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Saturday, March 21, 2015

समय पर ही हितैषी और शत्रु की पहचान संभव-रहीम संदेश के आधार पर चिंत्तन लेख(samay par hi hitaishi aur shatru ki pahchan sambhav-A Hindu hindu religion thought based on rahim sandesh)



          आमतौर से हम सभी अपने आसपास सक्रिय लोगों पर यह सोचकर यकीन करते हैं कि समय पड़ने पर वह हमारे काम आयेंगे। अनेक लोगों से इसी आशा में संपर्क रखते हुए बरसों बीत जाते हैं पर समय आने पर उनसे निराशा हाथ लगती है।  शैक्षणिक, व्यवसायिक तथा सेवा के स्थानों पर लोगों के आपसी संपर्क सहजता से बनते हैं।  साथ चाय पीने, भोजन करने अथवा घूमने जाने से संपर्क में आये व्यक्तियों के प्रति एक विश्वास जरूर बनता है।  खासतौर से आज के युग में जब लोगों को अपने परिवार और शहर से बाहर जाकर काम करने के लिये बाध्य होना पड़ता है तब उनके दिमाग में अपने इर्दगिर्द सहजता से निकट आये लोगों के प्रति सकारात्मक भाव बन ही जाता है।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन तीन प्रकार ते हित अनहित पहिचानि।
पर बस परै, परोस बस, परे मामिला जानि।।
          सामान्य हिन्दी में भावार्थ-अन्य व्यक्ति, पड़ौसी और अपनी शक्ति के बाहर कार्य होने पर ही अपने हितैषी और शत्रु को पहचान लेना चाहिये।

          यह अलग बात है कि समय आने पर उन्हें यथार्थ का पता चल जाता है। अनेक बार तो यह देखा गया है कि अपने परिवार तथा शहर से बाहर निकलकर रहने वाले लोग अक्सर अन्य व्यक्तियों पर यकीन कर धोखा खा जाते हैं। खासतौर से युवा महिलाओं को अनेक बार अन्य व्यक्तियों ये प्रताड़ित होने के समाचार आते हैं।  हम आजकल अंतर्जाल पर भी यह देख रहे हैं कि अनेक लड़कियां बिना सोचे समझे केवल आकर्षक प्रोफाइल पर देखकर प्रभावित हो जाती हैं और बाद में उनके लिये घातक परिणाम निकलता है।
          इसलिये जब तक किसी के विचार, व्यवहार तथा व्यक्तित्व का प्रमाणीकरण न हो जाये तब तक उस पर विश्वास नहीं करना चाहिये।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, March 7, 2015

नवीन प्राचीन सामाजिक सिद्धांतों का द्वंद्व-हिन्दी चिंत्तन लेख(navin aur prachin samajik siddhanton ka yuddh-hindi thought article)



