समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
-------------------------


Showing posts with label parsonal. Show all posts
Showing posts with label parsonal. Show all posts

Sunday, December 22, 2013

कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख-पराक्रमी के पास भोग के साधन स्वतः उपलब्ध होते है(hindi thought article on kautilya ka arthshastra-prakrami ka paas bhog ke sadhan swat$ uplabdh hote hain)



            अनेक कथित धार्मिक गुरु यह तो कहते हैं कि मोह, माया, अहंकार तथा क्रोध का त्याग करें पर न तो वह स्वयं उनके प्रभाव से मुक्त हैं न वह अपने शिष्यों को कोई विधि बता पाते हैं। सत्य और माया के बीच केवल अध्यात्मिक ज्ञानी और साधक ही समन्वय बना पाते हैं। एक बात तय है कि सत्य के ज्ञान का विस्तार नहीं है पर माया का ज्ञान अत्यंत विस्तृत है।  कोई ऐसा बुरा काम नहीं करना चाहिये दूसरे को पीड़ा यह सत्य का ज्ञान है यह सभी जानते हैं पर माया के पीछे जाते हुए अनेक ऐसे काम करने पड़ते हैं जिनके उचित या अनुचित होने ज्ञान सभी को नहीं होता।  माया के अनेक रूप हैं सत्य का कोई रूप नहीं है। अनेक रूप होने के कारण धन, संपदा तथा उच्च के पद की प्राप्ति के लिये अनेक प्रकार के मार्ग हैं।  हर मार्ग का ज्ञान अलग है। स्थिति यह है कि लोग धन और संपत्ति प्राप्त करने के मार्ग बताने वालों को ही धार्मिक गुरु मान लेते हैं। मजे की बात तो यह है कि ऐसे गुरु श्रीमद्भागवत गीता से निष्काम कर्म तथा निष्प्रयोजन का संदेश नारे के रूप में देते देते ही मायावी संसार का ज्ञान देने लगते हैं।  इस संसार में माया की संगत जरूरी है पर सत्य का ज्ञान हो तो माया दासी होकर सेवा करते हैं वरना स्वामिनी होकर नचाने लगती है।
कौटिल्य महाराज ने अपने अर्थशास्त्र में कहा है कि
-----------------
वे शूरा येऽपि विद्वांतो ये च सेवाविपिश्चितः।
तेषा मेव विकाशिन्यों भोग्या नृपतिसम्भवः।।
            हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य में वीरता, विद्वता और सेवा करने का गुण है वही भोग के लिये  सम्पत्ति प्राप्त करता है।
कुलं वृत्तञ् शौर्य्यञ्च सर्वमेतन्ना गभ्यते।
दुवृतेऽश्न्यकुलीनेऽप जनो दातरि रज्यते।।
            हिन्दी में भावार्थ-कुल, चरित्र और वीरता को भी कोई ऐसे नहीं सराहता। दुष्ट तथा अकुलीन भी अगर दातार हो तो सामान्य जन उसमें अनुराग रखते हैं।
            अध्यात्मिक ज्ञानी मानते हैं कि मनुष्य अगर अपने अंदर ज्ञान साधना कर सत्य समझ ले तो उसमें वीरता और पराक्रम के गुण स्वतः आ जाते हैं और तब वह इस संसार में माया का स्वामी बनता है पर उसे अपनी स्वामिनी बनकर नचाने का अवसर नहीं देता।  दूसरी बात यह है कि ज्ञानी आदमी धन का व्यय इस तरह करता है कि उसके आसपास के लोग भी प्रसन्न रहें। वह दान और सहायता के रूप में ऐसे लोगों को धन या वस्तुऐं देता है जो उसके लिये सुपात्र हों। जिन लोगों के पास अध्यात्म ज्ञान नहीं है वह पैसा, पद और प्रतिष्ठा के मद में दूसरों को छोटा समझकर उनकी उपेक्षा कर देते हैं जिससे उनके प्रति समाज में विद्रोह का भाव निर्माण होता है।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Friday, December 6, 2013

धार्मिक विचाराधाराओं के बीच द्वंद्व स्वाभाविक-हिन्दी चिंत्तन लेख (Dharmik vichardharaon ke beech dwandwa swabhavik-hindi thought article)



