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Sunday, July 6, 2014

प्रातःकाल दैहिक तथा मानसिक शुद्धि करने वालों को उत्पात नहीं सताते-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(pratkal daihik tathaa mansik shuddhi karane walon ko utpat nahin satate-A hindu hindu religion thought based on manu smriti)




            आजकल शिरडी के सांईबाबा की भक्ति को लेकर भारी विवाद चल रहा है।  भारतीय धार्मिक परंपरा  शंकरचार्य नाम पदवी का निर्माण हुआ जिन पर बैठे कुछ लोग अपने विचार आये दिन व्यक्त कर यह जताने का प्रयास करते हैं कि समग्र हिन्दू समाज उनका अनुयायी है पर जिस तरह जनमानस में स्वतंत्र की भक्ति धारा का प्रवाह हम देश में  देख रहे हैं उनके दावे  यकीन नही होता।  आदि शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म को शक्तिशाली संगठित रूप देने का पवित्र प्रयास करने के लिये चार पीठों की स्थापना की थी। इसके अनुसार चार शंकराचार्य होना चाहिये पर देखा जा रहा है कि येनकेन प्रकरेण अनेक लोग स्वघोषित रूप से शंकराचार्य बन बैठे हैं। उसके बाद अनेक महामंडलेश्वर भी दिखाई देते हैं।  इनमें से अनेक लोग धर्म के रूप को व्यापक तथा कर्मकांडों के गूढ़ अर्थ बताते हुए अपनी विद्वता समाज में प्रमाणित करने का ऐसा प्रयास करते हैं जिसे सामान्य व्यक्ति सहजता से चुनौती नहीं दे सकता।
            अगर हम अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का स्वयं अध्ययन करें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि परमात्मा का नाम स्मरण करना ही सबसे बड़़ा यज्ञ है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा भी है कि यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूं  उन्होंने ज्ञानी भक्तों से यह अपेक्षा भी की है कि प्रातःकाल वह शुद्ध स्थान पर त्रिस्तरीय आसन बिछाकर प्राणायाम करें ताकि आंतरिक तथा बाह्य शुद्धि हो सके।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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मङ्गलाचारयुक्तः स्वात्प्रयतात्तमजितेन्द्रियः।
जपेच्च जुहुयाच्चैव नित्यमग्निमतन्द्रितः।।
            हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य को सदा ही शुभ कार्य करने के लिये तत्पर रहने के साथ ही अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए मन पवित्र रखना चाहिये। नित्य ही प्रातः आलस्य का त्याग कर परमात्मा के नाम स्मरण से मनुष्य का चित्त पूरे दिन प्रसन्न रहता है।

मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च प्रयतात्पनाम्।
जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-शुभ कर्म करने वाले, नित्य प्रातः बाह्य तथा आंतरिक शुद्धि रखने वाले एवं नित्य जाप होम करने वाले को दैहिक रोग, भौतिक बाधा एवं दैविक उत्पात कष्ट नहीं दे पाते।
            कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अगर यह सांसरिक जीवन सहजता से बिताना है तो प्रातःकाल धर्म का जमकर उपयोग करें। सुबह दैहिक शुद्धि के बाद योगासन और प्राणायाम करने के साथ ही गायत्री मंत्र, शांति पाठ तथा ओम शब्द का जाप कर अपनी वैचारिक, शारीरिक तथा मानसिक शुद्धता के साथ ही  सांसरिक जीवन में प्रवेश करें।  जब अपना शरीर, मन, और विचार निर्मल हो जाता है तब हमें किसी दूसरे के ज्ञान मार्ग पर चलने की बाध्यता नहीं रह जाती।  बहुत ही सरल और सहज यह प्रंक्रिया उन लोगों के लिये आसान नहीं है जो अपने ही अंदर ज्ञान प्राप्त कर भक्ति का संकल्प नहीं पाल सकते।  जिनको बाहर से प्रेरणा या उत्साह की आवश्यकता पड़ती है वह कभी प्रातःकाल का उस तरह का उपयोग नहीं करते जैसा कि ज्ञान और योग साधक करते हैं।
            हम यह देख रहे हैं कि जिन लोगों ने प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान संदेशों  रट लिया है वह उसका प्रदर्शन केवल अपने भौतिक लाभ के लिये करते हैं। वह ज्ञान देते हैं पर उनको सुनने वाले लोग भी केवल समय पास करने जाते हैं इसलिये समाज पर कोई प्रभाव नहीं दिखता।  देश में भ्रष्टाचार, अपराध तथा आर्थिक अपराध बढ़ रहे हैं उससे तो नहीं लगता कि हमारे समाज की जो मानसिकता पूरी तरह धार्मिक नहीं रह गयी है।  उस पर इतने सारे धर्म ध्वजवाहक चहूं ओर विचर रहे हैं तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर समाज में मानसिक तथा वैचारिक अंतर्द्वंद्व क्यों दिख रहे हैं? देश में स्वास्थ्य का स्तर बहुत नीचे क्यों चल रहा है? तय बात है कि कहीं न कहंी गड़बड़झाला है।  इसका निराकरण तभी संभव है जब लोग धर्म को गूढ़ समझने की बजाय उसके सहज भाव को समझ कर अपने समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं ही ज्ञानी बन जायें।         


