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Saturday, August 17, 2013

अथर्ववेद के आधार पर संदेश-सौ हाथ से कमा हजार हाथ से दान कर (atharvved ke adhar par sandesh-sau hath ka kama hazar hath se dan kar)



    हमारे देश में धर्म को लेकर अनेक भ्रम प्रचलित हैं जिनका मुख्य कारण धन के आधारित पर प्रचलित पंरपराऐं हैं जिनको निभाने के लिये कथित धर्मभीरु अपना पूरा जीवन पर दाव पर लगा देते हैं। दूसरी बात यह है कि आधुनिक शिक्षा पद्धति में डूबा समाज अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गया है और उसके पास धर्म तथा भ्रम की पहचान ही नहीं रही।  सच बात तो यह है कि हम जिस अपनी महान संस्कृति और संस्कारों की बात करते रहे हैं उनका आधार वह पारिवारिक संबंध रहे हैं जो अब धन के असमान वितरण के कारण कलह का कारण बनते जा रहे हैं। पहले एक रिश्तेदार के  पैसा अधिक होता तो दूसरे के पास कम पर अंतर इतना नहीं रहता था कि उसकी अनुभूति प्रत्यक्ष रूपे की जा सके पर  कि अब असमान स्तर दिखने लगा है। इतना ही नहीं स्तर में अंतर इतना अधिक आ गया है कि सद्भाव बने रहना कठिन हो गया है। एक रिश्तेदार सामान्य जीवन जी रहा है तो दूसरा राजकीय कर्म से जुड़ने के कारण विशिष्ट हो जाता है। ऐसे में रिश्तों में मिठास कम कड़वाहट अधिक हो जाती है।
       महत्वपूर्ण बात यह कि हम धर्म के नाम पर सभी एक होने का स्वांग करते हैं पर हो नहीं पाते। इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे देश में दो प्रकार के भारतीय धार्मिक लोग हैं। एक तो हैं लालची दूसरे हैं त्यागी।  एक बात निश्चित है कि भारतीय धर्म से जुड़े लोग अधिकतर त्यागी होते हैं पर आधुनिक लोकतंत्र ने कुछ लालची लोगों को आगे बढ़ने का मार्ग दिया है। समाज पर नियंत्रण करने वाली अनेक संस्थाओं में कथित रूप से लालची लोगों ने कब्जा कर लिया है। यह लालची लोग एक तरफ से चंदा लेते हैं दूसरी तरफ दान करने का स्वांग करते हैं। अंधा बांटे रेवड़ी आपु ही आपको दे की तर्ज पर यह उस दान का हिस्सा भी अपने घर ही ले जाते हैं। धर्म, अर्थ, राज्य, कला, तथा शिक्षा के शिखर पर अनेक ऐसे कथित लोग पहुंचें हैं जो भारतीय धर्म के रक्षक होने का दावा तो करते हैं पर होते महान लालची हैं। सीधी बात कहें तो हमारे भारतीय धर्म को खतरा बाहर से नहीं बल्कि अपने ही लालची लोगों से है।  यह लालची लोग प्रचार तंत्र में अपने समाज सेवक होने का प्रचार करते हैं जो जब बाहरी लोग उनका चरित्र देखते हैं तो समस्त भारतीय धर्म के लोगों को वैसा ही समझते हैं जबकि हमारे हमारे देश के अधिकतर  लोग अपने धर्म के अनुसार त्यागी होते हैं।  लालची लोग सौ हाथों से धन तो बटोरते हैं पर दान एक हाथ से भी नहीं करते।  ऐसे ही लोग धर्म के लिये सबसे बड़ा संकट हैं। अगर हम अपने देश में श्रम पर आधारित करने वाले लोगों को देखें तो वह गरीब होने के बावजूद अपने आसपास के लोगों की सहायता को तत्पर होते हैं। इसका वह प्रचार नहीं  करते वरन् करने के बाद किसी प्रकार की फल याचना भी नहीं करते।  इसके विपरीत जिन लोगों ने अपनी लालच की वजह से येन केन प्रकरेण समाज पर नियंत्रण करने वाली संस्थाओं पर कब्जा किया है वह अपना स्तर बनाये रखने के लिये षडयंत्रपूर्वक काम करते हैं। इतना ही नहीं धर्म का कोई एक नाम देना हमारे अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि गलत है वहीं वह सभी धर्मों की रक्षा की बात कहते हुए भ्रमित भी करते हैं।  सबसे बड़ी  इन लोगों ने सभ्रांत होने का रूप भी रख लिया है और अपने से नीचे हर व्यक्ति को हेय मानकर चलते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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शातहस्त समाहार सहस्त्रस्त सं किर।
कृतस्य कार्यस्य चहे स्फार्ति समायह।।
        हिन्दी में भावार्थ-हे मनुष्य! तू सौ हाथों वाला होकर धनार्जन कर और हजार हाथ वाला बनकर दान करते हुए समाज का उद्धार कर।
       समाज में समरसता बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि शक्तिशाली तथा समृद्ध वर्ग कमतर श्रेणी के लोगों की सहायता करे पर अब तो समाज कल्याण सरकार का विषय बना दिया गया है जिससे लोग अब सारा दायित्व सरकार का मानने लगे हैं।   धनी, शिक्षित तथा शक्तिशाली वर्ग यह मानने लगा  है कि अपनी रक्षा करना ही एक तरह से  समाज की रक्षा है।  इतना ही नहीं यह वर्ग मानता है कि वह अपने लिये जो कर रहा है उससे ही समाज बचा हुआ है।  जब धर्म की बात आती है तो सभी उसकी रक्षा की बात करते हैं पर लालची लोगों का ध्येय केवल अपनी समृद्धि, शक्ति तथा प्रतिष्ठा बचाना रह जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमें केवल किसी को अपने धर्म से जुड़ा मानकर उसे श्रेष्ठ मानना गलत है बल्कि आचरण के आधार पर ही किसी के बारे में राय कायम करना चाहिये। हमारा समाज त्याग पर आधारित सिद्धांत को मानता है जबकि लालची लोग केवल इस सिद्धांत की दुहाई देते हैं पर चलते नहीं। समाज की सेवा भी अनेक लोगों का पारिवारिक व्यापार जैसा  हो गया है यही कारण है कि वह अपनी संस्थाओं का पूरा नियंत्रण परिवार के सदस्यों को सौंपते हैं। दावा यह करते हैं कि पूरे समाज का हम पर विश्वास है पर यह भी दिखाते हैं कि  उनका समाज में  परिवार के बाहर किसी दूसरे पर उनका विश्वास नहीं है।  हम जाति, धर्म, शिक्षा, क्षेत्र तथा कला में ऐसे लालची लोगों की सक्रियता पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि उनका ढोंग वास्तव में समूचे समाज  को बदनाम करने वाला हैं। बहरहाल हमें अपने आचरण पर ध्यान रखना चाहिये। जहां तक हो सके धर्म, जाति, भाषा, कला, राज्यकर्म तथा क्षेत्र के नाम पर समाज को समूहों में  बांटने वाले लोगों  की लालची प्रवृत्ति देखते हुए उनसे दूरी बनाने के साथ ही अपना सहज त्याग कर्म करते रहना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, July 31, 2013

