मिल सकता है।  निद्रा के समय ही चिंतायें साथ लिये होते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य अपने की पहचान नहीं कर पाता जिससे वह जीवन भर भटकता है। हम अनुभव करते हैं कि आज के समय भारतीय योग विज्ञान से जीवन व्यतीत करने पर ही मानसिक शांति अनुभव कर सकते हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, September 5, 2015

सत्कर्म से अपना मन उद्धार होता है न कि किसी की सहायता-श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष हिन्दी लेख(satkarm se apna uddhar hota hai n ki kisee ki sahaltya-A Hindu hindu article on ShriKrishna Janmashtami


                                   श्रीमद्भागवतगीता पर लिखने और बोलने वाले यह हमेशा देख लिया करें कि उनके शब्द श्रीकृष्ण के मतानुसार जस की तस है कि नहीं। इस लेखक ने योग साधना का अभ्यास करते करते जब श्रीमद्भागवतगीता का अध्ययन प्रारंभ किया तब एक ज्ञानी मित्र ने सलाह दी कि श्रीगीता की पुस्तक वह लेना जिसमें महात्म्य न हो इससे अध्ययन में सुविधा होगी। महात्मय वाली कथायें किसी पाठ का महत्व तो बताती हैं पर वास्तविक ज्ञान विस्मृत कर देती हैं।
                                   उसकी बात मानकर जब केवल संदेशों वाली गीता खरीद करअध्ययन किया तब से उस मित्र को हर मुलाकात में धन्यवाद देते हैं।  श्रीमद्भागवतगीता में इस संसार का रहस्य  बताने के साथ ही उसे पार करने की कला भी बतायी गयी है। संभव है यह इस लेखक का अल्पज्ञान हो फिर जब भी कहीं गीता का नाम लेकर अच्छी बात कही जाती है तो ऐसा लगता है कि वह तोड़मरोड़कर पेश की गयी है। सच बात तो यह है कि गीता में किसी काम को अच्छा या बुरा नहीं कहा गया है बल्कि उसमें कर्म और उसका परिणाम का सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है। उसके अनुसार आप जैसा जीवन जीना चाहते हैं उसके अनुसार अपने हृदय में संकल्प स्थापित करें। फिर उसके अनुसार आचरण करें।  आप लोगों के लिये हृदय में सद्भाव रखेंगे तो वह भी रखेंगे।  आप दूसरे से मधुर व्यवहार करेंगे तो दूसरा भी करेगा पर यह बातें स्पष्ट रूप से नहीं कही गयी है। गीता में कहीं भी नहीं कहा गया कि कर्म  ही मेरी पूजा है-उसमें निष्काम कर्म का सिद्धांत है जिसे व्यापक अर्थों मे समझने की आवश्यकता है। गीता में दया करने के स्पष्ट संदेश की बजाय  निष्प्रयोजन दया का सिद्धांत है   जिसे आमतौर से  गीतावाचक स्पष्ट नहीं कर पाते।
                                   गीता में सहज जीवन के लिये नारे नहीं वरन् संदेश हैं जिन पर चलने पर ही आनंद का अनुभव होता है। अगर हम कहते हैं गीता में सभी पर दया दिखाने, सभी से  मधुर बोलने, सभी को समान समझने तथा सभी का हित करने के लिये कहा गया है तो तय बात है कि हमने गीता का सार नहीं समझा।  गीता के आधार पुरुष श्रीकृष्ण का मंतव्य यह है कि सत्कर्म कर मनुष्य किसी पर अहसान नहीं करता वरन् अपने लिये सहज वातावरण बनाता है। जब हम दूसरे पर दया करने की बात कहते हैं तो हम सामने वाले को शक्तिशाली होने की अनुभूति भी कराकर उसमें अहं पैदा करते हैं जो गलत है, जबकि श्रीगीता के अनुसार तो हर मनुष्य गुणों के वशीभूत एक कमजोर जीव है-यही बात समझाने की है। मनुष्य सत्कर्म से किसी की सहायता नहीं करता वरन् अपना उद्धार करता है। यही भगवान श्रीकृष्ण का मंतव्य है-ऐसा गीता में स्पष्ट नहीं कहा गया पर हम भक्ति भाव से गीता का अध्ययन करने के बाद ऐसा समझ पाये हैं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, September 3, 2015

हिन्दी दिवस और सनी लियोनी पर आज के ट्विटर(Today Twitter on hindi diwas and sunny lione)

          
             सामाजिक संगठन राज्यकर्म की जानकारी या समीक्षा करने का राजसी कर्म न करें-यह कौनसा नियम है।
         विदेशी विचाराधारायें तो पूरी तरह से राजनीतिक विस्तारवाद के पोषक हैं उनके समर्थक राष्ट्रीयस्वयंसेवकसंघ को सिखा रहे हैं कि वह राजसीकर्म न करे।
                राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की भारतीय समाज के उस मध्यम वर्ग में बहुत पहुंच  है जो बौद्धिक शक्ति रखता है इसलिये उसकी चिंता करना ही चाहिये।
           14 सितम्बर 2015 हिन्दी दिवस पर कार्यक्रमों के लिये दिल्ली प्रवास का कार्यक्रम है। चाहें तो    पर संपर्क कर सकते हैं।
               राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जानता है कि मध्यमवर्ग देशी और समाज में रीढ़ की हड्डी है इसलिये वह उसे दृढ़ बनाने के लिये सक्रिय रहता है।
           ट्विटर पर लोग हम पर हिन्दी थोपना रोकने की मांग कर रहे हैं, यह अच्छा लगा। अब अंग्रेजीवादियों को चिढ़ाने के लिये हिन्दी दिवस पर खूब लिखेंगे। जो अहिन्दी भाषी हिन्दी का विरोध करते हैं उन्हें यह समझना चाहिये कि उनकी मातृभाषा भी देवभाषा संस्कृत की पुत्री है। अगर कुछ लोग यह सोचते हैं कि भारत शब्द, भारतीय भाषा और धर्म के प्रति घृणा का भाव दिखाकर विदेशियों से सहानुभूति प्राप्त करेंगे तो वह भ्रम पाल रहे हैं।
             सनी लियोनी के कंडोम विज्ञापन बंद करने से बलात्कार कम हो जायेंगे-इस अंधविश्वास का कथित समाज सुधारक अभियान से प्रतिकार करें। सनी लियोन के विज्ञापन से बलात्कार की घटनायें बढ़ी है तो हमारा मानना है कि हिन्दी फिल्मों से देश में कायरता बढ़ी है। कोई रोक की मांग करेगा?यह सनीलियोनी कौन है हमें पता नहीं! टीवी चैनलों पर उसके कंडोम विज्ञापन के विरोध में चर्चा हो रही तब पता लगा कि वह देश के लिये खतरा है। सनीलियोनी के एक विज्ञापन का इतना बुरा प्रभाव हो सकता है यह बात भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का ज्ञानी नहीं मान सकता।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Thursday, August 27, 2015

