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Monday, May 20, 2013

रहीम के दर्शन के आधार पर चिंत्तन-बड़े लोगों की नक़ल न करें (rahim ke darshan ke aadhar par chinttan-badon ke nakal na karen)



             इस संसार में युवाकाल के दौरान हर मनुष्य में आक्रामकता रहती है।  उस समय वह किसी काम को करते समय यह नहीं सोचता कि उसका परिणाम क्या होगा? दूसरी बात युवावस्था में दूसरे की होड़ करने की सभी के हृदय में प्रवृत्ति भी अत्यंत तीव्रतर होती है। ऐसे में अनेक लोग अपनी सामाजिक, आर्थिक तथा पारिवारिक पृष्ठभूमि की परवाह नहीं करते हुए ऐसे कामों में लग जाते हैं जो अनुचित होते हैं। दरअसल जब हीन पृष्ठभूमि वाले लोग देखते हैं कि संपन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को अपने अपराधों का दंड नहीं मिल रहा है तब वह भी उनकी राह चलते हैं।  उसके बाद होता यह है कि निम्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को सजा तो मिल जाती है पर सपंन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों को कोई दंड क्या उन पर मामला चलाने का भी कोई साहस नहीं कर सकता।
            यह विधि का विधान कहें या मनुष्य समाज की कमजोरी कि बड़े लोगों पर कोई आक्षेप नहीं करता बल्कि छोटे आदमी की हर कोई टांग खींचता है। इस सच्चाई को तो वैसे छोटा बड़ा हर आदमी जानता है पर उसके बावजूद कुछ लोग जोश में आकर होश खो बैठते है जिसका परिणाम उनको भुगतना ही पड़ता है।  उस समय भले ही कोई शिकायत करे कि बड़े लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता हम छोटे लेागों को ही दंड भुगतना पड़ता है, मगर यहां सुनता कौन है?
कविवर रहीम कहते हैं कि
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जानि अनीति ज करै, जागत ही रह सोइ।
ताहि सिखाइ जगाइबो, ‘रहिमनउचित न होइ।।
सामान्य हिन्दी भाषा में अनुवाद-जो मनुष्य जान बूझकर अपराध करता है वह जागते हुए भी सोता है।  उसे किसी प्रकार का भी ज्ञान देना व्यर्थ है।
जे रहीमविधि बड़ किए, को कहि दूषण काढ़ि।
चंद्र दूबरो कूबरो, तऊ नखत तें बाढ़ि।।
सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-जिन लोगों को प्रकृति ने बड़ा बनाया है उनको कोई दोष नहीं देता। निर्बल और कुबड़ा चंद्रमा आकाश में अन्य नक्षत्रों से बड़ा ही दिखाई देता है।
       मूल बात यह है कि जीवन में केवल अपनी छवि, स्थिति तथा शक्ति का ख्याल करते हुए ही अपना लक्ष्य तय करना चाहिए।  अपने आचरण और विचार पर आत्ममंथन करते हुए ही जीवन में सक्रिय होना चाहिये।  यह विचार नहीं करना चाहिए कि दूसरे का कुछ नहीं बिगड़ा तो हम भी कोई अपराध करके बच जायेंगे।  खासतौर से अपने से अधिक संपन्न पृष्ठभूमि वाले लोगों का अनुकरण करने का विचार भी हृदय में नहीं लाना चाहिए।  जीवन में सहजता, संपन्नता तथा सुख लाने का एकमात्र मार्ग यही है कि हम अपनी छवि, शक्ति तथा संभावनाओं के अनुसार काम करें न कि दूसरे की नकल कर अपना जीवन संकट में डालें।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



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