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Saturday, July 2, 2011

दक्ष स्मृति-योग शक्ति के प्रभाव अत्यंत व्यापक (daksh smriti-yoga shakti atayant vyapak)

       जब हम योग साधना के विषय से संबंधित ग्रंथों की सामग्री पर दृष्टिपात करते हैं तो ऐसा लगता है कि जैसे कोई विज्ञान हो। हालांकि उसके सूत्र अत्यंत सूक्ष्म हैं पर उनका अर्थ अत्यंत गूढ़ है।अनेक योग प्रचारक अपने शिष्यों को तात्कालिक दैहिक प्रभाव दिखाने वाले आसनों तथा प्राणायामों के बारे में सिखाते हैं जबकि योग विधा के आठ अंग होते हैं जिनका ज्ञान होने पर आदमी ज्ञानी हो जाता है।
      इसमें कोई संशय नहीं है कि योगासन तथा प्राणायाम का बहुत महत्व है पर यह भी जरूरी है कि पतंजलि योग के मूल तत्वों का भी ज्ञान प्राप्त किया जाये। योगासन और प्राणायाम से शरीर में स्फूर्ति और स्थिरता आती है तब मानव मन कोई अच्छा विचार करना चाहता है। मन में बेहतर विषयों के अध्ययन के प्रति रुचि उत्पन्न होती है। ऐसे में भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन करना एक महत्वपूर्ण कार्य साबित हो सकता है। पतंजलि योग में वर्णित आठों भागों का ज्ञान प्राप्त होने पर हमारे अंदर योग शक्ति का निर्माण होता है। मन के उतार चढ़ाव, इंद्रियों की गतिविधियों तथा देह के अंदर चल रही प्रक्रिया को हम अपनी अंतदृष्टि से देखते हैं। इससे हमारे अंदर संसार के व्यवहार का ज्ञान आता है।
                दक्षस्मृति में कहा गया है कि
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         लोको वशीकृतों येन यन चात्मा वशीकृतः।
         इन्द्रियार्थो जितोयने ते योग प्रब्रवीम्यहम्।।
               ‘‘योग से मनुष्य सारे संसार को वश में कर सकता है। बिना योग शक्ति के किसी को भी वश में करना संभव नहीं है। बिना योग के व्यवहार का भी ज्ञान नहीं होता न ही इंद्रियों की गतिविधियों को नियंत्रित किया जा सकता है।’’
                सच बात तो यह है कि बोलते, सुनते, स्पर्श करते, सूंघते और देखते हुए केवल एक प्रयोक्ता की तरह हो जाते हैं। अपने अंदर के स्वामित्व का आभास तनिक भी नहीं रहता। हमारी इंद्रियां कार्यरत हैं पर उन पर हमारी नज़र नहीं रहती। हमें लगता है कि सारे काम हम कर रहे हैं पर यह भूल जाते हैं कि यह सब इंद्रियों की गतिविधियों का परिणाम है। हम इंद्रियों के प्रयोक्ता हैं पर यह अहसास नहीं होता। यही अहसास अपने स्वामित्व होने का परिचय देता है और आदमी दृष्टा की तरह हो जाता है। तब वह संसार के व्यवहार के सिद्धांतों को अच्छी तरह समझता है। इसी कारण योग साधना तथा ध्यान में हमेशा तत्पर रहना चाहिए। इससे जो ज्ञान प्राप्त होता है वह आदमी को विश्व विजयी बना सकता है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Wednesday, June 15, 2011

हिन्दी चाणक्य नीति-अन्न, जल और मधुर वाणी रत्न के समान (hindi chankya neeti-anna, jal aur madhur wani ratna ke saman)

