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Sunday, September 21, 2014

ग्रंथों के सतत अध्ययन से भी ज्ञान और विज्ञान में पारंगत होना संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(granthon ke satat adhyayan se bhi gyan aur vigyan mein paarangat hona sambhav-hindi chinttan)



            भारत में यह प्रकृति की कृपा कहें या प्राचीन ऋषियों, मुनियों तथा तपस्वियों का प्रभाव कि हमारे यहां  लोग स्वाभाविक रूप से धर्मभीरु होते हैं।  हम लोग  संसार के दृश्यव्य विषयों में लिप्त जितना होते हैं उतनी ही हमारी रुचि अध्यात्म के अदृश्यव्य तत्वों में भी रहती है।  यही कारण है कि हमारे यहां बरसों से ही प्रवचन, सत्संग और परमात्मा की एकांत साधना की परंपरा रही है।  यह अलग बात है कि लोगों को धार्मिक शिक्षा की व्यवसायीकरण आधुनिक शिक्षा की तरह सदियों पहले ही हो गया है पर इसका आभास लोग सहजता से नहीं करते।  जहां अनेक निष्काम योगियों, साधुओं और संतों भारतीय अध्यात्म दर्शन का रथ अपने तप से खींचा वही अनेक कामनावान विद्वानों ने आमजन से दक्षिणा के नाम पर पैसा कमाने तथा समाज में अपनी प्रभावी छवि बनाये रखने के लिये धर्म प्रचार का व्यवसाय अपनाया।  यह अलग बात है कि वह निष्काम और सन्यासी होने का दावा करते रहे हैं पर उनके रहन सहन और चाल चलने से यह स्पष्ट होता रहा है कि वह वास्तव में वैसे त्यागी हैं नहीं जैसा दावा करते हैं।
            यही कारण है कि आजकल अनेक धर्मभीरु लोग सच्चे गुरु की तलाश में रहते हैं। अनेक लोग प्रश्न करते हैं कि सच्चा गुरु ढूंढना मुश्किल हो गया है तो कैसे अध्यात्म ज्ञान कहां से प्राप्त करें? पाखंड गुरु से प्राप्त ज्ञान गेय नहीं हो पता। इस समस्या के कारण अनेक लोगों की ज्ञान पिपासा शांत नहीं हो पाती।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथायथा हि पुरुषः शास्त्रंसमधिगच्छति।
तथा विजानाति विज्ञानं चास्य रोचते।
            हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य निरंतर शास्त्रों का अभ्यास करता है वह अंततः ज्ञान और विज्ञान में दक्षता प्राप्त ही कर लेता है। सतत अध्ययन से उसकी रुचि ज्ञान और विज्ञान में बढ़ती जाती है।
            हमारा मानना है कि इसके दो ही उपाय हैं। एक तो यह कि इन्हीं पेशेवर रट्टा लगाने वाले गुरुओं से प्रवचन सुने पर उनके पास जाकर उनकी निजी गतिविधियों पर ध्यान न लगायें।  उनके आश्रम या दरबार में जो स्थान हो उसके सामने ही बैठे, सत्संग सुने और ध्यान लगायें फिर वहां से चले आयें।  दरबार के पीछे या गुरु के अंतपुर में कभी न जायें। सीधी बात कहें तो पर्दे पर देखें उसके पीछे क्या इसमें दिलचस्पी न लें।  अगर वह आपने कोई अनैतिक या असहनीय विषय देखा तो आपका मन खराब होगा।  मन में कुविचार आने से अपनी ही हानि होती है। यह संसार संकल्प के आधार पर ही निर्मित होता है।  इसलिये अपने ंसकल्प में शुद्ध विषयों का संग्रह करें। जिस तरह अर्थ संग्रह की सीमा रखना चाहिये उसी तरह धर्म संग्रह में यही नियम लागू होता है। गुरु से शिक्षा प्राप्त करनें उसके आश्रम या दरबार में चिपक कर न रह जायें।
            दूसरा उपाय यह कि अपने ही प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करें। पेशेवर गुरु यह प्रचारित जरूर करते हैं कि इस संसार में उद्धार के लिये किसी दैहिक गुरु होना चाहिये पर महान धनुर्धर एकलव्य ने हमें इस बंधने से भी मुक्त कर दिया है कि गुरु हमेशा सामने बैठा रहे।  अनेक महान लोगों ने ग्रंथों को अपना गुरु बनाया और महान ज्ञान अर्जित किया।  इसलिये नियमित रूप से अध्ययन करें तो भी ज्ञान और विज्ञान विषय स्वतः आत्मसात हो जाता है। इसलिये दैहिक गुरु होने पर अधिक चिंता नहीं करना चाहिये।

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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, September 15, 2013

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन-बालक यदि अनाचार होतो उसे भी कड़ा दंड देना चाहिये( thought article based on manu smriti-balak yadi anachari ho to use bhee kada dan dena chahiye)