            पश्चिमी इतिहासकार राम रावण युद्ध को जब सभ्यताओं का युद्ध कहते हैं तो भारतीय धार्मिक विद्वान असहज हो जाते हैं। हम इस पर आज तक अपनी राय कायम नहीं कर पाये सिवाय इसके कि राम और रावण युद्ध दैवीय और आसुरी प्रवृत्तियों का युद्ध था।  रावण अपने प्रभाव क्षेत्र में द्रव्यमय यज्ञ करने वालों की उपस्थिति स्वीकार नहीं करता था।  उसने तपस्या से वरदान प्राप्त किये थे और उसे लगता था कि भगवान की आराधना का यही मार्ग श्रेयस्कर है।  इसलिये वह अन्य पूजा पद्धतियों को मानने वाले लोगों के कार्यक्रमों में बाधा डालता था।  उसी तरह महाभारत युद्ध को जमीन के लिये हुआ युद्ध माना जाता है जिसे हम धर्म और अधर्म के बीच का युद्ध कहते हैं।  इस युद्ध के बारे में भी हमारी वही धारणा है जो राम रावण युद्ध के बारे में थी।  यहां हम इन युद्धों पर विचार नहीं कर रहे वरन् आज की कथित आधुनिक  सहिष्णु सभ्यता के सिद्धांतों का प्राचीन सिद्धांतों से हो रहे युद्ध की चर्चा कर रहे हैं जो निरंतर जारी है।  इसमें हथियारों के उपयोग के साथ बहस में विचार भी शस्त्र की तरह प्रस्तुत किये जा रहे हैं।
            अभी बीबीसी पर दिल्ली में हुए एक बलात्कार के अभियुक्त का साक्षात्कार आया था।  इस पर महिलाओं पर की गयी टिप्पणियों पर बहस चल ही रही थी कि नागालैंड में एक बलात्कार के आरोपी को केंद्रीय जेल से निकालकर सरेराह दंडित करने का मामला आ गया।  एक तरफ दिल्ली के बलात्कारियों के अभियुक्तों का सभ्य कानूनों के तहत अभी तक सजा नहीं दिये जाने पर आधुनिक विद्वान सियापा कर रहे थे तो अब नागालैंड में अभियुक्त को जनसजा दिये जाने पर रोष जता रहे हैं।
            भारतीय अध्यात्म के पुरोधा मनु के अनुसार जो सजा बलात्कारी के लिये तय है उसका कुछ लोग  समर्थन करेंगे तो जंगली कहलायेंगे। कहा जायेगा कि आज मनुस्मृति अप्रासंगिक है। मनुस्मृति में यह तय नहीं है कि सजा कौन देगा-राज्य या जनसमूह-पर जो है उसके अनुसार बलात्कारी के लिये काफी दर्दनाक स्थिति हो सकती है।  आधुनिक सभ्यता के विद्वान उसे अमानवीय कहेंगे। इन विद्वानों के अनुसार तो पूरे विश्व में आधुनिक सभ्रांत व्यवस्था का ही अनुसरण होना चाहिये  जिसमें छानबीन के बाद ही किसी को सजा मिलना चाहिये। आधुनिक सभ्रांत व्यवस्था के अनुसार चाहे हजार अपराधी छूट जायें पर एक निरपराध को सजा नहीं होना चाहिये।  यह सिद्धांत ठीक है पर जिस तरह की आधुनिक व्यवस्थायें हैं उसमें न्यायालय में जांच संस्थाओं की शक्ति भी इतनी है कि वह जिस तरह आरोप प्रस्तुत करती हैं उसी के अनुसार ही निर्णय हो सकता है।  अनेक न्यायालय तो जांच एजेंसियों की कुछ अपराधों में जांच प्रक्रिया की कमजोरी पर  ही आपत्ति कर देते हैं। न्यायाधीशों के पास अपने विवेक का अधिक उपयोग करने की अधिक सुविधा नहीं है-किताबों में लिखे नियमों के आधार पर उन्हें चलना होता है।  न्यायाधीश ईमानदार और उत्साही हो तो भी उसे जांच एजेंसियों के सहयोग पर ही निर्भर होना होता है।  इन्हीं जांच एजेंसियों पर कभी कभी  अपराधियों को बचाने या कमजोर आरोप पत्र बनाने का आरोप भी लगता है।  ऐसे में न्याय में विलंब भी होता है जिससे पक्षकार परेशान होते हैं।
            जब पूरे विश्व में अपराध बढ़ रहे हैं और आधुनिक सभ्रांत व्यवस्था उनका सामना नहीं कर पा रही तो समाज में निराशा होना स्वाभाविक है।  तब प्राचीन सभ्यता के सिद्धांतों के प्रति लोगों में झुकाव हो रहा है।  यह अलग बात है कि अहिंसक चर्चा के साथ साथ कहीं हिंसा भी हो रही है।  आजकल समाज पर आधुनिक प्रचार माध्यमों का प्रभाव इतना है कि लोग उनसे संचालित हो रहे हैं।  ऐसे में जब प्रचार माध्यम कहीं निराशा का माहौल पैदा करते हैं तो उससे उपजा क्रोध भी अपना काम कहीं न कहीं दिखाता है।  हमें ठीक नहीं पता कि दीमापुर में क्या हुआ पर इतना हमने जरूर देखा कि दिल्ली के प्रकरण की चर्चा की पूरे भारत में प्रतिकिया हुई थी।  एक बलात्कारी को सजा न दिये जाने पर प्रचार माध्यमों ने जो निराशा पैदा की वह एक बलात्कार के आरोपी पर जनसजा के रूप में प्रकट हुई तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। हालांकि इस घटना को मानवीय ठहराये जाने पर यह तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता-क्योंकि भीड़ जब आक्रोश में होती है तब यह संभव नहीं है कि वह सत्य तर्क के आधार पर किसी के अपराधी या निरपराधी होने पर विचार करे।
            वैसे तो अनेक स्थानों पर जनता के हत्थे चढ़े बलात्कार के आरोपी मौत के गाल में समा चुके हैं पर चूंकि दिल्ली का प्रकरण प्रचार माध्यमों में चल ही रहा था तब दीमापुर में बलात्कार के आरोपी की हत्या हुई है शायद इसलिये उसकी चर्चा हो रही है।  हमारा मानना है कि यह आधुनिक और प्राचीन सभ्य सैद्धांतिक परंपराओं का द्वंद्व है जो  फिलहाल किसी निष्कर्ष पर पहुंचता नहीं दिख रहा।  यह बात आधुनिक समाज शास्त्री स्वीकार नहंी करेंगे पर सत्य यही है।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
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Sunday, March 1, 2015

दुष्टों की बदतमीजी सहने से कोई लाभ नहीं-भर्तृहरि नीति शतक(dushton ki badatamiji sahane se koyee labh nahin-bhartrihari neeti shatak)



            सामान्य मनुष्य की यह प्रवृत्ति रहती है कि वह उच्च पदस्थ, धनवान तथा प्रतिष्ठा के शिखर पर पहुंचे कथित सिद्ध पुरुषों की चाटुकारिता इस उद्देश्य से करता है कि पता नहीं कब उनमें काम पड़ जाये? जबकि शिखर पुरुषों की भी यह प्रकृत्ति है कि वह अपनी सुविधानुसार ही सामान्य लोगों को लाभ देने का अवसर प्रदान करते हैं।  वह दरियादिल नहीं होते पर समाज उनसे ऐसी अपेक्षा सदैव किये रहता है कि वह कभी न कभी दया कर सकते हैं।  माया के पुतले इन शिखर पुरुषों को अनावश्यक ही प्रतिष्ठा और सम्मान मिलता है जिस कारण हर कोई उन जैसा स्तर पाने की कामना करता है।

पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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फलमलशनाय स्वादु पानाय तोयं।
क्षितिरपि शयनार्थ वाससे वल्कलं च।
नवधन-मधुपानभ्रान्तसर्वेन्द्रियाणामविनयमनुमन्तुं नौतसहे दुर्जनाम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-खाने के लिये पर्याप्त धन, पीने के लिये मधुर जल, सोने के लिये प्रथ्वी और पहनने के लिये वृक्षों की छाल है तो हमारी नई ताजी संपदा की मदिरा पीकर मस्त हुए दुर्जनों की बदतमीजी सहने की कोई इच्छा नहीं है।

            योगी, सन्यासी और ज्ञानी इस मायावी संसार के सत्य को जानते हैं।  इसलिये ही जितना मिले उससे संतोष कर लेते हैं।  कहा भी जाता है कि संतोष ही सबसे बड़ा धन है जबकि असंतोष के वशीभूत होकर लोग न केवल अनुचित प्रयास करते हैं वरन् अनावश्यक ही धन, पद और प्रतिष्ठा के शिखर पुरुषों के दरवाजे अनावश्यक नत मस्तक होते हैं।  कालांतर में असंतोष से प्रेरित होकर किये गये प्रयास उन्हें भारी निराश करते हैं। हर व्यक्ति को एक बात याद रखना चाहिये कि उच्च पद, धनवान तथा प्रतिष्ठा के शिखर पर बैठे लोग  कुछ देने के लिये हाथ जरूर उठाते हैं पर वह उनकी सुविधानुसार सकाम प्रयास होता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Saturday, February 14, 2015

संतुष्ट गरीब किसी धनिक से बेहतर-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(santush garib kisi dhanik se behatar-A Hindu hindu religion thought based on patanjali yog sahitya)



            कहा जाता है कि संतोष सबसे बड़ा धन है पर आज हम जब समाज में इस सिद्धांत के आधार पर दृष्टि डालते हैं तो आभास होता है कि लोग माया की दृष्टि से अधिक धनी जरूर हो गये पर मानसिक रूप से बहुत दरिद्र हैं।  स्थिति यह है कि धन, पद और प्रतिष्ठा के अभाव से त्रस्त अनेक लोग आत्महत्या कर स्वयं को जीवन से मुक्ति दिला देते हैं।  नश्वर देह को समय से पहले ही नष्ट करना अने लोगों को  अच्छा लगने लगा है।
            हमारे एक मित्र ने एक किस्सा सुनाया जो  हमें अत्यंत रुचिकर लगा । वह मित्र अपनी धर्मपत्नी के साथ मंडी गये थे।  वहां उनका एक परिचित दूधिया अपनी साइकिल छायादार स्थान पर खड़ी कर गर्मी में बटी खा रहा था।  उसके पास आठ दस बटियां थीं। सभी जानते हैं कि गर्मी में बटियां खाने से पानी की कमी नहीं होती।  हमारे मित्र ने उस दूधिया से कहा-अरे, इतनी सारी बटियां जमा कर रखी हैं। सभी खाओगे या बचाकर घर ले जाओगे?’’
            उस दूधिया ने कहा कि-‘‘सभी खाऊंगा। मेरा घर यहां से सात  किलोमीटर दूर है। इस गर्मी में साइकिल चलाते हुए यही बटियां मेरे पेट में कूलर का काम करेंगी।’’
            हमारे मित्र ने उसकी आंखों में जो आत्मविश्वास देखा उससे वह आत्मविभोर हो गये।  उन्होंने अपनी पत्नी से कहा-‘‘पता नहीं यह गलतफहमी अनेक समाज सेवकों  को क्यों है कि गरीब और परिश्रमी लोग जीवन में मुश्किलों से हार जाते हैं। ऐस लोगों को देखो तो लगता है कि गरीब होना ही दुःख का प्रमाण नहीं है।  इस लड़के की आंखों में जो आत्मविश्वास था वह हम जैसे सभ्रांत वर्ग के बच्चों के पास कहां होता है? सबसे बड़ी बात यह कि गरीबों को भिखारी मानकर विचार नहीं करना चाहिए।’’

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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वयमिह परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दुकूलैस्सभ इह परितोषे निर्विशेषो विशेषः।
स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः।।
            हिन्दी में भावार्थ-हे राजन्! हम पेड़ की छाल के वस्त्र पहनकर संतुष्ट हैं तो तुम रेशमी परिधान पहनकर प्रसन्न हो। संतोष तो हम दोनों को ही है तब विरोध वाली बात कहां है? इसमें विशेष कुछ नहीं है। दोनों ही संतुष्ट है तब अंतर नहीं है। मगर जो दरिद्र है पर जिसकी इच्छायें अधिक है उसका अगर मगर संतोष से भर जाये तो धनिक और दरिद्र में अंतर कहां रह जाता है।

