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Saturday, July 2, 2011

दक्ष स्मृति-योग शक्ति के प्रभाव अत्यंत व्यापक (daksh smriti-yoga shakti atayant vyapak)

       जब हम योग साधना के विषय से संबंधित ग्रंथों की सामग्री पर दृष्टिपात करते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई विज्ञान हो। हालांकि उसके सूत्र अत्यंत सूक्ष्म हैं पर उनका अर्थ अत्यंत गूढ़ है।अनेक योग प्रचारक अपने शिष्यों को तात्कालिक दैहिक प्रभाव दिखाने वाले आसनों तथा प्राणायामों के बारे में सिखाते हैं जबकि योग विधा के आठ अंग होते हैं जिनका ज्ञान होने पर आदमी ज्ञानी हो जाता है।
      इसमें कोई संशय नहीं है कि योगासन तथा प्राणायाम का बहुत महत्व है पर यह भी जरूरी है कि पतंजलि योग के मूल तत्वों का भी ज्ञान प्राप्त किया जाये। योगासन और प्राणायाम से शरीर में स्फूर्ति और स्थिरता आती है तब मानव मन कोई अच्छा विचार करना चाहता है। मन में बेहतर विषयों के अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करना एक महत्वपूर्ण कार्य साबित हो सकता है। पतंजलि योग में वर्णित आठों भागों का ज्ञान प्राप्त होने पर हमारे अंदर योग शक्ति का निर्माण होता है। मन के उतार चढ़ाव, इंद्रियों की गतिविधियों तथा देह के अंदर चल रही प्रक्रिया को हम अपनी अंतदृष्टि से देखते हैं। इससे हमारे अंदर संसार के व्यवहार का ज्ञान आता है।
                दक्षस्मृति में कहा गया है कि
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         लोको वशीकृतों येन यन चात्मा वशीकृतः।
         इन्द्रियार्थो जितोयने ते योग प्रब्रवीम्यहम्।।
               ‘‘योग से मनुष्य सारे संसार को वश में कर सकता है। बिना योग शक्ति के किसी को भी वश में करना संभव नहीं है। बिना योग के व्यवहार का भी ज्ञान नहीं होता न ही इंद्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है।’’
                सच बात तो यह है कि बोलते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते और देखते हुए केवल एक प्रयोक्ता की तरह हो जाते हैं। अपने अंदर के स्वामित्व का आभास तनिक भी नहीं रहता। हमारी इंद्रियां कार्यरत हैं पर उन पर हमारी नज़र नहीं रहती। हमें लगता है कि सारे काम हम कर रहे हैं पर यह भूल जाते हैं कि यह सब इंद्रियों की गतिविधियों का परिणाम है। हम इंद्रियों के प्रयोक्ता हैं पर यह अहसास नहीं होता। यही अहसास अपने स्वामित्व होने का परिचय देता है और आदमी दृष्टा की तरह हो जाता है। तब वह संसार के व्यवहार के सिद्धांतों को अच्छी तरह समझता है। इसी कारण योग साधना तथा ध्यान में हमेशा तत्पर रहना चाहिए। इससे जो ज्ञान प्राप्त होता है वह आदमी को विश्व विजयी बना सकता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Monday, December 28, 2009

संत कबीर के दोहे-शब्द वही है जो दिल में समाए (sant kabir ke dohe-shabd jo dil me samae)

सीखे सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने गुरूजनों से शब्द सीखकर उसे अपने हृदय में धारण कर उनका सदुपयोग करता है वही जीवन का आनंद उठा सकता है पर जो केवल उन शब्दों को रटता है उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता।
सीतलता तब जानिये, समता रहै समाय
विघ छोड़ै निरबिस रहै, सक दिन दूखा जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने अंदर तभी शीतलता की अनुभूति हो सकती है जब हर स्थिति के लिए हृदय में समान भाव आ जाये। भले ही अपने काम में विघ्न-बाधा आती रहे और सभी दिन दुःख रहे तब भी आदमी के मन में शांति हो-यह तभी संभव है जब वह अपने अंतर्मन में सभी स्थितियों के लिए समान भाव रखता हो।
यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुम्बक भाय
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि उसी शब्द के प्रभाव की प्रशंसा की जाती है जो सभी लोगों के हृदय में चुंबक की तरह प्रभाव डालता है। जो मधुर वचन नहीं बोलते या रूखा बोलते हैं वह कभी भी अपने जीवन के संकटों से कभी उबर नहीं सकते।
वर्त्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ लोग थोडा ज्ञान प्राप्त कर फिर उसे बघारना शुरू कर देते हैं।कुछ लोगों तो ऐसे भी हैं जिन्होंने भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन इसलिए किया ताकि वह गुरु बन कर अपनी पूजा करा सकें। ऐसे लोगों को उस अध्यात्म ज्ञान से कोइ संबंध नहीं है जो वास्तव में ह्रदय को शांत और समभाव में स्थित रखने में सहायक होता है। ऐसे कथित गुरुओं ने ज्ञान को रट जरूर लिया है पर धारण नहीं किया इसलिए ही उनके शिष्यों पर भी उनका प्रभाव नज़र नहीं आता। उनके वाणी से निकले शब्द तात्कालिक रूप से जरूर प्रभाव डालते हैं पर श्रोता के ह्रदय की गहराई में नहीं उतरते क्योंकि वह कथित वक्ताओं के ह्रदय की गहराई से वह शब्द निकल कर नहीं आते। आजकल के गुरुओं का नाम बहुत है पर उनका प्रभाव समाज पर नहीं दिखता।
शब्द लिखे जाएँ या बोले, उनका प्रभाव तभी होता है जब वह श्रोता या लेखक से उत्पन्न होता है। यह तभी संभव है जब उसने अपना अध्ययन,चिंतन और मनन गहराई से किया हो। जो लोग केवल सुनाने के लिये ज्ञान रटते हैं उनका प्रभाव श्रोताओं पर नहीं होता। वाणी से उनके शब्दों का संप्रेक्षण कानों तक तो होता है पर हृदय का भाव न होने के कारण वह मन में ठहरता नहीं है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepakraj.wordpress.com