      देखा जाये तो हमें प्रकृति का आभारी होना चाहिए जिसने हमारे देश को खनिज, कृषि तथा जलवायु की दृष्टि से संपन्न होता है। प्रकृति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में भूगर्भ जलस्तर अन्य देशों की अपेक्षा सबसे कम नीचे मिलता है। मतलब हमारे यहां जलस्त्रोत सहजता से उपलब्ध हैं। इस बात को समझने की बजाय  आधुनिक प्रचार माध्यमों के विज्ञापनों से पूरा भारतीय समाज दिग्भ्रमित हो रहा है। क्रिकेट खिलाड़ियों, फिल्म अभिनेता तथा अभिनेत्रियों के अभिनीत विज्ञापन उपभोग की ऐसी खतरनाक प्रवृत्ति को जाग्रत करते हैं कि लोगों की अध्यात्मिक चेतना लुप्त हो गयी है। फिर हमारी शिक्षा व्यवस्था में ऐसी प्रणाली अपनाई गयी है जो केवल गुलाम बनाती है। ऐसे में अगर किसी में रचनात्मक प्रवृत्ति जाग्रत हो जाये तो वह पूर्व जन्म का ही प्रभाव समझे तो अच्छा है वरना तो    अब व्यक्ति में चरित्र निर्माण की बजाय उसे प्रयोक्ता और सेवक बनने के लिये प्रेरित किया जा रहा है।
       वैसे समाज की हालत तो कोई पहले भी अच्छी नहीं थी। सोना, चांदी, हीरा और रत्नों की चाहत हमारे समाज में हमेशा रही है। शायद यही कारण है कि हमारे मनीषी मनुष्य के अंदर मौजूद उस रत्न का परिचय कराते रहे हैं जिसे आत्मा कहा जाता है। इसके बावजूद लोग भौतिक संसार की चकाचौंध में खो जाते हैं और सोना, चांदी और हीरे की चाहत में ऐसे दौड़ते हैं कि पूरा जीवन ही अध्यात्मिक ज्ञान के बिना गुजार देते हैं। जिस अन्न और जल से जीवन मिलता है उसे तुच्छ समझते हैं एक पल का चैन न दे वही सोना गले लगा देते हैं। उसी तरह देहाभिमान से युक्त होने के कारण अधिक वाचाल होकर क्रूरतम शब्दों का प्रयोग करते हैं। जिससे समाज में वैमनस्य बढ़ता है।
           महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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          पृथिव्यां त्रीणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम्।
             मूर्खे पाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते।।
         ‘‘इस प्रथ्वी पर तीन ही रत्न हैं-अन्न, जल और मधुर वाणी, किन्तु मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों को ही रत्न कहते हैं।’’
       अक्सर लोग कहते हैं कि भारतीय लोगों के पास दुनियां के अन्य देशों के मुकाबले बहुत अधिक सोना है, मगर बहुत कम लोग जानते हैं कि उससे अधिक तो हम पर परमात्मा की यह कृपा है कि दुनियां के अन्य देशों से अधिक हमारे यहां भूगर्भ जलस्तर के साथ अन्य प्रकृति संपदा भी बड़े पैमाने पर उपलब्ध है।  वैसे आजकल बाज़ार के सौदागर यह प्रयास भी कर रहे हैं कि यहां जल सूख जाये और उसे बेचकर अपने बैंक खाते बढ़ायें। अनेक तरह के ठंडे पेयों के कारखाने यहां स्थापित हो गये हैं जो अपने इलाके का पूरा जल पी जाते हैं। वहां का जलस्तर कम हो गया है पर भारतीय जनमानस ऐसी चकाचौंध में खो गया है कि उसे इसका आभास ही नहीं होता। जल जैसा रत्न हम खोते जा रहे हैं पर आर्थिक विकास का मोह ऐसा अंधा किये जा रहा है कि उसकी परवाह नहीं है।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Tuesday, August 25, 2009

मनु संदेश-आयु में छोटा होने पर भी ज्ञानी सम्मानीय (manu smruti in hindi-gyan aur ayu)

