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Saturday, July 13, 2013

पतंजलि योग साहित्य-प्रत्याहार चतुर्थ प्राणायाम है (pratyahar chaturth pranaya hai)



  हम जानते हैं कि योग साधना के आठ भाग-यम. नियम, आसन, प्राणायाम प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि-होते हैं। इसमें प्रत्याहार के बारे में बहुत कम समझते हैं। वैसे इसे समझने के लिये अधिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। इतना अवश्य है कि प्रत्याहार को समझने के लिये अपने हृदय में यह विश्वास धारण करना  पड़ेगा कि भारतीय योग साधना पद्धति  से प्रतिदिन अभ्यास करने पर देह के साथ ही मन और विचार के विकार भी निकालने में सहायता मिलती है।  प्रत्याहार इस योग साधना अत्यंत महत्वपूर्ण भाग होने के साथ ही चौथा प्राणायाम भी माना जाता है। जिस तरह प्राणाायाम में हम सांस को रोकते और ग्रहण करते हैं उसी तरह प्रत्याहार में अपने मस्तिष्क में विषयों का चिंत्तन भी त्यागते हैं। जिस तरह प्रातः सांसों का प्राणायाम करने से मन की शुद्धि होती है उसी तरह विषयों के प्राणायाम यानि प्रत्याहार से विचारों की शुद्धि होती है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है।
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बाह्यभ्यन्तरिवषयाक्षेपी चतुर्थः।।
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।।
धारणासु च योग्यता मनसः।।
स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्दियाणां प्रत्याहारः।
हिन्दी में भावार्थ-बाहर अंदर के विषयों का त्याग करना चौथा प्राणायाम है। इसके अभ्यास से प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है तथा धारणाओं में मन  योग्यता प्राप्त कर लेता है।  अपने विषयों से सम्बंध रहित होने पर इन्द्रियों का जो चित्त के स्वरूप एकाकार हो जाता है वह प्रत्याहार है।
         हम अपने सांसरिक विषयों से इस तरह जुड़े होते है कि उन पर चिंत्तन का क्रम चलता रहता है। एक विषय से ध्यान हटता है तो दूसरे पर चल जाता है। इस कारण हमारे मस्तिष्क को विराम नहीं मिलता।  हम चाहे जितने भी आसन कर लें या कितने भी प्रकार का प्राणायम करें जब तक अपने मस्तिष्क में विषयों से पैदा विकारों का निष्कासन नहीं करेंगे तब तक योग साधना का आनंद नहीं उठा पायेंगे।  प्रत्याहार के समय मन को एकाग्र कर लेना चाहिये। उस समय किसी भी स्थिति में किसी भी विषय का चिंत्तन दिमाग में नहीं आने देना चाहिये। अपनी दृष्टि केवल नासिका के मध्य ऊपरी भाग पर रखना चाहिये।  उस समय कोई भी ख्याल आता है तो आने दीजिये। दरअसल यह क्रम विषयों से उत्पन्न विकारों के ध्वस्त होने का होता है। धीरे धीरे मन शांत होने लगता है।  ऐसा लगता है कि वह अंधरे में चला गया है।  यह स्थिति इस बात का प्राण होती है कि विषयों से पैदा विकार जल गये हैं। उसके बाद  अपना चित्त केवल इसी अंधेरे पर रखते हुए बैठे रहें । चित्त की एकाग्रता ही धारणा के स्थिति  है जो कि  प्रत्याहार के बाद ही आती है। इसके बाद ध्यान लग पाता है।   ध्यान से पूर्व विषयों का त्याग करना ही प्रत्याहार है।  इस तरह के अभ्यास से इंद्रियों के सही स्वरूप को समझकर उन पर निंयत्रण किया जा सकता है। योग के आठ भागों को अभ्यास नहीं होगा तो जीवन में संपूर्ण आंनद का अनुभव नहीं किया जा सकता।         

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, December 31, 2011

दादू दयाल के दोहे-आदमी जहर को अमृत समझता है (admi jahar ko amrit samajhta hai-dadu dayal ke dohe)

