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Tuesday, July 29, 2014

अपनी उच्च तथा निम्न इंद्रियों को पहचाने-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(apni uchcha tatha nimna indriyon ko pahachane-manu smriti ka aadhar par chinnta lekh)




            कहा जाता है कि भौतिक विकास के कारण समाज में विभिन्न आयुवर्ग के लोगों में एक पीढ़ीगत अंतर स्वाभाविक रूप से होता है। आजकल तो यह भी कहा जाता है कि बच्चे अक्षर ज्ञान से पहले ही टीवी, मोबाइल और अन्य आधुनिक उपभोग के सामानों का चलाना सीख लेते हैं।  इस बहिर्मुखी जानकारी को अब बौद्धिक विकास का प्रतीक माना जाने लगा है जबकि आंतरिक ज्ञान से-जिसके बिना जीवन में हमेशा ही आनंद उठाने का अवसर मिलता है-सभी परे हो गये हैं। यही कारण है कि समाज में तनाव की प्रवृत्ति बढ़ रही है।  सबसे बड़ी बात यह कि जिस देह को धारण कर इस संसार में गुजारना है उसके बारे में कोई नहीं जानता।
            हमारे शरीर के विकार मन को प्रभावित करते हैं जिससे बुद्धि संचालित होती है।  अक्सर अनेक बुद्धिमान और विद्वान समाज के लोगों को नकारात्मक दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव देते हैं पर जिसकी देह और मन में विकार होंगे वह किस तरह सकारात्मक दृष्टिकोण अपना सकता है भारतीय अध्यात्म ज्ञान के अभाव में वह स्वयं भी नहीं जानते।


मनुस्मृति में कहा गया है कि
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वसाशुक्रमसृङ्मज्जरमूत्रविङ्घ्राणकर्णविट्।
श्लेषामाश्रृदूषिकास्वेदा द्वाशैते नृणां मलाः।।
            हिन्दी में भावार्थ-चर्बी, वीर्य, रक्त, मज्जा, मूत्र, मल, आंखों का कीचड़, नाक की गंदगी, कान का मैल, आंसू, कफ तथा पसीना यह बारह प्रकार के मल हैं।
ऊर्ध्व नाभेर्यानि खानि तानि मेध्यानि सर्वशः।
यान्यधस्तान्यमेध्यानि देहाच्चैव मलाश्चयुताः।।
            हिन्दी में भावार्थ-नाभि के ऊपर स्थित इंद्रियां-हाथ, कान, नाक, आंख तथा जीभ पवित्र मानी जाती हैं। नाभि के नीचे की इंद्रियां-गुदा, लिंग, तथा पैर एवं शरीर से निकलने वाले मल, मूत्र, विष्टा पसीना, खोट आदि अपवित्र हैं।

            महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपनी नाभि के ऊपर स्थित इंद्रियों के उपयोग करते समय यह नहीं जानते कि नीचे की इंद्रियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उच्च इंद्रियां ग्रहण करती हैं और निम्न इंद्रियां उसके संपर्क से  मिले कचड़े का निवारण करती हैं। हमारी देह में सात चक्र हैं-सहस्त्रात, आज्ञा, विशुद्धि, अनहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मूलाधार-जो निरंतर घूमते रहते हैं। हम अपनी इंद्रियों से बाहरी विश्व का उपभोग करते हैं पर इसमें नियमितता तभी तक संभव रह पाती है जब तक यह सभी चक्र काम करते हैं।
            इसलिये हम उच्च इंद्रियों से केवल उन्हीं व्यक्तियों, वस्तुओं और विषयों से संपर्क करें जिनसे हमारी देह का कोई चक्र दृष्प्रभाव का शिकार न हो। हम इन्हीं इंद्रियों से अपने कर्म फल का निर्माण करते हैं यह नहीं भूलना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, July 26, 2014

बिना अध्यात्मिक ज्ञान के जीवन में आनंद नहीं-भर्तृहरि नीति शतक के आधार पर चिंत्तन लेख(bina adhyatmik gyan ke jiwan mein anand nahin-A Hindu hindu religion thought message on bhartrihari neeti shatak)