संत कबीरदास दर्शन-अध्यात्म की साधना में वीरता होना आवश्यक (sant kabirdas darshan-adhyatma sadhana mein veerta hona avashyak)



      हमारे देश में आजकल योग साधना विधा का अत्यंत प्रचार हो रहा है।  अनेक योग साधक प्रचारक अत्यंत परिश्रम से इसका प्रचार कर रहे हैं। उनकी जितनी प्रशंसा की जाये अत्यंत कम है।  उनके निष्काम प्रयासों के परिणाम यह तो हुआ है कि सामान्य लोग योग साधना का महत्व समझ गये हैं, जिससे योग साधकों की संख्या बढ़ी भी है फिर जनसंख्या की दृष्टि से उसे पर्याप्त नहीं माना जा सकता।  सच तो यह है कि देश में मनोरंजन के आधुनिक साधनों ने सामान्य मनुष्य की बुद्धि का हरण कर लिया है और लोग देर रात तक जागते हैं और सुबह प्रातःकाल भी निद्रा उनको घेर रहती है। कहा जाता है कि प्रातः सुबह साढ़े तीन बजे से साढ़े चार बजे तक प्रथ्वी पर  आक्सीजन सर्वाधिक मात्रा में होती है। इस अवधि का लाभ उठाने वाले हमारे देश में बहुत कम हैं।  हालांकि कुछ वीर ऐसे भी हैं जिन्होंने जीवन भर इसी समय का जमकर लाभ उठाया हैं। इस लेखक ने अनेक ऐसे लोग देखे हैं जो सुबह चार बजे उठकर बिना किसी अवरोध के भ्रमण करते हैं और वह किसी अन्य मनुष्य से अधिक स्वस्थ लगते हैं। 
       योग साधना के प्रचार के बाद अब साधकों की संख्या भी बढ़ी है फिर भी अधिकतर लोग इसे अपनाना नहीं चाहते।  दरअसल प्रातः जल्दी उठकर भ्रमण या योग साधना करने के लिये त्याग का भाव होना आवश्यक है। जो इस संबंध में नियम बनाते हैं वह सांसरिक विषयों से उस अवधि में अलग हो जाते हैं।  हमें घूमना ही  है या योग साधना करना ही है, यह भाव जिनके मन में आता है वह कहीं न कहीं सांसरिक विषय का त्याग कर अध्यातम के प्रति झुक जाते हैं। अध्यात्म का यह अर्थ कदापि नहीं है कि सुबह उठकर भगवान की सकाम भक्ति की जाये अथवा किसी मूर्ति के पास जाकर सिर झुकाया जाये। यह मनुष्य देह परमात्मा ने दी है इसे स्वस्थ रखना भी एक तरह से उसकी पूजा करना ही है।  इसके लिये अध्यात्म चेतना आवश्यक है जो कि सांसरिक विषयों से हृदय का भाव त्यागने पर ही उत्पन्न होती है।  मनुष्य सांसरिक विषयों से कुछ देर भी प्रथक नहीं रहना चाहता है।  
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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मारग कठिन कबीर का, धरि न सकै पग कोय।
आय चले कोई सूरमा, जा धड़ सीस न होव।।
         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-अध्यात्म का मार्ग अत्यंत कठिन है, इस पर हर कोई कदम नहीं रख सकता।
कायर का काचा मता, घड़ी पलक मन और।
आगा पीछा ह्वै रहै, जागि मिसै नहिं ठौर।।
         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-अध्यात्म साधना के क्षेत्र में अपरिपक्व तथा कायर का मन इधर से उधर भटकता भी है। साधना के क्षेत्र में पहले आग में जलना पड़ता है फिर राम शब्द का उच्चारण करना होता है।
       अस्वस्थ देह में विकारपूर्ण मन लोगों को भटका रहा है। अपने शहर में प्रातःकाल उठकर सैर सपाटे पर जाना, योग साधना करना  या मंदिर में जाने वाले लोगों के मन में एक शांति रहती है। इसके विपरीत जो अपने शहर में ही नहीं घूमते वही धर्म के नाम पर पर्यटन के नाम कथित भक्ति का पाखंड करते हुए इधर से उधर भागते हैं।  देश के बड़े शहरों में अनेक प्रसिद्ध बड़े मंदिर हैं जहां लोग जाते है।  देखा जाये तो हर शहर में कोई न कोई सिद्ध मंदिर होता है पर जो अपने घर के पास के मंदिर में ही जाने का कष्ट नहीं करते वही बड़े सिद्ध मंदिरों पर दर्शन करने के बहाने पर्यटन करने के लिये लालायित होते हैं।  यही मन मन का भटकाव है जो अध्यात्म ज्ञान के अभाव में पैदा होता है। सासंरिक विषयों में सतत लगा मन ऊबने लगता है और अपरिपक्त तथा कच्चे विचारों वाले लोग उसके जाल में फंसे रहते हैं।  इसके विपरीत जो प्रातःकाल वीरता पूर्वका\ भ्रमण, योग साधना या मंदिर में जाते हैं उनका चित्त हमेशा प्रसन्न रहता है ।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, July 27, 2013

