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Sunday, September 22, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बुद्धिमान क्लेश के समय भी अपना जीवन शुद्ध रखे(kautilya ka arthsharta-buddhiman klish ke samay bhi apna jiwan shuddh rakhen)



                        सांसरिक जीवन में उतार चढ़ाव आते ही रहते हैं। हम जब पैदल मार्ग पर चलते हैं तब कहीं सड़क अत्यंत सपाट होती है तो कहीं गड्ढे होते हैं। कहीं घास आती है तो कहंी पत्थर पांव के लिये संकट पैदा करते हैं।  हमारा जीवन भी इस तरह का है। अगर अपने प्राचीन ग्रंथों का हम निरंतर अभ्यास करते रहें तो मानसिक रूप से परिपक्वता आती है। इस संसार में सदैव कोई विषय अपने अनुकूल नहीं होता। इतना अवश्य है कि हम अगर अध्यात्मिक रूप से दृढ़ हैं तो उन विषयों के प्रतिकूल होने पर सहजता से अपने अनुकूल बना सकते हैं या फिर ऐसा होने तक हम अपने प्रयास जारी रख सकते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि प्रकृति के अनुसार हर काम के पूरे होने का एक निश्चित समय होता है।  अज्ञानी मनुष्य उतावले रहते हैं और वह अपने काम को अपने अनुकूल समय पर पूरा करने के लिये तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठानो के चक्कर पड़ जाते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म के नाम पर अनेक प्रकार के पाखंडी सिद्ध बन गये हैं। ऐसे कथित सिद्धों की संगत मनुष्य को डरपोक तथा लालची बना देती है जो कथित दैवीय प्रकोप के भय से ग्रसित रहते हैं।  इतना ही नहीं इन तांत्रिकों के चक्कर में आदमी इतना अज्ञानी हो जाता है कि वह तंत्र मंत्र तथा अनुष्ठान को अपना स्वाभाविक कर्म मानकर करता है।  उसके अंदर धर्म और अधर्म की पहचान ही नहीं रहती।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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अपां प्रवाहो गांङ्गो वा समुद्रं प्राप्य तद्रसः।
भवत्यपेयस्तद्विद्वान्न्श्रयेदशुभात्कम्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-गंगाजल जब समुद्र में मिलता है तो वह पीने योग्य नहीं रह जाता। ज्ञानी को चाहिये कि वह अशुभ लक्षणों वाले लोगों का आश्रय न ले अन्यथा उसकी स्थिति भी समुद्र में मिले गंगाजल की तरह हो जायेगी।
किल्श्यन्नाप हि मेघावी शुद्ध जीवनमाचरेत्।
तेनेह श्लाध्यतामेति लोकेश्चयश्चन हीयते।।
                        हिन्दी में भावार्थ-बुद्धिमान को चाहे क्लेश में भी रहे पर अपना जीवन शुद्ध रखे इससे उसकी प्रशंसा होती है। लोकों में अपयश नहीं होता।
                        हमारे देश में अनेक ज्ञानी अपनी दुकान लगाये बैठे हैं। यह ज्ञानी चुटकुलों और कहानियों के सहारे भीड़ जुटाकर कमाई करते हैं। इतना ही नहीं उस धन से न केवल अपने लिये राजमहलनुमा आश्रम बनाते हैं बल्कि दूसरों को अपने काम स्वयं करने की सलाह देने वाले ये गुरु अपने यहां सारे कामों के लिये कर्मचारी भी रखते हैं।  एक तरह से वह धर्म के नाम पर कपंनियां चलाते हैं यह अलग बात है कि उन्हें धर्म की आड़ में अनेक प्रकार की कर रियायत मिलती है।  मूल बात यह है कि हमें अध्यात्मिक ज्ञान के लिये स्वयं पर ही निर्भर होना चाहिये। दूसरी बात यह भी है कि ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है बल्कि उसे धारण भी करना चाहिये।  यही बुद्धिमानी की निशानी है। बुद्धिमान व्यक्ति तनाव का समय होने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता।  यही कारण है कि बुरा समय निकल जाने के बाद वह प्रतिष्ठा प्राप्त करता है।  लोग उसके पराक्रम, प्रयास तथा प्रतिबद्धता देखकर उसकी प्रशंसा करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Friday, May 31, 2013

मनुस्मृति में स्त्रियों को स्वयं वर चुनने का अधिकार-हिन्दी चिंत्तन लेख (manu smriti mein striyon ko swayan var chunna ka adhikar-hindi chinttan lekh)



