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Sunday, May 26, 2013

कविवर रहीम का दर्शन-इस संसार का सबसे बड़ा सत्य है भोजन (rahim ka darshan-is sansar ka sabse bada satya hai bhojan, roti a truth of world-A hindu dharma article)



    साम्यवादी विचारधारा के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स ने कहा था कि इस विश्व का सबसे बड़ा सत्य रोटी है।  हमारे देश में उनके अनुयासी उनके इस वचन को विश्व की एक बहुत बड़ी खोज मानते हैं जबकि हमारे अध्यात्मिक विद्वानों ने यह बात तो बहुत पहले ही बता दी थी।  यह अलग बात है कि कार्ल मार्क्स के शिष्य अंग्रेंजी में लिखे गये उनके पूंजी ग्रंथ के अलावा किसी अन्य भारतीय विद्वान की बात पढ़ना ही नहीं चाहते। वह भारतीय अध्यात्म ग्रंथों को साम्प्रदायिक तथा जातिवादी व्यवस्था का पोषक मानते हुए कार्ल मार्क्स को विश्व का इकलौता धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों का पोषक प्रचारित करते हैं।
    हमारा अध्यात्मिक दर्शन न केवल भोजन को मनुष्य के लिये बल्कि हर जीव के लिये एक सत्य के रूप में स्वीकारता है। इतना ही नहीं हमारा दर्शन हर मनुष्य को श्रम से धन कमाने के साथ ही भेाजन अपने हाथ से बनाने का संदेश भी देता है।  उससे भी आगे जाकर हमारा अध्यात्मिक दर्शन श्रमिकों और गरीबों की सहायता की निष्काम भाव से मदद करने की बात कहता है। 
कविवर रहीम कहते हैं कि
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चारा प्यारा जगत में, छाला हित कर लेय।
ज्यों रहीमआटा लगे, ज्यों मृदंग स्वर देय।।
    सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-इस संसार में भोजन सभी जीवों को प्यारा है। इसमें स्वाद तभी आता है जब परिश्रम कर उसे जुटाया जाये। जिस तरह मृद्रग पर आटे की थाप पड़ने से मधुर स्वर होता है उसी तरह अपने मेहनत के कमाये तथा बनाये भोजन में स्वाद आता है।
        अंग्रेजी संस्कृति तथा शिक्षा के प्रभाव के चलते  हमारे देश में शारीरिक तथा अकुशल श्रम को हेय मान लिया गया हैं। हर कोई सफेद कालर वाली नौकरी करना चाहता है। गृहस्थ स्त्रियों के प्रति समाज में एक नकारात्मक भाव बन गया है।  घर पर रोटी बनाने, कपड़े धोने, और बर्तन मांजने जैसे कामों को छोटा बताकर शिक्षित स्त्रियों को उससे विमुख करने का प्रयास भी हो रहा है। एक शोध के अनुसार भारत में गृहस्थी का काम करने वाली स्त्रियों के कार्यों का अगर मुद्रा में मूल्यांकन किया जाये तो वह अपने पुरुषों से ज्यादा कमा रही है।  इसका सीधा मतलब यह है कि पुरुष अगर उन कामों के लिये कहीं दूसरी जगह या दूसरे पर अपनी घरेलु सुविधाओं के लिये   धन व्यय करे तो उसे अपनी कमाई से अधिक भुगतान करना होगा। यह कहा जा सकता है कि  इस तरह उसके घर में काम करने वाली स्त्री उससे अधिक कमा रही है।  स्थिति यह है कि कार्ल मार्क्स के शिष्य इस तरह घर का काम करने वाली स्त्रियों को हेय मानते हुए उनको आजादी के नाम पर बाहर आकर काम करने की प्रेरणा देते हैं। मनुष्य के लिये सर्वोत्म सत्य यानि रोटी का सृजन करने वाली नारियों को इस तरह हेय मानना अपने आप में ही अनुचित विचार लगता है। भारतीय अध्यात्मिक दर्शन के प्रमाणिक ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता में भी  अकुशल श्रम को हेय मानना तामस बुद्धि का प्रमाण माना गया है।  कहने का अभिप्राय यही है कि हमें अपने शरीर से अधिक काम लेना चाहिये ताकि वह आर्थिक रूप से उत्पादक होने के साथ ही स्वस्थ भी रहे।  इसी में ही जीवन का आनंद है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, May 24, 2013