                        हमारे देश में यह देखा गया है कि अनेक नाबालिग युवक बलात्कार और हत्या के आरोप में लिप्त पाये जा रहे हैं।  हमारे देश में किशोर अपराधियों के लिये अलग से कानून है पर उसकी व्याख्या अनेक आम लोगों की समझ में नहीं आती। क्या किसी युवक की आयु अट्ठारह वर्ष से तीन, चार, या छह माह से कम हो तो उसका अपराध इसलिये कम हो जाता है कि वह बालिग नहीं है। प्रकृति का ऐसा कौनसा नियम है कि अट्ठारह वर्ष होने पर व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान हो जाता है, अगर उसकी यह आयु एक महीने या पंद्रह दिन भी कम हो तो इसका मतलब यह है कि वह पूर्ण ज्ञानी नहीं है। हास्यास्पद तो बात तब होगी जब किसी ने बालिग होने के एक दिन पहले अपराध किया हो और उस पर किशोरो के अपराध वाले कानून के तहत मुकदमा चले। दूसरी बात यह है कि बुद्धि का कौनसा पैमाना है कि यह मान लिया जाये कि मनुष्य सोलह वर्ष की आयु में कम ज्ञानी और अट्ठारह वर्ष होने पूर्ण ज्ञानी हो जाता है।
                        अभी एक मामला सामने आया जिसमें एक सामूहिक बलात्कार तथा हत्या के आरोप में एक नाबालिग होने के बात सामने आयी।  हैरानी की बात यह है कि इसी नाबालिग ने ही सबसे बड़ा अपराध में बढ़चढ़कर भाग लिया था पर उसे किशोर न्याय के नियमों के अनुसार हल्की सजा दी गयी।  उसके सहअपराधियों ने स्पष्ट किया कि हमें उकसाने तथा सर्वाधिक अपराध करने में उसी का हाथ है।  जब मामला सामने आया तो पता नहीं जांच एजेंसियां उम्र का विषय क्यों लेकर बैठ गयीं? दूसरी बात यह कि उसकी आयु की जांच स्वास्थ्य विशेषज्ञों से ही कराने की बात कही गयी, पर पता नहीं वह हुई कि नहीं- कहीं पढ़ा या सुना था बाद में इस बारे में कोई खबर नहीं मिली।  हमारा मानना है कि इस प्रकरण को मनोवैज्ञानिकों के पास भी भेजा जाये। वही जांच करें कि उस कथित नाबालिग की बौद्धिक आयु क्या है? जिन लोगों का जांच और अभियोजन काम काम है उन्हें मनोविज्ञानिक आधार भी लेना चाहिये।  यह कानून में नहीं लिखा है पर यह भी कहां लिखा है कि अपराध जघन्य होने पर बौद्धिक आयु का परीक्षण नहीं होगा अथवा अपराध की प्रकृत्ति देखकर यह निर्णय नहीं होगा कि यह अपराध करना ही बालिग होने का प्रमाण है। खासतौर से तब जब नाबालिग अपराधी पर पहले भी अपराधिक प्रकरण दर्ज होने की बात सामने आती हो-यह भी कहीं हमने पढ़ा या सुना था।  एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक होने के आधार पर हमारी यह राय है कि अपराध की प्रकृत्ति देखा जाना चाहिये।  अगर दिन या माह की कमी से अपराध की प्रकृत्ति करे कम माना जायेगा तो न्याय में विसंगतियां अवश्य आयेंगी।
मनुस्मति में कहा गया है कि
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गुरुं वा बालबुद्धौ वा ब्राह्म्ण वा बहुतश्रुतम।
अतितायिनमायांन्तं हन्यादेवाविचारवन्।।
हिन्दी में भावार्थ-यदि गुरु, बालक, वृद्ध या विद्वान या बहुचर्चित मनुष्य अत्याचारी हो तो उसे मृत्युदंड दिया जाना चाहिये।     
परस्य पत्न्या पुरुषः सम्भाषां योजयन् रहः।
पूर्वामाक्षारितो दोषैः प्राप्नुयात्पूर्वसाहसम्।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य पहले से ही कुख्यात हो और परायी स्त्री से अकेेले में मिलने का प्रयास करता हो उसे भी कड़ा दंड देना चाहिये।
                        हमारे देश में पश्चिमी सभ्यता के अनुसार कानून बनते हैं। इतना ही नहीं जघन्य अपराधियों के लिये मानव अधिकारों जैसे प्रश्न उठाये जाते हैं।  यह माना जाता है कि सभी मनुष्य दैवीय प्रकृत्ति के हैं और अगर किसी से गलती हो जाये तो उसे सुधारा जा सकता है। इसके विपरीत हमारा अध्यात्मिक दर्शन मानता है कि आसुरी प्रकृत्ति के लोगों को कभी सुधारा नहीं जा सकता। भारतीय क्षेत्र की प्रकृत्ति ऐसी है कि यहां यदि आदमी दैवीय प्रकृत्ति  का है तो वह छोटे अपराध करने से भी डरता है और आसुरी है तो सिवाय अपराध के उसे कुछ नहीं सूझता।  यही कारण है कि मनुस्मृति में अपराधों के लिये कड़े दंड का प्रावधान किया गया है। दूसरी बात यह भी है कि अपराध और अत्याचार में अंतर होता है। अपराध हो तो किसी नाबालिग  पर पश्चिमी आधार पर बने कानून के अनुसार मामला चले हम इसका प्रतिवाद नहीं करते पर जब अत्याचार का मामला हो तब कम से कम हमने अध्यात्मिक दर्शन के आधार पर इसका समर्थन करना थोड़ अजीब लगता है।  हमारा यह तो मानना है कि बालिग की आयु अट्ठारह वर्ष ही रहे। किशोर कानून भी बना है तो बुरी बात नहीं है पर जघन्य अपराध के समय इस विषय की अनदेखी करते हुए अपराधियों को न्यायालय के समक्ष पेश करना चाहिये।  हमारे देश के न्यायाधीशों में इतनी विद्वता है कि वह इस बात को समझेंगे मगर उनके सामने अभियोजन पक्ष को ही मामला लाना होता है वह स्वयं कोई ऐसा आदेश नहीं दे सकते।  अगर देंगे तो तमाम तरह के विवाद खड़े कर न्यायालयों पर टिप्पणियां करने वाले कथित मानवाधिकार कार्यकर्ता भी इस देश में कम नहीं है। इन कार्यकर्ताओं का मुख्य लक्ष्य चर्चित मामलों में अपनी टांग फंसाकर प्रचार पाना होता है। यही कार्यकर्ता मनुस्मृति को भी अप्रासंगिक मानते हैं क्योंकि उनको अपने प्रसंगों के माध्यमों से प्रचार तथा लोकप्रियता मिलती है।          

