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Sunday, July 24, 2011

हिन्दी अध्यात्मिक संदेश-शराब पीने से अन्य बुराईयां भी आती हैं (sharab peena buri adat-hindu adhyamik sandesh)

            यह प्रकृति की महिमा है कि मनुष्य का ध्यान व्यसनों की तरफ बहुत आसानी से चला जाता है। इसमें मद्यपान तथा जुआ दो ऐसे व्यसन हैं जो आदमी के तन, मन और धन की क्षति करते हैं पर फिर भी वह इसे अपनाता है। यह सही है कि सारे संसार में लोग एक जैसे नहीं होते पर प्रवृत्ति तो सभी की एक जैसी है। जिनके पास धन आता है उनका ऐसी राह पर चले जाना सहज होता है। जिनके पास धनाभाव है वह ऐसी प्रवृत्तियों में लिप्त इसलिये नहीं होते क्योंकि उनके पास अवसर नहीं होता।
          आर्थिक विशेषज्ञ अपने आंकड़े बताते हैं कि भारत में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो सामाजिक विशेषज्ञ भी यह रेखांकित करते हैं कि देश में खतरनाक प्रवृत्तियों वाले लोग भी बढ़ते जा रहे हैं। शराब और जुआ के प्रति लोगों का रूझान बढ़ रहा है। स्थिति यह है कि धनिकों की संगत वाले युवा अपनी जरूरतों के लिये अपराध की तरफ अपने कदम बढ़ाते जा रहे हैं।
पानझिप्तो हि पुरुषो यत्र तत्र प्रवर्तते।
वात्यसंव्यवहारर्यत्वै यत्र तत्र प्रवर्त्तनात्।।
                ‘‘मद्यपान का आदी पुरुष हर जगह अपना मुंह डालते हैं। मद्यपान के आदी पुरुष व्यवहार के योग्य नहीं रह जाते।’’
कामं स्त्रियं निषेवेत पानं वा साधुमात्रया।
न युतमृगये विद्वान्नात्यंव्यसने हि ते।।
             ‘‘भले ही कोई पुरुष स्त्रियों से अधिक संपर्क रखता हो और थोड़ी मात्रा में मद्यपान भी करे पर द्युतक्रीड़ा और शिकार में लिप्त होना तो बहुत बुरा व्यसन है।’’
          भारतीय समाज में अनेक विरोधाभास हैं जिनमें एक यह भी है कि जहां धर्म कर्म के नाम पर शोरशराबा बढ़ रहा है वही शराब और जुआ को सामाजिक शिष्टाचार माना जाने लगा है। अब तो यह संभव ही नहीं है कि कोई व्यक्ति यह कहे कि मैं शराबी से अपने संपर्क नहीं रखूंगा। पहले जिन रिश्तों के सामने शराब की बात तक कहना भी कठिन था उनके पास बैठक बड़े मजे से सेवन किया जाता है।
              इस तरह विचार परिवर्तन से सत्य नहीं बदल जायेगा। शराब शनै शनै मनुष्य की मानसिकता को प्रभावित करती है। उसके व्यवहार में विश्वास की कमी आने लगती है। इस बात को केवल तत्वज्ञानी ही अनुभव कर सकते हैं। वैसे आज तो यह स्थिति है कि मित्रता और व्यवहार के समूह बनते ही ऐसी आदतों पर हैं जिनको वर्जित माना जाता है। जुआ या सट्टा तो इस तरह आम हो गया है कि प्रसिद्ध खेल, धारावाहिक और चुनावों में इसका प्रभाव देखा जाता है। ऐसे में समाज के बिगड़ने की शिकायत करना बेमानी लगता है। यहां तो पूरी दाल ही काली है और जब हम समाज के बिगड़ने की बात कहते हैं तो अपनी मान्यताओं का भी विचार करना चाहिए। स्वयं तथा निकटस्थ लोगों को शराब और जुआ जैसे व्यवसनों से दूर रहने के लिये प्रेरित करना चाहिए।शराब पीने के बाद आदमी की बुद्धि नियंत्रण में नहीं रहती और वह अन्य अपराध करने के लिये प्रेरित भी होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, February 5, 2011

भक्ति में पाखंड से कोई लाभ नहीं-हिन्दी अध्यात्मिक लेख (bhakti aur pakhand-hindi chintan)

इस संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो अपनी धार्मिक छबि बनाये रखने के लिये भक्ति का दिखावा करते हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो गुरु बनकर अपने लिये शिष्य समुदाय का निर्माण कर अपनी रोजी रोटी चलाते हैं। ऐसे दिखावे की भक्ति करने वाले अनेक लोग हैं। इसके विपरीत जो भगवान की वास्तव में भक्ति करते हैं वह उसका प्रयार नहीं करते न ही अपना ज्ञान बघारते हैं। 
कबीरदास जी  के  अनुसार  
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मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
" दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।" 
मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।
"जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।"
भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों। हमारे समाज मिह दिखावे कि भक्ति सभी करते हैं पर जब आप करें तो ह्रदय से करें ताकि मन को शांति मिल सके।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा "भारतदीप",ग्वालियर 
writer and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwaliro
http://deepkraj.blogspot.com