            आधुनिक राज्यव्यवस्थाओं में पूरे विश्व के शिखर पुरुष हमेशा ही गरीबों के मसीहा होने का दावा करते हैं यह अलग बात है कि उनके प्रशासनिक तंत्र की नीतियां और कार्यशैली इसके विपरीत दिखती हैं।  गरीब, बेसहारा, बूढ़े, कमजोर तथा विकलांग की सेवा के नारे पूरे विश्व में लगते हैं।  तब ऐसा लगता है कि बस इस धरती पर देवता प्रकट होने वाले ही है।  ऐसा होता नहीं क्योंकि इस तरह के नारे लगाने वालों का उद्देश्य केवल प्रचार के माध्यम से अपना अर्थ साधने का होता है।  सभी गरीब भीख नहीं मांगते और श्रम से जीने वाले सभी लोग धनिक होने का सपना देखकर अपना समय भी नष्ट नहीं करते।  अभावों में जीने वाले जिंदा हैं तो संपन्न लोगों को अपनी रक्षा की चिंता खाये जाती है।
            इसलिये किसी गरीब को देखकर उस पर हंसना नहीं चाहिये और न ही अपनी संपन्नता के मद में रहकर जीवन बिताना चाहिये। जिसके पास मन का संतोष है वही सबसे बड़ा धनी है। बढ़त राजरोगों के बढ़़ते प्रभाव से तो यही निष्कर्ष निकलता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
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Sunday, February 1, 2015

ध्यान से वृत्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(dhayan se vritiyo par niyantran paya ja sakta hai-A Hindu hindi thought article based on patanjali yoga sahitaya)




                                                       यह संसार चक्र अपनी गति से चलता है।  सदियों से अनेक मनुष्य इस धरती पर जन्मे फिर काल कलवित हो गये। यह अलग बात है कि अपने जीवनकाल में हर मनुष्य यही सोचता है कि उसकी सांसे भौतिक वस्तुओं की तरह  संपत्ति है।  जीवन निर्वाह के कर्मो को वह इतनी रुचि के साथ करता है अपने अध्यात्म या आत्म के प्रति लापरवाह हो जाता है। लाभ पर हंसना और हानि होने पर रोकर वह पूरा जीवन बिता देता है।  इसके विपरीत योग तथा ज्ञान साधक जीवन के हर पल का सहजता से आनंद उठाते हैं।  वह जानते हैं कि लोभ से निराशा, राग से द्वेष, मोह से वियोग तथा अविद्या से भय के भाव का स्थायी संयोग है।  जो  घट गया वह  आज स्मृतियों में है  और जो चल रहा है वह भी स्मृतियों का ही भाग हो जायेगा।  इसलिये अपने अंदर राग या कामना का भाव नहीं आने देते क्योंकि बाद के भाव द्वेष और निराशा का भी उनको अनुमान होंता है। इसलिये विषयों में वह सीमित भाव हिन्दी में भावार्थ-अविद्या, मोह, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश यह पांच प्रकार के क्लेश हैं।

पतंजलि योग में कहा गया है कि

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अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-अविद्या, मोह, राग, द्वेष तथा अभिनिवेश यह पांच प्रकार के क्लेश हैं।

सुखानुशयी राग।



सुखानुशयी राग।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-सुख भोगने की जो इच्छा हृदय में रहती है उसे राग कहा जाता है।

दुःखानुशायी द्वेषः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-दुःख के अनुभव के पीछे जो भाव है उसे द्वेष कहते हैं।

ध्याहेयास्तदृवृत्त्यः।

                                                       हिन्दी में भावार्थ-ऐसी वृत्तियों का त्याग ध्यान से ही किया जा सकता है।

                                                       संसार का हर  विषय हमारी देह से जुड़ा है पर वह अंतिम सत्य नहीं है। जिस तरह देह को धारण करने वाला ही अंतिम शक्ति है उसी तरह सांसरिक विषयों से अधिक अध्यात्मिक ज्ञान महत्वपूर्ण है। एक बात तय है कि देह का सांसरिक विषयों से जिस तरह संयोग होता है उसी तरह उसके कर्म के परिणाम अच्छे और बुरे दोनों तरह का संयोजन करते हैं। जहां राग है वहां क्लेश है और जहां कामना है वहां निराशा उत्पन्न होगी यह निश्चित है।  इस तरह के संयोग का ध्यान से ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।  ध्यान और योग में सक्रिय लोग विषयों से जुड़ने के बाद उनसे परिणाम प्रतिकूल होने पर निराशा नहीं होते क्योंकि वह राग से परे होते हैं।  अपनी दैहिक आवश्यकता की पूर्ति के लिये प्रयास रहते हैं पर वस्तुओं में कामना नहीं रखते क्योंकि जानते हैं कि  एक दिन वह पुरानी हो जायेंगी तब निराशा का भाव आयेगा।
            ध्यान से वृत्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेखसे संपर्क रखते हैं ताकि उनसे निराशा या तनाव न हो।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
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Saturday, January 17, 2015

भारत का आम हिन्दू अध्यात्मिक रूप से ज्ञानी है-हिन्दी चिंत्तन लेख(bharat ka aam hindu adhyatmik roop se gyani hai-hindi thought article)