      अंग्रेजों ने भारत में जिस शिक्षा पद्धति को स्थापित किया उसका प्रचलन निर्बाध गति से हमारे देश में अब भी जारी है।  इस पद्धति को अपनाये रखने का कारण यह है कि इसके आधार पर विद्याध्यन करने के पश्चात् जो उपाधियां प्राप्त होती हैं उसी से निजी तथा सरकारी क्षेत्रों में नौकरियां करने का अवसर आधुनिक गुलामों को मिलता है।  यह अलग बात है कि हमारे शैक्षणिक क्षेत्र के विद्वान आज भी देश में व्याप्त बेरोजगारी की समस्या को देखते हुए शिक्षा को अधिक रोजगारोन्मुखी बनाने की मांग करते हैं।
      पहले तकनीकी और विज्ञान के क्षेत्र में शिक्षा करने वालों को भी नौकरी ढूंढने के अभियान में लगना पड़ता था पर उदारीकरण ने ऐसी स्थिति बना दी है कि तकनीकी महाविद्यालायों मेें अध्ययन करने के दौरान ही नौकरी देने वाले शिविर लगाकर छात्रों का भावी गुलाम कें रूप में चयन किया जाने लगा है। आजकल  किसी भी शैक्षणिक संस्थान की प्रतिष्ठा इस बात पर निर्भर करती है कि उसने  अपने यहां अध्ययनरत कितने अधिक छात्रों को गुलामी का अवसर का लाभ उठाने की सुविधा प्रदान की। 

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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पुरा विद्वत्तासीदुषशमवतां क्लेशहेतयेगता कालेनासौ विषयसुखसिद्धयै विषयिणाम्।
इदानीं सम्प्रेक्ष्य क्षितितलभुजः शास्त्रविमुखनहो कष्ट साऽपि प्रतिदिनमधोऽधः प्रविशत।।
     हिन्दी भावार्थ-पहले लोग मानसिक रूप से दृढ़ होने के लिये विद्याध्ययन करते थे। कालांतर में विषयों में आसक्त होने पर सुख प्राप्त करने के लिये उसका अनुकरण किया। अब तो लोग शास्त्रों से विमुख हो गये हैं। वह उनका नाम भी नहीं सुनना चाहते थे। राजाओं ने भी शास्त्रों में मुंह फेर लिया है। इस तरह यह प्रथ्वी रसातल में जा रही है वह चिंत्ता का विषय है।

      आमतौर से हमारे यहां के धार्मिक विद्वान शास्त्रों से विमुख होने की शिकायत करते हैं पर यह कोई नयी बात नहीं है। हमारे समाज में भले ही प्राचीन ग्रंथो को मान्यता प्राप्त है पर उसमें स्वाध्याय करने का मन सहजता से नहीं लगता। यही कारण है कि जो उनका अध्ययन करते हैं वह उसका व्यवसायिक उपयोग करते समाज में गुरु पद पर प्रतिष्ठित हों जाते हैं।  लोग फुर्सत के समय उनके प्रवचन सुनकर मनोरंजन के रूप में आनंद उठाते हैं।
        दरअसल प्राचीन ग्रंथों का अध्यात्मिक अध्ययन प्रारंभ में विषतुल्य प्रतीत होता है पर कालांतर में उसके आधार पर इस मायावी संसार के नाटकीय दृश्य देखकर उनका विश्लेषण करने की सुविधा मिलती है जो अत्यंत मनोरंजक होती है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन में भाव के त्याग का अत्यंत महत्व प्रतिपादित करने के साथ ही यह भी बताया गया है कि भोग का सुख क्षणिक होने के साथ कालांतर में उसका  प्रभाव विकार के रूप में प्रकट होता है।  अज्ञान के अभाव में लोग भोग के स्वरूप को ही जीवन का आनंद समझते हैं।  इतना ही नहीं लोगों में सबसे बड़ा भोगी बनने की होड़ लगी है।  यही कारण है कि देश में दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक रोगियों की संख्या बढ़ी है।
      आज के समय हम प्राचीन शिक्षा पद्धति की बात तो कर ही नहीं सकते।  कारण यह है कि भारत में मानव श्रम अधिक मात्रा में है और उसका निर्यात भी होता है।  हम जिन लोगों को विदेशों में नोक्री करते देखते हैं वह मानव श्रम के निर्यात का ही रूप है।  अंग्रेजी भाषा का इसलिये अपनाये रखा गया है ताकि श्रम निर्यात करने की सुविधा बनी रहे।  ऐसे में शिक्षा के पाठयक्रम में भारतीय ग्रंथों को समाहित करने का विचार प्रकट करने पर सामान्य व्यक्ति भी हंसेगा तब अंग्रेजी शिक्षा से उच्च पद पर लोगों से समर्थन की आशा करना भी व्यर्थ है। 
      यह अलग बात है कि समाज में नैतिक, भावनात्मक तथा वैचारिक पतन का रोना सभी होते हैं। हमारे प्राचीन ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों ने अपने परिश्रम से जीवन के सत्य की खोज कर प्रस्तुत कर दी है।  नया कोई सत्य दृष्टिागोचर नहीं होता।  ऐसे में जिन लोगों को ज्ञान के आधार पर जीवन का आंनद उठाना है उन्हें प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, July 17, 2014

