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Saturday, July 13, 2013

पतंजलि योग साहित्य-प्रत्याहार चतुर्थ प्राणायाम है (pratyahar chaturth pranaya hai)



  हम जानते हैं कि योग साधना के आठ भाग-यम. नियम, आसन, प्राणायाम प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि-होते हैं। इसमें प्रत्याहार के बारे में बहुत कम समझते हैं। वैसे इसे समझने के लिये अधिक ज्ञान की आवश्यकता नहीं है। इतना अवश्य है कि प्रत्याहार को समझने के लिये अपने हृदय में यह विश्वास धारण करना  पड़ेगा कि भारतीय योग साधना पद्धति  से प्रतिदिन अभ्यास करने पर देह के साथ ही मन और विचार के विकार भी निकालने में सहायता मिलती है।  प्रत्याहार इस योग साधना अत्यंत महत्वपूर्ण भाग होने के साथ ही चौथा प्राणायाम भी माना जाता है। जिस तरह प्राणाायाम में हम सांस को रोकते और ग्रहण करते हैं उसी तरह प्रत्याहार में अपने मस्तिष्क में विषयों का चिंत्तन भी त्यागते हैं। जिस तरह प्रातः सांसों का प्राणायाम करने से मन की शुद्धि होती है उसी तरह विषयों के प्राणायाम यानि प्रत्याहार से विचारों की शुद्धि होती है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है।
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बाह्यभ्यन्तरिवषयाक्षेपी चतुर्थः।।
ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।।
धारणासु च योग्यता मनसः।।
स्वविषयासम्प्रयोगे चित्तस्वरूपानुकार इवेन्दियाणां प्रत्याहारः।
हिन्दी में भावार्थ-बाहर अंदर के विषयों का त्याग करना चौथा प्राणायाम है। इसके अभ्यास से प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है तथा धारणाओं में मन  योग्यता प्राप्त कर लेता है।  अपने विषयों से सम्बंध रहित होने पर इन्द्रियों का जो चित्त के स्वरूप एकाकार हो जाता है वह प्रत्याहार है।
         हम अपने सांसरिक विषयों से इस तरह जुड़े होते है कि उन पर चिंत्तन का क्रम चलता रहता है। एक विषय से ध्यान हटता है तो दूसरे पर चल जाता है। इस कारण हमारे मस्तिष्क को विराम नहीं मिलता।  हम चाहे जितने भी आसन कर लें या कितने भी प्रकार का प्राणायम करें जब तक अपने मस्तिष्क में विषयों से पैदा विकारों का निष्कासन नहीं करेंगे तब तक योग साधना का आनंद नहीं उठा पायेंगे।  प्रत्याहार के समय मन को एकाग्र कर लेना चाहिये। उस समय किसी भी स्थिति में किसी भी विषय का चिंत्तन दिमाग में नहीं आने देना चाहिये। अपनी दृष्टि केवल नासिका के मध्य ऊपरी भाग पर रखना चाहिये।  उस समय कोई भी ख्याल आता है तो आने दीजिये। दरअसल यह क्रम विषयों से उत्पन्न विकारों के ध्वस्त होने का होता है। धीरे धीरे मन शांत होने लगता है।  ऐसा लगता है कि वह अंधरे में चला गया है।  यह स्थिति इस बात का प्राण होती है कि विषयों से पैदा विकार जल गये हैं। उसके बाद  अपना चित्त केवल इसी अंधेरे पर रखते हुए बैठे रहें । चित्त की एकाग्रता ही धारणा के स्थिति  है जो कि  प्रत्याहार के बाद ही आती है। इसके बाद ध्यान लग पाता है।   ध्यान से पूर्व विषयों का त्याग करना ही प्रत्याहार है।  इस तरह के अभ्यास से इंद्रियों के सही स्वरूप को समझकर उन पर निंयत्रण किया जा सकता है। योग के आठ भागों को अभ्यास नहीं होगा तो जीवन में संपूर्ण आंनद का अनुभव नहीं किया जा सकता।         

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Saturday, April 13, 2013

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन-वानप्रस्थ से पहले अपनी भौतिक संपदा का दान करें (hindu thought of manu smriti-vanprasth se pahale apni bhautik sampada ka tyag karen)

             हमारे देश में सन्यास और सन्यासी को लेकर कभी सार्वजनिक रूप से परिभाषित किया ही नहीं जाता। इसका कारण यह है कि जिन लोगों को सन्यास या वानप्रस्थ का सही अर्थ बताना चाहिये वही गेरुए या सफेद वस्त्र पहनकर इस तरह समाज के सामने प्रस्तुत होते हैं जैसे कि वह भारी भरकम आत्मज्ञानी हों।  इतना ही नहीं स्वयंभू गुरु बनकर वह अपने शिष्यों से धन संपदा संग्रह करने के साथ ही उनसे अपने पांव भी पुजवाते हैं।  भारतीय अध्यात्म ज्ञान में सिद्ध होने का दावा करने वाले यह पेशेवर महापुरुष समाज को भौतिक यज्ञ करने के लिये ही प्रेरित करते हैं।  इतना ही ज्ञान यज्ञ के नाम पर यह ऐसे कार्य करते हैं जिनका धार्मिक कर्मकांडों से संबंध तो होता है पर अध्यात्म के विषय से उनका कोई सरोकार नहीं माना जा सकता।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार तो सन्यास का सीधा अर्थ संसार के भौतिक साधनों का पूरी तरह से त्याग करना ही है। सन्यास ग्रहण करने के बाद केवल प्रकृति से निर्मित वस्तुओं का ही उपभोग करना आवश्यक है ।  पहनना, ओढ़ना और सोना हमेशा ही प्रकृति प्रधान वस्तुओं का ही जुड़ा  होना चाहिये । वस्त्रों के रूप में मृगचर्म या फिर पेड़ के पत्तों को ओढ़ना चाहिये। भोजन में फल और कंदमूल का सेवन करना ही श्रेयस्कर माना जाता है।  कहने का अभिप्राय यह है कि मानव निर्मित वस्तुओं का उपभोग एक तरह से निषिद्ध है। देखा जाये तो सन्यास के इस रूप में आज के अनेक गुरु खरे नहीं उतरते।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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प्राजापत्यां निरुप्येर्ष्टिसर्ववेदसदक्षिणाम्।
आत्मन्यग्नीसमारोप्य ब्राह्म्णः प्रव्रजेद्गृहात्।
       हिन्दी में भावार्थ-वानप्रस्थ आश्रम में रहने वाले को चाहिये कि वह अपनी सारी संपत्ति दान देने के साथ ही परमात्मा के प्रति धन्यवाद ज्ञापित करने के लिये यज्ञ का आयोजन करे। इसके पश्चात् आत्मज्ञान की ज्योति को जलाकर सन्यास के लिये प्रस्थान करे।
यो दत्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभवं गृहात्।
तस्य तेजोमया लोक भवन्ति ब्रह्मवादिनः।
        हिन्दी में भावार्थ-सभी जीवों को अभयदान देकर वानप्रस्थ के लिये  सन्यास ग्रहण करने वालों को तेजपूर्ण लोकों की प्राप्ति होती है।
         सन्यासी को न तो किसी निंदा करना चाहिये न किसी के व्यक्ति के मन में भय पैदा कर उसका हृदय अपने अनुकूल बनाने के प्रयास करना चाहिये।  उसे किसी की मधुर वाणी पर मुग्ध और कटु वाणी पर क्रुद्ध होने के भाव से भ परे होना चाहिये।  जबकि इसके विपरीत हम देख रहे हैं कि जिन्होंने धर्म क्षेत्र में शिखर पर अपनी जगह बनाई है वह आम लोगों में उसका प्रभाव भी दिखाते हैं।  राजसी पुरुषों के अपने शिष्य होने के दावे के प्रचार   के लिये वह उनके साथ खिंचवाये गये फोटो की प्रदर्शनी भी लगाते हैं।  अनेक कथित धर्मगुरु यह कहते थकते नहीं कि वह तो सन्यासी हैं पर अपने पास आने वालों लोगों को वह उनके स्तर के अनुसार दर्शन देते हैं।  अनेक गुरु तो आम तथा विशिष्ट लोगों को दर्शन देने के लिये अलग अलग स्थान निर्धारित करते हैं।  हम उन लोगों की निंदा नहीं कर रहे। हमारा कहना तो यह है कि धर्म के क्षेत्र में उनका यह पेशा है और यह कोई बुराई नहीं है।  हमारा उद्देश्य तो यह बता कहना है कि किसी को वस्त्र, वाणी, या व्यक्तितत्व देखकर उसे सन्यासी मानकर उसके सामीप्य प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिये।  ऐसे में हम अपने जीवन में आये भटकाव से बच नहीं सकते क्योंकि उन पेशेवर साधुओं के पास कोई ऐसी युक्ति नहंी है जिससे  मनुष्य तनाव से बच सकते।  इसके लिये सबसे बेहतर उपाय तो यही है कि अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का स्वयं ही अध्ययन करें। उसके संदेशों को समझकर जीवन के प्रति अपना उचित दृष्टिकोण बनाये।  अध्यात्मिक चिंत्तन और मनन की यह प्रक्रिया स्वतः ही मस्तिष्क में वैचारिक स्फृर्ति पैदा करती है और हमें किसी अन्य से राय लेने से बचाती है ।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 