          इस संसार में ऐसे ज्ञानी और ध्यानी लोगों की कमी नहीं है जो अपने सांसरिक ज्ञान को बघारते हुए नहीं थकते। इतना ही नहीं धर्म के नाम कर्मकांडों का महत्व इस तरह किया जाता है कि मानो उनको करने से स्वर्ग मिल जाता है। क्षणिक लाभ और मनोरंजन के लिये लोग अपने संबंध बनाते हैं। उनको ऐसा लगता है कि इससे उनका जीवन आराम से कट जायेगा पर इसके विपरीत ऐसे ही संबंध बाद में बोझ बन जाते हैं।
             आजकल हमारे यहां प्रेम विवाहों का प्रचलन अधिक हो गया है। देखा यह जाता है कि अंततः लड़कियों को ही अपने परिवार से वेदना अधिक मिलती है। एक तो उनके परिजन उसकी सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं और अपनी मर्जी से विवाह करने का आरोप लगाकर संपर्क नहीं रखते दूसरे पति के परिजन भी दहेज आदि न मिलने के कारण उनको बहू रूप में ऐसे स्वीकारते हैं जैसे कि मजबूरी हो। फिर परिवार आदि में खटपट तो होती है साथ ही चाहे लड़की नौकरीशुदा हो या नहीं उससे अपेक्षा यह की जाती है कि वह घर का काम करे। ऐसे में जिन लड़कियों ने प्रेम विवाह किया होते हैं उनको वही लड़के संकट देते हैं जिन्हें उन्होंने प्रेमवश सर्वस्व न्यौछावर किया होता है।
संत कवि दादू दयाल कहते हैं कि
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झूठा साचा करि लिया, विष अमृत जाना।
दुख कौ सुख सब कोइ कहै, ऐसा जगत दिवाना।। 
            ‘‘मनुष्य को सत्य असत्य, विष अमृत और दुःख सुख की पहचान ही नहीं है। लोगों का दीवाना पन ऐसा है दुख देने वाली वस्तुओं और व्यक्तियों से सुख मिलने की आशा करते हैं।
               
 
              इस तरह दीवानापन लड़कों में भी देखा जाता है। वह लड़कियों के बाह्य रूप देखकर बहक जाते हैं पर जब घर चलाने का अवसर उपस्थित होता है तब पता चलता है कि जीवन उतना सहज नहीं है जितना उन्होंने समझा था। जिस इश्क को उर्दू शायर गाकर थकते नहीं है वही एक दिन नफरत का कारण बन जाता है। आई लव यू कहने वाले फिर आई हेट यू कहने लगते हैं।
        तत्वज्ञानियों को पता है कि यहां हर देहधारी वस्तु अंततः पुरातन अवस्था में आती है। हम अपने मुख से करेला खायें या मिठाई पेट में अंततः वह कचड़ा ही हो जाता है। हम शराब पियें या शरबत पेट में वह विषाक्त जल में परिवर्तित होता है जिसके जिसके निष्कासन पर ही हमारी देह ठंडी होती है। इस ज्ञान को बुढ़ापे में धारण करने अच्छा है कि बचपन में धारण किया जाये तभी संसार के उन संकटों से बचा जा सकता है जो अज्ञान के कारण हमारे सामने उपस्थित होते हैं। कभी कभी तो उनकी वजह से देह का नाश भी होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, December 10, 2011

भर्तृहरि नीति दर्शन-मनुष्य की मनोकामना रूप बदलती है (bharathari neeti shatak-manushya ke manokamna)

             इस संसार में अनेक वस्तुएं हैं और धनी और निर्धन दोनों ही उसे पाना चाहिते हैं पर समय और हालात के अनुसार उनका मोल के साथ महत्व में भी अंतर होता है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि वह अगर धनार्जन करता है तो उसे व्यय के लिये भी तत्पर रहता है। जैसे जैसे उसके पास धन संपदा बढ़ती है अपना वैभव दिखाने के लिये वह उतना ही उतावला होता हैै। अगर कोई अल्पधनी अपनी मेहनत से धनवान हो जाता है तो उसे इस बात की प्रसन्नता कम होती है बल्कि वह इस चिंता को अधिक पाल लेता है कि वह अपने वैभव का प्रदर्शन समाज के सामने कर अपनी गरीब की छवि से मुक्ति पाये।
         नवधनाढ्य आदमी समाज के सामने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने कें लिये अनेक पदार्थों का संचय करता है। अपनी चाल ढाल से वह यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि वह अब धनवान हो गया है। यही कारण है कि हमारे देश में धनवानों की बढ़ती संख्या के कारण भौतिक पदार्थों के संचय के साथ ही विलासिता का प्रदर्शन भी तेज हो गया है।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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परिक्षीणः कश्चित्स्पृहयति यवानां प्रसृतये स पश्चात्सम्पूर्णः कलयति धरित्रीं तृणसमाम्।
अतश्चानैकान्त्याद् गुरु लघुतयाऽर्थेषु धनिनामवस्था वस्तुनि प्रथयति च संकोचयति च।।
         ‘‘जब मनुष्य गरीब होता है तब वह अपने रहने के लिये एक गज जमीन की चाहत करता है पर जब अमीर होने पर वही पूरे भूमंडल की कामना करने लगता है। इस संसार में अनेक पदार्थ हैं और अमीरी गरीबी के अनुसार उनको पाने की कामना बदलती रहती है। वस्तुओं का महत्व भी मनुष्य की आर्थिक स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।"
            जहां तक धन कम या ज्यादा होने का सवाल है तो यह त्रिगुणमयी माया अपने रंग रूप इंसान को इस तरह दिखाती है कि वह उसी को ही सत्य मानकर उसके इर्दगिर्द घूमता रहता है। अपनी आत्मा और परमात्मा विषयक अध्यात्म ज्ञान उसके लिये सन्यासियों का विषय होता है। धन न होने पर आदमी अपने सांसरिक संघर्ष में निरंतर व्यस्त रहता है इसलिये सत्संग तथा ज्ञान चर्चा उसके लिये दूर की कौड़ी हो जाती है तो धन आने पर आदमी ऐसे सात्विक स्थानों पर भी अपने राजस भाव का प्रदर्शन बहुत उत्तेजना के साथ करता है जहां अध्यात्मिक विषयक विचार हो रहा है। मजे की बात यह है कि धनवान लोगों को यह भ्रम रहता है कि उनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह उसका बखान भी करते हैं। यह अलग बात है कि उनकी वाणी के पीछे ज्ञान का नहीं  वरन् धन का ओज होता है। उनके सामने प्रस्तुत लोग ज्ञान बघारते समय भले कुछ न कहें पर पीठ पीछे  उन पर हंसते हैं। वजह साफ है, ज्ञान का प्रमाण भौतिक पदार्थों की उपलिब्ध नहीं वरन! उनका त्याग है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, November 30, 2011

