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Sunday, November 22, 2015

वैचारिक बहस से आतंकवाद पर नियंत्रण संभव नहीं संकट-हिन्दी लेख (World Terratish Not Control by Theorical Disscisopm-Hindi Article or Hindi lekh)

                           कथित रूप से अगर किसी धर्म का नाम लेकर उसके सिद्धांतों पर राज्यप्रबंध चलाने की बात कही जायेगी तो तय है कि उसके विद्रोही भी अपना संगठन चलाने की बात कहा सकते हैं। तब निष्पक्ष व्यक्ति यह तर्क स्वीकार कैसे कर सकता है कि  राज्यप्रबंध का धर्म से संबंध है पर आतंकवाद का नहीं।
                           आतंकवाद विश्व में एक व्यवसाय की तरह चल रहा है। आतंकी संगठन भी धर्म का उपयोग उसी तरह कर रहे हैं जैसे कि सफेदपोश व्यवसायी करते हैं। इस विषय पर धर्म के नाम पर बहस करने वालों में वैचारिक खोखलापन साफ दिखता है। दरअसल धर्म को लोगों ने पूजा पद्धति, खानपान, रहनसहन और चाल चलने के नियमों का समूह मान लिया है। विदेशी विचाराधाराओं पर यह नियम लागू हो पर भारतीय अध्यात्मिक दर्शन पर लागू नहीं होता। इसके अनुसार सांसरिक तथा अध्यात्मिक विषय प्रथक प्रथक हैं। हमें ऐसा लगता है कि भारत के बाहर पनपी  विचाराधाराओं में अध्यात्मिक ज्ञान का नितांत अभाव है शायद यही कारण है कि उसके कुछ अनुयायियों में अपने ही मत को लेकर भ्रम की स्थिति है जिससे आतंकवाद का वैश्विक संकट खड़ा हुआ है।
इस  समय विश्व में चल रहे आतंकवाद के इतिहास पर नज़र डालें तो यह साफ दिखेगा कि यह पैंतीस से अधिक वर्ष से चल रहा है। यह अलग बात है कि समय के साथ आतंक के शीर्ष और उनके संगठनों के नाम बदलते रहे हैं।  हथियारों के नये रूप तथा प्रचार माध्यमों की नयी तकनीकी के साथ आतंकवादी संगठनों का कार्यशैली बदल जाती है। हमने पिछले दस वर्षों से स्वयं देखा है कि पहले वेबसाईटें, ब्लॉग तथा अन्य साधनों के साथ पहले आतंकवादी बनाते हैं तो अब फेसबुक और ट्विटर भी का भी उन्होंने पहले अपने ढंग से पूरा उपयोग किया। जहां तक आतंकवाद का युद्ध से सामना करने का सवाल है वह एक अलग विषय है पर समस्या यह है कि कुछ लोग इस पर वैचारिक बहस कर अपनी धार्मिक चर्चायों करने लगते हैं और इससे समाज में भ्रम फैलता है। यही कारण है कि कम से कम इस संकट का हल वैचारिक प्रहार से होता नहीं दिखता। जब तक भारतीय दर्शन के आधार पर अध्यात्मिक तथा सांसरिक विषयों को प्रथक नहीं देखा जायेगा तब तक आतंकवाद का कम से कम वैचारिक रूप से मुकाबला करना बेमानी है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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Sunday, July 17, 2011

वेद शास्त्र-पाप को न रोकना भी उसमें सहभागी होना है

         स्वयं पाप न करना ही धर्म का परिचायक नहीं है वरन् जिस पाप को रोकना संभव है उसका प्रतिकार न करना भी अधर्म है। हम अपने मित्रों, रिश्तेदारों या परिवार के सदस्यों के पाप में स्वयं लिप्त न हों पर उनको दुष्कर्म करते देख मौन रहना या उनको न रोकना भी अधर्म की श्रेणी में आता है। चूंकि मनुष्य को प्रकृति ने हाथ पांव, वाणी, तथा आंखें दी हैं और उसके साथ ही बुद्धि भी प्रदान की है तब यह उसके लिये आवश्यक है कि वह अपने समूहों को पाप कर्म से रोके। अगर कोई ऐसा सोचता है कि वह स्वयं पाप नहीं कर रहा है इसलिये वह धर्मभीरु है तो गलती पर है। यह उदासीनता अधर्म का ही एक बहुत बड़ा भाग है।
           हमारे वेद शस्त्रों में कहा गया है कि
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          धर्मादयेतं यत्कर्म यद्यपि स्यान्महाफलम्।
            न तत् सेवत मेधावी न तद्धिमिहोच्यते।।
               ‘‘इस धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। जहां विद्वान लोग न्याय का समर्थन नहीं करते वह अधर्मी ही कहे जाते हैं।
           यत्र धर्मोह्य्मेंण सत्यं यत्रानृतेन च।
          हन्यते प्रेक्षामाणानां हतास्तत्र सभासदः।।
       ‘‘जहां अधर्म को देखते हुए भी सभासद चुप रहते हैं और उसका प्रतिकार नहीं करते वह भी पाप के भागी हैं।’’
                 कहते हैं भी अन्याय करने से अधिक पाप अन्याय पाप सहना है। उतना ही पाप है अपने सामने अन्याय, व्याभिचार, भ्रष्टाचार और बेईमानी होते देखना। वैसे धर्म साधना एकाकी होती है पर उसका निर्वहन करना सामूहिक गतिविधियों में ही होता है। परमार्थ, दान तथा धर्म की रक्षा का दायित्व बोध बाहरी गतिविधियों से प्रमाणित होता है। जब कोई आदमी अपनी जाति, परिवार और मित्र समुदाय के पथभ्रष्ट होने पर यह सोचकर चुप रहता है कि वह अपना धर्म निभा रहा है तो उसे बताना चाहिए कि यह भी अधर्म का ही एक भाग है। धर्म का आशय यह है कि आप स्वयं पाप न करें तो दूसरे को भी करने से रोकें।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com