मनृस्मृति के आधार पर चिंत्तन-जहां लक्ष्य एक ही हो वहां अपना त्याग करे (hindu dharma thought on manu smriti-mitra ke liye lakshya ka tyag karen)



        हमारे समाज में निंरतर व्यक्ति तथा परिवारों के स्तर पर आसपस तनाव बढ़ता जा रहा है।  सच बात तो यह है कि हम राष्ट्र की एकता, अखंडता तथा स्थिरता की चिंता कर रहे हैं पर व्यक्ति तथा परिवारों की स्थिरता के बिना यह संभव नहीं है कि हम उत्थान के मार्ग पर चल सकें।  आर्थिक विकास आवश्यक है पर मनुष्य का अध्यात्मिक पतन होने पर उसका महत्व नहंी रहता।  हम चाहें कितने भी दावे करें पर पश्चिम की वैचारिक धारायें वहीं के देशों के अनुकूल नहीं रही क्योंकि उनका आधार राष्ट्र, प्रदेश, नगर, समाज, परिवार तथा व्यक्ति के क्रम में विकास का महत्व प्रतिपादित करती हैं जबकि मनुष्य का स्वभाव ठीक इस क्रम के विपरीत होता है।  सबसे पहले वह अपनी चिंता करता है फिर परिवार की। बाद में दूसरे क्रमों पर उसका ध्यान जाता  है।  अब हमारे यहां हो यह रहा है कि हम सोचते पश्चिम के आधार पर चलते अपने मूल रूप के साथ ही हैं।  सांसरिक विषयों का ज्ञान तो बहुत हो गया है पर अध्यात्मिक ज्ञान का अभाव है।  यही कारण है कि देश में लोगों के अंदर मानसिक तनाव बढ़ रहा है।  फलस्वरूप छोटी छोटी बातों पर हिंसा का तांडव नृत्य देखने को मिलता है।
मनुमृति में कहा गया है कि
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भूतानुग्रहविच्छेदजाते तत्र वदेत्प्रियम्।
दवमेव तु दवोत्थे शमनं साधुसम्मतम्।।
           हिन्दी में भावार्थ-जो प्राणियों के अनुग्रह के विच्छेद से विग्रह हुआ हो उसे अपनी मधुर वाणी से प्रियवचन बोलकर तथा जो दैव कोप से विग्रह  उत्पन्न हुआ हो उसे दैव की प्रसन्नता से शांत करने का प्रयास करें।
कुर्यायर्थदपरित्यागमेकार्थाभिनिवेशजे।
धनापचारजाते तन्निराधं न समाचरेत्।।
           हिन्दी में भावार्थ-जहां एक ही उद्देश्य के निमित विग्रह उपस्थित हो वहां दोनों में एक को अपना त्याग करना चाहिये। जहां धन के अपचार से अशांति उत्पन्न हो वहां विरोध न करें तो शांति हो जाती है।
           कहा जाता है कि झगड़े और अपराध का कारण हमेशा ही जड़, जमीन और जोरु होती है।  सबसे अधिक झगड़ा जमीन और धन को लेकर होता है। इन विषयों पर विवाद भी कोई गैरों में नहीं बल्कि अपनो के साथ ही होता है।  तय बात है कि जब कोई व्यक्ति अपना है और अज्ञानवश लोभ की प्रवृत्ति के चलते कोई चीज हमसे पाना चाहता है और हम उसे मना करें दें तो वह लड़ने पर आमादा होगा।  ऐसे मेें अध्यात्मक ज्ञानी को चाहिये कि वह त्याग के भाव का अनुसरण करे।  उसी तरह मित्रवर्ग में भी कभी समान रूप से एक ही लक्ष्य बन जाता है तब वातावरण में शत्रुता का भाव उत्पन्न होता है।  ऐसे में ज्ञानसाधक को चाहिये कि वह अपने उद्देश्य का त्याग करे। 
    उसी तरह हमें एक बात समझना चाहिये कि वर्तमान समय में हर कोई धन के लिये कुछ भी करने के लिये तैयार है।  आदमी सज्जन भी हो पर उसके आर्थिक लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा पैदा की जाये तो वह दुर्जनता का व्यवहार कर सकता है।  उसी तरह अगर व्यक्ति मूलतः दुंर्जन है तो वह अधिक क्रूरता भी दिखा सकता है। इसलिये जहां तक हो सके दूसरों के आर्थिक लक्ष्यों की प्राप्ति में बाधा पैदा करने का प्रयास नहीं करें तो ही ठीक रहेगा।  ज्ञान साधकों के लिये इस युग में सर्वाधिक सुखद स्थिति यह है कि वह किसी से डरे नहीं क्योंकि अकारण उनको कोई तंग नहीं कर सकता।  किसी के पास अपने लक्ष्यों के पीछा करने से समय ही नहीं मिलता।  अगर किसी प्रियजन या मित्र से बातचीत में वाद विवाद भी हो जाये तो उसे मधुर वाणी से शांत करें।  जहां तक गैरों का प्रश्न है जब किसी के कार्य में बाधा पैदा नहीं की जायेगी तब कोई भय भी उत्पन्न नहीं करेगा।  भयमुक्त रहना ही तनाव मुक्त रहने का सबसे सरल उपाय है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Friday, July 19, 2013

सांसरिक विषयों में डूबे गुरू शिष्य को भी डुबो देते हैं-गुरु पूर्णिमा पर विशेष नया हिन्दी लेख (lalchi guru shishsya ka bhee dubo deta hain-new special hindi lekh or article on guru purnima)