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, September 8, 2013

विदुर नीति-पुरूष में शील प्रधान होता है(vidur neeti-purush mein sheel pradhan hota hai)



       अगर हम आज देश के हालात देखें तो भारी निराशा हाथ लगती है।  सभी लोग देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, महंगाई तथा अपराध कम  के लिये कमर कसने की बात तो करते हैं पर फिर भी कोई बड़ा अभियान इसके लिये छेड़ा नहीं जा पाता।   विगत समय में एक भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन हुआ था पर उसकी परिणति अत्यंत निराशाजनक ढंग से हुई।  इसका कारण यह है कि हमारा देश अब सामाजिक रूप से शक्तिशाली नहीं रहा।  समस्त प्राचीन सामाजिक संस्थायें ध्वस्त हो गयी हैं।  जो बची हैं वह निष्काम रहने की बजाय अपने साथ आर्थिक, राजनीतिक तथा प्रचार करने की कामना के साथ कार्यरत हैं।  ईमानदारी की बात यह है कि समाज, अर्थ, कला साहित्य, पत्रकारिता, राजनीति, फिल्म और धर्म के क्षेत्रों में शिखर पर बैठे लोगों ने कांच के महल बना लिये हैं और इसलिये कोई किसी पर पत्थर फैंकने का सामर्थ्य नहीं रखते।
            हमारे देश में अनेक विद्वान क्रांति की बातें करते हैं। समाज में बदलाव का नारा लगाते हुए थकते नहीं है। विचारधाराओं में बंटे यह विद्वान समाज को बदल तो नहीं पाये पर उसे तोड़ डालने में सफल हो गये हैं। आज स्थिति यह है कि नैतिकता, पवित्रता, विचारशीलता तथा कार्यक्षमता के आधार पर हमार समाज का आधार अत्यंत  कमजोर हो गय गया है। जब किसी शिखर पुरुष के निजी आचरण की बात होती है तो हमारे देश के  बौद्धिक वर्ग के लेाग उसके सार्वजनिक जीवन की प्रशंसा तो करना चाहते हैं पर निजी आचरण पर चर्चा करने से बचते है क्योंकि देखा यह जा रहा है कि बहुत कम ऐसे बड़े लोग हैं जिनका निजी चरित्र बेदाग हैं। इतना ही नहीं हमारे देश के कुछ सामाजिक विद्वान तो यह मानते हैं कि लड़की का चरित्र मिट्टी के बर्तन की तरह है एक बार टूटा तो फिर उसके जीवन का आधार कमजोर हेाता है जबकि लड़के का चरित्र पीतल के बर्तन की तरह जो गंदा होने या टूटने पर फिर से संवर सकता है।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन इसे स्वीकार नहंी करता।

विदुर नीति में कहा गया है कि
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शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः।।
                        हिन्दी में भावार्थ-किसी पुरुष में उसका शील ही प्रधान होता है। वह नष्ट हो तो फिर पुरुष का जीवन, धन और बंधुओं से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
आत्मानमेव प्रथमं द्वेष्यरूपेण बीजायेत्।
ततोऽमात्यानमित्रांश्च न मोघं विजिगीषते।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य इंद्रियों के साथ ही मन को भी शत्रु मानकर जीत लेता है वही बाहरी शत्रुओं को जीतने में सफलता प्राप्त कर सकता है।

                        हमारे दर्शन के अनुसार जिस पुरुष का चरित्र शुद्ध है वही पवित्र विचार रखने के साथ ही अनैतिकता से लड़ने का सामर्थ्य रखता है।  जिसका चरित्र कमजोर है उसे स्वयं का पता होता है इसलिये वह कभी किसी अस्वच्छ चरित्र, अपवित्र विचारवान तथा अधर्म के लिये तत्पर दुष्टों से लड़ने का साहस नहीं दिखाते।  इतना ही नहीं अब तो यह भी देखा गया है कि दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को समाज के कथित शिखर पुरुष अपनी स्वच्छ छवि के पीछे छिपाते हैं। अनेक लोगों को तो इसके विपरीत कहना है कि समाज के शिखरों पर कथित रूप से स्वच्छ छवि वाले चेहरे लाने वाले वही लोेग हैं जिनको अपने चरित्र पर लगे दागों की वजह से प्रतिष्ठा वाले शिखर पदों पर बैठना संभव नहीं लगता।  स्थिति यह है कि अर्थ, धर्म, कला, साहित्य, फिल्म तथा धर्म के क्षेत्र के शिखरों पर बैठे लोग दुष्टों को संरक्षण देने या उनसे पाने के लिये लालायति रहते हैं।  यही कारण है कि हमारे देश में अब विश्वास का संकट पैदा हो गया है। किस पर यकीन करें या नहीं लोग अब इस बात को  लेकर द्वंद्व में रहने लगे हैं।  प्रचार माध्यमों में हमारे अनेक प्रकार के शत्रु बताये जाते हैं पर सच यह है कि हमारा सबसे बड़ा शत्रु हमारे चरित्र का ही संकट है।  हम देश की विश्व में प्रतिष्ठा भी देखना चाहते हैं और विदेशीमुद्रा पर आश्रित हैं। हमारा देश भारी कर्ज के साथ सांस ले रहा है।
      हमारे देश में अध्यात्म के नाम पर मनोरंजन बिकता है इसलिये उसके वास्तविक संदेशों का ज्ञान किसी को नहीं है। सच बात तो यह है कि हमें अपने अध्यात्मिक दर्शन के साथ जुड़े रहें और इस बात पर विचार न करें कि हमारा समाज किधर जा रहा है बल्कि हम यह तय करें कि हमें कहां जाना है?