गीता प्रेस बचाना हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये आवश्यक-हिन्दी लेख(Gitapress bachana hindudharma ki raksha ke liye awashyak-hindi article)


                              सुना है गीता प्रेस संकट में है।  एक समाचार चैनल की खबर पर यकीन करें तो यह कहा जा सकता है कि भारतीय  अध्यात्म की अकेली झंडाबरदार इस संस्था का समाप्त होना हिन्दू धर्म का स्वर्ण युग का समाप्त हो जाना होगा। हिन्दू, हिन्दू हिन्दुस्तान का नारा देने वाले अनेक महापुरुष हुए तो आजकल पेशेवर भी कम महापुरुष नहीं दिखते मगर साहित्य और रचना के सहारे समाज को जीवित रखा जा सकता है और यही काम गीता प्रेस ने किया है।
                              जिस तरह मैकाले ने अपनी शिक्षा पद्धति से भारत को इस तरह गुलाम बनाया कि आज भी बौद्धिक धरती पर हमें परायापन लगता है उसके विपरीत गीता प्रेस ने भारतीय अध्यात्म को जिंदा रखने का ऐसा प्रयास किया कि  इस बौद्धिक गुलामी में स्वतंत्र अध्यात्मिक विचार जीवंत बने हुए हैं।  सच माने तो हमारा कहना है कि किसी मंदिर को बनाने या बचाने से ज्यादा गीता प्रेस को बचाना होना चाहिये।  एक मंदिर हजार, लाख या करोड़ लोगों की भौतिक श्रद्धा का केंद्र हो सकता है पर गीता प्रेस जैसी संस्था सदियों तक उसी श्रद्धा को बनाये रखने का काम कर सकती है। जिन लोगों में आर्थिक क्षमता और प्रबंधकीय कौशल हो तथा  धर्म रक्षा करने के लिये प्रतिबद्ध भी हों वह सब काम छोड़कर इस प्रयास में लग जायें कि गीता प्रेस बंद न हो।  हम यहां यह भी स्पष्ट कर दें कि गीता प्रेस के किताबों के हम पाठक भर हैं और उसके संकट की हमें अधिक जानकारी भी नहीं है पर एक अध्यात्मिक लेखक के रूप में हमारी यात्रा में उसके प्रकाशनों का बहुत महत्व है इसलिये यह लिख रहे हैं। भले ही अंतर्जाल पर हमारे कम पाठक हैं पर इतनी अपेक्षा है कि हमारी बात धीरे धीरे लोगों तक पहुंच जायेगी।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, August 16, 2015

योगसाधना से बुद्धि का विकास होता है-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(yoga sadhna se buddhi ka vikas hota hai-A hindu hindu reliigion thought article based on bhartriharineeti shatak)

                              इस संसार में हर जीव की देह में चित्त होता है। मनुष्य में बुद्धि और विवेक अधिक होने से चित्त भी वैसा ही चंचल होता है।  यह चित्त या मन भोग की तरह सहजता से आकर्षक होता है और सांसरिक विषयों के प्रति रुझान अधिक होने से मनुष्य को अध्यात्मिक साधना का अवसर नहीं देता।  देखते देखते समय निकल जाता है।  देह जब थकने लगती है तो मन में चिंता और भय का भाव बढ़ जाता है।  भौतिकता का आकर्षण आज नहीं तो कल समाप्त होना है और अध्यात्मिक साधना के अभाव में मन उदासी का भाव घर कर लेता है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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भोगा मेघवितानमध्यविलसत्सौदामिनी चञ्चला आयुर्वायुविघट्टिताब्जपटलीलीनाम्बुवद् भङ्गुरम्।
लीला यौवनलालसास्तनुभृतामित्याकलव्य योग धैर्यसमाधिसिद्धिसुलभे बुद्धिं विदध्वं बृधाः।।
                              हिन्दी में भावार्थ-भोग से जुड़े हर विषय की आयु बादल की कड़कती विद्युत के समान ही क्षणिक  होती है। मनुष्य जीवन भी कमल के पत्ते पर थिरकती बूंदों के समान है जो किसी भी क्षण गिर जाती हैं। तृष्णा भी अस्थिर है। बुद्धिमान मनुष्य को चाहिये कि इन सभी का हिसाब लगाये और चित्त को स्थिर कर योग साधना से परब्रह्मा का चिंत्तन करे।
          भोग से रोग होते हैं। योग तथा ज्ञान के अभ्यास से ही मनुष्य  भौतिक विषय की क्षणिक आयु और अध्यात्मिक अभ्यास के प्रभाव को समझ सकता है।  आज जब भौतिकता ने मानव जीवन में अस्थिरता, तनाव और भय का जो भाव पैदा किया है उसे योगाभ्यास से ही दूर किया जा सकता है। योगाभ्यास एक यज्ञ है जिसमें प्राणायाम और ध्यान से नैसर्गिक ऊर्जा का निर्माण होने के साथ ही निरंकार परब्रहम के दर्शन का अनुभव भी होता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Wednesday, August 12, 2015