         22 जुलाई 2013 को गुरू पूर्णिमा का पर्व पूरे देश मनाया जाना स्वाभाविक है।  भारतीय अध्यात्म में गुरु का अत्ंयंत महत्व है। सच बात तो यह है कि आदमी कितने भी अध्यात्मिक ग्रंथ पढ़ ले जब तक उसे गुरु का सानिध्य या नाम के अभाव में  ज्ञान कभी नहीं मिलेगा वह कभी इस संसार का रहस्य समझ नहीं पायेगा। इसके लिये यह भी शर्त है कि गुरु को त्यागी और निष्कामी होना चाहिये।  दूसरी बात यह कि गुरु भले ही कोई आश्रम वगैरह न चलाता हो पर अगर उसके पास ज्ञान है तो वही अपने शिष्य की सहायता कर सकता है।  यह जरूरी नही है कि गुरु सन्यासी हो, अगर वह गृहस्थ भी हो तो उसमें अपने  त्याग का भाव होना चाहिये।  त्याग का अर्थ संसार का त्याग नहीं बल्कि अपने स्वाभाविक तथा नित्य कर्मों में लिप्त रहते हुए विषयों में आसक्ति रहित होने से है।
          हमारे यहां गुरु शिष्य परंपरा का लाभ पेशेवर धार्मिक प्रवचनकर्ताओं ने खूब लाभ उठाया है। यह पेशेवर लोग अपने इर्दगिर्द भीड़ एकत्रित कर उसे तालियां बजवाने के लिये सांसरिक विषयों की बात खूब करते हैं।  श्रीमद्भागवतगीता में वर्णित गुरु सेवा करने के संदेश वह इस तरह प्रयारित करते हैं जिससे उनके शिष्य उन पर दान दक्षिण अधिक से अधिक चढ़ायें।  इतना ही नहीं माता पिता तथा भाई बहिन या रिश्तों को निभाने की कला भी सिखाते हैं जो कि शुद्ध रूप से सांसरिक विषय है।  श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार हर मनुष्य  अपना गृहस्थ कर्तव्य निभाते हुए अधिक आसानी से योग में पारंगत हो सकता है।  सन्यास अत्यंत कठिन विधा है क्योंकि मनुष्य का मन चंचल है इसलिये उसमें विषयों के विचार आते हैं।  अगर सन्यास ले भी लिया तो मन पर नियंत्रण इतना सहज नहीं है।  इसलिये सरलता इसी में है कि गृहस्थी में रत होने पर भी विषयों में आसक्ति न रखते हुए उनसे इतना ही जुड़ा रहना चाहिये जिससे अपनी देह का पोषण होता रहे। गृहस्थी में माता, पिता, भाई, बहिन तथा अन्य रिश्ते ही होते हैं जिन्हें तत्वज्ञान होने पर मनुष्य अधिक सहजता से निभाता है। हमारे कथित गुरु जब इस तरह के सांसरिक विषयों पर बोलते हैं तो महिलायें बहुत प्रसन्न होती हैं और पेशेवर गुरुओं को आजीविका उनके सद्भाव पर ही चलती है।  समाज के परिवारों के अंदर की कल्पित कहानियां सुनाकर यह पेशेवक गुरु अपने लिये खूब साधन जुटाते हैं।  शिष्यों का संग्रह करना ही उनका उद्देश्य ही होता है।  यही कारण है कि हमारे देश में धर्म पर चलने की बात खूब होती है पर जब देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराध तथा शोषण की बढ़ती घातक प्रवृत्ति देखते हैं तब यह साफ लगता है कि पाखंडी लोग अधिक हैं।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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बहुत गुरु भै जगत में, कोई न लागे तीर।
सबै गुरु बहि जाएंगे, जाग्रत गुरु कबीर।।
     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस जगत में कथित रूप से बहुत सारे गुरू हैं पर कोई अपने शिष्य को पार लगाने में सक्षम नहीं है। ऐसे गुरु हमेशा ही सांसरिक विषयों में बह जाते हैं। जिनमें त्याग का भाव है वही जाग्रत सच्चे गुरू हैं जो  शिष्य को पार लगा सकते हैं।
जाका गुरू है गीरही, गिरही चेला होय।
कीच कीच के घोवते, दाग न छूटै कीव।।
    सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जो गुरु केवल गृहस्थी और सांसरिक विषयों पर बोलते हैं उनके शिष्य कभी अध्यात्मिक ज्ञान  ग्रहण या धारण नहीं कर पाते।  जिस तरह कीचड़ को गंदे पानी से धोने पर दाग साफ नहीं होते उसी तरह विषयों में पारंगत गुरु अपने शिष्य का कभी भला नहीं कर पाते।
           सच बात तो यह है कि हमारे देश में अनेक लोग यह सब जानते हैं पर इसके बावजूद उनको मुक्ति का मार्ग उनको सूझता नहीं है। यहां हम एक बात दूसरी बात यह भी बता दें कि गुरु का अर्थ यह कदापि नहीं लेना चाहिये कि वह देहधारी हो।  जिन गुरुओं ने देह का त्याग कर दिया है वह अब भी अपनी रचनाओं, वचनों तथा विचारों के कारण देश में अपना नाम जीवंत किये हुए हैं।  अगर उनके नाम का स्मरण करते हुए ही उनके विचारों पर ध्यान किया जाये तो भी उनके विचारों तथा वचनों का समावेश हमारे मन में हो ही जाता है।  ज्ञान केवल किसी की शक्ल देखकर नहीं हो जाता।  अध्ययन, मनन, चिंत्तन और श्रवण की विधि से भी ज्ञान प्राप्त होता है। एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य का स्मरण कर ही धनुर्विधा सीखी थी।  इसलिये शरीर से  गुरु का होना जरूरी नहीं है। 
     अगर संसार में कोई गुरु नहीं मिलता तो श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन भगवान श्रीकृष्ण को गुरु मानकर किया जा सकता है। हमारे देश में कबीर और तुलसी जैसे महान संत हुए हैं। उन्होंने देह त्याग किया है पर उनका नाम आज भी जीवंत है। जब दक्षिणा देने की बात आये तो जिस किसी  गुरु का नाम मन में धारण किया हो उसके नाम पर छोटा दान किसी सुपात्र को किया जा सकता है। गरीब बच्चों को वस्त्र, कपड़ा या अन्य सामान देकर उनकी प्रसन्नता अपने मन में धारण गुरू को दक्षिणा में दी जा सकती हैं।  सच्चे गुरु यही चाहते हैं।  सच्चे गुरु अपने शिष्यों को हर वर्ष अपने आश्रमों के चक्कर लगाने के लिये प्रेरित करने की बजाय उन्हें अपने से ज्ञान प्राप्त करने के बाद उनको समाज के भले के लिये जुट जाने का संदेश देते हैं।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, July 6, 2013