Tuesday, August 14, 2012

विदुर नीति-रोगी मनुष्य मृतक समान

        एक तरफ हमारे संचार माध्यम जहां अपने देश के आर्थिक विकास का ढिंढोरा पीट रहे हैं दूसरी तरफ विश्व के स्वास्थ्य विशारद भारतीय समाज में मधुमेह, हृदय रोग, वायुविकार जैसे दैहिक संकट तथा मनोरोगों के बढ़ते आंकड़ों को प्रस्तुत कर रहे हैं। पश्चिमी शिक्षा से ओतप्रोत देश के बुद्धिजीवी इससे बेखबर लगते हैं। देश में स्वास्थ्य की चिंता करने वाले व्यवसायिक विशेषज्ञ भी रोगों के निवारण का प्रचार कर आर्थिक हित साध रहे हैं। ऐसे बहुत कम अध्यात्मिक चिंतक हैं जो रोगों के निवारण से अधिक आरोग्य रूपी धन का संचय करने के लिये लोगों को प्रेरित करें।
            पिछले कुछ समय से हमारे देश में योग का प्रचार बढ़ा है। यह अच्छी बात है पर इसके साथ ही अध्यात्मिक ज्ञान हो तो आनंद अधिक ही लिया जा सकता है। इसके लिये यह आवश्यक है कि भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन किया जाये। दरअसल जो लोग योगासन और प्राणायाम करने वाले हैं उनके दैहिक विकास न्यूनतम स्तर पर पहुंच जाते है पर तत्वज्ञान के अभाव में वह जीवन का पूरा आनंद नहीं उठा पाते। ऐसे में उनका मन रुचिकर विषयों की तरफ लगता है। वह चाहते हैं कि उनसे मिलने वाले लोग भी उन जैसे हों। मगर उनको तब निराशा का सामना करना पड़ता है जब बहुतायत रोगग्रस्त लोगों वाले समाज में केवल विकारों वाले विषयों से सामना होता है। तब उनको असहजता का अनुभव होता है। फिर दैहिक विकारों से ग्रसित लोग तो प्रत्यक्ष दिखते हैं पर मानसिक विकारों वाले लोगों की पहचान नहीं होती। मानसिक रोगों से ग्रसित लोग अपने विचार,, वाक्या तथा व्यवहार से अपने आसपास के लोगों को क्षुब्ध कर देते हैं। उनके इस कर्म से अध्यात्मिक ज्ञान रखने वाले विचलित नहीं होते।
                     विदुरनीति में कहा गया है कि 
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              रोगार्दिता न फलान्याद्वियन्ते न वै लभन्ते विषयेषु तत्वम्।
               दुःखोपेता रोगिणी नित्यमेव न बुध्यन्ते धनभौगान्न सोख्यम्।
           ‘‘बीमार मनुष्य कभी अमृतदायी फलों का आदर नहीं करता। विषयों में भी आसक्ति से भी उनको कोई सुख नहीं मिलता। रोगी सदा ही कष्ट में रहते हैं उनके लिये भोग और सुख व्यर्थ हो जाते हैं।
              न मनुष्ये गुणः कश्चिद् राजन् सधनतामृते।
              अनातुरत्वाद् भद्रं ते मृतकल्या हि रोगिणः।।
             ‘‘मनुष्य के पास धन हो या नहीं  निरोग होने का गुण जरूर होना चाहिये

क्योंकि रोगी मनुष्य तो मृतक समान है।‘‘
                जिस तरह बबूल के पेड़ से आम की अपेक्षा करना व्यर्थ है उसी तरह विकारों से ग्रसित लोगों से सद्व्यवहार की अपेक्षा करना मूर्खता और अज्ञान का प्रमाण है। हम जब किसी व्यक्ति के व्यवहार, विचार या वाक्य से निराश हों तो यह समझना चाहिए कि वह विकार से ग्रसित है। अपने अंदर निराशा या क्रोध का भाव लाने की बजाय उसकी बात को अनसुना करना श्रेयस्कर है। सच बात तो यह है कि हम दूसरों की बात से अपने अंदर गुस्सा लाकर स्वयं को तकलीफ देते हैं। जो विकार से ग्रसित है उसके लिये मधुर वचन बोलना तथा सद्व्यवहार करना कठिन है। तब क्यों अपना खून जलाया जाये।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, August 4, 2012

पतंजलि योग सूत्र-इच्छाओं का त्याग ही सन्यास है (patanjali yog sahitya-ichchaon ka tyag hi sanyas)

                 हमारे देश में सन्यास तथा वैराग्य को लेकर भारी भ्रम प्रचलित हैं। विषयों में आसक्ति का अभाव होने का मतलब यह माना जाता है कि मनुष्य कोई कर्म ही नहीं करे। संसार के अन्य जीवों से कटकर कहीं वन में जाकर रहने को ही सन्यास माना जाता है। दरअसल कर्म और सन्यास की जो व्याख्या श्रीमद्भागत गीता में की गयी उसे समझने में हमारा समाज असमर्थ रहा है। कर्म करना और उसके फल में आकांक्षा न होना ही सन्यास है। श्रीमद्भागवत गीता में यह स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य अपनी देह के रहते बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता। वह तत्वज्ञान को जानने के बाद विषयों से प्रथक नहीं होता बल्कि उसमें आसक्ति का त्याग कर देता है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब हम कोई काम करते हैं तो वह केवल हमें इसलिये करना चाहिए कि उससे हमारा जीवन निर्वाह होगा। इससे अधिक अपेक्षा करने पर निराशा हाथ लगती है।
                     पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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                   दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम।।
               ‘‘दिखने और सुनने वाले विषयों से सर्वथा तृष्णारहित चित्त की अवस्था है वही वैराग्य है।’’
                     तत्परं पुरुषरव्यातेर्गुणवतृष्ण्यम्।।
                 ‘‘मनुष्य के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा का सर्वथा अभाव हो जाना ही परम वैराग्य है।’’
              हमें गाना सुनना है सुने। फिल्म देखनी है देखें। गाड़ी पर जाना है जायें। वैराग्य तो उनमें आसक्ति से हैं। जब हम यह सोचते हैं कि गाना सुने बगैर हमारे कान रह नहीं सकते। फिल्म देखे बिना हमारी आंखें प्यासी रह जाती हैं। गाड़ी में बैठे बिना हमारा मन तृप्त नहीं होगा। यहीं से शुरु होती है मानसिक तनाव की जो हमें ऐसी स्थिति में पहुंचाता है जहां बड़ा से बड़ा ज्ञान भी धरा का धरा रह जाता है। संसार के विषयों से हम अलग नहीं हो सकते मगर उनमें इस तरह की लिप्पता कभी सुखद नहीं होती। शराबी और जुआरी समाज में कभी विश्वसनीय नहीं होते क्योंकि सब जानते हैं कि वह उनके बिना चल नहीं सकते इस कारण किसी भी दूसरे आदमी के कर्म के योग्य नहीं है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Monday, February 6, 2012

पतंजलि योग सूत्र-सुख के पीछे छिपा राग क्लेश है (sukh ke peechi klesh rag chhipa hai-patanjali yog sootra)

         भौतिकतावाद के चलते पूरे विश्व के साथ ही हमारे देश में लोगों का मानसिक तनाव बढ़ा है। कहा तो यहां तक जाता है कि भारत में एक बहुत बड़ा प्रतिशत इस तनाव की वजह से मनोरोगों के साथ ही मधुमेह, उच्च रक्तचाप तथा अन्य विकारों से पीड़ित ऐसे लोगों का है जिनको अपने रोगी होने की जानकारी तक नहीं है।पंचतत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार प्रकृति स्वतः विराजती हैं। मनुष्य का मन तो अत्यंत चंचल माना जाता है। यही मन मनुष्य का स्वामी बन जाता है और जीवात्मा का ज्ञान नहीं होने देता। अध्यात्म के ज्ञान के अभाव में सांसरिक क्रियाओं के अनुकूल मनुष्य प्रसन्न होता है तो प्रतिकूल होने पर भारी तनाव में घिर जाता है। मकान नहीं है तो दुःख है और है उसके होने पर सुख होने के बावजूद उसके रखरखाव की चिंता भी होती है। धन अधिक है तो उसके लुटने का भय और कम है नहीं है या कम है, तो भी सांसरिक क्रियाओं को करने में परेशानी आती है मनुष्य सारा जीवन इन्हीं  अपनी कार्यकलापों के अंतद्वंद्वों में गुजार देता है। विरले ज्ञानी ही इस संसार में रहकर हर स्थिति में आनंद लेते हुए परमात्मा की इस संसार रचना को देखा करते हैं। अगर किसी वस्तु का सुख है तो उसके प्रति मन में राग है और यह उसके छिन जाने पर क्लेश पैदा होता है। कोई वस्तु नहीं है तो उसका दुःख इसलिये है कि वह दूसरे के पास है। यह द्वेष भाव है जिसे पहचानना सरल नहीं है। मृत्यु का भय तो समस्त प्राणियों को रहता है चाहे वह ज्ञानी ही क्यों न हो। मनुष्य का पक्षु पक्षियों में भी यह भय देखा जाता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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सुखानुशयी रागः।
‘‘सुख के अनुभव के पीछे रहने वाला क्लेश राग है।’’
‘‘दुःखानुशयी द्वेषः।
‘‘दुःख के अनुभव पीछे रहने वाला क्लेश द्वेष है।’’
स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूडोऽभिनिवेशः।।
            ‘‘मनुष्य जाति में परंपरागत रूप से स्वाभाविक रूप से जो चला आ रहा है वह मृत्यु का क्लेश ज्ञानियों में भी देखा जाता है। उसे अभिनिवेश कहा जाता है।’’
ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः।
           ‘‘ये सभी सूक्ष्मावस्था से प्राप्त क्लेश चित्त को अपने कारण में विलीन करने के साधन से नष्ट करने योग्य हैं।’’
ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः।।
‘‘उन क्लेशों की वृत्तियां ध्यान से नष्ट करने योग्य हैं।’’
       इस तरह अंतद्वंद्वों में फंसी अपनी मनस्थिति से बचने का उपाय बस ध्यान ही है। ध्यान में जो शक्ति है उसका बहुत कम प्रचार होता है। योगासन, प्राणायाम और मंत्रजाप से लाभ होते हैं पर उनकी अनुभूति के लिये ध्यान का अभ्यास होना आवश्यक है। दरअसल योग साधना भी एक तरह का यज्ञ है। इससे कोई भौतिक अमृत प्रकट नहीं होता। इससे अन्तर्मन   में जो शुद्ध होती है उसकी अमृत की तरह अनुभूति केवल ध्यान से ही की जा सकती है। इसी ध्यान से ही ज्ञान के प्रति धारणा पुष्ट होती है। हमें जो सुख या दुःख प्राप्त होता है वह मन के सूक्ष्म में ही अनुभव होते हैं और उनका निष्पादन ध्यान से ही करना संभव है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Wednesday, September 28, 2011

