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Saturday, November 10, 2012

विदुर नीति-भोजन वह करो जो पच सके (vidur neeti-bhojan vah karen jo pach sake)

                 धन, पद और शक्ति की संचय में लगे पूरे विश्व समाज का ध्यान अपने शरीर पर कम मन पर अधिक रहता है।  लोग बाहरी आंखों से संसार की रंगीनियों  को देखने में इतना ध्यान लगाते हैं कि उनको इस बात का आभास ही नहीं होता कि उनकी देह समय से पूर्व ही विकारो के जाल में फसती जा रही है।  अब तो स्थिति यह है कि दिमागी तनाव से पैदा होने वाले रोग छोटे बच्चों और युवकों में भी दिखाई देने लगे  है। विश्व के मनोवैज्ञानिक समाज में मनोविकारों की बढ़ती संख्या से चिंतित हैं।  पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञ इसके लिये भोजन, रहन सहन और अप्राकृतिक कार्यशैली को बताते हैं। हालत यह है कि अनेक मनोवैज्ञानिक यह बात  कहते हुए नहीं चूकते कि अब यह बात लगाना भी कठिन है कि हम से बात कर रहा व्यक्ति मनोरोगी है या हम स्वयं ही हैं।  उनकी बात ठीक है पर भोजन, रहन सहन और कार्यशैली के सुविधाभोगी होने से उपजे मनोरोगों का परिणाम क्या हो रहा है, इस पर अभी तक कोई चिंत्तन सामने नहीं आ रहा है।

विदुरनीति में कहा गया है कि
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भक्ष्योत्तमप्रतिाच्छन्नं मत्स्यो वडिशमायसम्।
लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धनवेक्षते।।
      हिन्दी में भावार्थ-मछली हमेशा ही भोजन की लालच में कांटा पकड़कर उसमें बिना किसी विचार के फस जाती है।’’
यच्छक्यं ग्रसितु ग्रस्यं परिणमेच्च यत्
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता।।
      हिन्दी में भावार्थ- अपनी उन्नति की इच्छा रखने वाले व्यक्ति को सदैव ऐसा भोजन करना चाहिए जो पच सके।
    पूरे विश्व के प्रचार माध्यम पूंजीपतियों के हाथ में है और वह केवल आर्थिक विकास की बात करते हुए समाज को भ्रमित कर रहे हैं।  वास्तविकता यह है कि विकास केवल भौतिक ही नहीं वरन् आध्यात्मिक भी होता है पर इसके प्रति कोई जागरुक नहीं है। वास्तविकता यह  है कि जब मनुष्य को भौतिकता का चरम मिलता है तब उसके अंदर एक खालीपन दिखाई देता है।  यह खालीपन उसके आध्यात्मिक विषयों के अभाव की तरफ संकेत करता है। कहा जाता है कि इस ंसार में न गरीब सुखी है न अमीर! तब प्रश्न उठता है कि लोग अमीर होकर कौनसा सुख पाते है? सीधी बात यह है कि सुख कहीं मिलता नहीं बल्कि उसे अंदर अनुभव किया जाता है। इस अनुभूति के लिये यह आवश्यक है कि अध्यात्मिक ज्ञान होना चाहिए वरना तो जिस तरह मछली फसती है आदमी भी फस ही रहा है।  स्थति यह है कि फास्ट फूड के नाम पर ऐसा भोजन करने की आदत लोगों में बढ़ी गयी है जो कि जिससे देह में ऊर्जा का निर्माण नहीं होता। बाज़ार में बनने वाले खाद्य पदार्थों में शुद्धता का अभाव होता है पर वहां खाने वालों की भीड़ इस बात का प्रमाण है कि लोग अपने स्वास्थ्य को बेजुबान मछलियों की तरह  दाव पर लगा रहे हैं।

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Sunday, February 19, 2012

पतंजलि योग सूत्र-साधन तीव्र हो तो सिद्धि भी वैसी होगी (patanjali yoga sadhana-sadhan aur siddhi)

          इस संसार में सभी मनुष्य का जीवन एक जैसा दृष्टिगोचर नहीं होता। इसका कारण यह है कि हर मनुष्य की संकल्प शक्ति प्रथक प्रथक है। वैसे देखा जाये तो मनुष्य इस संसार से जुड़ता है जिसे योग ही कहा जा सकता है। अर्थात योग तो हर मनुष्य कर रहा है पर कुछ लोग अभ्यास के माध्यम से स्वयं ही अपनी सक्रियता तथा परिणाम निर्धारित करते हैं जबकि कुछ मनुष्य परवश होकर जीवन में चलते हैं। जो स्वयं योग करते हैं वह सहज योग को प्राप्त होते हैं जबकि अभ्यास रहित मनुष्य असहज होकर जीवन गुजारते हैं। स्वयं योग करने वालों की सिद्धि भी एक समान नहीं रहती। जिनका संकल्प प्रबल है उनके मानसिक साधन अत्यंत शक्तिशाली होते हैं और उनको सिद्धि तीव्र गति से मिलती है। जिनकी संकल्प शक्ति मध्यम अथवा निम्न है उनको थोड़ा समय लगता है।
                                            पतंजलि योग में कहा गया है कि
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                                            तीव्रसंवेगानामासन्नः।।
             ‘‘जिसके साधन की गति तीव्र है उनकी शीघ्र सिद्धि हो जाती है।’’                                   मृदुमध्याधिमात्रत्वात्तोऽपि विशेषः।।
        ‘‘साधन की मात्रा हल्की, मध्यम और तीव्र गति वाली होने से भी सिद्धि में भेद आता है।’’
                     मुख्य बात यह है कि मनुष्य को अपनी साधना में निष्ठा रखना चाहिए। यह निष्ठा संकल्प से ही निर्मित होती है। जब मनुष्य यह तय करता है कि वह योग साधना के माध्यम से ही अपने जीवन को श्रेष्ठ बनायेगा तब उसका मन अन्यत्र नहीं भटकता, ऐसे में उसका साधन शक्तिशाली हो जाता है। जहां मनुष्य ने यह माना कि अन्य साधन भी आजमाये जायें वहां उसकी साधना क्षीण होती है। जब कोई साधक केवल इसलिये योग साधना करता है कि इससे कोई अधिक लाभ नहीं होगा तब उसका संकल्प कमजोर होता है। एक बात तय है कि अभ्यास करते करते मनुष्य अंततः पूर्ण सहज योग को प्राप्त होता है पर यह उसकी मनस्थिति पर निर्भर है कि वह कितनी तेजी से इस राह पर बढ़ेगा।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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