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Friday, August 9, 2013

चाणक्य नीति-श्रृंगार का प्रेमी कभी अकाम नहीं हो सकता (chankya neeti darshan-shringar ka premi kabhee akam nahin ho sakta)




        महान भारतीय विद्वान चाणक्य को आज भी विश्व का महान दार्शनिक माना जाता है। हमारे यहां राजनीति शास्त्र का उनको एक तरह से  जनक माना जाता है। जब हम राजनीति की बात करते हैं तो यकीनन उसमें सक्रिय भूमिका राजसी भाव से राजसी कर्म के साथ ही निभाई जा सकती है। महान विशारद चाणक्य के संदेशों में जीवन रहस्यों का सार है। व्यक्ति कोई भी हो-योगी, सात्विक और राजस-उसे चाणक्य नीति का ज्ञान हो तो कहना ही क्या? दरअसल हमारे यहां अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को अपनाया गया है जिसमें केवल राजसी विषयों का अध्ययन ही किया जाता है। नैतिक शिक्षा के नाम पर भी अंग्रेजी उद्धरणों का सहारा ही लिया जाता है।  इस पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय अध्यात्म दर्शन के विषय को बाहर रखा गया है। सच बात यह है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन किसी एक देवता या भगवान की पूजा पद्धति की बात नहीं करता। उसमें साकार तथा  निरंकार का दोनों में किसी का भी  स्मरण करना श्रेष्ठ विचार माना गया है। उसमें जीवन रहस्य के साथ ही सांसरिक विषयों की पहचान भी बतायी गयी है।  मनुष्य की मनस्थिति कब किस प्रकार की होगी यह मनोविज्ञान का विषय है पर भारतीय दर्शन इसे अलग से अध्ययन करने का विचार नहीं देता बल्कि वह सामान्य जीवन के भाग के रूप में इसे देखता है। श्रीमद्भागवत गीता में यह माना गया है कि मनुष्य तीन प्रकार का-सात्विक, राजस तथा तामस-होता है।  अगर कोई  योग का अभ्यास करे तो वह इन तीनों से प्रथक एक अलग प्रकार का जीव योगी  हो जाता है। एक मनुष्य अलग अलग मनस्थिति से गुजर सकता है तो वह प्रथक प्रथक समय सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृतियों के वशीभूत होने से वैसे  कर्म भी कर सकता है। श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान तथा विज्ञान के संदेशोें से भरा एक महान ग्रंथ है।  यह अलग बात है कि उसे केवल भारतीय धर्मों से जुड़ा मानकर शिक्षा के विषयों से दूर रखा जाता है। इसका कारण देश का राजनीतिक रूप से धर्मनिरपेक्ष होने विचार कम, लोगों में अज्ञान का अंधेरा रहे और उन्हें रौशनी के रूप में सपने, वादे और दावे बेचे जा सके, यह नीति अधिक जिम्मेदार है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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निःस्पमृहो नाऽअधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः।।
      हिन्दी में भावार्थ-कोई भी अधिकार संपन्न आकांक्षा रहित, श्रृंगार का प्रेमी अकाम, मूर्ख मधुर वचन बोलने वाला तथा स्पष्टवादी कभी धोखेबाज नहीं होता।
 
       यही कारण है कि आजकल लोग व्यवहार में धोखे का शिकार हो रहे हैं। खासतौर से युवक युवतियों के बीच अज्ञानता की प्रवृत्ति अधिक देखी जा रही है।  सहशिक्षा ने युवक युवतियों के बीच कथित मित्रता या प्रेम संबंधों को प्रोत्साहन दिया है। उर्दू शायर कर लड़कियों को लड़के प्रभावित करते हैं। लड़कियां यह समझती हैं कि उनका मित्र या प्रेमी उनसे निष्काम प्रेम कर रहा है। जब उन्हें धोखे, आक्रमण या अपराध का शिकार होना पड़ता है तब सच्चाई का पता चलता है। लैला मजनूं, शीरी फरहद, रोमियो जूलियट और ससी पुनू के किस्से अक्सर पत्रिकाओं प्रकाशित होते है।  स्थिति यह है कि कामना और वासनामय आकर्षण को हमारे प्रचार माध्यम प्यार, इश्क, लव और प्रेम बताकर प्रचार करते हैं।
    हमारा अध्यात्म दर्शन कहता है कि साकार या निराकार परमात्म के अलावा किसी अन्य नश्वर वस्तु या व्यक्ति से प्रेम हो ही नहीं सकता।  प्रेम निष्काम होना चाहिये पर कामनामय प्रेमी कभी ऐसा नहीं करता।  वह तो श्रृंगार के आकर्षण का शिकार होता है। उसी तरह रिश्त नातों में पारंपरिक अधिकार की बात आती है।  तय बात है कि जब कोई व्यक्ति दूसरे के समक्ष  रिश्ते में अपना अधिकार मानता है उससे  त्याग की आशा करना व्यर्थ है।  मूर्ख से मधुर वचन की आशा लगभग मूर्खतापूर्ण बात ही है।  जो लोग स्पष्ट बात कहते हैं वह कभी धोखेबाज नहीं होते यह अलग बात है उनकी बातें सुनने में बुरी जरूर लगती हैं।
      जीवन में हर आदमी को सतर्क तथा व्यवहारकुशल होना चाहिये पर यह तभी संभव है जब कोई भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करे। उसमें व्यक्ति, विषय तथा वस्तुओं के व्यवहार के साथ ही उनकी उपयोगिता का भी रूप बताया गया है। भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन कर उनका ज्ञान धारण करने पर जीवन में हर पल सहजता का अनुभव होता है तथा प्यार, पैसा तथा प्रतिष्ठा के विषय में कभी कोई धोखा नहीं खा सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, July 31, 2013

संत कबीरदास दर्शन-अध्यात्म की साधना में वीरता होना आवश्यक (sant kabirdas darshan-adhyatma sadhana mein veerta hona avashyak)