मनुस्मृति-राज्य जनता से कर प्राप्त करने में उदारता दिखाये (manusmruti-rajya,janta aur kar or tax)

             हमारे देश के अनेक अर्थशास्त्री हैं जिन्होंने आधुनिक शिक्षा पद्धति के आधार पर अध्ययन कर उपाधियां प्राप्त की हैं। हमारे देश में अर्थशास्त्र विषय के अंतर्गत अधिकतर पश्चिमी विद्वानों के सिद्धांतों का अध्ययन करते हैं जबकि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में केवल भक्ति ही नहीं वरन् अर्थशास्त्र के सिद्धांतों का भी प्रतिपादन किया गया है। इसमें राज्य व्यवस्था को किस तरह प्रजा के लिये संचालित करते हुए उससे कर वसूल किया जाय यह बताया गया है। हम देख रहे हैं कि पूरे विश्व में कर की वसूली और मुद्रा प्रचलन के जो नियम हैं वह अपूर्ण हैं और इसी कारण अनेक देश संकटों का सामना करते हैं तो अनेक जगह प्रजा त्रस्त और गरीब रहती है। राज्य कर्म के लिये पद पाने के मोह में लोग राजनीति के अर्थशास्त्र के नियमों का अध्ययन नहंी करते। इसके विपरीत हमारे प्राचीन विद्वान मनु, कौटिल्य तथा चाणक्य ने राजनीति और अर्थशास्त्र के सिद्धांतों की जो व्याख्या की है वह आज भी प्रासंगिक है।
हमारे महान मनीषी मनु की रचित मनुस्मृति में कहा गया है कि
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अष्टौमासान्यथादित्रूतोयं रश्मिभिः।
तथा हरेत्करंराष्ट्रान्नित्यर्कव्रतं हि तत्।।
           ‘‘राज्य प्रमुख को प्रजा से वैसे ही कर प्राप्त करना चाहिए जैसे सूर्य धरती से आठ माह तक अपनी किरणों के माध्यम से जल प्राप्त करता है।
प्रविश्य सर्वभूतानि यथा चरति मारुतः।
तथा हरेत्करंराष्ट्रान्नित्यमर्क हि तत्।।
              ‘‘राज्य प्रमुख को अपने गुप्तचरों के माध्यम से प्रजा की मनोवृत्ति की जानकारी उसी प्रकार रखनी चाहिए जिस प्रकार हवा सभी जीवों में प्रविष्ट होकर घूमती रहती है।’’
प्रतापयुक्तस्तेजस्वी नित्यं स्वात्पापकमेंसु।
दुष्टसामन्तहिंस्त्रश्च तदाग्नेयं व्रतं स्मृतम्।।
                ‘‘राज्य प्रमुख का आग्नेय व्रत यही है वह अपराधियों को दंड देने के लिये प्रतापयुक्त रहे तथा दुष्ट संपन्न लोगों के लिये हिंसक।’
           पूरे विश्व में यह देखा जा रहा है कि धनपति तथा अपराधी अपनी शक्ति के बल पर राज्य व्यवस्था को आतंकित किये रहते हैं। इसका कारण है कि राज्य कर्म के लिये पद पाने वाले न तो राजनीतिक सिद्धांतों का जानते हैं और न ही अर्थशास्त्र के नियमों का उनको ज्ञान होता है। किसी भी राज्य प्रमुख का सिंहासन प्रजा की प्रसन्नता से ही स्थिर रहता है। राज्य कर्म राजस भाव वाले लोग करते हैं उनसे सात्विकता की आशा तो नहीं करना चाहिए पर उनको भी अच्छे काम करने पर ही प्रजा से सम्मान की इच्छा करना चाहिए। राजसवृत्ति के लोग फल की आशा में ही अपना काम करते है अतः उनके लिये अपने कर्म फल का भी विचार करना आवश्यक है इतना ही नहीं जनता पर कर लगाते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसका आर्थिक आधार समाप्त न हो। राज्य व्यवस्था के लिये होने वाले व्यय में मितव्ययता का प्रदर्शन करे। एक बात याद रखना चाहिए कि राज्य धर्म का पालन करने वाले ही राज्य प्रमुख को जनता भगवत् स्वरूप मानती है अन्यथा उसकी दृष्टता से दुःखी होकर उसके अनिष्ट की कामना करती है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, September 8, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-अपनी जीभ पर काबू रखने वाला ही प्रभावी

         मनुष्य का धर्म है कि वह अपना कर्म निरंतर करता रहे। अपनी वाणी और विचार पर नियंत्रण रखे। भगवान का स्मरण करते हुए अपनी जीवन यात्रा सहजता से पूर्ण करे। जहां तक हो सके अपने ही काम से काम रखे न कि दूसरों को देखकर ईर्ष्या करे। आमतौर से इस विश्व में लोग शांति प्रिय ही होते हैं इसलिये ही मानव सभ्यता बची हुई। यह अलग बात है कि शांत और निष्कर्मी मनुष्य की सक्रियता अधिक दिखती नहीं है इसलिये उसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं होती जबकि अशांति, दुष्टता और परनिंदा में लगे लोगों की सक्रियता अधिक दिखती है इसलिये आमजन उस पर चर्चा करते हैं।
     हम लोग परनिंदकों की बातें सुनकर मजे लेते हैं जबकि दूसरों की तरक्की से ईर्ष्या के साथ उसकी निंदा करने वालों की बातें सुनना भी अपराध है। ऐसे लोग पीठ पीछे किसी आदमी की निंदा कर सामने मौजूद आदमी को प्रसन्न अवश्य करते हैं पर सुनने वाले को यह भी सोचना चाहिए कि उसके पीछे वही आदमी उसकी भी निंदा कर सकता है।
       आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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       दह्यमानाः सुतीत्रेण नीचा पर-यशोऽगिना।
           अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
     ‘‘दुर्जन आदमी दूसरों की कीर्ति देखकर उससे ईर्ष्या करता है और जक स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो प्रगतिशील आदमी की निंदा करने लगता है।’’
       यदीच्छसि वशीकर्तु जगदकेन कर्मणा।
            परापवादस्सयेभ्यो गां चरंतीं निवारथ।।
       ‘‘यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि वह समस्त संसार को अपने वश में करे तो उसे दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिए। अपनी जीभ को वश में करने वाला ही अपना प्रभाव समाज पर रखता है।
           इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी दिखते हैं जिनका उद्देश्य अपना काम करने अधिक दूसरे का काम बिगाड़ना होता है। सकारात्मक विचाराधारा से अधिक उनको नकारात्मक कार्य में संलिप्त होना अधिक अच्छा लगता है। रचना से अधिक विध्वंस में उनको आनंद आता है। अंततः वह अपने लिये हानिदायक तो होते हैं कालांतर में अपने सहयेागी की भी लुटिया डुबो देते हैं।
        जो लोग सोचते हैं कि उनको समाज में सम्मान प्राप्त हो उनके लिये यह जरूरी है कि वह अपनी ऐसी संगत बदल दें जिसके साथ रहने पर लोग उनसे भी हानि होने की आशंका से ग्रस्त रहते हैं। यह भय सम्मान दिलाने में सबसे अधिक बाधक है। इसके अलावा किसी की निंदा तो बिल्कुल न करें क्योंकि अगर किसी आदमी के सामने आप अन्य की पीठ पीछे निंदा करते हैं तो सामने वाले के मन में यह संशय भी आ सकता है कि बाद में आप उसकी भी निंदा करे। इससे विश्वास कम होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Thursday, September 1, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-शराबी भरोसे लायक नहीं होते (kautilya ka arthshastra-sharabi aur bharosa)