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, May 1, 2011

मनोरंजन और घमंड मनुष्य को नष्ट कर देता है-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (manoranjan aur ghamand-hindu dharmik chittan)

प्रकृतिव्यसननि भूतिकामः समुपेक्षेत नहि प्रमाददर्पात्। प्रकृतिव्यवसनान्युपेक्षते यो चिरातं रिपवःपराभवन्ति।।
                   विभूति की कामना से उत्पन्न प्रमाद और अहंकार की प्रकृति से उत्पन्न व्यसन की उपेक्षा न करें। प्रकृत्ति की व्यसनों की उपेक्षा करने वाला शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
                        प्रकृति के पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि और अहंकार की प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है। जिनके पास भौतिक उपलब्धि है वह उसके आकर्षण में बंधकर मतमस्त हो जाते हैं। दूसरे को गरीब या अल्पधनी मानकर उसका मज़ाक उड़ाते हैं। मज़ाक न उड़ाये तो भी शाब्दिक दया दिखाकर अपने मन को शांति देने का प्रयास करते हैं। दरअसल यह सब दूसरों से ही नहीं बल्कि अपने साथ भी प्रमाद करना ही है। इस संसार में भगवान की तरह माया का खेल भी निराला है। किसी के पास कम है तो किसी के पास ज्यादा है, इसमें मनुष्य की कोई भूमिका नहीं है। यह अलग बात है कि अज्ञानवश वह अपने को कर्ता मान लेता है। इसी कारण वह कभी प्रमाद तो कभी अहंकार के भाव से ग्रसित होकर व्यवहार करता है।
                        आज हम देश के हालात देखें तो यह बात समझ में आ जायेगी कि जिन लोगों के पास धन, प्रतिष्ठा और पद की उपलब्धि है वह दूसरे को अपने से हेय समझते हैं। नतीजा यह है कि आम इंसानों में उनके प्रति विद्रोह के बीज पड़ गये हैं। शिखर पुरुषों को यह भ्रम है कि आम आदमी उनसे जाति, धर्म, भाषा तथा क्षेत्र के बंटवारे के कारण उनसे जुड़े हैं जो कि उनके किराये के बुद्धिजीवी बनाकर रखते हैं। मगर सच तो यह है कि शिखर पुरुषों से अब किसी की सहानुभूति नहीं है। भले ही प्रचार माध्यम कितने भी दावा करें कि जनता प्रसिद्धि लोगों को देखना और सुनना चाहती है। अब तो हर आदमी यह जान गया है कि शिखर पर अब बिना ढोंग, पाखंड या बेईमानी के कोई नहीं पहुंच सकता। अगर ऐसा न होता तो देश के अनेक शिखर पुरुष अपने घरों के बाहर सुरक्षा उपाय नहीं करते। इतना ही नहीं अनेक तो राह चलते हुए भी सुरक्षा लेकर चलते हैं। इसका मतलब सीधा है कि अपने ही कारनामों को उनके अंदर भय व्याप्त है। गरीबों से भरे देश में सुरक्षा एक मुद्दा बन गयी है।
फिर अब शिखर पर भी झगड़े होने लगे हैं। एक जाता है तो दूसरा आ जाता है। यह अस्थिरता इसलिये हैं क्योंकि प्रमाद और अहंकार में लगे शिखर पुरुष जल्दी जल्दी अपना आकर्षण खो देते हैं। शिखर बैठकर वह अपने वैभव का प्रदर्शन कर वह एक दूसरे को प्रभावित तो कर सकते हैं पर आम आदमी को नहीं।
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संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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