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Monday, May 31, 2010

‘जीवन जीने की कला’ का मतलब है कि कभी विचलित न होना-हिन्दी लेख (meaning of art of living-hindi article

कथित रूप से जीने की कला सिखाने वाले एक संत के आश्रम पर गोली चलने की वारदात हुई है। टीवी चैनलों तथा समाचार पत्रों की जानकारी के अनुसार इस विषय पर आश्रम के अधिकारियों तथा जांच अधिकारियों के बीच मतभेद हैं। आश्रम के अधिकारी इसे इस तरह प्रचारित कर रहे हैं कि यह संत पर हमला है जबकि जांच अधिकारी कहते हैं कि संत को उस स्थान से निकले पांच मिनट पहले हुए थे और संत वहां से निकल गये थे। यह गोली सात सो फीट दूरी से चली थी। अब यह कहना कठिन है कि इस घटना की जांच में अन्य क्या नया आने वाला है।
संतों की महिमा एकदम निराली होती है और शायद यही कारण है कि भारतीय जनसमुदाय उनका पूजा करता है। भारतीय अध्यात्म ग्रंथों के प्रचार प्रसार तथा उनके ज्ञान को अक्षुण्ण बनाये रखने में अनेक संतों का योगदान है वरना श्रीमदभागवतगीता जैसा ग्रंथ आज भी प्रासंगिक नहीं बना रहता है।
मगर यह कलियुग है जिसके लिये कहा गया है कि ‘हंस चुनेगा दाना, कौआ मौती खायेगा’। यह स्थिति आज के संत समाज के अनेक सदस्यों में लागू होती है जो अल्पज्ञान तथा केवल भौतिक साधना की पूजा करते हुए भी समाज की प्रशंसा पाते हैं । कई तो ऐसे लोग हैं कि जिन्होंने पहनावा तो संतों का धारण कर लिया है पर उनका हृदय साहूकारों जैसा ही है। ज्ञान को रट लिया है पर उसको धारण अनेक संत नहीं कर पाये। हिन्दू समाज में संतों की उपस्थिति अब कोई मार्गदर्शक जैसी नहीं रही है। इसका एक कारण यह है कि सतों का व्यवसायिक तथा प्रबंध कौशल अब समाज के भक्ति भाव के आर्थिक् दोहन पर अधिक केंद्रित है जिसे आम जनता समझने लगी है। दूसरा यह कि अंग्रेजी शिक्षा पद्धति से शिक्षित बुद्धिजीवी अब संतों की असलियत को उजागर करने में झिझकते नहीं। बुद्धिजीवियों की संत समाज के प्रतिकूल अभिव्यक्तियां आम आदमी में चर्चित होती है। एक बात यह भी है कि पहले समाज में सारा बौद्धिक काम संतों और महात्माओं के भरोसे था जबकि अब आधुनिक शिक्षा प्राप्त कर यह काम ऐसे बुद्धिजीवी करने लगे हैं जो धार्मिक चोगा नहीं पहनते।
ऐसे अनेक बौद्धिक रूप से क्षमतावान लोग हैं जो भारतीय अध्यात्म के प्रति रुझान रखते हैं पर संतों जैसा पहनावा धारण नहीं करते। इनमें जो अध्यात्मिक ज्ञान के जानकार हैं वह तो इन कथित व्यवसायिक संतों को पूज्यनीय का दर्जा देने का ही विरोध करते हैं।
