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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
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Tuesday, January 31, 2017

ट्रम्प के आतंकवादी प्रयासों के आशानुरूप परिणाम निकलने की संभावना कम ही है-हिन्दी संपादकीय (Dought in Trump efferd succes as Expetsion agisnt terrism-HindiEditorial)

                             भक्तों ने अभी ट्रम्प की सात मुस्लिम बाहुल्य देशों के शरणार्थियों के आगमन पर रोक तथा 9-11 के हमले बीच संबंध को समझा ही नहीं है। अमेरिका ने ईरान, इराक, सूडान, यमन, सोमालिया सीरिया तथा लीबिया पर यह प्रतिबंध लगाये हैं जबकि उसके देश में जो हमले हुए हैं उसमें इन देशों के नागरिक लिप्त नहीं पाये गये वरन् पाकिस्तान, तुर्की, अफगानिस्तान और सऊदी अरब और संयुक्त अरब  में पैदा लोगों ने वहां की आतंकवादी घटनाओं में तार जुड़े पाये गये। अमेरिका के प्रचार माध्यमों के आंकड़ों में भी यह बताया गया है कि इन सात देशों के बहुत कम नागरिक अमेरिका आ रहे थे। इन देशों के लोगों में अमेरिका विरोध की वैसी प्रवृत्ति भी नहीं देखी गया बल्कि अमेरिका ने इन्हीं देशों के राष्ट्राध्यक्षों को कभी समर्थन देकर उनको वहां का तानाशाह बनाया फिर उनसे रुष्ट होकर अपने हमले इस तरह किये कि ईरान को छोड़ सारे देश  अब लगभग तबाही झेल रहे हैं। दूसरी बात यह कि इन्हीं देशों में ईसाई आबादी भी है जो इन प्रतिबंधों का शिकार होगी-इसलिये इसे मुस्लिम विरोधी नीति मानना भी ठीक नहीं, यह बात ट्रंप ने भी कही है।
                                 यह भी बता दें इन देशों ने कभी अमेरिका के विरोध को कभी प्रायोजित किया हो इसके प्रमाण नहीं है। अमेरिक के विरोध में सक्रिय बौद्धिक तथा मानवाधिकार  संगठनों को इन देशों से किसी आर्थिक सहायता की संभावना ही नहीं दिखती वरन् जिन्हें ट्रम्प ने प्रतिबंध से मुक्त रखा है वही यह कर सकते हैं। यह संगठन इस समय इन सात देशों पर प्रतिबंध का विरोध कोई उनके प्रति सदाशयता दिखाने के लिये नहीं कर रहे वरन् उन्हें भय है कि कहीं उनके प्रायोजक देश कहीं इसकी चपेट में न आयें इसलिये इन प्रदर्शनों से दबाव बना रहे हैं। वह इसमें सफल भी हो गये हैं क्योंकि ट्रम्प प्रशासन अब आगे इस सूची को नहीं बढ़ायेगा-कम से कम पाकिस्तान, सऊदी अरब, तुर्की और संयुक्त अरब अमीरात का नाम तो नहीं आयेगा जैसे कि भक्त सोच रहे हैं।
                                                        ट्रम्प ने सात इस्लामिक देशों की यात्रा पर प्रतिबंध लगाया है इससे भक्त समूह को प्रसन्न होने की जरूरत नहीं है। आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में इससे अमेरिका को मदद नहीं मिलने वाली क्योंकि उसने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की के साथ ही पाकिस्तान पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जिन पर  अपने धर्म के नाम पर आतंकवाद फैलाने आरोप लगते हैं। यमन, ईरान, इराक, सीरिया और लीबिया में शियाओं का प्रभाव है जिनके विरुद्ध सऊदी अरब बहावीवाद के रूप में आतंक का समर्थन करता है। आईएसआईएस शुद्ध रूप से सऊदी अरब की पैदाइश है। ऐसे में पूंजीवादी अमेरिका का पूंजीपति ट्रंप कभी अपने पांव पर कुल्हाड़ी नहीं मारेगा।  अफगानिस्तान पर नियंत्रण के लिये पाकिस्तान का साथ भी नहीं छोड़ेगा क्योंकि वहां से आर्थिक फायदा उठाना अमेरिका की भविष्य की योजना है।
                               ट्रम्प के विरोधियों के तर्कों को भी भक्तगण भावनात्मकता के आधार पर खारिज नहीं कर सकते क्योंकि उनका व्यवाहारिक पक्ष अत्यंत मजबूत है।  उल्टे कहीं ऐसा न हो जाये कि मीडिया के दबाव में कहीं ट्रम्प निरपेक्ष दिखने के प्रयास में अमेरिका के हिन्दूओं को भी परेशान न करने लगे-ऐसी आशंका लगती है। हालांकि भक्तों के लिये यह संतोष का विषय है भारतीय रणनीतिकारों ने कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ रणनीतिक मित्रता स्थापित कर ली है जो भविष्य में सहायक साबित होगी। ऐसे में भक्त निरपेक्ष भाव से देखते रहें क्योंकि राजनीति में त्वरित रूप से टिप्पणी करना हमेशा बुद्धिमानी नहीं होती।

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