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Friday, August 9, 2013

चाणक्य नीति-श्रृंगार का प्रेमी कभी अकाम नहीं हो सकता (chankya neeti darshan-shringar ka premi kabhee akam nahin ho sakta)




        महान भारतीय विद्वान चाणक्य को आज भी विश्व का महान दार्शनिक माना जाता है। हमारे यहां राजनीति शास्त्र का उनको एक तरह से  जनक माना जाता है। जब हम राजनीति की बात करते हैं तो यकीनन उसमें सक्रिय भूमिका राजसी भाव से राजसी कर्म के साथ ही निभाई जा सकती है। महान विशारद चाणक्य के संदेशों में जीवन रहस्यों का सार है। व्यक्ति कोई भी हो-योगी, सात्विक और राजस-उसे चाणक्य नीति का ज्ञान हो तो कहना ही क्या? दरअसल हमारे यहां अंग्रेजी शिक्षा पद्धति को अपनाया गया है जिसमें केवल राजसी विषयों का अध्ययन ही किया जाता है। नैतिक शिक्षा के नाम पर भी अंग्रेजी उद्धरणों का सहारा ही लिया जाता है।  इस पर धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय अध्यात्म दर्शन के विषय को बाहर रखा गया है। सच बात यह है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन किसी एक देवता या भगवान की पूजा पद्धति की बात नहीं करता। उसमें साकार तथा  निरंकार का दोनों में किसी का भी  स्मरण करना श्रेष्ठ विचार माना गया है। उसमें जीवन रहस्य के साथ ही सांसरिक विषयों की पहचान भी बतायी गयी है।  मनुष्य की मनस्थिति कब किस प्रकार की होगी यह मनोविज्ञान का विषय है पर भारतीय दर्शन इसे अलग से अध्ययन करने का विचार नहीं देता बल्कि वह सामान्य जीवन के भाग के रूप में इसे देखता है। श्रीमद्भागवत गीता में यह माना गया है कि मनुष्य तीन प्रकार का-सात्विक, राजस तथा तामस-होता है।  अगर कोई  योग का अभ्यास करे तो वह इन तीनों से प्रथक एक अलग प्रकार का जीव योगी  हो जाता है। एक मनुष्य अलग अलग मनस्थिति से गुजर सकता है तो वह प्रथक प्रथक समय सात्विक, राजस तथा तामस प्रकृतियों के वशीभूत होने से वैसे  कर्म भी कर सकता है। श्रीमद्भागवत गीता ज्ञान तथा विज्ञान के संदेशोें से भरा एक महान ग्रंथ है।  यह अलग बात है कि उसे केवल भारतीय धर्मों से जुड़ा मानकर शिक्षा के विषयों से दूर रखा जाता है। इसका कारण देश का राजनीतिक रूप से धर्मनिरपेक्ष होने विचार कम, लोगों में अज्ञान का अंधेरा रहे और उन्हें रौशनी के रूप में सपने, वादे और दावे बेचे जा सके, यह नीति अधिक जिम्मेदार है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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निःस्पमृहो नाऽअधिकारी स्यान्नाकामी मण्डनप्रियः।
नाऽविदग्धः प्रियं ब्रूयात् स्पष्टवक्ता न वञ्चकः।।
      हिन्दी में भावार्थ-कोई भी अधिकार संपन्न आकांक्षा रहित, श्रृंगार का प्रेमी अकाम, मूर्ख मधुर वचन बोलने वाला तथा स्पष्टवादी कभी धोखेबाज नहीं होता।
 
       यही कारण है कि आजकल लोग व्यवहार में धोखे का शिकार हो रहे हैं। खासतौर से युवक युवतियों के बीच अज्ञानता की प्रवृत्ति अधिक देखी जा रही है।  सहशिक्षा ने युवक युवतियों के बीच कथित मित्रता या प्रेम संबंधों को प्रोत्साहन दिया है। उर्दू शायर कर लड़कियों को लड़के प्रभावित करते हैं। लड़कियां यह समझती हैं कि उनका मित्र या प्रेमी उनसे निष्काम प्रेम कर रहा है। जब उन्हें धोखे, आक्रमण या अपराध का शिकार होना पड़ता है तब सच्चाई का पता चलता है। लैला मजनूं, शीरी फरहद, रोमियो जूलियट और ससी पुनू के किस्से अक्सर पत्रिकाओं प्रकाशित होते है।  स्थिति यह है कि कामना और वासनामय आकर्षण को हमारे प्रचार माध्यम प्यार, इश्क, लव और प्रेम बताकर प्रचार करते हैं।
    हमारा अध्यात्म दर्शन कहता है कि साकार या निराकार परमात्म के अलावा किसी अन्य नश्वर वस्तु या व्यक्ति से प्रेम हो ही नहीं सकता।  प्रेम निष्काम होना चाहिये पर कामनामय प्रेमी कभी ऐसा नहीं करता।  वह तो श्रृंगार के आकर्षण का शिकार होता है। उसी तरह रिश्त नातों में पारंपरिक अधिकार की बात आती है।  तय बात है कि जब कोई व्यक्ति दूसरे के समक्ष  रिश्ते में अपना अधिकार मानता है उससे  त्याग की आशा करना व्यर्थ है।  मूर्ख से मधुर वचन की आशा लगभग मूर्खतापूर्ण बात ही है।  जो लोग स्पष्ट बात कहते हैं वह कभी धोखेबाज नहीं होते यह अलग बात है उनकी बातें सुनने में बुरी जरूर लगती हैं।
      जीवन में हर आदमी को सतर्क तथा व्यवहारकुशल होना चाहिये पर यह तभी संभव है जब कोई भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करे। उसमें व्यक्ति, विषय तथा वस्तुओं के व्यवहार के साथ ही उनकी उपयोगिता का भी रूप बताया गया है। भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन कर उनका ज्ञान धारण करने पर जीवन में हर पल सहजता का अनुभव होता है तथा प्यार, पैसा तथा प्रतिष्ठा के विषय में कभी कोई धोखा नहीं खा सकता।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, August 3, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-दूषित अन्न की पहचान आवश्यक (katilya ka arthshastra-dushti anna ki pahachan awashyak)