         
        हमारे देश में पाश्चात्य विचारधाराओं के प्रचारक अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि भारतीय दर्शन स्त्रियों की स्वतंत्रता का हनन करता है।  उसे पहले पिता और पति तथा बाद में पुत्र के अधीन रहने के लिये प्रेरित करता है। ऐसे पाश्चात्य विचाराधाराओं के प्रचारकों की सक्रियता हमेशा ही भारतीय दर्शन के विरुद्ध ही दिखती है। उनकी सक्रियता का अवलोकन करने पर यह भी पता चलता है कि उन्होंने पाश्चात्य विचाराधाराओं को भी नहीं समझा बल्कि भारतीय दर्शन के विरुद्ध चलना है इसीलिये वह उससे नारे लेकर यह गाते हुए अपनी विद्वता प्रदर्शित करते हैं।
   हमारा भारतीय दर्शन वैज्ञानिक आधारों पर टिका है। इसके एक नहीं वरन् अनेक प्रमाण हैं। खासतौर से स्त्रियों को स्वतंत्र रूप से अपने निर्णय की छूट जितनी है उसे अन्य कोई विचाराधारा नहीं देती। सबसे बड़ी बात है कि विदेशी विचारधारायें स्त्री को हमेशा ही कमजोर दिल वाला मानती हैं।  जबकि हमारा दर्शन मानता है कि स्त्रियों में बुद्धि का स्तर पुरुषों से कम नहीं होता। यही कारण है कि स्त्रियों को समान स्तर के परिवार, वर तथा समाज में विवाह करने का संदेश हमारा दर्शन ही देता है। यही कारण है कि परिवार से उचित समय पर विवाह न करवा पाने की स्थिति में स्वयं ही वर चुनने का अधिकार भी मनुस्मृति में दिया गया है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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त्रीणि वर्षाण्युदीक्षेत् कुमार्यूतुमती सती।
ऊर्ध्व तु कालादेताम्माद्विन्देत सदृशं पतिम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-ऋतुमती होने के बाद भी अगर पिता कन्या का तीन वर्ष तक विवाह नहीं करे तो तो कन्या को स्वतः किसी योग्य से विवाह कर लेना चाहिए।
काममामरणात्तिष्ठेत् गृहे कन्यर्तुमत्यपि।
न चैवेनां प्रयाच्छेतु गुणहीनाय कर्हिचित्।।
         हिन्दी में भावार्थ-भले ही ऋतुमती कन्या जीवन भर अविवाहित घर में रह जाये पर उसका विवाह गुणहीन व्यक्ति से नहीं  करना चाहिए।
          विदेशी विचाराधाराओं के प्रचारक मनुस्मृति पर जातिवाद का आरोप लगाते हैं पर इसी में ही अंतर्जातीय विवाह करने की बात भी स्वीकारी गयी है।  हां, इसमें एक बात स्पष्ट रूप से कही गयी है कि स्त्री को अपने से कम स्तर के परिवार का वर चुनने की गलती नहीं करना चाहिये। हमने देखा है कि स्वयं विवाह करने पर अक्सर सम्मान के लिये लड़कियों को परिवार से प्रताड़ित करने की खबरें आती हैं उस समय हमारे देश में पैदा धर्मों का मजाक उड़ाया जाता है जबकि ऐसी घटनाओं में देखा गया है कि लड़कियां अपने परिवार से कम स्तर का वर चुनती हैं।  कभी कभी तो वह प्रथक संस्कार वाले वर को चुनती हैं जिसका ज्ञान उनको विवाह से पहले नहीं हो पाता।  दूसरी बात यह भी है कि विवाह एक आसान क्रिया है पर बाद में गृहस्थी की गाड़ी खींचना आसान नहीं होता। आज के आर्थिक संकट के युग में माता पिता को बाद में भी लड़कियों की जिम्मेदारी लेनी पड़ती है या फिर इसके लिये उनको मजबूर किया जाता है।  दूसरी बात यह है कि बाहरी रूप से अब अंतर नहीं दिखता पर सांस्कारिक रूप से पहले से अधिक कहीं अधिक अंतर समाज में हैं।  ऐसे में प्रथक संस्कार वाले वर से विवाह करने पर लड़कियों को बाद में भारी संकट का सामना करना पड़ता है तब समाज लड़कियोें के माता पिता की मजाक बनाते हैं।  हम इस पर अधिक बहस नहीं कर सकते पर इतना तय है कि लड़कियों को अपने हिसाब से भी योग्य वर चुनने का अधिकार है जिसे रोका नहीं जाना चाहिये।  दूसरी बात यह है कि समय रहते हुए माता पिता को भी अपनी लड़की के लिये योग्य वह गुणवान वर चुनने का कर्तव्य पूरा कर लेना चाहिये अन्यथा लड़की को स्वयं वर चुनने के अधिकार को चुनौती देने का हक उनको नहीं है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, May 4, 2013

गुरु ग्रंथ साहिब से संदेश-छल कपट करने वालों की विपत्ति पर रोना व्यर्थ (chhal kapat karne walon ki vipatti par rona vyarth-guru granth sahib se sandesh)



    हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मनुष्य इस संसार में अपने संकल्प के आधार पर ही चलता है। जैसा वह संकल्प करता है वैसा ही दृश्य उसके सामने आता है। जब हम यह कहते हैं कि आजकल छलकपट करने वालों की संख्या अधिक हो गयी है तब अपने अंदर नहीं झांकते।  दरअसल हमारे अंदर कहीं न कहीं छल कपट रहता है।  समय आने पर कौन छल करने को तैयार नहीं होता? आजकल हमारे देश में भ्रष्टाचार को लेकर खूब चर्चा होती है। इसका इतना विरोध हो रहा है पर फिर भी वह कम नहीं हो रहा। दरअसल जो लोग भ्रष्टाचार में लिप्त होते हैं वह उससे अर्जित धन को  उपरी कमाई कहते है। दूसरा कमाई तो उनको भ्रष्टाचार लगता है। इतना ही नहीं समाज में लोग अब केवल धन के आकर्षण में आकर सम्मान करते हैं। वह यह नहीं देखते कि कोई आदमी किस तरह के धन से अमीर बना है।  जिस तरह समाज ने भ्रष्टाचारियों को मान्यता दी है वह एक तरह से समूचे सदस्यों के अंदर मौजूद छल कपट का ही परिणाम कहा जा कसता है। एक तरफ भ्रष्टाचार का विरोध दूसरी तरफ  उससे कमाई करने वाले का सम्मान करने का अपने आपसे ही छल न करना तो और क्या है? क्या समाज ने कभी किसी ऐसे व्यक्ति का बहिष्कार किया है जो भ्रष्टाचार के कारण अमीर बना है?
गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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जिना अंदरि कपटु विकार है तिना रोइ किआ कीजै।
हिन्दी में भावार्थ-जिन व्यक्तियों के मन में छल और कपट भरा है उनकी विपत्तियों पर रोना व्यर्थ है।
हिरदै जिनकै कपटु बाहरहु संत कहाहि।
तृस्ना मूलि न चुकई अंति गए पछुताहि।
हिन्दी में भावार्थ-अपने हृदय में कपट धारण करने वाले कथित संतों की पद, पैसे और प्रतिष्ठा की भूख कभी शांत नहीं होती। ऐसे लोगों को आखिरी समय में पछताना पड़ता है।
 