दादू दयाल के दोहे-माया के साथ अहंकार भी आता है (dadu dayal ke dohe-maya ke saath ahankar bhee aataa hai)



  अनेक मासूम दिल वाले लोग धनी, उच्च पदस्थ तथा बाहुबली लोगों से दया की आशा से निहारते हैं। कुछ लोग बड़े होने पर भी विनम्र हो सकते हैं पर सभी के अंदर सहृदयता का भाव होना  संभव नहीं है। माया के फेर में फंसे लोगों से दया, परोपकार और अपने से कमजोर व्यक्ति के प्रति सहृदयता दिखाने की उम्मीद करना निरर्थक है।  खासतौर से आजकल अंग्रेजी शिक्षा तथा जीवन पद्धति के साथ जीने के आदी हो चुके समाज में तो यह आशा करना ही मूर्खता है कि धनी, उच्च पदस्थ तथा शक्तिशाली लोग समाज के प्रति उत्तरदायित्व निभायेंगे।  अंग्रेजी शिक्षा उपभोग के लिये गुलाम तक बनने के लिये प्रेरित करती है तो जीवन शैली अपना पूरा ध्यान सांसरिक विषयों की तरफ ले जाती है।  ऐसे में सामान्य मनुष्य से आशा करना कि वह भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन करेगा, बेकार है |
कविवर दादू दयाल कहते हैं कि
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दादूमाया का खेल देखि करि, आया अति अहंकार।
अंध भया सूझे नहीं, का करिहै सिरजनहार ।।
        सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-माया का खेल अत्यंत विकट है। यह संभव ही नहीं है कि जिस मनुष्य के  पास धन, पद और प्रतिष्ठा का अंबार हो वह अहंकार का समंदर में न डूबे। जिसके पास माया है उसे कभी भी परमात्मा की भक्ति हो ही नहीं सकती।
माखन मन पांहण भया, माया रस पीया।
पाहण मन मांखण भया, राम रस लीया।।
      सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिनका मन मक्खन की तरह है उनके पास धन, पद और प्रतिष्ठा यान माया के प्रभाव में वह भी पत्थर हो जाता है। राम का रस पी ले तो पत्थर मन भी मक्खन हो जाता है।
       सच बात तो यह है कि भारत ने हर क्षेत्र में पाश्चात्य व्यवस्था का अनुकरण किया है। एक अंग्रेजी विद्वान ने बहुत पहले कहा था कि इस संसार में बिना बेईमानी या दो नंबर के धन के बिना कोई धनपति बन ही नहीं सकता।  जब हम अपनी प्राचीन पद्धतियों  से दूर हो गये हैं और  भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात नहीं भी करें तो  पश्चिमी विद्वानों का सिद्धांत भी यही कहता है कि बिना बेईमानी के किसी के पास अधिक धन आ ही नहीं सकता।  हम यह भी देखें कि जब किसी के पास बेईमानी से काला धन आता है तो यकीनन उसके साथ अनेक प्रकार के संकट भी जुउ़ते हैं।  ऐसे में ऐसे काले धन के स्वामियों की रात की नींद हराम हो जाती है तो दिन का चैन भी साथ छोड़ देता है। अपने संकटों से दो चार हो रहे बड़े लोग  अपनी रक्षा करेंगे या दूसरों पर दया करने का समय निकालेंगे? इसलिये जहां तक हो सके अपने ही पवित्र साधनों से जीवन बिताना चाहिये और धनी, उच्च पदस्थ तथा प्रतिष्ठावान लोगों से कोई सरोकार न रखते हुए उनसे आशा करना त्याग देना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, May 20, 2013

रहीम के दर्शन के आधार पर चिंत्तन-बड़े लोगों की नक़ल न करें (rahim ke darshan ke aadhar par chinttan-badon ke nakal na karen)