राज्य प्रबंध जनोन्मुख बनाये बिना पूर्ण आजादी नहीं मिल सकती-15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस पर नया पाठ(no real independence without good state managment-A hindi article on 15 august independent day of india)


                                   15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस 2015 को मनाया जायेगा। इस अवसर पर टीवी तथा अन्य प्रचार माध्यमों में  वास्तविक स्वतंत्रता या आजादी पर चर्चा सुनने का मौका भी मिलेगा। इस विषय पर पुराने तर्क या इतिहास सुनाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गांधीजी के अनेक भक्त मानते हैं कि अभी स्वतंत्रता या आजादी मिलना बाकी है। गांधी भक्तों में वर्तमान काल के सबसे ज्यादा लोकप्रिय समाज सेवी श्री अन्ना हजारे भी मानते हैं सच्ची आजादी मिलना अभी शेष है। जिस तरह स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये गांधीजी के नेतृत्व मे आंदोलन चला वैसे ही आंदोलन आज भी हो रहे हैं। यह अलग बात है कि उस तरह के आंदोलन किसान, छात्र तथा महिलाओं के हितों की रक्षा को लेकर होते हैं पर उनके संचालन वही अहिंसक रूप है जैसा गांधीजी ने बनाया था। इससे एक बात तो निश्चित कही जा सकती है कि जैसी कल्पना स्वतंत्रता के बाद सर्वजनहिताय राज्य प्रबंध व्यवस्था की कल्पना देश भक्त दीवानों ने की थी वैसा हो नहीं पाया।
                                   आमतौर से भारत में महंगाई, गरीबी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के विषय पर  अर्थशास्त्री अपने अपने ढंग से वक्तव्य देते हैं पर सच यह है कि यह समस्यायें नहीं वरन  हमारे देश में व्याप्त अकुशल प्रबंध की समस्याओं के परिणाम है।  हमने देखा है कि हमारे देश में कोई अपराधिक घटना होती है तो उसे रोकने के लिये नया कानून बनता है जबकि विशेषज्ञ कहते हैं कि पुराने कानूनों पर ही अमल किया जाये तो बढ़ते अपराधों से छुटकारा मिलता है। समस्या यह नहीं है कि किसी अपराध के विरुद्ध कानून नही है वरन् उसे अमल में लाने की व्यवस्था में दोष है जिससे अपराधी निशंक रहते हैं।  हमारे देश मेें जल, अन्न और खनिज संपदा का अपार भंडार है पर वितरण में कुशल प्रबंध व्यवस्था की अभाव में धन का असमान वितरण से गरीब और अमीर के बीस भारी अंतर की स्थिति बन गयी है। हैरानी की बात है कि किसी अर्थशास्त्री ने कभी अकुशल प्रबंध की समस्या से निजात पाने के उपाय नहीं बताये।
                                   राज्य प्रबंध एक गंभीर विषय है पर लगता नहीं है कि अंग्र्रेजों की गुलामी करते हुए यह बात हम समझ पाये। अंग्रेजों से वस्तुओं के भोग के तरीके तो सीख लिये पर सृजन का योग नहीं सीखा। नतीजा वही होना था जो सामने है। 15 अगस्त पर अनेक प्रकार की चर्चायें होंगी और हम यह देखना चाहेंगे कि क्या कोई इस अकुशल प्रबंध की समस्या पर कोई गंभीर विचार रखता है या नहीं।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, August 8, 2015

बांग्लादेश में ब्लॉगर की हत्या से सबक सीखने की आवश्यकता-हिन्दी चिंत्तन लेख( murder of A Blogger in bangladesh-reading lesson-hindi thoughtt article)

                  बांग्लादेश में एक हिन्दू ब्लॉग लेखक की हत्या कर दी गयी है। हत्या करने वाले वहीं के वह चरमपंथी हैं जो हिन्दुओं को अपना दुश्मन मानते हैं। हिन्दू ब्लॉगर वहां के इन्हीं चरमपंथियों के विरुद्ध लिखता था।  बांग्लादेश में वह चौथा ब्लॉग लेखक है जिसे मारा गया है। एक योग तथा ज्ञान साधक होने के नाते यह लेखक तो यह मानता है कि धर्म शब्द मनुष्य के व्यवहार, विचार तथा आचरण विषय के सकारात्मक सिद्धांतों के सामूहिक रूप का प्रतिनिधि है और उसके साथ किसी अन्य शब्द जोड़ना ही गलत है। भारत के कट्टर धार्मिक भी हिन्दू शब्द से धर्म की  बजाय  एक संस्कृति से जोड़ते हैं पर पश्चिम से आयी विचारधारायें अपने नाम को अधिक महत्व देती हैं। भारत के पश्चिम में उत्पन्न धार्मिक विचारधाराओं के बीच हिंसक संघर्ष हुए हैं। जब तक उनका भारत में प्रवेश नहीं हुआ था तब तक यहां ऐसा कोई संघर्ष नहीं देखा गया।  आजादी के समय अंग्रेजों ने भारत का धार्मिक आधार पर विभाजन कर ऐसे ही संघर्ष को जन्म दिया जिसकी कल्पना यहां नहीं की जाती थी। आज पाकिस्तान और बांग्लादेश धार्मिक आधार पर ही भारत के प्रति दुर्भावना रखते हैं।
                                   एक दूसरा सवाल भी हमारे मन मे आ रहा है कि किसी भी धर्म के चरमपंथी आलोचना को सहन नहीं करते पर देखा तो यह भी जा रहा है कि अनेक राज्य भी लोगों की आस्था पर आघात पर प्रहार रोकने के लिये किसी भी धर्म की आलोचना को अपराध घोषित करती हैं। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार धर्म की साधना एकांत का विषय पर विदेशी विचाराधाराओं  सार्वजनिक रूप से समूह में करने की प्रवृत्ति देखी जाती है। इसका लाभ धार्मिक ठेकेदार समूह को अपने हित साधने में उपयोग करते हैं। यही कारण है कि इन धार्मिक ठेकेदारों के इर्दगिर्द भीड़ देखकर राज्य प्रबंध उनके प्रति भय से सदाशयी हो जाता है।  इन्हीं ठेकेदारों से इशारा पाकर उन्मादी दूसरे धर्म के लोगों पर हमला करते हैं। मुश्किल यह है कि एक तो आस्था पर हमले रोकने के राजकीय प्रयासों के चलते वैसे ही किसी धर्म की सीधे आलोचना करने वाले बुद्धिमान कम ही मिलते हैं और जो मिलते हैं उन्हें प्रताड़ित किया जाता है।  अगर यह सरकारी प्रयास न हो तो कथित आस्थाओं को चुनौती देने वाले बहुत हो जायेंगे तब उन्मादी कुछ नहीं कर पायेंगे। इसलिये अब आवश्यकता इस बात की है कि लोगों की आस्था या धार्मिक भावनाऐं आहत होने से रोकने के राजकीय प्रयास बंद होना चाहिये।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, August 6, 2015

