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Tuesday, December 25, 2012

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जो सद्व्यवहार करे वही सच्चा बंधु (kautilya ka arthshastra-jo sadvyavahar kare vahi sachcha bandhu)

             इस संसार में कोई मनुष्य अकेला नहीं रह सकता।  उसे समय समय पर बंधु बांधव और मित्रों की सहायता की आवश्यकता होती है।  इसके साथ ही यह भी सत्य है कि सभी बंधु या मित्र समय पड़ने पर सहायता करने वाले नहीं होते।  आजकल विद्यालयो, महाविद्यालयों तथा कार्यालयों में अनेक लोगों के बीच मैत्री और प्रेम भाव पनपता है और सभी लोग इस भ्रम में रहते हैं कि आपत्तकाल में वह मदद करने वाले हैं।  अनेक लोगों को तो ऐसा लगता है कि  ऐसे मित्र जीवन भर निभायेंगे। इतना ही नहीं आपस में एक दूसरे की परीक्षा किये बिना लोग बंधु या मित्र का रिश्ता कायम कर लेते हैं।  यह अलग बात है कि समय आने पर उनको पता चलता है कि कोई उनकी सहायता करना नहीं चाहता या वह उतना क्षमतावान नहीं है जितना वह दावा करता है।  इसके अलावा  अपने रिश्तों नातों में आदमी यह सोचकर लिप्त रहता है कि समय आने पर वह निभायेंगे।  यह अलग बात है कि समय आने पर कोई सीधे मुंह फेर लेता है या मदद न करने के लिये कोई  बहाना बना देता है। ऐसा नहीं है कि संसार में सभी बुरे लोग हैं क्योंकि देखा यह भी गया है कि समय पड़ने पर ऐसे लोग भी मदद करते हैं जो न तो बंधु होते हैं न मित्र।  यह सत्य है कि अध्यात्मिक रूप से ज्ञान होने पर मनुष्य  किसी का न मित्र रहता न शत्रु बल्कि वह निष्काम भाव से दूसरे की मदद करता है।  ज्ञानियों को न मित्र चाहिये न शत्रु पर वह ऐसे लोगों को बंधु मानते हैं जो इस भौतिक संसार से जुड़े विषयों पर बिना किसी प्रयोजन के उनकी मदद करते हैं।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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सा बन्धुर्योऽनुबंधाति हितऽर्वे वा हितादरः।।
अनुरक्तं विरक्त वा तन्मित्रमुपकरि यत्।।
              हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में वही बंधु है जो अपने प्रयोजन को सिद्ध करता हो।  अनुरक्त होकर विरक्त भाव से जो उपकार करे वही सच्चा बंधु है।
मित्रं विचार्य बहुशो ज्ञातदोषं परित्यवेत्।
तयजन्नभूतदोषं हि धर्मार्थदुपहन्ति हि।।
        हिन्दी में भावार्थ-अपनी मित्र मंडली के बारे में विचार करते रहना चाहिए। जब किसी मित्र के दोष का पता चले तब उससे दूरी बना लें। अगर दोष युक्त मित्र या पूरी मंडली का त्याग न किया तो अनर्थ होने की संभावना प्रबल रहती है।
     इतना ही नहीं अपने बंधुओं या मित्रों में अनेक ऐसे भी होते हैं जिनके अंदर अनेक प्रकार के दोष होते हैं।  उनके मुख में कुछ मन में कुछ होता है।  ऐसे लोगों की पहचान होने पर उनका साथ त्याग देना ही श्रेयस्कर है।  समय समय पर एकांत में हर आदमी को अपने मित्र तथा बंधुओं की स्थिति और विचारों पर दृष्टिपात करना चाहिये।  मनुष्य गुणों का पुतला है। समय और स्थिति के अनुसार उसकी सोच बदलती रहती है।  संभव है कि वह वफादार दिखते हों पर जब हमें हानि पहुंचाने पर उनको लाभ होता है तब वह गद्दारी करने में संकोच न करें।  इसलिये हमेशा सतर्क रहते हुए अपने बंधु और मित्रों की भाव भंगिमाओं पर दृष्टिपात रखना चाहिये।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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