             इस संसार में युवाकाल के दौरान हर मनुष्य में आक्रामकता रहती है।  उस समय वह किसी काम को करते समय यह नहीं सोचता कि उसका परिणाम क्या होगा? दूसरी बात युवावस्था में दूसरे की होड़ करने की सभी के हृदय में प्रवृत्ति भी अत्यंत तीव्रतर होती है। ऐसे में अनेक लोग अपनी सामाजिक, आर्थिक तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि की परवाह नहीं करते हुए ऐसे कामों में लग जाते हैं जो अनुचित होते हैं। दरअसल जब हीन पृष्ठभूमि वाले लोग देखते हैं कि संपन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को अपने अपराधों का दंड नहीं मिल रहा है तब वह भी उनकी राह चलते हैं।  उसके बाद होता यह है कि निम्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को सजा तो मिल जाती है पर सपंन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को कोई दंड क्या उन पर मामला चलाने का भी कोई साहस नहीं कर सकता।
            यह विधि का विधान कहें या मनुष्य समाज की कमजोरी कि बड़े लोगों पर कोई आक्षेप नहीं करता बल्कि छोटे आदमी की हर कोई टांग खींचता है। इस सच्चाई को तो वैसे छोटा बड़ा हर आदमी जानता है पर उसके बावजूद कुछ लोग जोश में आकर होश खो बैठते है जिसका परिणाम उनको भुगतना ही पड़ता है।  उस समय भले ही कोई शिकायत करे कि बड़े लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता हम छोटे लेागों को ही दंड भुगतना पड़ता है, मगर यहां सुनता कौन है?
कविवर रहीम कहते हैं कि
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जानि अनीति ज करै, जागत ही रह सोइ।
ताहि सिखाइ जगाइबो, ‘रहिमनउचित न होइ।।
सामान्य हिन्दी भाषा में अनुवाद-जो मनुष्य जान बूझकर अपराध करता है वह जागते हुए भी सोता है।  उसे किसी प्रकार का भी ज्ञान देना व्यर्थ है।
जे रहीमविधि बड़ किए, को कहि दूषण काढ़ि।
चंद्र दूबरो कूबरो, तऊ नखत तें बाढ़ि।।
सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिन लोगों को प्रकृति ने बड़ा बनाया है उनको कोई दोष नहीं देता। निर्बल और कुबड़ा चंद्रमा आकाश में अन्य नक्षत्रों से बड़ा ही दिखाई देता है।
       मूल बात यह है कि जीवन में केवल अपनी छवि, स्थिति तथा शक्ति का ख्याल करते हुए ही अपना लक्ष्य तय करना चाहिए।  अपने आचरण और विचार पर आत्ममंथन करते हुए ही जीवन में सक्रिय होना चाहिये।  यह विचार नहीं करना चाहिए कि दूसरे का कुछ नहीं बिगड़ा तो हम भी कोई अपराध करके बच जायेंगे।  खासतौर से अपने से अधिक संपन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों का अनुकरण करने का विचार भी हृदय में नहीं लाना चाहिए।  जीवन में सहजता, संपन्नता तथा सुख लाने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम अपनी छवि, शक्ति तथा संभावनाओं के अनुसार काम करें न कि दूसरे की नकल कर अपना जीवन संकट में डालें।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, May 18, 2013

दादू दयाल के दोहे -मनुष्य में सच झूठ की पहचान का गुण होना जरूरी (dadu daya ke dohe-sach jhooth ke pahachan ka gun mansuhya mein hona jaroori(