भक्त भोले या मूर्ख नहीं होते-हिन्दी चिंत्तन लेख(bhakt bhole ya murkh nahin hote-hindi chinttan article)

                 
                                   11 किलो सोने के आभूषण पहनने वाला एक बाबा 25 सुरक्षाकर्मियों के साथ चलता है तो एक कथित महिला धार्मिक संत बिकनी पहनकर फोटा खिंचवाती है़।  दोनों के पास कथित रूप से भक्तों का जमावड़ा है पर इसका मतलब यह कतई नहीं है कि भारतीय धर्म के लोग मूर्ख हैं।  इस तरह तो हम उन लोगों को भी मूर्ख कह सकते हैं जो फिल्मों में पैसा खर्च कर मनोरंजन करने जाते हैं।  दरअसल हर मनुष्य में मनोरंजन की भूख होती है और धर्म की आड़ में आकर्षण पैदा कर अपनी रोजी रोटी चलाने वाले उसका लाभ उठाते हैं।  यह बुरा है या अच्छा यह अलग से चर्चा का विषय है पर इतना तय है कि अध्यात्मिक ज्ञानी ऐसे लोगों के पास जाने वालों  को मूर्ख या भोला नहीं मानते।
                                   भारतीय अध्यात्मिक ज्ञानी जानते हैं कि भक्त चार प्रकार के होते हैं-अर्थार्थी, आर्ती, जिज्ञासु और ज्ञानी। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि ज्ञानी भक्त ही मुझे सबसे प्रिय हैं। ज्ञानी ऐसे संतों के पास नहीं जाते पर निरंकार का उपासक होने के बावजूद कभी कभी ज्ञानार्जन और भक्ति के लिये साकार भक्ति के उपासना स्थल पर चले जाते है। । जहां तक धर्म के नाम पर ठेकेदारी करने वालों की बात है तो सच तो यह है कि राजसी वृत्ति के लोग अपने काले धंधे ऐसे ही लोगों के नाम पर कर रहे हैं जो उनके सामने किराये की भीड़ लगाकर उनके प्रचार का काम करते हैं। इसी प्रचार से अनेक लोग यह तमाशा देखने की इच्छा से चले जाते हैं।
                                   कहने का अभिप्राय यह है कि ऐसे संतों पर चाहे जैसी टिप्पणियां कर लें पर भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा मानने वालों को भोला या मूख कतई न कहें। जो कहेगा हमारी दृष्टि से अज्ञानी होगा।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Sunday, August 2, 2015

कभी कभी अपने आज्ञाचक्र पर रखा रिमोट भी चलाया करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(kabhi kahbi apne agyachakra par rakha rimot bhi chalaya karen-hindi thought article)

                              टीवी का रिमोट आपके हाथ में है, आपका स्वयं का रिमोट आपके आज्ञा चक्र-भृकुटि, नाक के ठीक ऊपर-होता है। टीवी पर किसी चैनल के बदलने से आपके मस्तिष्क पर क्या प्रभाव पड़ता है जरा गौर फरमायें।
                              आज यह लेखक सत्संग से लौटा। कुछ देर शवासन के बाद टीवी खोला। मन में विचार आया कि शवासन करते हुए चलो  मनोरंजन के लिये समाचार सुन लें।  जिस टीवी चैनल को खोला वहां एक फांसी प्राप्त व्यक्ति के-मृत्यु के बाद आदमी अपने अपराधों से मुक्त हो जाता है इसलिये उसके लिये कोई कड़ा शब्द लिखना ठीक नहीं है-समर्थक एक धार्मिक राजनीतिक नेता का चेहरा दिखाई दिया।  समझ में आया कि यह इन्हीं क्लेशी महाशय के सहारे इस रविवार को  आकर्षक-सुपर संडे (super sunday)-का रूप प्रदान करेंगे। थोड़ी देर में मन में कांटे चुभते लगे। तब हमने चैनल बदला तो उस पर महामृत्यंजय जाप का संगीत के साथ प्रसारण हो रहा था।  हम फिर शवासन में चले गये। उस जाप से मन आनंदित हो उठा। वाह क्या बात है?
                              कंप्यूटर पर बैठते ही यह विषय मन में आया कि टीवी के रिमोट से ज्यादा शक्तिशाली तो स्वयं का ही रिमोट है जो नाक के ठीक ऊपर लगा हुआ है। अक्सर हम ध्यान करते हैं और उसमें आनंद भी मिलता है।  निर्बीज ध्यान में समस्त विषयों से परे हो जाते हैं तब अध्यात्मिक आनंद आता है।  कभी कभी न चाहते हुए भी सबीज ध्यान लग जाता  है।  चाहे जैसा भी लगे सह अनुभव करना चाहिये कि  ध्यान में अपने रिमोट की स्वतः  साफ सफाई हो रही है। पहले हमें तय करना चाहिये कि चाहते क्या हैं? आज्ञा चक्र प्रभावशाली-विकार रहित-होगा तब हमें सुख की चाहत परेशान नहीं करती क्योंकि तब उसका वही बटन दबता है जो उस स्थान की तरफ ले जाता है जहां आनंद मिलता है।  जहां बेजान पड़ा है वहां वह बटन तो स्वत दबा रहता है जो क्लेश की तरफ मन को ले जाता है।
                              आखिरी बात कोई बतायेगा कि रिमोट को हिन्दी में क्या कहते हैं?
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Friday, July 31, 2015