                        शायर इकबाल ने लिखा था कि मजहब नहीं सिखाता बैर करना। आमतौर से कुछ कट्टरपंथी भारतीय धार्मिक बौद्धिक विद्वान  कहते हैं कि उसका आशय केवल अपने ही धर्म से था जो मजहब कहलाता है। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि इकबाल उर्दू शायर थे और उनकी विचाराधारा को ही मजहब कहा जाता है। इतना ही नहीं उनकी लेखन की  भाषा को भी मजहब से ही जोड़ा जाता है हालांकि यह तार्किक है। याद रहे हिन्दू को धर्म और ईसाई को रिलीजन कहा जाता है। इकबाल ने  विरोधियों को आलोचना का  अवसर उन्होंने स्वयं ही दिया क्योंकि विभाजन के बाद वह नवनिर्मित पाकिस्तान चले गये।  हम यहां मान लेते हैं कि इकबाल के मजहब का आशय व्यापक था और उन्होंने हिन्दू तथा ईसाई शब्द को भी मजहब ही माना होगा।  हम उनकी बात से सहमत है कि मजहब नहीं सिखाता बैर करना पर हमारा सवाल यह है कि मजहब का मतलब वह क्या समझते थे?
            अगर उनके मजहब का मतलब दुनियां के हर प्रकार के धर्म या रिलीजन से था तो हम मानते हैं कि वह केवल एक नारा देकर वाहवाही लूटते रहे थे।  दरअसल हमारा मानना है कि जहां भी धर्म के साथ कोई नाम जुड़ा है वह राजसी बुद्धि से बनी योजना का हिस्सा है ताकि उसकी आड़ में विशेष प्रकार के लोगों का वर्चस्व बना रहे। श्रीमद्भागवत में धर्म का आशय व्यापक है पर उसका पूरा संबंध मनुष्य के आचरण, कर्म तथा विचार से ही है।  बेहतर आचरण ही धर्म है पर जब हम वर्तमान में उसके साथ तमाम नाम जुड़े देखते हैं तो पाते हैं कि एक तरह से वर्चस्व की लड़ाई चल रही है।  सभी धर्मों के प्रचारक अपने धर्म तथा उसकी पूजा पद्धति को श्रेष्ठ बताते हैं। यही कारण है कि अनेक देशों के रणनीतिकार  कथित रूप से धर्म निरपेक्ष या सर्वधर्म समभाव के सिद्धांत का पालन करने का दावा करते हैं।  सर्व धर्म समभाव अपने आप में विवादास्पद है।  धर्म का आशय अगर आचरण से है तो अनेक प्रकार के धर्मों की स्वीकार्यता का क्या अर्थ हो सकता है? जहां तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न है तो वह केवल उन लोगों का सिद्धांत है जो अपने स्वार्थ तक ही सीमित हैं।  उन्हें आचरण या व्यवहार से कोई अर्थ नहीं रहता।  धर्म के प्रति निरपेक्ष रहने का अर्थ यह है कि अपने तथा दूसरों के व्यवहार, आचरण तथा विचारों के प्रति उदासीन होकर केवल अपना स्वार्थ पूरा करना।  अपनी स्वार्थ पूर्ति के लिये धर्म के सिद्धांतों का भी उल्लंघन करना ही धर्म निरपेक्षता का प्रमाण है।  एक विचाराशील, परिश्रमी तथा सात्विक मनुष्य कभी भी धर्म से निरपेक्ष नहीं रह सकता। धर्म से निरपेक्ष रहने का आशय यही है कि अपने तथा दूसरों के अच्छे या बुरे व्यवहार, कर्म तथा विचार के  प्रति उदासीन रहना। हालांकि धर्म के प्रति यह उदासीनता सकाम भाव को इंगित करती है। मतलब यह कि हमारा काम सिद्ध होना चाहिये और उसकी वजह से किसी को कष्ट हो तो हो।
                        अगर इकबाल का आशय सभी प्रचलित धर्मो से था तो भी हम मानते हैं कि वह कोई बड़े ज्ञानी नहीं थे और अगर यह मान ले कि उनका श्रीगीता में वर्णित आचरण रूप धर्म से था इसका प्रमाण नहीं मिलता कि उसका उनको कोई ज्ञान था।  हम यहां मानकर चलते हैं कि उनके मजहब शब्द से आशय सभी धर्मों से था तो वह गलत थे।  आचरण से धर्म का संबंध है पर पर देखा जा रहा है कि जिन धर्मों का कोई नाम है वह योजनापूर्वक बनाये गये हैं।  सभी धर्मों में राजसी पुरुषों के साथ कुछ धार्मिक चेहरे रहे हैं जो उनके लिये धर्म का उपयोग राज्य विस्तार के लिये करते हैं।  वह लोगों के मौजूद अध्यात्मिक भूख को धर्म की आड़ में शांत कर अपने राजसी पुरुषों के नियंत्रण में लाते हैं।  देखा जाये तो प्रत्यक्ष धर्मों के ठेकेदार अपनी धवल छवि बनाकर सभ्य समाज पर बौद्धिक नियंत्रण करते हैं पर उन पर राजसी पुरुषों का ही वरद हस्त रहता है।  भारत के बाहर तो धर्म के नाम पर अनेक युद्ध भी हुए हैं। जब हम श्रीमद्भागवत गीता में वणित धर्म रूपी आचरण की बात करें तो वह वाकई बैर करना नहीं सिखाता पर उसके इतर हम नामधारी कथित धर्मो की बात करें तो वह राजसी पुरुषों की विस्तारवादी नीतियों को ही प्रश्रय देते हैं। तय बात है कि इन प्रयासों को विभिन्न विचारधाराओं को मानने वालों के बीच विरोध होता है।  ऐसे में इकबाल साहब की बात बेदम हो जाती है। खासतौर से जब उन्होंने मजहब के आधार पर बने पाकिस्तान में जाना श्रेयस्कर समझा हो। अगर उनके मजहब शब्द  आशय धर्म या रिलीजन से होता तो वह कभी भी पाकिस्तान नहीं जाते।  कहीं न कहंी उनके मन में यह बात रही होगी कि भारत में जब हिन्दी का बोलबाला होने वाला है जिसकी वजह से भारतीय अध्यात्म ज्ञान भी विस्तार पायेगा तब उनकी शायरी बौनी हो जायेगी।
            हमारे कहने का अभिप्राय यह है कि अगर हम भारतीय अध्यात्म दर्शन की बात करें तो उसमें धर्म वाकई बैर करना नहीं सिखाता पर जब हम उसके इतर नाम धारी धर्मों की बात करें तो उनके सिद्धांत बड़े ही आकर्षक हों पर उनसे जुड़े शिखर पुरुष अपने अपने समाजों पर नियंत्रण करने के लिये  दूसरे समाजों का भय पैदा कर नियंत्रण करते हैं जिससे अनेक देशों में वैमनस्य फैलता है।  ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि इकबाल का यह तर्क कैसे माना जाये कि धर्म, मजहब या रिलीजन बैर करना नहीं सिखाता।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Thursday, October 31, 2013

