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Saturday, December 15, 2012

विदुर नीति-कोई धन में तो कोई गुण में धनी है (vidur neeti-koyee dhan mein to gun mein dhani hai)

       पूरे विश्व में आर्थिक एवं वैज्ञानिक विकास की बात खूब होती है पर चारित्रिक विकास  का कोई प्रश्न नहीं उठाता। अगर विश्व के भौतिक विकास को ही सत्य माना जाये तो फिर हमें यह मानना चाहिए समूचे मानव सभ्यता में जो भयंकर वैचारिक दोष आ गये हैं उन पर अधिक चिंता करने की आवश्यकता व्यर्थ है ।  यह अलग बात है कि पूरे विश्व के प्रचार माध्यम एक तरफ से विश्व समुदाय के भौतिक विकास को सभ्य मानव सभ्यता का प्रमाण प्रचारित कर रहे हैं तो दूसरी तरफ उन्हीं में नित प्रतिदिन हिंसा, अपराध और संवदेनहीन समाज को लेकर अनेक प्रकार की बहस भी होती है।  इस धरती पर विचरने वाले जीवों में मनुष्य एक ऐसा जीव है जिसकी बुद्धि अधिक है और जहां वह भौतिक विकास पर प्रसन्न है वहीं चारित्रिक, वैचारिक तथा आचरण में हुए हृास पर  चिंतित भी है।  संसार का बौद्धिक समाज असमंजस में है।  इस भौतिक विकास ने एक तरह से मनुष्य समुदाय की बुद्धि का ह्रास  इस कदर किया है कि समझ में नहीं आता कि पशु और मनुष्य में अंतर क्या रह गया है?
         अध्यात्मिक विकास की बात करना एक तरह से बकवाद करना लगता है।  यह कहना गलत होगा कि पूरा मनुष्य समुदाय मूर्ख है पर इतना तय है कि ज्ञानियों की संख्या अब नगण्य रह गयी है।  आर्थिक विकास और मनोरंजन के नये साधनों में मगजपच्ची लोगों को यह आभास नहीं है कि इनसे उनकी बुद्धि के साथ आयु का भी क्षय हो रहा है।  देह और मन के साथ विचारों में विकार इतने भर गये हैं कि आदमी विष को भी अमृत समझ कर सेवन कर रहा है। 
विदुरनीति में कहा गया है कि
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न च क्षयो महाराज यः क्षयो शुद्धिभावहेतु।
क्षयः सत्विह मन्तव्यो यं लब्धवां बहुनाशयेत्।।
         हिन्दी में भावार्थ-किसी हानि या क्षय से अगर वृद्धि या लाभ होता है तो उसकी परवाह नहीं करना चाहिये पर अगर किसी लाभ से बाद में हानि या क्षय हो उस पर अवश्य विचार कर कोई काम करना चाहिए।
समृद्धा गुणतः केचित भवन्ति धनतोऽपरे।
धनवृद्धान् गुणंहींनान् धृतराष्ट्र विवर्जय।
        हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में कुछ लोग धन के तो कुछ गुणों में धनी होते हैं। जो धनी होते हुए भी गुणों से हीन हैं उनका त्याग करना ही श्रेयस्कर है।
         समाज में धनवान को गुणवान मानने की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  गुणवान अगर अल्पधनी है तो उसका सम्मान कोई नहीं करना चाहता। स्थिति यह है कि समाज सेवा, राजनीति, कला, साहित्य, तथा धार्मिक क्षेत्र में जो लोग सक्रिय हैं उनके छोटे और बड़े होने की पहचान केवल उनके पास उपलब्ध  धन की मात्रा रह गयी है।  इधर उधर से धन के साथ शिष्यों का संग्रह कर कोई अपना रटा रटाया अध्यात्मिक ज्ञान सुनाता है तो वह ज्ञानी है पर धारण करने वाला जो त्यागी है उसे कोई ज्ञानी नहीं मान सकता।  दान लेकर समाज सेवा करने वाले सम्मानीय और स्वतः दान देने वाला मूर्ख मान जा रहा है।  धर्म और समाज सेवा में व्यवसायिकता का इतना बोलबाला है कि जिसे अध्यात्म का ज्ञान नहीं है वह उन्हीं लोगों को महान समझता है जो कमाने के लिये सेवा करते हैं।  सेवा कर जो न कमाये उसे तो एक तरह से मूर्ख माना जाता है।
        समाज की इस प्रवृत्ति के बावजूद ज्ञानी और  साधकों का एक ऐसा समूह है जो निष्काम भाव से सक्रिय है।  वह यह सच जानते हैं कि समाज में लोगों का एक बहुत बड़ा वर्ग मानसिक, शारीरिक और बौद्धिक विकारों से जूझ रहा है।  हमारे देश में संपन्नता बड़ी है पर लोगों में उसी अनुपात से  प्रसन्नता का भाव कम हो गया है।  मूल बात यह है कि हम दूसरों की तरफ देखने की बजाय आत्ममंथन करें कि कहां खड़े हैं। भीड़ में भेड़ की तरह एकांत में ध्यान साधना करने पर इसका आभास हो सकता है कि एक ज्ञानी या साधक और आम मनुष्य में क्या अंतर है? साथ ही जिन लोगों को बड़ा माना जाता है उनकी स्थिति वाकई क्या है?        
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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