वैसे संत का आशय क्या है यह किसी के समझ में नहीं आया पर हम परंपरागत रूप से देखें तो संत केवल वही हैं जो निष्काम भाव से भक्ति में करते हैं और उसका प्रभाव इतना बढ़ जाता है कि अन्य सामान्य लोग उसने ज्ञान लेने उनके पास आते हैं। पहले ऐसे संत सामान्य कुटियाओं मे रहते थे-रहते तो आज भी कुटियाओं में कहते हैं यह अलग बात है कि वह संगममरमर की बनी होती हैं और उनके वातानुकूलित यंत्र लगे रहते हैं और नाम भी कुटिया या आश्रम रखा जाता है। सीधी बात कहें कि संत अब साहूकार, राजा तथा शिक्षक की संयुक्त भूमिका में आ गये हैं। नहीं रहे तो संत, क्योंकि जिस त्याग और तपस्या की अपेक्षा संतों से की जाती है वह अनेक में दिखाई नहीं देते। यही कारण है कि समाज में उनके प्रति सद्भावना अब वैसी नहीं रही जैसे पहले थी। ऐसे में आश्रम के व्यवसाय तथा व्यवस्था में अप्रिय प्रसंग संघर्ष का कारण बनते हैं पर उनको समूचे धर्म पर हमला कहना अनुचित है।
उपरोक्त आक्रमण को लेकर जिस तरह टीवी चैनलों ने भुनाने का प्रयास किया उसे बचा जाना चाहिए। भारतीय धर्म एक गोली से नष्ट नहीं होने वाला और न ही किसी एक आश्रम में गोली चलने से उसके आदर्श विचलित होने वाले हैं।
बात संतों की महिमा की है तो यकीनन कुछ संत वाकई संत भी हो सकते हैं चाहे भले ही उनके आश्रम आधुनिक साजसज्जा से सुसज्तित हों। इनमें एक योगाचार्य हैं जो योगसाधना का पर्याय बन गये हैं। यकीनन यह उनका व्यवसाय है पर फिर भी उनको संत कहने में कोई हर्ज नहीं। मुश्किल यह है कि यह संत हर धार्मिक विवाद पर बोलने लगते हैं और व्यवसायिक प्रचार माध्यम उनके बयानों को प्रकाशित करने के लिये आतुर रहते हैं। चूंकि यह हमला एक आश्रम था इसलिये उनसे भी बयान लिया गया। .32 पिस्तौल से निकली एक गोली को लेकर धर्म पर संकट दिखाने वाले टीवी चैनलों पर जब वह इस घटना पर बोल रहे थे तब लग रहा था कि यह भोले भाले संत किस चक्कर में पड़े गये। कुछ और भी संत बोल रहे थे तब लग रहा था कि कथित जीने की कला सिखाने वाले संत को यह लोग व्यर्थ ही प्रचार दे रहे हैं। जीवन जीने की कला सिखाने वाले कथित संत की लोकप्रियता से कहीं अधिक योगाचार्य की है और लोग उनकी बातों पर अभी भी यकीन करते हैं। कुछ अन्य संत कभी जिस तरह इस घटना को लेकर धर्म को लेकर चिंतित हैं उससे तो लगता है कि उनमें ज्ञान का अभाव है।
जहां तक जीवन जीने की कला का सवाल है तो पतंजलि योग दर्शन तथा श्रीमदभागवतगीता का संदेश इतना स्वर्णिम हैं कि वह कभी पुरातन नहीं पड़ता। इनके रचयिता अब रायल्टी लेने की लिये इस धरती पर मौजूद नहीं है इसलिये उसमें से अनेक बातें चुराकर लोग संत बन रहे हैं। वह स्वयं जीवन जीने की कला सीख लें जिसमें आदमी बिना ठगी किये परिश्रम के साथ दूसरों का निष्प्रयोजन भला करता है, तो यही बहुत है। जो संत अभी इस विषय पर बोल रहे हैं उनको पता होना चाहिए कि अभी तो जांच चल रही है। जांच अधिकारियों पर संदेह करना ठीक नहीं है। जीवन जीने की कला शीर्षक में आकर्षण बहुत है पर उसके बहुत व्यापक अर्थ हैं जिसमें अनावश्यक रूप से बात को बढ़ा कर प्रस्तुत न करना और जरा जरा सी बात पर विचलित न होना भी शामिल है। 
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anant-shabd.blogspot.com
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Tuesday, May 4, 2010