अनुकूल संगति के लिये उद्यान तथा मंदिर उत्तम स्थान-हिन्दी चिंत्तन लेख(anukool sangati ki liye udyan tatha madir uttam sthan-hindi chinttan lekh)



                        आमतौर से हर मनुष्य देखने में एक जैसे ही लगते हैं पर आचार, विचार, रहन सहन, खाने पीने तथा व्यवहार की दृष्टि से उनमें भिन्नता का आभास तब  होता है जब उसने कोई दूसरा व्यक्ति उनसे संपर्क करता है। अनेक बार दो लोग एक जैसे लगते हैं तो अनेक लोग भी एक जैसे स्वभाव के नहीं लगते।  इसके दो कारण है एक तो यह कि लोग अपने रहन सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार के अनुसार ही हो जाते हैं। दूसरा कारण उल्टा भी होता है कुछ लोग अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार ही रहन, सहन, खान पान, आचार विचार तथा व्यवहार करने लगते हैं।  इन दोनों कारणों में श्रीमद्भागवत गीता का गुण और कर्म विभाग सिद्धांत लागू होता है। एक तो मनुष्य वह होता है जो अपनी मूल प्रकृत्ति के अनुसार सात्विक, राजस तथा तामसी कार्य करता है तो दूसरा वह होता है जो अपने कर्म के अनुसार ही अपने स्वभाव की प्रकृत्ति का हो जाता है। इस चक्र को योग तथा ज्ञान साधक अनुभव कर सकते हैं।
                        हम देखते हैं कि सहकर्म में लिप्त लोगों के बीच आपसी संपर्क सहजता से बनता है। जिसको निंदा करनी है उसे निंदक मिल जाते हैं दूसरे प्रशंसा करते हैं तो उनको प्रशंसक मिल जाते हैं। यही स्थिति आदतों की भी है। जो जुआ खेलते हैं उनको जुआरी और जो शराब पीते हैं उन्हें शराबी मिल जाते है। स्थिति यह है कि व्यसन में फंसा मनुष्य कुंऐं के मेंढक की तरह हो जाता है जिसे अज्ञान का अंधेरा ही पसंद होता है।  आमतौर से हम देखते भी हैं कि बुरी संगत सहजता से मिलती है पर अच्छी संगत के लिये प्रयास करने पड़ते है।  बाज़ार में सहजता से व्यसनी मिल जाते हैं  पर सत्संगी को ढूंढना पड़ता है। ऐसे में समस्या यह आती है कि हम सहज प्रकृत्ति के लोग कहां ढूंढे।
                        हमारा मानना है कि हमें मंदिरों और पार्कों में सहज प्रकृत्ति के लोग मिल ही जाते हैं। दरअसल मंदिरों और पार्कों में आया व्यक्ति कहीं न कहीं से मन से स्वच्छ होता ही है भले ही वह पूरे दिन असहज वातावरण में रहता हो।  जब हम मंदिर जाते हैं तो वहां आये लोग अत्यंत शांत और सद्भाव से संपन्न  होने के कारण हमारे मन तथा चक्षुओं को आकर्षित करते हैं। वहां कोई मित्र मिल जाये तो उसे  भी प्रसन्नता होती है तो हमें भी अधिक सुख  मिलता है। इस प्रसन्नता का सामान्य सुख से ज्यादा मोल है। यह भी कह सकते हैं कि इस प्रसन्नता का सुख अनमोल है।  उसी तरह प्रातःकाल किसी उद्यान में आया व्यक्ति भी निर्मल भाव से जुड़ जाता है। वहां घूमते हुए लोग एक दूसरे को अत्यंत निर्मल भाव से देखते हैं। यह अलग बात है कि इसकी उनको स्वतः अनुभूति नहीं होती। उनमें अनेक लोग तो केवल इसलिये एक दूसरे को जानने लगते हैं क्योंकि दोनों ही वहां प्रतिदिन मिलते हैं। इस प्रकार की आत्मीयता मिलना एक संयोग है जो कि व्यसन के दुर्योग से मिली संगति से कहीं बेहतर है।