            यह प्रकृति की महिमा है कि मनुष्य का ध्यान व्यसनों की तरफ बहुत आसानी से चला जाता है। इसमें मद्यपान तथा जुआ दो ऐसे व्यसन हैं जो आदमी के तन, मन और धन की क्षति करते हैं पर फिर भी वह इसे अपनाता है। यह सही है कि सारे संसार में लोग एक जैसे नहीं होते पर प्रवृत्ति तो सभी की एक जैसी है। जिनके पास धन आता है उनका ऐसी राह पर चले जाना सहज होता है। जिनके पास धनाभाव है वह ऐसी प्रवृत्तियों में लिप्त इसलिये नहीं होते क्योंकि उनके पास अवसर नहीं होता।
          आर्थिक विशेषज्ञ अपने आंकड़े बताते हैं कि भारत में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो सामाजिक विशेषज्ञ भी यह रेखांकित करते हैं कि देश में खतरनाक प्रवृत्तियों वाले लोग भी बढ़ते जा रहे हैं। शराब और जुआ के प्रति लोगों का रूझान बढ़ रहा है। स्थिति यह है कि धनिकों की संगत वाले युवा अपनी जरूरतों के लिये अपराध की तरफ अपने कदम बढ़ाते जा रहे हैं।
पानझिप्तो हि पुरुषो यत्र तत्र प्रवर्तते।
वात्यसंव्यवहारर्यत्वै यत्र तत्र प्रवर्त्तनात्।।
                ‘‘मद्यपान का आदी पुरुष हर जगह अपना मुंह डालते हैं। मद्यपान के आदी पुरुष व्यवहार के योग्य नहीं रह जाते।’’
कामं स्त्रियं निषेवेत पानं वा साधुमात्रया।
न युतमृगये विद्वान्नात्यंव्यसने हि ते।।
             ‘‘भले ही कोई पुरुष स्त्रियों से अधिक संपर्क रखता हो और थोड़ी मात्रा में मद्यपान भी करे पर द्युतक्रीड़ा और शिकार में लिप्त होना तो बहुत बुरा व्यसन है।’’
          भारतीय समाज में अनेक विरोधाभास हैं जिनमें एक यह भी है कि जहां धर्म कर्म के नाम पर शोरशराबा बढ़ रहा है वही शराब और जुआ को सामाजिक शिष्टाचार माना जाने लगा है। अब तो यह संभव ही नहीं है कि कोई व्यक्ति यह कहे कि मैं शराबी से अपने संपर्क नहीं रखूंगा। पहले जिन रिश्तों के सामने शराब की बात तक कहना भी कठिन था उनके पास बैठक बड़े मजे से सेवन किया जाता है।
              इस तरह विचार परिवर्तन से सत्य नहीं बदल जायेगा। शराब शनै शनै मनुष्य की मानसिकता को प्रभावित करती है। उसके व्यवहार में विश्वास की कमी आने लगती है। इस बात को केवल तत्वज्ञानी ही अनुभव कर सकते हैं। वैसे आज तो यह स्थिति है कि मित्रता और व्यवहार के समूह बनते ही ऐसी आदतों पर हैं जिनको वर्जित माना जाता है। जुआ या सट्टा तो इस तरह आम हो गया है कि प्रसिद्ध खेल, धारावाहिक और चुनावों में इसका प्रभाव देखा जाता है। ऐसे में समाज के बिगड़ने की शिकायत करना बेमानी लगता है। यहां तो पूरी दाल ही काली है और जब हम समाज के बिगड़ने की बात कहते हैं तो अपनी मान्यताओं का भी विचार करना चाहिए। स्वयं तथा निकटस्थ लोगों को शराब और जुआ जैसे व्यवसनों से दूर रहने के लिये प्रेरित करना चाहिए।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, August 14, 2011

चाणक्य नीति-नालायक राजा से प्रजा दुखी रहती है

             मनुष्य अपने जीवन में संबंध बढ़ाकर आनंद प्राप्त करना चाहता है। अधिक से अधिक मित्र बनाकर अपने आपको ही इस बात की तसल्ली देता है कि वह शत्रुओं से बचा रहेगा। उसी तरह अनेक लोग अपने घर की स्त्री से बाहर की स्त्रियों से संपर्क रखकर यह सोचता है कि वह जीवन आनंद से बितायेगा। ऐसे अनेक भ्रम हैं जिनके चक्कर में पढ़कर आदमी अपना जीवन कष्टप्रद बना लेता है। उसी तरह मनुष्य अनेक स्थानों पर संपत्ति का निर्माण भी यही सोचकर करता है कि एक जगह से परेशान होकर दूसरी जगह आराम से जाकर रहेगा। लालची, लोभी और अहंकार मनुष्य तर्क की कसौटी पर काम न कर केवल काल्पनिक सुखों के आधार पर चलता है जो कि उसे नहीं मिल पाते। इसी कारण उसे आनंद की जगह तनाव की प्राप्ति होती है।
आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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कुराज्यनेकृतः प्रजासुखं कुमित्रमित्रेण कुतोऽस्ति निवृत्तिः।
कुदारदारैश्च केतो गृहे रतिः कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः।।
            ‘दुष्ट राजा के राज्य से प्रजा को सुख नहीं मिलता। धोखा देने वाले मित्र की संगत में दुःख ही मिलता है उसी तरह दुष्ट स्त्री को भार्या बनाने से प्रेम मिलना मुश्किल है। किसी गुरु को भी कुठित मानसिकता वाले शिष्य को शिक्षा देने से यश नहीं मिलता।"
             जितना भी हम अपने संबंधों और संपत्ति का विस्तार करते हैं कालांतर में उनको निभाने और संभालने का भी संकट उत्पन्न होता है। इसके अलावा जो अपेक्षाऐं हम करते हैं वह सभी पूर्ण हो जायें यह संभव नहीं है। उम्र और समय के साथ आदमी की शक्ति कभी कभी क्षीण भी होती है तब जीवन में विस्तारित कृत्य अत्यंत कष्टकारक हो जाते हैं। इसलिये जहां तक हो सके सीमित साधनों के साथ सीमित लक्ष्यों की पूर्ति का प्रयास करना चाहिए। अधिक अपेक्षाऐं करना ठीक नहीं है। महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा हो या किसी व्यक्ति से संबंध स्थापित करने का भाव मन में हो तब तर्क की कसौटी पर विचार करना चाहिए। बिना सोचे समझे कम करने के परिणाम कभी अच्छे  भी नहीं होते।
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Thursday, August 11, 2011

पतंजलि योग विज्ञान-दृष्टा बनकर जीवन को देखना चाहिए (life see as vewers-patanjali yog scince)

            पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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            द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः।।
          ‘‘चेतनमात्र दृष्ट (आत्मा) यद्यपि स्वभाव से एकदम शुद्ध यानि निर्विकार तो बुद्धिवृति के अनुरूप देखने वाला है।
           तदर्थ एवं दृश्यस्यात्मा।।
         ‘‘दृश्य का स्वरूप उस द्रष्टा यानि आत्मा के लिये ही है।’’
                    संपादकीय व्याख्या-पंचतत्वों से बनी इस देह का संचालन आत्मा से ही है मगर उसे इसी देह में स्थित इंद्रियों की सहायता चाहिए। आत्मा और देह के संयोग की प्रक्रिया का ही नाम योग है। मूलतः आत्मा शुद्ध है क्योंकि वह त्रिगुणमयी माया से बंधा नहीं है पर पंचेंद्रियों के गुणों से ही वह संसार से संपर्क करता है और बाह्य प्रभावों का उस पर प्रभाव पड़ता है।
           आखिर इसका आशय क्या है? पतंजलि विज्ञान के इस सूत्र का उपयोग क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर तभी जाना जा सकता है जब हम इसका अध्ययन करें। अक्सर ज्ञानी लोग कहते हैं कि ‘किसी बेबस, गरीब, लाचार, तथा बीमार या बेजुबान पर अनाचार मत करो’ तथा ‘किसी असहाय की हाय मत लो’ क्योंकि उनकी बद्दुआओं का बुरा प्रभाव पड़ता है। यह सत्य है क्योंकि किसी लाचार, गरीब, बीमार और बेजुबान पशु पक्षी पर अनाचार किया जाये तो उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही वह स्वयं दानी या महात्मा न हो चाहे उसे ज्ञान न हो या वह भक्ति न करता हो पर उसका आत्मा उसके इंद्रिय गुणों से ही सक्रिय है यह नहीं भूलना चाहिए। अंततः वह उस परमात्मा का अंश है और अपनी देह और मन के प्रति किये गये अपराध का दंड देता है।
         कुछ अल्पज्ञानी अक्सर कहते है कि देह और आत्म अलग है तो किसी को हानि पहुंचाकर उसका प्रायश्चित मन में ही किया जा सकता है इसलिये किसी काम से डरना नहीं चाहिए। । इसके अलावा पशु पक्षियों के वध को भी उचित ठहराते हैं। यह अनुचित विचार है। इतना ही नहीं मनुष्य जब बुद्धि और मन के अनुसार अनुचित कर्म करता है तो भी उसका आत्मा त्रस्त हो जाता है। भले ही जिस बुद्धि या मन ने मनुष्य को किसी बुरे कर्म के लिये प्रेरित किया हो पर अंततः वही दोनों आत्मा के भी सहायक है जो शुद्ध है। जब बुद्धि और मन का आत्मा से संयोग होता है तो वह जहां अपने गुण प्रदान करते हैं तो आत्मा उनको अपनी शुद्धता प्रदान करता है। इससे अनेक बार मनुष्य को अपने बुरे कर्म का पश्चाताप होता है। यह अलग बात है कि ज्ञानी पहले ही यह संयोग करते हुए बुरे काम मे लिप्त नहीं होते पर अज्ञानी बाद में करके पछताते हैं। नहीं पछताते तो भी विकार और दंड उनका पीछा नहीं छोड़ते।
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Friday, August 5, 2011