            अभी हाल ही में एक फिल्म से हमारे देश के धार्मिक संगठनों के लिये हास्यास्पद स्थिति का निर्माण किया।  इस फिल्म के विरोध अभियान चलाते समय में रणनीति तथा धरातल के सत्य का उनको ज्ञान नहीं था-यह बात साफ प्रतीत होती है।  एक सामान्य फिल्म जो तीन दिन में दम तोड़ देती एक निरर्थक विरोध अभियान ने उसने इतिहास के सबसे अधिक राजस्व कमाने वाली फिल्म बना दिया।  अगर हिन्दू धर्म की रक्षा का अभियान इन कथित लोगों को युद्ध स्तर पर चलाना है तो नीतियां भी व्यवहारिक अपनाना चाहिए। बिना रणनीति के कोई रण नहीं जीता जा सकता।  कम से कम उन्हें इस विषय में चाणक्य और विदुर नीति का अध्ययन तो अवश्य करना चाहिये।

      जब कोई सेनापति युद्ध के लिये जब निकलता है तो अपने अस्त्र शस्त्र के भंडार के साथ ही अपने सैनिकों के पराक्रम की व्यापकता और सीमा दोनों का ही अध्ययन कर लेता है।  इतना ही नहीं वह अपनी प्रजा की मानसिकता का भी विचार करता है।  हमारे भारत में कथित धर्म रक्षक हवा में ही शब्द बाण छोड़कर आत्ममुग्ध हो जाते हैं।  उन्हें न तो अपने समाज के संपूर्ण विचारों का ज्ञान है न यह जानते हैं कि आर्थिक, सामाजिक तथा पारिवारिक कारणों से वह मध्यम वर्ग कितने भारी तनाव में सांस ले रहा है जो धर्म के लिये बौद्धिकता का दान देता है। उसी तरह उस निम्न वर्ग के लिये अपने अस्तित्व का संघर्ष अत्यंत जटिल हो गया है जो धर्म की रक्षा के लिये अपना श्रम दान करता है।  पैसा दान करने वाला उच्च वर्ग भी अब अपने सात्विक लक्ष्य पाने की बजाय स्वार्थवश ही करता है।  सामाजिक तथा आर्थिक विषयों में तीनों वर्ग समन्वय स्थापित नहीं कर पा रहे-बल्कि कहीं कहीं वैमनस्य की भावना भी बढ़ रही है।

      ऐसे में फिल्म को लेकर कथित धर्म रक्षकों का अभियान न केवल टांय टांय फिस्स हुआ वरन् उससे फिल्म बनाने वालों को कमाई अधिक ही हो गयी।  उससे भी अधिक अब हंसी महिलाओं को चार बच्चे पैदा करने की प्रेरणा देने पर उड़ रही है। जिस तरह महिलाओं को एक वस्तु मानकर यह बात कही गयी है वह अत्यंत अपमानजनक है।  इन लोगों का एक तरह से इसी तरह की मान्यता है कि महिलायें तो केवल बच्चे पैदा करने की मशीन है। इससे ज्यादा उसका महत्व नहीं है।

      चार बच्चे पैदा करने की प्रेरणा के लिये विचित्र बातें कही जा रही हैं।

      1-चार बच्चे इसलिये पैदा करो क्योंकि दूसरे समूह के लोग चालीस कर रहे हैं।

      2-एक बच्चा सीमा पर भेज दो। एक संतों को दे दो। दो अपने पास रख लो।

      निहायत ही हास्यास्पद तर्क हैं। पहली बात तो यह कि बच्चे से आशय इनका लड़के से ही है।  क्या यह मानते हैं कि इनकी राय पर चलने वाली औरते केवल लड़के को ही जन्म देंगी? क्या गर्भवती होने पर वह भ्रुण परीक्षण कराने जायेंगी।  क्या जब तक चार लड़के जन्म लें तब तक लड़कियों का जन्म उनको स्वीकार्य होगा? इससे तो बच्चों की संख्या आठ से दस तक जा सकती है।  आज स्वास्थ्य का जो स्तर है उसमें यह संभव नहीं लगता।  इस तरह तो कन्या भ्रुण हत्या को प्रोत्साहन मिलेगा?। हमें मालुम है कि देश की सामान्य महिलायें समझदार हैं और इस तरह के बयानवीरों की असलियत जानती हैं।  दूसरी बात यह कि सीमा पर जाने का मतलब सेना में भर्ती होने से ही है।  उस पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि देश में बेरोजगारी इतनी है कि किसी स्थान विशेष पर चार या पांच सौ सैनिकों की भर्ती के लिये शिविर लगता है तो वहां चालीस से पचास हजार लड़के भर्ती होने के लिये आ जाते हैं।  अनेक जगह तो भीड़ बेकाबू होने से उपद्रव भी हो चुके हैं।  पहले तो इस देश के युवकों को पूरी तरह भर्ती करा लें जो मौजूद हैं।  संतों को देने का सवाल एकदम अधार्मिक है।  कहीं भी किसी जगह इस तरह का संदेश नहीं है।

      हम यहां यह स्पष्ट कर दें कि भारत की विश्व में पहचान श्रीमद्भागवत गीता के कारण अधिक है।  उसमें जो अध्यात्मिक ज्ञान है वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना पूर्व काल में था।  धार्मिक वस्त्र पहनकर स्वयं को विद्वान समझने वाले लोगों को अपने अध्यात्मिक ज्ञान के बारे में कितना पता है यह तो पता नहीं पर इतना तय है कि उनमें अपने समाज को लेकर आत्मविश्वास की भारी कमी है। वह शायद नहीं जानते कि भारत का आम हिन्दू अध्यात्मिक रूप से ज्ञानी है।