             आजकल खाने पीने की वस्तुओं में मिलावट अधिक हो गयी है। स्थिति यह है कि अनेक धूर्त लोग खाने के सामान अभक्ष्य तथा अपच सामान मिलाकर बेचते हैं।  उससे भी अधिक दृष्ट लोग हैं जो यह जानते हुए कि उनकी सामग्री विषाक्त है वह उसे खाने पीने के लिये ग्राहक या प्रयोक्त को बेचते हैं। अभी हाल ही में बिहार में मध्यान्ह भोजन खाकर अनेक छात्रों की मृत्यु हो गयी थी। इतना ही प्रचार माध्यमों-समाचार पत्रों तथा टीवी चैनलों-में ऐसे समाचार लगातार आते रहे हैं कि मध्यान्ह भोजन में खराब या विषाक्त खाना परसो जा रहा है।  प्रचार माध्यमों का यह प्रयास प्रशंसनीय है पर यह कहना पड़ता है कि उनका ध्यान देर से गया है। देश में सरकारी तथा गैर सरकारी कार्यक्रमों में गरीबों को खाना खिलाने के नाम पर जिस तरह की खुले में व्यवस्था होती है उसमें ऐसी ढेर सारी शिकायते पहले से ही रही हैं पर उन पर बिहार की घटना से पहले ध्यान नहंी दिया गया।  बहरहाल अब स्थिति यह है कि हम हर जगह इस यकीन के साथ भोजन नहीं कर सकते कि वह स्वच्छ है।  सामान्य लोगों को भोजन के दूषित होने की जानकारी सहजता से नहीं रहती जबकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन इस विषय में अनेक प्रमाण दिये गये हैं।

कौटिल्य के अर्थशासत्र में बताया गया है कि
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भोज्यमन्नम् परीक्षार्थ प्रदद्यात्पूर्दमग्नये।
वयोभ्यश्व तत दद्मातत्र लिङ्गानि लक्षयेत्।।
       हिन्दी में भावार्थ-भोजन योग्य अन्न की परीक्षा करने के लिये  पहले अग्नि को दें और फिर पक्षियों को देकर उनकी चेष्टा का अध्ययन किया जा सकता है।
धूमार्चिर्नीलता वह्नेः शब्दफोटश्व जायते।
अन्नेन विषदिग्धेन वयसां मरणभवेत्।।
        हिन्दी में भावार्थ-यदि अग्नि से नीला धुआं निकले और फूटने के समान शब्द हो, अथवा पक्षी खाने के बाद मर जाये तो मानना चाहिये कि वह अन्न विषैला है।
अस्विन्नता मादकत्यमाशु शल्यं विवर्णता।
अन्नस्य विषदिगधस्य तथाष्मा स्निगधमेचकः।।
                 हिन्दी में भावार्थ-विष मिला हुआ भोजन आवश्यकता से अधिक गर्म तथा चिकना होता है।
व्यञ्जनस्याशु शुष्कत्वं क्वथने श्यामफेनता।
गंधस्पर्शरसाश्वव नश्यन्ति विषदूषाणात्।।
    हिन्दी में भावार्थ-बने हुए व्यंजन का जल्दी सुखता है। पकाते समय काला फेल उठना  विष दूषित अन्न के ही लक्षण है।

           बिहार के विद्यालय में विषाक्त अन्न परोसने की जो घटना हुआ थी उसमें खाना पकाने वाली महिला ने वहां की प्राचार्या को पकाते समय ही तेल या अन्न के विषाक्त होने की बात कही थी पर उसने ध्यान नहंी दिया।  गरीब महिला ने खाना पकाया और स्वय तथा वहां उपस्थित अपने तीन बच्चों को भी खिलाया। परिणाम यह हुआ कि यहाँ ं उसके मृत 22 बच्चों में उसके दो बच्चे भी थे। तीसरा बीमार हुआ और वह स्वयं भी बुरी तरह बीमार हुई।  रसोई बनाने वाली महिला संभवतः अधिक शिक्षित नहीं थी पर ग्रंामीण परिवेश की होने के कारण उसे भोजन के विषाक्त होने का संदेंह हो हुआ पर महिला प्राचार्य ने उसकी बात को नज़रअंदाज कर दिया गया । दरअसल देखा जाये तो भारतीय अध्यात्म में वर्णित सूत्रों की जानकारी जितनी ग्रामीण लोग रखते हैं उतनी शहरी क्षेत्र में अंग्र्रेजी शिक्षा पद्धति से ज्ञान संपन्न लोगों को नहीं रहती शायद यही कारण है कि उससे अधिक शिक्षित प्राचार्या ध्यान नहीं दे पायी।
     हम अक्सर कहा करते हैं कि गांवों में अशिक्षित लोग रहते हैं पर सच यह है कि भारतीय अध्यात्म से वह गहराई से जुड़े रहते हैं कि वह शहरी लोगों से अधिक ज्ञानी होते हैं।  इसके विपरीत शहरी क्षेत्रों में रहने वाले लोग शिक्षित जरूर होते हैं पर ज्ञानी नहीं होते।  कोई बीमारी हो तो शहरी लोग आधुनिक चिकित्सा पद्धति की तरफ भागते हैं जबकि ग्रमीण परिवेश के लोग अचूक देशी नुस्खे आजमाते हैं और कभी दूसरों का भी सुझाते हैं।  देखा जाये तो शहरी लोगों में बीमारी का अनुपात अधिक ही रहता है। दूसरी बात यह भी है कि शहरी क्षेत्रों में दूषित और विषाक्त पदार्थ अधिक बिकते हैं क्योंकि वहां के लोगों को उसकी पहचान नहीं है।  अतः शहरी क्षेत्रों में ही दूषित तथा पवित्र खाद्य पदार्थै के प्रति चेतना लाने का प्रयास करना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, June 2, 2013