      भारतीय समाज में अनेक ऐसे कथित महान संत  सक्रिय हैं जिन्होंने भारी भरकम आश्रम बनाये हैं। शिष्यों के साथ वह संपदा का संग्रह कर रहे हैं।  कहा जाता है कि सच्चा गुरु वह है जो शिक्षा देकर शिष्य का त्याग करे पर यहां तो हर गुरु अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाने में लगा है।  यही कारण है कि आम भक्तजन गुरुओं के छलिया तथा कपटी रूप को देखकर दुःखी होते है।  यही कारण है कि लोग आजकल किसी को गुरु नहीं बनाते। अगर बनाते हैं तो विश्वास नहंी करते। देखा तो यह भी जा रहा है कि जो लोग गुरु पर विश्वास करते हैं उनकी साथ धोखा भी होता है। अनेक गुरु जेलों में अपने शिष्यों के साथ ठगी और यौन शोषण के आरोप में जेल की हवा खा चुके हैं।  पहले तो गेरुऐ वस्त्र पहनना जहां सम्मान का प्रतीक था अब ऐसे गुरुओं की वजह से यह रंग भी बदनाम हो गया है।
गुरु ग्रंथ साहिब से संदेश-छल कपट करने वालों की विपत्ति पर रोना व्यर्थ

            हिन्दी साहित्य,अध्यात्मिक दर्शन,हिन्दू धर्म संदेश

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, April 27, 2013

मनुस्मृति-दुस्साहसियों को अनदेखा करने वाला राजा शीघ्र नष्ट हो जाता है



            अक्सर हमारे देश में बढ़ते अपराधों की चर्चा की जाती है। अनेक बुद्धिमान लोग राजनीति में अपराधियों के घुस आने पर चिंता जताते हैं।  हम देख रहे हैं कि अनेक ऐसे मामले सामने आते हैं जिसमें कथित अभियुक्तों के विरुद्ध कार्यवाही  न करने या उनका मामला लटकानें की बात सामने आती है।  अब तो प्रचार माध्यमों में कुछ लोग खुलकर यह कहने लगे हैं कि आम आदमी के  साथ अन्याय होने पर उन्हें राज्य से किसी सहयोग की अपेक्षा नहीं रहती। 
        देश का राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक परिदृश्य अत्यंत विरोधाभासी है।  जब कोई बड़ा कांड होता है तो हल्ला खूब मचता है। चारों तरफ से आवाजें आने लगती हैं कि अभियुक्तों को पकड़कर सजा दो।  जब अभियुक्त पकड़ा जाता है तो फिर प्रचार माध्यम यह बताने लगते हैं कि उसने किसी मजबूरी में आकर अपराध किया।  किसी को सजा होती है तो उसके प्रति सहानुभूति जताने लगते हैं।  हर अपराध पर शोर मचाने वाले प्रचार माध्यम बाद में अपराधियों में नायकत्व का आभास  कराते हुए विलाप भी करते हैं। ऐसी एक नहीं अनेक घटनायें हैं जिनमें प्रचार माध्यम एक अभियुक्त के प्रति घृणा तो दूसरे के लिये सहानुभूति वाली सामग्री प्रचारित करते हैं।  इतना ही नहीं कहीं कई बार किसी कांड का कोई कथित अभियुक्त पकड़ा जाये तो जांच एजेंसियों की कहानी पर भी वह आपत्तियां दिखाते हैं।
                 मनुस्मृति में कहा गया है कि                                                         
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        साहसे वर्तमानं तु यो मर्वयति पार्थिवः।                                                                                                       
                सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।                                        
        हिन्दी में भावार्थ-दुस्साहस करने वाले मनुष्य को यदि राज्य प्रमुख अनदेखा कर उसे छोड़ता है तो उसका स्वयं का शीघ्र विनाश निश्चित है।  दुस्साहस को अनदेखा करने वाले राज्य प्रमुख के प्रति प्रजा में विद्वेष पैदा होता है।                                                                                         
            न मित्रकारणाद्रांजा विपुलाद्वधनागमात्।                                                                                      
                          समुत्सुजेत्साहसिकान्सर्वभूतभ्भूत्भवाहात्।।                                                                                                                  
           हिन्दी में भावार्थ-राजा को चाहिए कि वह स्नेह तथा लालच होने से किसी भी ऐसे अपराध को न छोड़े जो प्रजा में भय उत्पन्न करता है।                     
        पिछले अनेक सालों में ऐसी अनेक घटनायें हुई हैं जिससे आमजनों को लगता है तो अब तो हत्या, डकैती, ठगी तथा अन्य धृणित अपराध बड़े लोगों के संरक्षण के बिना संभव नहीं है।  यह भाव भारत की एकता तथा  अखंडता के लिये खतरनाक है।  किसी भी अपराधी या अभियुक्त को उच्च स्तर पर संरक्षण मिलने की बात सच हो या नहीं पर ऐसा होने का प्रचार जनता के विश्वास को कम करता है।  हमारे देश में अपराध बढ़ते जा रहे हैं पर जिस तरह प्रचार  माध्यम कभी कभी उनसे सहानुभूति वाली सामग्री प्रचारित करते हैं उससे तो यह लगता है कि जैसे अपराध कोई हवा कर जाती है। हमारे देश में तो सभी सभ्य देवता है।  इसलिये जांच एजेंसियों तथा न्याय प्रणाली से जुड़े लोगों को अपराधों के प्रति हमेशा कठोर भाव न केवल अपनाना चाहिये बल्कि उसे प्रचारित भी करना चाहिए।
           