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी का हार्दिक अभिनंदन(guru purnima par sabhi ka hardik abhinandan)


                    आज 31 जुलाई 2015 गुरु पूर्णिमा का पर्व पूरे देश में मनाया जा रहा है। किसी भी मनुष्य के लिये अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लिये अपनी  इंद्रियों को निरंतर सक्रिय रखना पड़ता है।  उसे दर्शन, श्रवण अध्ययन, चिंत्तन और मनन के साथ ही अनुसंधान कर इस संसार के भौतिक तथा अध्यात्मिक दोनों तत्वों का ज्ञान करना चाहिये।  भौतिक तत्वों का ज्ञान देने वाले तो बहुत मिल जाते हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान समझाने वाले गुरु बहुत कठिनाई से मिलते हैं। यहां तक कि जिन पेशेवर धार्मिक प्रवचनकारों को गुरु माना जाता है वह भी धन या शुल्क लेकर उस श्रीमद्भागवत गीता का ज्ञान रटकर सुनाते हैं जो निष्काम कर्म का अनुपम सिद्धांत बताती है।  उनके दर्शन और और वचन श्रवण का प्रभाव कामनाओं की अग्नि में जलकर नष्ट हो जाता है।
                    ऐसे मेें अपने प्राचीन ग्रथों का अध्ययन कर ही ज्ञानार्जन करना श्रेष्ठ  लगता है। श्रीमद्भागवत गीता को अध्ययन करते समय यह अनुुभूति करना चाहिये कि हम अपने गुरु के शब्द ही पढ़ रहे हैं। भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों में गंुरू की महिमा बताई गयी है पर पेशेवर ज्ञानी केवल दैहिक या भौतिक आधारों तक ही सीमित रखकर अपनी पूजा करवाते हैं। इस संबंध में हमारे एक आदर्श शिष्य के रूप में एकलव्य का उदाहरण हमेशा विद्यमान रहता  है, जिन्होंने गुरू द्रोणाचार्य की प्रस्तर प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या सीखी।  इसका सीधा अर्थ यही है कि केवल देहधारी गुरु होना ही आवश्यक नहीं है।  जिस तरह प्रतिमा गुरु बन सकती है उसी तरह पवित्र शब्द ज्ञान से सुसज्जित ग्रंथ भी हृदय से अध्ययन करने पर हमारे गुरु बन जाते हैं।  एक बात तय रही कि इस संसार में विषयों के विष का प्रहार अध्यात्मिक ज्ञान के अमृत से ही झेला जा सकता है और उसके लिये कोई गुरु-व्यक्ति, प्रतिमा और किताब होना आवश्यक है।
                    इस पावन पर्व पर सहयोगी ब्लॉग लेखक मित्रों, पाठकोें, फेसबुक और ट्विटर के अनुयायियों के साथ ही  भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा मानने वाले सभी सहृदय जनों को हार्दिक बधाई।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Tuesday, July 28, 2015

गुरदासपुर हमलाः 10-15 वर्ष में सीमा पार जाकर पाक को सबक सिखाना होगा(gurdaspur Attack::10-15varsh mein seema par jakar pakistan ko samjhana hoga)

               
                              गुरदासपुर में हुआ पाकिस्तानी प्रायोजित हमला बहुत गंभीर है-यह सभी मान रहे हैं पर ऐसे हमले आगे न हों इसका स्थाई उपाय करने की बात पर सभी खामोश हो जाते हैं। सन् 1971 के बाद भारतीय सेना ने सीमा पार जाकर पाकिस्तान को सबक नहीं सिखाया  है जबकि इसकी आवश्यकता लंबे समय से अनुभव की जा रही है-कारगिल युद्ध में भारत ने सीमा पार नहीं की इसका पाकिस्तान इसे भारत की कमजोरी समझ रहा है। पाकिस्तान सीना तानकर कहता है कि उसके पास परमाणु बम है और वह युद्ध में परंपरागत हथियारों की बजाय उसका इस्तेमाल करेगा। भारत के रणनीतिकार इस धमकी पर खामोश हो जाते हैं।  निष्पक्ष अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षक कह चुके हैं कि पाकिस्तान के परमाणु बम से भारत का जो होगा सो होगा पर जवाबी कार्यवाही में पाकिस्तान का अस्तित्व मिट जायेगा। पाकिस्तान के अस्तित्व मिटने की बात पर वहां से ज्यादा भारत के रणनीतिक विशारद ज्यादा घबड़ाते हैं।  उनका मानना है कि पाकिस्तान का अस्तित्व बना रहना भारत के हित में है। अगर उनकी बात सही माने तो उन्हें यह भी समझना चाहिये कि कम से कम दस वर्ष में एक बार सीमा पार जाकर पाकिस्तान को सबक सिखाते रहना जरूरी होगा।  वह लातों का भूत है बातों से नहीं मानेगा।
                              जहां तक पाकिस्तान के अस्तित्व का प्रश्न है पाकिस्तान के रणनीतिकार इसके लिये कम चिंतित नहीं होंगे। परमाणु बम हमले की धमकी देते जरूर हैं पर उनको पता है कि अंततः सबसे बुरे नतीजे उन्हें भी भोगने होंगे। जिस तरह भारत के सुविधा भोगी युद्ध के नाम से सिहरते हैं उसी तरह पाकिस्तान के सुविधाभोगी रणनीतिकार भी कम विचलित नहीं होंगे।  थोड़ी मार झेलकर उन्हें खामोश होना ही होगा।  इस थोड़ी मार से सीधा आशय यही है कि दस पंद्रह वर्ष में एक बार भारतीय सेना पंजाब से बाघा सीमा या गुजरात के कच्छ के रण से एक बार निकल कर पाकिस्तान को ठोके।  रहा परमाणु बम का सवाल तो पाकिस्तान कोई अमेरिका नहीं कि बम फैंक ही लेगा और भारत भी कोई जापान जैसा छोटा देश नहीं है कि दो चार परमाणु बम खाकर चुप बैठ जायेगा।  वैसे भी अमेरिकी सैन्य विशेषज्ञ अक्सर पाकिस्तान को समझाते हैं कि पाकिस्तान जब भारत पर परमाणु बम फैंकने की सोचगा तब तक भारत उसे पहले ही अपने परमाणु बम उपहार में आकाश से प्रस्तुत  कर इस तरह कृतार्थ करेगा कि वह उठ ही नहीं जायेगा-पाकिस्तान बचेगा ही नहीं कि वह परमाणु बम फैंके।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, July 24, 2015