संत कबीर के दोहे-धनी गुरु को चेलों से खतरा रहता है (sant kabir ke dohe-amir guru ko chelon se khatra rahta hai)



          अगर देखा जाये तो पैसे की औकात केवल जेब तक ही रहती है जबकि अज्ञानी लोग इसे सदैव अपने सिर पर धारण किए रहती है।। वह बात-बात में अपने धनी होने का प्रमाणपत्र लेकर आ जाते हैं। अपनी तमाम प्रकार डींगें  हांकते है। परमार्थ से तो उनका दूर  दूर तक नाता नहीं होता। जो लोग ज्ञानी हैं वह जेब मैं पैसा है यह बात अपने दिमाग में लेकर नहीं घूमते। आवश्यकतानुसार उसमें से पैसा खर्च करते हैं पर उसकी चर्चा अधिक नहीं करते। आजकल जिसके भी घर जाओं वह अपने घर के फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, वीडियो और कंप्यूटर दिखाकर उनका मूल्य बताना नही भूलता और इस तरह प्रदर्शन करता है जैसे कि केवल उसी के पास है अन्य किसी के पास नहीं। कहने का अभिप्राय है कि लोगों के सिर पर माया अपना प्रभाव इस कदर जमाये हुए है कि उनको केवल अपनी भौतिक उपलब्धि ही दिखती है।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि
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माया दासी संत की साकट की शिर ताज
साकुट की सिर मानिनी, संतो सहेली लाज
               सामान्य हिंदी भाषा में भावार्थ- माया तो संतों के लिए दासी की तरह होती है पर अज्ञानियों का ताज बन जाती है। अज्ञानी लोग का माया संचालन करती है जबकि संतों के सामने उसका भाव विनम्र होता है।
गुरू का चेला बीष दे, जो गांठी होय दाम
पूत पिता को मारसी, ये माया के काम
                    सामान्य हिंदी भाषा में भावार्थ- शिष्य अगर गुरू के पास अधिक संपत्ति देखते हैं तो उसे विष देकर मार डालते है। और पुत्र पिता की हत्या तक कर देता है।

         सामूहिक स्थानों पर लोग आपस में बैठकर अपने धन और आर्थिक उपलब्धियों पर ही चर्चा करते हैं। अगर कोई गौर करे और सही विश्लेषण करे तो लोग नब्बे फीसदी से अधिक केवल पैसे के मामलों पर ही चर्चा करते हैं। अध्यात्म चर्चा और सत्संग तो लोगों के लिए फ़ालतू का विषय  है । इसके विपरीत जो ज्ञानी और सत्संगी हैं वह कभी भी अपनी आर्थिक और भौतिक उपलब्धियों पर अहंकार नहीं करते। न ही अपने अमीर होने का अहसास सभी को कराते हैं।
                वैसे जिस तरह आजकल धार्मिक संस्थानों में संपतियों को लेकर विवाद  और मारामारी मची है उसे देखते हुए यह आश्चर्य ही मानना चाहिये कि कबीरदास जी ने भी बहुत पहले ही ऐसा कोई  घटनाक्रम देखा होगा इसलिए ही चेताते हैं कि गुरुओं को अधिक संपति नहीं रखना चाहिये।  आजकल अनेक संत इस सन्देश कि उपेक्षा कर संपति संग्रह में लगे हुए हैं इसलिए ही विवादों में  भी घिरे रहते हैं। इतना ही नहीं अनेक धार्मिक स्थानों पर तो आथिक कारणों से खून खराबा तक हो जाता है| देखा जाए तो आध्यात्मिक सस्थान एकांत में होना चाहिए पर लोग उसे सामूहिक स्थानों पर करना चाहते है जिसका लाभ धार्मिक ठेकेदार उठाना चाहते है, जिसके कारण उनके आपस में ही विवाद होते हैं|


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, January 12, 2013

विदुर नीति-चरित्रवान पुरुष ही समाज और धर्म की रक्षा करने में समर्थ (vidur neeti-charitrawan purush hi samaj aur dharm ki raksha mein samarth)