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Thursday, December 24, 2009

संत कबीर के दोहे-मन के चोर को मारना कठिन (man ka chor-hindu dharm sandesh)


अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार
मेरा चोर मुझको मिलै, सरबस डारूं वार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के सब तो अपने अपने चोर को मार डालते हैं, परंतु मेरा चोर तो मन है। वह अगर मुझे मिल जाये तो मैं उस पर सर्वस्व न्यौछावर कर दूंगा।
सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार
जो कोई याते बचै, तीन लोक ते न्यार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो एक महान ठग है जो देवता, मनुष्य और मुनि सभी को ठग लेता है। यह मन जीव को बार बार अवतार लेने के लिये बाध्य करता है। जो कोई इसके प्रभाव से बच जाये वह तीनों लोकों में न्यारा हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान तो मन है और वह उसे जैसा नचाता। आदमी उसके कारण स्थिर प्रज्ञ नहीं रह पाता। कभी वह किसी वस्तु का त्याग करने का निर्णय लेता है पर अगले पर ही वह उसे फिर ग्रहण करता है। अर्थात मन हमेशा ही व्यक्ति का अस्थिर किये रहता है। कई बार तो आदमी किसी विषय पर निर्णय एक लेता है पर करता दूसरा काम है। यह अस्थिरता मनुष्य को जीवन पर विचलित किये रहती है और वह इसे नहीं समझ सकता है। यह मन सामान्य मनुष्य क्या देवताओं और मुनियों तक को धोखा देता है। इस पर निंयत्रण जिसने कर लिया समझा लो तीनों को लोकों को जीत लिया। वरना तो यह मन ऐसा है कि आदमी उसका गुलाम हो जाता है और जिसने उसके मन को गुलाम बन लिया उसकी गुलामी करने लगता है। आजकल आदमी पर हिंसा के द्वारा दैहिक रूप से जीतने की बजाय उसके मन को ललचा कर उसको बौद्धिक रूप से गुलाम बनाया जाता है। जिन लोगों को इसका ज्ञान है वही जीवन में स्वतंत्र रूप से तनावमुक्त जीवन बिता सकते हैं।

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Friday, December 18, 2009

चाणक्य नीति शास्त्र-कुसंस्कारी लोगों का साथ करने से यश नहीं मिलता

अर्थार्थीतांश्चय ये शूद्रन्नभोजिनः।
त द्विजः कि करिष्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः।।