                        हमने देखा है कि योग शिविरों में जाने पर अनेक ऐसे लोगों से मिलने और उनको सुनने का सौभाग्य मिलता है जिनकी कल्पना सामान्य जीवन में नहीं की थी।  इसी अनुभव के आधार पर हम यह लेख लिख रहे है। हमारे कहने का अभिप्राय यही है कि अगर आप यह चाहते हैं कि आप एक बेहतर जीवन जियें तो पहले अपनी देह तथा मन  के लिये अनुकूल  वातावरण, मित्र तथा आत्मीय लोगों का चयन करें।  वातावरण, रहन सहन, आचार विचार, तथा खान पान के साथ ही संगति के अनूकूल बनने के बाद जीवन को सुखमय बनाने का कोई दूसरा उपाय करना शेष नहीं रह जाता।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, February 17, 2010

विदुर नीति-पैसे का बुद्धि से कोई रिश्ता नहीं (hindu dharma sandesh-buddhi aur paise ka rishta)

न बुद्धिर्धनलाभाय न जाह्यमसद्धये।
लोकपर्यावृतांत प्राज्ञो जानाति नेतरः।।
हिंदी में भावार्थ-
धन केवल बुद्धि से ही प्राप्त होता है या मूर्खता के कारण आदमी दरिद्र रहता है, ऐसा कोई नियम नहीं है। इस संसार के नियमों को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं।
असंविभागो दुष्टात्मा कृतघ्नो निरपत्रपः।
तादृंनारिधपो लोके वर्जनीवो नारधिपः।।
हिंदी में भावार्थ-
अपने व्यक्ति अपने आश्रितों में अपनी धन संपत्ति को ठीक से बंटवारा नहीं करे तो दुष्ट कृतघ्न और निर्लज्ज है उसे इस लोक में त्याग देना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जिन लोगों के पास धन नहीं है या अल्पमात्रा में है उन्हें धनवान लोग मूर्ख और अज्ञानी मानते हैं। अक्सर धनवाल लोग कहते हैं कि ‘अक्ल की कमी के कारण लोग गरीब होते हैं।’
उनका यह तर्क गलत और बेहूदा है। अगर ऐसा है तो अनेक धनवान गरीब क्यों हो जाते हैं? जिनके पास धन और संपत्ति विपुल मात्रा में वह अपने व्यवसाय में हानि उठाने या अपने बच्चों की गलत संगत के कारण उनके द्वारा किये जा रहे अपव्यय के से संकटग्रस्त हो जाने से निर्धनता को प्राप्त हो जाते हैं। तब उनके बारे में क्या यह कहना चाहिये कि ‘वह अक्ल के कारण ही अमीर हुए और अब उसके न रहने से गरीब हो गये।’ या ‘अब धन नहीं है तो उनके पास अक्ल भी नहीं होगी।’
कहने का तात्पर्य है कि यह धारणा भ्रांत है कि बुद्धि या अक्ल के कारण कोई अमीर या गरीब बनता है। संसार का अपना एक चक्र है। शाश्वत सत्य कभी नहीं बदलता पर माया तो महाठगिनी है। आज इस घर में सुशोभित है तो कल वह किसी दूसरे दरवाजे पर जायेगी। लक्ष्मी के नाम का एक पर्यायवाची शब्द ‘चंचला’ भी है। वह हमेशा भ्रमण करती हैं। अतः हमेशा ही अमीरों को बुद्धिमान और गरीबों को बुद्धिहीन मानने वालों को अपने विचार बदलना चाहिए। इस तरह के सोच ने ही समाज में जो वैमनस्य फैलाया है उसे अब दूर करने की आवश्यकता है। जिस तरह आज चारों तरफ हिंसक संघर्ष का वातावरण दिख रहा है उसके पीछे ऐसी ही सोच जिम्मेदार है।
.....................................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, February 3, 2010