Thursday, July 2, 2009

विदुर नीति-आत्मा साथ छोडे तो फ़िर कौन निभाता है

अग्नी प्रास्तं पुरुषं कर्मान्वेति स्वयंकृतम्।
तस्मातु पुरुषो यत्नाद् धर्म संचितनुयाच्छनैः।।
हिंदी में भावार्थ-
इस देह के अग्नि में जलकर राख हो जाने के बाद मनुष्य का अच्छा और बुरा कर्म ही उसके साथ जाता है अतः जितना हो सके धर्म के संचय का प्रयत्न करें।

उत्सृत्न्य विनिवर्तन्ते ज्ञातयः सह्दः सुताः।
अपुष्पानफलान् वृक्षान् यथातत पतित्रणः।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस तरह फल और फूल से हीन वृक्ष को पक्षी त्याग कर चले जाते हैं वैसे इस शरीर से आत्मा निकल जाने पर उसे जाति वाले, सहृदय और पुत्र चिता में छोड़कर लौट जाते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस देह को लेकर अभिमान पालना व्यर्थ है। एक न एक दिन इसे नष्ट होना है। इस देह से बने जाति, धर्म, परिवार और समाज के रिश्ते तभी तक अस्तित्व में हैं जब तक यह इस धरती पर विचरण करती है। मनुष्य मोहपाश में फंसकर उनको ही सत्य समझने लगता है। इसमें मेहमान की तरह स्थित आत्मा का कोई सम्मान नहीं करता जिसकी वजह से यह देह रूपी शरीर प्रकाशमान है।
आपने देखा होगा कि आजकल हर जगह विवाहों के लिये बहुत सारी इमारतें बनी हुईं हैं। वहां जिस दिन कोई वैवाहिक कार्यक्रम होता है उस दिन वह रौशनी से जगमगाता है। जब विवाह कार्यक्रम नहीं होता उस दिन वहां अंधेरा रहता है। यह विचार करना चाहिये कि जब उस इमारत में बिजली और उससे चलने वाले उपकरण तथा सजावट का सामान हमेशा विद्यमान रहता है तब क्यों नहीं उसे हमेशा रौशन किया जाता? स्पष्ट है कि विवाह स्थलों के मालिक विवाह कार्यक्रम के आयोजकों से धन लेते हैं और इसी कारण वहां उस स्थान पर रौशनी की चकाचौंध रहती है। आयोजक भी धन क्यों देता है? उसके रिश्तेदार, मित्र और परिवार के लोग उस कार्यक्रम में शामिल होते हैं। अगर दूल्हा दुल्हन के माता पिता अकेले ही विवाह कार्यक्रम करें तो उनको व्यय करने की आवश्यकता ही नहीं पर तब ऐसे विवाह स्थल जगमगा नहीं सकते। तात्पर्य यह है कि मेहमानों की वजह से ही वहां सारी सजावट होती है। जब सभी चले जाते हैं तब वहां सन्नाटा छा जाता है। यही स्थिति इस देह में विद्यमान आत्मा की है। यह देह तो बनी यहां मौजूद पंच तत्वों से ही है पर उसको प्रकाशमान करने वाला आत्मा है। इस सत्य को पहचानते हुए हमें अपने जीवन में धर्म का संचय करना चाहिये। हमारे अच्छे काम ही इस आत्मा को तृप्त करते हैं। यह आत्मा तो परमात्मा से बिछड़ा अंश है और कभी न कभी उसके पास जाना है तो क्यों न परमात्मा की भक्ति कर उन्हें प्रसन्न करने का प्रयास किया जाये।
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