हिंदी में भावार्थ- नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अर्थोपासक विद्वान समाज के लिये किसी काम के नहीं है। वह विद्वान जो असंस्कारी लोगों के साथ भोजन करते हैं उनको यश नहीं मिल पता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस देश का अध्यात्मिक ज्ञान सदेशों के अनमोल खजाने से भरा पड़ा है। उसका कारण यह है कि प्राचीन विद्वान अर्थ के नहीं बल्कि ज्ञान के उपासक थे। उन्होंने अपनी तपस्या से सत्य के तत्व का पता लगाया और इस समाज में प्रचारित किया। आज भी विद्वानों की कमी नहीं है पर प्रचार में उन विद्वानों को ही नाम चमकता है जो कि अर्थोपासक हैं। यही कारण है कि हम कहीं भी जाते हैं तो सतही प्रवचन सुनने को मिलते हैं। कथित साधु संत सकाम भक्ति का प्रचार कर अपने भोले भक्तों को स्वर्ग का मार्ग दिखाते हैं। यह साधु लोग न केवल धन के लिये कार्य करते हैं बल्कि असंस्कारी लोगों से आर्थिक लेनदेने भी करते हैं। कई बार तो देखा गया है कि समाज के असंस्कारी लोग इनके स्वयं दर्शन करते हैं और उनके दर्शन करवाने का भक्तों से ठेका भी लेते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अध्यात्मिक चर्चा तो बहुत होती है पर ज्ञान के मामले में हम सभी पैदल हैं।
समाज के लिये निष्काम भाव से कार्य करते हुए जो विद्वान सात्विक लोगों के उठते बैठते हैं वही ऐसी रचनायें कर पाते हैं जो समाज में बदलाव लाती हैं। असंस्कारी लोगों को ज्ञान दिया जाये तो उनमें अहंकार आ जाता है और वह अपने धन बल के सहारे भीड़ जुटाकर वहां अपनी शेखी बघारते हैं। इसलिये कहा जाता है कि अध्यात्म और ज्ञान चर्चा केवल ऐसे लोगों के बीच की जानी चाहिये जो सात्विक हों पर कथित साधु संत तो सार्वजनिक रूप से ज्ञान चर्चा कर व्यवसाय कर रहे हैं। वह अपने प्रवचनों में ही यह दावा करते नजर आते हैं कि हमने अमुक आदमी को ठीक कर दिया, अमुक को ज्ञानी बना दिया।
अतः हमेशा ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लये ऐसे लोगों को गुरु बनाना चाहिये जो एकांत साधना करते हों और अर्थोपासक न हों। उनका उद्देश्य निष्काम भाव से समाज में सामंजस्य स्थापित करना हो। वैसे भी जीवन में संस्कारों के बहुत महत्व है और संगत का प्रभाव आदमी पर पड़ता है। इसलिये न केवल संस्कारवान लोगों के साथ संपर्क रखना चाहिये बल्कि जो लोग कुसंस्कारी लोगों में उठते बैठते हैं उनसे भी अधिक संपर्क नहीं रखना चाहिये।
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Sunday, December 13, 2009

हिन्दू धर्म संदेश-पेट में पचे वही खाना खायें (pet men pache vahi khana khayen-hindu dharm sandesh)

भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो वङिशमायसम्।
लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते।।
यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्।
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भतिमिच्छता।।
हिंदी में भावार्थ
-मछली कांटे से लगे चारे को लोभ में पकड़ कर अपने अंदर ले जाती है उस समय वह उसके परिणाम पर विचार नहीं करती। उससे प्रेरणा ग्रहण कर उन्नति चाहने वाले पुरुष को ऐसा ही भोजन ग्रहण करना चाहिये जो खाने योग्य होने के साथ पेट में पचने वाला भी हो। जो भोजन पच सकता है वह ग्रहण करना ही उत्तम है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-हमारे देश में फास्ट फूड संस्कृति का प्रचार निरंतर बढ़ता जा रहा हैं। क्या जवान, क्या अधेड़ और बूढ़े और क्या स्त्री और पुरुष, बाजारों में बिकने वाले फास्ट फूड पदार्थों को खाने में आनंद अनुभव करते हैं। यह पश्चिम से आया फैशन है पर वहीं के स्वास्थ्य विशेषज्ञ उसे पेट के लिये खराब और अस्वास्थ्यकर मानते हैं। इसके अलावा मांस खाना भी पश्चिम के ही विशेषज्ञ गलत मानते हैं।
इन्हीं पश्चिमी स्वास्थ्य विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मांस खाने से मनुष्य में अनावश्यक आक्रामकता आती है और वह जल्दी ही हिंसा पर उतारु हो जाता है। यह जरूरी नहीं है कि भोजन में विष मिला हो तभी वह बुरा प्रभाव डालता है। विष मिले भोजन को पता तो तत्काल चल जाता है क्योंकि उसकी देह पर तत्काल प्रतिक्रिया होती है पर असात्विक और बीमारी वाले भोजन का पता थोड़े समय बाद चलता है। खाने के बाद भोजन पचने से आशय केवल उसका भौतिक रूप नहीं है बल्कि भावनात्मक रूप से पचने से है। अगर मांस वाला भोजन किया तो लगता है कि वह पच गया पर उसके लिये जिस जीव की हत्या हुई उसकी भावनायें भी उसी मांस में मौजूद होती है और सभी जानते है कि भावनाओं का कोई भौतिक स्वरूप नहीं होता जो किसी को दिखाई दे। अतः मांस खाने वाले के पेट में वह कलुषित भावनायें भी चली जाती हैं जो उस समय उस जीव के अंदर मौजूद थी जब उसे काटा गया। यही हाल ऐसे भोजन का भी है जिसके बहुत से पदार्थ अपच्य है पर वह पेट में धीरे धीरे जमा होकर बड़ी बीमारी का स्वरूप लेते हैं। ऐसा अशुद्ध पेय पदार्थों के सेवन पर भी होता है।
श्रीमदभागवत गीता में ‘गुण ही गुणों के बरतते है’ का जो सिद्धांत बताया गया है उसका यह भी तात्पर्य है कि जैसे अन्न और जल का भोजन हम करते हैं वैसा ही उसका प्रभाव हम पर होता है और हम उससे बच नहीं सकते। अतः प्रयास यही करना चाहिये कि सात्विक भोजन करें ताकि हमारे विचार भी पवित्र रहें जो कि आनंदपूर्ण जीवन के अति आवश्यक हैं। अगर हम स्वच्छ और पवित्र भोजन करेंगे तो हमारे विचार वैसे ही होंगे फलस्वरूप हमारे कर्म भी अच्छे होंगे और जीवन में आनंद प्राप्त होगा।
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Friday, December 11, 2009