पतंजलि योग सूत्र-आदमी स्वयं अहिंसक हो तो उसके शत्रु नहीं बनते (ahinsa aur aadmi-patanjali yog sahitgya)

              श्रीमद्भागवत गीता में बताया गया है कि इस संसार के सारे पदार्थ परमात्मा के संकल्प के आधार पर स्थित पर वह उनमें नहीं है। यहां इस बात को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि इस संसार के देहधारी जीव के संकल्प से गहरा संबंध है क्योंकि वह अंततः उसी परमात्मा का अंश हैं। इसलिये जीव भले ही इस संसार और भौतिक पदार्थों को धारण करे वह उसमें अपना भाव लिप्त न करे। हम अगर योग साधना और ध्यान करने के साथ श्रीमद्भावगत गीता का अध्ययन करें तो धीरे धीरे यह बात समझ में आने लगेगी कि यह संसार की प्रकृति और इसमें स्थित समस्त पदार्थ न बुरे हैं न अच्छे, बल्कि वह हमारे संकल्प के अनुसार कभी प्रतिकूल तो कभी अनुकूल होते हैं। इसलिये हम अपने हृदय के अंदर अहिंसा, त्याग, तथा परोपकार के संकल्प धारण करें तो यह सारा संसार और पदार्थ हमारे अनुकूल हो जायेंगे। 
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः।
           ‘‘हृदय में अहिंसा का भाव जब स्थिर रूप से प्रतिष्ठ हो जाता है तब उस योगी के निकट सब प्राणी वैर का त्याग कर देते हैं।
अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्।
‘‘हृदय जब चोरी के भाव से पूरी तरह रहित हो जाता है तब उस योगी के समक्ष सब प्रकार के रत्न प्रकट हो जाता है।’’
          अधिकतर लोग यह तर्क देते हैं कि यह संसार बिना चालफरेब के चल नहीं सकता। यह लोगों की मानसिक विलासिता और बौद्धिक आलस्य को दर्शाता है। एक तरह से यह मानसिक विकारों से ग्रसित लोगों का अध्यात्मिक दर्शन से परे एक बेहूदा तर्क है। हम यह तो नहीं कहेंगे कि सारा समाज ही मानसिक विकारों से ग्रसित है पर अधिकतर लोग इस मत के अनुयायी हैं कि जैसे दूसरे लोग चल रहे हैं वैसे ही हम भी चलें। कुछ लोग ऐसे जरूर हैं जो इस सत्य को जानते हैं और अपने देह, हृदय तथा मस्तिष्क से विकारों की निकासी कर अपना संकल्प शुद्ध रखते हुए अपना जीवन शान्ति  से जीते हैं। ऐसे लोगों संख्या में नगण्य होते हैं पर समाज के लिये वही प्रेरणास्त्रोत होते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, October 27, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-खानदानी लोग अकारण किसी को तंग नहीं करते (kautilya ka arthshastra-khandani log kisee ko akaran tang nahin karte)