चाणक्य नीति-घर में आसक्ति रखने वाले को विद्या प्राप्त नहीं होती (chankya neeti-ghar mein aaskati rakhne walon ko viddya prapt nahin hotee)



           हमारे समाज में परनिंदा की प्रवृत्ति बहुत देखी जाती है। जहां चार लोग मिलेंगे वहां किसी अन्य की निंदा करते हुए अपनी चर्चा करेंगे।  इसके अलावा अपने गुणों तथा कल्पित परोपकार की बात सुनाते हुए अपनी प्रशंसा करते हुए कहीं भी लोगों को देखा जा सकता है। उससे भी बड़ी बात यह कि ज्ञान की बातें बखान करने वाले कदम कदम पर मिल जायेंगे।  जहां तक उस ज्ञान को धारण करने वालों की संख्या की बात है वह नगण्य ही नज़र आती है। ज्ञान और योग साधना में लिप्त लोगों के लिये भारतीय समाज में व्याप्त अंतर्विरोध हमेशा ही शोध का विषय रहा है।  यही कारण है कि हमारे देश में  अध्यात्मिक विषय में नित्य नये नये सृजन होते रहते हैं।  यह अलग बात है कि अध्यात्मिक सिद्धों की रचनाऐं लोग पढ़ते हैं और फिर उनको रटकर एक दूसरे को सुनाते हैं।  उस ज्ञान को धारण करने की कला किसी किसी को ही आती है जबकि सामान्य मनुष्य ज्ञान का बखान तो करता है पर अपना पूरा पंाव  अज्ञान की राह पर ही रखता है। 
     सच बात यह है कि श्रीमद्भगवत्गीता में कहा गया है कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। इंद्रियां ही विषयों में लिप्त हैं।  त्रिगुणमयी माया में फंसा मनुष्य अपनी स्थिति के अनुसार ही विचार करते हुए व्यवहार करता है।  इसलिये ज्ञान साधकों को कभी किसी की निंदा नहीं करते हुए इस बात का विचार अवश्य करना चाहिये कि जिस व्यक्ति का खान पान, रहन सहन तथा संगत जिस तरह की होगी वैसा ही वह काम तथा आचरण करेगा।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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गृह्यऽसक्तस्य नो विद्या नो दया मासंभोजिनः।
द्रव्यनुलुब्धस्य नो सत्यं स्त्रेणाभ्य न पवित्रता।।
       हिन्दी में भावार्थ-घर में आसक्ति रखने वालों को कभी  विद्या प्राप्त नहीं होती, मांस खाने वालों में दया नहीं होती, धन के लोभी में कभी सच्चाई नहीं होती और भोग विलासी में विचारों की पवित्रता नहीं होती।

          हमारे समाज में एक बात दूसरी भी देखी जाती है कि अर्थ, राज्य तथा धर्म के शिखर पर स्थिति पुरुषों की तरफ आशा भरी नज़रों से देखता है। वह सोचता है कि उनमें शायद समाज भक्ति पैदा हो और वह उस पर कृपा करें।  वह उनके विचार, व्यवहार और व्यक्तित्व की तरफ नहीं देखता। जिन शिखर पुरुषों में समाज के प्रति दया, सद्भावना तथा प्रेम का भाव है वह बिना प्रचार ही अपना काम करते है। जिनके मन में संवेदना नहीं है वह पाखंड बहुत करते हैं। इतना ही नहीं अनेक शिखर पुरुष तो दिखावे के लिये समाज सेवा करते हैं।  उनका मुख्य उद्देश्य अपने परिवार तथा कुल को प्रतिष्ठा दिलाकर अधिक शक्ति प्राप्त करना ही होता है।  समाज से दूर होने के कारण उनके घर के सत्य बाहर नहीं आ पाते पर फिर अपने सामान्य व्यवहार में उनका चरित्र सामने आ ही जाता है। वह प्रचार के लिये समाज के साथ सहानुभूति अवश्य जताते हैं उनके किसी कर्म से ऐसा नहीं लगता कि वह आशाओं पर खरे उतरेंगे। उनसे किसी भी प्रकार समाज हित की आशा करना व्यर्थ है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, June 29, 2013

चाणक्य नीति-मणि भी स्वर्ग में जड़े जाने की अपेक्षा रखता है (chanaklya neeti-mani bhee swarg mein jade jaane ke apeksha rakhta hai)