प्रस्तुत है इस पर एक कविता

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सच्चाई यह है कि
संख्या बल से
युद्ध नहीं जीते जाते।

पराक्रमियों का संरक्षण
समाज अगर न पा सके
शांति से दिन नहीं बीते जाते।

कहें दीपक बापू बुद्धि के वीरों पर
दो गुणा दो बराबर चार का सिद्धांत
असर नहीं करता
एक और ग्यारह की योजना से
करते किला फतह,
भीड़ बढ़ाकर नहीं चाहते कलह,
अपनी सोच से बढ़ते आगे
बांटते हैं वह सभी को प्रसन्नता
स्वयं भी सुख पीते जाते।
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Friday, January 9, 2015

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन से इतर अन्य विचाराधाराऐं राजनीतिक आधार पर चलती हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख (bhartiya adhyatmik darshan se itar anya vichardharaen rajneetik adhar par chaltee hain-hindi hindu thought article)



            फ्रांस के पेरिस में लगातार आतंकवादी हमलों से वहां के वातावरण जो भावनात्मक विष मिश्रित हो रहा है उसे कोई समझ नहीं पा रहा है।  ऐसा लगता है कि विश्व में मध्य एशिया से निर्यातित आतंकवाद के मूल तत्व को कोई समझ नहीं पा रहा है। हमारे देश में कथित रूप से जो सर्व धर्म समभाव या धर्म निरपेक्ष का राजनीतिक सिद्धांत प्रचलित है वह विदेश से आयातित है और भारतीय दर्शन या समाज की मानसिकता का उससे कोई संबंध नहीं है। पहले तो सर्व धर्म शब्द ही भारतीय के लिये एक अजीब शब्द है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में कहीं भी हिन्दू धर्म का नाम नहीं है वरन् उसे आचरण और कर्म से जोड़ा गया है।  कभी कभी सर्व धर्म भाव या धर्मनिरपेक्ष शब्द कौतूहल पैदा करता है।  इस संसार में आचरण या कर्म के आशय से प्रथक अनेक कथित धर्म हो सकते हैं-यह बात भारतीय ज्ञान साधक के लिये सहजता से गेय नहीं हो पाती।
            जब हम यह दावा करते हैं कि हमारे देश में विभिन्नता में एकता रही है तो उसका आम जनमानस में  पूजा पद्धति के प्रथक प्रथक रूपों की स्वीकार्यता से है। हम जैसे अध्यात्मिक ज्ञान साधकों के लिये किसी की भी पूजा पद्धति या इष्ट के रूप पर प्रतिकूल टिप्पणी करना अधर्म करने वाला काम होता है। सर्वधर्म समभाव तथा धर्म निरपेक्ष शब्द अगेय लगते हैं पर इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी मूल भावना से कोई विरोध है।  इसके बावजूद विश्व में प्रचलित कथित धर्मों के नाम पर चल रही गतिविधियों का आंकलन करना जरूरी लगता है।  स्पष्टतः मानव में अदृश्य सर्वशक्तिमान के प्रति जिज्ञासा तथा सम्मान का भाव रहता है।  इसी का दोहन के करने के लिये अनेक प्रकार की पूजा पद्धतियां तथा इष्ट के रूप में निर्मित किये गये।  यहां तक सब ठीक है पर उससे आगे जाकर अज्ञात सर्वशक्तिमान  के आदेश के नाम पर मनुष्य जीवन के रहन सहन, खान पान तथा पहनावे तक के नियम भी बनाने की प्रक्रिया चतुर मनुष्यों की अपना स्थाई समूह बनाकर अपना वैचारिक सम्राज्य विस्तार की इच्छा का परिणाम लगता है।  वह इसमें सफल रहे हैं।  पूजा पद्धतियां और इष्ट के रूप अब मनुष्य के लिये धर्म की पहचान बन गये हैं।  उससे भी आगे रहन सहन, पहनावे और खान पान में अपने शीर्ष पुरुषों के सर्वशक्तिमान के संदेश के नाम पर बिना चिंत्तन किये अनुसरण इस आशा में करते हैं कि इस धरती पर इस नश्वर देह के बिखरने के बाद आकाश में भी बेहतर स्थान मिलेगा। पूजा पद्धतियां और सर्वशक्तिमान के रूप ही लोगों की पहचान अलग नहीं कर सकते क्योंकि इनके साथ मनुष्य एकांत में या कम जन समूह में संपर्क करता है जबकि खान पान, रहन सहन तथा पहनावे से ही असली धर्म की पहचान होती है।  हम एक तरह से कहें कि जिस तरह सर्व धर्म समभाव या धर्म निरपेक्षता राजनीतिक शब्दकोष से आये हैं उसी तरह विभिन्न धर्मों से जुड़े शब्द भी प्रकट हुए हैं।  हम सीधी बात कहें तो पूजा पद्धति और इष्ट के रूप से आगे निकली धर्म की पहचान उसके शिखर पुरुषों की राजनीतिक विस्तार करती है।  ऐसे में जब हम जैसे चिंत्तक विभिन्न नाम के धर्मों को देखते हैं तो सबसे पहला यह प्रश्न आता है कि उसकी सक्रियता से राजनीतिक लाभ किसे मिल रहा है?