जब असहाय हों तो शांत आसान करें-मनुस्मृति के आधार पर चिन्तन लेख(jab asahya hon tab shant aasan karen-A hindu hindi religion thought based on manu smriti




            म देख रहे हैं कि समाज में लोग एक भारी तनाव के बीच जीवन व्यतीत कर रहे हैं।  प्रदूषित वायु, अशुद्ध भोजन तथा आर्थिक संकट के कारण लोगों की मनस्थिति बिगड़ रही है।  जरा जरा सी बात पर हिंसा हो जाती है।  जब समस्याओं से जूझने के लिये मन को शांत रखने की आवश्यकता हो तब लोग आक्रामक होकर अपने तनाव के विसर्जन के दूसरों को पीड़ा देने के लिये तैयार रहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि दूसरों को शांति और अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले अनेक विद्वान भी आत्मसंयम रखने में असमर्थ दिखते हैं।  स्थिति यह है कि आजकल कोई भी आदमी अपनी बात धीरज से कहने की बजाय चीख कर इस तरह कहना चाहता है जैसे कि लोग बहरे या नासमझ हों।
मनु स्मृति में कहा गया है कि
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क्षीणस्य चैव क्रमशो दैवात् पूर्वकृतेन वा।
मित्रस्य चानुरोधेन द्विविधं स्मृतमासनम्।।

           
हिन्दी में भावार्थ-जब शक्ति क्षीण हो जाने पर या अपनी गलतियों के कारण चुप बैठना तथा मित्रों की बात का सम्मान करते हुए उनसे विवाद न करना यह दो प्रकार के शांत आसन हैं।
यदावगच्छेदायत्वयामाधिक्यं ध्रृवमात्मनः।
तदा त्वेचाल्पिकां पीर्डा तदा सन्धि समाश्चयेत्।।

           
हिन्दी में भावार्थ-भविष्य में अच्छी संभावना हो तो वर्तमान में विरोधियों और शत्रुओं से भी संधि कर लेना चाहिए।
            किसी भी मनुष्य के जीवन में दुःख, सुख, आशा और निराशा के दौर आते हैं। आवेश और आल्हाद के चरम भाव पर पहुंचने के बाद किसी भी मनुष्य का अपने पर से नियंत्रण समाप्त हो जाता है। भावावेश में आदमी कुछ नहीं सोच पाता। मनु महाराज के अनुसार मनुष्य को अपने विवेक पर सदैव नियंत्रण करना चाहिये। जब शक्ति क्षीण हो या अपने से कोई गलती हो जाये तब मन शांत होने लगता है और ऐसा करना श्रेयस्कर भी है। अनेक बार मित्रों से वाद विवाद हो जाने पर उनके गलत होने पर भी शांत बैठना एक तरह से आसन है। यह आसन विवेकपूर्ण मनुष्य स्वयं ही अपनाता है जबकि अज्ञानी आदमी मज़बूरीवश ऐसा करता है। जिनके पास ज्ञान है वह घटना से पहले ही अपने मन में शांति धारण करते हैं जिससे उनको सुख मिलता है जबकि अविवेकी मनुष्य बाध्यता वश ऐसा करते हुए दुःख पाते हैं।
            कहने का अभिप्राय यह है कि जीवन में ऐसे अनेक तनावपूर्ण क्षण आते हैं जब आक्रामक होने का मन करता है पर उस समय अपनी स्थिति पर विचार कना चाहिए। अगर ऐसा लगता है कि भविष्य में अच्छी आशा है तब बेहतर है कि शत्रु और विरोधी से संधि कर लें क्योंकि समय के साथ यहां सब बदलता है इसलिये अपने भाव में सकारात्मक भाव रखते स्थितियों में बदलाव की आशा रखना चाहिए।
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दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, July 6, 2014