मनुस्मृति से संदेश-प्रजा हित के लिये राज्यप्रमुख को हमेशा युद्ध के लिये तैयार रहना चाहिए (king should always reddy to war for public welfare-manu smriti)

             समाज हित के लिये राज्य और राजा की व्यवस्था पूरे विश्व में स्वीकार की गयी है। किसी भी राज्य के कार्य का दायरा अत्यंत विस्तृत होता है। केवल एक राजा या उसके कुछ अनुचर मिलकर पूरे राज्य की व्यवस्था नहीं चला सकते इसलिये राजा और प्रजा के बीच एक बहुत बड़ा संगठन होता है जिसमें प्रथक प्रथक विभाग होते हैं जिनमें कार्य करने वाले व्यक्तियों के लिये पदों का सृजन किया जाता है। राज्य प्रमुख या राजा तो एक ही होता है पर उसके अंतर्गत अनेक राजकीय कर्मी अनुचर पदों के नाम से शासन करते हैं। यही कारण है कि प्रजा में से अनेक लोग राजकीय पदों पर भी सुशोभित होते हैं पर राजकीय पद के अहंकार में वह प्रजाजनों से ही राजा की तरह बर्ताब करते हैं। यह बुरा नहीं है पर अगर ऐसे राजकीय पदधारी लोग राजनीति नहीं जानते तो वह समाज का संकट बन जाते हैं। इतना ही नहीं अगर वह सक्षम न हों तो राजा के शत्रुओं के लिये हमले करना आसान हो जाता है। इसलिये यह आवश्यक है कि राजकीय पदों पर राज्य प्रमुख के अनुचर पदों वाले लोग भी राजनीति शास्त्र का ज्ञान रखें।
                साम्ना दोनेन भेदेन समस्तैरथवा पृथक।
                 विजेतुः प्रयतेतनारीन्न युद्धेन कदाचन्।।
           ‘‘जिस राज्य प्रमुख को जीत की इच्छा हो वह साम, दाम तथा भेद नीति के माध्यम से किसी भी शत्रु को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करे। अगर उसमें असफल हो तो फिर उसे दंडात्मक कार्यवाही यानि युद्ध करना ही चाहिए।’’
               त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्त्तानामसम्भवे।
                 ततो युध्येत संपन्नो विजयेत रिपून्यथा।।
             ‘‘साम, दाम तथा भेद नीतियों में सफलता न मिले तो फिर राजा को अपने शत्रु के विरुद्ध पूरी तैयारी के बाद युद्ध छेड़ना चाहिए ताकि निश्चित रूप से विजय मिल सके।
                आधुनिक लोकतंत्र में राज्य प्रमुख की शक्तियों का विकेंद्रीकरण हो गया है इसलिये अनेक स्थानीय, प्रादेशिक तथा केंद्रीय स्तर के पद भी राज्य प्रमुख की तरह आकर्षक प्रभाव रखने वाले हो गये हैं। उनके आकर्षण के शिकार लोग उनको पाना चाहते हैं। उनको लगता है कि यह पद समाज पर प्रभाव दिखाने के लिये सबसे आसान मार्ग हैं। वह कभी यह नहीं सोचते कि इन पदों से राज्य का उपभोग तो किया जाता है पर अपने कौशल से प्रजा की रक्षा भी की जाती है। इसके लिये राजनीति शास्त्र का ज्ञान होन आवश्यक है। खासतौर से राज्य के शत्रुओं से निपटने की कला आना चाहिए। जिसमें वीरता के साथ प्रबंध कौशल भी होना चाहिए। यही कारण है कि हम देख रहे हैं कि विश्व राजनीति में ऐसे लोग भी शीर्ष पदों पर पहुंच रहे हैं जो प्रत्यक्ष शासन करते दिखते हैं पर उनकी डोर धनपतियों, बाहुबलियों तथा चालाक लोगों के हाथ में होती है। हिटलर जैसे लोग भी इतिहास में हुए हैं पर शक्ति के बल पर हासिल सत्ता अपने राज्य का भला करने की बजाय उसे हानि पहुंचाते हैं। शक्ति के मद में चूर अनावश्यक रूप से युद्ध करते हैं और बाद में मारे जाते हैं। फिर गद्दाफी जैसे लोग भी हुए हैं जो शक्ति के दम पर सत्ता प्राप्त करने के बाद भ्रष्ट हो जाते हैं और प्रजा के शत्रु हो जाते हैं। अगर हम पूरे विश्व की वर्तमान व्यवस्था को देखें तो लगता है कि अनेक लोग केवल अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए राजकर्म  करते हैं  न कि उनका लक्ष्य प्रजा  या समाज का भला करना होता है। उनको राजनीतिशास्त्र का ज्ञान न के बराबर होता, भले ही वह  पद कितने भी बड़े पद पर बैठे हों। 
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Tuesday, August 2, 2011

अथर्ववेद-जो प्रजा की सुरक्षा करे वही इंद्र के समान राजा कहा जाता है

         सभी मनुष्य को अपने लिये नियत तथा स्वाभाव के अनुकूल कार्य करना चाहिए। इतना ही नहीं अगर सार्वजनिक हित के लिये कोई कार्य आवश्यक करने की अपने अंदर क्षमता लगे तो उसमें भी प्राणप्रण से जुट जाना चाहिए। अगर हम इतिहास और धर्म पुस्तकों पर दृष्टिपात करें तो सामान्य लोग तो अपना जीवन स्वयं और परिवार के लिये व्यय कर देते हैं पर जो ज्ञानी, त्यागी और सच्चे भक्त हैं पर सार्वजनिक हित के कार्य न केवल प्रारंभ करते हैं बल्कि समय आने पर बड़े बड़े अभियानों का नेतृत्व कर समाज को सम्मान और परिवर्तन की राह पर ले जाते हैं। ऐसे लोग न केवल इतिहास में अपना नाम दर्ज करते हैं वरन् अपने भग्वत्स्वरूप हो जाते हैं।
भारतीय अध्यात्म ग्रंथ अथर्ववेद में कहा गया है कि
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यः शर्धते नानुददाति शुध्यां दस्योर्हन्ता स जनास इन्द्रः।
‘‘जो मनुष्य अहंकारी के अहंकार को दमन करता है और जो दस्युओं को मारता है वही इन्द्र है।’’
यो जाभ्या अमेथ्यस्तधत्सखायं दुधूर्षति।
ज्योष्ठो पदप्रचेतास्तदाहु रद्यतिगति।
‘‘जो मनुष्य दूसरी स्त्री को गिराता है, जो मित्र की हानि पहुंचाता है जो वरिष्ठ होकर भी अज्ञानी है उसको पतित कहते हैं।’’
       एक बात निश्चित है कि जैसा आदमी अपना संकल्प धारण करता है उतनी ही उसकी देह और और मन में शक्ति का निर्माण होता है। जब कोई आदमी केवल अपने परिवार तथा स्वयं के पालन पोषण तक ही अपने जीवन का ध्येय रखता है तब उसकी क्षमता सीमित रह जाती है पर जब आदमी सामूहिक हित में चिंत्तन करता है तब उसकी शक्ति का विस्तार भी होता है। शक्तिशाली व्यक्ति वह है जो दूसरे के अहंकार को सहन न कर उसकी उपेक्षा करने के साथ दमन भी करता है। समाज को कष्ट देने वालों का दंडित कर व्यवस्था कायम करता है। ऐसी मनुष्य स्वयं ही देवराज इंद्र की तरह है जो समाज के लिये काम करता है। शक्तिशाली मनुष्य होने का प्रमाण यही है कि आप दूसरे की रक्षा किस हद तक कर सकते हैं।
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Friday, July 22, 2011

हिन्दू धर्म संदेश-मन पवित्र न हो तो भक्ति से कोई लाभ नहीं (man pavitra hone par hi bhakti se labh-hindu relgiion thought)

