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Thursday, September 8, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-अपनी जीभ पर काबू रखने वाला ही प्रभावी

         मनुष्य का धर्म है कि वह अपना कर्म निरंतर करता रहे। अपनी वाणी और विचार पर नियंत्रण रखे। भगवान का स्मरण करते हुए अपनी जीवन यात्रा सहजता से पूर्ण करे। जहां तक हो सके अपने ही काम से काम रखे न कि दूसरों को देखकर ईर्ष्या करे। आमतौर से इस विश्व में लोग शांति प्रिय ही होते हैं इसलिये ही मानव सभ्यता बची हुई। यह अलग बात है कि शांत और निष्कर्मी मनुष्य की सक्रियता अधिक दिखती नहीं है इसलिये उसकी चर्चा सार्वजनिक रूप से नहीं होती जबकि अशांति, दुष्टता और परनिंदा में लगे लोगों की सक्रियता अधिक दिखती है इसलिये आमजन उस पर चर्चा करते हैं।
     हम लोग परनिंदकों की बातें सुनकर मजे लेते हैं जबकि दूसरों की तरक्की से ईर्ष्या के साथ उसकी निंदा करने वालों की बातें सुनना भी अपराध है। ऐसे लोग पीठ पीछे किसी आदमी की निंदा कर सामने मौजूद आदमी को प्रसन्न अवश्य करते हैं पर सुनने वाले को यह भी सोचना चाहिए कि उसके पीछे वही आदमी उसकी भी निंदा कर सकता है।
       आचार्य चाणक्य कहते हैं कि
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       दह्यमानाः सुतीत्रेण नीचा पर-यशोऽगिना।
           अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकृर्वते।।
     ‘‘दुर्जन आदमी दूसरों की कीर्ति देखकर उससे ईर्ष्या करता है और जक स्वयं उन्नति नहीं कर पाता तो प्रगतिशील आदमी की निंदा करने लगता है।’’
       यदीच्छसि वशीकर्तु जगदकेन कर्मणा।
            परापवादस्सयेभ्यो गां चरंतीं निवारथ।।
       ‘‘यदि कोई व्यक्ति चाहता है कि वह समस्त संसार को अपने वश में करे तो उसे दूसरों की निंदा करना बंद कर देना चाहिए। अपनी जीभ को वश में करने वाला ही अपना प्रभाव समाज पर रखता है।
           इस संसार में कुछ लोग ऐसे भी दिखते हैं जिनका उद्देश्य अपना काम करने अधिक दूसरे का काम बिगाड़ना होता है। सकारात्मक विचाराधारा से अधिक उनको नकारात्मक कार्य में संलिप्त होना अधिक अच्छा लगता है। रचना से अधिक विध्वंस में उनको आनंद आता है। अंततः वह अपने लिये हानिदायक तो होते हैं कालांतर में अपने सहयेागी की भी लुटिया डुबो देते हैं।
        जो लोग सोचते हैं कि उनको समाज में सम्मान प्राप्त हो उनके लिये यह जरूरी है कि वह अपनी ऐसी संगत बदल दें जिसके साथ रहने पर लोग उनसे भी हानि होने की आशंका से ग्रस्त रहते हैं। यह भय सम्मान दिलाने में सबसे अधिक बाधक है। इसके अलावा किसी की निंदा तो बिल्कुल न करें क्योंकि अगर किसी आदमी के सामने आप अन्य की पीठ पीछे निंदा करते हैं तो सामने वाले के मन में यह संशय भी आ सकता है कि बाद में आप उसकी भी निंदा करे। इससे विश्वास कम होता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, July 17, 2011

वेद शास्त्र-पाप को न रोकना भी उसमें सहभागी होना है

         स्वयं पाप न करना ही धर्म का परिचायक नहीं है वरन् जिस पाप को रोकना संभव है उसका प्रतिकार न करना भी अधर्म है। हम अपने मित्रों, रिश्तेदारों या परिवार के सदस्यों के पाप में स्वयं लिप्त न हों पर उनको दुष्कर्म करते देख मौन रहना या उनको न रोकना भी अधर्म की श्रेणी में आता है। चूंकि मनुष्य को प्रकृति ने हाथ पांव, वाणी, तथा आंखें दी हैं और उसके साथ ही बुद्धि भी प्रदान की है तब यह उसके लिये आवश्यक है कि वह अपने समूहों को पाप कर्म से रोके। अगर कोई ऐसा सोचता है कि वह स्वयं पाप नहीं कर रहा है इसलिये वह धर्मभीरु है तो गलती पर है। यह उदासीनता अधर्म का ही एक बहुत बड़ा भाग है।
           हमारे वेद शस्त्रों में कहा गया है कि
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          धर्मादयेतं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम्।
            न तत् सेवत मेधावी न तद्धिमिहोच्यते।।
               ‘‘इस धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। जहां विद्वान लोग न्याय का समर्थन नहीं करते वह अधर्मी ही कहे जाते हैं।
           यत्र धर्मोह्य्मेंण सत्यं यत्रानृतेन च।
          हन्यते प्रेक्षामाणानां हतास्तत्र सभासदः।।
       ‘‘जहां अधर्म को देखते हुए भी सभासद चुप रहते हैं और उसका प्रतिकार नहीं करते वह भी पाप के भागी हैं।’’
                 कहते हैं भी अन्याय करने से अधिक पाप अन्याय पाप सहना है। उतना ही पाप है अपने सामने अन्याय, व्याभिचार, भ्रष्टाचार और बेईमानी होते देखना। वैसे धर्म साधना एकाकी होती है पर उसका निर्वहन करना सामूहिक गतिविधियों में ही होता है। परमार्थ, दान तथा धर्म की रक्षा का दायित्व बोध बाहरी गतिविधियों से प्रमाणित होता है। जब कोई आदमी अपनी जाति, परिवार और मित्र समुदाय के पथभ्रष्ट होने पर यह सोचकर चुप रहता है कि वह अपना धर्म निभा रहा है तो उसे बताना चाहिए कि यह भी अधर्म का ही एक भाग है। धर्म का आशय यह है कि आप स्वयं पाप न करें तो दूसरे को भी करने से रोकें।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Saturday, July 17, 2010