        हम देख रहे हैं कि समाज में अब बुराई और  भलाई की पहचान के साथ पाप पुण्य के कर्म के चयन का  लोगों में ज्ञान नहीं रहा। अक्सर क्रिकेट में फिक्सिंग की चर्चा होती है। अनेक युवा क्रिकेट खिलाड़ियों को मैचों  के लिये अच्छा खासा पैसा मिलता है फिर भी वह अधिक लालच में सट्टेबाजी के चक्कर में फंस जाते हैं। सभी जानते हैं कि कथित सट्टेबाज अपना हित साधने के लिये पैसे का पिंजरा हाथ में लिये फिर रहे है।  फिर भी कुछ क्रिकेट खिलाड़ियों ने उनके इशारों पर नाचकर अपना पूरा भविष्य  ही दाव पर लगा दिया।  यह सब देखकर हैरानी होती है। पकड़े गये खिलाड़ियों न केवल मैचों के लिये अच्छा पैसा मिल रहा था बल्कि उनको प्रतिष्ठित संस्थानओं में सेवा का अवसर भी मिला।  सब कुछ उनको क्रिकेट में बेहतर प्रदर्शन के कारण मिला पर अधिक पैसों की लालच में वह उसे भूल जाते हैं।  पकड़े जाने के बाद उन्हें अपनी गलती पर पछतावा भी होता  है। हालांकि अनेंक लोग इस पर उनकी निंदा कर रहे हैं पर इस विषय पर कोई चर्चा नहीं कर रहा कि आखिर उन्होंने ऐसा किया क्यों?
       अगर हम कहें कि आजकल समाज में संस्कारहीनता की स्थिति है तो यह भी कहना  पड़ता है कि संत कवि दादूदयाल ने तो बरसों पहले ही समाज की दीवानगी की स्थिति बता दी।  उस समय समाज में पाश्चात्य संस्कृति का प्रचलन नहीं था।  तब  हमारे अपने मूल संस्कार अपने ही समाज में बसे  थे। इसके बावजूद  लोगों में सच झूठ और विष अमृत की पहचान नहंी थी जिसका उल्लेख अनेक संत कवि करते हैं।   ऐसे में जब अंग्रेजी संस्कृति के साथ ही वहां के खेलों को भी समाज में स्थापित किया गया है तब उनके कुसंस्कारों से बचना कठिन ही है।
संत कवि दादू दयाल ने कहा है कि
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झूठा साचा करि लिया, विष अमृत जाना।
दुख कौ सुख सब कोइ कहै, ऐसा जगत दिवाना।।
        सामान्य भाषा में भावार्थ-पूरा संसार एक तरह से दीवाना है। झूठ को सच और विष को अमृत मानता है। दुख को ही सुख समझकर प्रसन्न होता है।
दादूविषे विकार सौं, जब लग मन राता।
तब लग चीत न आवई, त्रिभुवन पति दाता।।
            सामान्य भाषा में भावार्थ-जब मन में विकार और विष बढ़ता है तब कोई भजन नहीं करता।  ऐसे में त्रिलोकपति परमात्मा की हªªदय में सहज अनुभूति नहीं की जा सकती।
          हम क्रिकेट खिलाड़ियों के पकड़े जाने पर कितनी भी बहस कर लें पर इस तरह की सट्टेबाजी रुकने वाली नहीं है। दरअसल संकट किन्हीं व्यक्तियों का नहीं है वरन समाज की सोच का है।  पहले तो किसी के पास पैसे आने पर उसके स्तोत्रों का पता लगाया जाता था पर अब समाज ने इस जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लिया है। अब  जिसके पास पैसा है सभी लोग उसके सामने साष्टांग दंडवत् करने के लिये मरे जाते हैं।  दूसरी बात यह है कि पहले आमतौर से परिवार के बड़े सदस्य गाहे बगाहे अपने से छोटे सदस्यों को धर्म के अनुसार पैसा कमाने का संदेश देते थे। अच्छे बुरे की पहचान का तरीका बताते थे। अब हालत यह है कि बच्चों में धर्म के नाम पर केवल पूजा पाठ करने को कहा जाता है बाकी कोई सिद्धांत समझाया नहंी जाता।  ऐसे में आजकल के युवा चाहे जिसे क्षेत्र में कार्यरत हों उनके अनैतिक आचरण में फंसने की संभावना प्रबल रहती है।  उनके पकड़े जाने पर पर उनकी निंदा तो की जा सकती है पर जिस मानसिकता के चलते वह ऐसा करते हैं,उसका अध्ययन करना भी आवश्यक है। वरना सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा।  आखिर सच झूठ, नैतिक अनैतिक तथा विष अमृत की पहचान जिसे न हो उससे हमेशा ही सदाचरण की उम्मीद कैसे की जा सकती है?      