            इतिहास बताता है कि मध्य एशिया में हमेशा ही संघर्ष होता रहा है। परिवहन के आधुनिक साधनों से पूर्व विश्व के मध्य में स्थित होने के कारण दोनों तरफ से आने जाने वाले लोगों को यहां से गुजरना होता था।  इसलिये यह मध्य एशिया पूरे विश्व के लिये चर्चा का विषय रहा है।  तेल उत्पादन की वजह से वहां माया मेहरबान है और ऐसे में इस क्षेत्र के प्रति विश्व के लोगों का आकर्षण होना स्वाभाविक रहा है।  ऐसे में मध्य एशिया ने अपनी पूजा पद्धति और इष्ट के रूप के साथ मनुष्य जीवन में हस्तक्षेप करने वाली प्रक्रियाओं को जोड़कर अपने धर्म का प्रचार कर अपना साम्राज्य सुरक्षित किया है।  इस क्षेत्र में अन्य पूजा पद्धतियों या इष्ट के रूप मानने वालों को स्वीकार नहीं किया जाता मगर इसके बावजूद उन पर सर्वधर्म समभाव या धर्मनिरपेक्ष भाव अपनाने का का दबाव कोई नहीं डाल सकता।  अलबत्ता इन्होंने अपने दबाव से भिन्न पूजा पद्धतियों और इष्ट के रूप मानने वालों को  सर्वधर्म समभाव या धर्मनिरपेक्ष भाव अपनाने का दबाव डाला।  इनके पास तेल और गैस के भंडार तथा उससे मिली आर्थिक संपन्नता से विश्व के मध्यवर्गीय समाज का वहां जाने के साथ  अपने क्षेत्र में ही प्रमुख धार्मिक स्थान होने की वजह से जो शक्ति मिली उससे मध्य एशिया के देशों की ताकत बढ़ी।  यह क्षेत्र आतंकवाद का निर्यातक इसलिये बना क्योंकि अपना भावनात्मक साम्राज्य विश्व में बदलाव से नष्ट होने की आशंका यहां के शिखर पुरुषों में हमेशा रही है।
            हमें इनकी गतिविधियों पर कोई आपत्ति नहीं है पर हम यह साफ कहना चाहते हैं कि पूजा पद्धति और इष्ट के रूप के आगे जाकर कथित रूप से अन्य परंपरायें शुद्ध रूप से राजसी विषय है-स्पष्टत । सात्विक भाव का इनसे कोई संबंध नहीं है। हमारा भारतीय अध्यात्मिक दर्शन जिसे सुविधा के लिये हम हिन्दू संस्कृति का आधार भी कह सकते हैं वह केवल पूजा पद्धति के इर्दगिर्द ही रहा है।  इतना ही नहीं जीवन को सहन बनाने के लिये योग साधना जैसी विधा इसमें रही है जिसमें आसन, प्राणायाम तथा ध्यान के माध्यम से समाधि का लक्ष्य पाकर व्यक्त्तिव में निखार लाया जा सकता है।  भारतीय अध्यात्मिक दर्शन का आधार ग्रंथ श्रीमद्भागवत गीता स्वर्णिम शब्दों का भंडार है  सांसरिक विषय का रत्तीभर भी उल्लेख  नहीं है।  स्पटष्तः कहा गया है कि अध्यात्मिक ज्ञान होने पर मनुष्य राजसी विषय में भी सात्विकता से सक्रिय रह कर सहज जीवन बिता सकता है।  खान पान, पहनावे, तथा रहन सहन के साथ ही कोई ऐसा धार्मिक प्रतीक चिन्ह नहीं बताया गया जिससे अलग पहचान बनी रहे। हमारी पहचान दूसरे कथित धर्मों से अलग इसलिये दिखती है क्योंकि उनके मानने वाले अपनी विशिष्ट पहचान के लिये बाध्य किये गये दिखते हैं।
            जिस तरह पूरे विश्व में कथित धर्मों के बीच संघर्ष चल रहा है उसके आधार पर हमारी यही राय बनी है कि उनके आधार राजनीतिक ही हैं। हमारे देश के लोग यह कहते हैं कि धर्म को राजनीति से नहीं जोड़ना चाहिये तो उन्हें यह समझना होगा कि इस नियम का पालन केवल भारतीय अध्यात्मिक विचारधाराओं में ही होता है।  बाहर से आयातित सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा साहित्य विचाराधारायें शुद्ध रूप से राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली हैं। अगर ऐसा न होता तो रहन सहन, खान पान तथा पहनावा जो भौगोलिक आधारों पर तय होना चाहिये उसके लिये सर्वशक्तिमान के आदेश बताने की जरूरत नहीं होती। 
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Wednesday, December 24, 2014

महापुरुष विश्व रत्न होते हैं-हिन्दी चिंत्तन लेख(mahapurush vishwaratna hote hain-hindi thought article)