समाज के संकट पर शोध जरूरी-हिन्दी चिंत्तन लेख(samaj ke sankar par shodh jaroori-hindi thought article)

                                                आज के समाज का संकट के सामने क्यों खड़ा है इस पर कोई शोध नहीं करता। हर कोई अपना बखान कर रहा है पर सार्थक चर्चा नहीं हो्र पाती। बहुत समय पहले एक मित्र ने कहा था कि इस देश की सबसे बड़ी समस्या यह है कि भले काम का ठेका भी ऐसे लोग ले रहे हैं जो कभी यह सोचते भी नहीं कि किसी का भला करना चाहिये।
                              यह हमें बात इतनी सही लगी कि हमारे लेखन का अभिन्न हिस्सा बन गयी।  वह मित्र हमसे उम्र में करीब पंद्रह वर्ष बड़ा था पर लेखक होने के नाते अक्सर चर्चा होती थी। उसने ही यह भी समझाया था कि हमें किसी भी विषय पर केवल प्रचार माध्यमों में आधिकारिक रूप से प्रकाशित हो रही खबरों को जस की तरह नहीं मान लेना चाहिये।  दूर की छोड़ो  अपने ही इर्दगिर्द अनेक ऐसे आपराधिक घटनायें  देख सकते हैं जिनके बारे में हमारी जानकारी इन प्रचार माध्यमों से दी गयी आधिकारिक सूचना से अलग होती है। हमारे एक गुरु जो पत्रकार थे उन्होंने भी करीब करीब यही बात कही थी।  इन दोनों महानुभावों की वजह से हम किसी भी घटना पर वैसा नहीं सोचते जैसा कि अन्य करते हैं।
                              हम अब तो अपनी सोच का विस्तार यहां तक देख रहे हैं कि निहायत पाखंडी लोग भलाई के व्यापार में लगे हुए है और विज्ञापन तथा प्रचार के सहारे सामान्य समाज में अपनी छवि धवल बनाते हैं।  उससे भी बड़ी समस्या यह कि भले लोग भय से इन्हीं कथित धवल छवि वालों की अदाओं पर तालियां बजाते हैं।  वह मौन भी नहीं रहते इस आशंका से कहीं इन दुष्टों की पता नहीं कब जरूरत पड़ जाये।  हमारे यहां समाज का वातावरण ही ऐसा हो गया है कि लोग भले लोगों की संगत में समय खराब करने की बजाय दुष्टों को दबंग मानकर उनके प्रति सद्भाव दिखाते हैं।
                              कहा जाता है कि हमारे समाज का संकट यह नहीं कि दुष्ट सक्रिय हैं वरन् यह भी है कि सज्जन लोग निष्क्रिय हैं।  वैसे तो यह भी देखा  जाता है कि सज्जन लोगों का संगठन सहजता से नहीं बनता जबकि दुष्ट लोग स्वार्थ के आधार पर जल्दी संगठन बना लेेते हैं। संभवतः यह मानवीय स्वभाव है कि स्वार्थ से लोग एक दूसरे से सहजता से जुड़ जाते हैं और परमार्थ के समय सभी अकेले होते हैं।  हालांकि आजकल भौतिकता के प्रभाव के कारण लोगो की चिंत्तन क्षमता केवल संपन्न और प्रतिष्ठित लोगों की तरफ केंद्रित हो गयी है। कोई किसी क चरित्र पर विचार नहीं करता और यही समाज के संकट का कारण है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Monday, July 20, 2015

अफवाह और सच-लघु हास्य व्यंग्य(afawaf aur sach-hindi comdey satire article)


