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Friday, August 9, 2013

चाणक्य नीति-श्रृंगार का प्रेमी कभी अकाम नहीं हो सकता (chankya neeti darshan-shringar ka premi kabhee akam nahin ho sakta)




        महान भारतीय विद्वान चाणक्य को आज भी विश्व का महान दार्शनिक माना जाता है। हमारे यहां राजनीति शास्त्र का उनको एक तरह से  जनक माना जाता है। जब हम राजनीति की बात करते हैं तो यकीनन उसमें सक्रिय भूमिका राजसी भाव से राजसी कर्म के साथ ही निभाई जा सकती है। महान विशारद चाणक्य के संदेशों में जीवन रहस्यों का सार है। व्यक्ति कोई भी हो-योगी, सात्विक और राजस-उसे चाणक्य नीति का ज्ञान हो तो कहना ही क्या? दरअसल हमारे यहां अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को अपनाया गया है जिसमें केवल राजसी विषयों का अध्ययन ही किया जाता है। नैतिक शिक्षा के नाम पर भी अंग्रेजी उद्धरणों का सहारा ही लिया जाता है।  इस पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय अध्यात्म दर्शन के विषय को बाहर रखा गया है। सच बात यह है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन किसी एक देवता या भगवान की पूजा पद्धति की बात नहीं करता। उसमें साकार तथा  निरंकार का दोनों में किसी का भी  स्मरण करना श्रेष्ठ विचार माना गया है। उसमें जीवन रहस्य के साथ ही सांसरिक विषयों की पहचान भी बतायी गयी है।  मनुष्य की मनस्थिति कब किस प्रकार की होगी यह मनोविज्ञान का विषय है पर भारतीय दर्शन इसे अलग से अध्ययन करने का विचार नहीं देता बल्कि वह सामान्य जीवन के भाग के रूप में इसे देखता है। श्रीमद्भागवत गीता में यह माना गया है कि मनुष्य तीन प्रकार का-सात्विक, राजस तथा तामस-होता है।  अगर कोई  योग का अभ्यास करे तो वह इन तीनों से प्रथक एक अलग प्रकार का जीव योगी  हो जाता है। एक मनुष्य अलग अलग मनस्थिति से गुजर सकता है तो वह प्रथक प्रथक समय सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृतियों के वशीभूत होने से वैसे  कर्म भी कर सकता है। श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान तथा विज्ञान के संदेशोें से भरा एक महान ग्रंथ है।  यह अलग बात है कि उसे केवल भारतीय धर्मों से जुड़ा मानकर शिक्षा के विषयों से दूर रखा जाता है। इसका कारण देश का राजनीतिक रूप से धर्मनिरपेक्ष होने विचार कम, लोगों में अज्ञान का अंधेरा रहे और उन्हें रौशनी के रूप में सपने, वादे और दावे बेचे जा सके, यह नीति अधिक जिम्मेदार है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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निःस्पमृहो नाऽअधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः।।
      हिन्दी में भावार्थ-कोई भी अधिकार संपन्न आकांक्षा रहित, श्रृंगार का प्रेमी अकाम, मूर्ख मधुर वचन बोलने वाला तथा स्पष्टवादी कभी धोखेबाज नहीं होता।
 
       यही कारण है कि आजकल लोग व्यवहार में धोखे का शिकार हो रहे हैं। खासतौर से युवक युवतियों के बीच अज्ञानता की प्रवृत्ति अधिक देखी जा रही है।  सहशिक्षा ने युवक युवतियों के बीच कथित मित्रता या प्रेम संबंधों को प्रोत्साहन दिया है। उर्दू शायर कर लड़कियों को लड़के प्रभावित करते हैं। लड़कियां यह समझती हैं कि उनका मित्र या प्रेमी उनसे निष्काम प्रेम कर रहा है। जब उन्हें धोखे, आक्रमण या अपराध का शिकार होना पड़ता है तब सच्चाई का पता चलता है। लैला मजनूं, शीरी फरहद, रोमियो जूलियट और ससी पुनू के किस्से अक्सर पत्रिकाओं प्रकाशित होते है।  स्थिति यह है कि कामना और वासनामय आकर्षण को हमारे प्रचार माध्यम प्यार, इश्क, लव और प्रेम बताकर प्रचार करते हैं।
    हमारा अध्यात्म दर्शन कहता है कि साकार या निराकार परमात्म के अलावा किसी अन्य नश्वर वस्तु या व्यक्ति से प्रेम हो ही नहीं सकता।  प्रेम निष्काम होना चाहिये पर कामनामय प्रेमी कभी ऐसा नहीं करता।  वह तो श्रृंगार के आकर्षण का शिकार होता है। उसी तरह रिश्त नातों में पारंपरिक अधिकार की बात आती है।  तय बात है कि जब कोई व्यक्ति दूसरे के समक्ष  रिश्ते में अपना अधिकार मानता है उससे  त्याग की आशा करना व्यर्थ है।  मूर्ख से मधुर वचन की आशा लगभग मूर्खतापूर्ण बात ही है।  जो लोग स्पष्ट बात कहते हैं वह कभी धोखेबाज नहीं होते यह अलग बात है उनकी बातें सुनने में बुरी जरूर लगती हैं।
      जीवन में हर आदमी को सतर्क तथा व्यवहारकुशल होना चाहिये पर यह तभी संभव है जब कोई भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करे। उसमें व्यक्ति, विषय तथा वस्तुओं के व्यवहार के साथ ही उनकी उपयोगिता का भी रूप बताया गया है। भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन कर उनका ज्ञान धारण करने पर जीवन में हर पल सहजता का अनुभव होता है तथा प्यार, पैसा तथा प्रतिष्ठा के विषय में कभी कोई धोखा नहीं खा सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


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