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, December 14, 2011

तुलसी के दोहे-दूसरे को बदनाम कर अपनी तारीफ करना घटिया काम (tulsi ke dohe-doosre ki badnami aur apnee tarif karna ghatiya kam)

           सामान्य मनुष्य अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है। देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत कम होते हैं पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है। उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है।
          आपसी वार्तालाप में लोग एक दूसरे से कहते हैं कि ‘‘अमुक आदमी में वह दोष है’, ‘अमुक आदमी यह बुरा काम करता है’, अमुक आदमी इस तरह का गंदा विचार पालता है’, या फिर ‘अमुक आदमी गंदा भोजन खाता है या पानी पीता है’। इस तरह आदमी यह साबित करना चाहता है कि अमुक बुराई ये वह स्वयं दोषमुक्त है। ज्ञानी आदमी अपना आत्ममंथन करता है। वह दूसरों की बजाय अपनी कमियां ढूंढकर उनको दूर करने का प्रयास करता है।
महाकवि तुलसीदास कहते हैं कि
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‘तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
         ‘‘दूसरों की निंदा कर स्वयं प्रतिष्ठा पाने का विचार ही मूर्खतापूर्ण है। दूसरे को बदनाम कर अपनी तारीफ गाने वालों के मुंह पर ऐसी कालिख लगेगी जिसे  कितना भी धोई जाये मिट नहीं सकती।’’
तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहु गत जान।।
        ‘‘सौंदर्य, सद्गुण, धन, प्रतिष्ठा और धर्म भाव न होने पर भी जिनको अहंकार है उनका जीवन ही बिडम्बना से भरा है। उनकी गत भी बुरी होती है।
          सच बात तो यह है कि आधुनिक समय में आदमी धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल अर्जित करने के प्रयास में लगा रहता है। न उसके व्यक्तित्व में आकर्षण न व्यवहार में गुण दिखता हैं और न ही व्यसनों की वजह से प्रतिष्ठा और धन भी उसके स्थिर रहता है। इसके बावजूद अधिकतर लोगों के पास अहंकार होता है। जो लोग जुआ, शराब या यौन अपराधों में लिप्त होते हैं उनको अगर नैतिकता का उपदेश दिया जाये तो वह उत्तेजित होते हैं। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अपने में ढेर सारे दोष होने के बावजूद दूसरों की निंदा में लगकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बना देते हैं।
ज्ञानी आदमी इन सबसे परे होकर जीवन व्यतीत करता है। उसे मालुम होता है कि गुण और ज्ञान के संचय के लिये समय कम होता है तब परनिंदा में उसे नष्ट करना बेकार है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, December 3, 2011

ऋग्वेद से संदेश-हर मनुष्य उत्तम बल का स्वामी बने (rigved se sandsh-har manushya uttam bal ka swami bane)

             सामान्य मनुष्य अनेक बार परिवार, मित्र तथा समाज के दबाव में अनेक बार ऐसे कार्य करते हैं जिससे उनका स्वयं का मन उद्विग्न हो उठता है। इसके विपरीत ज्ञानी हमेशा ही अपने मन को प्रसन्न करने वाले ही कर्म करते हैं। यह बात हम धार्मिक कर्मकांडों अवसर पर देख सकते हैं जब परिवार, समाज तथा मित्रों के दबाव में आदमी उनका निर्वाह करता है यह जानते हुए भी यह ढकोसला है। खासतौर से विवाह, गमी तथा अन्य कार्यक्रमों के समय दिखावे के लिये ऐसे अनेक कर्मकांड रचे गये हैं जिनको केवल दिखावे के लिये ही धर्म का प्रतीक माना जाता है। हमारे अनेक महान विद्वानों ने धार्मिक कर्मकांडों तथा अध्यात्मिक ज्ञान के अंतर को स्पष्ट किया है। यह अलग बात है कि समाज में उनका नाम को सम्मान दिया जाता है पर उनके संदेश कोई नहीं मानता। यही कारण है कि जब किसी के घर में शादी या गमी का अवसर आता है तो वह अपना सुख दुःख भूलकर केवल अपनी जिम्मेदारी निभाने का तनाव झेलता है। उसके मन में यही ख्याल आता है कि ‘अगर मैंने यह नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे’।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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श्रिय मनांसि देवासो अक्रन्
‘‘ज्ञानी निज अपने हृदय को प्रसन्न करने वाले कर्म करते हैं।’’
सुवीर्यस्य पतयः स्याम।
‘‘हम उत्तम बल के स्वामी बनें।’’
अगर मनुष्य चाहे तो स्वयं को योगसाधना तथा अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन से मानसिक रूप से दृढ़ होने के साथ ही दैहिक रूप से बलवान भी बना सकता है। हमारे हिन्दू धर्म की पहचान उसके कर्मकांडों से नहीं वरन् उसमें वर्णित तत्वज्ञान से है जिसका लोह आज पूरा विश्व मानता है। अगर हम अपने अंदर कर्मकांडों के निर्वहन का तनाव पालेंगे तो कभी शक्तिशाली नहीं बन सकते। जहां धर्म से कुछ पाने का मोह है वहां सिवाय तनाव के कुछ नहीं आता। मन में धर्म के प्रति त्याग का भाव हो तो स्वतः मन स्फूर्त हो जाता है। इस त्याग को भाव को तभी समझा जा सकता है जब हम परोपकार, ज्ञान संग्रह तथा हृदय से भगवान की भक्ति करेंगे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
४.शब्दयोग सारथी पत्रिका
५.हिन्दी एक्सप्रेस पत्रिका 
६.अमृत सन्देश  पत्रिका