विदुर दर्शन-सत्य से ही धर्म की रक्षा संभव (satya se hi dharma ki raksha sanbhav)

सत्येन रक्ष्यते धर्मो विद्या योगेन रक्ष्यते।
मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते।।
हिन्दी में भावार्थ-
सत्य से धर्म, योग से विद्या, सफाई से सुंदरता और सदाचार से कुल की रक्षा होती है। 


पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मन्त्रिबान्धवाः।।
पतयो बान्धवा स्त्रीणां ब्राह्मण वेदबान्धवा।।
हिन्दी में भावार्थ-
पशुओं के सहायक बादल, राजाओं के सहायक मंत्री, स्त्रियों के सहायक पति के साथ बंधु और विद्वानों का सहायक ज्ञान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में ज्ञान का होना जरूरी है अन्यथा हम अपने पास मौजूद व्यक्तियों, वस्तुओं तथा उपलब्धियों का सही उपयोग नहीं कर सकते। एक बात याद रखना चाहिये कि हमारे साथ जो लोग होते हैं उनका महत्व होता है।  अंधेरे में तीर चलाने से कुछ नहीं होता, इसलिये जीवन के सत्य को समझ लेना चाहिये। राजाओं के सहायक मंत्री होते हैं। इसका आशय साफ है कि अपने मित्र और सलाहकार के चयन में हर आदमी को सतर्कता बरतना चाहिये।
स्त्रियों की स्वतंत्रता बुरी नहीं है पर उन्हें यह समझ लेना चाहिये कि उनकी रक्षा उसके परिवार के पुरुष सदस्य ही कर सकते हैं।  उनको बाहर के व्यक्तियों से यह अपेक्षा नहीं करना चाहिये कि वह उनकी रक्षा करेंगे भले ही चाहे वह कितना भी दावा करें।  हम अक्सर ऐसी वारदातें देखते हैं जिसमें स्त्रियों के साथ धोखा होता है और इनमें अधिकतर उनमें अपने ही  लोग होते हैं। इनमें भी अधिक संख्या उनकी होती है  जो परिवार के बाहर के होने के बावजूद उनसे निकटता प्राप्त करते हैं।  स्त्रियों के मामले में यह भी दिखाई देता है कि उनके साथ विश्वासघात अपने ही करते हैं पर इनमें अधिकतर संख्या  उन लोगों की होती है जो बाहर के होने के साथ  अपने बनने का नाटक हुए   उनको धर्म और चरित्र पथ से भ्रष्ट भी करते हैं।
हम लोगों का यह भ्रम होता है कि बादल हमारे लिये बरस रहे हैं।  जब बादल नहीं बरसते तब तमाम तरह के धार्मिक कर्मकांड किये जाते हैं। बरसते हैं तो धर्म के ठेकेदार अनेक प्रकार के दावे करते हैं जबकि सच्चाई यह है कि बादल धरती पर स्थित पेड़ पौद्यों तथा पशुओं के रक्षक हैं और इसलिये उनका तो बरसना ही है।
आजकल भारतीय योग साधना का प्रचार हो रहा है। दरअसल यह योग साधना न केवल स्वास्थ्य के लिये उपयुक्त है बल्कि उससे हमारी विद्या तथा ज्ञान की रक्षा भी होती है। इसलिये जो लोग चाहते हैं कि उनके बच्चे प्रतिभाशाली हों उन्हें चाहिये कि वह इसके लिये उनको प्रेरित करें।  आजकल कठिन प्रतियोगिता का समय है और ऐसे में योग साधना ही एक ऐसा उपाय दिखती है जिससे उनकी प्रतिभा को सोने जैसी चमक मिल सकती है। सच बात तो यह है कि इस संसार में खुश रहने के लिये योग साधना के अलावा कोई अन्य उपाय है इस पर विश्वास करना कठिन है। 
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anantraj.blogspot.com
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Tuesday, August 4, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-कविताओं से बहक जाते हैं लोग (kavita se log bahak jate-dharm sndesh)

भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
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सत्यत्वे न शशांक एव बदनीभूतो न चेन्दोवर द्वंद्व लोनतां गतं न कनकैरष्यंगयश्टिः कूता।
किंतवेवं कविभि प्रतारितमनतत्वं विजनान्नपि त्वं मांसस्थ्मियं वयूर्मृगदृशां मंदो जनः सेवते।।


हिंदी में भावार्थ- न तो चंद्रमा जमीन पर आकर किसी सुंदरी युवती के मुख पर सजा है और न ही कभी कमल ने किसी के नेत्र का स्थान लिया है और न ही किसी की देह सोने से बनी है पर फिर भी कविगणों के बहकावे में सामान्य लोग आ जाते हैं और हाड़मांस के इस नश्वर को सर्वस्व मानते हुए भोगों में लिप्त हो जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-बरसो पूर्व कही गयी यह बात आज भी कितनी प्र्रासंगिक है। हमारे यहां आजकल फिल्मों में सूफी तरीके से गीत लिखे जा रहे हैं जिसमेंे भगवान और प्रेमिका को एक ही गदद्ी पर बिठाया जाता है यानि उस गीत को सोलह साल का लड़का अपनी प्रेयसी पर भी गा सकता है और कोई भक्त भगवान के लिये भी गा सकता है। सच तो यह है कि सच्चे भक्त के लिये तो किसी सुर संगीत की आवश्यकता तो होती नहीं इसलिये वह उनके दांव पर नहीं फंसते पर युवक युवतियां उन गीतों पर झूमते हैं और कभी कभार तो यह लगता है कि इस तरह देश को बहकाया जा रहा है। उनके दांव में कच्चे भक्त भी फंस जाते हैं और गीत सुनकर अपनी गर्दन हिलाने लगते हैं।
भगवान की निष्काम भक्ति का सर्वश्रेष्ठ रूप एकांत में उनका ध्यान और स्मरण करना है जबकि सुर संगीत से उनका स्मरण करना एक तरह से सकाम भक्ति का प्रमाण है और जिस तरह प्यार प्यार की बात आती है उससे तो ध्यान भटकता है और देह तथा मन को कोई लाभ भी हीं होता।
इस तरह भगवान और प्रेयसी के प्रति एक साथ प्रेम पैदा करने वाले शब्द केवल बहकाते हैं और आजकल के व्यवसायिक युग में इसका प्रचलन बढ़ गया है। कभी कभी तो लगता है कि इस तरह के सूफी गीत भारत के युवाओं में मौजूद अध्यात्मिक की स्वाभाविक प्रवृति को अपने स्वार्थ को भुनाने के लिये लिखे गये हैं।
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Friday, July 24, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-अध्यात्मिक ज्ञान विषयों से बचाता है (bhartrihari niti shatak-adhyatmik gyan aur vishay)