चाणक्य नीति संदेश-गुणों की पहचान न हो तो लोग निंदा करते हैं (hindu dharm sandesh-gunon ki pahchan)

न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्ष स तं सदा निन्दति नाऽत्र चित्रम्।
यथा किराती करिकुम्भजाता मुक्ताः परित्यज्य विभति गुंजाः।।

हिंदी में भावार्थ- अगर कोई मनुष्य किसी वस्तु या अन्य मनुष्य के गुणों को नहीं पहचानता तो तो उसकी निंदा या उपेक्षा करता है। ठीक उसी तरह जैसे जंगल में रहने वाली कोई स्त्री हाथी के मस्तक से मिलने वाली मोतियों की माला मिलने पर भी उसे त्यागकर कौड़ियों की माला पहनती है।
अकृष्टफलमूलेन वनवासरतः सदा।
कुरुतेऽहरहः श्राद्धमृषिर्विप्रः स उच्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
वह विद्वान ऋषि कहलाता है जो जमीन को जोते बिना पैदा हृए फल एवं कंधमूल आदि खाकर हमेशा वन में जीवन व्यतीत करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति या वस्तु के गुणों का ज्ञान नहीं है तो उसकी उपेक्षा हो ही जाती है। यह स्थिति हम अपने भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में आज समाज द्वारा बरती जा रही उपेक्षा के बारे में समझ सकते हैं। हमारे देश के प्राचीन और आधुनिक ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने बड़े परिश्रम से हमें जीवन और सृष्टि के रहस्यों को जानकर उसका ज्ञान हमारे लिये प्रस्तुत किया पर हमारे देश के विद्वानों ने उसकी उपेक्षा कर दी। यही कारण है कि आज हमारे देश में विदेशी विद्वानों के ज्ञान की चर्चा खूब होती है। देश में पश्चिम खान पान ही सामान्य जीवन की दिनचर्या का भाग बनता तो ठीक था पर वहां से आयातित विचार और चिंतन ने हमारी बौद्धिक क्षमता को लगभग खोखला कर दिया है। यही कारण है कि सामान्य व्यक्ति को शिक्षित करने वाला वर्ग स्वयं भी दिग्भ्रमित है और भारतीय अध्यात्म उसके लिये एक फालतू का ज्ञान है जिससे वर्तमान सभ्यता का कोई लेना देना नहीं है।
जबकि इसके विपरीत पश्चिम में भारतीय अध्यात्म ज्ञान की पुस्तकों पर अब जाकर अनुसंधान और विचार हो रहा है। अनेक महापुरुषों के संदेश वहां दिये जा रहे हैं। हमारी स्थिति भी कुछ वैसी है जैसे किसी घर में हीरों से भरा पात्र हो पर उसे पत्थर समझकर खेत में चिड़ियों को भगाने के लिये कर रहा हो। हमें यह समझना चाहिए कि अज्ञान और मोह में मनुष्य के लिये हमेशा तनाव का कारण बनता है।
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Saturday, September 5, 2009

चाणक्य दर्शन-ज्ञानी के लिए परमात्मा का वास सभी जगह (For knowledge of God resides everywhere)