Saturday, November 12, 2011

ऋग्वेद से संदेश-हम उत्तम बल के स्वामी बने

             सामान्य मनुष्य अनेक बार परिवार, मित्र तथा समाज के दबाव में अनेक बार ऐसे कार्य करते हैं जिससे उनका स्वयं का मन उद्विग्न हो उठता है। इसके विपरीत ज्ञानी हमेशा ही अपने मन को प्रसन्न करने वाले ही कर्म करते हैं। यह बात हम धार्मिक कर्मकांडों अवसर पर देख सकते हैं जब परिवार, समाज तथा मित्रों के दबाव में आदमी उनका निर्वाह करता है यह जानते हुए भी यह ढकोसला है। खासतौर से विवाह, गमी तथा अन्य कार्यक्रमों के समय दिखावे के लिये ऐसे अनेक कर्मकांड रचे गये हैं जिनको केवल दिखावे के लिये ही धर्म का प्रतीक माना जाता है। हमारे अनेक महान विद्वानों ने धार्मिक कर्मकांडों तथा अध्यात्मिक ज्ञान के अंतर को स्पष्ट किया है। यह अलग बात है कि समाज में उनका नाम को सम्मान दिया जाता है पर उनके संदेश कोई नहीं मानता। यही कारण है कि जब किसी के घर में शादी या गमी का अवसर आता है तो वह अपना सुख दुःख भूलकर केवल अपनी जिम्मेदारी निभाने का तनाव झेलता है। उसके मन में यही ख्याल आता है कि ‘अगर मैंने यह नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे’।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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श्रिय मनांसि देवासो अक्रन्
‘‘ज्ञानी निज अपने हृदय को प्रसन्न करने वाले कर्म करते हैं।’’
सुवीर्यस्य पतयः स्याम।
‘‘हम उत्तम बल के स्वामी बनें।’’
अगर मनुष्य चाहे तो स्वयं को योगसाधना तथा अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन से मानसिक रूप से दृढ़ होने के साथ ही दैहिक रूप से बलवान भी बना सकता है। हमारे हिन्दू धर्म की पहचान उसके कर्मकांडों से नहीं वरन् उसमें वर्णित तत्वज्ञान से है जिसका लोह आज पूरा विश्व मानता है। अगर हम अपने अंदर कर्मकांडों के निर्वहन का तनाव पालेंगे तो कभी शक्तिशाली नहीं बन सकते। जहां धर्म से कुछ पाने का मोह है वहां सिवाय तनाव के कुछ नहीं आता। मन में धर्म के प्रति त्याग का भाव हो तो स्वतः मन स्फूर्त हो जाता है। इस त्याग को भाव को तभी समझा जा सकता है जब हम परोपकार, ज्ञान संग्रह तथा हृदय से भगवान की भक्ति करेंगे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, November 6, 2011

ऋग्वेद से संदेश-समझदार लोग सभी के दिल को अच्छे लगने वाले काम ही करते है (rigved se sandesh-gyani logon ka dil)

             सामान्य मनुष्य अनेक बार परिवार, मित्र तथा समाज के दबाव में अनेक बार ऐसे कार्य करते हैं जिससे उनका स्वयं का मन उद्विग्न हो उठता है। इसके विपरीत ज्ञानी हमेशा ही अपने मन को प्रसन्न करने वाले ही कर्म करते हैं। यह बात हम धार्मिक कर्मकांडों अवसर पर देख सकते हैं जब परिवार, समाज तथा मित्रों के दबाव में आदमी उनका निर्वाह करता है यह जानते हुए भी यह ढकोसला है। खासतौर से विवाह, गमी तथा अन्य कार्यक्रमों के समय दिखावे के लिये ऐसे अनेक कर्मकांड रचे गये हैं जिनको केवल दिखावे के लिये ही धर्म का प्रतीक माना जाता है। हमारे अनेक महान विद्वानों ने धार्मिक कर्मकांडों तथा अध्यात्मिक ज्ञान के अंतर को स्पष्ट किया है। यह अलग बात है कि समाज में उनका नाम को सम्मान दिया जाता है पर उनके संदेश कोई नहीं मानता। यही कारण है कि जब किसी के घर में शादी या गमी का अवसर आता है तो वह अपना सुख दुःख भूलकर केवल अपनी जिम्मेदारी निभाने का तनाव झेलता है। उसके मन में यही ख्याल आता है कि ‘अगर मैंने यह नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे’।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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श्रिय मनांसि देवासो अक्रन्