             दैहिक रूप से मनुष्य सभी एक जैसे होते हैं। उनमें भी कोई गेहुए तो कोई काले या कोई गोरे रंग का होता है। इससे उसकी पहचान नहीं होती वरन् उसका आचरण, व्यवहार और विचार ही उसके आंतरिक रूप का प्रमाण होते है। सभी गोरे अच्छे हों यह जरूरी नहीं उसी तरह सभी काले बुरे हों यह समझना भी बेकार है। गेहुए रंग के लोग भी सामान्य स्वभाव के हों यह भी आवश्यक नहीं है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की जाति, धर्म, क्षेत्र अथवा भाषा के आधार पर उसकी पहचान स्थाई नही होती। मनुष्यों में भी कुछ पशु हैं तो कुछ तामसी प्रवृत्ति के हैं। कुल, पद, धन और बाहुबल के दम पर अनेक लोग आमजन के साथ हिंसा कर अपनी शक्ति को प्रमाणित करते हैं। उन्हें इस बात से संतोष नहीं होता कि वह शक्तिशाली वर्ग के हैं वरन् कमजोर पर अनाचार कर वह संतोष प्राप्त करते हैं। ऐसे लोग नीच होते हैं।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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नहि स्वसुखमन्विच्छन् पीडयेत् कृपणं नृपः।
कृषणः पीडयमानोहि मन्युना हन्ति पार्थिवम्।।
        ‘‘राज्य प्रमुख अथवा राजा को चाहिए कि वह अपने सुख के लिये कभी प्रजाजन को पीड़ा न दे। पीड़ित हुआ आम जन राजा को भी नष्ट कर सकता है।’’
कोहि नाम कुले जातः सुखलेशेन लोभितः।’’
अल्पसाराणि भूतानि पीडयेदिविचारम्।।
        बलशाली और कुलीन पुरुष कभी भी अपने से अल्प बलवान पुरुष को बिना विचारे कभी पीड़ित नहीं करते। ऐसा करने वाला निश्चय ही अधम होता है।’’
          जिन लोगों के पास राजपद, धन और शक्ति है उनको यह समझना चाहिए कि परमात्मा ने उनको यह वैभव आमजन की सेवा के लिये दिया है। प्राचीन समय में अनेक राजा लोगों ने प्रजाजनों के हित के लिये इसी विचार को ध्यान में रखकर काम किया। जहां तक हो सकता था अनेक महान राजा प्रजाजनों के हित के लिये काम किया और प्रसिद्धि पाई इसलिये भगवान के बाद दूसरा दर्जा दिया गया। इतिहास में अनेक महान राजाओं के नाम दर्ज हैं। मगर अब जिस तरह पूरे विश्व में हालात हैं उसे देखकर तो ऐसा लगता है कि आर्थिक, सामाजिक, राजनीति, तथा धार्मिक क्षेत्रों में तामस प्रवृत्तियों वाले लोग हावी हैं। यही कारण है कि प्रजाजनों का ख्याल कम रखा जाता है। सच बात तो यह है कि राजनीतिक कर्म ऐसा माना गया है जिसे करने के लिये उसके शास्त्र का अध्ययन करना अनिवार्य नहीं है। यही कारण है कि राजपद पाने का लक्ष्य रखकर अनेक लोग राजनीति में आते हैं पर प्रजाजनों के हित की बात सोचते नहीं है। उनको लगता है कि राजपद पाना ही राजनीति शास्त्र का लक्ष्य है तब क्यों उसका अध्ययन किया जाये।
           यही कारण है कि हम आज पूरे विश्व में जनअसंतोष के स्वर उठते देख रहे हैं। अनेक देशों हिंसा हो रही है। आतंकवाद बढ़ रहा है। अपराधियों और पूंजीपतियों का गठजोड राजपद पर बैठे लोगों पर हावी हो गया है। राजपद पर बैठे लोग भले ही प्रजाजनों के हित की सोचें पर कर नहीं सकते क्योंकि उनको राजनीति शास्त्र का ज्ञान नहीं होता जिससे कोई काम नहीं कर पाते। राजपदों पर बैठे लोग और उनके परिवार के सदस्य अपनी सुविधा के लिये प्रजाजनों को आहत करने के किसी भी हद तक चले जाते हैं। बात भले ही धर्म करें पर उनकी गति अधम की ही होती है। अतः वर्तमान युवा पीढ़ी के जो लोग राजनीति में सक्रिय होना चाहते हैं उनको कौटिल्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन अवश्य करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Wednesday, September 28, 2011

मनुस्मृति-राज्य जनता से कर प्राप्त करने में उदारता दिखाये (manusmruti-rajya,janta aur kar or tax)