सुधाशुभ्रं धाम स्फुरदमलरश्मिः शशधरः प्रियाववत्राभोजं मलयजरजश्चातिसुरभिः।
स्रजो हृद्यामोदास्तदिदमखिलं रागिणी जने करोतयन्तः क्षोभं न तु विषयसंसर्गविमुखे।।
हिंदी में भावार्थ-
सफेद रंग से पुता चमकता भवन, चंद्रमा की शीतल रौशनी, अपनी प्राणप्रिया का मुख कमल, चंदन की सुगंध, फूलों की माला जैसे विषय अनुरागियों के मन को तड़पाते हुए विचलित कर देते हैं लेकिन जिन्होंने अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लिया है वह इनसे प्रभावित नहीं होते।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-जीवन में राग अनुराग के प्रति लगाव स्वाभाविक रूप से रहता है। मगर यही राग अनुराग कष्ट का कारण भी बनते हैं। एक अच्छा और बड़ा मकान रहने के लिये होना चाहिये। जिनके पास नहीं है वह ख्वाब देखते हैं पर जिनके पास महल जैसा आवास है वह भी खुश नहीं है। इतने बड़े मकान का रखरखाव नियमित रूप करना भी उनके लिये कष्टप्रद है। बड़े शहरों मे चले जाईये तो कई नई कालौनियां देखकर लगता है कि जैसे यहां स्वर्ग है। कुछ वर्ष बाद जाईये तो वही पुरानी लगती हैं। लोगों के पास धन है पर समय नहीं कि अपने मकानों की हर वर्ष पुताई करा सकें। हालांकि कहने के लिये ऐसे रंग आ गये हैं जो कई वर्ष तक चलें पर बरसात और धूप के सामने भला कौनसा रसायन टिक सकता है।

आदमी का मन है जो कभी न कभी ऊबता है और वह विश्राम चाहता है। देह को तो आराम मिल जाता है पर मन को नहीं। भौतिक जीवन की सत्यता को समझना ही अध्यात्म ज्ञान है और जो इसे जानता है वही सुख दुःख से परे होकर जीवन में आनंद उठा सकता है। कहते भी है कि इस समय विश्व में लोगों के दिमाग में तनाव बढ़ रहा है। आखिर यह सोचने का विषय है कि जब इतनी सारी सुविधायें हैं तो फिर इंसान विचलित क्यों हो जाता है? यह सब अध्यात्म ज्ञान की कमी की वजह से है।
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Wednesday, June 17, 2009

रहीम के दोहे-धनी को धन देने के लिए सब तैयार,गरीब से इंकार

संतत संपति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीन बंधु बिन दीन की, कौ रहीम सुधि लेत


कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास धन पर्याप्त मात्रा में लोग उनको सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं और जिसके पास कम है उसकी कोई सुधि नहीं लेता।

संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में माया का खेल विचित्र है। वह कभी स्थिर नहीं रहती। आजकल जितने धन के उद्भव के काले स्त्रोत बने हैं उतने उसके पराभव के मार्ग बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने पद, प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर गलत तरीके से अथाह धनार्जन किया पर उनके घर के सदस्यों ने ही गलत मार्ग अपना कर जूए, शराब, सट्टे तथा अन्य व्यसनों में तबाह कर दिया। देखने के लिये अनेक भले लोग अपने धन का अहंकार दिखते हैं पन अपने बच्चों की आदतों से उनका मन हमेशा विचलित होता है। हालांकि कुछ लोग अनाप-शनाप पैसा कमा रहे हैं और अपने बच्चों के विरुद्ध शिकायत न तो सुनते हैं और न ही कोई उनके सामने करता है।

यह कारण है कि आजकल जो कथित बड़े लोग उनके अनेक घर के रहस्य जब सामने आते हैं तो लोग हैरान रह जाते हैं। उनका अपने परिवार पर बस नहीं हैं। कई लोग तो जिनका नाम था अब इसलिये गुमनाम हो गये क्योंकि उनका धन पूरी तरह गलत कामों की वजह से तबाह हो गया। उनकी चर्चा अब इसलिये नहीं होती क्योंकि जिनके पास धन नहीं है उनकी चर्चा भला कौन करता है? इसके बावजूद भी शिक्षित और कथित ज्ञानी लोग भी वैभवशाली लोगों का चाटुकारिता करते हैं और गरीब को अनदेखा करते हैं। अमीर के दौलत से कुद पाने के लिये ही वह लोग उनके इर्दगिर्द चक्कर लगाते है। गरीब को तो वह पांव की जुती समझते हैं। इसके बावजूद हमें समझदार होना चाहिए और सबके प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी होता है कि अमीर की चाटुकारिता करते रहो पर हाथ कुछ नहीं आता। कोई अमीर किसी की बिना कारण सहायता नहीं करता। यह हमें समझना चाहिए। अगर कोई हमारी सहायता करने आ रहा है तो समझ लो उसका कोई स्वार्थ है।
अतः अगर अपने पास अगर धन कम हो तो यह मान लेना चाहिए कि लोग आर्थिक सहयोग तैयार करने के लिये कम ही तैयार होंगे। साथ ही इस बात की चिंता नहीं करना चाहिए कि कोई सम्मान करेगा या नहीं। अगर धन अधिक हो तो दूसरों द्वारा सहयोग की पेशकश को अपने गुणों का प्रभाव न समझते हुए यह मान लेना चाहिए कि हमारे धन की वजह से दूसरे प्रभावित हैं।
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Thursday, June 11, 2009