      हमारे देश में आजकल योग साधना विधा का अत्यंत प्रचार हो रहा है।  अनेक योग साधक प्रचारक अत्यंत परिश्रम से इसका प्रचार कर रहे हैं। उनकी जितनी प्रशंसा की जाये अत्यंत कम है।  उनके निष्काम प्रयासों के परिणाम यह तो हुआ है कि सामान्य लोग योग साधना का महत्व समझ गये हैं, जिससे योग साधकों की संख्या बढ़ी भी है फिर जनसंख्या की दृष्टि से उसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता।  सच तो यह है कि देश में मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने सामान्य मनुष्य की बुद्धि का हरण कर लिया है और लोग देर रात तक जागते हैं और सुबह प्रातःकाल भी निद्रा उनको घेर रहती है। कहा जाता है कि प्रातः सुबह साढ़े तीन बजे से साढ़े चार बजे तक प्रथ्वी पर  आक्सीजन सर्वाधिक मात्रा में होती है। इस अवधि का लाभ उठाने वाले हमारे देश में बहुत कम हैं।  हालांकि कुछ वीर ऐसे भी हैं जिन्होंने जीवन भर इसी समय का जमकर लाभ उठाया हैं। इस लेखक ने अनेक ऐसे लोग देखे हैं जो सुबह चार बजे उठकर बिना किसी अवरोध के भ्रमण करते हैं और वह किसी अन्य मनुष्य से अधिक स्वस्थ लगते हैं। 
       योग साधना के प्रचार के बाद अब साधकों की संख्या भी बढ़ी है फिर भी अधिकतर लोग इसे अपनाना नहीं चाहते।  दरअसल प्रातः जल्दी उठकर भ्रमण या योग साधना करने के लिये त्याग का भाव होना आवश्यक है। जो इस संबंध में नियम बनाते हैं वह सांसरिक विषयों से उस अवधि में अलग हो जाते हैं।  हमें घूमना ही  है या योग साधना करना ही है, यह भाव जिनके मन में आता है वह कहीं न कहीं सांसरिक विषय का त्याग कर अध्यातम के प्रति झुक जाते हैं। अध्यात्म का यह अर्थ कदापि नहीं है कि सुबह उठकर भगवान की सकाम भक्ति की जाये अथवा किसी मूर्ति के पास जाकर सिर झुकाया जाये। यह मनुष्य देह परमात्मा ने दी है इसे स्वस्थ रखना भी एक तरह से उसकी पूजा करना ही है।  इसके लिये अध्यात्म चेतना आवश्यक है जो कि सांसरिक विषयों से हृदय का भाव त्यागने पर ही उत्पन्न होती है।  मनुष्य सांसरिक विषयों से कुछ देर भी प्रथक नहीं रहना चाहता है।  
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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मारग कठिन कबीर का, धरि न सकै पग कोय।
आय चले कोई सूरमा, जा धड़ सीस न होव।।
         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-अध्यात्म का मार्ग अत्यंत कठिन है, इस पर हर कोई कदम नहीं रख सकता।
कायर का काचा मता, घड़ी पलक मन और।
आगा पीछा ह्वै रहै, जागि मिसै नहिं ठौर।।
         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-अध्यात्म साधना के क्षेत्र में अपरिपक्व तथा कायर का मन इधर से उधर भटकता भी है। साधना के क्षेत्र में पहले आग में जलना पड़ता है फिर राम शब्द का उच्चारण करना होता है।
       अस्वस्थ देह में विकारपूर्ण मन लोगों को भटका रहा है। अपने शहर में प्रातःकाल उठकर सैर सपाटे पर जाना, योग साधना करना  या मंदिर में जाने वाले लोगों के मन में एक शांति रहती है। इसके विपरीत जो अपने शहर में ही नहीं घूमते वही धर्म के नाम पर पर्यटन के नाम कथित भक्ति का पाखंड करते हुए इधर से उधर भागते हैं।  देश के बड़े शहरों में अनेक प्रसिद्ध बड़े मंदिर हैं जहां लोग जाते है।  देखा जाये तो हर शहर में कोई न कोई सिद्ध मंदिर होता है पर जो अपने घर के पास के मंदिर में ही जाने का कष्ट नहीं करते वही बड़े सिद्ध मंदिरों पर दर्शन करने के बहाने पर्यटन करने के लिये लालायित होते हैं।  यही मन मन का भटकाव है जो अध्यात्म ज्ञान के अभाव में पैदा होता है। सासंरिक विषयों में सतत लगा मन ऊबने लगता है और अपरिपक्त तथा कच्चे विचारों वाले लोग उसके जाल में फंसे रहते हैं।  इसके विपरीत जो प्रातःकाल वीरता पूर्वका\ भ्रमण, योग साधना या मंदिर में जाते हैं उनका चित्त हमेशा प्रसन्न रहता है ।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, March 3, 2013

ऋग्वेद के आधार पर सन्देश-अपने तन का पोषण कर उसका सम्मान करें (rigved ke adhar par sandesh-apne tan ka poshan ka uska samman karen)

              हम अपनी इस देह की शक्ति के माध्यम से ही संसार को देखते, सुनते और अनुभव करते हैं।  यह सही है कि हर मनुष्य को अध्यात्मिक ज्ञान के इस सूत्र का अनुभव होना चाहिये कि हम आत्मा हैं पर साथ ही इसे धारण करने वाली देह तथा उसकी इंद्रियों पर ध्यान करना जरूरी है। हमारे अध्यात्मिक ज्ञान में योगासन, प्राणायाम और ध्यान के रूप में ऐसी विधाओं का सृजन किया गया है जिससे शरीर के साथ मन तथा बुद्धि जैसी अनियंत्रित प्रकृत्तियों को नियंत्रत कर जीवन गुजारने की सुविधा मिल जाती है।  संसार के मायावी विषयों का प्रभाव मनुष्य पर इतना बुरा पड़ता है कि उसकी बुद्धि केवल भौतिक संग्रह तक ही काम करती है। अनेक लोगों के पास तो इतना समय भी नहीं रहता कि वह अपनी देह के लिये हितकर विषय पर विचार करें।
          खाने के समय भी लोग सांसरिक विषय पर ही विचार करते हैं।  जहां चार लोग बैठकर खा रहे हों वहां बातचीत का दौर भी  चलता है।  संसार के मायावी विषयों में गहराई तक डूबे लोगों के लिये अपने पद, धन और और दैहिक शक्ति का बखान करना ही ज्ञान की परिधि में आता है और शांति से भोजन करना उनके लिये एक बेकार विषय है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में खाने को लेकर भी अनेक नियम हैं पर उन नियमों पर अब कोई ध्यान नहीं देता।
ऋगवेद में कहा गया है कि
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यजस्व तन्त्रं त्वस्वाम्।
हिन्दी में भावार्थ-अपने तन का भी पोषण कर उसका सत्कार करें।
     मूल बात यह है कि खाना खाते समय मन में पवित्रता होना चाहिये। भोजन को प्रसाद की तरह ग्रहण करने से वह सहजहता से पच जाता है।  खाने का मतलब केवल पेट भरना ही नहीं होता बल्कि वह प्रक्रिया भी उस देह की पूजा करना है जो परमपिता परमात्मा की कृपा से प्राप्त हुई है।  खाते समय यह अनुभूति करना चाहिये कि मुंह में जाता हुआ भोजन हमारे शरीर को एक नई ऊर्जा दे रहा है।  उससे हमारे शरीर की शिथिल इंद्रियों को राहत अनुभव हो रही है। यह संसार संकल्प का खेल है जब हम इस तरह पवित्र विचार करते हुए अपनी दैहिक क्रियाओं में लिप्त रहेंगे तो हमारे कर्मो के फल भी पवित्र होंगे।  भोजन इस तरह न करें कि वह तो मजबूरी में करना ही है वरना हमारी देह को कष्ट होगा।  हमें यह सोचते हुए खाना चाहिये कि इससे हमारी देह पुष्ट होकर सांसरिक विषयों में हमें विजय दिलायेगी।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, February 23, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-समय आने पर शत्रु पर हमला अवश्य करें (samay aane par shatru par hamla avshya karen-kautilya ka arthshastra)