             हमारे देश के अनेक अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने आधुनिक शिक्षा पद्धति के आधार पर अध्ययन कर उपाधियां प्राप्त की हैं। हमारे देश में अर्थशास्त्र विषय के अंतर्गत अधिकतर पश्चिमी विद्वानों के सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं जबकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में केवल भक्ति ही नहीं वरन् अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का भी प्रतिपादन किया गया है। इसमें राज्य व्यवस्था को किस तरह प्रजा के लिये संचालित करते हुए उससे कर वसूल किया जाय यह बताया गया है। हम देख रहे हैं कि पूरे विश्व में कर की वसूली और मुद्रा प्रचलन के जो नियम हैं वह अपूर्ण हैं और इसी कारण अनेक देश संकटों का सामना करते हैं तो अनेक जगह प्रजा त्रस्त और गरीब रहती है। राज्य कर्म के लिये पद पाने के मोह में लोग राजनीति के अर्थशास्त्र के नियमों का अध्ययन नहंी करते। इसके विपरीत हमारे प्राचीन विद्वान मनु, कौटिल्य तथा चाणक्य ने राजनीति और अर्थशास्त्र के सिद्धांतों की जो व्याख्या की है वह आज भी प्रासंगिक है।
हमारे महान मनीषी मनु की रचित मनुस्मृति में कहा गया है कि
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अष्टौमासान्यथादित्रूतोयं रश्मिभिः।
तथा हरेत्करंराष्ट्रान्नित्यर्कव्रतं हि तत्।।
           ‘‘राज्य प्रमुख को प्रजा से वैसे ही कर प्राप्त करना चाहिए जैसे सूर्य धरती से आठ माह तक अपनी किरणों के माध्यम से जल प्राप्त करता है।
प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः।
तथा हरेत्करंराष्ट्रान्नित्यमर्क हि तत्।।
              ‘‘राज्य प्रमुख को अपने गुप्तचरों के माध्यम से प्रजा की मनोवृत्ति की जानकारी उसी प्रकार रखनी चाहिए जिस प्रकार हवा सभी जीवों में प्रविष्ट होकर घूमती रहती है।’’
प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्वात्पापकमेंसु।
दुष्टसामन्तहिंस्त्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम्।।
                ‘‘राज्य प्रमुख का आग्नेय व्रत यही है वह अपराधियों को दंड देने के लिये प्रतापयुक्त रहे तथा दुष्ट संपन्न लोगों के लिये हिंसक।’
           पूरे विश्व में यह देखा जा रहा है कि धनपति तथा अपराधी अपनी शक्ति के बल पर राज्य व्यवस्था को आतंकित किये रहते हैं। इसका कारण है कि राज्य कर्म के लिये पद पाने वाले न तो राजनीतिक सिद्धांतों का जानते हैं और न ही अर्थशास्त्र के नियमों का उनको ज्ञान होता है। किसी भी राज्य प्रमुख का सिंहासन प्रजा की प्रसन्नता से ही स्थिर रहता है। राज्य कर्म राजस भाव वाले लोग करते हैं उनसे सात्विकता की आशा तो नहीं करना चाहिए पर उनको भी अच्छे काम करने पर ही प्रजा से सम्मान की इच्छा करना चाहिए। राजसवृत्ति के लोग फल की आशा में ही अपना काम करते है अतः उनके लिये अपने कर्म फल का भी विचार करना आवश्यक है इतना ही नहीं जनता पर कर लगाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसका आर्थिक आधार समाप्त न हो। राज्य व्यवस्था के लिये होने वाले व्यय में मितव्ययता का प्रदर्शन करे। एक बात याद रखना चाहिए कि राज्य धर्म का पालन करने वाले ही राज्य प्रमुख को जनता भगवत् स्वरूप मानती है अन्यथा उसकी दृष्टता से दुःखी होकर उसके अनिष्ट की कामना करती है।
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Thursday, September 8, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-अपनी जीभ पर काबू रखने वाला ही प्रभावी

         मनुष्य का धर्म है कि वह अपना कर्म निरंतर करता रहे। अपनी वाणी और विचार पर नियंत्रण रखे। भगवान का स्मरण करते हुए अपनी जीवन यात्रा सहजता से पूर्ण करे। जहां तक हो सके अपने ही काम से काम रखे न कि दूसरों को देखकर ईर्ष्या करे। आमतौर से इस विश्व में लोग शांति प्रिय ही होते हैं इसलिये ही मानव सभ्यता बची हुई। यह अलग बात है कि शांत और निष्कर्मी मनुष्य की सक्रियता अधिक दिखती नहीं है इसलिये उसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं होती जबकि अशांति, दुष्टता और परनिंदा में लगे लोगों की सक्रियता अधिक दिखती है इसलिये आमजन उस पर चर्चा करते हैं।
     हम लोग परनिंदकों की बातें सुनकर मजे लेते हैं जबकि दूसरों की तरक्की से ईर्ष्या के साथ उसकी निंदा करने वालों की बातें सुनना भी अपराध है। ऐसे लोग पीठ पीछे किसी आदमी की निंदा कर सामने मौजूद आदमी को प्रसन्न अवश्य करते हैं पर सुनने वाले को यह भी सोचना चाहिए कि उसके पीछे वही आदमी उसकी भी निंदा कर सकता है।
       आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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       दह्यमानाः सुतीत्रेण नीचा पर-यशोऽगिना।
           अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
     ‘‘दुर्जन आदमी दूसरों की कीर्ति देखकर उससे ईर्ष्या करता है और जक स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो प्रगतिशील आदमी की निंदा करने लगता है।’’
       यदीच्छसि वशीकर्तु जगदकेन कर्मणा।
            परापवादस्सयेभ्यो गां चरंतीं निवारथ।।
       ‘‘यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि वह समस्त संसार को अपने वश में करे तो उसे दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिए। अपनी जीभ को वश में करने वाला ही अपना प्रभाव समाज पर रखता है।
           इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी दिखते हैं जिनका उद्देश्य अपना काम करने अधिक दूसरे का काम बिगाड़ना होता है। सकारात्मक विचाराधारा से अधिक उनको नकारात्मक कार्य में संलिप्त होना अधिक अच्छा लगता है। रचना से अधिक विध्वंस में उनको आनंद आता है। अंततः वह अपने लिये हानिदायक तो होते हैं कालांतर में अपने सहयेागी की भी लुटिया डुबो देते हैं।
        जो लोग सोचते हैं कि उनको समाज में सम्मान प्राप्त हो उनके लिये यह जरूरी है कि वह अपनी ऐसी संगत बदल दें जिसके साथ रहने पर लोग उनसे भी हानि होने की आशंका से ग्रस्त रहते हैं। यह भय सम्मान दिलाने में सबसे अधिक बाधक है। इसके अलावा किसी की निंदा तो बिल्कुल न करें क्योंकि अगर किसी आदमी के सामने आप अन्य की पीठ पीछे निंदा करते हैं तो सामने वाले के मन में यह संशय भी आ सकता है कि बाद में आप उसकी भी निंदा करे। इससे विश्वास कम होता है।
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Saturday, July 2, 2011