           यह मानव  का स्वभाव है कि वह सांसरिक विषयों में हमेशा अन्य लोगों से श्रेष्ठ दिखने का प्रयास करता है।  सभी लोग एक दूसरे से भौतिक उपलब्धियों  की प्राप्ति में आगे निकलना चाहते हैं।  यही कारण है कि माया सभी को नचा रही है। माया ही उन्नति का प्रमाण है तो वह पतन का कारण भी बनती है।  मनुष्य मन की तृष्णा उसे इधर उधर भगाती हैं।  इधर सुख मिलेगा वह एक मार्ग पकड़ता है। वहां पहुंचकर उसे लगता है कि दूसरी जगह आनंद मिलेगा। वह उधर भागता है।  भौतिक वस्तुओं की उपलब्धि उसे विचार शक्ति से शून्य  कर देती है।  इस भागमभाग में अनेक बार मनुष्य को कष्ट का सामना करना पडता है।
       सोने का मृग कभी नहीं  बना पर भगवान श्रीराम ने जब मारीचि को स्वर्णमृग में रूप में देखा तो उसे पाने का मोह पाल बैठे।  वह तो बहुत ज्ञानी ध्यानी थे फिर भी मृग मारीचिका का शिकार बने तो फिर आम आदमी की बिसात ही क्या? भौतिक उपलब्धियों में डूबा मनुष्य कभी प्रसन्न नहीं रह पाता।  जब तक इच्छित वस्तु  मिली नहीं है तब तक आदमी उसके लिये जी भर के संघर्ष करता हैं। जब वह मिलती है तो क्षणिक प्रसन्नता मिलने के बाद  फिर दूसरी का मोह जागता हैं। संसार का यह सत्य  सब जानते हैं फिर भी आदमी बेबस है।
चाणक्य नीति  में कहा गया है कि
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न निर्मितः केन न दृष्टमूर्ख न श्रृवते हेममयः कुरंगः।
तथापि तृष्णा रघुनन्दतस्य विनाशकाले विपरीत बुद्धिः।।
       हिन्दी में भावार्थ-स्वर्ण का मृग न कभी पहले देखा गया न बाद में, फिर भी भगवान श्री राम का मन उसे पाने के लिये लालायित हो उठा।  सच है मन की तृष्णा ही  विनाशकाल के लिये विपरीत बुद्धि का निर्माण करती है।
गुणैः सर्वज्ञतुल्योऽपि सीदत्येको निराश्रयः।
अनर्ध्यमपि माणिक्यं हेमाश्रयमपेश्चपेक्षते।।
              हिन्दी में भावार्थ-सभी प्रकार के गुण होते हुए ईश्वर के सामन व्यक्तित्व वाला व्यक्ति भी आश्रयहीन होने पर दुःख उठाता है।  अत्यंत मूल्यवान मणि भी स्वर्ग में जड़े जाने की अपेक्षा रखता है।
       इस बेबसी का कारण यह है कि मानव मन हमेशा ही समाज में प्रशंसा पाने के लिये तरसता है। भौतिक उपलब्धियों की प्रतियोगिता से अगर वह बाहर बैठ जाये तो त्यागी हो जायेगा। ज्ञानी हो जायेगा। यकीनन उसके अंदर अध्यात्मिक चेतना का जागरण होगा पर यह स्थिति उसे अकेला बना देती है।  सांसरिक पदार्थों के लिये भागमभाग कर रहे लोग उसकी तरफ देखते भी नहीं।  कह देते हैं कि यह तो रिटायर हो गया है या बूढ़ा हो गया है या फिर जीवन में सक्रिय रहने की इसकी औकात नहीं है।
     इस बात से बड़े से बड़ा ज्ञानी नहीं झेल पाता और वह अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिये हमेशा ही भौतिक संसार में लगा रहता है।  यह अलग बात है कि ऐसे ज्ञानियों की धारणा शक्ति क्षीण होती है। सच्चा ज्ञानी तो वही है जो अपने त्याग का महत्व समझते हुए सांसरिक विषयों से उतना  ही सम्बन्ध  रखता है जिससे उसी आवश्यकता की पूर्ति होती रहे। वह इतना धन संचय नहीं  करता कि उसके लिये अपने आध्यात्मिक ज्ञान से दूर होना पड़े।  ज्ञान तथा ध्यान के लिये समय ही न मिले। इसलिये वह अपने कर्म में निष्काम भाव से संलग्न रहता है। ऐसे में भौतिक संसार उसके लिये कष्टमय इस अर्थ  में होता है लोग उस पर सम्मान से भरी दृष्टि नहीं डालते पर इस स्थिति को  यह सोचकर वह सहन करता है कि अज्ञानियों में अपनी श्रेष्ठता प्रमाणित करने के लिये प्रयास करना व्यर्थ है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Monday, June 17, 2013

चाणक्य नीति-बुरे इंसानों को बेहतर बनाना संभव नहीं (chanakya policy-bure insanon ko behtar banana sambhav nahin)



       मूलतः यह एक प्रकार से निराशावादी दृष्टिकोण हो सकता है पर सत्य तो सत्य ही होता है कि इस संसार में जिस व्यक्ति की जैसी प्रकृति एक बार बन गयी और अगर उसमें विकृतियां हैं तो फिर किसी भी प्रकार से उसकी बुद्धि को शुद्ध नहीं किया जा सकता।  बचपन से ही जैसी प्रवृत्तियां मनुष्य मन में स्थापित हो जाती हैं तो वह अंत तक उसके साथ ही चलती हैं।  जिनका मन बचपन से ही अध्यात्म की तरफ मुड़ जाये तो  उनके विचार और व्यवहार में शुद्धता स्वतः ही बनी रहती है पर जिसे केवल सांसरिक विषयों का ही अध्ययन कराया जाये  उसमें उन्माद, क्रोध, अहंकार तथा लोभ की प्रवृत्ति स्वतः आ जाती हैं। यह अलग बात है कि कोई अध्यात्मिक साधना की तर्फ मुड़ जाये तो वह अपने निकृष्ट प्रकृत्तियों पर स्वतः निंयत्रण कर लेता है मगर ऐसा विरले ही लोगों के साथ होता है।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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दुर्जनं सज्जनं कर्तृमुपायो न हि भूतले।
अपानं शतधा धौतं न श्रेष्ठमिन्द्रियं भवेत्।।
    सामान्य हिन्दी भाषा में भावार्थ-दुष्ट व्यक्ति को सज्जन बनाने के लिए इस धरती पर कोई उपाय नहीं है।  जैसे मल त्याग करने वाली इंद्रियां सौ बार धोने पर भी श्रेष्ठ इंद्रियां नहीं बन पातीं।
      दुर्जन से सज्जन बन जाने की धटनायें अपवाद स्वरूप हो जाती है।  ऐसा भी होता कि किसी स्वार्थी प्रकृति के मनुष्य के साथ कोई दुर्घटना घट जाये तब वह मानसिक रूप से टूट जाता है। यह सही है कि ऐसे में उसके व्यवहार में परिवर्तन आता है।  आमतौर से दुष्ट प्रकृति के मनुष्य  में कभी सुधार नहीं होता। पाश्चात्य विचारधाराओं के अनुसार दुष्ट व्यक्ति में सुधार हो सकता है यहां तक तो ठीक है पर वह इसे भी मानती हैं कि समूचा समूह ही भ्रंष्ट ये इष्ट बनाया जा सकता है।  यही बात भारतीय अध्यात्म से मेल नहीं खाती। किसी दुष्ट समूह में एक दो व्यक्ति सुधर जाये पर सभी सदस्य देवता नहीं बन सकते। दूसरी बात यह भी कि किसी मनुष्य में सुधार प्राकृतिक कारणों से आता है पर कोई दूसरा मनुष्य यह काम करे यह संभव नहीं है। इसलिये जिनके बारे में हमारी धारणा अच्छी नहीं है उनसे व्यवहार ही नहीं रखना चाहिये। रखें तो किसी प्रशंसा की उम्मीद करना व्यर्थ है।   