संत कबीर के दोहे-एकमत न रहने वाले लोगों से संपर्क न रखें (sant kabir vani in hindi)

कबीर न तहां न जाइये, जहां जु नाना भाव।
लागे ही फल ढहि पड़े, वाजै कोई कुबाव।।
संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि वह कभी न जायें जहां नाना प्रकार के भाव हों। ऐसे लोगों से संपर्क न कर रखें जिनका कोई एक मत नहीं है। उनके संपर्क से के दुष्प्रभाव से हवा के एक झौंके से ही मन का प्रेम रूपी फल गिर जाता है।
कबीर तहां न जाइये, जहां कपट का हेत।
जानो कली अनार की, तन राता मन सेत।
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वहां कभी न जायें जहां कपट का प्रेम मिलता हो। ऐसे कपटी प्रेम को अनार की कली की तरह समझें जो उपरी भाग से लाल परंतु अंदर से सफेद होती है। कपटी लोगों का प्रेम भी ऐसा ही होता है वह बाहर तो लालित्य उड़ेलते हैं पर उनके भीतर शुद्ध रूप से कपट भरा होता है।

वर्तमान संदर्भ  में संपादकीय व्याख्या-जीवन में प्रसन्न रहने का यह भी एक तरीका है कि उस स्थान पर न जायें जहां आपको प्रसन्नता नहीं मिल जाती। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो बाहर से तो बहुत प्रेम से पेश आते हैं जैसे कि उनका दिल साफ है पर व्यवहार में धीरे धीरे उनके स्वार्थ या कटु भाव दिखने लगता है तब मन में एक तरह से व्यग्रता का भाव पैदा होता है।  अनेक लोग अपने घर इसलिये बुलाते हैं ताकि दूसरे को अपमानित कर स्वयं को सम्मानित बनाया जा सके।  वह बुलाते तो बड़े प्यार से हैं पर फिर अपमान करने का मौका नहीं छोड़ते।  ऐसे लोगों के घर जाना व्यर्थ है जो मन को तकलीफ देते हैं वह चाहे कितने भी आत्मीय क्यों न हों? मुख्य बात यह है कि हमें अपने जीवन के दुःख या सुख की तलाश स्वयं करनी है अतः ऐसे ही स्थान पर जायें जहां सुख मिले। जहां जाने पर हृदय में क्लेश पैदा हो वहां नहीं जाना चाहिये।  उसी तरह ऐसे लोगों का साथ ही नहीं करना चाहिये जो एकमत के न हों। ऐसे भ्रमित लोग न स्वयं ही परेशान होते हैं बल्कि साथ वाले को भी तकलीफ देते हैं। अनेक जगह लोग निरर्थक विवाद करते हैं। ऐसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं जिनका हल उनके स्वयं के हाथ में ही नहीं होता। इतना ही नहीं सार्वजनिक विषयों पर बहस करने वाले अनेक लोग आपस में ही लड़ पड़ते हैं और शांतप्रिय आदमी के लिये यही अच्छा है कि वह उनसे दूर रहे।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://anantraj.blogspot.com
------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन

Thursday, December 24, 2009

संत कबीर के दोहे-मन के चोर को मारना कठिन (man ka chor-hindu dharm sandesh)