दक्ष स्मृति-योग शक्ति के प्रभाव अत्यंत व्यापक (daksh smriti-yoga shakti atayant vyapak)

       जब हम योग साधना के विषय से संबंधित ग्रंथों की सामग्री पर दृष्टिपात करते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई विज्ञान हो। हालांकि उसके सूत्र अत्यंत सूक्ष्म हैं पर उनका अर्थ अत्यंत गूढ़ है।अनेक योग प्रचारक अपने शिष्यों को तात्कालिक दैहिक प्रभाव दिखाने वाले आसनों तथा प्राणायामों के बारे में सिखाते हैं जबकि योग विधा के आठ अंग होते हैं जिनका ज्ञान होने पर आदमी ज्ञानी हो जाता है।
      इसमें कोई संशय नहीं है कि योगासन तथा प्राणायाम का बहुत महत्व है पर यह भी जरूरी है कि पतंजलि योग के मूल तत्वों का भी ज्ञान प्राप्त किया जाये। योगासन और प्राणायाम से शरीर में स्फूर्ति और स्थिरता आती है तब मानव मन कोई अच्छा विचार करना चाहता है। मन में बेहतर विषयों के अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करना एक महत्वपूर्ण कार्य साबित हो सकता है। पतंजलि योग में वर्णित आठों भागों का ज्ञान प्राप्त होने पर हमारे अंदर योग शक्ति का निर्माण होता है। मन के उतार चढ़ाव, इंद्रियों की गतिविधियों तथा देह के अंदर चल रही प्रक्रिया को हम अपनी अंतदृष्टि से देखते हैं। इससे हमारे अंदर संसार के व्यवहार का ज्ञान आता है।
                दक्षस्मृति में कहा गया है कि
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         लोको वशीकृतों येन यन चात्मा वशीकृतः।
         इन्द्रियार्थो जितोयने ते योग प्रब्रवीम्यहम्।।
               ‘‘योग से मनुष्य सारे संसार को वश में कर सकता है। बिना योग शक्ति के किसी को भी वश में करना संभव नहीं है। बिना योग के व्यवहार का भी ज्ञान नहीं होता न ही इंद्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है।’’
                सच बात तो यह है कि बोलते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते और देखते हुए केवल एक प्रयोक्ता की तरह हो जाते हैं। अपने अंदर के स्वामित्व का आभास तनिक भी नहीं रहता। हमारी इंद्रियां कार्यरत हैं पर उन पर हमारी नज़र नहीं रहती। हमें लगता है कि सारे काम हम कर रहे हैं पर यह भूल जाते हैं कि यह सब इंद्रियों की गतिविधियों का परिणाम है। हम इंद्रियों के प्रयोक्ता हैं पर यह अहसास नहीं होता। यही अहसास अपने स्वामित्व होने का परिचय देता है और आदमी दृष्टा की तरह हो जाता है। तब वह संसार के व्यवहार के सिद्धांतों को अच्छी तरह समझता है। इसी कारण योग साधना तथा ध्यान में हमेशा तत्पर रहना चाहिए। इससे जो ज्ञान प्राप्त होता है वह आदमी को विश्व विजयी बना सकता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Wednesday, June 29, 2011

अथर्ववेद से संदेश-विद्वान लोग ही बहसों में सत्य का निष्कर्ष प्रस्तुत कर पाते हैं (atharvaved se sandesh-vidvan, bahas aur nishkarsh)