            यह विचित्र बात है कि जब भी किसी शासकीय पुरस्कार की बात आती है विवाद प्रारंभ हो जाते हैं। देश में केंद्र तथा राज्य सरकारें साहित्य कला तथा खेल के क्षेत्र में पुरस्कार देती रहती हैं।  यह पुरस्कार सम्मानीय लोगों को उनके क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के रूप में दे दिया जाता है-सिद्धांतः ऐसा माना जाता है। यह अलग बात है कि बाद में उन पर अनेक प्रकार के विवाद प्रारंभ हो जाते हैं। हमारे यहां अनेक निजी प्रतिष्ठानों की तरफ से भी प्रदान किये जाने वाले-खासतौर से साहित्य और पत्रकारिता के पुरस्कार-विशुद्ध रूप से प्रबंध कौशल से निर्धारित होते हैं।
            सात वर्ष पूर्व हमारे अध्यात्मिक ब्लॉग पर एक बार एक ब्लॉग मित्र ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि मनुस्मृति पर लिखने के बाद यह आशा आप कभी न करें कि आपका कभी सम्मान नहीं होगा।  हमें हसंी आ गयी।  जब युवावस्था में लिखते थे तो सम्मान की चाह होती थी पर अंतर्जाल पर लिखना प्रारंभ करते समय सम्मान का मोह समाप्त हो चुका था।  हम तो यही मानकर चलते हैं कि दो लोग भी हमारा पढ़कर प्रसन्न हुए तो वही हमारा सम्मान है।  स्थानीय स्तर पर हमसे सम्मान लेने के सर्शत प्रस्ताव आये पर उनमें हमारी रुचि नहीं रही।  इधर अध्ययन चिंत्तन और मनन की सतत प्रक्रिया के साथ ही योगाभ्यास ने हमारे इस दृष्टिकोण को मजबूत कर दिया कि हमारी अपनी सोच भी कम अनोखी नहीं है।  यह लेख हम आत्मप्रवंचन के लिये नहीं लिख रहे वरन् अभी भारत रत्न के लिये श्रीअटल बिहारी वाजपेयी और श्री मदन मोहल मालवीय का नाम चयनित होने पर विवाद हो रहा है।  इस पर जारी चर्चाओं में अनेक लोग कुछ ऐसे महापुरुषों को भारत रत्न न देने पर प्रश्न उठा रहे हैं जो विश्व रत्न हैं-यथा, श्रीगुरू नानक देव, संत कबीर, कविवर रहीम, संत विवेकानद आदि। इस पर केवल हंसा ही जा सकता है।
            वैसे तो श्रीअटल बिहारी वाजपेयी और स्वर्गीय मदन मोहन मालवीय को भारत रत्न का विरोध करना ही नहीं चाहिये अगर करना ही है तो ऐसे महापुरुषों का नाम नहीं लेना चाहिये जिनकी छवि अध्यात्मिक रूप से इतनी उज्जवल हो कि उन्हें पूरा विश्व ही रत्न मानता है।  इस चर्चा में प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों का दर्द सामने आ ही गया है क्योंकि उनकी दृष्टि से यह दोनों महानुभाव दक्षिणपंथियों के नायक हैं। उनके लिये सबसे ज्यादा दर्दनाक तो इनके साथ जुड़े हिन्दु तत्व जुड़ा होना है जिसे दक्षिण पंथ का पर्याय माना जाता है।  यही वजह है कि कथित प्रगतिशील और जनवादी विद्वानों में मन में यह टीस तो होगी कि आगामी पांच वर्ष उन्हें अपनी विचारधारा के लिये केंद्रीय सम्मान की आशा छोड़नी पड़ेगी। यह टीस उनके रचनाकर्म को प्रभावित कर सकती है क्योंकि निष्काम कर्म के सिद्धांत की उनको समझ नहीं है जो कि श्रीमद्भागवत गीता उनकी दृष्टि से अध्ययन के लिये वर्जित ग्रंथ है।
            माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी हमारे ग्वालियर शहर में ही जन्मे हैं इस कारण उनसे हमारा स्वाभाविक लगाव है।  बाल्यकाल में हमने जिन दो नेताओं का नाम हमने सुना था उनमें एक थे स्वर्गीय प्रधान मंत्री श्री जवाहर लाल नेहरु अैार जनसंघ के नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी।  श्री लालकृष्ण आडवाणी के हम सहभाषी जातीय समुदाय से हैं पर उनका  नाम कम से कम दस वर्ष बाद सुना था। हमारे कुल परिवार के सभी वरिष्ठ सदस्य अटल बिहारी का नाम श्रद्धा से लेते थे।  अनेक लोगों को यह भ्रम है कि सिंधी भाषी होने के कारण इस भाषा जाति के सदस्य इन दोनों महानुभावों की पार्टी के समर्थक रहे हैं पर ऐसी सोच अज्ञान का प्रमाण ही है। यही कारण है कि हम जातिवाद के आधार पर किसी समीकरण पर विचार नहीं करते जैसा कि दूसरे लोग बताते हैं। दरअसल अटल बिहारी की भाषण शैली ऐसी रही है कि उनको किसी भी जाति या भाषा के लोग आत्मीय समझने लगते हैं और यही गुण उनको रत्न रूप प्रदान करता है।



दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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