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, May 11, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जब दंड प्रणाली विफल हो तो कौआ पुरोडाश खाने लगता है (economics of kautilya-punisnment and criminal,kautilya ka arthshastra-jab dand pranali vifal ho to kauva pudorasha khane lagta hai)



      पिछले कई दिनों से भारतीय प्रचार माध्यम स्त्रियों के प्रति बढ़ते अपराधों की घटनाऐं प्रचारित कर समाज की स्थिति का रोना रोते हुए  अपने विज्ञापन का समय पास कर रहे हैं।  अनेक प्रकार की बहस होती  है पर निष्कर्ष के रूप में नतीजा शून्य ही रहा है।  सच बात तो यह है कि हमारे देश की  ही नहीं वरन् पूरे विश्व की दंडप्रणालियां अत्यंत अपराधों के अन्वेषण तथा  विलंब से निर्णय करने का कारक बन गयी हैं।  दूसरी बात यह है कि अपराध अन्वेषण तथा न्यायिक प्रणाली के सदुपयोग की योग्यता जिन लोगों में अधिक नहीं  है वह भी राज्य कर्म में लिप्त होकर समाज की रक्षा का जिम्मा ले लेते हैं।  पुरातन सभ्यताओं में अपराध की प्रकृत्ति के अनुसार दंड की व्यवस्था थी। इनमें कई सजायें क्रूर थी जिनको पश्चिमी सभ्यता के लोग पशुवत मानते थे।  अपने को सभ्य समाज साबित करने के लिये पश्चिम के लोगों ने पशुवत अपराधों के प्रति भी मानवीय दृष्टिकोण अपनाने का सिद्धांत स्थापित किया जिससे समाज में अपराध बढ़े ही हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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यदि प्रणयेराजा दण्डं उण्ड्येष्वतन्द्रितः।
शले मत्स्यानिवापक्ष्यन्दुर्बलान्बलवत्तराः।
           हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपनी प्रजा की रक्षा करने के लिये अपराधियों को दंड देने में सावधानी से काम नहीं करता तब अव्यवस्था फैलती है। शक्तिशाली मनुष्य कमजोर लोगों पर भारी अनाचार करने लगते हैं।
अद्यात्काकः परोडाशं श्वा लिह्याद्धविस्तथा।
स्वाम्यं च न स्यात्कस्मिंश्चित्प्रवर्तेताधरोत्तरम्
          हिन्दी में भावार्थ-जब राज्य अपराधियों को दंड नहीं देता तो कौआ पुरोडाश खाने लगेगा, कुत्ता हवि खाकर स्वामी की बात नहीं मानेगा और समाज उच्च से निम्न स्थिति में चला जायेगा।
        भारत में भी कथित रूप से पश्चिमी व्यवस्था को अपनााया गया है। जिस भारतीय संविधान के आधार पर हमारे देश का वर्तमान स्वरूप विद्यमान है वह भी अंग्रेजों से विरासत में मिला है। हमने अपना संविधान बनाया पर उसके साथ ऐसे अनेक नियम हैं जो अंग्रेजों के काल से ही बने हैं।  अंग्रेज आधुनिक सभ्यता के प्रवर्तक होने का दावा करते हैं जो अपराधियों के प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाने की बात करती है।  इसके विपरीत हमारा दर्शन मानता है कि क्रूरतम अपराधों की सजा भी क्रूर होना चाहिये।  चूंकि हमारे देश में पश्मिमी सभ्यता के समर्थकों के पास सारी शक्ति है इसलिये यह संभव नहीं है कि यहां अपराध के अन्वेषण तथा दंड के लिये अपने ही देश के अनुरूप कोई नयी प्रणाली बनायी जाये।
       हमारा दर्शन मानता है कि कुत्ते की पूंछ कभी सीधी नहीं हेाती जबकि पश्चिमी दर्शन अपराधियों के सुधरने की कल्पनातीत आशा पालता है।  उहापोह फंसे हमारे देश की स्थिति दिन ब दिन इसलिये बिगड़ती जा रही है क्योंकि हमारे यह अपराध तथा  अन्वेषण तथा न्यायालय में उनके प्रमाणीकरण में विलंब होता है।  अनेक अपराधी तो अपने पुराने अपराध के लिये क्षमा तक की आशा करते हैं।  कुछ तो बिना सजा के ही देह छोड़ जाते हैं।  जब तक हम अपने देश के मूल स्वभाव के अनुसार अपराध के अन्वेषण तथा उनके दंड देने की कोई तीव्र प्रणाली नहीं अपनायेंगे तब तक भयमुक्त समाज की आशा करना व्यर्थ है।         