अग्निर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिभा स्वल्पबुद्धीनां सर्वत्र समदर्शिनाम्
हिंदी में भावार्थ
-द्विजातियां अपना देव अग्नि, मुनियों का देव उनके हृदय और अल्प बुद्धिमानों के लिये देव मूर्ति में होता है किन्तु जो समदर्शी तत्वज्ञानी हैं उनका देव हर स्थान में व्याप्त है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-सकाम भक्ति करने वाले हवन, यज्ञ तथा भोजन दान करते हैं। उनके लिये देवता अग्नि है। जो सात्विक भक्ति करता हैं उनके लिये सभी के दिल में भगवान है। जो लोग एकदम अज्ञानी है वह केवल मूर्तियों में ही भगवान मानकर उनकी पूजा करते है। उनको किसी अन्य प्रकार के काम से कोई मतलब नही होता-न वह किसी का परोपकार करते हैं न ही सत्संग के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा उनके मन में आती है। सच्चा ज्ञानी और योगी वही है जो हर जगह उस ईश्वर का वास देखता है।
इस विश्व में अज्ञानी और स्वार्थी लोगों की भरमार है। लोगों ने धर्म से ही भाषा, ज्ञान, विचार, और व्यापार को जोड़ दिया है। आपने देखा होगा कि कुछ लोग धर्म परिवर्तन करते हैं तो अपना नाम भी बदल देते हैं। वह लोग अपने इष्ट के स्वरूप में बदलाव कर उसे पूजने लगते हैं। कहने को भले ही उनका धर्म निरंकार का उपासक हो पर कर्म के आधार पर मूर्तिमान को भजते दिखते हैं-उनका देव भले ही निरंकार हो पर धर्म एक तरह से मूर्तिमान होता है। कहने को सभी धर्माचार्य यही कहते हैं कि इस विश्व में एक ही परमात्मा है पर इसके पीछे उनकी चालाकी यह होती है कि वह केवल अपने वाले ही स्वरूप को इकलौता सत्य बताते हुए प्रचार करते हैं-कभी किसी दूसरे धर्म के स्वरूप पर बोलते कोई धर्माचार्य दिखाई नहीं देता। अलबत्ता भारत धर्मों से जुड़े के कुछ तत्वज्ञानी संत कभी अपने अंदर ऐसे पूर्वाग्रह के साथ सत्संग नहीं करते। वैसे भी भारतीय धर्म की यह खूबी है कि वह इस संसार में व्यापक दृष्टिकोण रखते हैं और केवल मनुष्य की बजाय सभी जीवों-यथा पशु पक्षी, जलचर, नभचर और थलचर-के कल्याण जोर दिया जाता है।
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Tuesday, August 25, 2009

मनु संदेश-आयु में छोटा होने पर भी ज्ञानी सम्मानीय (manu smruti in hindi-gyan aur ayu)

उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता।
ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य चेह च शाश्वतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को जन्म और शिक्षा देने वाले दोनों ही पिता होते हैं पर पर विद्या और ज्ञान देने से मनुष्य लोक तथा परलोक दोनों ही सुधारता है इसलिये उसका ही महत्व अधिक है। अतः ज्ञान देने वाले का ही अधिक महत्व है।
अध्यापयामास पितृन् शिशुरङिगरस कविः
पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्म तान्।।
हिंदी में भावार्थ-
अङिगरस ऋषि ने अपने बुजुर्गों को अध्ययन कराते हुए ‘हे पुत्रों’ कहकर ज्ञान दिया था। इस तरह अपने से छोटा होने पर भी ज्ञान देने वाला गुरु कहलाता है।
संपादकीय व्याख्या -भारतीय अध्यात्म में माता पिता तथा गुरु को परम आदरणीय माना जाता है पर जीवन और व्यवहार का ज्ञान देने वाले गुरु का विशेष स्थान होता है। माता पिता तो अपने पुत्र को परिवार तथा व्यवसायों की परंपराओं से अवगत स्वाभाविक रूप से कराते हैं क्योंकि वह देह के निकट होते हैं पर गुरु तो निष्काम भाव से अपने शिष्यों को जीवन और अध्यात्म का ज्ञान देते हैं जो कि न केवल इस लोक में बल्कि परलोक में भी सहायक होता है। गुरु का अपने शिष्य से कोई दैहिक संबंध नहीं होता इसलिये उसकी शिक्षा का अधिक महत्व है।
अङिगरस ऋषि ने भी अपने पिता, चाचा और ताउओं को ब्रह्मज्ञान दिया और उस समय उनको ‘हे पुत्रों’ कहकर संबोधित किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि ज्ञान देने वाला अपने से छोटी आयु का भी क्यों न हो उसका गुरु की तरह सम्मान करना चाहिये। उसी तरह अपने से बड़े को ज्ञान देते समय भी उसे अपना शिष्य समझना चाहिये। यही कारण है कि हमारे संत और ऋषि गुरु महिमा का बखान करते हैं।
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Saturday, August 8, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-सुख प्राप्त करने के लिए विद्वान बनने की इच्छा (hindi gyan sandesh-vidvata aur sukh)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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पुरा विद्वत्तासीदुषमवतां क्लेशहेतये गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।
इदानी, सम्प्रेक्ष्य क्षितितललभुजः शास्त्रविमुखानहो कष्टं साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशति।।