भर्तृहरि नीति संदेश: स्वर्ग पाने का विचार एवं प्रयास निरर्थक

महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि
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किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तरैः
स्वर्गग्रामकुटीनिवाफलदैः कर्मक्रियाविर्भमैः।
मुक्तवैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानल्र
स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणगव्त्तयः


                      हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मृतियों और पुराणों को पढ़ने, बृहद शस्त्रों के श्लोक रटने, किसी स्वर्ग जैसे ग्राम में फल देने वाले कर्मकांड एक तरह से पाखंड हैं उनके निर्वहन से क्या लाभ? संसार में दुःखों का भार हटाने और परमात्मा का दिव्य पद पाने के लिये केवल उसका स्मरण करना ही पर्याप्त है। उसके अलावा सभी कुछ व्यापार है।

                  वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने मन को शांति देन का इकलौता मार्ग एकांत में परमात्मा की हृदय से भक्ति करना ही है। चाहे कितने भी द्रव्य से संपन्न होने वाले यज्ञ कर लें और अनेक ग्रंथ पढ़कर उसकी सामग्री पढ़कर दूसरों का सुनाने से कोई लाभ नहीं हैं। हम अपनी शांति प्राप्त करने के लिये सत्संगों और आश्रमों में पाखंडी गुरूओं के पास जाते हैं। इनमें कई कथित साधुओं और संतों ने पंच सितारे होटलों की सुविधाओं वाले आश्रम बना लिये हैं जहां रहने का दाम तो दान के नाम वसूल किया जाता है। ऐसे संत और साधु कर्मकांडों में लिप्त होने का ही संदेश देते हैं। अधिकतर साधु संत सकाम भक्ति के उपासक हैं। वह अपने पैर पुजवाते हैं। कहते तो वह भी भगवान का स्मरण करने को हैं पर साथ में अपनी किताबें और मंत्र पकड़ाते हैं। उनके बताये रास्ते से सच्चे मन से भक्ति नहीं होती बल्कि शांति खरीदने के लिये हम उनको पैसे देकर अपने घर आते हैं। परंतु मन की शांति कहीं बाजार में मिलने वाली वस्तु तो है नहीं और फिर हमारा मन अशांत होकर भटकने लगता है।

              ईश्वर की भक्ति से ही मन को शांति मिलती है और उसके लिये यह आवश्यक है कि मन को कुछ पल सांसरिक मार्ग से हटाया जाये और उसका एक ही उपाय है कि एकांत में बैठकर उसका ध्यान करें। बाकी तो अपने देश में धर्म के नाम पर व्यापार है और जितने भी कर्मकांड हैं वह तो केवल व्यापार के लिये हैं और उनसे काल्पनिक स्वर्ग पाने का विचार ही बेकार है।
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Wednesday, June 10, 2009

भर्तृहरि नीति शतक: कर्मकांडों के निर्वहन से क्या लाभ?

राजा भर्तृहरि कहते हैं कि
किं वेदैः स्मृतिभिः पुराणपठनैः शास्त्रेर्महाविस्तरैः
स्वर्गग्रामकुटीनिवाफलदैः कर्मक्रियाविर्भमैः।
मुक्तवैकं भवदुःख भाररचना विध्वंसकालानल्र
स्वात्मानन्दपदप्रवेशकलनं शेषाः वणगव्त्तयः


हिंदी में भावार्थ- वेद, स्मृतियों और पुराणों को पढ़ने, बृहद शस्त्रों के श्लोक रटने, किसी स्वर्ग जैसे ग्राम में फल देने वाले कर्मकांड एक तरह से पाखंड हैं उनके निर्वहन से क्या लाभ? संसार में दुःखों का भार हटाने और परमात्मा का दिव्य पद पाने के लिये केवल उसका स्मरण करना ही पर्याप्त है। उसके अलावा सभी कुछ व्यापार है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने मन को शांति देन का इकलौता मार्ग एकांत में परमात्मा की हृदय से भक्ति करना ही है। चाहे कितने भी द्रव्य से संपन्न होने वाले यज्ञ कर लें और अनेक ग्रंथ पढ़कर उसकी सामग्री पढ़कर दूसरों का सुनाने से कोई लाभ नहीं हैं। हम अपनी शांति प्राप्त करने के लिये सत्संगों और आश्रमों में पाखंडी गुरूओं के पास जाते हैं। इनमें कई कथित साधुओं और संतों ने पंच सितारे होटलों की सुविधाओं वाले आश्रम बना लिये हैं जहां रहने का दाम तो दान के नाम वसूल किया जाता है। ऐसे संत और साधु कर्मकांडों में लिप्त होने का ही संदेश देते हैं। अधिकतर साधु संत सकाम भक्ति के उपासक हैं। वह अपने पैर पुजवाते हैं। कहते तो वह भी भगवान का स्मरण करने को हैं पर साथ में अपनी किताबें और मंत्र पकड़ाते हैं। उनके बताये रास्ते से सच्चे मन से भक्ति नहीं होती बल्कि शांति खरीदने के लिये हम उनको पैसे देकर अपने घर आते हैं। परंतु मन की शांति कहीं बाजार में मिलने वाली वस्तु तो है नहीं और फिर हमारा मन अशांत होकर भटकने लगता है।