मनु स्मृति संदेश-आर्थिक अपराधों के लिये कड़ा दंड देना चाहिए (arthik apradh ke liye dand-manu smriti)

जब हम आज देश की स्थिति पर नज़र डालते हैं तो मन में व्यथा पैदा होती है। इसका कारण यह है कि देश में भ्रष्टाचार, हिंसा तथा आर्थिक अपराध की घटनायें बहुत बढ़ गयी हैं। इसका कारण यह है कि अब किसी को कानून का भय नहीं रहा है और अपराध तथा हिंसा में लिप्त लोग खुलेआम अपना काम करते हैं। अनेक जगह तो अपराधों में भी आदर्श की बातें ढूंढी जाती है। अनेक प्रकार के नये कानून बनाये जाते हैं पर उनका प्रभाव कभी सकारात्मक रूप से दिखाई दे ऐसा नहीं होता। ऐसे में अब आवश्यकता इस बात की है कि कानून लागू करने वाली संस्थायें दृढ़ता से अपना काम करें और उनको किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप से दूर रहना चाहिए।
राज्ञः प्रख्यातभाण्डानि प्रतिधिद्धानि यानि च।
तानि निर्हरतो लोभार्त्स्वहारं हरेन्नृपः।।
हिन्दी में भावार्थ-
अगर राज्य का कोई बेईमान व्यवसायी राजा के निजी पात्रों व विक्रय के लिये प्रतिबंधित पात्रों को लोभवश दूसरे स्थान पर जाकर व्यापार करता है तो उसकी सारी संपत्ति अपने नियंत्रण में कर लेना चाहिए।
शुल्कस्थानं परिहन्नकाले क्रयविक्रयी।
मिथ्यावादी संस्थानदाष्योऽष्टगुणमत्ंययम्।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि कोई व्यवसायी या व्यक्ति कर न देकर अपना धना बचाता है, छिपकर चोरी की वस्तुओं को खरीदता और बेचता है, मोल भाव करता है एवं माप तौल में दुष्टता दिखाता है तो उस पर बचाये गये धन का आठ गुना दंड देना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह देखकर आश्चर्य होता है कि भारत के प्राचीन ग्रंथों का जमकर विरोध होता है। देश में जिस तरह व्यवसाय और अपराध का घालमेल हो गया है उसे देखकर तो ऐसा लगता है जैसे कि तस्करी, करचोरी तथा अन्य गंदे धंधे करने वाले लोग अपने ही चेले चपाटों से इन ग्रंथों विरोध कराते हैं क्योंकि उनमें अपराध के लिये कड़े दंड का प्रावधान है। राज्य द्वारा प्रतिबंधित वस्तुओं का व्यापार तथा कर चोरी करने वालों के लिये यह दंड डराने का काम करते हैं। जिस तरह आजादी के बाद देश में अपराधिक व्यापार बढ़ा है और गंदे धंधों में पैसा अधिक आने लगा है उसे देखकर लगता है कि जैसे धनवानों और बुद्धिमान लोगों का एक गठजोड़ बन गया है जो आधुनिक सभ्यता के नाम पर मानवीय दंडों की अपने ढंग से व्याख्या करता है।
तस्करी, जुआ, सट्टा तथा अवैध शराब के कारोबार करने वालों के पास जमकर धन आता है। इसके अलावा करचोरों के लिये तो पूरा विश्व स्वर्ग हो गया है। उदारीकरण के नाम पर एक देश से दूसरे देश में धन लगता है जिनके बारे आर्थिक विशेषज्ञ यह संदेह करते हैं कि वह अपराध से ही अर्जित है। विदेशी धन का अर्जन की स्त्रोत कोई नहीं पूछता और समझदार व्यवसायी अपने देश में विनिवेश करता नहीं है। आधुनिक सभ्यता में अवैध व्यापार तथा धन की प्रधानता हो गयी है इसका कारण यही है कि मानवता के नाम पर अनेक अपराधों को हल्का मान लिया गया है तो समाज सेवा और धर्म के नाम पर छूट भी दी जाने लगी है। जिनके पास धन है उनके पास बुद्धिजीवी चाटुकारों की सेना भी है जो भारतीय धर्म ग्रंथों में वर्णित कठोर दंडों से भयभीत अपने स्वामियों को खुश करने के लिये उसके कुछ ऐसे श्लोकों और दोहों का विरोधी करती है जो समय के अनुसार अप्रासंगिक हो गये हैं और समाज में उनकी चर्चा भी कोई नहीं करता।
मनुस्मृति का विरोध तो जमकर होता है। जैसे जैसे समाज में अवैध धनिकों की संख्या बढ़ रही है वैसे वैसे ही भारत के वेदों के साथ ही मनुस्मृति का विरोध बढ़ रहा है। स्पष्टतः यह ऐसे धनिकों के बुद्धिजीवियों द्वारा प्रायोजित है जो तस्करी, करचोरी, तथा सट्टा जुआ तथा अन्य कारोबार से जमकर धन कमा रहे हैं। ऐसे में स्वतंत्र और मौलिक बुद्धिजीवियों का यह दायित्व बनता है कि वह अपने प्राचीन धर्म ग्रंथों के अप्रासंगिक विषयों को छोड़कर वर्तमान में भी महत्व रखने वाले तथ्यों को मानस पटल पर स्थापित करने का प्रयास करें। यह जरूरी नहीं कि मनुस्मृति या वेदों का विरोध करने वाले सभी प्रायोजत हों पर इतना तय है कि उनमें ऐसे कुछ लोग सक्रिय हो सकते हैं जो जाने अनजाने उनका हित साधते हों।
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संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, March 28, 2009