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, June 9, 2013

रहीम के दोहे-सुख के समय ही दुःख के लिये सहायक ढूंढें (rahim ke dohe-sukh ke samay he dukh ke liye sahayak dhoondhe



        जीवन में सुख दूख आते जाते हैं।  यह अलग बात है कि सुख का समय लंबा होने से आदमी आत्ममुग्ध हो जाता है।  जऐ  जब दुःख के पल कम होने पर भी निकल जाने तक अत्यंत मुश्किल लगते हैं। कहीं वह अधिक लंबे हुए तो आदमी टूट जाता है।  दूसरी बात यह भी है कि सुख के समय आदमी धन का संचय तो करता है पर मित्र संग्रह पर उसका ध्यान नहीं होता। भौतिक उपलब्धियां उसे इतना आत्ममुग्ध कर देती हैं उसे लगता है कि मायावी संसार में बिना मांगे मित्र ही उसके पास आ जायेंगे।  सच बात तो यह है कि धन की खुशबु पाकर कोई भी मित्र बन जाता है पर ऐसे लोगों की विपत्ति में सहायता नहीं मिलती। धन, बाहुबल, और पद की श्रेष्ठता के कारण कोई भी दरबार लगा सकता है। ढेर सारे दरबारी भी मिल जायेंगे पर ऐसा मित्र जो विपत्ति में सहायता करे, समय पड़ने पर  मुश्किल है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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धन दारा अस सुतन सों, लगो रहे नित चित्त।।
नहिं रहीमकोऊ लख्या, गाढ़े दिन को मिल।
         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जब मनुष्य के पास धन, पत्नी और पुत्र का सुख होता है तब उसी में ही सारा ध्यान लगाये रहता है। जब कोई विपत्ति आती है तब वह सहायता के लिये इधर उधर ताकता है। उसी समय उसे भगवान की याद आती है।
       कहने का अभिप्राय यह है कि जब हमारा समय ठीक चल रहा हो तब भी भविष्य में बुरे समय की आशंकाओं का अनुमान अवश्य करते रहना चाहिये। उसके अनुसार ही ऐसा प्रबंध भी करें ताकि कोई प्रतिकूल परिस्थितियां आयें तो उनका सामना किया जा सके।  साथ ही जब अपने पास भौतिक सुख हो तब भी अपनी अध्यात्मिक चेतना को जाग्रत रखते हुए अहंकार तथा मद से दूर रहते हुए सभी से अपना व्यवहार बनाये रखना चाहिये। समय पड़ने पर कौन काम आ जाये यह कोई नहीं जानता।      

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, April 21, 2013

मनुस्मृति-मूर्ख को दान देने से पुण्य नहीं होता (manu smriti-murkh ko daan dene se punya nahin hota)

       
       वैसे तो हमारे देश में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण खान पान, रहन सहन तथा कार्यपद्धति में अनेक परिवर्तन आये हैं।  इतना ही नहीं देश के पेशेवर धार्मिक स्वयंभूओं तथा संगठनों ने भी पश्चिमी देशों की व्यवसायिक कंपनियों की तरह अपने कामकाज का विस्तार किया है।  वह भक्ति के साथ भगवान का नाम अवश्य लें  पर उनका लक्ष्य माया पाना ही होता है। यह सच है कि इन्हीं धार्मिक ठेकेदारों ने अपने शिष्यों को दान तथा दया के आधुनिक प्रयासों के लिये प्रेरित नहीं किया ताकि पुरानी दान परंपरा के नाम पर उनके घर भरत रहें। दान देने के मामले में यही लोग गुरु बनकर दक्षिणा का  मुख अपनी तरफ किये रहते हैं।  तब वह कभी नहीं कहते कि यह दान दक्षिणा गरीब बच्चों की शिक्षा या असहायों की मदद के लिये व्यय करो। यह अलग बात है कि ऐसे साधन संपन्न धार्मिक व्यवसायी लोगों को दिखाने के लिये कथित रूप से गरीबों को खाना खिलाने और बच्चों को किताबें बांटने का काम स्वयं करते हैं। कभी अपने शिष्यों को अपने घर के आसपास स्थित जरूरतमंदों को मदद करने की प्रेरणा नहीं देते।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथा प्लवेनौपलेन निमज्जत्युदके तरन्।
तथा निमज्जतोऽधस्तदजो दातृप्रतीच्छकौ।।
         हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह पानी में पत्थर की नाव पर सवार होने वाला व्यक्ति डूब जाता है उसी तरह पाखंडी विद्वान तथा उसका सहायक दानदाता दोनों ही पाप के भागी बनते हैं
तस्मादविद्वान्विद्यस्मात्तस्मात्प्रतिग्रहात्।
स्वल्पकेनाप्यविद्वान्हि पङ्के गौरवि सीदति।।
    हिन्दी में भावार्थ-पाखंडी विद्वान को दान देने से कोई लाभ नहीं होता। बल्कि उसे धन तथा पुण्य दोनों की हानि होती है। मूर्ख बनाकर दान लेने वाला विद्वान भी शीर्घ नष्ट होता है।
          सच बात यह है कि आधुनिक समय में समाज हित के लिये जिस व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है उसकी प्रेरणा कथित गुरु देना ही नहीं चाहते।  गरीबों को खाना खिलाना बुरी बात नहीं है पर प्रयास इस बात के होने चाहिये कि गरीबों को  अपने परिश्रम का उचित पारिश्रमिक मिले।  भीख मांगने वाले  को दान देते समय पुण्य का फल की कामना मन में रहती है तो लोग खुलकर देते हैं पर जब किसी मजदूर या सेवक को उचित पारिश्रमिक या वेतन देने की बात हो तो तब अमीर आदमी अपनी चतुराई पर उतर आता है।  उस समय वह मजदूर या सेवक के परिवार का पेट भरने में अपना पुण्य नहीं देखता।  यही कारण है कि अनेक भिखारी परिश्रम कर कमाने की बात कहने पर कहते हैं कि हमें तो अपने ही इस धंधे में ही इतनी कमाई है कि परिश्रम करने पर उसका दसवां हिस्सा भी नहीं मिल सकता।  यह हमारे समाज की बौद्धिक मूर्खता है कि वह मेहनतकश को उचित या अधिक पारिश्रमिक देने को दान नहीं मान पाता। यही कारण है कि हमारे देश में धनिक अधिक संख्या में पैदा रहे हैं पर समाज में उनके प्रति वैमनस्य भी उतनी तेजी से बढ़ रहा है।  सच बात तो यह कि हमारा आधुनिक समाज का संपन्न पहले की अपेक्षा अधिक मेहनतकशों पर निर्भर हो गया है पर उनका सम्मान नहीं करना चाहता जबकि अमीर गरीब के बीच स्थित तनाव से बचने का एक ही मार्ग है कि पूंजीगत शक्तियां मानव श्रम का उचित ढंग से लालन पालन करें।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Sunday, April 7, 2013