         इस संसार में तमाम तरह के लोग हैं।  सभी अच्छे नहीं तो बुरे भी नहीं है पर इतना तय है कि जिन लोगों में दूसरों को परेशान करने  वाली तामसी वृत्ति है उनका सामना कभी भी करना पड़ सकता है।  ऐसे कुछ लोग हैं जो दूसरों पर दैहिक या मानसिक आक्रमण अवश्य करते है।  उनको दो प्रकार के होते हैं।  एक तो वह जिनके पास धन, पद या बाहुबल की शक्ति है वह अपने अहंकार में चाहे जब जिससे लड़ जाते हैं।  दूसरे वह भी है जिनमें कोई गुण नहीं होता जिससे उनकी प्रवृत्ति नकारात्मक हो जाती है। उनकी मानसिकता इतनी कुंठित होती है कि वह दूसरों को नीचा दिखाने या किसी की भी मजाक उड़ाने से बाज नहीं आते।
          जहां तक हो सके ऐसे लोगों की उपेक्षा ही करना चाहिये पर जब वह शत्रुता की सीमा तक आ जायें तो फिर उन्हे बिना दंडितं छोड़ना नहीं चाहिये।  अगर धन, पद और बाहुबल में ऐसे लोग अधिक हों तब उन पर लगातार दृष्टि रखना चाहिये। जब वह स्वयं किसी विपत्ति में हों तब बिना किसी झिझक के उन पर आक्रमण अपना बदला चुकाने में चूकना नहीं चाहिए।  यह सच है कि यह कृत्य सात्विक प्रवृत्ति का नहीं वरन्  राजस प्रवृत्ति का प्रमाण है पर इस दैहिक जीवन में अपनी रक्षा करना बुरा नहीं है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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यदा क्षमस्तु प्रसमं पराक्रमदूर्जितमायमित्रम्।
तदा हि यायादहितानि कुर्वन्यरस्य या कर्षणपीडनानि।
    हिन्दी में भावार्थ-जब अपना शत्रु पराक्रम में बढ़ा हुआ हो पर अपनी शक्ति से उसे जीतना संभव हो तब उसका अहित करने की दृष्टि से उस पर आक्रमण करें।
प्रायेण संतो व्यसने रिपूर्णा यातव्यमित्येव सामादिशान्ति।
तत्रेव पक्षी व्यसने हि नित्यं क्षमस्तुसन्नभ्युदितोऽभियायात्।
        हिन्दी में भावार्थ-महापुरुषों का मानना है कि जिस पुरुष में दूसरे पर आक्रमण करने की प्रवृत्ति है उस पर समय आने पर आक्रमण अवश्य करें।          
योगी और तत्वज्ञानी सात्विक, राजसी और तामसी तीनों प्रवृत्तियों को जानते हैं।  मूल रूप से उनका हृदय सात्विक रंग से रंगा होता है पर यह भी जानते हैं कि इस जीवन में व्यवहार के दौरान आने वाले लोगों से स्वयं जैसा होने की अपेक्षा करना उचित नहीं है।  अतः वह दूसरों की प्रवृत्ति के अनुसार अपने व्यवहार और व्यक्त्तिव का रूप तय करते हैं।  अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अगला आदमी तो ज्ञान में सराबोर रहने वाला आदमी है इसलिये उसके साथ जैसा भी व्यवहार करो चुपचाप झेल जायेगा।  इसलिये अपने साथ भेदभाव, बदतमीजी या फिर तनाव पैदा करने वाले लोगो को कभी दंडित भी करना चाहिये।  यह नहीं भूलना चाहिये कि इस संसार में तामसी प्रवृत्तियों की प्रधानता वाले बहुत से लोग हैं जो दूसरे का अहित कर प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।  समय आने पर उन्हें दंडित करना आवश्यक है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Saturday, February 16, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-बैंत की तरह झुककर ही उपलब्धि प्राप्त करना संभव (bent kee tarah jhukkar hee uplabdhi prapt karna sambhav-economics of kautilya)

        जीवन में कोई भी काम सोच समझ कर करना ही मनुष्य के विवेकवान होने का प्रमाण हैं।  इस संसार में सात्विक, राजस और तामस तीन प्रकार की प्रवृत्तियों में स्वामी रहते हैं।  सात्विक व्यक्ति केवल प्रार्थना करने पर ही निष्काम भाव से काम करते हैं जबकि राजस व्यक्ति फल के प्रस्ताव मिलने पर ही किसी काम के लिये तैयार होते हैं। जिन लोगों में तामस वृत्ति है वह न तो स्वयं किसी का काम करते हैं न ही अपने काम के लिये तत्पर होते हैं।  उनसे किसी काम निकलने की अपेक्षा करना ही व्यर्थ है। इसलिये जब हम अपने जीवन में किसी विशेष अभियान में रत हों या प्रतिदिन के नित्यकर्म में, सदैव ही इस बात का ध्यान रखें कि जहां तक हो सके किसी पर शब्दिक या दैहिक प्रहार न करें।
          हर कर्म का फल अनिश्चित है।  जीवन की अपनी धारा है जिस पर वह चलता है पर मनुष्य मन का कोई भरोसा नहीं है। हम दूसरों की क्या कहें, पहले यह भी देख लें कि हमारा मन स्वयं के कितने नियंत्रण में है?  संसार के भौतिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये हमेशा ही हम राजस प्रवृत्ति के लोगों के संपर्क में रहते हैं जिनके स्वभाव में ही फल की आकांक्षा के साथ ही अहंकार, मोह तथा काम वासना की प्रवत्तियां शासन करती हैं।  हम से अधिक धनवान, पदवान और बलवान लोग कभी भी अपने से लघु स्तर के व्यक्ति से अपमान या आक्रमण को सहजता से नही लेते और न ही उसे सम्मान देने का भाव उनके हृदय में रहता है।  ऐसे में उन पर हावी होने का प्रयास निरर्थक होता है।  उनके सामने झुक कर ही काम निकालना चाहिये।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में में कहा गया है कि
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समाक्रान्तो बलावता काङ्गवन्नाधार्शिनी वियम्।
आश्रयेद्वेतसी वृति वृति न भौजङ्गी कथञ्वन।।
          हिन्दी में भावार्थ-बलवान से आक्रात हुआ व्यक्ति अचल लक्ष्मी को प्राप्त करता है बस उसमें बैंत की तरह वायु के सामने झुकने जैसी वृत्ति चाहिये। सांप की तरह फन उठाकर फुफकारने की प्रवृत्ति का आश्रय कभी न लें।
आगत विग्रहं विद्वानुपायैः प्रशम्न्नयेत्।
विजयस्य ह्यनित्यत्वाद्रभासेन न सम्पतेत्।।
     हिन्दी में भावार्थ-विद्वान को उचित है कि प्राप्त हुए उपायों से विग्रह को शांत करें। किसी भी अभियान  में विजय प्राप्त होना निश्चित नहीं है इसलिये किसी पर अचानक प्रहार न करें।
        जहां तक हो सके हमें अपने सात्विक वृत्ति को ही धारण करे हुए अपने से लघु स्तर के व्यक्ति को सम्मान और प्यार देने के साथ ही उस पर दया करते हुए काम करना चाहिये।  देखा जाये तो बड़े अभियानों में धनवान, पदवान और कथित बलवान लोग कभी साथ नहीं निभाते जितना लघु स्तर के लोग कर सकते हैं।  नित्य कर्म में लघु स्तर के लोग काम कर जाते हैं और बृहद स्तर वाले मजबूरियां जताते हुए मुंह फेर लेते हैं। सबसे बड़ी बात है मनुष्य का अहंकार जिसे कभी धारण नही करना चाहिये।  संसार के सारे काम नम्रता से पूर्ण करना ही एक सहज उपाय है जिसे कभी छोड़ना नहीं चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Monday, February 4, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-ज्ञानी जिस काम की तारीफ करें वही धर्म (gyani jis kaam kee tarif karen vahi dharma)