उत्पादकब्रह्मदात्रोर्गरीयान् ब्रह्मदः पिता।
ब्रह्मजन्म हि विप्रस्य चेह च शाश्वतम्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुष्य को जन्म और शिक्षा देने वाले दोनों ही पिता होते हैं पर पर विद्या और ज्ञान देने से मनुष्य लोक तथा परलोक दोनों ही सुधारता है इसलिये उसका ही महत्व अधिक है। अतः ज्ञान देने वाले का ही अधिक महत्व है।
अध्यापयामास पितृन् शिशुरङिगरस कविः
पुत्रका इति होवाच ज्ञानेन परिगृह्म तान्।।
हिंदी में भावार्थ-
अङिगरस ऋषि ने अपने बुजुर्गों को अध्ययन कराते हुए ‘हे पुत्रों’ कहकर ज्ञान दिया था। इस तरह अपने से छोटा होने पर भी ज्ञान देने वाला गुरु कहलाता है।
संपादकीय व्याख्या -भारतीय अध्यात्म में माता पिता तथा गुरु को परम आदरणीय माना जाता है पर जीवन और व्यवहार का ज्ञान देने वाले गुरु का विशेष स्थान होता है। माता पिता तो अपने पुत्र को परिवार तथा व्यवसायों की परंपराओं से अवगत स्वाभाविक रूप से कराते हैं क्योंकि वह देह के निकट होते हैं पर गुरु तो निष्काम भाव से अपने शिष्यों को जीवन और अध्यात्म का ज्ञान देते हैं जो कि न केवल इस लोक में बल्कि परलोक में भी सहायक होता है। गुरु का अपने शिष्य से कोई दैहिक संबंध नहीं होता इसलिये उसकी शिक्षा का अधिक महत्व है।
अङिगरस ऋषि ने भी अपने पिता, चाचा और ताउओं को ब्रह्मज्ञान दिया और उस समय उनको ‘हे पुत्रों’ कहकर संबोधित किया था। कहने का तात्पर्य यह है कि ज्ञान देने वाला अपने से छोटी आयु का भी क्यों न हो उसका गुरु की तरह सम्मान करना चाहिये। उसी तरह अपने से बड़े को ज्ञान देते समय भी उसे अपना शिष्य समझना चाहिये। यही कारण है कि हमारे संत और ऋषि गुरु महिमा का बखान करते हैं।
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Tuesday, July 14, 2009

चाणक्य नीति-अपनी छः बातें गुप्त रखें (chhah baten gupt rakhen-chankya niti)

सुसिद्धमौषधं धर्म गृहच्द्रिं मैथुनम्।
कुभुक्तं कुश्रुतं चैव मतिमान्न प्रकाशयेत्।।
हिंदी मे भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिऐ कि वह छह बातें किसी को भी न बताये। यह हैं अपनी सिद्ध औषधि, धार्मिक कृत्य, अपने घर के दोष, संभोग, कुभोजन तथा निंदा करने वाली बातें।
प्रस्तावसदृशं वाक्यं प्रभावसदृशं पिय्रम!
आत्मशक्तिसमं कोपं यो जानाति स पण्डितः।
हिंदी में भावार्थ-
जैसा प्रस्ताव देखें उसी के अनुसार प्रभावपूर्ण विचार मधुर वाणी में व्यक्त करे और अपनी शक्ति के अनुसार ही क्रोध करे वही सच्चा ज्ञानी है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-नीति विशारद चाणक्य के अनुसार मनुष्य को अपने जीवन में वाक्पटु होना चाहिये। समय के अनुसार ही किसी विषय को महत्व को देखते हुए अपना विचार व्यक्त करना चाहिए। इतना ही नहीं किसी विषय पर सोच समझ कर प्रिय वचनों में अपना बात रखना चाहिए। इसके अलावा अपने पास किसी सिद्ध औषधि का ज्ञान हो तो उसे सभी के सामने अनावश्यक रूप से व्यक्त करना ठीक नहीं है। अपने घर के दोष, तथा स्त्री के साथ समागम की बातें सार्वजनिक रूप से नहीं करना चाहिए। इसके अलावा जो भोजन अच्छा नहीं है उसके खाने का विचार तक अपने मन में न लाना ही ठीक है-दूसरे के सामने प्रकट करने से सदैव बचना चाहिए। किसी भी प्रकार के निंदा वाक्य किसी के बारे में नहीं कहना चाहिये।