अपने अपने चोर को, सब कोय डारै मार
मेरा चोर मुझको मिलै, सरबस डारूं वार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के सब तो अपने अपने चोर को मार डालते हैं, परंतु मेरा चोर तो मन है। वह अगर मुझे मिल जाये तो मैं उस पर सर्वस्व न्यौछावर कर दूंगा।
सुर नर मुनि सबको ठगै, मनहिं लिया औतार
जो कोई याते बचै, तीन लोक ते न्यार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह मन तो एक महान ठग है जो देवता, मनुष्य और मुनि सभी को ठग लेता है। यह मन जीव को बार बार अवतार लेने के लिये बाध्य करता है। जो कोई इसके प्रभाव से बच जाये वह तीनों लोकों में न्यारा हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान तो मन है और वह उसे जैसा नचाता। आदमी उसके कारण स्थिर प्रज्ञ नहीं रह पाता। कभी वह किसी वस्तु का त्याग करने का निर्णय लेता है पर अगले पर ही वह उसे फिर ग्रहण करता है। अर्थात मन हमेशा ही व्यक्ति का अस्थिर किये रहता है। कई बार तो आदमी किसी विषय पर निर्णय एक लेता है पर करता दूसरा काम है। यह अस्थिरता मनुष्य को जीवन पर विचलित किये रहती है और वह इसे नहीं समझ सकता है। यह मन सामान्य मनुष्य क्या देवताओं और मुनियों तक को धोखा देता है। इस पर निंयत्रण जिसने कर लिया समझा लो तीनों को लोकों को जीत लिया। वरना तो यह मन ऐसा है कि आदमी उसका गुलाम हो जाता है और जिसने उसके मन को गुलाम बन लिया उसकी गुलामी करने लगता है। आजकल आदमी पर हिंसा के द्वारा दैहिक रूप से जीतने की बजाय उसके मन को ललचा कर उसको बौद्धिक रूप से गुलाम बनाया जाता है। जिन लोगों को इसका ज्ञान है वही जीवन में स्वतंत्र रूप से तनावमुक्त जीवन बिता सकते हैं।

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, October 6, 2009

रहीम दर्शन-ज्ञानी की पहचान उसके गुणों से हो जाती है (gyani ki pahachan-rahim ke dohe)

कविवर रहीम कहते हैं कि
----------------------------------
उत्तम जाती ब्राह्मनी, देखत चित्त लुभाय
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाय


ज्ञानी मनुष्य की पहचान तो स्वतः ही उसके गुणों और लक्षणों से हो जाती है। ब्रह्मज्ञानी का चेहरा मात्र देखते ही आदमी का चित्त आनन्द विभोर हो उठता है। ऐसे ब्रह्मज्ञानी के दर्शन मात्र से पाप परे हो जाते हैं और उसके चरणों कें शीश झुकाने का मन करता है।
वर्तमान संदभ में संपादकीय व्याख्या-यह बिल्कुल सत्य बात है कि आदमी के चेहरे पर वही भाव स्वतः रहते हैं जो उसके मन में विद्यमान हैं। किसी प्रकार के ज्ञान और विज्ञान में श्रेष्ठता का भाव प्रदर्शन करना व्यर्थ है। आदमी के गुण स्वतः ही दूसरों के सामने प्रकट होते हैं। दूसरे के अंदर अगर झांकना हो तो उसके चेहरे को पढ़ें। कई बार ऐसा होता है कि हम दूसरों के कहने में आकर किसी को श्रेष्ठ समझ बैठते हैं यह देखने का प्रयास ही नहीं करते कि उस व्यक्ति का आचरण कैसा है या उसमें वह गुण है भी कि नहीं जिसका बखान किया जा रहा है।

अनेक गुरु ऐसे हैं जो रटारटाया ज्ञान तो बताते हैं पर उनके चेहरे देखकर नहीं लगता कि वह कोई ब्रह्मज्ञानी हैं। योग साधना,ध्यान और धार्मिक ग्रंथों से चिंतन और मनन से ज्ञान प्राप्त होता है और जिसने वह धारण कर लिया उसका चेहरा स्वतः खिल उठता है और अगर नहीं खिला तो इसका आशय यह है कि मन में भी तेज नहीं है। इसलिये किसी के कहने में आकर कोई गुरु नहीं बनाना चाहिये। जिन लोगों में ज्ञान है तो उनका चेहरा ही बता देता है और उनका आचरण और व्यवहार उसे पुष्ट भी करता है। अतः ऐसे लोगों को ही अपना गुरु बनाना चाहिये।
याद रखें योग्य गुरू जहाँ जीवन की नैया पार लगाता हैं अयोग्य दोबो भी देता है।
  -----------------------------

यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.‘शब्दलेख सारथी’
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, October 3, 2009

मनुस्मृति-नाचना गाना ठीक नहीं (music and dance in nod good-manu smriti)