       प्रचार माध्यमों में-टीवी चैनल एवं समाचार पत्र पत्रिकाएँ-हमारे देश के प्रचलित  धर्मों के विषय पर लेकर अनेक प्रकार की बहस होती है। देश में कुछ बुद्धिमान इतने धर्मनिरपेक्ष हैं कि उनको भारतीय अध्यात्म में केवल जातिवाद और स्त्री शोषण के अलावा कुछ नज़र नहीं आता है।  यहां तक तो सब ठीक है पर धर्म को लेकर उनका नजरिया अजीब लगता है।  वह विश्व में अनेक धर्मो की उपस्थिति स्वीकार्य मानते हैं।  उनकी नजर में सभी धर्म समान हैं।  मतलब उनकी दृष्टि में धर्म केवल पूजा पद्धतियां ही हैं। यह अलग बात है की भारतीय धर्मों पर उनकी ड्रिसथी हमेशा वक्र ही रहती है।   जबकि  हमारा अध्यात्म दर्शन किसी विशेष पूजा पद्धति का न तो समर्थन करता है न विरोध।  वह तो नैतिक आचरण को ही धर्म मानता है।  मूल बात भी है कि हमारे प्राचीन धर्म तथा अध्यात्म ग्रंथों में धर्म को कोई नाम नहीं दिया गया है।  किसी व्यक्ति विशेष की सत्ता को स्वीकार न कर निरंकार कि उपासना को महत्व नहीं दिया गया है।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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यमाय्र्याः क्रियामाणं हिः शंसत्यागगमवेदिनः।
स धम्माय विगर्हन्ति तमधम्र्मं परिचक्षते।।

                  हिन्दी में भावार्थ-शास्त्र के ज्ञाता श्रेष्ठ पुरुष जिस कार्य की प्रशंसा करें वही धर्म है और जिसकी निंदा करें वही अधर्म हैं।
       हम जब विदेशी विचाराधाराओं को देखते हैं तो वह पूजा पद्धतियों को ही धर्म माना जाता हैं।  इतना ही नहीं मानवीय जीवन में उनका हस्तक्षेप इतना है कि खानपान, रहन सहन और भाषा को भी धर्म से जोड़ दिया जाता है जबकि उनका आधार प्रकृति के अनुसार तय होता है। इसका सीधा मतलब यह है कि पाश्चात्य विचाराधारायें मनुष्य के बाह्य रूप के आधार पर धर्म का स्वरूप तय करती हैं और इस देह को धारण करने वाला आत्मा जिसे हम अध्यात्म भी कह सकते हैं कोई अर्थ नहीं रखता।  हमारा अध्यात्मिक ज्ञान देह और आत्म दोनों के सत्य को धारण करता है। इतना ही नहीं विदेशी  विचारधाराओं में पूजापद्धति से  मेल न रखने वाले व्यक्तियों को निंदनीय माना जाता है।  यही कारण है कि पूरे विश्व में धर्म के आधार पर वैमनस्य बढ़ता जा रहा हैं इसके विपरीत भारतीय दर्शन अध्यात्म ज्ञान को संचित करता है।  इसमें यह माना जाता है कि मनुष्य अपनी देह और उसमें विराजमान मन, बुद्धि के साथ अहंकार की प्रवृत्ति पर नियंत्रण कर एक सुविधाजनक जीवन बिता सकता है। किसी विशेष प्रकार की पूजा पद्धति अपनाने या वस्त्र पहनने की बात उनमें नहीं है।  भारतीय अध्यात्म दर्शन  मनुष्य को आत्म निर्माण के लिये प्रेरित करता है।  इसके विपरीत विदेशी विचाराधारा समाज निर्माण की बात करती है जबकि व्यक्ति निर्माण के बिना ऐसा करना कठिन है।  यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन वैज्ञानिक है।  कथित रूप से सभी धर्मों की बात कहना अपने आप में इसलिये अजीब लगता है क्योंकि धर्म का कोई नाम नहीं होता।  नैतिक आचरण में पवित्रता रखना, विचारों में शुद्धता तथा परोपकार की भावना ही धर्म का प्रमाण है। भारतीय अध्यात्म विद्वान इसी आधार पर धर्म और अधर्म का रूप तय करते हैं कि उसके नाम से पहचानते हैं।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Friday, December 28, 2012

विदुर नीति-मूढ़ता की प्रवृत्ति से बचना चाहिये(vidur neeti-murkhta ki privritti se bachna chahiye)

                    जब तक कोई मनुष्य   नित्य आत्ममंथन न करें तब तक उसे इसका आभास नहीं हो सकता है कि वह  दिन में कितनी बार मूढ़ता का प्रदर्शन करता हैं।  अनेक बार किसी का यह पता होता है कि अमुक आदमी उसके प्रति सद्भावना न रखता है न आगे ऐसी कोई संभावना  है तब भी यह कामना करता है कि शायद स्थिति पलट जाये।  इतना ही नहीं कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जो अपने हित की कामना करने वालों को संदेह की दृष्टि से देखता है और जो संदेहपूर्ण है उसके हितचिंतक होने की कामना करता है। 
     समाज में सभी लोग मूर्ख नहीं होते पर सभी ज्ञानी भी नहीं होते।  कुछ लोगों में किसी के लक्ष्य का विध्वंस करने या देखने की अत्यंत उत्कंठा होती है।  वह हर समय किसी न किसी की हानि का कामना करते हैं।  ऐसे मनुष्य के साथ संपर्क रखना भी अत्यंत खतरनाक हो सकता है। किसी का बनता काम बिगाड़ने और बिगाड़ कर बदनाम करने की प्रवृत्ति अनेक लोगों में होती है।  ऐसे लोगों से यह अपेक्षा करना कि वह कभी सुधर जायेंगे एकदम व्यर्थ है।  अगर कोई ऐसी अपेक्षा करता है तो वह स्वयं महामूर्ख है।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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अकामान् कामयनि यः कामयानान् परित्यजेत्।
बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मुढचेतसम्।।
           हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य अपने से प्रेम न करने वाले को प्रेम करता है और प्रेम करने वाले को त्याग देता है वह मनुष्य मूढ़ चेतना वाला कहलाता है।
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं देष्टि हिनस्ति।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मुढचेतसम्।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य शत्रु को मित्र और मित्र को शत्रु बनाने का प्रयास करता है वह मूढ़ प्रवृत्ति का होता है।
संसारयति क1त्यानि सर्वत्र विचिकित्सते।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ।।
       हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य अपने काम को व्यर्थ ही फैलाता है। सर्वत्र ही संदेह करता है और शीघ्र होने वाले काम मे विलंब करता है वह अत्यंत मूढ़ है।
       अपने काम को लापरवाही या बेईमानी से करना भी मूढ़ प्रवृत्ति का प्रमाण है।  कबीर दास जी भी कह गये हैं कि ‘‘कल करे सो आज कर, आज करे सो अब,
पल में परलय हो जायेगी बहुरि करेगा कब’’।  कुछ लोग अपना काम अनावश्यक रूप से फैला लेते हैं। कुछ अपने काम में यह सोचकर विलंब करते हैं कि करना तो हमें ही है। यह प्रवृत्ति पतन की ओर धकेलने वाली है।
     कहने का अभिप्राय यह है कि हमें दिन प्रतिदिन अपने कार्य, व्यापार और आचरण पर दृष्टिपात रखते हुए दूसरों की भी प्रकृत्ति, लक्ष्य और स्वभाव का अध्ययन करते रहना चाहिये।  ऐसा न कर हम स्वयं को धोखा देंगे और यही मूढ़ प्रवृत्ति है जो घातक कहलाती है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
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7.दीपक भारतदीप की शब्दयोग-पत्रिका