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, May 4, 2013

गुरु ग्रंथ साहिब से संदेश-छल कपट करने वालों की विपत्ति पर रोना व्यर्थ (chhal kapat karne walon ki vipatti par rona vyarth-guru granth sahib se sandesh)



    हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मनुष्य इस संसार में अपने संकल्प के आधार पर ही चलता है। जैसा वह संकल्प करता है वैसा ही दृश्य उसके सामने आता है। जब हम यह कहते हैं कि आजकल छलकपट करने वालों की संख्या अधिक हो गयी है तब अपने अंदर नहीं झांकते।  दरअसल हमारे अंदर कहीं न कहीं छल कपट रहता है।  समय आने पर कौन छल करने को तैयार नहीं होता? आजकल हमारे देश में भ्रष्टाचार को लेकर खूब चर्चा होती है। इसका इतना विरोध हो रहा है पर फिर भी वह कम नहीं हो रहा। दरअसल जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं वह उससे अर्जित धन को  उपरी कमाई कहते है। दूसरा कमाई तो उनको भ्रष्टाचार लगता है। इतना ही नहीं समाज में लोग अब केवल धन के आकर्षण में आकर सम्मान करते हैं। वह यह नहीं देखते कि कोई आदमी किस तरह के धन से अमीर बना है।  जिस तरह समाज ने भ्रष्टाचारियों को मान्यता दी है वह एक तरह से समूचे सदस्यों के अंदर मौजूद छल कपट का ही परिणाम कहा जा कसता है। एक तरफ भ्रष्टाचार का विरोध दूसरी तरफ  उससे कमाई करने वाले का सम्मान करने का अपने आपसे ही छल न करना तो और क्या है? क्या समाज ने कभी किसी ऐसे व्यक्ति का बहिष्कार किया है जो भ्रष्टाचार के कारण अमीर बना है?
गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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जिना अंदरि कपटु विकार है तिना रोइ किआ कीजै।
हिन्दी में भावार्थ-जिन व्यक्तियों के मन में छल और कपट भरा है उनकी विपत्तियों पर रोना व्यर्थ है।
हिरदै जिनकै कपटु बाहरहु संत कहाहि।
तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।
हिन्दी में भावार्थ-अपने हृदय में कपट धारण करने वाले कथित संतों की पद, पैसे और प्रतिष्ठा की भूख कभी शांत नहीं होती। ऐसे लोगों को आखिरी समय में पछताना पड़ता है।
 
      भारतीय समाज में अनेक ऐसे कथित महान संत  सक्रिय हैं जिन्होंने भारी भरकम आश्रम बनाये हैं। शिष्यों के साथ वह संपदा का संग्रह कर रहे हैं।  कहा जाता है कि सच्चा गुरु वह है जो शिक्षा देकर शिष्य का त्याग करे पर यहां तो हर गुरु अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाने में लगा है।  यही कारण है कि आम भक्तजन गुरुओं के छलिया तथा कपटी रूप को देखकर दुःखी होते है।  यही कारण है कि लोग आजकल किसी को गुरु नहीं बनाते। अगर बनाते हैं तो विश्वास नहंी करते। देखा तो यह भी जा रहा है कि जो लोग गुरु पर विश्वास करते हैं उनकी साथ धोखा भी होता है। अनेक गुरु जेलों में अपने शिष्यों के साथ ठगी और यौन शोषण के आरोप में जेल की हवा खा चुके हैं।  पहले तो गेरुऐ वस्त्र पहनना जहां सम्मान का प्रतीक था अब ऐसे गुरुओं की वजह से यह रंग भी बदनाम हो गया है।
गुरु ग्रंथ साहिब से संदेश-छल कपट करने वालों की विपत्ति पर रोना व्यर्थ

            हिन्दी साहित्य,अध्यात्मिक दर्शन,हिन्दू धर्म संदेश

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, July 28, 2012

पतंजलि योग विज्ञान-आत्मा और संसार का संबंध दृश्य से है (patanjali yog vigyan-atma aur sansar ka sanbandh)