         प्रचार माध्यमों की बढ़ती संख्या से विषय सामग्री पर चर्चाओं के लिये बहसों की परंपरा भी बढ़ती जा रही है।  सांसरिक विषयों पर पक्ष और विपक्ष में वैचारिक योद्धा युद्धरत रहकर समाज को बौद्धिक मनोरंजन प्रदान करते हैं। हमारा देश तो बहसों और चर्चाओं में बहुत पारंगत है। अब यह अलग बात है कि सार्थक विषयों पर बहस कितनी होती है और निरर्थक विषय समाज में कितने लोकप्रिय हैं, इस पर दृष्टिपात कोई नहीं करता। अध्यात्मिक विषयों पर बहस तो शायद ही कभी होती है जबकि सांसरिक विषयों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है जैसे कि वह अध्यात्मिकता से जुड़े हैं। ऐसा मान लिया गया है कि आज के भौतिक युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का कोई महत्व नहीं है। इतना जरूर है कि जब सांसरिक विषयों में अपनी बुद्धि लगाये रखने से उकताये लोगों का मन कभी न कभी अध्यात्मिक विषय में लिप्त होने का करता है। ऐसे में उनको सत्य और असत्य पर बहसों में भाग लेना अच्छा लगता है मगर उनके निष्कर्ष निकालना केवल ज्ञानी लोगों के लिये ही संभव है।
          अथर्ववेंद में कहा गया है कि
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            सुविज्ञानं चिकितेषुजनायसच्चासच्च वयसी पस्पृधाते
             तर्योर्यत्सत्यं यतरह जीयस्तदित्सोमोऽहन्त्यासतु।
       ‘‘ज्ञानी मनुष्य के विशिष्ट ज्ञान की यह पहचान है वह सत्य और असत्य भाषणों में जो स्पर्धा रहती है उसमें सरलता और सत्य की रक्षा करते हुए असत्य को विलोपित करता है।
        ‘‘इंद्र मित्रं वरुणमाग्नियाहुरथो दिव्यः स सुपर्णों गुरुत्मान्।      
          एकं साद्विप्रा बहुधा वदन्त्यानि वमं मातरिश्वानमाहुः।
         ‘‘सत्य एक ऐसा विषय है जिसका ज्ञानी अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। उसी तरह एक इंद्र को मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य, सुवर्ण, गुरुत्भानु, यम और माता शिखा कहते हैं।’’
        ज्ञानी लोग कभी अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करते। जब तक कोई पूछे नहीं तब तक तत्वज्ञान का उपदेश नहीं करते। यह जरूर है कि वह जिज्ञासावश दूसरों की बहसें सुनते हुए उनमें सत्य और सरल भाव के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हैं। निष्कर्ष निकालते हुए निरर्थक तर्कों से अधिक वह सार्थक तत्वों पर अपनी दृष्टि रखते हैं। वैसे देखा जाये तो तत्वज्ञान कोई व्यापक नहीं है पर अधिकतर विद्वान उस पर अपने अपने अनुसार व्याख्यायें प्रस्तुत करते हैं। उनकी व्याख्यायें से अल्पज्ञानियों को ऐसा लगता हे कि सत्य कोई अद्भुत तथा रहस्यमय विषय है पर ज्ञानी लोग ऐसा नहीं सोचते। ज्ञानी लोगों में विनम्रता होती है इसलिये वह सत्य पर की गयी अलग अलग व्याख्याओं का सार समझ लेते हैं।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, July 24, 2010

रहीम के दोहे-समय के अनुसार बदलाव आता है (rahim ke dohe-samay aur badlav)