Thursday, November 15, 2012

मनुस्मृति से संदेश-भिक्षा लेने और देने के भी नियम होते हैं (manu smriti se sandesh-bhiksha lene aur dene ka bhee niyam hote hain)

            हमारे देश में बरसों से भिक्षा मांगने और देने की एक धार्मिक परंपरा रही है। इसमें भी भिक्षा मांगने वाले भिक्षुक और देने वाले गृहस्थ के लिये भी नियम होते इसकी जानकारी बहुत कम लोगों को  है।  दरअसल भिक्षा हमारी दान परंपरा का वह हिस्सा है जिसमें सांसरिक धर्म का निर्वाह होता है।  दान के बारे में कहा जाता है कि वह हमेशा सुपात्र को दिया जाना चाहिए। गृहस्थ का कुपात्र को दिया गया दान   निष्फल हो जाता है और दुष्ट को दान देने पर तो पाप भी लगता है।  उसी तरह भिक्षा लेना भी केवल उन सन्यासियों का कार्य है जो संसार में धनोपार्जन त्यागी भाव होने के कारण नहीं करते। भिक्षा लेकर अपनी देह का पालन पोषण वह धर्म पालन की दृष्टि से करते हैं न कि उनका यह एक पूर्णकालिक व्यवसाय होता है।  अपना पेट भरने के बाद वह समाज निर्माण का प्रयास करते हैं। इस सन्यासियों के मुख, वाणी और चक्षृओं में तप का तेज दिखाई देता है।  
                                    एककालं चरेद्भेक्षं न प्रसजोत विस्तरे।
                               भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति।।
          हिन्दी में भावार्थ-
एक बार भिक्षा मांगकर सन्यासी को उसी से अपना पालन करना चाहिए।  एक से अधिक बार भीख मांगने वाला सन्यासी विषयों में घिरने लगता है।
                      विघूमे सन्ममुसले ज्याङ्गारे भुक्तवञ्जने।
                    वृत्ते शराव सम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत्।।
            हिंदी में भावार्थ-
सन्यासी को उसी घर से  भिक्षा मांगनी चाहिए जहां चूल्हा ठंडा हो चुका हो। उस घर में कूटने और पीसने का काम पूरा होने पर खानी पीने के बर्तन धोकर रख दिये गये हों।
                 यह अलग बात है कि इस भिक्षा का स्वरूप अब बदलकर भीख के रूप में दिखता है। अब भिखारी मंदिरों के द्वारों पर खड़े होकर जिस  तरह भीख मांगते हैं उसे देखकर नहीं लगता कि वह कोई त्यागी हैं।  उनके चेहरे पर अकर्मण्यता, लालच और लोभ के भाव आसानी से देखे जा सकते हैं।  अनेक खास अवसरों पर ऐसे भिखारी सारा दिन भीख मांगते हैं। अनेक श्रद्धालु उनको खाना खिलाते हैं पर उसके बाद वह फिर वहीं भीख मांगने लगते हैं। कुछ धर्मभीरु भीख में धन या भोजन प्रदान कर  यह सोचते हैं कि उन्होंने महान दान किया है। अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में उनका यह प्रयास वृथा होता है।  अनेक सामाजिक विशेषज्ञ तो इस प्रकार की भीख को पापपूर्ण मानते हैं क्योंकि इस कार्य में त्यागी लोग नहीं बल्कि आलसी और लालची लोग लगे हैं।  अनेक जगह छोटे छोटे बच्चे भीख मांगते हैं। सामाजिक विशेषज्ञ मानते हैं कि उन बच्चों को भीख देकर उनको भविष्य में अकर्मण्यता के साथ जीवन बिताने के लिये प्रेरित किया जाता है। देखा यह गया है कि अनेक लोगों को भीख मांगने की आदत बचपन से ही लग जाती है और वृद्धावस्था तब वह उससे छूट नहीं पाते।  इसलिये भीख की इस नयी परंपरा से समाज में जो विकृत्तियां आई हैं उसे रोकने के लिये हमें अपने ग्रंथों में वर्णित भिक्षा परंपरा के नियमों की जानकारी रखनी चाहिए।



संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, April 8, 2012

पतंजलि योग सूत्र-इच्छाओं का त्याग ही सन्यास है (patnjali yog sootra-ichchaon ka tyag hee snyas)

                 हमारे देश में सन्यास तथा वैराग्य को लेकर भारी भ्रम प्रचलित हैं। विषयों में आसक्ति का अभाव होने का मतलब यह माना जाता है कि मनुष्य कोई कर्म ही नहीं करे। संसार के अन्य जीवों से कटकर कहीं वन में जाकर रहने को ही सन्यास माना जाता है। दरअसल कर्म और सन्यास की जो व्याख्या श्रीमद्भागत गीता में की गयी उसे समझने में हमारा समाज असमर्थ रहा है। कर्म करना और उसके फल में आकांक्षा न होना ही सन्यास है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य अपनी देह के रहते बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता। वह तत्वज्ञान को जानने के बाद विषयों से प्रथक नहीं होता बल्कि उसमें आसक्ति का त्याग कर देता है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब हम कोई काम करते हैं तो वह केवल हमें इसलिये करना चाहिए कि उससे हमारा जीवन निर्वाह होगा। इससे अधिक अपेक्षा करने पर निराशा हाथ लगती है।
                     पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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                   दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम।।
               ‘‘दिखने और सुनने वाले विषयों से सर्वथा तृष्णारहित चित्त की अवस्था है वही वैराग्य है।’’
                     तत्परं पुरुषरव्यातेर्गुणवतृष्ण्यम्।।
                 ‘‘मनुष्य के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना ही परम वैराग्य है।’’
              हमें गाना सुनना है सुने। फिल्म देखनी है देखें। गाड़ी पर जाना है जायें। वैराग्य तो उनमें आसक्ति से हैं। जब हम यह सोचते हैं कि गाना सुने बगैर हमारे कान रह नहीं सकते। फिल्म देखे बिना हमारी आंखें प्यासी रह जाती हैं। गाड़ी में बैठे बिना हमारा मन तृप्त नहीं होगा। यहीं से शुरु होती है मानसिक तनाव की जो हमें ऐसी स्थिति में पहुंचाता है जहां बड़ा से बड़ा ज्ञान भी धरा का धरा रह जाता है। संसार के विषयों से हम अलग नहीं हो सकते मगर उनमें इस तरह की लिप्पता कभी सुखद नहीं होती। शराबी और जुआरी समाज में कभी विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि सब जानते हैं कि वह उनके बिना चल नहीं सकते इस कारण किसी भी दूसरे आदमी के कर्म के योग्य नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, March 3, 2012