               हमारे अध्यात्मिक दर्शन मे भक्ति के प्रकारों को लेकर कोई विवाद नहीं है यह अलग बात है कि कुछ लोग अनावश्यक रूप से इस पर विवाद होता दिखाते हैं। हमारे वेदशास्त्रों में अस्सी फीसदी से ज्यादा सकाम भक्ति पर लिखा गया है तो बीस फीसदी निष्काम भक्ति पर चर्चा की गयी है। श्रीगीता चूंकि समस्त वेदों का सार माना जाता है इसलिये उसका महत्व बहुत है। उसमें स्पष्ट रूप से निराकार तथा निष्काम भक्ति को श्रेष्ठ बताया गया है पर सकाम और साकार भक्ति की महत्ता को भी स्वीकार किया गया है। यही कारण है कि हमारे यहां भक्तों में परमात्मा के स्परूप को लेकर विवाद नहीं होता। अनेक इतिहासकारों के साथ विदेशी संस्कृति और धर्म के देशी समर्थक भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का मखौल उड़ाते हुए कहते हैं कि उनका कोई एक ग्रंथ या भगवान नहीं है। उनकी इस आलोचना का भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान समर्थक अधिक प्रतिकार नहीं करते हुए समाज में एकरसता लाने की वकालत करते हैं। दरअसल ऐसे लोगों ने श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन नहीं किया होता। यदि अध्ययन किया होता है तो समझा नहीं होता।
हमारे अध्यात्मिक दर्शन में सकाम तथा सगुण भक्ति का महत्व स्वीकार किया गया है पर भाव निष्काम होने की बात कही गयी है। इस विषय पर हमारे ग्रंथो में कहा गया है कि--
सम्प्रीतिभोज्यान्यन्ननि आपभ्दोन्यानि वा पुनः।
न च सम्प्रीयस राजन् न चैवायद्गता वयम्।।
                    पूर्णकाम होने के कारण भगवान किसी भी वस्तु की चाहत नहीं रखते। वह तो प्रेम के भूख हैं। भगवान कहते हैं कि पत्र, पुष्प, फल अथवा जल जैसी वस्तुऐं मनुष्यों को बिना परिश्रम के बड़ी सरलता से मिल जाती हैं इसलिये उनको मुझे अर्पण करना कोई बड़ी बात नहीं है। इस अर्पण में प्रेम का भाव होना चाहिए। जो भक्त प्रेम से यह वस्तुऐं अर्पण करता है उसके निष्काम भाव को देखकर में सगुण रूप में प्रकट होकर खाता हूं।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो में भक्तया प्रयच्छति।
तदहं भवत्युपतमनश्नामि प्रयतात्मनः।।
             "जिस मनुष्य का हृदय शुद्ध न हो तो वह चाहे बाहर से कितना भी शिष्टाचार दिखाते हुए पत्र, पुष्प, फल तथा जल जैसे वस्तुऐं प्रदान करे उसे भगवान स्वीकार नहीं करते"
                   श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण योगासन, प्राणयाम तथा मंत्र जाप करने वाले भक्त को सर्वश्रेष्ठ बताते हैं पर साथ ही सकाम भक्ति को राजस भाव से उत्पन्न होने के कारण स्वभाविक भी मानते हैं। निष्काम तथा निर्गुण भक्ति में व्यक्ति को अंतर्मुखी होना पड़ता है जो कि कठिन होता है क्योंकि उससे बाहर प्रतिक्रिया दिखाई नहीं देती जबकि सकाम तथा सगुण भक्ति में लोगों को उसका बाहरी प्रदर्शन बहुत अच्छा लगता है। इसलिये सामान्य लोग उसी तरफ आकर्षित होते है। यह भी बुरा नहीं है पर उसमें भाव निष्काम होना चाहिये यही हमारे धर्मग्रंथों का कहना है।

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Saturday, July 2, 2011

दक्ष स्मृति-योग शक्ति के प्रभाव अत्यंत व्यापक (daksh smriti-yoga shakti atayant vyapak)

       जब हम योग साधना के विषय से संबंधित ग्रंथों की सामग्री पर दृष्टिपात करते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई विज्ञान हो। हालांकि उसके सूत्र अत्यंत सूक्ष्म हैं पर उनका अर्थ अत्यंत गूढ़ है।अनेक योग प्रचारक अपने शिष्यों को तात्कालिक दैहिक प्रभाव दिखाने वाले आसनों तथा प्राणायामों के बारे में सिखाते हैं जबकि योग विधा के आठ अंग होते हैं जिनका ज्ञान होने पर आदमी ज्ञानी हो जाता है।
      इसमें कोई संशय नहीं है कि योगासन तथा प्राणायाम का बहुत महत्व है पर यह भी जरूरी है कि पतंजलि योग के मूल तत्वों का भी ज्ञान प्राप्त किया जाये। योगासन और प्राणायाम से शरीर में स्फूर्ति और स्थिरता आती है तब मानव मन कोई अच्छा विचार करना चाहता है। मन में बेहतर विषयों के अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करना एक महत्वपूर्ण कार्य साबित हो सकता है। पतंजलि योग में वर्णित आठों भागों का ज्ञान प्राप्त होने पर हमारे अंदर योग शक्ति का निर्माण होता है। मन के उतार चढ़ाव, इंद्रियों की गतिविधियों तथा देह के अंदर चल रही प्रक्रिया को हम अपनी अंतदृष्टि से देखते हैं। इससे हमारे अंदर संसार के व्यवहार का ज्ञान आता है।
                दक्षस्मृति में कहा गया है कि
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         लोको वशीकृतों येन यन चात्मा वशीकृतः।
         इन्द्रियार्थो जितोयने ते योग प्रब्रवीम्यहम्।।
               ‘‘योग से मनुष्य सारे संसार को वश में कर सकता है। बिना योग शक्ति के किसी को भी वश में करना संभव नहीं है। बिना योग के व्यवहार का भी ज्ञान नहीं होता न ही इंद्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है।’’
                सच बात तो यह है कि बोलते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते और देखते हुए केवल एक प्रयोक्ता की तरह हो जाते हैं। अपने अंदर के स्वामित्व का आभास तनिक भी नहीं रहता। हमारी इंद्रियां कार्यरत हैं पर उन पर हमारी नज़र नहीं रहती। हमें लगता है कि सारे काम हम कर रहे हैं पर यह भूल जाते हैं कि यह सब इंद्रियों की गतिविधियों का परिणाम है। हम इंद्रियों के प्रयोक्ता हैं पर यह अहसास नहीं होता। यही अहसास अपने स्वामित्व होने का परिचय देता है और आदमी दृष्टा की तरह हो जाता है। तब वह संसार के व्यवहार के सिद्धांतों को अच्छी तरह समझता है। इसी कारण योग साधना तथा ध्यान में हमेशा तत्पर रहना चाहिए। इससे जो ज्ञान प्राप्त होता है वह आदमी को विश्व विजयी बना सकता है।
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Wednesday, June 29, 2011

अथर्ववेद से संदेश-विद्वान लोग ही बहसों में सत्य का निष्कर्ष प्रस्तुत कर पाते हैं (atharvaved se sandesh-vidvan, bahas aur nishkarsh)

         प्रचार माध्यमों की बढ़ती संख्या से विषय सामग्री पर चर्चाओं के लिये बहसों की परंपरा भी बढ़ती जा रही है।  सांसरिक विषयों पर पक्ष और विपक्ष में वैचारिक योद्धा युद्धरत रहकर समाज को बौद्धिक मनोरंजन प्रदान करते हैं। हमारा देश तो बहसों और चर्चाओं में बहुत पारंगत है। अब यह अलग बात है कि सार्थक विषयों पर बहस कितनी होती है और निरर्थक विषय समाज में कितने लोकप्रिय हैं, इस पर दृष्टिपात कोई नहीं करता। अध्यात्मिक विषयों पर बहस तो शायद ही कभी होती है जबकि सांसरिक विषयों को इस तरह प्रस्तुत किया जाता है जैसे कि वह अध्यात्मिकता से जुड़े हैं। ऐसा मान लिया गया है कि आज के भौतिक युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का कोई महत्व नहीं है। इतना जरूर है कि जब सांसरिक विषयों में अपनी बुद्धि लगाये रखने से उकताये लोगों का मन कभी न कभी अध्यात्मिक विषय में लिप्त होने का करता है। ऐसे में उनको सत्य और असत्य पर बहसों में भाग लेना अच्छा लगता है मगर उनके निष्कर्ष निकालना केवल ज्ञानी लोगों के लिये ही संभव है।
          अथर्ववेंद में कहा गया है कि
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            सुविज्ञानं चिकितेषुजनायसच्चासच्च वयसी पस्पृधाते
             तर्योर्यत्सत्यं यतरह जीयस्तदित्सोमोऽहन्त्यासतु।
       ‘‘ज्ञानी मनुष्य के विशिष्ट ज्ञान की यह पहचान है वह सत्य और असत्य भाषणों में जो स्पर्धा रहती है उसमें सरलता और सत्य की रक्षा करते हुए असत्य को विलोपित करता है।
        ‘‘इंद्र मित्रं वरुणमाग्नियाहुरथो दिव्यः स सुपर्णों गुरुत्मान्।      
          एकं साद्विप्रा बहुधा वदन्त्यानि वमं मातरिश्वानमाहुः।
         ‘‘सत्य एक ऐसा विषय है जिसका ज्ञानी अनेक प्रकार से वर्णन करते हैं। उसी तरह एक इंद्र को मित्र, वरुण, अग्नि, दिव्य, सुवर्ण, गुरुत्भानु, यम और माता शिखा कहते हैं।’’
        ज्ञानी लोग कभी अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करते। जब तक कोई पूछे नहीं तब तक तत्वज्ञान का उपदेश नहीं करते। यह जरूर है कि वह जिज्ञासावश दूसरों की बहसें सुनते हुए उनमें सत्य और सरल भाव के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हैं। निष्कर्ष निकालते हुए निरर्थक तर्कों से अधिक वह सार्थक तत्वों पर अपनी दृष्टि रखते हैं। वैसे देखा जाये तो तत्वज्ञान कोई व्यापक नहीं है पर अधिकतर विद्वान उस पर अपने अपने अनुसार व्याख्यायें प्रस्तुत करते हैं। उनकी व्याख्यायें से अल्पज्ञानियों को ऐसा लगता हे कि सत्य कोई अद्भुत तथा रहस्यमय विषय है पर ज्ञानी लोग ऐसा नहीं सोचते। ज्ञानी लोगों में विनम्रता होती है इसलिये वह सत्य पर की गयी अलग अलग व्याख्याओं का सार समझ लेते हैं।
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Wednesday, June 15, 2011