प्रातःकाल दैहिक तथा मानसिक शुद्धि करने वालों को उत्पात नहीं सताते-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(pratkal daihik tathaa mansik shuddhi karane walon ko utpat nahin satate-A hindu hindu religion thought based on manu smriti)




            आजकल शिरडी के सांईबाबा की भक्ति को लेकर भारी विवाद चल रहा है।  भारतीय धार्मिक परंपरा  शंकरचार्य नाम पदवी का निर्माण हुआ जिन पर बैठे कुछ लोग अपने विचार आये दिन व्यक्त कर यह जताने का प्रयास करते हैं कि समग्र हिन्दू समाज उनका अनुयायी है पर जिस तरह जनमानस में स्वतंत्र की भक्ति धारा का प्रवाह हम देश में  देख रहे हैं उनके दावे  यकीन नही होता।  आदि शंकराचार्य ने हिन्दू धर्म को शक्तिशाली संगठित रूप देने का पवित्र प्रयास करने के लिये चार पीठों की स्थापना की थी। इसके अनुसार चार शंकराचार्य होना चाहिये पर देखा जा रहा है कि येनकेन प्रकरेण अनेक लोग स्वघोषित रूप से शंकराचार्य बन बैठे हैं। उसके बाद अनेक महामंडलेश्वर भी दिखाई देते हैं।  इनमें से अनेक लोग धर्म के रूप को व्यापक तथा कर्मकांडों के गूढ़ अर्थ बताते हुए अपनी विद्वता समाज में प्रमाणित करने का ऐसा प्रयास करते हैं जिसे सामान्य व्यक्ति सहजता से चुनौती नहीं दे सकता।
            अगर हम अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का स्वयं अध्ययन करें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि परमात्मा का नाम स्मरण करना ही सबसे बड़़ा यज्ञ है। श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा भी है कि यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूं  उन्होंने ज्ञानी भक्तों से यह अपेक्षा भी की है कि प्रातःकाल वह शुद्ध स्थान पर त्रिस्तरीय आसन बिछाकर प्राणायाम करें ताकि आंतरिक तथा बाह्य शुद्धि हो सके।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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मङ्गलाचारयुक्तः स्वात्प्रयतात्तमजितेन्द्रियः।
जपेच्च जुहुयाच्चैव नित्यमग्निमतन्द्रितः।।
            हिन्दी में भावार्थ-मनुष्य को सदा ही शुभ कार्य करने के लिये तत्पर रहने के साथ ही अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए मन पवित्र रखना चाहिये। नित्य ही प्रातः आलस्य का त्याग कर परमात्मा के नाम स्मरण से मनुष्य का चित्त पूरे दिन प्रसन्न रहता है।

मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यं च प्रयतात्पनाम्।
जपतां जुह्वतां चैव विनिपातो न विद्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-शुभ कर्म करने वाले, नित्य प्रातः बाह्य तथा आंतरिक शुद्धि रखने वाले एवं नित्य जाप होम करने वाले को दैहिक रोग, भौतिक बाधा एवं दैविक उत्पात कष्ट नहीं दे पाते।
            कहने का अभिप्राय यह है कि हमें अगर यह सांसरिक जीवन सहजता से बिताना है तो प्रातःकाल धर्म का जमकर उपयोग करें। सुबह दैहिक शुद्धि के बाद योगासन और प्राणायाम करने के साथ ही गायत्री मंत्र, शांति पाठ तथा ओम शब्द का जाप कर अपनी वैचारिक, शारीरिक तथा मानसिक शुद्धता के साथ ही  सांसरिक जीवन में प्रवेश करें।  जब अपना शरीर, मन, और विचार निर्मल हो जाता है तब हमें किसी दूसरे के ज्ञान मार्ग पर चलने की बाध्यता नहीं रह जाती।  बहुत ही सरल और सहज यह प्रंक्रिया उन लोगों के लिये आसान नहीं है जो अपने ही अंदर ज्ञान प्राप्त कर भक्ति का संकल्प नहीं पाल सकते।  जिनको बाहर से प्रेरणा या उत्साह की आवश्यकता पड़ती है वह कभी प्रातःकाल का उस तरह का उपयोग नहीं करते जैसा कि ज्ञान और योग साधक करते हैं।
            हम यह देख रहे हैं कि जिन लोगों ने प्राचीन ग्रंथों के ज्ञान संदेशों  रट लिया है वह उसका प्रदर्शन केवल अपने भौतिक लाभ के लिये करते हैं। वह ज्ञान देते हैं पर उनको सुनने वाले लोग भी केवल समय पास करने जाते हैं इसलिये समाज पर कोई प्रभाव नहीं दिखता।  देश में भ्रष्टाचार, अपराध तथा आर्थिक अपराध बढ़ रहे हैं उससे तो नहीं लगता कि हमारे समाज की जो मानसिकता पूरी तरह धार्मिक नहीं रह गयी है।  उस पर इतने सारे धर्म ध्वजवाहक चहूं ओर विचर रहे हैं तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर समाज में मानसिक तथा वैचारिक अंतर्द्वंद्व क्यों दिख रहे हैं? देश में स्वास्थ्य का स्तर बहुत नीचे क्यों चल रहा है? तय बात है कि कहीं न कहंी गड़बड़झाला है।  इसका निराकरण तभी संभव है जब लोग धर्म को गूढ़ समझने की बजाय उसके सहज भाव को समझ कर अपने समय का सदुपयोग करते हुए स्वयं ही ज्ञानी बन जायें।         


