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Sunday, March 29, 2015

मनोरोग के बढ़ते खतरे का सामना ध्यान से ही संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(manorogon ke badhte khatare ka samana dhayan se hi sambhav-hindu hindi thought article)

अभी हाल ही में जर्मनी के विमान को उसके ही मनोरोगी चालक ने जमीन पर गिरा दिया। उसमें सवार सभी यात्री काल के गाल में समा गये।  अब उसकी महिला मित्र ने बताया कि वह चालक एक मनोरोगी था और उसकी इच्छा थी कि ऐसा काम करे जिससे पूरी दुनियां उसका नाम याद रखे। उसका मनोरोग इतना विकराल था कि वह उसके निराकरण के लिये दवायें ले रहा था। उसके कुछ करने की इच्छा ने अनेक मनुष्यों को असमय ही काल के गाल में डाल दिया।
अध्यात्मिक ज्ञान की तरह से कुछ करने की इच्छा मनुष्य में स्थित अहंकार के भाव को ही परिलक्षित करती है। सामान्य मनुष्य में भी अहंकार रहता ही है। यह अलग बात है कि उसके अंदर ऐसे विषय भी रहते हैं जिससे उसमें काम, क्रोध, मोह और लोभ के भाव भी आते जाते हैं।  संसार चक्र में वह किसी एक भाव में स्थिर नहीं रहता।  जब वह किसी एक भाव में रहेगा तो मनोरोगी हो जायेगा।  वह जर्मनी का विमान चालक अगर अपनी महिला मित्र को लेकर काम और मोह के वशीभूत रहता तो शायद कुछ करने की इच्छा से-जिसका पिता अहंकार का ही भाव है-दूर हो जाता तब शायद यह दुर्घटना नहीं होती।  जिस तरह यह कहा जाता है कि शरीर में कहीं  दर्द हो और फिर एकाएक दूसरी जगह घाव हो जाये तो वहां होने वाले दर्द से पुराने की अनुभूति  नहीं रहती। यही स्थित हमारे अंदर काम, क्रोध, लोभ मोह तथा अहंकार के भाव की है।  जब एक भाव आता है तो दूसरा दूर रहता है। एकरसता नहीं रहती तो मनुष्य खतरनाक नहीं रहता।
          हमारे कथित धार्मिक विशेषज्ञ इन भावों से दूर रहने को कहते हैं पर सच यह है कि कोई भी इससे दूर नहीं रह सकता।  यह अलग बात है कि ज्ञान होने पर आदमी इन पर नियंत्रण रख सकता है।  योग साधना करने पर तो इतनी शक्ति आ जाती है कि इन भावों की लगाम ही अपने हाथ में आ जाती है। मुक्ति तब भी नहीं मिल सकती पर यह तय है कि वह योग साधक पर सवारी नहीं करते वही उन पर सवार रहता है।  सामान्य मनुष्य इन भावों में घूमता है इसलिये खतरनाक नहीं रहता पर जो मनोरोगी हो जाये वह एक ही भाव में फंसकर अपना जीवन नष्ट कर लेता है।  धार्मिक विद्वान काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार के भावों को विष कहते हैं पर सच यही है कि जीवन के संचालन में इनका ही योगदान है।  इन पर नियंत्रण का मार्ग भक्ति है इसलिये ही प्राचीन कालीन ऋषि, मुनियों और तपस्वियों ने ही अनेक प्रयोग कर तत्वज्ञान का रहस्य खोज निकाला। जो लोग तत्वाज्ञान की राह चले जाते हैं वह जीवन में बाहरी विषयों में उतनी ही सक्रियता रखते हैं  जितनी देह के लिये आवश्यक हो पर जिन पर इन भावों ने सवारी की वह उसे इधर से उधर दौड़ाते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि पूरे विश्व में मनोरोगियों की संख्या बढ़ रही है।  इसके साथ ही ऐसे रोगों की संख्या बढ़ रही है जो मानसिक तनाव से पैदा होते हैं। हमारा मानना है कि मानसिक तनाव का मुख्य कारण यह है कि हम अपना ध्यान बहिर्मुखी विषयों पर ही रखते हैं।  एकांत में ध्यान, नाम स्मरण तथा आत्मचिंत्तन करने की प्रक्रिया हमारी आदत से बाहर चली गयी है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं कि देश में मनोरोगियों के साथ अन्य रोगियों की संख्या बढ़ रही है। अनेक लोगों को तो अपने रोगों का ज्ञान तक नहीं है। इसलिये जहां तक हो सके एकांत में ध्यान, नाम स्मरण तथा आत्मचिंत्तन करते रहना चाहिये।  इससे अपने बुद्धि तथा मन पर नियंत्रण रहता है। यही जीवन के लिये श्रेयस्कर स्थिति हो सकती है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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