‘‘ज्ञानी लोग   अपने हृदय को प्रसन्न करने वाले कर्म करते हैं।’’
सुवीर्यस्य पतयः स्याम।
‘‘हम उत्तम बल के स्वामी बनें।’’
अगर मनुष्य चाहे तो स्वयं को योगसाधना तथा अध्यात्मिक ग्रंथों के अध्ययन से मानसिक रूप से दृढ़ होने के साथ ही दैहिक रूप से बलवान भी बना सकता है। हमारे हिन्दू धर्म की पहचान उसके कर्मकांडों से नहीं वरन् उसमें वर्णित तत्वज्ञान से है जिसका लोह आज पूरा विश्व मानता है। अगर हम अपने अंदर कर्मकांडों के निर्वहन का तनाव पालेंगे तो कभी शक्तिशाली नहीं बन सकते। जहां धर्म से कुछ पाने का मोह है वहां सिवाय तनाव के कुछ नहीं आता। मन में धर्म के प्रति त्याग का भाव हो तो स्वतः मन स्फूर्त हो जाता है। इस त्याग को भाव को तभी समझा जा सकता है जब हम परोपकार, ज्ञान संग्रह तथा हृदय से भगवान की भक्ति करेंगे।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, October 23, 2011

भारतीय धर्म ग्रंथों से संदेश-भगवान विष्णु नारायण का पुरुषार्थ के विषय पर अनुसरण करें

                  जीवन चलते रहने का नाम है। आलस्य करना मनुष्य का सहज भाव है। ऐसे में ज्ञानी, चतुर और सामर्थ्यशाली लोग हमेशा सक्रिय रहकर कुछ न कुछ करते रहते हैं। वह जानते हैं कि जहां हमने अपने जीवन में सक्रियता को विराम दिया वहीं दैहिक तथा मानसिक विकार उन पर हमला कर देंगे। स्वास्थ्य विज्ञानी कहते हैं कि सामान्य आदमी अपने जीवन का केवल पांच फीसदी उपयोग करता है जबकि बुद्धिमान भी उससे थोड़ा अधिक उपयोग कर पाता है। इसे हम मानव स्वभाव की विवशता ही कह सकते हैं कि वह थोड़ा काम करने के बाद आराम चाहता है। दैहिक आराम न भी करे तो भी दिमागी रूप से चिंतन या मनन करने से परे रहता है। हर कोई मनोरंजन चाहता है पर सृजन बहुत कम लोग करते हैं। टीवी के सामने बैठकर दृश्य देखने या हाथ में अखबार पढ़ने से क्षणिक सुख मिलता है पर उससे जो बाद में तनाव आता है उसकी कल्पना कोई नहीं कर सकता। दरअसल इस तरह हम निष्क्रियता के साथ जीते हैं।
सामवेद में कहा गया है कि
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उत्तो कृपन्त धीतयो देवानां नाम विभ्रतीः।
           ‘‘ज्ञानी लोगों की उंगलियां सदैव कर्मो में लिप्त रहकर सामर्थ्यवान होती है। यह बात समझ लें ज्ञानी हमेशा सक्रिय रहता है तथा निष्क्रयता उसे स्वीकार नहीं होती।।
विष्णोः कर्माणि पश्चत यतो व्रतानि पस्पर्श।
           ‘‘विष्णु के पुरुषार्थ को देखो और उनका विचार कर अनुसरण करो।’
              ज्ञानी लोग जानते हैं कि अपने जीवन में विश्राम शब्द केवल निष्क्रियता का पर्याय है। यही कारण है कि वह हाथ से कोई न कोई काम करते हैं। फल की चाहत कर वह कोई तनाव नहीं पालते। मुख्य बात यह है कि जिंदा रहने के लिये जिस तरह भोजन और पानी आवश्यक है उसी तरह देह को चलायमान रखना चाहिए। हमेशा ही दैहिक तथा मानसिक सक्रियता से सृजन के पथ पर चलना अच्छा है बनिस्बत के मनोरंजन या क्षणिक सुख की खातिर निष्क्रियता अपनाने के। यही जीवन का मूल मंत्र है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, October 16, 2011

विद्यार्थियों को मनोरंजन से दूर रहना चाहिए-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन (students should away from entertainment-chittan aur thought base on chankya neeti in hindi)