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, June 29, 2014

रविवार के दिन भगवान के स्वरूप पर अध्यात्मिक चर्चा-हिन्दी लेख(special hindi article on bhagwan,A Hindu religion discussion on sunday special)



            आजकल एक संत को भगवान मानने या मानने के विषय को  लेकर प्रचार माध्यमों पर बहस चली रही है। हमारे यहां इतिहास में अनेक कथित चमत्कारी संत हुए हैं पर जिन संत की चर्चा हो रही है उन पर बाज़ार के सौदागरों तथा प्रचार प्रबंधकों की विशेष श्रद्धा रही है। आज के आधुनिक युग में बाज़ार तथा प्रचार का संयुक्त उपक्रम किसी को भी भगवान बना सकता है और मामला बिगड़े तो शैतान भी बना सकता है।  बहरहाल अध्यात्मिक और योग साधकों के लिये ऐसी उन संत के भगवान होने या न होने पर चर्चा मनोरंजक हो सकती है तो साथ ही अपनी साधना पर चिंत्तन करने का अवसर भी प्रदान करती है।
            इस बहस में कथित रूप से अनेक धार्मिक विद्वान शामिल हो रहे हैं।  भारतीय अध्यात्म के पुरोधा होने का दावा करने वाले अनेक श्वेत और केसरिया वस़्त्र पहनने वाले सन्यासी भी इस बहस में प्रचार के लोभ की वजह से शामिल हो रहे हैं। चर्चित संत को मानने वाले इस देश में बहुत हैं पर एक बात तय है कि भारतीय अध्यात्मिक दर्शन की दृष्टि से उनका कोई महत्व नहीं है।  उनके नाम पर कोई एक समाज नहीं रहा  पर बहस कर यह साबित करने का प्रयास किया जा रहा है कि कोई अलग समूह है जो केवल आर्त भाव की भक्ति में लीन रहना चाहता है। हमारा तो यह मानना है यह बहस ही प्रायोजित है क्योंकि चुनाव के बाद इस समय कोई सनसनीखेज विषय नहीं है जिस पर प्रचार माध्यम अपना विज्ञापन का समय पास कर सकें इसलिये धर्म से जुड़ा विषय ले लिया है।

संत कबीरदास कहते हैं कि

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हरि सुमिरन सांची कथा, कोइ न सुनि है कान|

कलिजुग पूजा दंभ की, बाजारी का मान||

            सरल हिन्दी में व्याख्या-यदि कोई श्रद्धापूर्वक हरि की कथा कहे तो उस पर कोई ध्यान नहीं देता। इस कलियुग में अहंकारी की पूजा होती है और धर्म का बाज़ारीकरण वाले को सम्मान मिलता है।

कालि का स्वामी लोभिया, पीतल की खटाय।

राज दुवारें यौं फिरै, ज्यों हरियाई गाय।

            सरल हिन्दी में व्याख्या-इस कलियुग का स्वामी लोभ है जहां पीतल को खटाई में रखकर चमकाया जाता है। लोभी स्वामी राज दरबारों का रुख उसी तरह करते हैं जैसे गाय हरियाली की तरफ जाती है।