ईश्वर की भक्ति से ही मन को शांति मिलती है और उसके लिये यह आवश्यक है कि मन को कुछ पल सांसरिक मार्ग से हटाया जाये और उसका एक ही उपाय है कि एकांत में बैठकर उसका ध्यान करें। बाकी तो अपने देश में धर्म के नाम पर व्यापार है और जितने भी कर्मकांड हैं वह तो केवल व्यापार के लिये हैं और उनसे काल्पनिक स्वर्ग पाने का विचार ही बेकार है।
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Sunday, June 7, 2009

चाणक्य नीति-दूसरो के सुख से खुश होने वाले ही सज्जन

तुष्यन्ति भोजने विप्रा मयूरा धनगर्जिते।
साधवः परसम्पतिौ खलः परविपत्तिषुः।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्वान अच्छा भोजन, मेघों की गर्जना से मोर तथा साधु लोग दूसरों की संपत्ति देखकर प्रसन्न होते हैं वैसे ही दुष्ट लोग दूसरों को संकट में फंसा देखकर हंसते हैं।

हस्ती अंकुशमात्रेण वाजी हस्तेन ताडयते।
श्रृङगी लगुडहस्तेन खङगहस्तेन दुर्जनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह अंकुश से हाथी तथा चाबुक से घोड़ा, बैल तथा अन्य पशु नियंत्रित किये जाते हैं वैसे ही दुष्ट से निपटने के लिये खड्ग हाथ में लेना ही पड़ता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में भांति भांति प्रकार के लोग हैं। जो ज्ञानी और विद्वान है उनको रहने, खाने,पीने और पहनने के लिये अच्छी सुविधा मिल जाये तो वह संतुष्ट हो जाते हैं। जो सच्चे साधु और सज्जन हैं वह दूसरों की भौतिक उपलब्धियों देखकर प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनकी मान्यता होती है कि आसपास के लोग प्रसन्न होंगे तो उनके स्वयं के पास अच्छा वातावरण रहेगा और वह शांति से रह सकेंगे। इसके विपरीत कुछ लोग दुष्ट प्रवृत्ति के भी होते हैं जो स्वयं तो विपत्ति में पड़े रहते हैं पर उनका खेद तब कम हो जाता है जब कोई दूसरा भी विपत्ति मेें पड़ता है। ऐसे लोग अपने दुःख से अधिक दूसरे के सुख से अधिक दुःखी होती हैं। इसके अलावा अपने सुःख से अधिक दूसरे का दुःख उनको अधिक प्रसन्न करता है।
वैसे तो जीवन में हिंसा कभी नहीं करना चाहिये क्योंकि फिर प्रतिहिंसा का सामना करने पर स्वयं को भी कष्ट उठाना पड़ा सकता है, पर इस संसार में कुछ ऐसे दुष्ट लोग भी हैं जिनको कितना भी समझाया जाये वह दैहिक आक्रमण से बाज नहीं आते। उनसे शांति और अहिंसा की अपील निरर्थक साबित होती है। ऐसे लोगों से मुकाबला करने के लिये अपने अस्त्रों शस्त्रों तथा अन्य साधनों उपयोग करने में कोई झिझक नहीं करना चाहिये। ऐसे लोगों के लिये धर्म और ज्ञान एक निरर्थक वस्तु हैं। देहाभिमान से ग्रस्त ऐसे लोगों के विरुद्ध लड़ना पड़े तो संकोच त्याग देना चाहिए।
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Thursday, June 4, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-काम पर विजय पाने की इच्छा क्या नहीं करवाती

भर्तृहरि महाराज कहते है कि
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स्त्रीमुद्रां कुसुमायुधस्य जविनीं सर्वार्थस्म्पत्करीं ये मूढ़ा प्रविहाय यान्ति कुधियो मिथ्याफलान्वेषणः।
ते तेनैव निहत्य निर्दयतरं नग्नीकृता मुण्डिताः केचित्तपंचशिखीकृताश्च जटिलाः कापालिश्चापरे।।