                 भारतीय दर्शन में विद्याध्ययन के समय शिष्य के शिक्षा के अलावा अन्य किसी गतिविधि पर ध्यान देने वर्जित माना जाता है। आधुनिक शिक्षा पद्धति में इस बात को भुला दिया गया है। हमने देखा है कि अक्सर आजकल के  शिक्षक अपने छात्रों को शिक्षा के दौरान अन्य गतिविधियों पर ध्यान देने के लिये उकसाते हैं। इतना ही नहीं अनेक शिक्षण संस्थान तो अपने यहां शैक्षणिकोत्तर सुविधायें देने के विज्ञापन तक देते हैं। इतना ही नहीं माता पिता भी यह चाहते हैं कि उनका बालक शिक्षा के दौरान अन्य ऐसी गतिविधियों में भी भाग ले जिससे उसे अगर कहीं नौकरी न मिले तो दूसरा काम ही वह कर सके। नृत्य, खेल, तथा अभिनय का प्रशिक्षण देने के दावे के साथ ही चुनाव संघों के चुनाव के माध्यम से हर छात्र को एक संपूर्ण व्यक्ति बनाने का यह प्रयास भले ही आकर्षक लगता हो पर कालांतर में उसे अन्मयस्क भाव का बना देता है। एक दृढ़ व्यक्त्तिव का स्वामी बनने की बजाय छात्र छात्राऐं मानसिक रूप से डांवाडोल हो जाते हैं। इतना ही नहीं महाविद्यालायों में एक गणवेश का नियम होने पर उसका विरोध किया जाता है जिस कारण छात्र छात्रायें फिल्मों में दिखाये जाने वाले परिधान पहनकर शिक्षा प्राप्त करने जाते हैं। इससे उनका ध्यान शिक्षा की बजाय दैहिक आकर्षण पर केंद्रित हो जाता है।
इस विषय में चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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कामं क्रोधं तथा लोभं स्वादं श्रृंगारकौतुके।
अतिनिद्राऽतिसेवे च विद्यार्थी ह्यष्ट वर्जयेत्।।
         ‘‘विद्यार्थी को चाहिए कि वह कामुकता, क्रोध, लोभ, स्वाद, श्रृंगार, कौतुक, चाटुकारिता तथा अतिनिद्रा जैसे इन आठ व्यसनों और दोषों से दूर रहना चाहिए।’’
             हम यहां किसी पर अपने विचार लादना नहीं चाहते। जिसे जो करना है वह करे पर यह जरूर कहना चाहेंगे कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन इस बात को स्पष्ट करता है कि शिक्षा के समय छात्र छात्राओं को अपनी किताबों की विषय सामग्री का ही अध्ययन करना चाहिए। हमने यह भी देखा है कि प्रायः वही छात्र छात्रायें ही अपनी शिक्षा का पूर्ण लाभ उठा पाते हैं जिन्होंने अपनी किताबों का अध्ययन किया है। आज के फैशन, फिल्मों तथा फैस्टीवलों पर फिदा छात्र अंततः शिक्षा समाप्त करने के बाद कहीं के नहंी रह जाते। इसलिये छात्र छात्राओं को जहां तक हो सके अपनी पाठ्यक्रम सामग्री पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि उसमें उनको विशेषज्ञता मिल सके।
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Friday, October 14, 2011

भारतीय धर्मग्रंथों से संदेश-हवा भी दवा का काम करती है (bharteeya dharmagranthon se sandesh-hawa to dava ka kam bhee karti hai)

        वर्षा के मौसम में अक्सर अनेक प्रकार की बीमारियां फैलती हैं। इसका कारण यह है कि इस मौसम मेंएक तो मनुष्य की पाचन क्रिया इस समय अत्यंत मंद पड़ जाती है जबकि जीभ स्वादिष्ट मौसम के लिये लालायित हो उठती है। दूसरा यह है कि जल में अनेक प्रकार के विषाणु अपना निवास बना लेते हैं। इस तरह स्वाभाविक रूप से इस समय बीमारी का प्रकोप यत्र तत्र और सर्वत्र प्रकट होता है। बरसात के मौसम में जहां चिकित्सकों के द्वार पर भीड़ लगती है वहीं योग साधक अधिक सतर्कता पूर्वक प्राणायाम करने लगते हैं ताकि वह बीमारियों से बचे रहें।
            जल और वायु न केवल जीवन प्रवाह में सहायक होती है बल्कि रोगनिदान में औषधि के रूप में इनसे सहायता मिलती है। वर्षा ऋतु में दोनों का प्रवाह बाधक होता है पर नियम, समय और प्राणयाम के माध्यम से अपनी देह को उन विकारों से बचाया जा सकता है जो इस मौसम में होती है।
वेद शास्त्रों में कहा गया है कि
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वात ते गृहेऽमृतस्य निधिर्हितः।
ततो नो देहि जीवसे।।
           ‘‘इस वायु के गृह में यह अमरत्व की धरोहर स्थापित है जो हमारे जीवन के लिये आवश्यक है।’’
अ त्वागमं शन्तातिभिरथे अरिष्टतातिभिः दक्षं ते भद्रमाभार्ष परा यक्ष्मं सुवामित ते।।
        ऋग्वेद की इस ऋचा अनुसार वायु देवता कहते हैं कि ‘‘हे रोगी मनुष्य! मैं वैद्य तेरे पास सुखदायक और अहिंसाकर रक्षण लेकर आया हूं। तेरे लिये कल्याणकारी बल को शुद्ध वायु के माध्यम से लाता हूँ  और तेरे रोग दूर करता हूं।’’
वातु आ वातु भेषजं शंभु मयोभु नो हृदे।
प्र ण आयूँरिर तारिषत्।।
             ‘‘याद रखें कि शुद्ध ताजी वायु अमूल्य औषधि है जो हमारे हृदय के लिये दवा के समान उपयोगी है, आनंददायक है। वह आनंद प्राप्त करने के साथ ही आयु को बढ़ाता है।
          हमने देखा होगा कि जब कोई मरीज नाजुक हालत में अस्पताल पहुंचता है तो सबसे पहले चिकित्सक उसकी नाक में आक्सीजन का प्रवाह प्रारंभ करते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि सबसे प्रथम दवा तो वायु ही होती है। इसके अलावा जो दवायें मिलती हैं उनके जल का मिश्रण होता है या फिर उनका जल से सेवन करने की राय दी जाती है। हम यहां वायु के महत्व को समझें। हमने देखा होगा जहां जहां घनी आबादी हो गयी है वहां अधिकतर लोग चिढ़चिढ़े, तनाव ग्रस्त और हताशा जनक स्थिति में दिखते हैं। अनेक लोग घनी आबादी में इसलिये रहना चाहते हैं कि उनको वहां सुरक्षा मिलेगी दूसरा यह कि अपने लोग वहीं है पर इससे जीवन का बाकी आनंद कम हो जाता है उसका आभास नहीं होता।
        श्रीमद्भागवत गीता में ‘गुणों के गुणों में ही बरतने’ और ‘इंद्रियों के इंद्रियों मे बरतने’ का जो वैज्ञानिक सिद्धांत दिया गया है उसके आधार पर हम यह कह सकते हैं कि जहां प्राणवायु विषाक्त है या जहां उसकी कमी है वहां के लोगों के मानसिक रूप से स्वस्थ या सामान्य रहने की अपेक्षा करना भी व्यर्थ है। आमतौर से सामान्य बातचीत में इसका आभास नहीं होता पर विशेषज्ञ इस बात को जानते हैं कि शुद्ध और अधिक वायु के प्रवाह में रहने वाले तथा इसके विपरीत वातावरण में रहने वाले लोगों की मानसिकता में अंतर होता है।
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Thursday, September 22, 2011