            अगर हम भारतीय समाज के अध्यात्म यात्रा को देखें तो हमारे अनेक प्राचीन ग्रंथ है जो पूज्यनीय तथा पठनीय है पर श्रीमद्भागवत गीत ने सभी का सार ले लिया है।  इसलिये यह माना जाता है कि भारतीय अध्यात्म का सबसे मजबूत आधार उसके संदेशों पर ही टिका है।  श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का आधुनिक संदर्भों में व्याख्या करने वालों को इस तरह की बहस में अपनी राय व्यक्त करने का अवसर नहीं मिलता और न ही वह चाहते हैं क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्तों से इतर लोगों में इस पर चर्चा करना निषिद्ध किया है।
            अनेक सन्यासी इस बहस में आ रहे हैं पर अगर श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों का अवलोकन करें तो उनके सन्यासत्व पर ही प्रश्न उठ सकते हैं।  उनका व्यवहार इस तरह है जैसे कि वह कोई धर्म के बहुत बड़े प्रवर्तक हैं।  एक बात यह सन्यासी भूल रहे हैं है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त हमेशा ही रहेंगे-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  जब इस समय महंगाई, बेकारी, बीमारी तथा अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है तो भय और आशंकाओं से ग्रसित लोग उससे उपजे तनाव के विसर्जन  के लिये नये मार्ग ढूंढ रहे हैं तो यह उनका अधिकार है। हमारे यहां भगवान की आरती की परंपरा रही जो कि अंततः आर्त भाव का ही परिचायक है। उसके बाद अर्थार्थी भाव के भक्तों का नंबर आता है। लोगों के अंदर जल्दी से जल्दी उपलब्धियां पाने की लालसा बढ़ी है इसलिये वह धर्म के नाम पर सिद्ध स्थानों का रास्ता पकड़ते हैं।  संसार के विषयों की स्थिति यह होती है कि समय आ गया तो काम सिद्ध नहीं तो इंतजार करो।  इस इंतजार में बीच लोग  दूसरा सिद्ध स्थान ढूंढने जाते है।  काम बन गया तो भक्त सिद्ध स्थान का स्थाई पर्यटक बन जाता है।  ज्ञान साधकों के लिये यह स्थिति अचंभित करने वाली नहीं होती। भक्त भी तीन प्रकार के होते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी-यह जानने वाले ज्ञानी कभी किसी की भक्ति पर टिप्पणी नहीं करते। इन तीनों से आगे होते हैं योगी जिनको ज्ञान भक्ति का प्रतीक माना जाता है जो ध्यान के माध्यम से अपनी आत्मा और मन का संपर्क करने में सफल होते हैं तब उन्हेें किसी अन्य प्रकार की भक्ति से प्रयोजन नहीं रह जाता-वह निरंकार परमात्मा का स्मरण करते हैं जो सामान्य मनुष्य के लिये सहज नहीं होती।  यह अलग बात है कि गेरुए और श्वेत वस्त्र धारण करने वाले अनेक लोग धर्म का झंडा उठाये स्वयं के योग होने का प्रचार करते हुए शिष्य समुदाय का संग्रंह का प्रचार करवाते हैं।
            हमारे यहां अनेक ऐसे कथित संत हुए हैं जिनके भगवान होने का प्रचार कर बाज़ार तथा प्रचार समूह अपना व्यवसायिक हित साधते हैं। यही कारण है कि हमारे यहां भक्ति में फैशन आ जाता है। यह अलग बात है कि हमारे यहां प्राचीन अध्यात्मिक पुरुषों-भगवान श्रीराम तथा श्रीकृष्ण-की ऐसी महत्ता है कि भारतीय जनमानस उसे कभी विस्मृत नहीं कर सकता।  इसी दृढ़ विश्वास के कारण अध्यात्मिक ज्ञान तथा योग साधक कभी किसी के भगवान होने के दावे पर चिंतित नहीं होते और न ही उनकी भक्ति तथा भक्तों पर प्रतिकूल टिप्पणी कर अपने ज्ञान का दुरुपयोग करते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, June 27, 2014