                आमतौर से हमारे समाज में यह भ्रम प्रचारित किया जाता है कि स्त्री को ही चरित्रवान होना चाहिए।  अपने चरित्र और मान की रक्षा करना उसकी ही स्वयं की जिम्मेदारी है।  कुछ लोग तो यह भी कहते है कि नारी का चरित्र और सम्मान  मिट्टी या कांच के बर्तन की तरह होता है, एक बार टूटा तो फिर नहीं बनता जबकि पुरुष का चरित्र और सम्मान पीतल के लोटे की तरह होता है एक बार खराब हुआ तो फिर मांजकर वैसी ही दशा में आ जाता है।  संभवतः यह कहावत राजसी मानसिकता के लोगों की देन है।  सात्विकत लोग इसे नहीं मानते।  ऐसा लगता है कि समाज की सच्चाईयों और मानसिकता को समझने का नजरिया अलग अलग है।  कुछ लोगों ने पुरुष की मनमानी को सहज माना है और औरत को सीमा में रहने की सलाह दी है। मगर कुछ कुछ विद्वान मानते हैं कि अंततः समस्त मनुष्य जाति के लिये ही उत्तम आचरण आवश्यक है। यही उत्तम आचरण ही वास्तविकता में धर्म है।
विदुर नीति में कहा गया है कि
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जिता सभा वस्त्रवता मिष्ठाशा गोमाता जिता।
अध्वा जितो यानवता सर्व शीलवता जितम्।।
   हिन्दी में भावार्थ-अच्छे कपड़े पहनने वाला सभा, गाय पालने वाला मीठे स्वाद की इच्छा और सवारी करने वाला मार्ग को जिस तरह जीतने वाला मार्ग को जीत लेता है उसी तरह शीलवान पुरुष समाज पर विजय पा लेता है।

शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति।
न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः।।
   हिन्दी में भावार्थ-किसी पुरुष में शील ही प्रधान है। जिसका शील नष्ट हो जाता है इस संसार में उसका जीवन, धन और परिवार से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता।
        दरअसल जिन राजसी मानसिकता वाले लोगों ने पुरुष को श्रेष्ठ माना है उनको पता नहीं कि हम जिस धर्म की रक्षा की बात करते हैं उसमें पुरुष की शक्ति का सर्वाधिक उपयोग होता है।  वह शक्ति तभी अक्षुण्ण रह सकती है जब आचरण और विचारों में पवित्रता हो। पवित्र आचरण की प्रवृत्ति भी बाल्यकाल में माता पिता के प्रयासों से ही निर्मित हो सकती है।  जो पुरुष शीलवान नहीं है वह अंततः समाज के साथ ही अपने परिवार के लिये संकट का कारण बनता है।  समाज के लोग कलुषित आचरण वाले लोगों से दूरी बनाते है।  डर के मारे में वह सामने कुछ नहीं कहें पर अधर्म और अपवित्र आचरण वाले पुरुष की निंदा सभी करते हैं। अंतः यह भ्रम कभी नहीं पालना चाहिए कि पुरुष का आचरण कोई चर्चा का विषय नहीं है या उसकी प्रतिष्ठा अमरत्तव लिये हुए है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Wednesday, October 24, 2012

राज्य के मंत्रियों को योग्य होना चाहिए-कौटिल्य का अर्थशास्त्र

           मूलतः हर मनुष्य में दूसरे पर शासन करने की प्रवृत्ति होती है जो अंततः अहंकार की अग्नि से पैदा होती है। यह बुरा भी नहीं है पर जिस मनुष्य में अपने शासित लोगों का हित करने की बजाय उनका दोहन करने का लक्ष्य होता है  वह उसको भ्रष्ट, निकृष्ट और दुष्ट बना देता है। आधुनिक लोकतंत्र ने पूरे विश्व में राजनीति शास्त्र की बजाय केवल नारे देने वालों को राज्य पद पर प्रतिष्ठित करना प्रारंभ किया है।  इतना ही नहीं राजनीति की बजाय अन्यत्र विषयों में पारंगत और प्रतिष्ठित लोगों के लिये राजकाज में आने की प्रवृत्ति बढ़ी है।  कहने का अभिप्राय यह है कि राजनीति से अनभिज्ञ लोग राजधर्म से भी अनभिज्ञ होते हैं और जब वह राजकाज करते हैं तो वह उसमें वह सफल नहीं हो पाते।  इसके परिणाम प्रजा को भोगने पड़ते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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शास्त्रचक्षुनृपस्तस्मान्महामात्यमते स्थितः।
धर्मार्थप्रतिपातीनि व्यसननि परित्येत्।।

                ‘हिन्दी में भावार्थ-किसी भी राज्य प्रमुख के पास शास्त्रों का ज्ञान होना आवश्यक है।  उसे हमेशा ही योग्य मंत्रियों के साथ दिखना चाहिए।  धर्म और अर्थ के लिये घातक व्यसनों को वह त्याग दे।
      राज्य करना भी एक तरह से कला है।  जिस तरह समाज में कला का व्यवसायीकरण हुआ है वैसे ही राजनीति भी पेशा बन गयी है।  अनेक लोग तो अपने राजनीति से इतर व्यवसायों, संगठनों तथा सामाजिक हितों की रक्षा के लिये पदारूढ़ होने की  कामना करते हैं।  वह सफल भी होते हैं। उनका लक्ष्य केवल पद पर बैठकर अपने तथा परिवार की रक्षा करना होता है इसलिये प्रजाहित की न तो उनमें दिलचस्पी रहती है न ही कोई वह योजना बनाते हैं।  इसी कारण पूरे विश्व में भ्रष्टाचार और अराजकता का वातावरण बन गया है।  अलबत्ता पद बचाये रखने के लिये ऐसे लोग  नारे अवश्य दिया करते हैं।  यही कारण है कि इस समय विश्व के अनेक देशों में असंतोष का वातावरण बन गया है।  अनेक जगह खूनी संघर्ष चल रहे हैं।  अनेक राज्य प्रमुख अपने ही देश के विद्रोहियों से जान बचाते फिर रहे हैं। यह राज्य प्रमुख केवल बंदूक के सहारे पदों पर आ गये पर जनहित करने की समझ उनमें कभी नहीं दिखी। हमारे देश को अंग्रेजों से राजनीतिक स्वतंत्रता मिले साठ साल से अधिक समय हो गया है पर आज भी अनेक विद्वान मानते हैं कि अधूरी आजादी ही मिली है।  इसलिये राजनीति में सक्रिय होने वाले लोगों को पहले राजनीति शास्त्र का अध्ययन करना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Wednesday, June 22, 2011