न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।

न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को करने से अच्छा फल नहीं मिलता हो उसे करने का प्रयास व्यर्थ है। अंजली में भरकर पानी और गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं नहीं है। बिना प्रयोजन का कौतूहल नहीं करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब आदमी तनाव रहित होता है तब वह कई ऐसे काम करता है जो उसकी देह और मन के लिये हितकर नहीं होते। लोग अपने उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने-चलने और बोलने-हंसने पर ध्यान नहीं देते जबकि मनुमहाराज हमेशा सतर्क रहने का संदेश देते हैं। अक्सर लोग अपनी अंजली से पानी पीते हैं और बातचीत करते हुए खाना गोद में रख लेते हैं-यह गलत है।
जब से फिल्मों का अविष्कार हुआ है लोगों का न केवल काल्पनिक कुतूहल की तरफ रुझान बढ़ा है बल्कि वह उन पर चर्चा ऐसे करते हैं जैसे कि कोई सत्य घटना हो। फिल्मों की वजह से संगीत के नाम पर शोर के प्रति लोग आकर्षित होते हैं।
मनुमहाराज इनसे बचने का जो संदेश देते है उनके अनुसार नाचना, गाना, वाद्य यंत्र बजाना तथा गधे की आवाज जैसे शब्द बोलना अच्छा नहीं है। फिल्में देखना बुरा नहीं है पर उनकी कहानियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को देखकर कौतूहल का भाव पालन व्यर्थ है इससे आदमी का दिमाग जीवन की सच्चाईयों को सहने योग्य नहीं रह जाता।

नाचने गाने और वाद्य यंत्र बजाना या बजाते हुए सुनना अच्छा लगता है पर जब उनसे पृथक होते हैं तो उनका अभाव तनाव पैदा करता है। इसके अलावा अगर इस तरह का मनोरंजन जब व्यसन बन जाता है तब जीवन में अन्य आवश्यक कार्यों की तरफ आदमी का ध्यान नहीं जाता। लोग बातचीत में अक्सर अपना प्रभाव जमाने के लिये किसी अन्य का मजाक उड़ाते हुए बुरे स्वर में उसकी नकल करते हैं जो कि स्वयं उनकी छबि के लिये ठीक नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि उठने-बैठने और चलने फिरने के मामले में हमेशा स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए। इस सन्देश के पीछे मनु महाराज का यह भी भाव रहा है कि नाचने गाने में व्यस्त होने से मनुष्य का मन उसके वश में नहीं रहता इसलिए उस पर कोई भी नियंत्रण कर सकता है। इधर हम भी देख रहे हैं कि मनोरंजन के नाम पर समाज की बुद्धि को एक तरह से अपहृत कर लिया गया है. तब इस सन्देश की प्रासंगिकता को समझा जा सकता है।
........................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, October 2, 2009

चाणक्य दर्शन-बुद्धिमान पर विजय पाना कठिन (hindu adhyatmik sandesh)

   नीति विशारद चाणक्य कहते हैं  कि 
-----------------------------------------------                                                                                                        

प्राज्ञं कुलीनं शूरं च दक्षं दातारमेव च।
कृतज्ञः धुतिमंत च कष्टमाहुररि बुधाः।।
हिंदी में भावार्थ-
बुद्धिमान, कुलीन, शूरवीर, चतुर, धर्मात्मा, धैर्यवान, तथा कृतज्ञ व्यक्ति पर विजय पाना कठिन है। ऐसे व्यक्ति से संधि कर लेना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-अनेक अवसर पर क्रोध अथवा विवाद के कारण आदमी अपनी बुद्धि पर नियंत्रण खो बैठता है और यही उसके लिये आपत्ति का कारण बनता है। क्रोध या निराशा की स्थिति क्षणिक और जीवन बहुत लंबा होता है। इसलिये अवसाद के क्षणों में भी बुद्धिमान, वीर, चतुर, धर्मात्मा तथा धैर्य धारण करने वाले व्यक्ति से विवाद मोल नहीं लेना चाहिये। जीवन में पता नहीं कम किस के सहयोग की आवश्यकता पड़ जाये। क्रोध और निराशा के क्षणिक आवेग में सुयोग्य व्यक्ति से बैर लेना भविष्य में उससे मिलने वाले सहयोग की अपेक्षाओं को समाप्त करना है। जब कोई आपत्ति आती है तब उससे निपटने के लिये योजनाबद्ध तरीके से निपटने के लिये कार्यक्रम बनाना, साधन जुटाना तथा नियत समय पर कार्यवाही करने के लिये जिस बौद्धिक चातुर्य की आवश्यकता होती है उसकी पूर्ति के लिये सुयोग्य व्यक्तियों का साथ होना जरूरी है। ऐसे लोगों के साथ हमेशा अच्छा व्यवहार रखना चाहिये।
अनेक लोगों को यह भ्रम होता है कि धनी, प्रतिष्ठित तथा बाहूबली लोगों के साथ मित्रता होने से ही सारे संकट दूर हो जायेंगे तो यह उनका भ्रम है। कुछ लोग तो ऐसे लोगों की संगत में शांतिप्रिय, धैयैवान तथा बुद्धिमान लोगों से बैर भी लेते हैं पर जब विपत्ति आती है तो उन्हें ऐसे ही लोगों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि जीवन में अपने मित्र और सहयोगियों के संग्रह करते समय इस बात को अवश्य देखना चाहिये कि वह न केवल सुयोग्य हों बल्कि समय आपने पर मददगार भी हों। इसके लिये उनके साथ हमेशा सौहार्दपूर्ण संबंध रखें। यह
 एक अच्छा उपाय है।
 .............................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, September 29, 2009