हिंदी में भावार्थ-प्राचीन काल में वह लोग विद्याध्ययन करते थे जो मानसिक तनाव से मुक्ति चाहते थे। बाद में ऐसे लोगों ने इसे अपना साधन बना लिया जो उससे विद्वता अर्जित कर विषय सुख प्राप्त करना चाहते थे। अब तो लोग उससे बिल्कुल विमुख हो गये हैं। उनको पढ़ना तो दूर सुनना भी नहीं चाहते। राजा लोग भी इससे विमुख हो रहे हैं। इसलिये यह दुनियां पतन के गर्त में जा रही है जो कि कष्ट का विषय है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपनी तपस्या और यज्ञों से जो ज्ञान अर्जित कर उसे शास्त्रों में दर्ज किया वह अनूठा है। इसी कारण विश्व में हमें अध्यात्म गुरु की पहचान मिली। अनेक ग्रंथ आज भी प्रासंगिक विषय सामग्री से भरपूर हैं पर लोग हैं कि उसे सुनना नहीं चाहते। पहले जहां लोग ज्ञानार्जन इसलिये करते थे ताकि उससे अपने जीवन को सहजता पूर्वक व्यतीत कर सकें। बाद में ऐसे लोग बढ़ने लगे जो उनका ज्ञान रटकर दूसरों को सुनाने का व्यापार करने लगे। उनका मुख्य उद्देश्य केवल अपने लिये भोग विलास की सामग्री जुटाना था। अब तो पूरा समाज ही इन शास्त्रों से विमुख हो गया है हालांकि ज्ञान का व्यापार करने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं और उनके लिये तो पौ बाहर हो गया है। इसका कारण यह है कि लोगों को अपने शास्त्रों की रचनाओं का जरा भी आभास नहीं है। आज के तनाव भरे युग में लोग जब वह किसी के श्रीमुख से उन शास्त्रों के अच्छे वाक्य सुनते हैं तो प्रसन्न हो जाते हैं और फिर वक्ताओं को गुरु बनाकर उन पर चढ़ावा चढ़ाते हैं। ऐसा करने की बजाय लोग शास्त्रों का अध्ययन इसलिये करें ताकि उसके ज्ञान से उनके मन का तनाव कम हो सके तो अच्छा हो।

वैसे आजकल लोग शिक्षा इसलिये प्राप्त कर सकें ताकि उससे किसी धनपति की गुलामी करने का सौभाग्य मिले। यह सौभाग्य कई लोगों को मिल भी जाता है पर तनाव फिर भी पीछा नहीं छोड़ता। हमारे देश में लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे गुलाम पैदा हों और गुलाम कभी सुखी नहीं रहते। वैसे यह आरोप लगाना गलत है कि लार्ड मैकाले ने ही ऐसा किया। राजा भर्तृहरि के संदेशों को देखें तो उनके काल में ही समाज अपने शास्त्रों से विमुख होने लगा था। इसलिये इस बात को ध्यान में रखकर विचार करना चाहिये कि हमने विषयों में आसक्ति के कारण शास्त्रों से मूंह फेरा है न कि विदेशियों के संपर्क के कारण! हमारे शास्त्रों का ज्ञान जीवन में तनाव से मुक्ति दिलाता है इसलिये उनका निरंतर अध्ययन करना चाहिये।
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Friday, July 24, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-अध्यात्मिक ज्ञान विषयों से बचाता है (bhartrihari niti shatak-adhyatmik gyan aur vishay)

सुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरश्मिः शशधरः प्रियाववत्राभोजं मलयजरजश्चातिसुरभिः।
स्रजो हृद्यामोदास्तदिदमखिलं रागिणी जने करोतयन्तः क्षोभं न तु विषयसंसर्गविमुखे।।
हिंदी में भावार्थ-
सफेद रंग से पुता चमकता भवन, चंद्रमा की शीतल रौशनी, अपनी प्राणप्रिया का मुख कमल, चंदन की सुगंध, फूलों की माला जैसे विषय अनुरागियों के मन को तड़पाते हुए विचलित कर देते हैं लेकिन जिन्होंने अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह इनसे प्रभावित नहीं होते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-जीवन में राग अनुराग के प्रति लगाव स्वाभाविक रूप से रहता है। मगर यही राग अनुराग कष्ट का कारण भी बनते हैं। एक अच्छा और बड़ा मकान रहने के लिये होना चाहिये। जिनके पास नहीं है वह ख्वाब देखते हैं पर जिनके पास महल जैसा आवास है वह भी खुश नहीं है। इतने बड़े मकान का रखरखाव नियमित रूप करना भी उनके लिये कष्टप्रद है। बड़े शहरों मे चले जाईये तो कई नई कालौनियां देखकर लगता है कि जैसे यहां स्वर्ग है। कुछ वर्ष बाद जाईये तो वही पुरानी लगती हैं। लोगों के पास धन है पर समय नहीं कि अपने मकानों की हर वर्ष पुताई करा सकें। हालांकि कहने के लिये ऐसे रंग आ गये हैं जो कई वर्ष तक चलें पर बरसात और धूप के सामने भला कौनसा रसायन टिक सकता है।

आदमी का मन है जो कभी न कभी ऊबता है और वह विश्राम चाहता है। देह को तो आराम मिल जाता है पर मन को नहीं। भौतिक जीवन की सत्यता को समझना ही अध्यात्म ज्ञान है और जो इसे जानता है वही सुख दुःख से परे होकर जीवन में आनंद उठा सकता है। कहते भी है कि इस समय विश्व में लोगों के दिमाग में तनाव बढ़ रहा है। आखिर यह सोचने का विषय है कि जब इतनी सारी सुविधायें हैं तो फिर इंसान विचलित क्यों हो जाता है? यह सब अध्यात्म ज्ञान की कमी की वजह से है।
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Friday, June 19, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-आध्यात्मिक ज्ञान से ही मानसिक शान्ति संभव