हिन्दी चाणक्य नीति-अन्न, जल और मधुर वाणी रत्न के समान (hindi chankya neeti-anna, jal aur madhur wani ratna ke saman)

      देखा जाये तो हमें प्रकृति का आभारी होना चाहिए जिसने हमारे देश को खनिज, कृषि तथा जलवायु की दृष्टि से संपन्न होता है। प्रकृति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में भूगर्भ जलस्तर अन्य देशों की अपेक्षा सबसे कम नीचे मिलता है। मतलब हमारे यहां जलस्त्रोत सहजता से उपलब्ध हैं। इस बात को समझने की बजाय  आधुनिक प्रचार माध्यमों के विज्ञापनों से पूरा भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो रहा है। क्रिकेट खिलाड़ियों, फिल्म अभिनेता तथा अभिनेत्रियों के अभिनीत विज्ञापन उपभोग की ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति को जाग्रत करते हैं कि लोगों की अध्यात्मिक चेतना लुप्त हो गयी है। फिर हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसी प्रणाली अपनाई गयी है जो केवल गुलाम बनाती है। ऐसे में अगर किसी में रचनात्मक प्रवृत्ति जाग्रत हो जाये तो वह पूर्व जन्म का ही प्रभाव समझे तो अच्छा है वरना तो    अब व्यक्ति में चरित्र निर्माण की बजाय उसे प्रयोक्ता और सेवक बनने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
       वैसे समाज की हालत तो कोई पहले भी अच्छी नहीं थी। सोना, चांदी, हीरा और रत्नों की चाहत हमारे समाज में हमेशा रही है। शायद यही कारण है कि हमारे मनीषी मनुष्य के अंदर मौजूद उस रत्न का परिचय कराते रहे हैं जिसे आत्मा कहा जाता है। इसके बावजूद लोग भौतिक संसार की चकाचौंध में खो जाते हैं और सोना, चांदी और हीरे की चाहत में ऐसे दौड़ते हैं कि पूरा जीवन ही अध्यात्मिक ज्ञान के बिना गुजार देते हैं। जिस अन्न और जल से जीवन मिलता है उसे तुच्छ समझते हैं एक पल का चैन न दे वही सोना गले लगा देते हैं। उसी तरह देहाभिमान से युक्त होने के कारण अधिक वाचाल होकर क्रूरतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। जिससे समाज में वैमनस्य बढ़ता है।
           महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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          पृथिव्यां त्रीणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
             मूर्खे पाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
         ‘‘इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं-अन्न, जल और मधुर वाणी, किन्तु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।’’
       अक्सर लोग कहते हैं कि भारतीय लोगों के पास दुनियां के अन्य देशों के मुकाबले बहुत अधिक सोना है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि उससे अधिक तो हम पर परमात्मा की यह कृपा है कि दुनियां के अन्य देशों से अधिक हमारे यहां भूगर्भ जलस्तर के साथ अन्य प्रकृति संपदा भी बड़े पैमाने पर उपलब्ध है।  वैसे आजकल बाज़ार के सौदागर यह प्रयास भी कर रहे हैं कि यहां जल सूख जाये और उसे बेचकर अपने बैंक खाते बढ़ायें। अनेक तरह के ठंडे पेयों के कारखाने यहां स्थापित हो गये हैं जो अपने इलाके का पूरा जल पी जाते हैं। वहां का जलस्तर कम हो गया है पर भारतीय जनमानस ऐसी चकाचौंध में खो गया है कि उसे इसका आभास ही नहीं होता। जल जैसा रत्न हम खोते जा रहे हैं पर आर्थिक विकास का मोह ऐसा अंधा किये जा रहा है कि उसकी परवाह नहीं है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Monday, June 13, 2011

परिणाम का कर्म से संबंध जानना चाहिए-पतंजलि योग साहित्य

        पतंजलि योग शस्त्र में कहा गया है कि
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          क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।
          ‘‘किसी कार्य करने के क्रम में भिन्नता से परिणाम भी भिन्न होता है।’’
         परिणामन्नयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।।
        ‘‘अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का विचार करने से परिणाम का ज्ञान हो जाता है।’’
                   पतंजलि योग में न केवल भौतिक तथा दृश्यव्य संसार को जानने की विधा बताई गयी है बल्कि अभौतिक तथा अदृश्यव्य स्थितियों के आंकलन का भी ज्ञान दिया गया है। हमारे सामने जो भी दृश्य आता है वह तत्काल प्रकट नहीं होता बल्कि वह किसी के कार्य के परिणाम स्वरूप ही ऐसा होता है। कोई व्यक्ति हमारे घर आया तो इसका मतलब वह किसी राह से निकला होगा। वहां भी उसके संपर्क हुए होंगे। वह हमारे घर पर जो व्यवहार करता है वह उसके घर से निकलने से लेकर हमारे यहां पहुंचने तक आये संपर्क तत्वों से प्रभावित होता है। वह धूप में चलकर आया है तो दैहिक थकावट के साथ मानसिक तनाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। कोई घर से लड़कर आया है तो उसका मन भी वहीं फंसा रह जाता है और भले ही वह उसे प्रकट न करे पर उसकी वाणी तथा व्यवहार अवश्य ही नकारात्मक रूप से परिलक्षित होती है।
               कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रतिदिन जो काम करते हैं या लोगों हमारे लिये काम करते हैं वह कहीं न कहीं अभौतिक तथा अदृश्यव्य क्रियाओं से प्रभावित होती हैं। इसलिये कोई दृश्य सामने आने पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उस दृश्य के पीछे कौन कौन से तत्व हैं। व्यक्ति, वस्तु या स्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई धटना हमारे सामने घटित होती है। जब हमें यह ज्ञान हो जायेगा तब हमारे व्यवहार में दृढ़ता आयेगी और हम अनावश्यक परिश्रम से बच सकते हैं। इतना ही नहीं किसी दृश्य के सामने होने पर जब हम उसका अध्ययन करते हैं तो उसके अतीत का स्वरूप भी हमारे अंतर्मन में प्रकट होता है। जब उसका अध्ययन करते हैं तो भविष्य का भी ज्ञान हो जाता है।
               हम अपने साथ रहने वाले अनेक लोगों का व्यवहार देखते हैं पर उसका गहराई से अध्ययन नहीं करते। किसी व्यक्ति के मन में अगर पूर्वकाल में से दोष रहे हैं और वर्तमान में दिख रहे हैं तो मानना चाहिए कि भविष्य में भी उसकी मुक्ति नहीं है। ऐसे में उससे व्यवहार करते समय यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि वह आगे सुधर जायेगा। योग साधना और ध्यान से ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति स्वचालित ढंग से परिणाम तथा दृश्यों का अवलोकन करता है। अतः वह ऐसे लोगों से दूर हो जाता है जिनके भविष्य में सुधरने की आशा नहीं होती। जब हमारा  कोई कार्य सफल नहीं होता तब हम भाग्य को दोष देते हैं जबकि हमें उस समय अपने दोषों और त्रुटियों पर विचार करना चाहिए।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, June 5, 2011

व्यवहार में घमंड रखने वालों से दूर रहे-भर्तृहरि नीति शतक (vyavhar mein ghamand dikhane valon se door rahen-bhartrihari neeti shatak)