               हमारे देश में अफवाहें संभवतः ऐसे लोग यह सोचकर प्रायोजित करते हैं कि अभी तक समाज के सामान्य लोगों की सोच अभी भी मृतप्रायः है या फिर उनमें चेतना आ गयी है।  जब वह जान लेते हैं कि अभी लोग गुलामी की मानसिकता में है तो वह शराब, जुआ तथा अन्य गंदे व्यवसायों में नये प्रयोग करते हैं ताकि अधिक से अधिक कमा सकें। अभी एक अफवाह फैली हुई है कि कोई जिन्न पत्थर की उपयोग में आने वाली वस्तुओं को खराब कर रहा है जिससे उसमें विष फैल जाता है।  अनेक लोग तमाम कहानियां सुना रहे हैं।  हैरानी इस बात की है कि पढ़े लिखे लोग भी चर्चायें कर एक तरह से इस अफवाह को प्रचारित ही कर रहे हैं। किसी ने बताया कि वर्षा के दिनों एक कीड़ा पैदा होता है जो कैल्शियम का भोजन करता है। हमारे देश के शहरों में अब पत्थरों के मकान नहीं होते अलबत्ते चक्की या सिल्वटा होता हैं इसलिये वह उन्हें चाटता है जिससे निशान बन जाते हैं।
            एक ने सवाल किया कि कितनी अजीब बात है कि कुछ लोग इंतजार करते हैं कि कोई दूध देने उनके घर पर आये पर शराब खरीदने स्वयं बाज़ार में दुकान पर लाईन में लगते हैं।’’
                    दूसरा कुछ देर सोचने लगा और फिर बोला-‘‘ अभी कोई अफवाह फैली है कि कोई जिन्न पत्थर की चक्की में मुंह मारता है।  कोई आदमी उसकी आवाज सुनकर कुछ कहता है तो वह स्वयं पत्थर का बन जाता है। ऐसी बेतुकी अफवाओं की जगह कोई ऐसी क्यों नही फैलाता कि कहीं कहीं शराब की बोतल से जिन्न निकलकर आदमी को खा जाता है। तब तो मजा आ जाये।’’
                 वहां तीसरा भी खड़ा था वह बोला-‘‘शराब से जिन्न निकलने की  अफवाह फैलाने वालों को प्रायोजित कौन करेगा? यहां मुफ्त में कोई अफवाह नहीं फैलाता। दूध गरीब बेचता है इसलिये घर आता है पर शराब बेचने वाले दमदार होते हैं इसलिये लोग उनकी दुकान पर जाते हैं। रही बोतल से जिन्न की अफवाह फैलाने की बात तो यकीन मानो उसे शराबी ही ठिकाने लगा देंगे या वह ऐसी हालत में आ जायेगा कि शराब पीकर ही अपना गम मिटायेगा।
                              बहरहाल हमारा मानना है कि इस तरह की अफवाहों पर चर्चा करना ही अफवाह को आगे बढ़ाने में सहायक होती है इसलिये उससे बचना चाहिये।
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Saturday, July 18, 2015

नेकी कर दरिया में डाल का सिद्धांत आंनददायक-हिन्दी चिंत्तन लेख(neki kar dariya mein dal-hindi religion thoght article)

                                                  अनेक लोग शिकायत करते हैं कि उन्होंनें किसी की मदद की तो उसने वादा नहीं निभाया। अनेक कहते हैं कि अमुक आदमी ने उनका भरोसा तोड़ा। भरोसे का संकट मनुष्य समाज में रहता ही है। एक आदमी पर कब तक भरोसा किया जा सकता है कि वह अपनी बात पर खरा उतरेगाजब तक वह अपनी जिम्मेदारी पर लिये गये काम को करने का वादा करता रहे भले ही इस संबंध में कुछ करता न दिखे या उसके काम करने की अवधि निकल जाये या फिर तब तक जब तक हम सुनते हुए बोर न हो जायें। सबसे बेहतर यह कि यह मान लिया जाये कि भरोसा वैसे ही टूटता है जैसे वादा मुकरने के लिये किया जाता है। जिसे काम करना है वह वादा नहंी करता। जो मदद करता है वह ढिंढोरा नहीं पीटता।  गरजने वाले बादल कभी बरसते नहीं-यह सिद्धांत मान लें तो कभी कष्ट ही न हो।
                              इस संबंध में एक कथा आती है कि एक आदमी फल तोड़ने के लिये पेड़ पर चढ़ गया।  फल तो उसने तोड़ा पर अब सवाल यह आया कि नीचे उतरे कैसेवह भगवान से प्रार्थना करने लगा कि हे भगवानकिसी तरह इस पेड़ से उतर तो मैं दस रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा।
                              वह थोड़ा उतरा तो पांच रुपये फिर सवा रुपये और जब पूरी तरह उतर गया तो कहने लगा किकाहे का प्रसाद चढ़ाऊंजब मै पेड़ पर चढ़ा ही स्वयं था तो उतरना कौनसी बड़ी बात थी?’’
                              पुरानी कहानियां में हमेशा कोई न कोई संदेश रहता है। यह कहानी मानवीय स्वभाव की स्थिति को बयान करती है।  जब व्यक्ति संकट में होता है या उसका ऐसा काम फंसा रहता है जिसे स्वयं नहीं कर सकता तब वह मासूमियत से इधर उधर देखता है कि कोई उसकी मदद करे। इस प्रयास में वह जिससे मदद की आशा करता है उससे तमाम तरह की प्रार्थना करने के साथ ही प्रलोभन भी देता है।  काम निकलने के बाद वह वादा पूरा करेगा या नहींकरेगा तो अपने कथन के अनुसार या नहींइस पर विश्वास करना कठिन है। नही करता तो मदद करने वाला आदमी निराश होता है पर ज्ञानियों के लिये यह समस्या नहीं होती। वह तो नेकी कर दरिया में डाल के सिद्धांत पर चलते हैं।
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Thursday, July 16, 2015

अपने भोजन पर भी विचार करें-हिन्दी चिंत्तन लेख(apne bhojan par bhi vichar karen-hindi thought article)