हिंदी में भावार्थ- जो मूर्ख लोग काम पर विजय प्राप्त करने के लिये स्त्री का त्याग करते हैं उनको कामदेव दंड देकर ही रहते हैं। उसमें कोई कोई वस्त्रहीन होकर धर्म का पालन करने लगता है तो कोई सिर मुंडवा लेता है। कोई बड़े बालों की जटा बना लेता है तो कोई भीख मांगने ही लग जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-भर्तृहरि जी का यह संदेश बहुत रोचक तथा प्रेरणादायक है। कितनी विचित्र बात है कि हमारे देश में कुछ लोग अध्यात्म ज्ञान का गलत अर्थ लेकर काम से बचने के लिये ब्रह्मचर्य का व्रत लेते हैं। ऐसे लोग वैराग्य वेश धारण करते हैं। इनमें से कोई जीवन भर वस्त्र नहीं पहनता तो कोई अपने बाल मुंडवा लेता है। कोई सिर पर जटा धारण कर लेता है। यह सभी लोग अर्थाजन तो करते नहीं इसलिये पेट पालने के लिये उनको दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। यही कारण है कि उन्हें शिष्य बनाकर उनसे दान लेना ही पड़ता है। यह सभी अध्यात्म ज्ञान के गलत अर्थ लेने के कारण है। सच बात तो यह है कि हमारी श्रीमद्भागवत गीता आदमी को त्याग के लिये प्रेरित करती है पर उसका आशय यह नहीं है कि वह सांसरिक कार्यों से वैराग्य लिया जाये। सांसरिक कार्य करते हुए उनके फल में लिप्त न होना ही वास्तविक त्याग है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य अपने मूल स्वभाव के अनुकूल कर्म करने को बाध्य होता है-जिसका साीधा आशय यह है कि मनुष्य को अपने तन,मन और विचारों की तृष्णा शांत करने के लिये जीवन में कार्य तो करना ही है। श्रीगीता में सांख्यभाव की चर्चा है पर यह भी कहा गया है कि वह एक असंभव काम है। सांख्यभाव का मतलब यह है कि इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण-यानि आंखों से देखें ही नहीं, नाक से सांस ही न लें और कान से सुने ही नहीं। यह एक कठिन त्याग है और इसे विरले योगी ही कर पाते हैं। सभी के लिये यह संभव नहीं है। इसके बावजूद कुछ लोग सांस लेते, आंख से देखते,पांव से चलते और मुख से खाते हुए वैराग्य का ढोंग करते हैं और उनको अंततः दूसरे लोगों का आसरा लेना पड़ता है। एक तरह से कामदेव उनको दंड देते हैं।

देखा जाये तो भर्तृहरि के काल में भी ढोंगी थे और आज अधिक ही हो गये हैं। कहने को अनेक लोग वैरागी हैं पर उनके यौन प्रकरण अक्सर चर्चा में आते हैं। अनेक लोग तो वैराग्य का दिखावा करते हुए विवाह तक कर लेते हैं पर सार्वजनिक रूप से अपनी पत्नी को मानने से इंकार करते हैं। एक तरह से यह उनके स्वयं के लिये भी दुःखदायी है। वह कामदेव पर विजय प्राप्त करने का ढोंग करते हैं तो कामदेव भी उनको एक तरह से चोर और भिखारी बना देते हैं।
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Thursday, March 19, 2009

रहीम के दोहे:अग्नि में मिलकर शरीर भी अग्नि हो जाता है

जहाँ गाँठ तहँ रस नहीं, यह रहीम जग होय
मंड़ए तर की गाँठ में, गाँठ गाँठ रस होय


कविवर रहीम कहते हैं कि यह संसार खोजकर देख लिया है, जहाँ परस्पर ईर्ष्या आदि की गाँठ है, वहाँ आनंद नहीं है. महुए के पेड़ की प्रत्येक गाँठ में रस ही रस होता है क्योंकि वे परस्पर जुडी होतीं हैं.

जलहिं मिले रहीम ज्यों, कियो आपु सम छीर
अंगवहि आपुहि आप त्यों, सकल आंच की भीर


कविवर रहीम कहते हैं कि जिस प्रकार जल दूध में मिलकर दूध बन जाता है, उसी प्रकार जीव का शरीर अग्नि में मिलकर अग्नि हो जाता है.
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जहां दो मनुष्यों में एक दूसरे के प्रति ईष्र्या है वहां किसी के दिल में भी संतोष नहीं रहा सकता। अक्सर लोग आपस में एक दूसरे के प्रति प्रेम होने का दावा करते हैं पर उनके मन में आपस में ही द्वेष, कटुता और ईष्र्या का भाव रहता है। इस तरह वह स्वयं को धोखा देते हैं। प्रेम तो तभी संभव है जब एक दूसरे की सफलता पर हृदय मेंं प्रसन्नता का भाव हो। हालांकि मूंह पर दिखाने के लिये एक मित्र अपने दूसरे मित्र की, भाई अपने भाई की या रिश्तेदार अपने दूसरे रिश्तेदार की सफलता पर बधाई देते हैं पर हृदय में कहीं न कहीं ईष्र्या का भाव होता है। यह दिखावे का प्रेम है और इस पर स्वयं को कोई आशा नहीं करना चाहिये क्योंकि न हम स्वयं दूसरे से वास्तव में प्रेम नहीं करते और न ही कोई हमें करता है। जहां ईष्र्या की गांठ हैं वहां प्रेम हो ही नहीं सकता।
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