अमीर लोग कांटों के समान हो जाते हैं-कौटिल्य का अर्थशास्त्र(amir log kante jaise ho jaate hain-kautilya ka arthashastra)

      राजनीति एक बहुत महत्वपूर्ण विषय है। आधुनिक राजनीतिक शास्त्रों का तो पता नहीं पर ऐसा लगता है कि उनमें राजनीति के विषय में इतना सबकुछ लिखा गया होगा जितना कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है। मूलतः कौटिल्य का अर्थशास्त्र केवल आर्थिक विषय पर ही नहीं बल्कि राजधर्म की भी स्पष्ट व्याख्या करता है। पूरे विश्व में आज एक ऐसे प्रकार का लोकतंत्र है जो चुनावों पर आधारित है। भारत में पुराने समय में यह प्रथा नहीं थी जिसका आज पालन किया गया जा रहा है। यह प्रणाली बुरी नहीं है पर ऐसा लगता है कि इससे जहां आम लोगों को राजनीति में आने का अवसर मिला वहीं है ऐसे लोगों भी राजनीति करने लगे हैं जो केवल पद पाकर उसकी सुविधाओं का उपयोग करने तथा समाज में प्रतिष्ठित रहने के लिये प्रयत्नशील रहते हैं। इसके अलावा विश्व के समस्त देशों में-ऐसे देश भी जहां तानाशाही या राजशाही हो-व्यवस्था में नौकरशाही की एक स्वचालित मशीनरी का निर्माण किया गया है।
       ऐसे में राजनीति के माध्यम से उच्च पदों पर रहने वाले लोगों के लिये करने को कुछ नहीं रहता। सभी को राजनीति विषय का ज्ञान हो यह जरूरी नहीं है और अगर किसी ने पढ़ा हो तो उसे धारण करता हो यह भी आवश्यक नहीं है। ऐसे में राजनीति के सिद्धांतों के अनुरूप कितने चलते हैं यह अलग चर्चा का विषय है। अलबत्ता ऐसे में अब यह दिखने लगा है कि पूरे विश्व में पूंजीपतियों, बाहूबलियों तथा प्रतिष्ठित लोगों का अनेक देशों की सरकारों पर प्रभाव हो गया है यही कारण है कि अनेक देश असंतोष की आग में झुलस रहे हैं। इसके लिये जिम्मेदार सामान्य लोग भी कम नहीं है क्योंकि न वह स्वयं राजनीति के विषय का अध्ययन करते हैं न बच्चों को कराते हैं। यही कारण है कि जहां कुछ शुद्ध विचार से लोग राजनीति में आते हैं उससे अधिक तो संख्या उन लोगों की है जो इसे उपभोग के लिये अपनाते हैं।
                    कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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                आयुक्तकेभ्यश्चौरेभ्यः परेभ्यो राजवल्भात्
               पृवितवीपतिलोभाच्व प्रजानां पंवधा भयम्।।
         ‘‘राज कर्मचारी, चोर, शत्रु, राजा के प्रियजनों और लोभी राजा इन पांचों से जनता को हमेशा भय रहता है।’’
            आस्रावयेदुपचितान् साधु दुष्टत्रणनिव।
            आमुक्तास्ते च वतेंरन् वाह्य् महीपती।।
          ‘‘दुष्टव्रणों या कांटों के समान धन से पके हुए समृद्ध दुष्ट लोगों को राज्य निचोड़ ले तो ठीक है अन्यथा वह आग के समान राज्य में अपने व्यवहार का प्रदर्शन करते हैं।
           अगर देखा जाये तो राजनीति का कार्य ही राजस भाव से किया जाता है। उसमें सात्विकता या निष्कर्मता को बोध तो रह ही नहीं जाता। भारत में कौटिल्य का अर्थशास्त्र चर्चित बहुत है पर इसे पढ़ते कम ही लोग हैं। राजधर्म का सबसे बड़ा कर्तव्य है समाज, धर्म, व्यापार तथा अपने अनुचरों की रक्षा करना। जिन नये लोगों को राजनीति में आना है उन्हें यह समझना चाहिए कि जिस तरह जल में बड़ी मछली हमेशा ही छोटी मछली का शिकार करती है वैसे ही समाज में शक्तिशाली वर्ग हमेशा ही कमजोर वर्ग को कुचला रहता है। यहीं से राजधर्म निभाने वालों की भूमिका प्रारंभ होती है। प्रजा को हमेशा ही राज्य के लिये काम करने वालों कर्मचारियों, अपराधियों, शत्रुओं और राज्य प्रमुख के करीबी लोगों से भय रहता है। जो राज्य प्रमुख जनता को भयमुक्त रखता है वही श्रेष्ठ कहलाता है। जो अपने कर्तव्य को निर्वाह नहीं करता उसकी निंदा होती है। इसलिये राजधर्म का अध्ययन करने के बाद ही राजनीति में कदम रखना चाहिए। सच बात तो यह है कि कौटिल्य का अर्थशास्त्र न केवल राजनीति बल्कि घर परिवार के लिये भी अध्ययन का विषय है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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