विदुर नीति-भले आदमी की याचना पर बेकार आदमी फूल जाता है

असन्तोऽभ्यार्थितताः सद्भिः क्वचित्कायें कदाचन।
मन्यन्ते स्न्तमात्मानमसन्तमपि विश्रुतम्।
हिंदी में भावार्थ-
किसी विशेष कार्य के लिये जब कोई सज्जन पुरुष किसी दुष्ट से मदद की याचना करता है तो अपने को प्रसिद्ध दुष्ट जानते हुए वह अपने को सज्जन समझने लगते हैं।
विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनो मदः।
मदा एतेऽवलिपतनामेत एवं सतां दमः।।
हिंदी में भावार्थ-
विद्या, धन, और ऊंचे कुल का मद अहंकार पुरुष के लिए तो व्यसन के समान है पर सज्जन पुरुषों के लिये वह शक्ति होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-विश्व में असत्य (माया) के विस्तार के साथ धनाढ्य लोगों की संख्या के साथ आधुनिक शिक्षा से संपन्न बुद्धिमानों की संख्या भी बेतहाशा बढ़ रही है पर उसी अनुपात में अन्याय और हिंसा की वारदातों की संख्या भी बढ़ी है। वजह साफ है कि विद्या और धन वह शक्ति है जो किसी को भी भ्रमित कर सकती है। धन की प्रचुरता जिनके पास है वह उसकी शक्ति दिखाने के लिये ऐसे अनैतिक काम करते हैं जो एक सामान्य आदमी नहीं करता। उसी तरह जिन्होंने तकनीकी ज्ञान-जिसे विद्या भी कहा जाता है-प्राप्त कर लिया है उनमें बहुत कम ऐसे हैं जो उसका रचनात्मक उपयोग करते हैं। अधिकतर तो ऐसे हैं जो उसके सहारे दूसरे को हानि पहुंचाकर अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं। इंटरनेट पर बढ़ते अपराध और ठगी इसी का प्रमाण है कि शिक्षा या विद्या का अहंकार आदमी की बुद्धि भ्रष्ट कर देता है।
यही स्थिति दुष्ट लोगों की है। सज्जन लोगों का समूह नहीं बन पाता पर दुष्ट लोग जल्दी ही समूह बनाकर समाज में वर्चस्व स्थापित कर लेते हैं। वह ऐसी जगहों पर अपना दबदबा बना लेते हैं जहां सज्जन लोगों को अपने काम से जाना ही पड़ता है। ऐसे में दुष्ट लोगों से अपने काम के लिये वह सहायता की याचना करते हैं पर अपनी प्रसिद्धि के अहंकार में दुष्ट लोग उनको कीड़ा मकौड़ा मान लेते हैं। आप अगर प्रचार माध्यमों को देखें तो वह भी सज्जनों की सक्रियता पर कम दुष्ट लोगों की दुष्टता का प्रचार इस तरह करते हैं जैसे कि वह नायक हों। यही कारण है कि विश्व में अपराध और हिंसा का पैमाना दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। अधिकार भ्रष्ट और नाकारा लोग श्रेष्ट स्थानों पर पहुँच गए हैं और किसी सामान्य व्यक्ति की याचना पर यह सोच कर फूल जाते हैं कि देखों वह कितने योग्य हैं कि सज्जन लोग भी उनके हाथ फैला रहे हैं।

..............................
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

अध्यात्मिक पत्रिकाएं