अथर्ववेद से संदेश-हे परमात्मा हमें सब का कल्याण करने वाली बुद्धि प्रदान कर (atharved se sandesh-parmatma se kalyan karne wali buddhi pradan kar)

            श्रीमद्भागवतगीता को लेकर हमारे देश में अनेक भ्रम प्रचलित हैं। कहा जाता है कि यह एक पवित्र किताब है और इसका सम्मान करना चाहिए पर उसमें जो तत्वज्ञान है उसका महत्व जीवन में कितना है इसका आभास केवल ज्ञानी लोगों को श्रद्धापूर्वक अध्ययन करने पर ही हो पाता है। श्रीगीता को पवित्र मानकर उसकी पूजा करना और श्रद्धापूर्वक उसका अध्ययन करना तो दो प्रथक प्रथक क्रियायें हैं। श्रीगीता में ऐसा ज्ञान है जिससे हम न केवल उसके आधार पर अपना आत्ममंथन कर सकते हैं बल्कि दूसरे व्यक्ति के व्यवहार, खान पान तथा रहन सहन के आधार पर उसमें संभावित गुणों का अनुमान भी कर सकते हैं। गीता का ज्ञान एक तरह से दर्पण होने के साथ दूरबीन का काम भी करता है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग परमात्मा की निष्काम आराधना करते हुए अपने अंदर ऐसी पवित्र बुद्धि स्थापित होने की इच्छा पालते हैं जिससे वह ज्ञान प्राप्त कर सकें। जब एक बार ज्ञान धारण कर लिया जाता है तो फिर इस संसार के पदार्थों से केवल दैहिक संबंध ही रह जाता है। ज्ञानी लोग उनमें मन फंसाकर अपना जीवन कभी कष्टमय नहीं बनाते।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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ये श्रद्धा धनकाम्या क्रव्वादा समासते।
ते वा अन्येषा कुम्भी पर्यादधति सर्वदा।।
            ‘‘जो श्रद्धाहीन और धन के लालची हैं तथा मांस खाने के लिये तत्पर रहते हैं वह हमेशा दूसरों के धन पर नजरें गढ़ाये रहते हैं।’’
भूमे मातार्नि धेहि भा भद्रया सुप्रतिष्ठतम्।
सविदाना दिवा कवे श्रियां धेहि भूत्याम्।।
         ‘‘हे मातृभूमि! सभी का कल्याण करने वाली बुद्धि हमें प्रदान कर। प्रतिदिन हमें सभी बातों का ज्ञान कराओ ताकि हमें संपत्ति प्राप्त हो।’’
          इस तत्वज्ञान के माध्यम से हम दूसरे के आचरण का भी अनुमान प्राप्त कर सकते हैं। जिनका खानपान अनुचित है या जिनकी संगत खराब है वह कभी भी किसी के सहृदय नहीं हो सकते। भले ही वह स्वार्थवश मधुर वचन बोलें अथवा सुंदर रूप धारण करें पर उनके अंदर बैठी तामसी प्रवृत्तियां उनकी सच्ची साथी हो्रती हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि तत्वज्ञान में ज्ञान तथा विज्ञान के ऐसे सूत्र अंतर्निहित हैं जिनकी अगर जानकारी हो जाये तो फिर संसार आनंदमय हो जाता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, February 6, 2012

पतंजलि योग सूत्र-सुख के पीछे छिपा राग क्लेश है (sukh ke peechi klesh rag chhipa hai-patanjali yog sootra)

         भौतिकतावाद के चलते पूरे विश्व के साथ ही हमारे देश में लोगों का मानसिक तनाव बढ़ा है। कहा तो यहां तक जाता है कि भारत में एक बहुत बड़ा प्रतिशत इस तनाव की वजह से मनोरोगों के साथ ही मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा अन्य विकारों से पीड़ित ऐसे लोगों का है जिनको अपने रोगी होने की जानकारी तक नहीं है।पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
            ‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
           ‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’
       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, January 7, 2012

दादू दयाल के दोहे-मनुष्य बिना पहचान के गुण के सुख की आशा करता है (dadudayal ke dohe-pahachan ke gun bina manushya ke sukh ki ichchha)

          इस संसार में ऐसे ज्ञानी और ध्यानी लोगों की कमी नहीं है जो अपने सांसरिक ज्ञान को बघारते हुए नहीं थकते। इतना ही नहीं धर्म के नाम कर्मकांडों का महत्व इस तरह किया जाता है कि मानो उनको करने से स्वर्ग मिल जाता है। क्षणिक लाभ और मनोरंजन के लिये लोग अपने संबंध बनाते हैं। उनको ऐसा लगता है कि इससे उनका जीवन आराम से कट जायेगा पर इसके विपरीत ऐसे ही संबंध बाद में बोझ बन जाते हैं।
             आजकल हमारे यहां प्रेम विवाहों का प्रचलन अधिक हो गया है। देखा यह जाता है कि अंततः लड़कियों को ही अपने परिवार से वेदना अधिक मिलती है। एक तो उनके परिजन उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं और अपनी मर्जी से विवाह करने का आरोप लगाकर संपर्क नहीं रखते दूसरे पति के परिजन भी दहेज आदि न मिलने के कारण उनको बहू रूप में ऐसे स्वीकारते हैं जैसे कि मजबूरी हो। फिर परिवार आदि में खटपट तो होती है साथ ही चाहे लड़की नौकरीशुदा हो या नहीं उससे अपेक्षा यह की जाती है कि वह घर का काम करे। ऐसे में जिन लड़कियों ने प्रेम विवाह किया होते हैं उनको वही लड़के संकट देते हैं जिन्हें उन्होंने प्रेमवश सर्वस्व न्यौछावर किया होता है।
संत कवि दादू दयाल कहते हैं कि
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झूठा साचा करि लिया, विष अमृत जाना।
दुख कौ सुख सब कोइ कहै, ऐसा जगत दिवाना।। 
                 ‘‘मनुष्य को सत्य असत्य, विष अमृत और दुःख सुख की पहचान ही नहीं है। लोगों का दीवाना पन ऐसा है दुख देने वाली वस्तुओं और व्यक्तियों से सुख मिलने की आशा करते हैं।

                इस तरह दीवानापन लड़कों में भी देखा जाता है। वह लड़कियों के बाह्य रूप देखकर बहक जाते हैं पर जब घर चलाने का अवसर उपस्थित होता है तब पता चलता है कि जीवन उतना सहज नहीं है जितना उन्होंने समझा था। जिस इश्क को उर्दू शायर गाकर थकते नहीं है वही एक दिन नफरत का कारण बन जाता है। आई लव यू कहने वाले फिर आई हेट यू कहने लगते हैं।
        तत्वज्ञानियों को पता है कि यहां हर देहधारी वस्तु अंततः पुरातन अवस्था में आती है। हम अपने मुख से करेला खायें या मिठाई पेट में अंततः वह कचड़ा ही हो जाता है। हम शराब पियें या शरबत पेट में वह विषाक्त जल में परिवर्तित होता है जिसके जिसके निष्कासन पर ही हमारी देह ठंडी होती है। इस ज्ञान को बुढ़ापे में धारण करने अच्छा है कि बचपन में धारण किया जाये तभी संसार के उन संकटों से बचा जा सकता है जो अज्ञान के कारण हमारे सामने उपस्थित होते हैं। कभी कभी तो उनकी वजह से देह का नाश भी होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, December 31, 2011