मनुष्य जब संकट में होता है तब उसका धैर्य जवाब देता है और लगता है कि वह कभी खत्म होने वाला नहीं है। यह सोच अज्ञान के कारण ही आती है। जिस तरह पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा अपनी धुरी पर घूमते हुए रात्रि और दिन लाते हैं वैसे ही समय के अनुसार सब बदलता है। आदमी के सुख के पल कट जाते हैं तो उसे पता नहीं लगता पर दुःख के समय वह तमाम तरह के ऐसे कदम उठाता है जिससे उसकी परेशानी बढ़ जाती है। अतः विवेकी मनुष्य सुख के समय तो अधिक प्रसन्न होते हैं और न ही दुःक्ष के समय विचलित। समय की अपनी महिमा है और वह अपने अनुसार सुख दुःख लाकर निकलता है।
समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय
सदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछिताय
कविवर रहीम कहते हैं कि समय आने पर अपने अच्छे कर्मों के फल की प्राप्ति अवश्य होती है। वह सदा कभी एक जैसा नहीं रहता इसीलिये कभी बुरा समय आता है तो भयभीत या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।
समय परे ओछे बचन, सब के सहे रहीम
सभा दुसासन पट गहे, गदा लिए रहे भीम
कविवर रहीम कहते हैं कि बुरा समय आने पर तुच्छ और नीच वचनों का सहना करना पड़ा। जैसे भरी सभा में देशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया और शक्तिशाली भीम अपनी गदा हाथ में लिए रहे पर द्रोपदी की रक्षा नहीं कर सके।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में सभी के पास कभी न कभी अच्छा समय आता है ऐसे में अपना काम करते रहने के अलावा और कोई चारा नहीं है। आजकल लोग जीवन में बहुत जल्दी सफलता हासिल करने को बहुत आतुर रहते हैं और कुछ को मिल भी जाती है पर सभी के लिये यह संभव नहीं है।
कई लोग जल्दी सफलता हासिल करने के लिये ऐसे मार्ग पर चले जाते हैं वहां उन्हें शुरूआत में बहुत अच्छा लगता है पर बाद में वह पछताते है।
यह सही है कि कुछ लोगों के लिये जीवन का संघर्ष बहुत लंबा होता है पर उन्हें अपना धीरज नहीं खोना चाहिए। कई बार ऐसा लगता है कि हमें जीवन में किसी क्षेत्र मे सफलता नहीं मिलेगी पर सत्य तो यह है कि आदमी को अपने अच्छे कर्मों का फल एक दिन अवश्य मिलता है।
जिस तरह दिन रात हैं और धूप छांव है वैसे ही जीवन में समय का फेर आता है। कभी दुःख तो कभी सुख की अनुभूति के साथ ही जीवन आगे बढ़ता है। जब आदमी तकलीफ में होता है तो संसार वाले उसका मजाक बनाते हुए कटु वचन तक कहते हैं। जब आदमी शक्तिशाली होता है तब सभी उसके सामने नतमस्तक होते हैं। ऐसे में जीवन में आये हर पल को सहजता से स्वीकार करना चाहिए।
संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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Tuesday, January 5, 2010

कौटिल्य दर्शन-अनापशनाप बकने से जमाना विपरीत हो जाता है (bakbas karna theek nahin-hindu dharama sandesh)

अकस्मादेव यः कोपादभीक्ष्णं बहु भाषते।
तसमाबुद्धिजते लोकः सस््फुलिंगदिवानलात्।।
हिंदी में भावार्थ-
जो व्यक्ति अचानक ही क्रोध में अनापशनाप बकने लगता है वह संसार को वैसे ही अपने विपरीत बना लेता है जैसे आग से निकलने वाली चिंगारी से लोग उत्तेजित होकर उससे दूर हो जाते हैं।
वाक्पारुष्यपरं लोक उद्वेजनमनर्थम्।
न कुर्यात्प्रियया वाचा प्रकृर्यात्ज्जगदात्मताम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस मनुष्य के वाक्यों में कठोरता है उससे लोग उत्तेजित हो जाते हैं। ऐसी अनर्थकारी वाणी न बोलें। इस जगत को अपने मधुर वाणी से वश में किया जा सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अगर इतिहास का अवलोकन करें तो अधिकतर संघर्ष अहंकार को लेकर हुऐ हैं वरना किसी को किसी पर आक्रमण करने की आवश्यकता क्या है? अपने आसपास होने वाली हिंसक वारदातों को देखें तो उनके पीछे बात का बतंगड़ अधिक होता है। हर समस्या का हल होता है पर उसे व्यक्त करने का अपना एक तरीका होता है। कहीं पानी को लेकर झगड़ा है तो कहीं जमीन का झगड़ा है। किसी की वजह से अगर पानी नहीं मिल रहा है तो उससे प्रेम से भी अपनी बात भी कही जा सकती है तो दूसरा व्यक्ति सहजता से मान भी जाये पर जहां दादागिरी, क्रोध या घृणा से बात कही गयी वहां अच्छे परिणाम की संभावना नगण्य हो जाती है। मनुष्य में अहंकार होता है और जहां उससे लगता है कि वह प्रेम से बोलने पर सामने वाले की आंखों में छोटा हो जायेगा या कड़ा बोलकर बड़प्पन दिखायेगा वहां विवाद होता है वहीं उसके अंदर अहंकार के कारण जो क्रोध पैदा होता है वही झगड़े का कारण बनता है।
इसलिये जहां तक हो सके मधुरवाणी बोलना चाहिये। इसे सज्जनता समझें या चालाकी पर इस संसार को इसी तरह ही जीता जा सकता है। आज जब मनुष्य में विवेक की कमी है वहां तो बड़ी सहजता से किसी में हवा से फुलाकर काम निकलवाया जा सकता है तब क्रोध करने की आवश्यकता है? दूसरी बात यह है कि लोगों में सहिष्णुता के भाव की कमी हो गयी है जिससे वह किसी की बात को सहन नहीं कर सकते। ऐसे समय में उनसे जरा सी कटु बात कहना भी उनको शत्रु बनाना है। अतः अच्छा यही है कि सभी से मधुरवाणी में बोलकर अपना काम निकालें।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://dpkraj.wordpress.com

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