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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पुरा विद्वत्तासीदुषमवतां क्लेशहेतये गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।
इदानी, सम्प्रेक्ष्य क्षितितललभुजः शास्त्रविमुखानहो कष्टं साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशति।।

हिंदी में भावार्थ-प्राचीन काल में वह लोग विद्याध्ययन करते थे जो मानसिक तनाव से मुक्ति चाहते थे। बाद में ऐसे लोगों ने इसे अपना साधन बना लिया जो उससे विद्वता अर्जित कर विषय सुख प्राप्त करना चाहते थे। अब तो लोग उससे बिल्कुल विमुख हो गये हैं। उनको पढ़ना तो दूर सुनना भी नहीं चाहते। राजा लोग भी इससे विमुख हो रहे हैं। इसलिये यह दुनियां पतन के गर्त में जा रही है जो कि कष्ट का विषय है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपनी तपस्या और यज्ञों से जो ज्ञान अर्जित कर उसे शास्त्रों में दर्ज किया वह अनूठा है। इसी कारण विश्व में हमें अध्यात्म गुरु की पहचान मिली। अनेक ग्रंथ आज भी प्रासंगिक विषय सामग्री से भरपूर हैं पर लोग हैं कि उसे सुनना नहीं चाहते। पहले जहां लोग ज्ञानार्जन इसलिये करते थे ताकि उससे अपने जीवन को सहजता पूर्वक व्यतीत कर सकें। बाद में ऐसे लोग बढ़ने लगे जो उनका ज्ञान रटकर दूसरों को सुनाने का व्यापार करने लगे। उनका मुख्य उद्देश्य केवल अपने लिये भोग विलास की सामग्री जुटाना था। अब तो पूरा समाज ही इन शास्त्रों से विमुख हो गया है हालांकि ज्ञान का व्यापार करने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं और उनके लिये तो पौ बाहर हो गया है। इसका कारण यह है कि लोगों को अपने शास्त्रों की रचनाओं का जरा भी आभास नहीं है। आज के तनाव भरे युग में लोग जब वह किसी के श्रीमुख से उन शास्त्रों के अच्छे वाक्य सुनते हैं तो प्रसन्न हो जाते हैं और फिर वक्ताओं को गुरु बनाकर उन पर चढ़ावा चढ़ाते हैं। ऐसा करने की बजाय लोग शास्त्रों का अध्ययन इसलिये करें ताकि उसके ज्ञान से उनके मन का तनाव कम हो सके तो अच्छा हो।

वैसे आजकल लोग शिक्षा इसलिये प्राप्त कर सकें ताकि उससे किसी धनपति की गुलामी करने का सौभाग्य मिले। यह सौभाग्य कई लोगों को मिल भी जाता है पर तनाव फिर भी पीछा नहीं छोड़ता। हमारे देश में लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे गुलाम पैदा हों और गुलाम कभी सुखी नहीं रहते। वैसे यह आरोप लगाना गलत है कि लार्ड मैकाले ने ही ऐसा किया। राजा भर्तृहरि के संदेशों को देखें तो उनके काल में ही समाज अपने शास्त्रों से विमुख होने लगा था। इसलिये इस बात को ध्यान में रखकर विचार करना चाहिये कि हमने विषयों में आसक्ति के कारण शास्त्रों से मूंह फेरा है न कि विदेशियों के संपर्क के कारण! हमारे शास्त्रों का ज्ञान जीवन में तनाव से मुक्ति दिलाता है इसलिये उनका निरंतर अध्ययन करना चाहिये।
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Friday, June 5, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-आध्यात्मिक ज्ञान से विमुख होना है पतन का कारण

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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पुरा विद्वत्तासीदुषमवतां क्लेशहेतये गता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।
इदानी, सम्प्रेक्ष्य क्षितितललभुजः शास्त्रविमुखानहो कष्टं साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशति।।