दादू दयाल के दोहे-आदमी जहर को अमृत समझता है (admi jahar ko amrit samajhta hai-dadu dayal ke dohe)

          इस संसार में ऐसे ज्ञानी और ध्यानी लोगों की कमी नहीं है जो अपने सांसरिक ज्ञान को बघारते हुए नहीं थकते। इतना ही नहीं धर्म के नाम कर्मकांडों का महत्व इस तरह किया जाता है कि मानो उनको करने से स्वर्ग मिल जाता है। क्षणिक लाभ और मनोरंजन के लिये लोग अपने संबंध बनाते हैं। उनको ऐसा लगता है कि इससे उनका जीवन आराम से कट जायेगा पर इसके विपरीत ऐसे ही संबंध बाद में बोझ बन जाते हैं।
             आजकल हमारे यहां प्रेम विवाहों का प्रचलन अधिक हो गया है। देखा यह जाता है कि अंततः लड़कियों को ही अपने परिवार से वेदना अधिक मिलती है। एक तो उनके परिजन उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं और अपनी मर्जी से विवाह करने का आरोप लगाकर संपर्क नहीं रखते दूसरे पति के परिजन भी दहेज आदि न मिलने के कारण उनको बहू रूप में ऐसे स्वीकारते हैं जैसे कि मजबूरी हो। फिर परिवार आदि में खटपट तो होती है साथ ही चाहे लड़की नौकरीशुदा हो या नहीं उससे अपेक्षा यह की जाती है कि वह घर का काम करे। ऐसे में जिन लड़कियों ने प्रेम विवाह किया होते हैं उनको वही लड़के संकट देते हैं जिन्हें उन्होंने प्रेमवश सर्वस्व न्यौछावर किया होता है।
संत कवि दादू दयाल कहते हैं कि
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झूठा साचा करि लिया, विष अमृत जाना।
दुख कौ सुख सब कोइ कहै, ऐसा जगत दिवाना।। 
            ‘‘मनुष्य को सत्य असत्य, विष अमृत और दुःख सुख की पहचान ही नहीं है। लोगों का दीवाना पन ऐसा है दुख देने वाली वस्तुओं और व्यक्तियों से सुख मिलने की आशा करते हैं।
               
 
              इस तरह दीवानापन लड़कों में भी देखा जाता है। वह लड़कियों के बाह्य रूप देखकर बहक जाते हैं पर जब घर चलाने का अवसर उपस्थित होता है तब पता चलता है कि जीवन उतना सहज नहीं है जितना उन्होंने समझा था। जिस इश्क को उर्दू शायर गाकर थकते नहीं है वही एक दिन नफरत का कारण बन जाता है। आई लव यू कहने वाले फिर आई हेट यू कहने लगते हैं।
        तत्वज्ञानियों को पता है कि यहां हर देहधारी वस्तु अंततः पुरातन अवस्था में आती है। हम अपने मुख से करेला खायें या मिठाई पेट में अंततः वह कचड़ा ही हो जाता है। हम शराब पियें या शरबत पेट में वह विषाक्त जल में परिवर्तित होता है जिसके जिसके निष्कासन पर ही हमारी देह ठंडी होती है। इस ज्ञान को बुढ़ापे में धारण करने अच्छा है कि बचपन में धारण किया जाये तभी संसार के उन संकटों से बचा जा सकता है जो अज्ञान के कारण हमारे सामने उपस्थित होते हैं। कभी कभी तो उनकी वजह से देह का नाश भी होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, December 29, 2011

संत तुलसीदास के दोहे-दूसरों की निंदा करने वाला खुद निंदनीय हो जाता है (sant tulsidas ke dohe-doosron ki ninda karnre anuchit)

           सामान्य मनुष्य अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है। देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत कम होते हैं पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है। उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है।वैसे आजकल लोगों का दैनिक जीवन पहले की अपेक्षा अधिक संघर्ष के साथ बीतता है। उनके पास इस बात के लिये न समय है न इच्छा शक्ति कि वह अध्यात्मिक ज्ञान का संग्रह करें पर समाज में अपनी प्रशंसा पाने का मोह कोई नहीं छोड़ पाता। इसलिये आत्मप्रवंचना के माध्यम से जब वह न मिले तो दूसरे की निंदा कर यह बताने का प्रयास किया जाता है कि अमुक अवगुण हमारे अंदर नहीं है।
          आपसी वार्तालाप में लोग एक दूसरे से कहते हैं कि ‘‘अमुक आदमी में वह दोष है’, ‘अमुक आदमी यह बुरा काम करता है’, अमुक आदमी इस तरह का गंदा विचार पालता है’, या फिर ‘अमुक आदमी गंदा भोजन खाता है या पानी पीता है’। इस तरह आदमी यह साबित करना चाहता है कि अमुक बुराई ये वह स्वयं दोषमुक्त है। ज्ञानी आदमी अपना आत्ममंथन करता है। वह दूसरों की बजाय अपनी कमियां ढूंढकर उनको दूर करने का प्रयास करता है।
महाकवि तुलसीदास कहते हैं कि
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‘तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
         ‘‘दूसरों की निंदा कर स्वयं प्रतिष्ठा पाने का विचार ही मूर्खतापूर्ण है। दूसरे की अपकीर्ति कर अपनी कीर्ति गाने वालों के मुंह पर ऐसी कालिख लगेगी जो कितना भी धोई जाये मिट नहीं सकती।’’
तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहु गत जान।।
        ‘‘सौंदर्य, सद्गुण, धन, प्रतिष्ठा और धर्म भाव न होने पर भी जिनको अहंकार है उनका जीवन ही बिडम्बना से भरा है। उनकी गत भी बुरी होती है।
          सच बात तो यह है कि आधुनिक समय में आदमी धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल अर्जित करने के प्रयास में लगा रहता है। न उसके व्यक्तित्व में आकर्षण न व्यवहार में गुण दिखता हैं और न ही व्यसनों की वजह से प्रतिष्ठा और धन भी उसके स्थिर रहता है। इसके बावजूद अधिकतर लोगों के पास अहंकार होता है। जो लोग जुआ, शराब या यौन अपराधों में लिप्त होते हैं उनको अगर नैतिकता का उपदेश दिया जाये तो वह उत्तेजित होते हैं। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अपने में ढेर सारे दोष होने के बावजूद दूसरों की निंदा में लगकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बना देते हैं।
         ज्ञानी आदमी इन सबसे परे होकर जीवन व्यतीत करता है। उसे मालुम होता है कि गुण और ज्ञान के संचय के लिये समय कम होता है तब परनिंदा में उसे नष्ट करना बेकार है। वैसे भी कहा जाता है कि श्रेष्ठ व्यक्ति कहलाना हो तो दूसरे की निंदा करना छोड़ दें।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, December 24, 2011

