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Sunday, June 23, 2013

मनु स्मृति-नियमों से अधिक यम का पालन धर्म केलिए महत्वपूर्ण (manu smriti-yan se adhik niyam dharm ke liye mahatvapoorn)




    हमारे देश में धर्म के नाम पर जितना भ्रम है अन्यत्र कहीं है।  श्रीमद्भागवत गीता में यज्ञों के दो प्रकार बताये गये हैं-एक द्रव्यमय यज्ञ दूसरा ज्ञान यज्ञ!  द्रव्यमय यज्ञ का आशय यही है कि भौतिक पदार्थों के माध्यम से परमात्मा का स्मरण किया जाये। ज्ञान यज्ञ का आशय यह है कि परमात्मा को तत्व से जानकर उसका स्मरण किया जाये।  देखा यह गया है कि हमारे देश के कथित घार्मिक ठेकेदारों ने धर्म के नाम पर अपने व्यवसाय चमकाने के लिये द्रव्यमय यज्ञ का ही प्रचार किया करते है।  स्थिति यह है कि अनेक जगह कथित रूप से ज्ञानयज्ञ भी होते हैं पर उसमें लोगों को दान दक्षिणा देकर पैसे की उगाही की जाती है। उनसे द्रव्य का दान करने के लिये कहा जाता है।  स्पष्टतः ज्ञान का यह एक तरह से व्यापार है।
      धर्म के निर्वाह के दो रूप हैं- यम और नियम।  यमों का पालन किया जाये तो धर्म स्वतः ही फल प्रदान करने लगता है।  यम में अहिंसा,सत्य अस्तेय ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह का पालन करना होता है।  यमों को धारण करना बाहर दिखता नहीं है इसलिये उसके आधार पर पाखंड करना कठिन है।  जबकि नियमों का पालन बाहर नजर आता है और उससे दूसरे की प्रशंसा पाने का मोह पूरा हो सकता है इसलिये लोग उनका पालन करते दिखना चाहते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यमान्स्सेवेत सततं न नित्यं नियमानबुधः।
यमान्यतन्यकुर्वाणो नियमान्केवलान्भजन्।।
         हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य नियमों की उपेक्षा कर यमो का पालन करना ही वास्तविक धर्म है। यमों की बजाय   जो मनुष्य  नियमों के  पालन की तरफ जो ध्यान देता है वह अधिक समय तक सफलता प्राप्त न करते हुए  शीघ्र पतन को प्राप्त होता है।
      हमारे यहां धर्म के नाम पर इधर उधर जाकर परमात्मा के विभिन्न स्वरूपों के मंदिरों पर उनके दर्शन करने की प्रवृत्ति अधिक देखी जाती है। दरअसल जिनके पास पैसा और समय होता है वह उसे व्यय करने को मार्ग ढूंढते हैं।  ऐसे लोग धर्म का मतलब नहीं जानते पर धार्मिक दिखना चाहते हैं।  इसलिये पर्यटन के नाम पर रमणीक स्थलों पर मंदिरों के दर्शन करने जाते हैं।  इनमें ऐसे भी शामिल लोग हैं जो अपने ही शहरों के मंदिरों पर जाना तो दूर घर में ही परमात्मा के स्वरूपों की मूर्तियों पर मत्था तक नहीं टेकते। मत्था टेकने की बात तो छोड़िये, अनेक लोग  मूर्ति बाज़ार से खरीदकर अपने घर की दीवार पर टांगते हैं या फिर अलमारी में रखते हैं पर फिर उसे देखते तक भी नहीं है। ऐसे लोग दूर शहरों  में मंदिरों में भगवान के दर्शन करने का दावा इस तरह करते हैं कि वह प्रथ्वी के अकेले ऐसे वासी हैं जिनको साक्षात भगवान ने दर्शन दिये।  यह धर्म के नाम पर पाखंड के अलावा कुछ नहीं है। ऐसा करके दूसरों के सामने आत्मप्रवंचना करना धर्म नहीं होता। धर्म वह विषय है जिसमें संलिप्त होने से स्वयं को प्रसन्नता का आभास हो। 

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, March 3, 2013

ऋग्वेद के आधार पर सन्देश-अपने तन का पोषण कर उसका सम्मान करें (rigved ke adhar par sandesh-apne tan ka poshan ka uska samman karen)

              हम अपनी इस देह की शक्ति के माध्यम से ही संसार को देखते, सुनते और अनुभव करते हैं।  यह सही है कि हर मनुष्य को अध्यात्मिक ज्ञान के इस सूत्र का अनुभव होना चाहिये कि हम आत्मा हैं पर साथ ही इसे धारण करने वाली देह तथा उसकी इंद्रियों पर ध्यान करना जरूरी है। हमारे अध्यात्मिक ज्ञान में योगासन, प्राणायाम और ध्यान के रूप में ऐसी विधाओं का सृजन किया गया है जिससे शरीर के साथ मन तथा बुद्धि जैसी अनियंत्रित प्रकृत्तियों को नियंत्रत कर जीवन गुजारने की सुविधा मिल जाती है।  संसार के मायावी विषयों का प्रभाव मनुष्य पर इतना बुरा पड़ता है कि उसकी बुद्धि केवल भौतिक संग्रह तक ही काम करती है। अनेक लोगों के पास तो इतना समय भी नहीं रहता कि वह अपनी देह के लिये हितकर विषय पर विचार करें।
          खाने के समय भी लोग सांसरिक विषय पर ही विचार करते हैं।  जहां चार लोग बैठकर खा रहे हों वहां बातचीत का दौर भी  चलता है।  संसार के मायावी विषयों में गहराई तक डूबे लोगों के लिये अपने पद, धन और और दैहिक शक्ति का बखान करना ही ज्ञान की परिधि में आता है और शांति से भोजन करना उनके लिये एक बेकार विषय है। हमारे अध्यात्मिक दर्शन में खाने को लेकर भी अनेक नियम हैं पर उन नियमों पर अब कोई ध्यान नहीं देता।
ऋगवेद में कहा गया है कि
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यजस्व तन्त्रं त्वस्वाम्।
हिन्दी में भावार्थ-अपने तन का भी पोषण कर उसका सत्कार करें।
     मूल बात यह है कि खाना खाते समय मन में पवित्रता होना चाहिये। भोजन को प्रसाद की तरह ग्रहण करने से वह सहजहता से पच जाता है।  खाने का मतलब केवल पेट भरना ही नहीं होता बल्कि वह प्रक्रिया भी उस देह की पूजा करना है जो परमपिता परमात्मा की कृपा से प्राप्त हुई है।  खाते समय यह अनुभूति करना चाहिये कि मुंह में जाता हुआ भोजन हमारे शरीर को एक नई ऊर्जा दे रहा है।  उससे हमारे शरीर की शिथिल इंद्रियों को राहत अनुभव हो रही है। यह संसार संकल्प का खेल है जब हम इस तरह पवित्र विचार करते हुए अपनी दैहिक क्रियाओं में लिप्त रहेंगे तो हमारे कर्मो के फल भी पवित्र होंगे।  भोजन इस तरह न करें कि वह तो मजबूरी में करना ही है वरना हमारी देह को कष्ट होगा।  हमें यह सोचते हुए खाना चाहिये कि इससे हमारी देह पुष्ट होकर सांसरिक विषयों में हमें विजय दिलायेगी।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



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