         जैसे जैसे विश्व में विकास हो रहा है वैसे वैसे ही लोगों के पास शारीरिक सुख के भौतिक साधनों एकत्रित होते जा रहे हैं। लोगों के लिये विलासिता ही सुख का पर्याय बन गयी है। शारीरिक श्रम के अभाव में अनेक तरह की बीमारियां जन्म लेती हैं। रुग्णता से ही मानसिक विकृति पनपती है।
      विश्व के अनेक स्वास्थ्य संगठन तथा विशेषज्ञ इस बात की ओर संकेत कर चुके हैं कि अनेक देशों में चालीस  प्रतिशत से अधिक लोग मनोरोगों से ग्रसित हैं पर वह न स्वयं न जानते हैं न दूसरों को ही आभास होता है। हम लोग यह समझते हैं कि मनोरोग होने का मतलब पागलपन से है। दरअसल हम विक्षिप्ता की चरम स्थित जिसे पागलपन कहा जाता है मनोरोग मान लेते हैं। वैसे मनोरोग की चरमस्थिति विक्षिप्पता ही है पर इसके अलावा भी ऐसी स्थितियां हैं जब कोई आदमी विक्षिप्त न हो पर मानसिक रूप से उसका मस्तिष्क तनाव से ग्रस्त होता है पर सामान्य दैहिक व्यवहार के चलते न उसे आभास होता है न दूसरे ही इस बात को समझते हैं। वह भी मनोरोग का शिकार हैं भले ही उनके सामान्य दैहिक क्रियाओं से यह लगता न हो। खासतौर से वर्तमान काल में जो लोग शारीरिक श्रम से बच रहे हैं उनका व्यवहार तो अनेक बार बेतुका हो जाता है और बातचीत में इसका आभास वही लोग कर सकते हैं जो परिश्रम करते हुए अपना मानसिक स्तर सामान्य बनाये हुए हैं।
            इस विषय पर भर्तृहरि महाराज कहते हैं
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             पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
             भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
            क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
            वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
           "भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।"
       जहां अमीरों और सम्मानित लोगों की महफिल होती है वहां उपस्थित होने वाले सभी एक तरह के होते हैं। इसलिये उन्हें आभास नहीं हो सकता कि कौन मनोरोगी हैं और कौन नहीं। कोई छोटा आदमी वहां मौजूद हो तो वह सोचता है कि यह तो बड़े लोग हैं पर जो ज्ञानी और मानसिक रूप से स्वस्थ हैं वह जानते हैं कि ‘गुण ही गुणों को बरतते हैं’। मतलब यह कि देह जैसे कर्म में लिप्त है वैसे ही मन की स्थिति हो जाती है। देह अगर अधिक परिश्रम करने वाली नहीं है तो बुद्धि भी अधिक चिंतन नहीं कर सकती। आदमी भले ही अपने वाहनों से लंबी लंबी यात्रायें करता हो पर उसका मन, बुद्धि और अहंकार उसे संकीर्ण दायरों में कैद कर देता है। ऐसे लोग न स्वयं कष्ट भोगते हैं बल्कि दूसरे को भी अपनी वाणी और व्यवहार से कष्ट देते हैं। ऐसे लोगों की पहचान कर उनसे दूर रहना ही बेहतर है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, May 21, 2011

पतंजलि योग साहित्य से संदेश-परिणाम को देखकर कर्म का ज्ञान हो जाता है (patanjali yog sahitya se sandesh-karma se parinam or result from work)

            पतंजलि  योग साहित्य या  सूत्र के अनुसार 
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             क्रमान्यत्वं परिणामन्यत्वे हेतुः।
        ‘‘किसी कार्य करने के क्रम में भिन्नता से परिणाम भी भिन्न होता है।’’
             परिणामन्नयसंयमादतीतानागतज्ञानम्।।
           ‘‘अतीत, वर्तमान तथा भविष्य का विचार करने से परिणाम का ज्ञान हो जाता है।’’
                   पतंजलि योग में न केवल भौतिक तथा दृश्यव्य संसार को जानने की विधा बताई गयी है बल्कि अभौतिक तथा अदृश्यव्य स्थितियों के आंकलन का भी ज्ञान दिया गया है। हमारे सामने जो भी दृश्य आता है वह तत्काल प्रकट नहीं होता बल्कि वह किसी के कार्य के परिणाम स्वरूप ही ऐसा होता है। कोई व्यक्ति हमारे घर आया तो इसका मतलब वह किसी राह से निकला होगा। वहां भी उसके संपर्क हुए होंगे। वह हमारे घर पर जो व्यवहार करता है वह उसके घर से निकलने से लेकर हमारे यहां पहुंचने तक आये संपर्क तत्वों से प्रभावित होता है। वह धूप में चलकर आया है तो दैहिक थकावट के साथ मानसिक तनाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है। कोई घर से लड़कर आया है तो उसका मन भी वहीं फंसा रह जाता है और भले ही वह उसे प्रकट न करे पर उसकी वाणी तथा व्यवहार अवश्य ही नकारात्मक रूप से परिलक्षित होती है।
               कहने का अभिप्राय यह है कि हम प्रतिदिन जो काम करते हैं या लोगों हमारे लिये काम करते हैं वह कहीं न कहीं अभौतिक तथा अदृश्यव्य क्रियाओं से प्रभावित होती हैं। इसलिये कोई दृश्य सामने आने पर त्वरित प्रतिक्रिया नहीं व्यक्त करना चाहिए। हमें यह विचार करना चाहिए कि उस दृश्य के पीछे कौन कौन से तत्व हैं। व्यक्ति, वस्तु या स्थितियों से प्रभावित होकर ही कोई धटना हमारे सामने घटित होती है। जब हमें यह ज्ञान हो जायेगा तब हमारे व्यवहार में दृढ़ता आयेगी और हम अनावश्यक परिश्रम से बच सकते हैं। इतना ही नहीं किसी दृश्य के सामने होने पर जब हम उसका अध्ययन करते हैं तो उसके अतीत का स्वरूप भी हमारे अंतर्मन में प्रकट होता है। जब उसका अध्ययन करते हैं तो भविष्य का भी ज्ञान हो जाता है।
               हम अपने साथ रहने वाले अनेक लोगों का व्यवहार देखते हैं पर उसका गहराई से अध्ययन नहीं करते। किसी व्यक्ति के मन में अगर पूर्वकाल में से दोष रहे हैं और वर्तमान में दिख रहे हैं तो मानना चाहिए कि भविष्य में भी उसकी मुक्ति नहीं है। ऐसे में उससे व्यवहार करते समय यह आशा कतई नहीं करना चाहिए कि वह आगे सुधर जायेगा। योग साधना और ध्यान से ऐसी सिद्धियां प्राप्त होती हैं जिनसे व्यक्ति स्वचालित ढंग से परिणाम तथा दृश्यों का अवलोकन करता है। अतः वह ऐसे लोगों से दूर हो जाता है जिनके भविष्य में सुधरने की आशा नहीं होती। तत्वज्ञानी किसी भी दृश्य को देखते हुए उसके कारणों का अनुमान कट लेते हैं क्योंकि योग विधा से उनको ऐसी विचार शक्ति प्राप्त  हो जाती है।
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Sunday, May 1, 2011

मनोरंजन और घमंड मनुष्य को नष्ट कर देता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (manoranjan aur ghamand-hindu dharmik chittan)

प्रकृतिव्यसननि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात्। प्रकृतिव्यवसनान्युपेक्षते यो चिरातं रिपवःपराभवन्ति।।
                   विभूति की कामना से उत्पन्न प्रमाद और अहंकार की प्रकृति से उत्पन्न व्यसन की उपेक्षा न करें। प्रकृत्ति की व्यसनों की उपेक्षा करने वाला शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
                        प्रकृति के पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है। जिनके पास भौतिक उपलब्धि है वह उसके आकर्षण में बंधकर मतमस्त हो जाते हैं। दूसरे को गरीब या अल्पधनी मानकर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। मज़ाक न उड़ाये तो भी शाब्दिक दया दिखाकर अपने मन को शांति देने का प्रयास करते हैं। दरअसल यह सब दूसरों से ही नहीं बल्कि अपने साथ भी प्रमाद करना ही है। इस संसार में भगवान की तरह माया का खेल भी निराला है। किसी के पास कम है तो किसी के पास ज्यादा है, इसमें मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है। यह अलग बात है कि अज्ञानवश वह अपने को कर्ता मान लेता है। इसी कारण वह कभी प्रमाद तो कभी अहंकार के भाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है।
                        आज हम देश के हालात देखें तो यह बात समझ में आ जायेगी कि जिन लोगों के पास धन, प्रतिष्ठा और पद की उपलब्धि है वह दूसरे को अपने से हेय समझते हैं। नतीजा यह है कि आम इंसानों में उनके प्रति विद्रोह के बीज पड़ गये हैं। शिखर पुरुषों को यह भ्रम है कि आम आदमी उनसे जाति, धर्म, भाषा तथा क्षेत्र के बंटवारे के कारण उनसे जुड़े हैं जो कि उनके किराये के बुद्धिजीवी बनाकर रखते हैं। मगर सच तो यह है कि शिखर पुरुषों से अब किसी की सहानुभूति नहीं है। भले ही प्रचार माध्यम कितने भी दावा करें कि जनता प्रसिद्धि लोगों को देखना और सुनना चाहती है। अब तो हर आदमी यह जान गया है कि शिखर पर अब बिना ढोंग, पाखंड या बेईमानी के कोई नहीं पहुंच सकता। अगर ऐसा न होता तो देश के अनेक शिखर पुरुष अपने घरों के बाहर सुरक्षा उपाय नहीं करते। इतना ही नहीं अनेक तो राह चलते हुए भी सुरक्षा लेकर चलते हैं। इसका मतलब सीधा है कि अपने ही कारनामों को उनके अंदर भय व्याप्त है। गरीबों से भरे देश में सुरक्षा एक मुद्दा बन गयी है।
फिर अब शिखर पर भी झगड़े होने लगे हैं। एक जाता है तो दूसरा आ जाता है। यह अस्थिरता इसलिये हैं क्योंकि प्रमाद और अहंकार में लगे शिखर पुरुष जल्दी जल्दी अपना आकर्षण खो देते हैं। शिखर बैठकर वह अपने वैभव का प्रदर्शन कर वह एक दूसरे को प्रभावित तो कर सकते हैं पर आम आदमी को नहीं।
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