संत तुलसीदास के दोहे-कमअक्ल लोग ही पाखंडियों का शिकार बनते हैं (sant tulsidas ke dohe-kamakal log pakhandiyon ka shikar hote hain)

                                 मनुष्य अपनी इंद्रियों का दास होता है। जैसे वह नचायें आदमी नाचता है। यही कारण है कि अगर सामान्य वस्तु या चेहरा भी साजसज्जा के साथ उसके सामने प्रस्तुत हो तो वह उसका शिकार हो जाता है। आधुनिक समाज में लोगों की नज़रों में सौंदर्य, चतुराई तथा बुद्धिमानी के मायने ही बदल गये हैं। रसायनिक पदार्थों से व्यक्तियों तथा वस्तुओं का सौंदर्य निखारा जा रहा है। बाज़ार के सौदागर तथा उनके प्रचारक मिलकर समाज की बुद्धि का हरण करते जा रहे हैं। किसी वस्तु के उपभोग को विज्ञापनो से प्रेरित करने के प्रयास में उनको आकर्षक शाब्दिक शोर तथा संगीत से इस तरह भरा जाता है कि उसके माध्यम से आम जनमानस का विवेक तथा बुद्धि का हरण किया जा सके। यही कारण है कि उपभोग की वस्तुओं के उपयोग को चतुराई माना जाता है। लोहे लकड़ी और प्लास्टिक की चीजों के रंगे होने से उनमें जो सौंदर्य उभरकर इस तरह आता है कि लोग उस पर मोहित हो जाते हैं।
संत कवि तुलसी दास जी कहते हैं कि
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बचन बेष क्या जानिए, मनमलीन नर नारि।
सूपनखा मृग पूतना, दस मुख प्रमुख विचारि।।
         ‘‘वाणी और वेश से किसी मन के मैले स्त्री या पुरुष को जानना संभव नहीं है। सूपनखा, मारीचि, रावण और पूतना ने सुंदर वेश धरे पर उनकी नीचत खराब ही थी।’’
मार खोज लै सौंह करि, करि मत लाज न ग्रास।
मुए नीच ते मीच बिनु, जे इन के बिस्वास।।
          ‘‘वह निबुर्द्धि मनुष्य ही कपटियों और ढोंगियों का शिकार होते हैं। ऐसे कपटी लोग शपथ लेकर मित्र बनते हैं और फिर मौका मिलते ही वार करते हैं। ऐसे लोगों भगवान का न भगवान का भय न समाज का, अतः उनसे बचना चाहिए।
          आधुनिक शिक्षा पद्धति में रचाबसा समाज आपनी बुद्धि तथा विवेक का इस्तेमाल करना फालतू तनाव मोल लेना समझता है। यही कारण है कि हमारे यहां दैहिक विकारों के साथ मानसिक रोगों का भी विस्तार हो रहा है। हम जब देश की जनंसख्या 121 करोड़ होने के दावे पर इतराते हैं तब इस बात की जानकारी एकत्रित नहीं करते कि उसमें शारीरिक तथा मानसिक विकारों से रहित कितने लोग हैं? मानसिक तथा दैहिक स्वास्थ्यय विशेषज्ञ देश में बढ़ रहे रोगियो की संख्या अब चालीस और पचास प्रतिशत से ऊपर बताने लगे हैं। इसका कारण यह है कि हम लोग अपने अध्यात्मिक दर्शन को प्राचीन मानकर उसकी अवहेलना करते हैं जबकि वह प्रकृत्ति तत्वों के सत्य पर आधारित है जो कभी नहीं बदलते भले ही हमारी नज़र में कथित रूप से जमाना बदल जाये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, December 14, 2011

तुलसी के दोहे-दूसरे को बदनाम कर अपनी तारीफ करना घटिया काम (tulsi ke dohe-doosre ki badnami aur apnee tarif karna ghatiya kam)

           सामान्य मनुष्य अपनी प्रकृतियों के वशीभूत होकर काम करता है, जबकि ज्ञानी मनुष्य उनको पहचानते हुए अपने विवेक से किसी काम को करने या न करने का निर्णय लेता है। देखा जाये तो समाज में ज्ञानी मनुष्य अत्यंत कम होते हैं पर दूसरे की अपकीर्ति के माध्यम से स्वयं की कीर्ति अपने मुख से बखान करने वालों की संख्या बहुत होती है। उससे भी अधिक संख्या तो दूसरों की निंदा करने वालों की होती है जो यह मानकर चलते हैं कि दूसरे के दोष गिनाकर हम यह साबित कर सकते हैं कि हमारे पास गुण है।
          आपसी वार्तालाप में लोग एक दूसरे से कहते हैं कि ‘‘अमुक आदमी में वह दोष है’, ‘अमुक आदमी यह बुरा काम करता है’, अमुक आदमी इस तरह का गंदा विचार पालता है’, या फिर ‘अमुक आदमी गंदा भोजन खाता है या पानी पीता है’। इस तरह आदमी यह साबित करना चाहता है कि अमुक बुराई ये वह स्वयं दोषमुक्त है। ज्ञानी आदमी अपना आत्ममंथन करता है। वह दूसरों की बजाय अपनी कमियां ढूंढकर उनको दूर करने का प्रयास करता है।
महाकवि तुलसीदास कहते हैं कि
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‘तुलसी’ जे कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।
तिनके मुंह मसि लागहैं, मिटिहि न मरिहै धोइ।।
         ‘‘दूसरों की निंदा कर स्वयं प्रतिष्ठा पाने का विचार ही मूर्खतापूर्ण है। दूसरे को बदनाम कर अपनी तारीफ गाने वालों के मुंह पर ऐसी कालिख लगेगी जिसे  कितना भी धोई जाये मिट नहीं सकती।’’
तनु गुन धन महिमा धरम, तेहि बिनु जेहि अभियान।
तुलसी जिअत बिडम्बना, परिनामहु गत जान।।
        ‘‘सौंदर्य, सद्गुण, धन, प्रतिष्ठा और धर्म भाव न होने पर भी जिनको अहंकार है उनका जीवन ही बिडम्बना से भरा है। उनकी गत भी बुरी होती है।
          सच बात तो यह है कि आधुनिक समय में आदमी धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल अर्जित करने के प्रयास में लगा रहता है। न उसके व्यक्तित्व में आकर्षण न व्यवहार में गुण दिखता हैं और न ही व्यसनों की वजह से प्रतिष्ठा और धन भी उसके स्थिर रहता है। इसके बावजूद अधिकतर लोगों के पास अहंकार होता है। जो लोग जुआ, शराब या यौन अपराधों में लिप्त होते हैं उनको अगर नैतिकता का उपदेश दिया जाये तो वह उत्तेजित होते हैं। इतना ही नहीं अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अपने में ढेर सारे दोष होने के बावजूद दूसरों की निंदा में लगकर अपनी स्थिति हास्यास्पद बना देते हैं।
ज्ञानी आदमी इन सबसे परे होकर जीवन व्यतीत करता है। उसे मालुम होता है कि गुण और ज्ञान के संचय के लिये समय कम होता है तब परनिंदा में उसे नष्ट करना बेकार है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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