अथर्ववेद से संदेश-योग्य लोग ही राष्ट्र की रक्षा करने में समर्थ (athrvaved se sandesh-yogya log se hi rashtra ki raksha karne mein samrth)

         हमारे यहां स्वतंत्रता संग्राम में दौरान आज़ादी तथा देश भक्ति का नारा इस तरह लगा कि हमारे यहां पेशेवर अभियान संचालक लोगों की भीड़ को एकत्रित करने के लिये आज भी लगाते हैं। लोगों   के राष्ट्रप्रेम की धारा इस तरह बह रही है कि आज भी स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस तथा गांधी जयंती पर भाव विभोर करने वाले गीत लोगों को लुभाते हैं। जब कोई आंदोलन या प्रदर्शन होता है तो उस समय मातृभूमि का नारा देकर लोगों को अपनी तरफ आकृष्ट करने के प्रयास होते हैं जिनसे प्रभावित होकर लोगों की भीड़ जुटती भी है।
         देश को स्वतंत्रता हुए 64 वर्ष हो गये हैं और इस समय देश की स्थिति इतनी विचित्र है कि धनपतियों की संख्या बढ़ने के साथ गरीबी के नीचे रहने वालों की संख्या उनसे कई गुना बढ़ी है। आर्थिक उदारीकरण होने के बाद तो यह स्थिति हो गयी है कि उच्च मध्यम वर्ग अमीरों में आ गया तो गरीब लोग अब गरीबी की रेखा के नीचे पहुंच गये हैं। आंकड़े बताते हैं कि देश में करोड़पतियों की संख्या में बढ़ोतरी हो गयी है तो समाज के हालत बता रहे हैं कि रोडपति उससे कई गुना बढ़े हैं। इसी कारण विकास दर के साथ अपराध दर भी तेजी बढ़ी है। आधुनिक तकनीकी जहां विकास में योगदान दे रही है तो उसके सहारे अपराध के नये नये तरीके भी इजाद हो गये हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा देश आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक विरोधाभासों के बीच सांसे ले रहा है। स्थिति यह है कि अनेक लोग तो 64 वर्ष पूर्व मिली आजादी पर ही सवाल उठा रहे हैं। अनेक लोग तो अब दूसरे स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ करने की आवश्यकता बता रहे हैं। मातृभूमि की रक्षा के नारे की गूंज इतनी तेज हो उठती है कि सारा देश खड़ा होता है। तब ऐसा लगता है कि देश में बदलाव की बयार बहने वाली है पर बाद में ऐसा होता कुछ नहीं है। वजह साफ है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा नारों से नहीं होती न ही तलवारें लहराने या हवा में गोलियां चलाने से शत्रु परास्त होते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सत्यं बृहदृत्तामृग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति।
सा नो भूतस्य भव्यस्य पत्न्पुरुं लोकं पृथिवी नः कृणोतु्।।
                ‘‘सत्य पथ पर चलने की प्रवृत्ति, हृदय का विशाल भाव, सहज व्यवहार, साहस, कार्यदक्षता तथा प्रत्येक मौसम को सहने की शक्ति, ज्ञान के साथ विज्ञान में समृद्धि तथा विद्वानों का सम्मान करने के गुणों से ही राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा की जा सकती है।’’
           राष्ट्र और मातृभूमि की रक्षा के लिये सतत और गंभीर प्रयास करने होते हैं। अपने नागरिकों को ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण करना होता है। उनका नेतृत्त करने वालों को न केवल शारीरिक रूप से सक्षम होना चाहिए बल्कि उनमें साहस भी होना चाहिए। समाज के नागरिक वर्ग के लोग आर्थिक रूप से उत्पादक, भेदभाव से रहित तथा सत्यमार्गी होना चाहिए। हम देख रहे हैं कि अभी तक विकसित कहलाने वाले पश्चिमी राष्ट्र अब लड़खड़ाने लगे हैं क्योंकि उनके यहां अनुत्पादक नागरिकों का वर्ग बढ़ रहा है। इसके विपरीत हमारे देश की आर्थिक स्थिति मजबूत हो रही है पर जिस तरह हमने पश्चिमी के विचारों को स्थान दिया है उसके चलते हमारे यहां भी अनुत्पादक नागरिक वर्ग बढ़ने की संभावना हो सकती है। कहने का अभिप्राय यह है कि राष्ट्र या मातृभूमि की रक्षा का नारा लगाना अलग बात है पर उसके लिये सतत और गंभीर प्रयास करते रहना अलग बात है और इस बात को समझना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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