विषयों के त्याग से पूर्ण योगाभ्यास संभव-पतंजलि योग साहित्य के आधार पर चिंत्तन लेख(vishayon ke tyag ka poorn yogabhyas sanbhav-A hindu hindi religion thought based on patanjali yoga literature)



            हमारा योग दर्शन अत्यंत पुराना है और उसका मूल स्वरूप आत्म नियंत्रण के लिये  आंतरिक क्रियाओं से जुड़ा है। उसमें आसनों साथ व्यायाम जुड़ा नहंी दिखता। हालांकि वर्तमान काल में जब लोगों का जीवन अत्यंधिक श्रमवान नहीं है तब इन व्यायामों की आवश्यकता है और नये योग शिक्षकों नेे इस विषय के  साथ सूर्यनमस्कार, वज्रासन और पद्मासन जैसी प्रभावशील क्रियाओं को जोड़ा है तो अच्छा ही किया है।  चूंकि देह की सक्रियता इन आसनों से दिखती है तो करने और देखने वाले को अच्छी लगती है।  यही कारण है कि प्राचीन योग के साथ नया स्वरूप उसे लोकप्रिय बना रहा है। यह अलग बात है कि लोग बाह्य रूप पर अधिक ध्यान दे रहे हैं पर उसके आंतरिक प्रभाव का ज्ञान उन्हें नहीं है। दरअसल योग का मूल आशय सांसरिक विषयों से परे होकर साधना करने से है। अभ्यास से ऐसी स्थिति हो जाती है कि आदमी संसार के विषयों में कार्यरत दिखता है पर उसमें आसक्ति नहीं रह जाती। यह कर्मयोगी का श्रेष्ठ रूप होता है।
पतंजलि योग साहित्य में कहा गया है कि
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बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः।
ततः क्षीयते प्रकाशवरणाम्।।
धारणासु च योग्यता मनसः।।
स्वविषयास्प्रयोग चित्तस्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः।
            हिन्दी में भावार्थ-बाहर और भीतर के विषयों के चिन्त्तन का त्याग कर देना अपने आप में चौथा प्राणायाम है। उससे सांसरिक प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है। ज्ञान की धारणा से मन योग्य हो जाता है। अपने विषयों से रहित हो जाने पर इंद्रियों का चित्त से जो संपर्क होता है वही प्रत्याहार है।
            हमने देखा है कि अनेक लोग प्रचार माध्यमों में योग के बारे में पढ़ और सुनकर समूह बनाकर  साधना करते हैं। इस दौरान वह सांसरिक विषयों पर बातचीत करते हैं।  कहीं पार्क में बैठ गये और हाथ पैर हिलाने लगे।  दावा यह कि योग कर रहे हैं। वैसे प्रातः घर से बाहर निकलना ही अपने आप में एक अच्छी किया है जिसका लाभ अवश्य होता है पर इस दौरान वार्तालाप में अपनी ऊर्जा नष्ट करना ठीक नहीं है। उससे ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह कि जिन सांसरिक विषयों से बाद में जुड़ना उनका स्मरण करना प्रातःकाल सैर करने पर मिलने वाले मानसिक लाभ से वंचित करता है।  अनेक लोग समूह में बैठकर हाथ पैर हिलाकर योग कर का दावा अवश्य करें पर उनको यह मालुम नहीं है कि वह स्वयं को ही धोखा दे रहे हैं।
            भारतीय योग संस्थान योग साधना का अभ्यास कराने के लिये निशुल्क शिविर चलाता है। उसके शिविर में योग का जो अभ्यास कराया जाता है पर अभी तक विधियों में अत्यंत श्रेष्ठ है। श्रीमद्भागवत में त्रिस्तरीय आसन की चर्चा होती है। पहले कुश फिर उस पर मृगचर्म और फिर वस्त्र बिछाकर सुख से बैठना ही आसन बताया गया है।  भारतीय योग संस्थान के शिविरों  उसकी जगह प्लस्टिक की चादर, दरी और फिर कपड़े की चादर को आसन बनाकर योगाभ्यास कराया जाता है। इस तरह के अभ्यास से देह, मन और विचारों में शुद्धि आती है।
            इस तरह के अभ्यास के बाद श्रीमद्भागवत गीता के एक दो श्लोक का अध्ययन अवश्य करना चाहिये।  उससे यह बात समझ में आ जायेगी के वास्तव में विषयों का त्यागकर अभ्यास करना ही योग है। अगर आसन तथा प्राणायाम के समय भी विषयों के प्रति आसक्ति बनी रहे तो समझ लेना चाहिये कि हमें अधिक आंतरिक अभ्यास की जरूरत है।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Saturday, June 14, 2014