अगर इतिहास देखा जाये तो वही विद्वान समाज में सम्मान प्राप्त कर सके हैं जिन्होंने समय समय पर कठिन से कठिन विषय पर अपनी बात इस तरह सभी लोगों के के सामने रखी जिसके प्रभाव से न केवल उनका बल्कि दूसरा समाज भी लाभान्वित हुआ। अधिक क्रोध अच्छा नहीं है और जब किसी के बात पर अपना दिमाग गर्म हो तो इस बात का भी ख्याल करना चाहिए कि अपने क्रोध के अनुसार संघर्ष करने की हमारी क्षमता कितनी है। अविवेकपूर्ण निर्णय न केवल हमारे उद्देश्यों की पूर्ति बाधक होते हैं बल्कि उनसे समाज में प्रतिष्ठा का भी हृास होता है।
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Thursday, July 2, 2009

विदुर नीति-आत्मा साथ छोडे तो फ़िर कौन निभाता है

अग्नी प्रास्तं पुरुषं कर्मान्वेति स्वयंकृतम्।
तस्मातु पुरुषो यत्नाद् धर्म संचितनुयाच्छनैः।।
हिंदी में भावार्थ-
इस देह के अग्नि में जलकर राख हो जाने के बाद मनुष्य का अच्छा और बुरा कर्म ही उसके साथ जाता है अतः जितना हो सके धर्म के संचय का प्रयत्न करें।

उत्सृत्न्य विनिवर्तन्ते ज्ञातयः सह्दः सुताः।
अपुष्पानफलान् वृक्षान् यथातत पतित्रणः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह फल और फूल से हीन वृक्ष को पक्षी त्याग कर चले जाते हैं वैसे इस शरीर से आत्मा निकल जाने पर उसे जाति वाले, सहृदय और पुत्र चिता में छोड़कर लौट जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस देह को लेकर अभिमान पालना व्यर्थ है। एक न एक दिन इसे नष्ट होना है। इस देह से बने जाति, धर्म, परिवार और समाज के रिश्ते तभी तक अस्तित्व में हैं जब तक यह इस धरती पर विचरण करती है। मनुष्य मोहपाश में फंसकर उनको ही सत्य समझने लगता है। इसमें मेहमान की तरह स्थित आत्मा का कोई सम्मान नहीं करता जिसकी वजह से यह देह रूपी शरीर प्रकाशमान है।
आपने देखा होगा कि आजकल हर जगह विवाहों के लिये बहुत सारी इमारतें बनी हुईं हैं। वहां जिस दिन कोई वैवाहिक कार्यक्रम होता है उस दिन वह रौशनी से जगमगाता है। जब विवाह कार्यक्रम नहीं होता उस दिन वहां अंधेरा रहता है। यह विचार करना चाहिये कि जब उस इमारत में बिजली और उससे चलने वाले उपकरण तथा सजावट का सामान हमेशा विद्यमान रहता है तब क्यों नहीं उसे हमेशा रौशन किया जाता? स्पष्ट है कि विवाह स्थलों के मालिक विवाह कार्यक्रम के आयोजकों से धन लेते हैं और इसी कारण वहां उस स्थान पर रौशनी की चकाचौंध रहती है। आयोजक भी धन क्यों देता है? उसके रिश्तेदार, मित्र और परिवार के लोग उस कार्यक्रम में शामिल होते हैं। अगर दूल्हा दुल्हन के माता पिता अकेले ही विवाह कार्यक्रम करें तो उनको व्यय करने की आवश्यकता ही नहीं पर तब ऐसे विवाह स्थल जगमगा नहीं सकते। तात्पर्य यह है कि मेहमानों की वजह से ही वहां सारी सजावट होती है। जब सभी चले जाते हैं तब वहां सन्नाटा छा जाता है। यही स्थिति इस देह में विद्यमान आत्मा की है। यह देह तो बनी यहां मौजूद पंच तत्वों से ही है पर उसको प्रकाशमान करने वाला आत्मा है। इस सत्य को पहचानते हुए हमें अपने जीवन में धर्म का संचय करना चाहिये। हमारे अच्छे काम ही इस आत्मा को तृप्त करते हैं। यह आत्मा तो परमात्मा से बिछड़ा अंश है और कभी न कभी उसके पास जाना है तो क्यों न परमात्मा की भक्ति कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास किया जाये।
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Saturday, April 25, 2009

चाणक्य नीति:कुसंस्कारी लोगों के साथ भोजन करने वाले विद्वानों के यश नहीं मिलता

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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अर्थार्थीतांश्चय ये शूद्रन्नभोजिनः।
त द्विजः कि करिष्यन्ति निर्विषा इन पन्नगाः।।