चाणक्य ने भी दिया है समाजवाद का सिद्धांत-हिन्दी चिंत्तन लेख (socialism thought of chanakya-besed on chankya neeti)

          हमारे देश में भारतीय अध्यात्म से प्रथक अनेक विदेशी विचारधाराओं ने लोगों के मनमस्तिष्क में घर कर लिया है। माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का दर्शन केवल बघारने के लिये है और उसके सिद्धांतों का अब कोई व्यवाहारिक महत्व नहीं है।  अनेक बुद्धिमानों ने  योजनाबद्ध ढंग से  साम्यवादी, प्रगतिवादी तथा समाजवादी विचाराधाराओं को  क्रम से यह कहकर स्थापित करने का प्रयास किया है कि उनके अनुसार गरीबों और असहायों को मदद मिलनी चाहिये।  जब यह बुद्धिमान इन विदेशी विचाराधाराओं का गुणगान करते हैं तो उनका संबोधन समाज नहीं वरन् राज्य व्यवस्था की तरफ होता है। उनका मानना है कि मनुष्य समाज तो एक दम संवदेनहीन होता और उसे राज्य के दंड से ही नियंत्रित किया जा सकता है।
           इसके विपरीत भारतीय अध्यात्म दर्शन समाज को संबोधित करता है। उसका मानना है कि अगर समाज स्वतः नियंत्रित होगा ता अधिक शक्तिशाली होगा। यही कारण है कि भारतीय अध्यात्म दर्शन ने ही हमेशा दान की प्रवृत्ति का संदेश दिया हैं। हमारे देश के बुद्धिमान लोग उसका आशय केवल मुफ्त में किसी गरीब को देना मानते हैं। इतना ही नहीं  यह समाज के धनी लोगों के विवेक पर ही निर्भर है जबकि हमारे बुद्धिमान मानते हैं कि जिसके पास राज्य दंड नहं है वह संवेदनशील हो ही नहीं सकता।  दरअसल इस दान की महिमा के लिये पुण्य का लाभ मिलने की बात अवश्य हमारा दर्शन कहता है पर उसका कोई रूप स्पष्ट नहीं किया है।  यह पुण्य केवल  अगले जन्म या इस जन्म में प्रत्यक्ष मिलता हो ऐसा दावा हमारा दर्शन नहीं करता।  इस दान की प्रवृत्ति को उकसाने के पीछे हमारे विद्वान मनीषियों का आशय यही रहा है कि इससे समाज में समरसता और शंाति रहे। जिनके पास धन है वह अपने से कमतर व्यक्ति को उसकी सेवा या वस्तु प्रतिफल या दान में देते रहें ताकि वह कभी भूखे न रहें। अगर वह भूखे या निराश होंगे तो समाज को कहीं न कहीं उनके विद्रोह का सामना करना पड़ता है। इससे अशांति फैलती है। अगर धनी मनुष्य अपने समाज के गरीब लोगों का ख्याल रखता है तो उसके धन देने की प्रक्रिया को भले ही दान कहें पर इससे जो शांति बनी रहती है वह उसके लिये पुण्य के रूप  में प्रतिफल ही होता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणाम्।
लडागोदसंस्थानां परीवाह इवाऽम्भासाम्।।
       हिन्दी में भावार्थ-अर्जित धन का त्याग करने से ही उसकी रक्षा हो सकती है। जैसे तालाब में जमा जल को बाहर निकालने पर उसकी रक्षा होती है।
      चाणक्य महाराज के इस संदेश का विस्तार से अर्थ समझें तो यह स्पष्ट है कि जिन लोगों को पास अधिक धन है वह इस गुमान में कतई नहीं रहें कि वह उसका केवल संग्रह कर अपनी तथा परिवार की रक्षा कर सकते हैं।  उनको अपने आसपास रह रहे लोगों को खुश रखने के लिये भी कुछ व्यय करते रहना चाहिये।  ताकि वह निराशा और हताशा से उनकी तरफ वक्र दृष्टि न डालें।  इतना ही नहीं जब वह धनिकों पर निर्भर रहेंगे तो उनकी रक्षा के लिये भी तैयार रहेंगे।  अगर धनी ऐसा नहीं करेंगे तो निश्चित रूप से न उनका धन और नही परिवार सुरक्षित रह सकता है। एक तरह से यह चाणक्य का समाजवादी सिद्धांत है जिसके लिये अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



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