कौटिल्य दर्शन: शत्रु का विनाश करे वही कुशल राजा कहलाता है (economics of kautilya-arthshastra)

रिपोः शत्रुपरिच्छेदः सहृद्वप्पुविभेनम्।
दुर्गकोषबलयानं कृत्यपक्षेपसंग्रहः।।

राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह अपने शत्रु को उसके शत्रु से विनाश की प्रक्रिया को जानने के साथ उसके सहृदयों का भेद,दुर्ग,कोष और शक्ति का ज्ञान प्राप्त करते हुए अपने साथ कर्तव्य पूर्ण करने वाले सहयोगियों का संगह करे।
दूतेनैव नरेंद्रस्तु फुर्वीतारविकर्षणम्।
स्वपक्षे च विजानीयात्तपरदूतविचेष्टितम्
हिंदी में भावार्थ-राजा को चाहिये कि वह अपने दूत के द्वारा ही दूसरे राजा को आकर्षित करे और अपने शत्रु के दूत की चेष्टाओं से उसका मंतव्य समझे।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल पूरी दुनियां के सभी देश आधुनिक और तीव्रगामी हथियारों से सुज्जित हो गये हैं। ऐसे में सीधे युद्ध के बहुत सारे खतरे है। सभी देशों के पास दूर तक मार करने वाली मिसाइलें और राकेट हैं। ऐसे बम हैं कि अगर एक गिर जायें तो पूरा शहर नष्ट हो जाये। 1942 में अमेरिका द्वारा जापान के हिरोशिमा और नागासकी पर गिराये गये बमों की याद आते ही लोग सिहर उठते हैं जबकि उससे कई गुना शक्तिशाली बम अब बन चुके हैं। ऐसे में अब कूटनीति से काम लेने में ही बुद्धिमान लोग ठीक समझते हैं। इसलिये अब वह समय है कि जब अपने शत्रु को उसके शत्रु से नष्ट कराया जाये या उसे अपने ही देश में उलझाया जाये कि वह अपने राज्य पर वक्रदृष्टि न डाल सके। सच बात तो यह है कि कुशल राजा वही है जो अपनी प्रजा पर युद्ध लादने की बजाय अपने शत्रु को उसके राज्य में स्थित शत्रु से नष्ट करने की कूटनीतिक चाल चले। हालांकि सीधे युद्ध में जीतने पर राज्य प्रमुख का सम्मान होता है पर उसके खतरे भी बहुत हैं। कूटनीतिक चाल से शत्रु को पराजित करने में जहां अपनी प्रजा सुरक्षित होती है पर आजकल उसका प्रचार करना संभव नहीं है। अगर कूटनीति से विजय मिल भी जाये तो उसका दावा कोई सार्वजनिक रूप से नहीं कर सकता। इसके बावजूद यह एक सच्चाई है कि बुद्धिमान राज्य प्रमुख वही है जो कूटनीतिक चाल चलते हुए शत्रु राज्य को उसके शत्रुओं के हाथ से पराजित करे।
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