                                                        
                              हमारे देश में लोग भोजन की बात तो करते हैं पर उसे ग्रहण करने का तरीके और पचाने की शक्ति पर कभी विचार नहीं करते। हम भोजन में कब, क्या और कितना खायें-यह सवाल अनेक लोगों को परेशान करता है। अनेक लोग तो अपने से सवाल पूछकर ही स्वयं से ही कन्नी काट जाते हैं।  हमारा मानना है कि पेट में ऐसे ही भरें जैसे स्कूटर या गाड़ी में उतना ही ईंधन भरवाते हैं जितना टंकी में आता है। अंतर इतना है कि अगर उनकी टंकी में ज्यादा पेट्रोल भरा जाये तो वह बाहर फैल जाता है और उसे कपड़े से साफ किया जा सकता है पर अगर पेट में भरा ईंधन फैला तो वह शरीर में ही इधर उधर फैलता है जिसे साफ करना कठिन है। कालांतर में यही अति भोजन बीमारियों का कारण बनता है।
                              आजकल स्थिति यह हो गयी है कि लोग भोजन के बारे में कम अपने लिये धन संपदा अर्जन पर अधिक मानसिक ऊर्जा नष्ट करते हैं।  परंपरागत घरेलू रोटी सब्जी की जगह बाज़ार में चटकदार मसाले का खाना चाहते हैं। उससे भी ज्यादा मैदे के बने पिज्जा तथा अन्य सामग्री सामान्य लोगों के लिये प्रिय भोजन बनता जा रहा है। परिणाम हम देख ही रहे हैं कि आजकल अस्पताल पांच सितारानुमा बन गये हैं।  उनके बाहर की नामपट्टिका भी संस्कृत के मधुर शब्दों-आस्था, संस्कार, संजीवनी आदि-से सजी हुई हैं।  अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति से किसी  बीमारी का इलाज नहीं होता पर इसके सहारे रहने वाले चिकित्सक भारी पैसा कमा रहे हैं।
                              हर व्यक्ति दावा करता है कि वह स्वयं परिवार तथा रोटी के लिये कमा रहा है पर उसी के प्रति वह गंभीर नहीं दिखता। लोग खाने का बाहरी आकर्षण और स्वाद देखते हैं यह जानना ही नहीं चाहते  कि उनके हाथ से उदरस्थ सामग्री सुपाच्य है कि नहीं।  खासतौर से शादी आदि समारोह  में लोगों की यह दिलचस्पी ही खत्म हो गयी है कि वह जो खा रहे हैं कि उससे उसे वह पचा पायेंगे कि नहीं। कई घंटे पहले रखा सलाद खा लेते हैं जिसके खराब होने की पूरी आशंका रहती है।
                              सबसे बड़ी बात यह है कि खाने के बाद आदमी में जो संतोष का भाव होना चाहिये उसकी अनुभूति करना ही भुला दिया गया है।  कहा जाता है कि भोजन प्रसाद की ग्रहण करना चाहिये। यह भी कहा जाता है कि प्रसाद भोजन की तरह नहीं लेना चाहिये। लोगों खाने पीने में किसी नियम का पालन नहीं कर रहे।  हमारा मानना है कि भोजन शांत भाव से ग्रहण करते हुए सर्वशक्तिमान का इस बात के लिये मन ही मन धन्यवाद देना चाहिये कि उसने हमें न केवल वह दिया वरन् हमें पचाने की शक्ति भी दी।                        
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Saturday, July 11, 2015

आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक क्षेत्र में स्वदेशी विचाराधारा का मार्ग ही श्रेष्ठ(arthik samajik tathaa dharmik kshitra mein swadeshi vichardhara ka marg hee shreshth)

                              विश्व में अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक संस्थाओं के दबाव में जब से कथित उदारीकरण का दौर प्रारंभ हुआ है तब से अनेक देशों पर जनकल्याण कार्यों से दूर हटने का दबाव बढ़ गया है। ग्रीस यानि यूनान यानि दुनियां की प्राचीन सभ्यताओं में भारत के समकक्ष देश ने अंतर्राष्ट्रीय दबाव के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था में बदलाव करने से इंकार कर दिया है।  वहां की जनता ने जनमत संग्रह में अपनी सरकार का समर्थन कर यह साबित किया कि वह विश्व से अलग रहना स्वीकार कर सकती है पर अपनी राज व्यवस्था को अस्थिर नहीं कर सकती।  इधर चीन की अर्थव्यवस्था को लेकर भी अनेक संदेह पैदा हो गये हैं क्योंकि वहां का शेयर बाज़ार ढह गया है।
                              हमारा हमेशा मानना रहा है कि भारतीय समाज, अर्थतंत्र तथा धार्मिक व्यवस्था कभी विदेशी सिद्धांतों पर नहीं चल सकती। भारत में राज्य व्यवस्था प्रजा हित के लिये मानी जाती है जबकि पश्चिमी विचारधारायें समाज को टुकड़ों में बांटकर उनका हित करने के सिद्धांत पर आधारित हैं।  अब वह समय आ गया है कि भारत के आर्थिक, रणनीति तथा धार्मिक क्षेत्र पर नियंत्रण करने वाले विद्वान स्वदेशी नीतियों पर विचार करना प्रारंभ कर दें। अनेक सामाजिक तथा इतिहास विशेषज्ञ यूनान और भारतीय सभ्यता को प्राचीन तथा वैज्ञानिक मानते हैं।  यह अलग बात है कि अर्थ, धर्म, कला तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों में व्यवसायिक प्रवृत्ति के लोगों ने अनेक बदलाव कर दोनों सभ्याताओं को नष्ट करने का प्रयास किया है। इतना ही संयुक्त राष्ट्र संघ कहने के लिये ही निष्पक्ष है पर उसकी गतिविधियों में  अमेरिका का दबाव स्पष्टतः दिखता है जो विभिन्न देशों पर अनुचित दबाव के रूप में प्रकट होता है।  इतना ही नहीं एक धर्म विशेष के प्रति उसका रुझान भी देखा गया है।
                              देखा जाये तो धर्म का संबंध केवल आचरण से है पर पश्चिम के अनेक लोगों ने सर्वशक्तिमान का मध्यस्थ होने के नाम पर लोगों की बुद्धि हरण करने के लिये व्यवसायिक तथा राजनीतिक दोहन के लिये अव्यवहारिक सिद्धांतों का निर्माण किया। मूलतः राजसी प्रवृत्तियों पर आधार इन पश्चिमी विचारधाराओं में राजा, व्यापारी और अस्त्र शस्त्रधारी को ही समाज का नियंत्रण करने का अधिकार सौंपा गया। जबकि हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हर मनुष्य को स्वविवेक से जीवन जीने का अधिक है।
हमारे देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है।  अध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली समुदाय यहीं है पर सबसे बड़ी कमी आत्मविश्वास की है जिसके कारण यह पाश्यात्य सभ्यता को पांव पसारने का अवसर मिला है। जिस तरह विश्व में उथल पुथल मची है उसे देखते हुए भारत में अब स्वदेशी आर्थिक, सामाजिक तथा धार्मिक विचाराधारा की राह पर चलने का निर्णय लेना ही चाहिये।
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