हिंदी में भावार्थ- नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अर्थोपासक विद्वान समाज के लिये किसी काम के नहीं है। वह विद्वान जो असंस्कारी लोगों के साथ भोजन करते हैं उनको यश नहीं मिल पता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- इस देश का अध्यात्मिक ज्ञान सदेशों के अनमोल खजाने से भरा पड़ा है। उसका कारण यह है कि प्राचीन विद्वान अर्थ के नहीं बल्कि ज्ञान के उपासक थे। उन्होंने अपनी तपस्या से सत्य के तत्व का पता लगाया और इस समाज में प्रचारित किया। आज भी विद्वानों की कमी नहीं है पर प्रचार में उन विद्वानों को ही नाम चमकता है जो कि अर्थोपासक हैं। यही कारण है कि हम कहीं भी जाते हैं तो सतही प्रवचन सुनने को मिलते हैं। कथित साधु संत सकाम भक्ति का प्रचार कर अपने भोले भक्तों को स्वर्ग का मार्ग दिखाते हैं। यह साधु लोग न केवल धन के लिये कार्य करते हैं बल्कि असंस्कारी लोगों से आर्थिक लेनदेने भी करते हैं। कई बार तो देखा गया है कि समाज के असंस्कारी लोग इनके स्वयं दर्शन करते हैं और उनके दर्शन करवाने का भक्तों से ठेका भी लेते हैं। यही कारण है कि हमारे देश में अध्यात्मिक चर्चा तो बहुत होती है पर ज्ञान के मामले में हम सभी पैदल हैं।
समाज के लिये निष्काम भाव से कार्य करते हुए जो विद्वान सात्विक लोगों के उठते बैठते हैं वही ऐसी रचनायें कर पाते हैं जो समाज में बदलाव लाती हैं। असंस्कारी लोगों को ज्ञान दिया जाये तो उनमें अहंकार आ जाता है और वह अपने धन बल के सहारे भीड़ जुटाकर वहां अपनी शेखी बघारते हैं। इसलिये कहा जाता है कि अध्यात्म और ज्ञान चर्चा केवल ऐसे लोगों के बीच की जानी चाहिये जो सात्विक हों पर कथित साधु संत तो सार्वजनिक रूप से ज्ञान चर्चा कर व्यवसाय कर रहे हैं। वह अपने प्रवचनों में ही यह दावा करते नजर आते हैं कि हमने अमुक आदमी को ठीक कर दिया, अमुक को ज्ञानी बना दिया।
अतः हमेशा ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के लये ऐसे लोगों को गुरु बनाना चाहिये जो एकांत साधना करते हों और अर्थोपासक न हों। उनका उद्देश्य निष्काम भाव से समाज में सामंजस्य स्थापित करना हो।
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Tuesday, April 7, 2009

कबीर के दोहे: ज्ञान को ह्रदय में धारण नहीं किया तो क्या लाभ?

सीखे सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने गुरूजनों से शब्द सीखकर उसे अपने हृदय में धारण कर उनका सदुपयोग करता है वही जीवन का आनंद उठा सकता है पर जो केवल उन शब्दों को रटता है उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता।

सीतलता तब जानिये, समता रहै समाय
विघ छोड़ै निरबिस रहै, सक दिन दूखा जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने अंदर तभी शीतलता की अनुभूति हो सकती है जब हर स्थिति के लिए हृदय में समान भाव आ जाये। भले ही अपने काम में विघ्न-बाधा आती रहे और सभी दिन दुःख रहे तब भी आदमी के मन में शांति हो-यह तभी संभव है जब वह अपने अंतर्मन में सभी स्थितियों के लिए समान भाव रखता हो।

यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुम्बक भाय
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि उसी शब्द के प्रभाव की प्रशंसा की जाती है जो सभी लोगों के हृदय में चुंबक की तरह प्रभाव डालता है। जो मधुर वचन नहीं बोलते या रूखा बोलते हैं वह कभी भी अपने जीवन के संकटों से कभी उबर नहीं सकते।
वर्त्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ लोग थोडा ज्ञान प्राप्त कर फिर उसे बघारना शुरू कर देते हैं।कुछ लोगों तो ऐसे भी हैं जिन्होंने भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन इसलिए किया ताकि वह गुरु बन कर अपनी पूजा करा सकें। ऐसे लोगों को उस अध्यात्म ज्ञान से कोइ संबंध नहीं है जो वास्तव में ह्रदय को शांत और समभाव में स्थित रखने में सहायक होता है। ऐसे कथित गुरुओं ने ज्ञान को रट जरूर लिया है पर धारण नहीं किया इसलिए ही उनके शिष्यों पर भी उनका प्रभाव नज़र नहीं आता। उनके वाणी से निकले शब्द तात्कालिक रूप से जरूर प्रभाव डालते हैं पर श्रोता के ह्रदय की गहराई में नहीं उतरते क्योंकि वह कथित वक्ताओं के ह्रदय की गहराई से वह शब्द निकल कर नहीं आते। आजकल के गुरुओं का नाम बहुत है पर उनका प्रभाव समाज पर नहीं दिखता।
शब्द लिखे जाएँ या बोले, उनका प्रभाव तभी होता है जब वह श्रोता या लेखक से उत्पन्न होता है। यह तभी संभव है जब उसने अपना अध्ययन,चिंतन और मनन गहराई से किया हो।
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Saturday, March 21, 2009

संत कबीर के दोहे: सीख,सुन और विचार करने पर ही शब्द का सुख मिलता है


सीतलता तब जानिये, समता रहै समाय
विघ छोड़ै निरबिस रहै, सक दिन दूखा जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने अंदर तभी शीतलता की अनुभूति हो सकती है जब हर स्थिति के लिए हृदय में समान भाव आ जाये। भले ही अपने काम में विघ्न-बाधा आती रहे और सभी दिन दुःख रहे तब भी आदमी के मन में शांति हो-यह तभी संभव है जब वह अपने अंतर्मन में सभी स्थितियों के लिए समान भाव रखता हो।

यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुम्बक भाय
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि उसी शब्द के प्रभाव की प्रशंसा की जाती है जो सभी लोगों के हृदय में चुंबक की तरह प्रभाव डालता है। जो मधुर वचन नहीं बोलते या रूखा बोलते हैं वह कभी भी अपने जीवन के संकटों से कभी उबर नहीं सकते।

सीखे सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहै, कछु न लोहा लेय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो व्यक्ति अपने गुरूजनों से शब्द सीखकर उसे अपने हृदय में धारण कर उनका सदुपयोग करता है वही जीवन का आनंद उठा सकता है पर जो केवल उन शब्दों को रटता है उसका कभी उद्धार नहीं हो सकता।
वर्त्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-कुछ लोग थोडा ज्ञान प्राप्त कर फिर उसे बघारना शुरू कर देते हैं।कुछ लोगों तो ऐसे भी हैं जिन्होंने भारतीय अध्यात्म ग्रंथों का अध्ययन इसलिए किया ताकि वह गुरु बन कर अपनी पूजा करा सकें। ऐसे लोगों को उस अध्यात्म ज्ञान से कोइ संबंध नहीं है जो वास्तव में ह्रदय को शांत और समभाव में स्थित रखने में सहायक होता है। ऐसे कथित गुरुओं ने ज्ञान को रट जरूर लिया है पर धारण नहीं किया इसलिए ही उनके शिष्यों पर भी उनका प्रभाव नज़र नहीं आता। उनके वाणी से निकले शब्द तात्कालिक रूप से जरूर प्रभाव डालते हैं पर श्रोता के ह्रदय की गहराई में नहीं उतरते क्योंकि वह कथित वक्ताओं के ह्रदय की गहराई से वह शब्द निकल कर नहीं आते। आजकल के गुरुओं का नाम बहुत है पर उनका प्रभाव समाज पर नहीं दिखता।
शब्द लिखे जाएँ या बोले, उनका प्रभाव तभी होता है जब वह श्रोता या लेखक से उत्पन्न होता है। यह तभी संभव है जब उसने अपना अध्ययन,चिंतन और मनन गहराई से किया हो।
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