बड़ा काम करने पर छोटे आदमी को प्रशंसा की आशा नहीं करना चाहिये-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(bada kam karnea par chhote aadmi ko prashansa ki aasha nahin karna chahiye-A hindi hindu religion thought based on chankya policy)



            जिस तरह प्रकृत्ति नियमों में बंधकर चलती है वैसे ही यहां विचरने वाले जीव भी अपनी मूल प्रकृत्ति के साथ ही रहते हैं। इस प्रकृत्ति और जीवन को बांधने वाले तत्वों का समझने वाला ही ज्ञानी है। सत्य के साथ जीवन बिताने वाला कभी भी अपने अंदर किसी भी हालत में कष्ट का अनुभव नहीं करता।
            आमतौर से मनुष्य का यह स्वभाव होता है कि वह अपनी शक्ति, योग्यता तथा पराक्रम से अधिक वस्तु पाने की कामना करता है। कई लोगों में प्रतिष्ठित हस्तियों की तरह महत्व पाने का लोभ पैदा होता है।  हम देखते भी हैं कि फिल्म और टीवी में कथित सामाजिक धारावाहिकों में अनेक ऐसे पात्र सृजित किये जाते हैं जिनका आधार केवल कल्पना ही होती है पर देखने वाले अनेक कमजोर मानसिकता वाले लोग वैसा ही जीवन जीने का सपना देखते हैं।  यही कारण है कि अनेक लोग उलूल जुलूल हरकते कर मजाक का पात्र बनते हैं।  अनेक लोग तो अपनी हरकतों की वजह से जान भी गंवा बैठते हैं।  उन्हें यह समझाना कठिन है कि जीवन और प्रकृत्ति के नियम अलग ही है। मनुष्यों का समूह मूल रूप से इस प्रकृत्ति का है कि वह खास को ही तवज्जो देता है और अपनी तरह आम आदमी की कभी प्रशंसा नहीं कर सकता।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अयुक्त्तं स्वामिनो युक्त्तं युक्त्तं नीचस्य दूषणम्।
अमृतं राहवे मृत्युर्विषं शंकर भूषणम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-धन, उच्च पद और बाहुबल के स्वामी यानि समर्थ व्यक्ति का अनुचित कार्य भी उचित माना जाता है जबकि असमर्थ या छोटे आदमी का बड़ा काम भी महत्वहीन माना जाता है। अमृत राहु के  कंठ के लिये कंटक तो विष भगवान शंकर के लिये आभूषण बन गया था।
            आजकल हर बड़ा कार्य पैसे की दम पर ही होता है यही कारण है कि लोग येनकेन प्रकरेण उसे कमाना चाहते हैं।  उन्हें उचित या अनुचित साधनों की चिंता नही होती।  किसी ने अगर गलत काम कर पैसे कमा लिये तो वह प्रतिष्ठित मान लिया जाता है।  हमारे देश में भ्रष्टाचार का रोना सभी रोते हैं पर कभी कोई आम आदमी अपने आसपास किसी धनिक के भ्रष्ट होने पर उसके समक्ष प्रतिकूल  टिप्पणी करने का न साहस करता है न उसकी इच्छा ही होती है।  सच बात तो यह है कि हमारे देश में धर्म, कर्म, कला, साहित्य तथा अन्य बड़े कार्यक्रम बिना दो नंबर के धन के हो ही नहीं सकते पर लोग उसमें अधिक संख्या में शामिल होते हैं।  यह प्रदर्शन है वहां भीड़ जमा होती है जहां सादगी है वहां कोई नहीं जाता।
            कहने का अभिप्राय यही है कि ज्ञान साधकों को हमेशा अपनी चादर देखकर ही पांव फैलाने के सिद्धांत का पालन करते हुए यही मानना चाहिये कि उनकी प्रतिष्ठा में इससे अधिक वृद्धि नहीं होगी। अगर वह कोई भला काम करते हैं तो उन्हें उससे किसी प्रकार की प्रतिष्ठा पाने का मोह भी नहीं रखना चाहिए।


दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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