            देह और आत्मा को लेकर हमारे समाज में अनेक विचार प्रचलन में है पर पतंजलि योग सूत्र के अनुसार आत्मा जहां देह के लिये प्राण धारण करता है वहीं देह में कार्यरत इंद्रियों के अनुसार सक्रिय रहता है। इसके लिये यह जरूरी है कि योग के माध्यम से इसे समझा जाये। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के कुछ विद्वान आत्मा को परमात्मा का अंश मानते हैं तो कुछ आत्मा को ही परमात्मा मानते हैं। इस तरह की राय में भिन्नता के बावजूद यह एक सत्य बात है कि आत्मा अत्यंत शक्तिशाली तत्व है जिसे समझने की आवश्यकता है। दरअसल जो लोग के माध्यम से इंद्रियों और आत्मा का संयोग करते हैं वही जानते हैं कि तत्पज्ञान क्या है और उसको सहजता से कैसे जीवन में धारण किया जा सकता है। आत्मा और परमात्मा में भेद करने जैसे विषयों में अपना दिमाग खर्च करने से अच्छा है कि अपनी आत्मा को पहचानने और उसे अपनी इ्रद्रियों को संयोजन का प्रयास किया जाये।
            पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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            द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।
          ‘‘चेतनमात्र दृष्ट (आत्मा) यद्यपि स्वभाव से एकदम शुद्ध यानि निर्विकार तो बुद्धिवृति के अनुरूप देखने वाला है।
           तदर्थ एवं दृश्यस्यात्मा।।
         ‘‘दृश्य का स्वरूप उस द्रष्टा यानि आत्मा के लिये ही है।’’
          पंचतत्वों से बनी इस देह का संचालन आत्मा से ही है मगर उसे इसी देह में स्थित इंद्रियों की सहायता चाहिए। आत्मा और देह के संयोग की प्रक्रिया का ही नाम योग है। मूलतः आत्मा शुद्ध है क्योंकि वह त्रिगुणमयी माया से बंधा नहीं है पर पंचेंद्रियों के गुणों से ही वह संसार से संपर्क करता है और बाह्य प्रभावों का उस पर प्रभाव पड़ता है।
           आखिर इसका आशय क्या है? पतंजलि विज्ञान के इस सूत्र का उपयोग क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर तभी जाना जा सकता है जब हम इसका अध्ययन करें। अक्सर ज्ञानी लोग कहते हैं कि ‘किसी बेबस, गरीब, लाचार, तथा बीमार या बेजुबान पर अनाचार मत करो’ तथा ‘किसी असहाय की हाय मत लो’ क्योंकि उनकी बद्दुआओं का बुरा प्रभाव पड़ता है। यह सत्य है क्योंकि किसी लाचार, गरीब, बीमार और बेजुबान पशु पक्षी पर अनाचार किया जाये तो उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही वह स्वयं दानी या महात्मा न हो चाहे उसे ज्ञान न हो या वह भक्ति न करता हो पर उसका आत्मा उसके इंद्रिय गुणों से ही सक्रिय है यह नहीं भूलना चाहिए। अंततः वह उस परमात्मा का अंश है और अपनी देह और मन के प्रति किये गये अपराध का दंड देता है।
         कुछ अल्पज्ञानी अक्सर कहते है कि देह और आत्म अलग है तो किसी को हानि पहुंचाकर उसका प्रायश्चित मन में ही किया जा सकता है इसलिये किसी काम से डरना नहीं चाहिए। । इसके अलावा पशु पक्षियों के वध को भी उचित ठहराते हैं। यह अनुचित विचार है। इतना ही नहीं मनुष्य जब बुद्धि और मन के अनुसार अनुचित कर्म करता है तो भी उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही जिस बुद्धि या मन ने मनुष्य को किसी बुरे कर्म के लिये प्रेरित किया हो पर अंततः वही दोनों आत्मा के भी सहायक है जो शुद्ध है। जब बुद्धि और मन का आत्मा से संयोग होता है तो वह जहां अपने गुण प्रदान करते हैं तो आत्मा उनको अपनी शुद्धता प्रदान करता है। इससे अनेक बार मनुष्य को अपने बुरे कर्म का पश्चाताप होता है। यह अलग बात है कि ज्ञानी पहले ही यह संयोग करते हुए बुरे काम मे लिप्त नहीं होते पर अज्ञानी बाद में करके पछताते हैं। नहीं पछताते तो भी विकार और दंड उनका पीछा नहीं छोड़ते।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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