हिंदी में भावार्थ-प्राचीन काल में वह लोग विद्याध्ययन करते थे जो मानसिक तनाव से मुक्ति चाहते थे। बाद में ऐसे लोगों ने इसे अपना साधन बना लिया जो उससे विद्वता अर्जित कर विषय सुख प्राप्त करना चाहते थे। अब तो लोग उससे बिल्कुल विमुख हो गये हैं। उनको पढ़ना तो दूर सुनना भी नहीं चाहते। राजा लोग भी इससे विमुख हो रहे हैं। इसलिये यह दुनियां पतन के गर्त में जा रही है जो कि कष्ट का विषय है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- हमारे प्राचीन मनीषियों ने अपनी तपस्या और यज्ञों से जो ज्ञान अर्जित कर उसे शास्त्रों में दर्ज किया वह अनूठा है। इसी कारण विश्व में हमें अध्यात्म गुरु की पहचान मिली। अनेक ग्रंथ आज भी प्रासंगिक विषय सामग्री से भरपूर हैं पर लोग हैं कि उसे सुनना नहीं चाहते। पहले जहां लोग ज्ञानार्जन इसलिये करते थे ताकि उससे अपने जीवन को सहजता पूर्वक व्यतीत कर सकें। बाद में ऐसे लोग बढ़ने लगे जो उनका ज्ञान रटकर दूसरों को सुनाने का व्यापार करने लगे। उनका मुख्य उद्देश्य केवल अपने लिये भोग विलास की सामग्री जुटाना था। अब तो पूरा समाज ही इन शास्त्रों से विमुख हो गया है हालांकि ज्ञान का व्यापार करने वालों की संख्या में कोई कमी नहीं और उनके लिये तो पौ बाहर हो गया है। इसका कारण यह है कि लोगों को अपने शास्त्रों की रचनाओं का जरा भी आभास नहीं है। आज के तनाव भरे युग में लोग जब वह किसी के श्रीमुख से उन शास्त्रों के अच्छे वाक्य सुनते हैं तो प्रसन्न हो जाते हैं और फिर वक्ताओं को गुरु बनाकर उन पर चढ़ावा चढ़ाते हैं। ऐसा करने की बजाय लोग शास्त्रों का अध्ययन इसलिये करें ताकि उसके ज्ञान से उनके मन का तनाव कम हो सके तो अच्छा हो।

वैसे आजकल लोग शिक्षा इसलिये प्राप्त कर सकें ताकि उससे किसी धनपति की गुलामी करने का सौभाग्य मिले। यह सौभाग्य कई लोगों को मिल भी जाता है पर तनाव फिर भी पीछा नहीं छोड़ता। हमारे देश में लार्ड मैकाले ने ऐसी शिक्षा पद्धति का निर्माण किया जिससे गुलाम पैदा हों और गुलाम कभी सुखी नहीं रहते। वैसे यह आरोप लगाना गलत है कि लार्ड मैकाले ने ही ऐसा किया। राजा भर्तृहरि के संदेशों को देखें तो उनके काल में ही समाज अपने शास्त्रों से विमुख होने लगा था। इसलिये इस बात को ध्यान में रखकर विचार करना चाहिये कि हमने विषयों में आसक्ति के कारण शास्त्रों से मूंह फेरा है न कि विदेशियों के संपर्क के कारण! हमारे शास्त्रों का ज्ञान जीवन में तनाव से मुक्ति दिलाता है इसलिये उनका निरंतर अध्ययन करना चाहिये।
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Monday, February 23, 2009

भर्तृहरि शतकः पूर्ण वैरागी बनो या सांसरिक बन जाओ

आवासः क्रियतां गंगे पापहारिणी वारिणि
स्तन,ये तरुपया वा मनोहारिणी हारिणी

हिंदी में भावार्थ- मनुष्य को अपने पापों से बचने के लिये गंगा के किनारे जाकर वैराग्यपूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिये या फिर सुंदर हार पहने नारी के साथ संपर्क रखते हुए गृहस्थ जीवन व्यतीत करना चाहिये।
वर्तमान संपादकीय व्याख्या-अपने जीवन में कभी भी मानसिक अंतद्वंद्व को स्थान नहीं देना चाहिए। अनेक लोगों को लगता है अगर वह विवाह नहीं करते तो सुखी रहते पर फिर भी करते हैं। विवाह करने पर धर की जिम्मेदारी आने से आदमी अनेक बार परेशान हो जाता है और तब उसे वैराग्य पूर्ण जीवन सही लगता है। दूसरी तरफ ऐसे लोग भी है जो गृहस्थ होने पर वैरागी होने का दिखावा करते हैं। जिन लोगों ने पहले वैराग्य लिया वह दूसरे रूप में पुनः विषयों की तरफ लौट आते हैं। भर्तृहरि जी का संदेश यही है कि अगर हमने विषयों को ओढ़ लिया है तो फिर उनमें मन लगाते हुए अपना काम करना चाहिये। अगर वैराग्य लिया है तो फिर विषयों से परे होने चाहिये। मध्य स्थिति में फंसे होन पर केवल कष्ट ही मिल सकता है। अगर हमारे ऊपर घर की जिम्मेदारियां हैं तो उनको निभाने के लिये उसमेंं मन लगाना ही चाहिये। अगर उनसे बचने का प्रयास करेंगे तो वह भी संभव नहीं है, इसलिये उसमें मन लगाकर जूझना चाहिये। अगर जीवन में जिम्मेदारियों से बचना है तो फिर उनके बारे में सोचने से अच्छा है कि वैराग्य पहले ही लें और गृहस्थी न बसायें पर अगर बसा ली है तो उससे भागना संभव नहीं है। कहने का तात्पर्य है कि अगर हमने विषयों को ओढ़ लिया है तो उसमें अपनी बुद्धि के अनुसार चलना चाहिये न कि उनसे बचने का प्रयास करते हुए तनाव को आमंत्रण दें। अगर उनसे बचना है तो पूरी तरह से वैराग्य लेना चहिये
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